एबीएन एडिटोरियल डेस्क। 15 अगस्त उन अनगिनत संघर्षों की स्मृति दिवस भी है, जिनके कारण भारत स्वतंत्र हुआ। यह स्वतंत्रता केवल नारों, भाषणों, बैठकों एवं सम्मेलनों से नहीं मिली; यह जेलों की अंधेरी कोठरियों, भूख से सूखते शरीरों, जनमत की शक्ति और संवैधानिक मूल्यों की रक्षा के लिए दिए गए त्याग से भी अर्जित की गई थी। ऐसी ही एक घटना 1938 में हजारीबाग केंद्रीय कारागार में घटी। पहली दृष्टि में यह कुछ राजनीतिक बंदियों की रिहाई का प्रश्न प्रतीत होता है, किंतु वास्तव में यह औपनिवेशिक निरंकुश सत्ता और भारतीय उत्तरदायी शासन के बीच टकराव था।
एक ओर ब्रिटिश शासन अपनी विशेष शक्तियों को सर्वोपरि मानता था, दूसरी ओर भारतीय नेतृत्व यह सिद्ध करना चाहता था कि जनता द्वारा चुनी गयी सरकार को जनता के प्रति उत्तरदायी होना चाहिए, न कि औपनिवेशिक अधिकारियों की इच्छा के प्रति। आज, जब हम स्वतंत्रता दिवस मना रहे हैं, तब यह प्रसंग मुझे उद्वेलित कर रहा है यह लिखने को कि लोकतंत्र केवल संविधान लिख देने से नहीं बनता, उसकी नींव उन संघर्षों से भी पड़ी है जिनमें सत्ता से अधिक सिद्धांतों को महत्व दिया जाता है। हजारीबाग जेल की भूख हड़ताल ऐसा ही एक संघर्ष थी।
20 जुलाई 1937 को बिहार में कांग्रेस मंत्रिमंडल का गठन हुआ। जेलों के भीतर यह समाचार आशा का संदेश लेकर पहुंचा। राजनीतिक बंदियों को विश्वास था कि अब उनकी रिहाई दूर नहीं। कांग्रेस ने चुनावों के दौरान यह वादा किया था। लेकिन सप्ताह बीत गये, फिर महीने। जेल के फाटक बंद रहे। हजारीबाग केंद्रीय कारागार में बेचैनी बढ़ने लगी। यहां केवल बिहार के राजनीतिक कार्यकर्ता ही नहीं थे। कुछ ऐसे क्रांतिकारी भी थे जिन्हें अंडमान की सेल्युलर जेल में भूख हड़ताल करने के कारण हजारीबाग स्थानांतरित किया गया था। काला पानी उनकी इच्छाशक्ति को नहीं तोड़ सका था। हजारीबाग में भी उन्होंने संघर्ष का वही मार्ग चुना, प्रतिरोध का अस्त्र—भूख।
17 जनवरी 1938 को आठ राजनीतिक बंदियों ने आमरण अनशन आरम्भ किया। नौ दिन बाद, 26 जनवरी तक अन्य बंदी भी इस संघर्ष में शामिल हो गए। अब यह केवल 23 बन्दियों का अनशन नहीं था। यह उस व्यवस्था के विरुद्ध नैतिक प्रतिरोध था, जो जनता के प्रतिनिधियों की सरकार बनने के बाद भी राजनीतिक बंदियों को स्वतंत्र करने को तैयार नहीं थी।
जेल की चारदीवारी के भीतर उठी यह आवाज शीघ्र ही बिहार की सड़कों पर सुनाई देने लगी। 30 जनवरी को पूरे प्रदेश में राजनीतिक बंदी दिवस मनाया गया। प्रभात फेरियां निकलीं, सभाएं हुईं। छात्रों, किसानों, समाजवादियों और कांग्रेस कार्यकतार्ओं ने एक स्वर में राजनीतिक बंदियों की रिहाई की मांग उठायी। हजारीबाग जेल अब केवल एक जेल नहीं रह गई थी। वह भारतीय जनमत का प्रतीक बन चुकी थी। इतनी गंभीर हो गयी कि बिहार के मुख्यमंत्री, तब प्रधानमंत्री, श्रीकृष्ण सिंह, मौलाना अबुल कलाम आजाद और अच्युत पटवर्धन स्वयं हजारीबाग जेल पहुंचे। उन्होंने बंदियों से लंबी बातचीत की। उन्हें विश्वास दिलाया कि उनकी रिहाई के लिए पूरा प्रयास किया जाएगा।
नेताओं के आग्रह पर भूख हड़ताल समाप्त हुई, किंतु संघर्ष समाप्त नहीं हुआ। असली संघर्ष अब शुरू हो चुका था। प्रश्न केवल बंदियों की रिहाई का नहीं था। प्रश्न यह था—निर्णय लेने का अधिकार किसके पास है? जनता द्वारा चुनी गई भारतीय सरकार के पास या औपनिवेशिक गवर्नर और गवर्नर-जनरल के पास। दरअसल दो शासन-दृष्टियाँ आमने-सामने थीं। बिहार के मुख्यमंत्री श्रीकृष्ण सिंह का मत स्पष्ट था, यदि जनता ने सरकार चुनी है, तो राजनीतिक बंदियों की रिहाई जैसे निर्णय लेने का अधिकार भी उसी सरकार का होना चाहिए। ब्रिटिश शासन इससे सहमत नहीं था।
गवर्नर-जनरल लॉर्ड लिनलिथगो ने तर्क दिया कि भारत शासन अधिनियम, 1935 की धारा 126(5) के अंतर्गत शांति और व्यवस्था बनाए रखने का अंतिम उत्तरदायित्व उनके ऊपर है। उनके अनुसार सभी राजनीतिक बंदियों की सामूहिक रिहाई सार्वजनिक सुरक्षा के लिए जोखिम उत्पन्न कर सकती थी। इसलिए उन्होंने बिहार के गवर्नर मॉरिस गार्नियर हैलेट को मंत्रियों की सलाह न मानने का निर्देश दिया। यहीं से संघर्ष प्रशासनिक नहीं, संवैधानिक बन गया। भारतीय नेतृत्व उत्तरदायी सरकार की बात कर रहा था। औपनिवेशिक शासन विशेषाधिकारों की।
15 फरवरी 1938 को बिहार कांग्रेस मंत्रिमंडल ने इस्तीफा दे दिया। यह इस्तीफा किसी पद के लिए नहीं था; यह एक सिद्धांत के लिए था। मंत्रिमंडल ने स्पष्ट कहा कि राजनीतिक बंदियों की रिहाई से शांति को कोई खतरा नहीं है। यदि निर्वाचित सरकार के अधिकारों में इस प्रकार हस्तक्षेप होगा, तो उत्तरदायी शासन केवल नाम का रह जायेगा। औपनिवेशिक शासन के सामने यह नैतिक चुनौती थी।
बिहार मंत्रिमंडल के इस्तीफे ने पूरे देश का ध्यान आकर्षित किया। महात्मा गांधी ने गवर्नर-जनरल के निर्णय की आलोचना करते हुए कहा कि धारा 126(5) का प्रयोग इस मामले में उचित नहीं था। गांधी ने लिखा, गवर्नर का कार्य मंत्रियों को सलाह देना है, उनके अधिकारों का स्थान लेना नहीं। यदि निर्वाचित मंत्री स्वतंत्र निर्णय ही न ले सकें, तो उत्तरदायी शासन का सिद्धांत अर्थहीन हो जायेगा।
गांधी जी ने एक महत्वपूर्ण प्रश्न उठाया, यदि कुछ राजनीतिक बंदियों की रिहाई से वास्तव में कोई अशांति नहीं होने वाली थी, तो फिर असाधारण संवैधानिक शक्तियों का प्रयोग क्यों किया गया? यह प्रश्न केवल ब्रिटिश सरकार से नहीं था; यह औपनिवेशिक शासन की पूरी वैधता पर प्रश्नचिह्न था। हरिपुरा में कांग्रेस ने संघर्ष को राष्ट्रीय स्वर दिया। 19 से 21 फरवरी 1938 को आयोजित इस अधिवेशन के अध्यक्ष सुभाषचंद्र बोस थे। उनके नेतृत्व में कांग्रेस ने बिहार मंत्रिमंडल का समर्थन किया।
अधिवेशन के प्रस्ताव में स्पष्ट कहा गया कि राजनीतिक बंदियों की रिहाई प्रांतीय सरकार के अधिकार-क्षेत्र का विषय है। गवर्नर-जनरल का हस्तक्षेप उत्तरदायी शासन की भावना के विरुद्ध है। यह प्रस्ताव केवल राजनीतिक समर्थन नहीं था। यह भारतीय लोकतांत्रिक मूल्यों की घोषणा थी। कांग्रेस ने पहली बार इतने स्पष्ट शब्दों में कहा कि जनता के प्रतिनिधियों की सरकार पर औपनिवेशिक नौकरशाही का नियंत्रण स्वीकार नहीं किया जा सकता। महात्मा गांधी और सुभाषचंद्र बोस के स्वर भी एक थे। इसलिए इसका प्रभाव भी औपनिवेशिक सत्ता के लिए भयावह और थर्रा देने वाला था।
देशभर में बढ़ते जनमत, गांधी के हस्तक्षेप, बोस की अध्यक्षता में हरिपुरा अधिवेशन के समर्थन और बिहार मंत्रिमंडल की अडिग संवैधानिक स्थिति ने अंतत: परिस्थितियाँ बदल दीं। 26 फरवरी 1938 को बिहार के गवर्नर मॉरिस गार्नियर हैलेट और श्रीकृष्ण सिंह के बीच समझौता हुआ। राजनीतिक बंदियों के मामलों की समीक्षा का निर्णय लिया गया। उनकी रिहाई का मार्ग प्रशस्त हुआ।
कांग्रेस मंत्रिमंडल ने पुन: कार्यभार संभाल लिया। यह किसी एक पक्ष की पूर्ण राजनीतिक विजय नहीं थी, लेकिन यह भारतीय संवैधानिक मूल्यों की नैतिक विजय अवश्य थी। औपनिवेशिक शासन को पहली बार यह स्वीकार करना पड़ा कि जनता द्वारा चुनी गई सरकार की उपेक्षा करके लंबे समय तक शासन नहीं चलाया जा सकता। हजारीबाग जेल की यह भूख हड़ताल केवल बारह बंदियों की कहानी नहीं है।
यह भारतीय लोकतंत्र के निर्माण की कहानी है, जिसने दिखाया कि नैतिक शक्ति, जनमत और संवैधानिक प्रतिबद्धता मिलकर सबसे शक्तिशाली सत्ता को भी अपने निर्णयों पर पुनर्विचार करने के लिए विवश कर सकती है। यह भी कि स्वतंत्र भारत की लोकतांत्रिक चेतना की लौ जेलों की अँधेरी कोठरियों में भी जली थी। यह भी कि जब भी तिरंगा लहराए, हजारीबाग जेल की उन कोठरियों को भी याद किया जाए, जहाँ भूख से क्षीण होते शरीरों ने साम्राज्य की शक्ति को नहीं, उसकी नैतिकता को चुनौती दी थी।
इतिहास में ऐसे क्षण कम आते हैं, जब भूख हथियार बनती है, नैतिकता शक्ति बनती है और जेल की एक कोठरी पूरे साम्राज्य की राजनीति बदल देती है। और इतिहास साक्षी है, साम्राज्य पहले अपनी नैतिक वैधता खोते हैं, उसके बाद अपना राजनीतिक प्रभुत्व। (डॉ. पाण्डेय प्रोफेसर, क्षेत्रीय इतिहास के अध्येता-शोधकर्ता और दर्जन भर पुस्तकों के लेखक हैं।)
एबीएन एडिटोरियल डेस्क। सामान्य जीवन में गुरु, माता-पिता एवं ईस्ट देवी देवता भगवान की कृपा, आशीर्वाद तथा वरदान की आकांक्षा सभी को रहती है; यहां तक कि सांसारिक जीवन में किसी उच्च शक्तिशाली व्यक्ति की कृपापात्र बनने की अपने-अपने नफा नुकसान के गणित से प्रयास किया जाता है।
प्रश्न है कि भौतिक अथवा आध्यात्मिक आशीर्वाद एवं वरदान प्राप्त करने के लिए क्या किया जाये। सबसे पहले तो किसी बड़े अधिकारी/पदाधिकारी के पास जाना होता है। तीर्थ स्थान मंदिर देवालय जाने के पीछे का उद्देश्य नजदीक पहुंचना ही होता है। सान्निध्य बनाये बिना आदान-प्रदान की क्रिया असंभव तो नहीं है लेकिन सरल भी नहीं है।
प्रकृति के प्रत्येक अवयव का एक अपना विशेष प्रभाव मंडल एवं प्रभाव होता है जिसकी अनुभूति उसके सानिध्य में आने के उपरांत ही हो पता है। समुद्र एवं नदी का अपना-अपना प्रभाव मंडल होता है जिसकी अनुभूति तभी प्राप्त की जा सकती है जब उनके नजदीक में जाया जाये, इसी प्रकार गांव शहर जंगल पहाड़ इत्यादि इत्यादि के अपने-अपने विशेष प्रभा मंडल होते हैं और उसका प्रभाव पानी के लिए उनके आसपास होना आवश्यक होता है।
गुरु माता-पिता एवं ईश्वर का आशीर्वाद एवं वरदान प्राप्त करने के लिए उनका सान्निध्य नितांत आवश्यक है। दूर-दूर से काम नहीं बनने वाला है। अपनी चेतना भावना संवेदना बुद्धि विवेक श्रद्धा भक्ति विश्वास; अपने निवेदन एवं प्रार्थना में व्यापक करना पड़ता है।
यही तो तप एवं तपस्या है, और सबको सामान्य रूप से पता होता है कि भोजन बनाने के लिए अनाज एवं सब्जी को अग्नि में पकाना पड़ता है। आजकल अनुग्रह प्राप्त करने के लिए तरह-तरह के ड्रामा और नौटंकी किये जाते हैं जिनका फल-प्रतिफल और परिणाम नहीं प्राप्त होने से आस्था एवं विश्वास टूट जाते हैं।
पहले सान्निध्य बनाया जाये, समर्पण प्रस्तुत किया जाए, निवेदन एवं प्रार्थना अर्पित किया जाए तो किसी का भी आशीर्वाद एवं वरदान प्राप्त किया जा सकता है.. और इसके लिए प्रथम एवं अंतिम शर्त यही होता है कि अपनी पात्रता को विकसित किया जाये। हर-हर महादेव...
एबीएन एडिटोरियल डेस्क। जैसा अन्न, वैसा मन- भारतीय संस्कृति का यह कथन केवल आध्यात्मिक संदेश नहीं, बल्कि स्वस्थ समाज की आधारशिला है। यदि भोजन ही मिलावटी, भ्रामक और निम्न गुणवत्ता का हो जाये तो उसका दुष्प्रभाव केवल व्यक्ति के शरीर तक सीमित नहीं रहता, बल्कि पूरे समाज के स्वास्थ्य, अर्थव्यवस्था और आने वाली पीढ़ियों पर पड़ता है।
हाल ही में महाराष्ट्र सरकार ने उपभोक्ताओं के स्वास्थ्य की सुरक्षा को प्राथमिकता देते हुए एक महत्वपूर्ण निर्णय लिया। राज्य में एनालॉग (नॉन-डेयरी) पनीर के निर्माण, भंडारण, परिवहन, वितरण और बिक्री पर एक वर्ष का प्रतिबंध लगाया गया। यह निर्णय तब लिया गया जब जांच में ऐसे उत्पादों के उपयोग और गुणवत्ता को लेकर गंभीर चिंताएं सामने आयीं।
इस कदम ने पूरे देश में यह संदेश दिया है कि यदि सरकार इच्छाशक्ति दिखाये तो खाद्य मिलावट और उपभोक्ता को भ्रमित करने वाली प्रवृत्तियों पर प्रभावी अंकुश लगाया जा सकता है। अब प्रश्न केवल महाराष्ट्र का नहीं है। प्रश्न यह है कि क्या झारखंड और बिहार जैसे राज्य भी उपभोक्ताओं के स्वास्थ्य की रक्षा के लिए ऐसी ही स्पष्ट और कठोर नीति अपनायेंगे?
आज शहरों से लेकर कस्बों तक भोजन का बड़ा हिस्सा होटल, रेस्टोरेंट, ढाबों, मिठाई दुकानों, बेकरी और आॅनलाइन फूड डिलीवरी के माध्यम से लोगों तक पहुंच रहा है। उपभोक्ता स्वाद, सुविधा और समय बचाने के लिए इन पर निर्भर हो गया है। लेकिन क्या उसे यह पता है कि उसकी थाली में परोसा गया पनीर वास्तव में दूध से बना है या किसी वनस्पति वसा और रसायनों से तैयार एनालॉग उत्पाद? क्या उसे बताया जाता है कि मिठाई में शुद्ध खोया है या कृत्रिम मिश्रण? क्या मसाले, तेल और घी वास्तव में वही हैं जो उनके नाम से बेचे जा रहे हैं?
उपभोक्ता किसी होटल या रेस्टोरेंट का सजा-धजा भोजन कक्ष देखता है, लेकिन उसका किचन नहीं देख पाता। अधिकांश रसोईघर आम जनता के लिए पूरी तरह बंद रहते हैं। भोजन किन परिस्थितियों में तैयार हो रहा है, किस प्रकार का तेल बार-बार उपयोग हो रहा है, कच्चे माल की गुणवत्ता क्या है, सफाई का स्तर कैसा है—इन सबकी जानकारी उपभोक्ता के पास नहीं होती। यही वह जगह है जहां उपभोक्ता और विक्रेता के बीच सबसे बड़ी सूचना-असमानता पैदा होती है। उपभोक्ता विश्वास के आधार पर भोजन खरीदता है, जबकि उसके पास गुणवत्ता की स्वतंत्र जांच का कोई साधन नहीं होता।
अक्सर खाद्य मिलावट को केवल आर्थिक अपराध माना जाता है, जबकि इसका प्रभाव कहीं अधिक व्यापक है। घटिया तेल, कृत्रिम रंग, सिंथेटिक दूध, नकली मसाले, मिलावटी घी और निम्न गुणवत्ता के खाद्य पदार्थ अनेक गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं का कारण बन सकते हैं। इनके कारण पाचन संबंधी रोगों से लेकर दीर्घकालिक स्वास्थ्य समस्याओं तक का जोखिम बढ़ सकता है।
सबसे चिंताजनक स्थिति तब होती है जब उपभोक्ता को यह भी नहीं बताया जाता कि वह जो पनीर समझकर खा रहा है, वह वास्तव में पारंपरिक डेयरी पनीर नहीं है। यदि किसी उत्पाद का स्वरूप, नाम या प्रस्तुति उपभोक्ता को भ्रमित करती है, तो यह केवल व्यापारिक नैतिकता का प्रश्न नहीं, बल्कि उपभोक्ता के सूचना के अधिकार का भी उल्लंघन है।
झारखंड और बिहार में समय-समय पर दूध, खोया, पनीर, मिठाइयों, सरसों तेल, मसालों तथा अन्य खाद्य पदार्थों में मिलावट के मामले सामने आते रहे हैं। त्योहारों के समय प्रशासन द्वारा छापेमारी भी होती है और नमूने लिए जाते हैं। लेकिन प्रश्न यह है कि क्या यह कार्रवाई पूरे वर्ष समान गंभीरता से चलती है?
खाद्य सुरक्षा केवल त्योहारों के दौरान अभियान चलाने से सुनिश्चित नहीं होगी। इसके लिए स्थायी व्यवस्था विकसित करनी होगी। रेस्टोरेंट और होटल उद्योग में ओपन किचन जैसी अवधारणाओं को प्रोत्साहन मिलना चाहिए, जहां उपभोक्ता भोजन बनने की प्रक्रिया देख सके। जहां यह संभव न हो, वहां नियमित निरीक्षण, डिजिटल रिकॉर्ड, स्वच्छता रेटिंग और निरीक्षण रिपोर्ट सार्वजनिक करने जैसी व्यवस्थाएं लागू की जा सकती हैं।
भोजन की गुणवत्ता से जुड़ी जानकारी उपभोक्ता के लिए उतनी ही सहज उपलब्ध होनी चाहिए जितनी किसी पैक्ड खाद्य पदार्थ पर सामग्री और पोषण संबंधी जानकारी उपलब्ध होती है।
खाद्य मिलावट से होने वाला लाभ यदि दंड से अधिक होगा तो यह अपराध चलता रहेगा। इसलिए केवल जुर्माना पर्याप्त नहीं है। जानबूझकर मिलावट करने, नकली खाद्य पदार्थ बेचने या उपभोक्ता को भ्रमित करने वाले मामलों में कठोर दंड, लाइसेंस निरस्तीकरण और त्वरित न्यायिक प्रक्रिया आवश्यक है। महाराष्ट्र का निर्णय इस दिशा में एक महत्वपूर्ण संदेश देता है कि सरकारें केवल सलाह जारी करने तक सीमित न रहें, बल्कि आवश्यकता पड़ने पर निर्णायक प्रशासनिक कदम भी उठायें।
खाद्य सुरक्षा एक ऐसा विषय है जिसमें केंद्र सरकार, भारतीय खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण, राज्य सरकारें, स्थानीय निकाय और जिला प्रशासन सभी की भूमिका महत्वपूर्ण है। यदि विभिन्न राज्यों में अलग-अलग स्तर की निगरानी होगी तो मिलावटी उत्पाद एक राज्य से दूसरे राज्य में आसानी से पहुंच सकते हैं। इसलिए राष्ट्रीय स्तर पर समन्वित रणनीति आवश्यक है। इस रणनीति में आधुनिक प्रयोगशालाओं का विस्तार, त्वरित परीक्षण तकनीक, डिजिटल ट्रेसबिलिटी, नियमित सैंपलिंग, पारदर्शी रिपोर्टिंग और राज्यों के बीच सूचनाओं का आदान-प्रदान शामिल होना चाहिए।
खाद्य सुरक्षा केवल सरकारी विभागों की जिम्मेदारी नहीं है। उपभोक्ता संगठन, सामाजिक संस्थाएं, व्यापारी संगठन, शिक्षण संस्थान, चिकित्सक और जागरूक नागरिक भी इस अभियान के महत्वपूर्ण भागीदार हैं। अखिल भारतीय ग्राहक पंचायत जैसे संगठन वर्षों से उपभोक्ता जागरण और व्यवस्था सुधार का कार्य कर रहे हैं। यदि सरकार ऐसे संगठनों को विश्वास में लेकर जिला और राज्य स्तर पर संयुक्त जागरूकता अभियान चलाए, शिकायत निवारण तंत्र को मजबूत करे तथा निरीक्षण प्रक्रियाओं में सामाजिक सहभागिता सुनिश्चित करे, तो इसका सकारात्मक प्रभाव अधिक व्यापक होगा।
उपभोक्ता भी अपनी भूमिका निभायें जागरूक उपभोक्ता ही सबसे बड़ा प्रहरी है। बिना बिल के खरीदारी, संदिग्ध रूप से सस्ते खाद्य पदार्थ, अत्यधिक चमकीले रंग, असामान्य स्वाद या गुणवत्ता पर संदेह होने पर शिकायत दर्ज कराना नागरिक जिम्मेदारी भी है। यदि समाज मिलावट को सामान्य बात मानकर स्वीकार करता रहेगा तो यह समस्या कभी समाप्त नहीं होगी।
महाराष्ट्र का निर्णय केवल एक राज्य का प्रशासनिक आदेश नहीं, बल्कि पूरे देश के लिए एक चेतावनी है। आज आवश्यकता है कि झारखंड, बिहार सहित सभी राज्य खाद्य सुरक्षा को केवल औपचारिक निरीक्षण का विषय न मानें, बल्कि इसे जनस्वास्थ्य और उपभोक्ता अधिकारों के केंद्र में रखें। हर नागरिक को यह अधिकार है कि उसकी थाली में परोसा गया भोजन शुद्ध, सुरक्षित और सही जानकारी के साथ उपलब्ध हो। भोजन में ईमानदारी केवल व्यापारिक नैतिकता नहीं, बल्कि संवैधानिक मूल्यों, उपभोक्ता अधिकारों और सार्वजनिक स्वास्थ्य के प्रति उत्तरदायित्व का प्रश्न है।
यदि केंद्र सरकार, राज्य सरकारें, स्थानीय प्रशासन, सामाजिक संगठन, व्यापारी और जागरूक नागरिक मिलकर राष्ट्रीय स्तर पर मिलावट मुक्त भारत का अभियान चलायें, तो वह दिन दूर नहीं जब उपभोक्ता भय नहीं, बल्कि विश्वास के साथ भोजन करेगा। अब समय आ गया है कि झारखंड और बिहार भी स्वयं से यह प्रश्न पूछें- क्या हम केवल मिलावट पकड़ने की प्रतीक्षा करेंगे, या महाराष्ट्र की तरह साहसिक निर्णय लेकर अपने नागरिकों के स्वास्थ्य की रक्षा के लिए ठोस कदम उठायेंगे? इस प्रश्न का उत्तर केवल सरकारों को नहीं, पूरे समाज को मिलकर देना होगा। क्योंकि ग्राहक रहेगा मौन तो उसकी सुनेगा कौन? (लेखक शिवाजी क्रांति : अखिल भारतीय ग्राहक पंचायत के क्षेत्रीय बिहार, झारखंड के संगठन मंत्री हैं।)
परिपक्व हो गया लोकतंत्र
जनता समझदार हो गई,
राजनीति की सूझ बूझ अब
उसकी अरदार हो गई
लोकतंत्र के ताने-बाने में
कीर्तिमान टूट जाते हैं
बनाने वाले कीर्तिमान
पीछे छूट जाते हैं ,
जिन्हें टूटा कहा जाता था
कीर्तिमान बन जाते हैं
स्टार प्रचारक काम न आए
जनता के मन में न भाए
जात पात सब मिट गया ,
बांकीपुर में देखो भाई
पांडेय प्रशांत किशोर जीत गया।
एबीएन एडिटोरियल डेस्क। वैसे तो देवाधिदेव महादेव की विशेष पूजा, अर्चना, प्रार्थना, समर्पण एवं सानिध्य प्राप्त करने के लिए सोमवार का दिन शुभ मुहूर्त माना गया है।
आषाढ़ शुक्ल एकादशी (देव शयनी एकादशी) को सृष्टि के संचालक श्रीहरि भगवान विष्णु चातुर्मास के लिए क्षीरसागर में योगनिद्रा में तल्लीन हो जाते हैं तथा कार्तिक मास शुक्ल पक्ष के एकादशी को उनकी योगनिद्रा भंग होती है। इन चार महीना में सृष्टि के संचालन का कार्य भगवान शंकर के द्वारा की जाती है; इसीलिए इन दिनों महादेव समाधि की अवस्था से जागृत अवस्था में क्रियाशील रहते हैं।
कांवड़ यात्रा करते हुए महादेव को जलार्पण तपस्या की श्रेणी में आता है। सात्विक भोजन, एकांत, मौनव्रत (यथासंभव अनावश्यक बहस से बचाना), महादेव के सानिध्य की अनुभूति, और उनसे आशीर्वाद तथा वरदान मांगना भक्तों के भौतिक एवं आध्यात्मिक जीवन के लिए अत्यंत ही महत्वपूर्ण है।
श्रावण मास के अतिरिक्त चातुर्मास में महादेव की कृपापात्र बनाना अन्य दिनों के तुलना में सरल है। इन दिनों भक्त/साधक के लिए ईश्वरीय शक्ति से जुड़ना थोड़ा सहज हो जाता है और तपस्या का पुरुषार्थ उसकी आदत बन जाती है और यही आदत भविष्य में उसे सब प्रकार के सफलता एवं समृद्धि का आधार बन जाता है। हर-हर महादेव...
एबीएन एडिटोरियल डेस्क। बाजार में हाथी जब चल रहा होता है तब गांव के बड़े-बूढ़े हाथी को प्रणाम करते हैं, बच्चों से प्रणाम करवाते हैं और हाथी का दर्शन करके लोग स्वयं को सौभाग्यशाली समझते हैं; यह हाथी के आगे का दृश्य होता है। गांव भर के कुत्ते इकट्ठा होकर हाथी के पीछे-पीछे चलते हुए भौंकते रहते हैं ; हाथी के पीछे का एक दृश्य यह भी होता है।
समझना बड़ा कठिन है कि आखिर कुत्तों को हाथी से चिढ़ क्यों होती है? हाथी से वे मुकाबला कर नहीं कर सकते, आकार के गणित से सारे भौंकते कुत्ते हाथी के पेट में समा सकते हैं। किसी ने कुत्तों से पूछा की भाई तुम लोगों को हाथी से क्या परेशानी है, तो कुत्तों ने कहा कि हमें इस बात से दिक्कत है कि हाथी के आगे कुछ लोग खड़े होकर उसे सम्मान क्यों दे रहे हैं और जब हमारी बारी आती है तो हमें लाठी से दुत्कार दिया जाता है।
निंदा एवं प्रशंसा से दूर अपने लक्ष्य की ओर हाथी आगे ही आगे बढ़ता जाता है। जिस व्यक्ति के लिए निंदा एवं प्रशंसा में कोई अंतर नहीं रह गया हो, राग वैमनस्य से परे हो गया हो, विवेक की सक्रियता उसका साथ दे रहा हो; वह मनुष्य अपने लक्ष्य की ओर आगे ही आगे बढ़ता जाता है और उद्देश्य को परिणाम में परिवर्तित करते फिर नई लक्ष्य की ओर आगे निकल जाता है।
एबीएन एडिटोरियल डेस्क। पिछले कुछ वर्षों में शिक्षा को लेकर देश में अनेक बहसें उभरी हैं। कभी विद्यालयों के ड्रेस कोड और धार्मिक प्रतीकों पर विवाद हुआ, कभी अल्पसंख्यक एवं बहुसंख्यक शिक्षण संस्थानों की स्वायत्तता चर्चा का विषय बनी, तो कभी सीखने की गुणवत्ता, शिक्षक उत्तरदायित्व और विद्यालयी अनुशासन पर प्रश्न उठे। आज भारतीय शिक्षा व्यवस्था दो महत्वपूर्ण प्रश्नों के सामने खड़ी है।
शिक्षा का काम निष्पक्ष आकलन है, पूर्वाग्रह या पहचान के आधार पर निर्णय नहीं। जब एक संस्थान सच में श्रेष्ठ शिक्षा दे रहा है तो उसको मापने का पैमाना उसकी पढ़ाई होनी चाहिए उसका धर्म नहीं। इसलिए किसी विद्यालय की पहचान उसके नाम या प्रबंधन से नहीं बल्कि उसकी गुणवत्ता, समान अवसर, चरित्र निर्माण और विद्यार्थियों की उपलब्धियों से होनी चाहिए।
ऐसे समय में सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह नहीं है कि किसी विद्यालय का प्रबंधन किस समुदाय के हाथ में है, बल्कि यह है कि वह अपने विद्यार्थियों को कितना सक्षम, संवेदनशील और उत्तरदायी नागरिक बना रहा है। कबीर का कालजयी संदेश- जाति न पूछो साधु की, पूछ लीजिए ज्ञान- आज प्रत्येक विद्यालय, गुरुकुल, मदरसा, मिशनरी स्कूल और विश्वविद्यालय पर समान रूप से लागू होता है।
भारतीय संविधान भी विविधता का सम्मान करते हुए शिक्षा को समान अवसर और उत्कृष्टता का माध्यम मानता है। अनुच्छेद 29और 30 विभिन्न समुदायों को अपनी शैक्षणिक संस्थाएं स्थापित करने का अधिकार देते हैं। लेकिन यह अधिकार शिक्षा की गुणवत्ता, समान अवसर, चरित्र निर्माण और संवैधानिक मूल्यों और राष्ट्रीय हित से ऊपर नहीं हो सकता है।
विविधता का सम्मान लोकतंत्र की शक्ति है और शिक्षा की गुणवत्ता पर कोई समझौता स्वीकार्य नहीं। समस्या तब उत्पन्न होती है जब मूल्यांकन का आधार परिणाम नहीं पहचान बन जाती है। किसी भी शिक्षण संस्थान का मूल्यांकन उसके नाम, वेश, प्रबंधन या धार्मिक पहचान से नहीं, बल्कि शिक्षा की गुणवत्ता, अनुशासन, समान अवसर और विद्यार्थियों के चरित्र निर्माण से होनी चाहिए। शिक्षा धर्मनिरपेक्ष है ।स्कूल का काम ज्ञान देना है दीक्षा देना नहीं। शिक्षा में पहचान नहीं, प्रदर्शन और प्रतिभा ही अंतिम कसौटी है।
विद्यालय वह कार्यशाला है जहां ज्ञान के साथ व्यक्तित्व भी गढ़ा जाता है। किसी विद्यालय की आत्मा उसकी इमारत नहीं, उसके शिक्षक और उसकी कार्य-संस्कृति होती है। डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन ने कहा था कि शिक्षा का उद्देश्य केवल जानकारी देना नहीं, बल्कि चरित्र का निर्माण करना है। यह कार्य पाठ्यपुस्तकों से अधिक शिक्षक के आचरण से पूरा होता है। इसके लिए अनुशासन पहली शर्त है। अनुशासन भय से नहीं, आत्मनियंत्रण से जन्म लेता है, आदेश से नहीं आदर्श से विकसित होता है।
समय का सम्मान करने वाला शिक्षक ही समय का सम्मान करने वाले विद्यार्थियों का निर्माण कर सकता है। ऐसा विद्यालय ही सीखने का वातावरण बनाता है जहां जिज्ञासा, परिश्रम और उत्तरदायित्व स्वाभाविक बन जाते हैं। बिना अनुशासन वाला स्कूल ऐसा दिशाविहीन यात्रा है जहां गति तो होती है पर गंतव्य नहीं। अनुशासन श्रेष्ठ शिक्षा की पहली ईंट है। कोई संस्थान अपनी धार्मिक पहचान से नहीं बल्कि अनुशासन, गुणवत्ता और कार्य संस्कृति से उत्कृष्ट बनता है। सबसे बड़ा संकट तब आता है जब धार्मिक पहचान और शैक्षणिक अनुशासन आमने-सामने खड़े हो जाएं।
ऐसी स्थिति में लक्ष्मण रेखा साफ है- अगर संस्थान शिक्षा की आड़ में नफरत, भेदभाव या अधूरा ज्ञान परोसता है तो वह ज्ञान का मंदिर नहीं है। आज मेरिट की परिभाषा भी बदल चुकी है। 21वीं सदी में मेरिट का अर्थ केवल अंक नहीं बल्कि समस्या -समाधान, वैज्ञानिक दृष्टिकोण, नैतिकता, संवाद- कौशल और सामाजिक उत्तरदायित्व भी है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 भी इसको शिक्षा का अनिवार्य लक्ष्य मानती है।
विभिन्न राष्ट्रीय अधिगम सर्वेक्षणों और असर जैसे अध्ययनों ने भी संकेत दिया है कि विद्यालयों की सबसे बड़ी चुनौती केवल नामांकन नहीं, बल्कि बुनियादी भाषा और गणितीय दक्षता को मजबूत करना है। इसलिए श्रेष्ठ संस्थान वही है जो अंक के साथ व्यक्तित्व भी गढ़े? क्योंकि श्रेष्ठ शिक्षा की पहचान चरित्र, काबिलियत और उत्तरदायित्व है जिसका आधार अनुशासन है।
विश्व के जिन देशों ने शिक्षा को राष्ट्रीय शक्ति बनाया है, उन्होंने विद्यालयों को वैचारिक संघर्ष का नहीं, गुणवत्ता का केंद्र बनाया। फिनलैंड ने शिक्षक की गुणवत्ता पर, सिंगापुर ने सतत कौशल-विकास पर और जापान ने अनुशासन तथा सामूहिक उत्तरदायित्व पर विशेष बल दिया। इन अनुभवों का संदेश स्पष्ट है- श्रेष्ठ शिक्षा वही है जो ज्ञान के साथ चरित्र का निर्माण करे।
भारत जब विकसित राष्ट्र बनने की दिशा में आगे बढ़ रहा है, तब प्रत्येक विद्यालय को केवल परीक्षा परिणाम देने वाला संस्थान नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक, वैज्ञानिक और संवेदनशील नागरिक तैयार करने वाला केंद्र बनना होगा। वहां धर्म, भाषा, जाति या आर्थिक पृष्ठभूमि अवसरों की बाधा नहीं, बल्कि विविधता की शक्ति बननी चाहिए।
विज्ञान और संस्कार, नवाचार और नैतिकता, प्रतिस्पर्धा और करुणा- इन सभी का संतुलन ही विकसित भारत की वास्तविक आधारशिला है। देश के अनेक आकांक्षी जिलों में सामुदायिक भागीदारी, शिक्षक नेतृत्व और स्थानीय नवाचारों के माध्यम से विद्यालयों ने सीखने के स्तर में उल्लेखनीय सुधार दर्ज किया है। उत्कृष्ट विद्यालय केवल अधिक बजट से नहीं बल्कि स्पष्ट दृष्टि, जवाबदेही और सतत प्रयास से बनते हैं।
विद्यालयों की पहचान उनके प्रार्थना स्थलों से नहीं उनकी प्रयोगशाला और पुस्तकालयों, कक्षाओं और वहां से निकलने वाले जिम्मेदार नागरिकों से होगी। विकसित भारत का मतलब है हर गांव और शहर में एक ऐसा स्कूल जहां प्रवेश का आधार समान अवसर हो पहचान नहीं, जहां घंटी की आवाज नफरत से ऊंची हो, जहां अनुशासन डंडे से नहीं आदर्श से उपजे। जिस दिन भारत यह कसौटी स्वीकार कर लेगा उसी दिन विश्वगुरु कोई नारा नहीं बल्कि शिक्षा से अर्जित राष्ट्रीय प्रतिष्ठा होगी।
शिक्षा का उद्देश्य किसी पहचान को श्रेष्ठ सिद्ध करना नहीं, बल्कि प्रत्येक विद्यार्थी की संभावनाओं को विकसित करना है। किसी संस्थान का मूल्यांकन उसके धार्मिक परिचय से नहीं, बल्कि उसकी शैक्षणिक गुणवत्ता, अनुशासन, पारदर्शिता और सामाजिक उत्तरदायित्व से होना चाहिए। यही संविधान की भावना है और यही आधुनिक शिक्षा का मूल दर्शन भी। शिक्षा का कोई संप्रदाय नहीं होता। उसका एकमात्र धर्म ज्ञान, एकमात्र साधना अनुशासन और एकमात्र पहचान चरित्र तथा मेरिट होती है।
विद्यालयों की महानता उनके नाम से नहीं बल्कि उनसे निकलने वाले जागरूक, संवेदनशील और उत्तरदायी नागरिकों से तय होती है। जिस दिन भारत का प्रत्येक विद्यालय ज्ञान को धर्म, अनुशासन को संस्कृति और चरित्र को सफलता की पहली शर्त मान लेगा उसी दिन विकसित भारत केवल आर्थिक महाशक्ति नहीं बल्कि न्याय, ज्ञान और मानवीय मूल्यों से समृद्ध सभ्यता के रूप में विश्व का मार्गदर्शन करेगा।
एबीएन एडिटोरियल डेस्क। कल गुरु पूर्णिमा की तिथि थी। बधाई एवं शुभकामनाओं वाले स्टीकर से सोशल मीडिया अटे-पटे थे; मैंने उन संदेशों के ऊपर बहुत ध्यान दिया और विश्लेषण किया कि मेरे व्यक्तित्व में कितना प्रभाव हुआ?
मैंने पाया कि बात आई राम गई राम हो गई। किसी एक व्यक्ति के एक जीवन में अनेक गुरुओं से संपर्क एवं सानिध्य प्राप्त होता है। प्रथम तो माता-पिता परिवार एवं समाज के सानिध्य में व्यक्ति आता है और उसका प्रभाव उसके व्यक्तित्व के ज्ञान विज्ञान कला साहित्य बुद्धि विवेक के ऊपर सीधा असर डालता है।
विद्यार्थी जीवन से लेकर आगे के जीवन में भी कई प्रकार के गुरुओं का सानिध्य प्राप्त होता है और उसका लाभ व्यवहारिक जीवन के लिए बहुमूल्य हो जाता है। यह भी होता है कि प्रत्यक्ष स्वरूप में गुरु का संपर्क एवं सानिध्य नहीं मिल पाता हो, परंतु उनका स्मरण मन, मस्तिष्क एवं भावना में सूक्ष्म रूप से क्रियाशील होते हुए संपर्क एवं सानिध्य का कार्य करते रहता है।
गुरु महाराज के संपर्क एवं सानिध्य से हर किसी की इच्छा होती है कि गुरु उसे वह सब कुछ दें जो गुरु के पास होती है। गुरु तो गुरु ही होते हैं, देने के पहले शिष्य की पात्रता का गहन निरीक्षण परीक्षण गुरु महाराज की प्राथमिकता होती है।
गुरु महाराज के संपर्क एवं सानिध्य में जाने से पहले अपनी पात्रता के विषय में भलीभांति जान लेना ही एक श्रेष्ठ शिष्य का दायित्व होता है। सांसारिक/भौतिक जीवन में गुरु का प्रभाव परिलक्षित होते रहता है। लोगबाग अमुक व्यक्ति के व्यवहार से समझ जाते हैं कि व्यक्ति का गुरु कैसा रहा होगा। आध्यात्मिक जीवन में गुरु महाराज का महत्व सबसे ज्यादा होता है।
मोटे तौर पर अध्यात्म का अर्थ ईश्वरीय अनुकंपा से जोड़कर देखा जाता है; जबकि ईश्वर की अनुकंपा के लिए स्वयं ही पुरुषार्थ करने का विधान है। गुरु महाराज के सानिध्य एवं संपर्क से चेतना भावना संवेदना बुद्धि विवेक एवं अनुशासन इत्यादि का शोधन परिशोधन तो हो जाता है, परंतु व्यवहार में संतुलन एवं साधना का मार्ग स्वयं ही तय करना होता है।
सांसारिक उपलब्धि तथा आध्यात्मिक उपलब्धि दोनों में निर्मित व्यक्तित्व ही परिणाम उत्पन्न करता है। वास्तव में गुरु की कृपा व्यक्तित्व निर्माण के स्वरूप में ही प्राप्त होती है। गुरु के पास जाने, उनसे संपर्क एवं सानिध्य साधने के लिए श्रद्धा भक्ति एवं विश्वास की पूंजी होनी ही चाहिए।
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