नागपुर से पुणे जा रही बस डिवाइडर से टकराकर पलटी; आग की लपटों में घिर 26 लोगों की मौतएबीएन सेंट्रल डेस्क। महाराष्ट्र में शनिवार रात भीषण हादसा हो गया। यहां बुलढाणा में नागपुर से पुणे जा रही एक बस हादसे का शिकार हो गयी। जानकारी के मुताबिक, बस जब समृद्धि महामार्ग एक्सप्रेसवे पर बुलढाणा के पास थी तभी बस पलट गयी और इसके बाद उसमें भीषण आग लग गयी। बुलढाणा पुलिस के डिप्टी एसपी बाबूराव महामुनि के मुताबिक, बस में 33 लोग सवार थे। जिनमें से 26 लोगों की जलकर मौत हो गयी। वहीं, अन्य लोगों को अस्पताल में भर्ती कराया गया है। उधर बुलढाणा जिला कलेक्टर ने कहा कि शवों की डीएनए जांच की जायेगी, जिसके बाद सभी शवों कों परिजनों को सौंप दिये जायेंगे। बुलढाणा पुलिस के डिप्टी एसपी बाबूराव महामुनि ने इसके बारे में जानकारी दी है। उन्होंने बताया कि यह घटना शुक्रवार रात करीब दो बजे की है। बस से 25 शव निकाले गये हैं। बस में कुल 33 लोग सवार थे। मृतकों में तीन बच्चे भी शामिल हैं। बस ड्राइवर का दावा- फट गया था टायर इस हादसे में छह से आठ लोग घायल हैं। फिलहाल हादसे की सही वजहों का पता नहीं चल पाया है। घायलों को बुलढाणा सिविल अस्पताल में भर्ती कराया जा रहा है। बस का ड्राइवर भी बच गया और उसने कहा कि टायर फटने के बाद बस पलट गयी, जिससे बस में आग लग गयी। प्रत्यक्षदर्क्षियों ने बताया कि बस पहले नागपुर से औरंगाबाद की ओर जाने वाले रास्ते पर दाहिनी ओर एक लोहे के खंभे से टकरायी। जिसके बाद ड्राइवर ने संतुलन खो दिया। इस दौरान बस रोड के बीच बने कंक्रीट के डिवाइडर से टकराकर पलट गयी। प्रत्यक्षदर्शियों ने यह भी बताया कि बस बायीं तरफ पलटी, जिससे बस का दरवाजा नीचे आ गया। ऐसे में उसमें सवार लोग बाहन नहीं निकल सके। बताया ये भी जा रहा है कि हादसे के दौरान बस से बड़ी मात्रा में डीजल सड़क पर फैल गया। डीजल फैलने के कारण ही बस में आग लग गयी।
मणिपुर पहुंचे राहुल गांधी, दो दिन तक राहत कैंपों में हिंसा पीड़ितों से करेंगे मुलाकातएबीएन सेंट्रल डेस्क। कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी पूर्वोत्तर के हिंसा प्रभावित राज्य मणिपुर के अपने दो दिवसीय दौरे के लिए गुरुवार को इंफाल पहुंचे। यहां से वह चुराचांदपुर जिले के लिए रवाना हुए, जहां वह पिछले महीने की शुरुआत में पूर्वोत्तर राज्य में हुई जातीय हिंसा के कारण विस्थापित हुए लोगों से मिलने के लिए राहत शिविरों का दौरा करेंगे। मणिपुर में इस साल मई में जातीय संघर्ष शुरू होने के बाद से 300 से अधिक राहत शिविरों में करीब 50,000 लोग रह रहे हैं। कांग्रेस पार्टी से जुड़े सूत्रों ने बताया कि राहुल गांधी की शुक्रवार को इंफाल में राहत शिविरों का दौरा करने और बाद में कुछ नागरिक संगठनों के सदस्यों से बातचीत करने की भी योजना है। मणिपुर में तीन मई को शुरू हुई हिंसा के बाद, यह कांग्रेस नेता का पूर्वोत्तर के इस राज्य का पहला दौरा है। बता दें कि मणिपुर में मेइती और कुकी समुदाय के बीच मई की शुरुआत में भड़की जातीय हिंसा में 100 से अधिक लोगों की मौत हो चुकी है। मणिपुर में अनुसूचित जनजाति (एसटी) का दर्जा देने की मेइती समुदाय की मांग के विरोध में 3 मई को पर्वतीय जिलों में आदिवासी एकजुटता मार्च के आयोजन के बाद झड़पें शुरू हुई थीं। मणिपुर की 53 प्रतिशत आबादी मेइती समुदाय की है और यह मुख्य रूप से इंफाल घाटी में रहती है। वहीं, नगा और कुकी जैसे आदिवासी समुदायों की आबादी 40 प्रतिशत है और यह मुख्यत: पर्वतीय जिलों में रहती है।
514 गांवों के 1.21 लाख से अधिक लोग प्रभावितएबीएन सेंट्रल डेस्क। असम में बाढ़ की स्थिति में तेजी से सुधार हो रहा है। राज्य आपदा प्रबंधन विभाग के मुताबिक अभी भी राज्य के 11 जिलों के 1 लाख 21 हजार 247 से अधिक नागरिक बाढ़ से प्रभावित हैं।सभी नदियां खतरे के निशान से नीचे बह रही हैं। बाढ़ की वजह से कई नदियों के तटबंध टूट गये हैं और सड़कें क्षतिग्रस्त हो गई हैं। प्रशासन लोगों को राहत पहुंचाने के लिए जरूरी कदम उठा रहा है।असम राज्य आपदा प्रबंधन विभाग के मंगलवार देरशाम जारी आंकड़ों के मुताबिक बाढ़ प्रभावित 11 जिलों में बजाली, बाक्सा, बरपेटा, बिश्वनाथ, दरंग, डिब्रूगढ़, गोलाघाट, कामरूप (ग्रामीण), लखीमपुर, नलबाड़ी और तामुलपुर शामिल हैं। बाढ़ से 22 राजस्व सर्किल अंतर्गत 514 गांवों के 1 लाख 21 हजार 247 लोग प्रभावित हुए हैं। बाढ़ से कुल 2389.63 हेक्टेयर फसल अभी भी प्रभावित है।बाढ़ प्रभावितों के लिए नौ राहत शिविर स्थापित किये गये हैं जबकि 106 राहत वितरण केंद्र खोले गये हैं। राहत शिविरों में कुल 713 लोग आश्रय लिये हुए हैं। बाढ़ की वजह से मंगलवार को बरपेटा जिले में एक व्यक्ति की मौत हो गयी। बाढ़ से राज्य के कुल 84 हजार 697 पशु धन प्रभावित हुए हैं। इनमें बड़े पशुओं की कुल संख्या 40 हजार 391 और छोटे पशुओं की 24 हजार 748 है। 19 हजार 558 कुक्कुट भी प्रभावित हुए हैं। बाढ़ के चलते बाक्सा और कामरूप (ग्रामीण) जिले में कुल 40 कच्चे घरों को आंशिक रूप से नुकसान पहुंचा है। बाढ़ प्रभावित इलाकों में छह मेडिकल टीमें अपनी सेवाएं दे रही हैं।बाढ़ प्रभावितों को खाद्य सामग्री का वितरण किया गया। इसमें 329.65 क्विंटल चावल, 60.15 क्विंटल दाल, 18.51 क्विंटल नमक, 1835.76 लीटर सरसों का तेल, पशुओं के लिए गेहूं का चोकर 2179.89 क्विंटल शामिल हैं। राज्य सरकार ने बाढ़ प्रभावित इलाकों में सभी तरह के आवश्यक कदम उठाये जाने के निर्देश दिये हैं।
मध्य प्रदेश में इस साल अब तक 24 टाइगर की गयी जानएबीएन सेंट्रल डेस्क। विशाखापत्तनम के इंदिरा गांधी प्राणी उद्यान में 24 घंटे के भीतर दो और बाघों की मौत हो गयी। वहीं, देश में इस वर्ष के शुरुआती छह महीनों में 95 से अधिक बाघों की जान गयी है। इसमें सबसे अधिक मौतें तीन राज्यों मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र और उत्तराखंड में हुईं हैं।इंदिरा गांधी प्राणी उद्यान में जानकी नाम की बाघिन (22) की वृद्धावस्था के कारण मौत हो गयी। उसके शरीर के अंगों ने काम करना बंद कर दिया था। वहीं, एआरसी (एनिमल रेस्क्यू सेंटर) में कुमारी (23) नाम की एक बाघिन की भी देर रात मौत हो गयी थी। प्राणी उद्यान की क्यूरेटर नंदनी सलारिया ने बताया कि बाघिन की उम्र औसत आयु से अधिक हो गयी थी। प्रोजेक्ट टाइगर के 50 साल पूरे होने पर इस साल अप्रैल में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 2022 की बाघ गणना के आंकड़े जारी किए थे। इसके अनुसार, 2018 से अब तक देश में 200 बाघ बढ़े है, लेकिन 2023 के शुरुआती छह महीने में ही इसके आधे बाघों की मौत हो चुकी है। नेशनल टाइगर कंजर्वेशन अथॉरिटी के अनुसार, इस साल 25 जून तक देशभर में 95 बाघों की मौत रिकॉर्ड की गई है। इनमें सबसे अधिक मध्य प्रदेश में 24, महाराष्ट्र में 19 और उत्तराखंड 14 बाघों की मौत हुई है। इस मामले में केंद्रीय वन मंत्रालय ने सभी राज्यों में जांच के आदेश दिये हैं।केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्रालय में महानिदेशक सीपी गोयल का कहना है कि आबादी बढ़ने के साथ वनों पर अतिक्रमण का दबाव बढ़ रहा है। 2021 में उत्तराखंड में तीन और 2022 में कुल छह बाघों की मौत हुई थी।साल 2018 की गणना के अनुसार, 526 बाघों के साथ मध्य प्रदेश पहले स्थान पर है। 524 बाघों के साथ कर्नाटक दूसरे और 442 बाघों के साथ उत्तराखंड तीसरे स्थान पर है।
एबीएन सेंट्रल डेस्क। केन्द्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने कहा कि मादक पदार्थों के खिलाफ सरकार की जीरो टॉलरैंस नीति के सफल परिणाम दिखने लगे हैं और सरकार का संकल्प है कि देश में मादक पदार्थों का व्यापार न तो होने देंगे और न ही भारत के माध्यम से इन्हें विश्व में कहीं बाहर जाने देंगे।केन्द्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने नशीली दवाओं के दुरुपयोग व अवैध तस्करी के खिलाफ अंतर्राष्ट्रीय दिवस पर सोमवार को अपने संदेश में कहा कि जीरो टॉलरैंस नीति का मुख्य आधार सरकार की व्होल ऑफ गवर्नमैंट अप्रोच है जिसमें अलग-अलग विभागों के समन्वय से नीति को प्रभावी बनाया गया है। मादक पदार्थों के खिलाफ अभियान चला रही संस्थाओं और लोगों को बधाई देते हुए उन्होंने कहा कि यह अच्छी बात है कि मादक पदार्थ नियंत्रण ब्यूरो इस बार भी अखिल भारतीय स्तर पर नशा मुक्त पखवाड़ा का आयोजन कर रहा है।गृह मंत्री ने कहा- हमारा संकल्प है कि हम भारत में नार्कोटिक्स का व्यापार नहीं होने देंगे और न ही भारत के माध्यम से ड्रग्स को विश्व में कहीं बाहर जाने देंगे। ड्रग्स के खिलाफ इस मुहिम में देश की सभी प्रमुख एजैंसियां, विशेषकर नार्कोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो निरंतर अपनी जंग जारी रखे हुए हैं। इस अभियान को सशक्त करने के लिए गृह मंत्रालय ने 2019 में एनकॉर्ड की स्थापना की एवं हर राज्य के पुलिस विभाग में मादक पदार्थ रोधी कार्य बल का गठन किया गया जिसका पहला राष्ट्रीय सम्मेलन गत अप्रैल में दिल्ली में हुआ। उन्होंने कहा कि मादक दवाओं के दुरुपयोग एवं दुष्प्रभावों के खिलाफ राष्ट्रीय स्तर पर उपयुक्त मंचों के माध्यम से युद्ध स्तर पर अभियान चलाया जा रहा है।
विनोबा भावे ने कभी नहीं कहा आपातकाल को अनुशासन पर्व : राम बहादुर रायप्रेस को कुचलने के लिए था सेंसरशिप : आलोक मेहताआपातकाल के बाद हुए चुनाव ने तय कर दिया कि ये देश परिवारवादी सत्ता की सनक से नहीं बल्कि संविधान से चलेगा : हितेश शंकरआपातकाल में प्रेस पर पाबंदी के खिलाफ एनयूजे ने निभायी थी बड़ी भूमिका : रास बिहारीएनयूजेआई स्कूल ऑफ जर्नलिज्म एंड कम्युनिकेशन व दिल्ली जर्नलिस्ट्स एसोसिएशन द्वारा आपातकाल और प्रेस विषय पर आयोजित संगोष्ठी में वक्ताओं ने किए कई खुलासेएबीएन सेंट्रल डेस्क। वरिष्ठ पत्रकार, लेखक तथा हिन्दुस्थान समाचार के प्रधान संपादक रामबहादुर राय ने एनयूजेआई स्कूल ऑफ जर्नलिज्म एंड कम्युनिकेशन तथा दिल्ली जर्नलिस्ट्स एसोसिएशन द्वारा आपातकाल और प्रेस विषय पर आयोजित संगोष्ठी में खुलासा किया कि कांग्रेस के नेता व कार्यकर्ता आपातकाल के दौरान पुलिस के मुखबिर बन गये थे। आपातकाल के दौरान 16 महीने जेल में बंद रहे श्री राय ने बताया कि कांग्रेस के नेताओं के दबाव में तमाम लोगों को गिरफ्तार कर जेल में डाला गया था। उन्होंने यह भी खुलासा किया कि आचार्य विनोवा भावे ने कभी नहीं कहा था कि आपातकाल अनुशासन पर्व है। कांग्रेसी नेता निर्मला देशपांडे द्वारा फैलाये गये झूठ का विनोबा भावे आपातकाल में व्याप्त भय के कारण विरोध नहीं कर पाये थे।दिल्ली में आयोजित संगोष्ठी में वरिष्ठ पत्रकार, आईटीवी के संपादकीय निदेशक डॉ आलोक मेहता, पांचजन्य के संपादक हितेश शंकर समेत कई पत्रकारों ने अपने विचार व्यक्त किये। संगोष्ठी की अध्यक्षता नेशनल यूनियन ऑफ जर्नलिस्ट्स के अध्यक्ष श्री रास बिहारी ने की।श्री राय ने संगोष्ठी में बताया कि आपातकाल का केवल राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्वयंसेवकों ने ही जमकर विरोध किया था। इंदिरा गांधी के खिलाफ आंदोलन के अगुआ जयप्रकाश नारायण गिरफ्तारी के बाद छाये सन्नाटे से हताश हो गए थे। जेपी को उम्मीद थी कि उनकी गिरफ्तारी के बाद पटना समेत देशभर में भारी विरोध होगा। पर देश में पूरी तरह सन्नाटा छा गया। उन्होंने बताया कि जेपी ने जेल में एक महीने बाद अपनी डायरी लिखना शुरू किया था। आपातलकाल के पहले पांच महीने में इंदिरा सरकार के अत्याचारों के कारण देश हिल गया था। इसके बाद भय को मिटाने के लिए संघ के स्वयंसेवकों ने भूमिगत होकर आपातकाल के विरोध में कार्य किया। उन्होंने यह भी खुलासा किया कि क्रांतिकारी माओवादी नेता और कार्यकर्ताओं ने भी आपातकाल में सरकार और पुलिस के मुखबिरों की भूमिका निभाई थी। जेल में बंद माओवादी नेता गिरफ्तार नेताओं की जासूसी करते थे।जेपी आंदोलन में बड़ी भूमिका निभाने वाले रामबहादुर राय ने कहा कि इंदिरा गांधी के विरोध में जेपी आंदोलन में सत्ता बदलने का दम नहीं था। उन्होंने कहा कि जेलों में ऐसा माहौल था कि आपातकाल कभी समाप्त नहीं होगा और परिवार के लोगों से इस जन्म में भेंट नहीं होगी।श्री राय ने कहा कि इंदिरा गांधी ने यह सोचकर जनवरी 1977 में लोकसभा चुनाव की घोषणा की थी कि आपातकाल में जनता उनके निर्णय पर मोहर लगा देगी। उन्होंने बताया कि इंदिरा गांधी ने दार्शनिक जे कृष्णमूर्ति, कांग्रेस नेता ओम मेहता और कई अन्य लोगों की राय पर चुनाव कराए थे। इंदिरा गांधी की सोच थी कि आपातकाल में चुनाव करा कर, वह फिर जीत जायेंगी, लेकिन जनता ने उनके मंसूबों पर पानी फेर दिया।श्री राय ने कहा कि इंदिरा गांधी ने केवल प्रधानमंत्री बने रहने के लिए ही आपातकाल घोषित किया था। इंदिरा गांधी को अगर सुप्रीम कोर्ट से राहत मिल जाती तो आपातकाल भी नहीं थोंपा जाता। इसके लिए इंदिरा गांधी ने सभी लोकतांत्रिक अधिकारों को हनन किया।मीडिया पूरी तरह स्वतंत्र हैं: आलोक मेहता आईटीवी के संपादकीय निदेशक पद्मश्री डॉ आलोक मेहता ने कहा इस समय पत्रकारों के बीच यह भ्रम फैलाया जा रहा है कि देश में आपातकाल जैसी स्थिति है। उन्होंने कहा कि आज भी मीडिया को पूरी स्वतंत्रता है कि वह तथ्यों के आधार पर समाचारों का प्रकाशन करें। उन्होंने कहा कि इंदिरा गांधी कहा करती थी कि हमें जयप्रकाश के आंदोलन से उतना खतरा नहीं है जितना अखबारों से है।श्री मेहता ने कहा कि आपातकाल के दौरान झुग्गी हटाने, श्रमिकों को बोनस का भुगतान न होने और गोदावरी जल संकट तक की खबरें लिखने पर भी पाबंदी थी। सरकारी अधिकारी और दरबारी राजा से बढ़ कर वफाद़ार बन गये थे। आपातकाल के दौरान हिन्दुस्थान समाचार एजेंसी में संवाददाता रहे श्री मेहता ने अपने कई अनुभव इस अवसर पर साझा किये। श्री मेहता ने कहा कि आपातकाल के दौरान लोकतंत्र को जीवित रखने के लिए पत्रकारों ने बड़ी भूमिका निभाई थी। इसी कारण तमाम पत्रकारों को इंदिरा सरकार की नाराजगी झेलनी पड़ी। इंदिरा सरकार ने प्रेस को कुचलने के लिए सेंसरशिप का पूरी तरह दुरुपयोग किया। सरकारी अधिकारी और दरबारी राजा से बढ़ कर वफाद़ार बन गये थे। आपातकाल ने एक बड़ा सबक यह दिया है कि अब कोई भी सरकार इस बारे में सोच भी नहीं सकती है।इंदिरा ने ब्रांड बनने के लिए देश का बैंड बजाया : हितेश शंकर पांचजन्य के संपादक हितेश शंकर ने कहा कि महत्वपूर्ण यह है कि आपातकाल को देखने की मीडिया की दृष्टि क्या है? उन्होंने कहा कि आपातकाल की घोषणा इलाहाबाद उच्च न्यायालय के 12 जून 1975 को इंदिरा गांधी को छह वर्ष के लिए अयोग्य ठहराने के निर्णय निर्णय के बाद की गयी। इसके बीज 1967 में ही पड़ गये थे, जबकि प्रसिद्ध गोलकनाथ बनाम पंजाब सरकार मामले में उच्चतम न्यायालय ने व्यवस्था दी कि व्यक्तियों के मूलभूत अधिकारों पर अंकुश नहीं लगा सकती। श्री शंकर ने कहा कि श्रीमती गांधी के सत्ता में आने के बाद बैंकों का राष्ट्रीयकरण, प्रिवी पर्स की समाप्ति, तत्कालीन प्रधानमंत्री द्वारा प्रतिबद्ध न्यायपालिका और नौकरशाही की जरूरत पर जोर दिया जाना तत्कालीन शासकों की मानसिकता दर्शाता था। उन्होंने कहा कि केशवानंद भारती मामले में पुन: न्यायालय की इस व्यवस्था से किस संविधान के मूल ढांचे में बदलाव नहीं किया जा सकता। उसके बाद संविधान को शासकों की मर्जी के अनुसार ढालने का प्रयास तेज हो गया। जो परिवार के आगे नहीं झुक रहे थे, उन्हें झुकाने की कोशिशें की गयी। श्री शंकर ने कहा कि आपातकाल के दौरान दो सौ से ज्यादा पत्रकारों को गिरफ्तार कर जेलों में डाल दिया गया था। उन्होंने कहा कि आपातकाल के बाद हुए आम चुनावों ने यह तय कर दिया था कि यह देश सत्ता की सनक से नहीं बल्कि संविधान से चलाया जाता है। आपातकाल में प्रेस पर पाबंदी के खिलाफ एनयूजे ने निभायी थी बड़ी भूमिका : रास बिहारी संगोष्ठी की अध्यक्षता करते हुए एनयूजेआई के अध्यक्ष रास बिहारी ने कहा कि आपातकाल में एनयूजेआई के नेताओं ने प्रेस पर पाबंदी के खिलाफ बड़ी भूमिका निभाई थी। कई नेताओं को गिरफ्तार कर जेल में डाल दिया गया। बड़ी संख्या में सदस्यों की मान्यता रद्द कर दी गयी। कई पत्रकारों को नौकरी से निकाल दिया गया। रासबिहारी ने देश में मीडिया पर अघोषित आपातकाल को भ्रम फैलाने की साजिश बताते हुए कहा कि मीडिया के सामने हर समय चुनौती रहेंगी। मीडिया संस्थानों में मालिकों की मनमानी हावी है और आज सम्पादक मैनेजर हो गए है। जिस मीडिया प्रतिष्ठान को दिल्ली में भाजपा का समर्थक कहा जाता है, उसे पश्चिम बंगाल में मुख्यमंत्री ममता बनर्जी का भोंपू बताया जाता है। सत्ता के बारे में तथ्यों के आधार पर समाचार लिखने वालों को परेशानी उठानी पड़ सकती है पर उन्हें चुप नहीं कराया जा सकता है। उन्होंने कहा कि दिल्ली की केजरीवाल सरकार हो या बिहार की नीतीश कुमार सरकार, उनकी आलोचना करने पर विज्ञापन बंद कर दिए जाते हैं। ऐसा हाल कई राज्यों में है। उन्होंने कहा कि मालिकों द्वारा समाचार छापने या न छापने के कारण ही अघोषित आपातकाल का भ्रम फैलाया जाता है। एनयूजेआई स्कूल ऑफ जर्नलिज्म एंड कम्युनिकेशन के अध्यक्ष अनिल पांडे ने संगोष्ठी के वक्ताओं का परिचय कराते हुए मीडिया की स्वतंत्रता में उनके योगदान के बारे में बताया। एनयूजेआई स्कूल के सचिव के पी मलिक ने संगोष्ठी में पधारे अतिथियों का स्वागत किया।दिल्ली पत्रकार संघ के संयोजक राकेश थपलियाल ने संगोष्ठी का संचालन करते हुए मीडिया से जुड़े मुद्दो को उठाया। एनयूजेआई के सचिव अमलेश राजू ने धन्यवाद ज्ञापन में कहा कि मीडिया के एकजुट होकर काम करने की आवश्यकता है। संगोष्ठी में संसद टीवी के वरिष्ठ एंकर मनोज वर्मा, अमरेंद्र गुप्ता, यूनीवार्ता के ब्यूरो प्रमुख मनोहर सिंह, वरिष्ठ पत्रकार उषा पाहवा, प्रतिभा शुक्ल, ज्ञानेंद्र सिंह, विवेक शुक्ल, दीपक उपाध्याय आदि ने भी विचार रखे। संगोष्ठी में बड़ी संख्या में पत्रकारों ने हिस्सा लिया
एबीएन सेंट्रल डेस्क। अदाणी समूह ने अडानी दिवस के मौके पर 2023 क्रिकेट विश्व कप के लिये जीतेंगे हम... कैंपेन लांच किया है।समूह के चेयरमैन गौतम अडानी के नेतृत्व में शुरू हुए इस अभियान का उद्देश्य भारतीय क्रिकेट प्रेमियों को एकजुट करना और विश्व कप में जीतेंगे हम... के नारे के साथ उन्हें भारतीय टीम का समर्थन करने के लिये प्रेरित करना है।
मणिपुर संकट को लेकर क्या हो प्रतिक्रिया मणिपुर ऐसी अराजकता में फंसा हुआ है जैसी देश के अन्य हिस्सों में दशकों से नहीं दिखी हैएबीएन सेंट्रल डेस्क। मणिपुर ऐसी अराजकता का शिकार हो गया जो देश के किसी अन्य हिस्से में दशकों से देखने को नहीं मिली है। अगर आप यह परखना चाहते हैं कि देश के सामने आज सबसे बड़ा तात्कालिक आंतरिक या बाहरी सुरक्षा खतरा क्या है तो कृपया उसकी तलाश टेलीविजन समाचार चैनलों पर न कीजिये। क्योंकि तब आप भ्रमित हो सकते हैं और आपको लग सकता है कि यह पश्चिम बंगाल के पंचायत चुनावों की हिंसा है। अगर एक देशभक्त भारतीय के रूप में आपको जरूरी लगे तो थोड़ा और पूर्व में देखिए और भारत के नक्शे पर मणिपुर को तलाशिये। मणिपुर ऐसी अराजकता में फंसा हुआ है जैसी देश के अन्य हिस्सों में दशकों से नहीं दिखी है। यहां तक कि मुझ जैसा व्यक्ति जिसने चार दशकों तक देश में कई जगह अशांति और आतंकवाद देखा हो उसके लिए भी मणिपुर की तस्वीरें असाधारण हैं। पहले भी एक समुदाय दूसरे समुदाय के खिलाफ लड़ा है और अतीत में भी राज्य सरकारों ने अपना नियंत्रण और प्रतिष्ठा गंवाई है। यहां तक कि कई बार ताकतवर केंद्र सरकार भी हालात संभालने में मुश्किलों से दो चार हुई। लेकिन लगातार छह सप्ताह तक और वह भी 2023 में? सन 1950 (नगालैंड), 1960 (मिजोरम) और सन 1980 के दशक (पंजाब और असम) में उत्पन्न चुनौतियां अलग थीं लेकिन सन 2023 में केंद्र और राज्य में भारतीय जनता पार्टी ने जिस प्रकार का राजनीतिक नियंत्रण बना रखा है और जिस तरह का संचार, लॉजिस्टिक्स, सैन्य और अर्द्धसैनिक शक्ति उपलब्ध है तब यह सब क्यों? अतीत वर्तमान को दिशा दिखाने वाला नहीं होता है, खासकर तब जबकि बात राज्य की शक्ति के प्रयोग की हो। बुनियादी बात यह है कि सन 1980 के दशक के आरंभिक वर्षों में जब वहां नगा, मिजो और मणिपुरी विद्रोह सक्रिय थे और असम में अराजकता का माहौल था, तब एक पत्रकार के रूप में मैंने नगालैंड में मोकॉकचंग में टेलीग्राफ के कार्यालय में मोर्स मशीन से दो रिपोर्ट भेजी थीं। उस समय संचार बहुत कमजोर या लगभग अनुपस्थित था और इस बात ने इस अशांत क्षेत्र में सरकार के काम को काफी कठिन बना दिया था। पत्रकारों के लिए तो काम करना लगभग असंभव था। आज ऐसी कोई वजह नहीं है। क्या मणिपुर के आज के हालात की तुलना अतीत के किसी समय से हो सकती है? हम कुछ घटनाओं पर नजर डालकर यह परीक्षण कर सकते हैं कि सरकार ने उस वक्त कैसे प्रतिक्रिया दी थी। पूर्वोत्तर में तथा देश के अन्य हिस्सों में ऐसी घटनाएं पहले भी हुई हैं जहां एक समुदाय ने दूसरे समुदाय को निशाना बनाया हो। असम में बांग्ला भाषियों और ज्यादा विशिष्ट होकर बात करें तो बांग्ला भाषी मुस्लिमों को बहुत हिंसात्मक अंदाज में निशाना बनाया गया। परंतु सरकार ने तत्परता से कार्रवाई की और कड़े कदम उठाकर अपनी प्रभुता स्थापित की। त्रिपुरा में हमने देखा कि आदिवासी अल्पसंख्यकों (आबादी के 25 फीसदी से भी कम) ने बहुसंख्यक बंगालियों की चुन-चुनकर हत्याएं कीं। इनमें सबसे पहली और सबसे कुख्यात घटना थी 8 जून, 1980 को अगरतला के निकट मंडाई नरसंहार जिसमें 400 से 600 के बीच ग्रामीण मारे गए थे। उससे भी बहुत तेजी से निपटा गया था। आखिर में हम जम्मू कश्मीर तथा पंजाब पर नजर डालते हैं। सन 1990 में जब विश्वनाथ प्रताप सिंह प्रधानमंत्री थे तब कुछ महीनों के लिए केंद्र और राज्य दोनों ने इस हिस्से पर नियंत्रण गंवा दिया था। इसके बावजूद सरकार ने हमेशा वापसी की। उस समय भी वहां मौजूदा मणिपुर जैसे हालात नहीं बने। पुलिस शस्त्रागार से हजारों की तादाद में हथियार बिना प्रतिरोध के लुटे नहीं। मणिपुर में लुटेरे इतने बेफिक्र हैं कि वे अपने आधार कार्ड छोड़कर जा रहे हैं ताकि कोई जांच होने पर ड्यूटी पर मौजूद पुलिस जवान मदद कर सकें। पूर्वोत्तर में शायद सबसे गंभीर खतरा तब उत्पन्न हुआ था जब इंदिरा गांधी को प्रधानमंत्री बने कुछ ही सप्ताह बीते थे। तब उन्हें ताकतवर नहीं माना जाता था। भारत केवल 19 महीनों के अंतराल में पंडित नेहरू और लाल बहादुर शास्त्री के रूप में दो प्रधानमंत्रियों की मौत देख चुका था। मिजो विद्रोहियों ने संप्रभु मिजोरम की घोषणा कर दी थी जबकि उस वक्त वह असम का एक जिला था जिसका नाम लुशाई हिल्स था। मिजो विद्रोही डिप्टी कमिश्नर कार्यालय और असम राइफल्स बटालियन के स्थानीय मुख्यालय पर कब्जा करने ही वाले थे। इंदिरा गांधी ने भारतीय वायु सेना को हवाई हमले और बमबारी करने का आदेश दिया। आज भी उस कदम को विवादास्पद माना जाता है। परंतु इसने विद्रोह को इस हद तक दबा दिया कि सेना का पहला दस्ता 200 किलोमीटर दूर मैदानी इलाकों से आसानी से वहां तक पहुंच सका। अब बात करते हैं सन 1980 के दशक के आरंभ के पंजाब की। हमने उदाहरणों की इस सूची में पंजाब को अंतिम स्थान इसलिए दिया कि शायद आगे की बातों की राह यहीं से निकलेगी। आतंकियों द्वारा हत्याओं का पहला सिलसिला सन 1981-83 में भिंडरांवाले के वर्षों में देखने को मिला। कांग्रेस पार्टी केंद्र और राज्य में सत्ता में वापस आ गयी थी। दरबारा सिंह उसके मुख्यमंत्री थे। पंजाब केसरी नामक प्रमुख अखबार के मालिक संपादक लाला जगत नारायण और एएस अटवाल नामक पुलिस विभाग के डीआइजी के रूप में हिंदुओं की हत्याओं ने देश को हिला दिया था। तब इंदिरा गांधी ने क्या किया? उन्होंने राष्ट्रपति शासन लगाकर अपनी ही पार्टी की सरकार और मुख्यमंत्री को हटा दिया। इतिहास बताता है कि इससे पंजाब की चुनौतियां समाप्त नहीं हुई लेकिन इससे यह पता चला कि सरकार संकट और उससे निपटने में शासन की नाकामी को स्वीकार कर रही है। अगर हर नये संकट, गलत कदम या झटके का जवाब यही है कि ऐसा पहले भी हो चुका है और खासकर कांग्रेस के शासनकाल में ऐसा हो चुका है तो हमें इतिहास में इसके उदाहरणों को भी देखना होगा। दिल्ली से महज 220 किलोमीटर दूर अपनी ही पूर्ण बहुमत की सरकार को राष्ट्रपति शासन लगाकर हटाने वाली सरकार कमजोर तो नहीं थी। उस समय इंदिरा गांधी आपातकाल के बाद शिखर पर थीं। उनके पास वह बहुमत था जो आज भाजपा के पास भी नहीं है। हम समझ सकते हैं कि मौजूदा सरकार इंदिरा गांधी की तरह कदम उठाने से या उनसे सबक लेने से हिचकिचा क्यों रही है लेकिन ईमानदारी से देखें तो समस्या के मूल में राज्य सरकार है, वह इसका हल नहीं है। कोई पक्ष उस पर भरोसा नहीं करता, उसके शीर्ष काम करने वाले लोग अदृश्य हैं और उसकी सबसे अहम जवाबदेही यानी कानून व्यवस्था बरकरार रखने का काम बाहर से भेजे गये सलाहकार और अधिकारी कर रहे हैं। इसके अलावा इसका निरंतर सत्ता में बने रहना दोनों पक्षों को भड़का रहा है। कुकी इसे बहुसंख्यक एजेंडे के हिस्से के रूप में देखते हैं मैतेई इसे अपना संरक्षण कर पाने में अक्षम मानते हैं जबकि उन्होंने चुनाव में उसका जमकर समर्थन किया था। हर संकट और उससे निपटने के तरीके को लेकर अतीत में नजीर मौजूद है लेकिन कई ऐसे कारक हैं जो मणिपुर के मौजूदा संकट को असाधारण बनाते हैं। हम ऐसी तीन वजहों की बात करेंगे: ऐसे असंख्य उदाहरण हैं जहां एक समुदाय ने धर्म, जातीयता या भाषा के आधार पर दूसरे समुदाय पर हमला किया। हमने दो समुदायों को खूब लड़ते हुए भी देखा है। इतिहास में यह पहला मौका है जब दो समुदाय बड़ी तादाद में और स्वचालित हथियारों से लैस होकर लड़ रहे हैं। उनके पास लंबी दूरी तक मार करने वाली स्नाइपर राइफल तक हैं जिनसे हमारे अधिकांश सशस्त्र बल भी जलन कर सकते हैं। गृहयुद्ध भला और कैसा होता है। यह पहला मौका है जब अराजकता छह सप्ताह से जारी है और सरकार को समुचित राजनीतिक प्रतिक्रिया देने में नाकाम रही है। इस इलाके में और जवानों की तैनाती, वातार्कारों की नियुक्ति शांति कायम करने के लिए समिति की स्थापना आदि सभी प्रयास नाकाम रहे हैं। ये फौरी उपाय हैं जो समस्या को हल करने में सक्षम नहीं। एक पीड़ित समुदाय के सामूहिक पलायन के अनेक मामले हैं। उदाहरण के लिए कश्मीरी पंडित। मणिपुर से दोनों प्रमुख समुदाय भाग रहे हैं। दरअसल यह पहली बार हो रहा है कि जो भी भाग सकता है, वह भाग रहा है। केंद्र सशक्त भी है और संविधान के अनुच्छेद 355 के अधीन हर राज्य को बाहरी और आंतरिक खतरे से बचाने की जिम्मेदारी भी उसकी है। अगर राज्य सरकार केंद्र की तमाम मदद के बावजूद नाकाम रहता है तो उसे जाना ही चाहिए। उसे कोई शर्म नहीं बची है। याद रहे इंदिरा गांधी ऐसा कर चुकी थीं। मुश्किल से गुजर रहे मणिपुर में हालात एकदम से ठीक नहीं होंगे। यह एक लंबी प्रक्रिया का हिस्सा होगा। परंतु एक शुरूआत तो होगी और दोनों पक्ष इसे देखेंगे। इससे दोनों पक्षों की इस साझा भावना का भी निराकरण होगा कि मणिपुर जल रहा है लेकिन किसी को परवाह नहीं है।
कल 25 जून यानी आपातकाल के 46 साल... एबीएन सेंट्रल डेस्क। पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने साल 1975 में आज ही के दिन देशभर में आपातकाल लगाए जाने की घोषणा की थी। भारत में 25 जून 1975 से 21 मार्च 1977 तक 21 महीने तक इमरजेंसी लगी थी।भारत के इतिहास में कल ही के दिन 25 जून 1975 में देशभर में आपातकाल लगाने की घोषणा की गयी थी। यह आदेश देश में तात्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की सिफारिश पर दिये गये थे। जिसने कई ऐतिहासिक घटनाओं को जन्म दिया। भारतीय राजनीति के इतिहास में यह सबसे विवादस्पद काल रहा क्योंकि आपातकाल में भारत में चुनाव स्थगित हो गये थे। भारत में 25 जून 1975 से 21 मार्च 1977 तक की 21 महीने की अवधि का आपातकाल था। 1975 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के नेतृत्व वाली सरकार की सिफारिश पर तत्कालीन राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद ने आपातकाल की घोषणा की थी। यह घोषणा भारतीय संविधान के अनुच्छेद 352 के अंतर्गत की गयी थी। उस वक्त इंदिरा गांधी ने सरकार के खिलाफ आवाज उठाने वले हर शख्स को जेल में बंद करवा दिया था। तत्कालीन राष्ट्रपति फखरुद्दीन ने दी थी आपातकाल की मंजूरी बता दें कि देश में आपातकाल के ड्राफ्ट पर तत्कालीन राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद ने 25 जून की आधी रात को हस्ताक्षर किये थे। जिसके बाद पूरा देश इंदिरा गांधी और संजय गांधी का बंधक बना दिया गया था। वहीं 26 जून की सुबह छह बजे इंदिरा गांधी ने कैबिनेट की आपात बैठक बुलायी, जिसमें गृह सचिव खुराना ने आपातकाल का घोषणापत्र कैबिनेट को सुनाया। आपातकाल में जेल भेजे गये इंदिरा विरोधी देश में आपातकाल लगते ही इंदिरा के कड़े विरोधी माने जा रहे जयप्रकाश नारायण को 26 जून की रात डेढ़ बजे गिरफ्तार कर लिया गया था। उनके साथ इंदिरा की नीतियों का विरोध कर रहे कई और नेताओं को भी गिरफ्तार कर लिया गया और देशभर की कई जेलों में डाल दिया गया। देश में आपातकाल की जानकारी आम जनता को आल इंडिया रेडियो के जरिए दी गयी थी। देशभर में आपातकाल लगाये जाने के बाद मेंटेनेंस आफ इंटरनल सिक्योरिटी एक्ट यानी मीसा के तहत हजारों लोगों को गिरफ्तार किया गया था। बता दें कि संविधान के अनुच्छेद 352 में बाहरी आक्रमण और आंतरिक डिस्टरबेंस या सशस्त्र संघर्ष की स्थिति में आपातकाल लगाये जाने की व्यवस्था दी गयी है। आपातकाल के पीछे मुख्य कारण जयप्रकाश नारायण की आर्मी और पुलिस को सरकार के आदेश नहीं मानने की बात को माना जाता है, जो सशस्त्र संघर्ष के दायरे में आता है।
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