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वर्तमान परिप्रेक्ष्य में शिक्षक का सम्मान चिंतनीय एवं  संवेदनशील
Published / 2026-09-04 20:51:00
वर्तमान परिप्रेक्ष्य में शिक्षक का सम्मान चिंतनीय एवं संवेदनशील

अश्लेष कुमार पांडेय एबीएन एडिटोरियल डेस्क। आज 5 सितंबर को प्रत्येक वर्ष की भांति इस वर्ष भी पूरे देश में भारत के महान दार्शनिक, शिक्षक, प्रथम उपराष्ट्रपति एवं देश के दूसरे राष्ट्रपति डॉ सर्वपल्ली राधाकृष्णन के जन्मदिन को समाज एवं राष्ट्र निर्माता रूपी पद शिक्षक को समर्पित शिक्षक दिवस के रूप में मनाया जा रहा है। अत: राष्ट्र के सभी शिक्षकों को शिक्षक दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं!  गुरु ब्रह्मा गुरु विष्णु गुरु देवो महेश्वर:। गुरु साक्षात परब्रह्मा तस्मै श्री गुरुवे नम:।। इन पंक्तियों के माध्यम से समाज एवं राष्ट्र के समस्त प्रबुद्ध नागरिक को अवगत कराने  की आवश्यकता नहीं है, कि गुरु का स्थान गोविंद अर्थात नारायण से भी बढ़कर है। वर्तमान समय से लगभग 60 वर्ष पूर्व भी शिक्षक दिवस मनाया जाता था किंतु जैसे-जैसे समय आगे बढ़ता गया इस दिवस को मनाने की पद्धति भी बदलती गयी। जहां पूर्व में गुरुकुल से लेकर विद्यालय में चकूचंदा प्राप्त कर विद्यार्थी शिक्षक दिवस मनाते थे। वहीं आज डिजिटल जमाने में अन्य कार्यक्रम को व्यवस्थित कर विद्यार्थी शिक्षकों का सम्मान देते हैं। गुरु शिष्य की परंपरा इस राष्ट्र की संस्कृति का एक अहम और पवित्र रिश्ता है, जिसका कई स्वर्णिम उदाहरण इतिहास के पन्नों में दर्ज है। शिक्षक व्यक्ति ही नहीं  मार्गदर्शक के साथ-साथ प्रेरक एवं जीवन का सच्चा मित्र होता है। शिक्षक प्रत्येक परिस्थिति में समस्या से संघर्ष करना एवं असफलताओं से सीखने की प्रेरणा देता है। डॉक्टर सर्वपल्ली राधाकृष्णन का एक कथन है कि एक वकील की गलती फाइलों में दब जाती है, एक इंजीनियर की गलती दीवार की र्इंट में पीछे छुप जाती है, एक डॉक्टर की गलती कब्रिस्तान में दफन हो जाती है। लेकिन एक शिक्षक की गलती सामाजिक एवं राष्ट्रीय जीवन में स्पष्ट रूप से झलकती है। इसीलिए कहा गया है कि असफलता ही सफलता की कुंजी है और इसी को मानकर एक महान शिक्षक हमेशा विद्यार्थियों को प्रोत्साहित करता है। शिक्षा का अर्थ ही होता है, जो मस्तिष्क को ऊर्जा दे, हृदय को करुणा दे और हाथ को हुनर दे। शिक्षक हमेशा इन पंक्तियों में विश्वास करता है कि राहें जहां तक जायेगी, राहगीर वहां तक जायेगा। तुम दरिया से क्या पूछते हो, नीर कहां तक जायेगा? अरे! खींच धनु की डोर, निशाना साध अपनी मंजिल का, बाकी बाद में देखेंगे की तीर कहां तक जायेगा।।  वर्तमान समय में प्राय यह देखा जा रहा है कि प्रतिवर्ष शिक्षक दिवस सिर्फ एक दिन के लिए समाचार पत्र एवं टीवी न्यूज चैनल से दिये गये संदेश आम जनों तक पहुंचाने का कार्य कर रहा है। डॉक्टर सर्वपल्ली राधाकृष्णन जिस उद्देश्य से अपने जन्मदिन को शिक्षक के लिए समर्पित किये थे वह कहीं ना कहीं आज अधूरा सफल साबित हो रहा है। चाहे इस कार्य के लिए विद्यार्थी, अभिभावक, समाज के प्रबुद्ध जन एवं स्वयं शिक्षक ही जिम्मेवार क्यों न हो? वर्ष के शेष 364 दिन शिक्षक सम्मान न पाकर अधिकांश शिक्षक अपमान ही महसूस कर रहे हैं। इसके लिए मेरा मानना है कि वर्तमान परिप्रेक्ष्य में सरकार, समाज के प्रबुद्ध जन के साथ-साथ विद्यार्थी, विद्यालय प्रबंधन एवं शिक्षक ही मुख्य रूप से जिम्मेवार है। आज पूरे देश में भ्रष्टाचार का बोलबाला चरम सीमा तक  पहुंच गया है जिसमें विद्यार्थी प्रांत से लेकर राष्ट्र स्तर पर प्रदर्शन कर रहे हैं। यह प्रश्न मेरे मन में बार-बार उठता है कि ऐसा क्यों?सरकार किसी भी पार्टी की हो मगर सत्य बात तो यह है कि किसी ने शिक्षा को अपनी प्रथम श्रेणी में नहीं रखा। आजादी से लेकर आज तक लगभग 80 वर्षों के सफर में शिक्षा का हाल तो ऐसा हुआ है की शिक्षक ही इसे अच्छी तरह समझ रहे हैं। सरकार एवं विद्यालय प्रबंधन की मंंशा एवं उनके कार्य के प्रति क्या है? यह अभी तक स्पष्ट नहीं हुआ है। आजादी के बाद भी सरकारी विद्यालय का संचालन एक या दो शिक्षकों के माध्यम से किया जा रहा है। इससे बच्चों का विकास कैसे कराया जा सकता है, यह मेरे 28 वर्षों के अध्यापन कार्य में समझ से परे है। आज विकसित राष्ट्र जहां शिक्षा एवं अध्यापक पर बजट एवं सुविधा का ख्याल जितना रखता है वहीं मेरे देश में इसे सामान्य श्रेणी में रखा जा रहा है। इसका तात्कालिक उदाहरण नवनियुक्त शिक्षकों के वर्तमान समय में वेतन की कमी को देखकर लगाया जा सकता है की सरकार कितना जागरूक है। जहां तक मान्यता प्राप्त एवं निजी विद्यालय के प्रबंधन को देखा जाये तो गिने चुने संगठन के अंतर्गत संचालित विद्यालय को छोड़कर शेष सभी प्रबंधन शिक्षकों का शोषण करने में कमी नहीं कर रहे हैं। इसका एक ही मुख्य कारण है-शिक्षित बेरोजगारी। निजी विद्यालय जो मान्यता प्राप्त नहीं है वेअप्रशिक्षित शिक्षकों को विद्यालय में रखकर अपने मनोनुकूल कार्य करा कर अपना अर्थ उपार्जन तो कर रहे हैं किंतु इसका प्रभाव समाज एवं विद्यार्थियों पर पड  रहा है, जिससे शिक्षक समाज में कहीं न कहीं अपने आप को वंचित महसूस कर रहे हैं। अनावश्यक कार्य तो शिक्षकों पर इतने डाल दिये गये हैं कि वे बच्चों को पढाने की जगह अपनी नौकरी बचाने के लिए पूरे दिन कागजी कार्रवाई में लगे रहते हैं। वर्तमान समय में तो निजी विद्यालय भी इससे अलग नहीं रहा है। ऐसी स्थिति में राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 तो असफल ही साबित होगी चाहे सरकार बंद ए सी कमरे में कितनी भी नीति क्यों ना तैयार कर लें। इन सभी नीतियों से एक ही अर्थ निकलता है कि जब कार्य पद के अनुसार पूर्ण रूप से नहीं करेंगे तो शिक्षक को कैसे सम्मान मिल पायेगा। इसके कारण ही वर्तमान समय में शिक्षक अपने आप को ठगा हुआ महसूस पा रहा है एवं प्रत्येक जगह अपमानित हो रहा है। अत: वर्तमान परिप्रेक्ष्य में शिक्षक का सम्मान एक अत्यंत ही संवेदनशील और विचारणीय विषय बन चुका है। प्राचीन काल में शिक्षक को गुरु मानकर ब्रह्मा एवं विष्णु के भाव से जहां सर्वोच्च स्थान दिया गया जाता था। वहीं आज की आधुनिक व्यवसाय और डिजिटल युग में शिक्षक और समाज की परिभाषा में गहरा बदलाव आया है।इस समय शिक्षकों के सम्मान में बदलते परिप्रेक्ष्य में मुख्य रूप से शिक्षा का व्यवसायीकरण, तकनीकी और इंटरनेट का प्रभाव, अतिरिक्त  शैक्षणिक कार्य, अभिभावक के शिकायती रवैया एवं पदाधिकारी द्वारा अपमानित करना एक चुनौतियां बन गया है। इस बदलते परिवेश  में विद्यार्थी उसी शिक्षक को सम्मान करते हैं जो सिर्फ किताबी ज्ञान न देकर उनके मानसिक स्वास्थ्य को समझता है एवं करियर काउंसलिंग कर मित्र की तरह व्यवहार करता है। इस बात से अलग नहीं किया जा सकता है कि वर्तमान समय में कुछ शिक्षकों द्वारा विद्यालय एवं समाज में ऐसे कृत्य कर  रहे हैं जो शोभनीय ही नहीं बल्कि अपने पद को कलंकित कर रहे  हैं। प्राय:यह समाचार पत्र के माध्यम से देखने को मिलता है जिसका मुख्य कारण अपरिपक्वता एवं अनुभवहीनता भी है। ऐसे शिक्षकों से मेरा करवद्व प्रार्थना है कि आपके अंदर यदि ऐसी प्रवृत्ति हो तो शिक्षक एवं समाज हित में अपने पद से त्यागपत्र देकर किसी अन्य  रोजगार में योगदान दें, जिससे शिक्षकों का मान सम्मान बना रहे। अत: मैं समाज एवं देश के सभी आमजनों से आह्वान करता हूं की राष्ट्र निर्माण में लगे शिक्षक समाज की नीव होते हैं। अत: नैतिकता और मूल्यों के संरक्षण मानसिक रूप से स्वस्थ रहने के लिए शिक्षक को वेतन भोगी कर्मचारी ना मानते हुए इतना सम्मान दें ताकि भविष्य में समाज की नीव को मजबूत बनाते हुए राष्ट्र को विकसित करने में अपना ईमानदारी पूर्वक योगदान दे सकें। (लेखक रोटरी स्कूल, चैनपुर पलामू के प्राचार्य हैं। ये उनके निजी विचार हैं।)

झारखण्ड के जननायक साबित हो सकते हैं टाइगर जयराम महतो
Published / 2026-09-02 13:42:33
झारखण्ड के जननायक साबित हो सकते हैं टाइगर जयराम महतो

डुमरी प्रकरण-विधायिका बनाम कार्यपालिका नहीं, सत्ता बनाम जनआक्रोश हैझारखण्ड के जननायक साबित हो सकते हैं टाइगर जयराम महतोगौतम कुमार पटेलएबीएन एडिटोरियल डेस्क। डुमरी विधायक टाइगर जयराम महतो और बरबड्डा थाना प्रभारी का प्रकरण आज झारखंड में सुर्खियों में है। सतह पर यह एक विधायक और एक थानेदार के बीच की तकरार दिखती है, लेकिन इसके पीछे का सच कहीं ज्यादा गहरा है। सवाल यह नहीं है कि जयराम महतो झारखंड के सबसे बिगड़ैल विधायक हैं जो हर किसी से बहस करते हैं।सवाल यह है कि क्या आज से पहले झारखंड के विधायकों ने थाना प्रभारियों की खरी-खोटी नहीं सुनाई है? हर दिन किसी न किसी थाने में जनता व उनके कार्यकर्ताओं को अपमानित किया जाता है, 26 वर्षों के झारखण्ड में आज तक प्रशासनिक व्यवस्था इतनी बेलगाम है कि राज्य के किसी भी विधानसभा क्षेत्र में रोज किसी न किसी जनप्रतिनिधि का अपमान होता है, पर कभी ऐसा बवंडर नहीं उठा। फिर इस बार क्यों?सरकार जिस एमएमडीआर बिल का विरोध कर रही है, वहीं पलामू जिले में 7 वर्षों से बालू का टेंडर नहीं हुआ है, लेकिन अवैध बालू और पत्थर की ढुलाई से पलामू में पदस्थापित प्रशासनिक व पुलिस अधिकारी जबरन वसूली करते हैं, यह बात पलामू के सभी माननीय विधायकों को पता है। कुछ दिन पूर्व तो राज्य के वित्त मंत्री राधाकृष्ण किशोर, पुलिस से नाराज होकर स्वयं पत्थर लदे ट्रक और ट्रैक्टर को पकड़ने लगे। क्या यह पुलिसिंग व्यवस्था पर सवाल या फिर सरकार की विफलता को नहीं दर्शाता हैं? लेकिन राज्य की खराब पुलिसिंग पर सवाल उठाना एक विधायक के लिए इतना बड़ा तूल पकड़ सकता है? यह बड़ा सवाल हैं? सच में क्या? जयराम महतो के पुलिस से माफी मांग लेने भर से राज्य की पुलिसिंग व प्रशासनिक अव्यवस्था में सुधार हो जाएगा और जनता की मूल भावनाओं को सम्मान मिलना शुरू हो जाएगा, या फिर पुलिस को जयराम महतो से माफी मांगने से कानून-व्यवस्था में सुधारात्मक डर पैदा होगा, यह तय करना किसकी जवाबदेह का काम है ?इसका उत्तर छात्र आंदोलन में छिपा है। राज्य में परीक्षा रिफॉर्म मंच, रविन्द्र पासवान, कुणाल सिंह, देवेंद्र नाथ महतो जैसे सैकड़ों छात्र नेताओं ने सरकार की नींद उड़ा रखी है। सरकार पुलिस के बल पर उन्हें किसी न किसी केस में फंसा सकती है, लेकिन एक निर्वाचित विधायक को कैसे फंसाए? खासकर तब, जब पूरे राज्य में राम और जय राम की लहर हो और युवाओं में जयराम की लोकप्रियता मुख्यमंत्री के कद को बौना साबित कर रही हैं। इसकी कलांतर में जब जाएंगे तो देखिए राज्य में कुड़मी रेल टेका जो बंगाल से लेकर झारखण्ड उड़ीसा तीन राज्यों से जुड़ा था, जिसमे भाजपा, कांग्रेस, झामुमो, आजसू, तृणमूल आदि राजनीतिक पार्टियों के महतो लीडर शामिल हुए लेकिन आंदोलन में केवल जयराम महतो और उनकी पार्टी जेएलकेएम को बदनाम किया गया। जेएसएससी, जेपीएससी आंदोलन या भाषा आंदोलन, डोमेसाइल 1932 हो या फिर खनिज संपदा, जमीन की आंदोलन हर आंदोलन में बिना जय राम के ना लिए बिना किसी मीडिया या नेता का राम राम नही होता। विधानसभा सत्र में सबसे ज्यादा जनमुद्दों को धरातल पर बहस करना हो या फिर राज्य में राजनीतिक हलचल में सियासी दाव पेच या फिर शोशल मीडिया को फ्लॉर्स सब्सक्रिप्शन बढ़ाना हो सभी जगहों पर जय राम ही आते है। यह पूरी घटना सरकार की बौखलाहट का नतीजा है। सरकार को पता है कि आज का जयराम महतो कल मुख्यमंत्री पद का दावेदार हो सकता है। इसलिए एक सोची-समझी रणनीति के तहत इस विवाद को हवा दी जा रही है। सबसे बड़ा सवाल एफआईआर पर है। विधायक पर बीएनएस की संगीन धाराएं - सरकारी काम में बाधा, जबरन धमकी, सरकारी सेवक को धमकाना - लगा दी गईं, जबकि बात केवल मोबाइल फोन पर हुई थी। यदि मामला इतना ही गंभीर था तो विधानसभा अध्यक्ष ने चार दिन तक चुप्पी क्यों साधे रखी? बाद में सिर्फ इतना कह दिया कि संयम बरतना चाहिए। क्या दो बार अध्यक्ष रह चुके अनुभवी नेता का यह दायित्व नहीं था कि वे पुलिस को विधायी प्रोटोकॉल समझाते? और मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन की चुप्पी सबसे ज्यादा सवाल खड़े करती है।विपक्ष के कई विधायक और कई दलों ने वैचारिक मतभेद के बावजूद जयराम का समर्थन किया, लेकिन राज्य के मुखिया ने अब तक मुंह नहीं खोला। बल्कि पुलिस एजेंसियों को अंदर ही अंदर इस आग को भड़काने के लिए छोड़ दिया गया है।यह लड़ाई विधायक बनाम थानेदार की नहीं है। यह लड़ाई उस पुलिसिंग व्यवस्था की विफलता को छिपाने की है, जिस पर खुद जनता का भरोसा उठ चुका है। जयराम महतो आज जननायक की भूमिका में खड़े हैं और यही बात सत्ता को चुभ रही है। (नोट:- लेखक एक स्थानीय पत्रकार हैं, यह उनके निजी विचार हैं।) 

रक्षाबंधन के अवसर पर जीडीपी में बहनों के योगदान को भी याद करें
Published / 2026-08-26 21:44:14
रक्षाबंधन के अवसर पर जीडीपी में बहनों के योगदान को भी याद करें

सत्यनारायण गुप्ता एबीएन एडिटोरियल डेस्क। संसद और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं को एक तिहाई आरक्षण उपलब्ध कराने संबंधी नारी शक्ति वंदन विधेयक संसद से पारित हो चुका है। लेकिन अभी उसके क्रियान्वयन में विलंब है। इस समय संसद में मात्र 13.6% तथा राज्य विधानसभाओं में मात्र 9% महिलाओं का प्रतिनिधित्व है। इसी तरह नौकरशाही में 13 प्रतिशत और न्यायपालिका में आधी आबादी की भागीदारी नगण्य है। व्यापार, कृषि, सुरक्षा, मेडिकल, इंजीनियरिंग, खेल या कला हर क्षेत्र महिलाओं ने अपनी उपस्थिति दर्ज करायी है। लेकिन महिला श्रम का उचित सम्मान समाज को अभी सीखना है। कंसल्टेंसी फर्म मेकिंजे की रिपोर्ट - पावर आॅफ पैरिटी एडवांसिंग वूमेंस इक्वैलिटी इन इंडिया के अनुसार महिलाओं को बराबरी का दर्जा देने पर भारत की अर्थव्यवस्था में तेजी से वृद्धि हो सकती है। इससे देश के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) लाखों करोड़ रुपए की अतिरिक्त बढ़ोतरी हो सकती है। विकास-दर भी 1.4 प्रतिशत ज्यादा संभव है। यदि विश्व के सभी देशों में लिंग भेद पूरी तरह मिट जाए तो विश्व जीडीपी में 1820 लाख करोड़ रुपए की अतिरिक्त बढ़ोतरी होगी। यह राशि संयुक्त राज्य अमेरिका और चीन के संयुक्त जीडीपी के बराबर है। जीडीपी में इस योगदान के लिए कम से कम 6.8 करोड़ और कामकाजी महिलाओं की जरूरत होगी। रिपोर्ट में शामिल 95 देश में से 26 देश प्रति व्यक्ति जीडीपी और मानव विकास इंडेक्स में भारत से पीछे हैं। भारत की जीडीपी में महिलाओं का योगदान इस समय 17 प्रतिशत है जबकि विश्व स्तर पर यह 37 प्रतिशत है। भारत स्टार्टअप और यूनिकॉर्न कम्युनिटी के क्षेत्र में दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा देश है। पर इन स्टार्टअप में सिर्फ 10 प्रतिशत महिलाएं ही फाउंडर हैं। भारत में महिलाओं को पुरुषों के समान स्टार्टअप करने के लिए प्रोत्साहित नहीं किया जाता है। जिसके कारण स्टार्टअप क्षेत्र में महिलाओं का बहुत कम योगदान है। इसके साथ ही भारत में कोरोना महामारी के कारण जेंडर गैप 4.3 प्रतिशत बढ़ गया है। जिसके कारण अर्थव्यवस्था में भी महिलाओं का योगदान कम हुआ है। महिलाओं-पुरुषों में घरेलू जिम्मेदारियों का बंटवारा भी असमान है। महिलाएं कई ऐसे काम करती हैं जिनके बदले पैसे नहीं मिलते। भारतीय महिलाएं ऐसे काम पुरुषों की तुलना में 10 गुना ज्यादा करती हैं, विश्व औसत से तीन गुना अधिक। अगर इसके मूल्य को भी जोड़ा जाए और घरेलू कामों के लिए पैसे दिये जायें तो भारत की इकोनॉमी 20 लाख करोड़ रुपये बढ़ जायेगी। मैकिंजी इंडिया द्वारा भारत के लिए एक नया इंडेक्स तैयार किया है- इंडिया फीमेल एंपावरमेंट इंडेक्स। यह राज्यों में स्त्री पुरुष समानता को मापने का पैमाना है। इसमें शीर्ष पर मिजोरम, केरल, मेघालय, गोवा और सिक्किम हैं। हालांकि नौकरी की उम्र के लिहाज से यहां देश के सिर्फ चार प्रतिशत महिलाएं हैं। सबसे नीचे बिहार, मध्य प्रदेश, असम, झारखंड और उत्तर प्रदेश हैं। यहां कामकाजी उम्र के लिहाज से देश की 32 प्रतिशत महिलाएं हैं। विश्व में बिना पैसे वाला 75 प्रतिशत काम महिलाएं करती हैं। यह हर साल 650 लाख करोड़ रुपये के बराबर है। दुनिया की जीडीपी का लगभग 13 प्रतिशत। भारत में 90 प्रतिशत ऐसे काम महिलाओं के जिम्मे है। आम धारणा है कि गृहणियों का न कोई कमाई होती है और न आर्थिक योगदान। इस धारणा को बदलने की जरुरत है। सुप्रीम कोर्ट ने कृति एवं अन्य बनाम ओरिएण्टल इंश्योरेंश कंपनी लिमिटेड के मामले में 5 जनवरी 2021 को पारित अपने फैसले में माना कि गृहणी का काम बिना कमाई वाला नहीं है। खाना बनाना, घर की देखभाल, बच्चों का पालन-पोषण, परिवार के बुजुर्गों की देखभाल,घर का प्रबंधन आदि ऐसे काम हैं, जिन्हें यदि बाहर से कराया जाए तो उनका आर्थिक मूल्य चुकाना पड़ेगा। इसी तरह  सुप्रीम कोर्ट ने 11 जून 2026 को शिशुपाल बनाम सुरजीत के मामले में एक गृहणी महिला की मासिक आय 30000 रुपये मानते हुए उनके आश्रित के लिए मुआवजा की राशि निर्धारित की है। अगर हम स्त्री-पुरुष का भेद खत्म कर दें तो अर्थव्यवस्था को बहुत ज्यादा फायदा होगा लेकिन यह अंतर तभी मिट सकता है जब हम समाज में लैंगिक समानता पर विचार करें इसके लिए हमें महिलाओं के प्रति अपना नजरिया बदलना होगा उनसे पक्षपात खत्म करना होगा।

देशभक्ति, राजनीति (सरकार) और कूटनीति...
Published / 2026-08-16 16:17:36
देशभक्ति, राजनीति (सरकार) और कूटनीति...

तस्वीर में सरदार वल्लभ भाई पटेल के आज के परिवार के साथ प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी दिखाई दे रहे हैं, यह परिवार आज गुमनामी के अंधेरे में है त्रिवेणी दास एबीएन एडिटोरियल डेस्क। देशभक्ति अलग वस्तु है, राजनीति सर्वथा भिन्न वस्तु है, देश भक्ति का परिणाम अलग है, राजनीति का परिणाम भिन्न ही होता है; और सफल कूटनीति उसे कहते हैं जिसमें देशभक्ति और राजनीति का सम्मिश्रण हो...। 

वंदे मातरम् ...
Published / 2026-08-15 20:51:40
वंदे मातरम् ...

वंदे मातरम् ...त्रिवेणी दासएबीएन एडिटोरियल डेस्क। भारत के राष्ट्रगीत वंदे मातरम् को लाल किला के प्राचीर तक पहुंचने और गाए जाने में अंग्रेजों से अपने देश के आजादी के बाद 80 वर्ष लग गए।वंदे मातरम् गीत की रचना आज से 150 वर्ष पूर्व बंगाल के बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय ने 1875 में किया और अपने प्रसिद्ध उपन्यास "आनंद मठ" में 1882 में सम्मिलित करते हुए उपन्यास का अंग बनाया।गुरुदेव रविंद्र नाथ टैगोर ने इस गीत को 1896 में तत्कालीन कांग्रेस के एक सभा में आजादी के प्रेरणा-गीत के स्वरूप में पहली बार गया, और तब से यह गीत आजादी के मतवालों, जेल जाने वालों और फांसी के फंदे पर झूलने वालों का नारा (Slogan) बन गया। आपस में मिलने वाले भारतीयों का दुआ-सलाम का वाक्य बन गया। गुलामी के समय ब्रिटिश सरकार चाहती थी कि राष्ट्रगीत के रूप में गौड सेभ द क्वीन (god save the queen) गया जाए, लेकिन आजादी के दीवानों ने उसका प्रतिकार किया।भारत के प्रथम राष्ट्रपति डॉ राजेंद्र प्रसाद को 11 दिसंबर 1946 को संविधान सभा का स्थाई अध्यक्ष चुना गया और 24 जनवरी 1950 को संविधान सभा की स्वीकृति के बाद डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद ने इस गीत को राष्ट्रगीत का दर्जा प्रदान किया; तब से यह गीत राष्ट्रगीत के रूप में भारत में गया जा रहा है।भारत के फिल्मों में प्रसिद्ध संगीतकार एवं गायक ए. आर. रहमान ने एक संगीत "मां तुझे सलाम"  तैयार किया और इसे अपने एल्बम वंदे मातरम् सम्मिलित करते हुए इस गीत को जन-जन तक पहुंचाया। 30 जुलाई 2026 को लोकसभा में बिल पास करके वंदे मातरम् गीत को आंशिक नहीं गाते हुए पूर्ण स्वरूप में गाने का संरक्षण एवं सम्मान प्रदान किया गया।आज 15 अगस्त 2026 को संपूर्ण देश एवं दुनिया भर के लोगों ने देखा कि तिरंगा ध्वजारोहण के बाद वंदे मातरम् के धुन बजाए गए तत्काल बाद राष्ट्रगान जन गण मन के धुन बजाए गए। वायुसेना के हेलीकॉप्टर M_17 ने वंदे मातरम् का बैनर लेकर लाल किला के ऊपर उड़ान भरते हुए तिरंगा के ऊपर फूलों की बरसात की। वंदे मातरम् गीत गाते हुए जिन स्वतंत्रता सेनानियों ने अपनी कुर्बानी दी थी आज पूरे राष्ट्र ने उनके प्रति अपनी श्रद्धांजलि समर्पित किया है..भारत माता की जय _! वंदे मातरम् _!!जय हिंद_!!!

नासूर...
Published / 2026-08-14 21:48:56
नासूर...

त्रिवेणी दास एबीएन एडिटोरियल डेस्क। नासूर वह जख्म है जो कभी ठीक नहीं होता है और उसकी दर्द-भरी टीश भारी तकलीफ देती रहती है। देश के बंटवारे का नासूर हम भारतीयों के लिए कभी नहीं खत्म होने वाला एक ऐसा मर्ज है जो लाइलाज है। भारत को लगभग 200 वर्षों तक अंग्रेजों ने गुलाम बनाए रखा। ब्रिटिश सरकार के अंतिम गवर्नर-जनरल माउंटबेटन ब्रिटिश सरकार के प्रतिनिधि के रूप में भारत में कार्यरत थे। 3 जून 1947 को भारत के विभाजन की योजना माउंटबेटन योजना के रूप में घोषित की गई और जुलाई 1947 को इसे ब्रिटिश संसद में पेश करते हुए पारित किया गया और भारत का विभाजन सुनिश्चित हो गया।  14 अगस्त 1947 को पाकिस्तान ने अपना स्वतंत्रता दिवस मनाया और दुनिया के नक्शे में एक नए राष्ट्र का उदय हो गया। भारत ने 15 अगस्त 1947 को अपने खंडित स्वरूप में अपना स्वतंत्रता दिवस मनाया। कश्मीर को लेकर भारत एवं पाकिस्तान के बीच 22 अक्टूबर 1947 को युद्ध शुरू हुआ और कश्मीर के भारत में विलय के बाद भी कश्मीर का एक भाग पाकिस्तान के कब्जे में चला गया जिसे आज भी पाक अधिकृत कश्मीर (ढडङ) कहा जाता है। देश के बंटवारा के बाद से आज तक पाकिस्तान भारत के साथ अनेक मुद्दों पर लड़ाई करते रहता है, कभी सीधा तो कभी छद्म अटैक भारत के ऊपर करते रहना उसकी आदत बन गयी है और यही वह नासूर है जो देशवासियों के लिए कभी नहीं ठीक होने वाला एक घाव बन गया है। बंटवारा के बाद पाकिस्तान से पलायन, खून खराबा और हत्या बलात्कार की एक अलग ही दर्द भरी दास्तान है जो नासूर को नीम चढ़ा बना देता है। कल 15 अगस्त 2026 को हम सभी देशवासी स्थापित परंपरा के अनुसार स्वतंत्रता दिवस मनाएंगे और लाल किला के प्राचीर में प्रधानमंत्री तिरंगा का ध्वजारोहण करेंगे तथा राष्ट्र को संबोधित करेंगे। स्वतंत्रता दिवस के शुभ अवसर पर हर वर्ष हम सभी एक नई उम्मीद, नई योजना के साथ राष्ट्र के सम्पूर्ण समृद्धि का संकल्प लेते हैं...। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं और ये उनके निजी विचार हैं।)

रोम जल रहा था और नीरो बंशी बजा रहा था...
Published / 2026-08-13 22:41:45
रोम जल रहा था और नीरो बंशी बजा रहा था...

रोम जल रहा था और नीरो बंशी बजा रहा था...त्रिवेणी दासरोम जल रहा था नीरो बंसी बजा रहा था बयानवीर का अपना घर जल रहा था दूसरे के घर में अंजलि से पानी डाल रहा थासवाल है कि दिल्ली के जंतर मंतर के आंदोलनकारी छात्र अगर छात्र थे, तो झारखंड के रांची में आंदोलनकारी छात्र दूसरे ग्रह आये बाह्य अंतरिक्ष-जीव हैं क्या? सवालों से बचने के लिए झारखंड में इं.डि.या. गठबंधन की सरकार विधानसभा का सत्र एक दिन पहले ही समाप्त कर देती है, इस पर तो माननीय सांसद इं.डि.या. गठबंधन के हिस्सा होने का फर्ज तो नहीं निभाते हैं, अलबत्ता संसद नहीं चलने देकर गर्व से अपना पीठ थपथपाते हुए डेमोक्रेसी के शान में बंदर राग में गजल गुनगुनाते हैं।रांची में छात्रों के आंदोलन को कभर करने वाले वाले पत्रकार को थाना में डिटेन कराया जाता है और एफआईआर की कॉपी थमा दी जाती है, परिवारवादियों की तानाशाही उजागर हो जाती है, जो अक्सर होती रहती है;  ऐसे में वह आदर्श, उसूल और लोकतंत्र के नैतिकता पता नहीं क्यों पीछे रह जाती है?हकीकत है कि काठ की हांडी से बार-बार खिचड़ी नहीं पकाइ जा सकती है। आवाम की समझदारी ने अपने मतदान से देश भर में लोकप्रिय सरकार का गठन किया है और आने वाले दिनों में जनता की समझदारी दूध का दूध और पानी का पानी को अलग करने का अपनी समझदारी पुन: सिद्ध करेगी...।

जॉब लॉस कवर: आपकी फाइनेंशियल स्थिरता की सुरक्षा
Published / 2026-08-12 21:01:14
जॉब लॉस कवर: आपकी फाइनेंशियल स्थिरता की सुरक्षा

अमरनाथ सक्सेना एबीएन एडिटोरियल डेस्क। आज की तेजी से बदलती दुनिया में, फाइनेंशियल सेक्योरिटी अब आपके स्वास्थ्य, जीवन या आपकी कार जैसे मूल्यवान एसेट की सेक्योरिटी तक सीमित नहीं है। जहां हेल्थ और लाइफ इंश्योरेंस आपके परिवार के भविष्य को सुरक्षित करता है, और मोटर इंश्योरेंस आपके वाहन की सुरक्षा करता है, वहीं एक ऐसा रिस्क भी है जिसे अक्सर नजरअंदाज कर दिया जाता है- और वह है अचानक नौकरी छूट जाने का संकट। नौकरी का छूटना, चाहे वह ले आॅफ के कारण हो या अचानक आई स्वास्थ्य समस्याओं की वजह से, आपकी नियमित आय में बाधा डाल सकता है और आपकी आर्थिक स्थिरता के लिए खतरा पैदा कर सकता है। जॉब लॉस कवर का उद्देश्य इसी फाइनेंशियल कमी को दूर करना है। यह आपको एक ऐसा सुरक्षा कवच प्रदान करता है जो आपके अगले करियर अवसर तक आपकी आर्थिक जरूरतों को पूरा करने में मदद करता है। जॉब लॉस कवर क्या है? जॉब लॉस कवर एक विशेष इंश्योरेंस लाभ है जो आपकी इच्छा के बिना नौकरी छूट जाने की स्थिति में आपको फाइनेंशियल सहायता प्रदान करता है। इसका मतलब है ऐसी स्थितियों में नौकरी जाना जो आपके नियंत्रण में न हों, जैसे कंपनियों का मर्जर, अधिग्रहण, कॉस्ट-कटिंग या आॅपरेशन बंद करना। यह उन स्थितियों को भी कवर करता है जब किसी बीमारी या चोट की वजह से आप अपनी नौकरी जारी नहीं रख पाते। इस लाभ का भुगतान आमतौर पर मासिक किश्तों के रूप में किया जाता है, जो चुने गए कवर और अवधि के अनुसार आपको कुछ समय के लिए आय का सहारा प्रदान करता है। जॉब लॉस कवर की प्रमुख विशेषताएं यह प्लान विशेष रूप से उन वेतनभोगी कर्मचारियों के लिए है जो सीधे कंपनी के पेरोल पर हैं; इसमें अस्थायी, कॉन्ट्रैक्चुअल और प्रोबेशनरी कर्मचारियों को शामिल नहीं किया गया है। अगर मर्जी के बिना नौकरी छूटती है, तो तय की गई राशि हर महीने तब तक दी जाती है जब तक कि इंश्योर्ड व्यक्ति द्वारा चुने गए महीनों की अवधि पूरी न हो जाये या उसे नयी नौकरी न मिल जाए, इनमें से जो भी पहले हो। भुगतान शुरू होने से पहले एक प्रतीक्षा अवधि होती है। अगर आपकी कंपनी आपको सेवरेंस पे या नोटिस पीरियड के बदले वेतन देती है, तो ओवरलैपिंग लाभों से बचने के लिए इंश्योरेंस भुगतान को एडजस्ट किया जाता है। कवरेज की अधिकतम लिमिट आपके मासिक वेतन के एक निश्चित प्रतिशत, आमतौर पर लगभग 70% तक सीमित होती है, भले ही आपके पास एक से अधिक पॉलिसी क्यों न हों। यही कारण है कि जॉब लॉस कवर एक बहुत ही व्यावहारिक और मददगार प्लान बन जाता है, जो करियर में बदलाव के मुश्किल समय में आपको  स्थिर फाइनेंशियल सहायता प्रदान करता है। जॉब लॉस कवर क्यों महत्वपूर्ण है जॉब लॉस कवर होने से अचानक आने आर्थिक संकटों का सामना और भी बेहतर तरीके से कर सकते हैं। अगर आपके पास यह कवर नहीं है, तो अचानक नौकरी जाने से आप बड़ी मुश्किल में पड़ सकते हैं। किराया, एटक२ और बच्चों की स्कूल फीस जैसे जरूरी खर्चों को रोका नहीं जा सकता, इसलिए यह सुरक्षा होना बहुत जरूरी है। ऐसे मामलों में, लोग अक्सर केवल अपनी बचत पर निर्भर रहते हैं, लेकिन अगर नौकरी मिलने में देरी हो जाए, तो वह पैसा बहुत जल्दी खत्म हो सकता है। हालांकि, जॉब लॉस कवर होने से आपके पास एक सुरक्षित विकल्प रहता है, जो आपको हर महीने किश्तों में भुगतान देता है। यह इंश्योरेंस अवधि के दौरान आपको आर्थिक रूप से मजबूत रखता है ताकि आप बिना किसी तनाव के नई नौकरी की तलाश कर सकें। इस लगातार सहयोग से आप अपनी बचत को खर्च किए बिना अपने बुनियादी खर्चे पूरे कर सकते हैं। यह आपको वह मानसिक शांति और भरोसा देता है जिससे आप आर्थिक तंगी की परवाह किए बिना फिर से रोजगार पाने की कोशिश कर सकते हैं। संक्षेप में, जॉब लॉस कवर यह सुनिश्चित करता है कि कुछ समय के लिए आय रुकने का असर आपके भविष्य के बड़े प्लान्स पर न पड़े। एक्सक्लूजन जिनके बारे में आपको पता होना चाहिए जॉब लॉस कवर में कुछ खास एक्सक्लूजन होते हैं, जो यह तय करते हैं कि आप कब क्लेम का लाभ ले सकते हैं। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि सहायता केवल उन वास्तविक मामलों में मिले जहां नौकरी आपकी मर्जी के बिना गई हो। यह उन स्थितियों में लागू नहीं होता जहां आप अपनी इच्छा से नौकरी छोड़ते हैं, जैसे कि इस्तीफा देना या रिटायर होना, क्योंकि ये आपके स्वैच्छिक फैसले हैं। ठीक इसी तरह, अगर किसी को गलत व्यवहार, धोखाधड़ी या अनुशासन तोड़ने की वजह से नौकरी से निकाला जाता है, तो उसे भी कवर नहीं दिया जाता है, क्योंकि ये आपकी अपनी गलतियों की वजह से हुए नुकसान माने जाते हैं। इसके अलावा, हड़तालों, श्रम विवादों या मैटरनिटी या पैटर्निटी लीव न बढ़ाए जाने के कारण होने वाली बेरोजगारी को भी इस कवर में शामिल नहीं किया जाता है, क्योंकि इन स्थितियों को अचानक होने वाली बेरोजगारी नहीं माना जाता है। अंत में, कवर केवल भारत के भीतर नौकरियों पर लागू होता है, जिसका मतलब है कि देश के बाहर रोजगार के नुकसान को कवर नहीं किया जाता है। इन एक्सक्लूजन का उद्देश्य इस कवर को सिर्फ स्थाई नौकरी में आने वाली उन अचानक और बड़ी रुकावटों तक सीमित रखना है जिन्हें टाला न जा सके, न कि उन स्थितियों के लिए जो आपकी अपनी मर्जी से हों या जिनके बारे में पहले से पता हो। कुल मिलाकर, जॉब लॉस कवर लेना आपके भविष्य की आर्थिक सुरक्षा के प्रति एक जिम्मेदारी भरा कदम है। यह सुनिश्चित करता है कि अचानक नौकरी जाने जैसा कोई संकट आपके फाइनेंशियल प्लान को खराब न करें। यह अनिश्चितता के समय में आपको सुरक्षा का भरोसा देता है और मानसिक शांति बनाये रखता है। (लेखक अमरनाथ सक्सेना, चीफ टेक्निकल आॅफिसर- कमर्शियल, बजाज जनरल इंश्योरेंस लिमिटेड पूर्व नाम बजाज आलियांज जनरल इंश्योरेंस कंपनी लिमिटेड हैं।) 

प्रकृति संरक्षण से सतत विकास की राह
Published / 2026-08-11 20:50:20
प्रकृति संरक्षण से सतत विकास की राह

कविता एबीएन एडिटोरियल डेस्क। झारखंड की पहचान जल, जंगल, जमीन और जानवर से गहरे जुड़े जीवन और संस्कृति से होती है। यहां के ग्रामीण और जनजातीय समुदायों की आजीविका, परंपराएं और सामाजिक जीवन लंबे समय से प्राकृतिक संसाधनों पर आधारित रहे हैं। जंगल से मिलने वाले लघु वनोपज, खेती के लिए जमीन, जीवन और कृषि के लिए जल तथा पशुधन ग्रामीण अर्थव्यवस्था के महत्वपूर्ण आधार हैं। इसलिए झारखंड में प्रकृति संरक्षण केवल पर्यावरण का विषय नहीं, बल्कि आजीविका, खाद्य सुरक्षा, स्वास्थ्य और आने वाली पीढ़ियों के भविष्य से जुड़ा प्रश्न है। बदलते मौसम, अनियमित वर्षा, जलस्रोतों पर बढ़ता दबाव, भूमि की उर्वरता में कमी, वनों पर बढ़ता दबाव, जैव विविधता में कमी तथा ठोस एवं तरल अपशिष्ट का बढ़ता प्रभाव ग्रामीण क्षेत्रों के सामने गंभीर चुनौतियां हैं। इन परिस्थितियों में विकास की ऐसी दिशा आवश्यक है जिसमें आर्थिक और सामाजिक प्रगति के साथ प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण भी सुनिश्चित हो। इस दिशा में ग्राम पंचायतों की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाती है। स्थानीय स्वशासन की सबसे निकटस्थ संस्था होने के कारण ग्राम पंचायत अपने क्षेत्र की भौगोलिक परिस्थितियों, प्राकृतिक संसाधनों और समुदाय की आवश्यकताओं को बेहतर ढंग से समझती है। इसलिए पर्यावरण संरक्षण को अलग गतिविधि के रूप में देखने के बजाय इसे ग्राम पंचायत विकास योजना और स्थानीय विकास की प्राथमिकताओं का अभिन्न हिस्सा बनाया जाना आवश्यक है। ग्राम पंचायतें अपने क्षेत्र में उपलब्ध जलस्रोतों, भूमि, वन क्षेत्र, सामुदायिक संसाधनों, कृषि क्षेत्र और जैव विविधता की स्थिति का स्थानीय स्तर पर आकलन कर सकती हैं। तालाबों और पारंपरिक जलस्रोतों का पुनर्जीवन, वर्षा जल संचयन, जलग्रहण क्षेत्र का विकास, भूमि संरक्षण, पौधरोपण एवं पौधों का संरक्षण, सामुदायिक भूमि और चारागाहों का संरक्षण तथा स्थानीय जैव विविधता की सुरक्षा जैसे कार्यों को पंचायत की विकास योजना में प्राथमिकता दी जा सकती है। प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण तभी प्रभावी होगा जब स्थानीय समुदाय इसमें सक्रिय भागीदार बने। ग्राम सभा इस प्रक्रिया का महत्वपूर्ण मंच है। महिलाओं, युवाओं, किसानों, जनजातीय समुदायों और अन्य स्थानीय समूहों की भागीदारी से गांव की वास्तविक पर्यावरणीय समस्याओं और प्राथमिकताओं की पहचान की जा सकती है। ग्राम सभा के माध्यम से यह तय किया जा सकता है कि गांव के सामने जल संकट, भूमि क्षरण, वन संरक्षण, अपशिष्ट प्रबंधन या आजीविका से जुड़ी कौन-सी चुनौती सबसे अधिक महत्वपूर्ण है और उसके समाधान के लिए स्थानीय स्तर पर क्या प्रयास किये जा सकते हैं। सतत विकास लक्ष्यों को भी स्थानीय परिस्थितियों से जोड़ना आवश्यक है। गरीबी उन्मूलन, बेहतर आजीविका, स्वच्छ जल, स्वच्छता, स्वास्थ्य, पोषण, लैंगिक समानता, जलवायु कार्रवाई तथा प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण जैसे लक्ष्य गांव के विकास से सीधे जुड़े हैं। उदाहरण के लिए जल संरक्षण की एक पहल केवल पेयजल की उपलब्धता नहीं बढ़ाती, बल्कि कृषि, पशुपालन, आजीविका और पोषण की स्थिति को भी प्रभावित करती है। इसी प्रकार ठोस एवं तरल अपशिष्ट प्रबंधन से स्वच्छता, स्वास्थ्य और पर्यावरण तीनों में सुधार संभव है। पर्यावरण संरक्षण से जुड़े कार्य किसी एक विभाग की जिम्मेदारी नहीं हैं। जल संरक्षण, ग्रामीण रोजगार, कृषि, पशुपालन, वन, आजीविका, स्वच्छता और पेयजल से संबंधित योजनाओं के बीच प्रभावी अभिसरण से पंचायतों की क्षमता और परिणाम दोनों बढ़ाए जा सकते हैं। ग्राम पंचायत अपनी विकास योजना में स्थानीय पर्यावरणीय प्राथमिकताओं की पहचान कर विभिन्न विभागों और योजनाओं के संसाधनों को उनसे जोड़ सकती है। इससे सीमित संसाधनों का अधिक प्रभावी उपयोग संभव होगा। हालांकि इस दिशा में ग्राम पंचायतों के सामने कई चुनौतियां भी हैं। तकनीकी जानकारी और मानव संसाधन की कमी, सीमित वित्तीय संसाधन, विभागीय समन्वय की कठिनाइयां, पर्यावरणीय विषयों पर पर्याप्त जागरूकता का अभाव तथा योजनाओं के प्रभावी अनुश्रवण की सीमाएं प्रमुख चुनौतियों में शामिल हैं। जल संरक्षण, भूमि सुधार और जैव विविधता संरक्षण जैसे कार्यों का लाभ अक्सर लंबे समय में दिखाई देता है। इसलिए इनके लिए निरंतर प्रयास, सामुदायिक भागीदारी और स्थानीय स्तर पर नियमित निगरानी आवश्यक है। आने वाले समय में विकास की सोच को केवल सड़क, नाली, भवन और अन्य आधारभूत संरचनाओं तक सीमित रखने के बजाय प्राकृतिक संसाधनों कीदीर्घकालिक सुरक्षा से जोड़ना होगा। प्रत्येक ग्राम पंचायत अपने क्षेत्र की परिस्थितियों के अनुसार जल संरक्षण, हरित क्षेत्र का विस्तार, अपशिष्ट प्रबंधन, जलवायु अनुकूल कृषि, प्राकृतिक संसाधन आधारित आजीविका और जैव विविधता संरक्षण जैसी प्राथमिकताएं निर्धारित कर सकती है। इसके लिए पंचायत प्रतिनिधियों और पंचायत कर्मियों की क्षमता-वृद्धि, ग्राम सभा की प्रभावी भागीदारी, स्थानीय आंकड़ों का उपयोग और योजनाओं का नियमित अनुश्रवण महत्वपूर्ण होगा। झारखंड में सतत विकास की राह गांवों से होकर गुजरती है। जल बचेगा तो खेती और आजीविका मजबूत होगी, जंगल बचेगा तो प्राकृतिक संतुलन और स्थानीय अर्थव्यवस्था सुरक्षित रहेगी, जमीन बचेगी तो आने वाली पीढ़ियों का भविष्य सुरक्षित होगा और पशुधन तथा जैव विविधता का संरक्षण ग्रामीण जीवन को अधिक टिकाऊ बनायेगा। इसलिए प्रकृति संरक्षण को विकास से अलग नहीं, बल्कि विकास की आधारभूत शर्त के रूप में देखने की आवश्यकता है। स्थानीय स्वशासन को मजबूत करते हुए यदि ग्राम पंचायतें अपनी विकास योजनाओं को पर्यावरण संरक्षण, ग्राम सभा की भागीदारी, विभागीय अभिसरण और सतत विकास लक्ष्यों के स्थानीयकरण से जोड़ें, तो गांवों में ऐसा विकास मॉडल तैयार किया जा सकता है जो वर्तमान आवश्यकताओं को पूरा करने के साथ आने वाली पीढ़ियों के लिए भी प्राकृतिक संसाधनों को सुरक्षित रखे। यही झारखंड के गांवों को अधिक समृद्ध, स्वस्थ, समावेशी और सतत बनाने की दिशा में एक सार्थक कदम होगा। (लेखक राष्ट्रीय ग्रामीण विकास एवं पंचायती राज संस्थान पंचायती राज मंत्रालय की क्षमता निर्माण सलाहकार हैं।)

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