एबीएन एडिटोरियल डेस्क। झारखंड मुक्ति मोर्चा ने असम विधानसभा चुनाव में अपनी पूरी ताकत झोंक दी है। मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन लगातार चुनाव प्रचार कर रहे हैं। झामुमो के 16 उम्मीदवार चुनाव मैदान में है। पार्टी ने 21 उम्मीदवारों की सूची जारी की थी, लेकिन 5 उम्मीदवारों ने चुनाव लड़ने से मना कर दिया।
असम के चाय बागानों में काम करने वाले अधिकांश लोग झारखंड के आदिवासी निवासी हैं, जिन्हें वहां टी ट्राईबल के नाम से जाना जाता है जबकि झामुमो उन्हें ट्राईबल नाम करने का मांग करता रहा है जिसे हेमंता की सरकार ने भी स्वीकृति प्रदान कर दी है।
2024 के झारखंड विधानसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी ने केंद्रीय मंत्री शिवराज सिंह चौहान को चुनाव प्रभारी और असम के मुख्यमंत्री हिमंता सरमा को सह प्रभारी बनाया था। हिमंता ने ही पूरी चुनाव की रणनीति झारखंड में रहकर बनायी थी। वह दो महीने तक झारखंड में जमे रहे।
जबरदस्त कैंपेन किया। भाजपा के पक्ष में अनेक प्रकार की कूटनीतिक चाल चली। झारखंड मुक्ति मोर्चा के कद्दावर नेता और हेमंत सोरेन के करीबी पूर्व मुख्यमंत्री चंपाई सोरेन को भाजपा में शामिल कराकर एक बड़ा झटका दिया। दूसरे दलों के कई नेताओं को भाजपा में शामिल कराया। शतरंज की हर चाल चली।
हालांकि अपेक्षित सफलता नहीं मिली लेकिन हेमंत सोरेन के आंख की वह किरकिरी जरूर बन गये, और यही कारण है कि हेमंत सोरेन असम में चुनाव लड़वा रहे हैं, जबकि बंगाल में उनकी पार्टी चुनाव नहीं लड़ रही है। बंगाल में आदिवासियों की संख्या अच्छी खासी है और उसकी सीमा झारखंड से लगता है।
हेमंत सोरेन ने असम में भी कांग्रेस से गठबंधन का प्रयास किया लेकिन बिहार के तरह कांग्रेस ने घास नहीं डाला। असम में चुनाव लड़ने से कांग्रेस के साथ झामुमो के रिश्ते में दरार पड़ी है। इसका असर भी दिखने लगा है। झामुमो प्रवक्ता सुप्रियो भट्टाचार्य ने कांग्रेस को विषैला सांप तक कह दिया है।
इधर, झारखंड कांग्रेस प्रभारी के. राजू ने पहली बार झारखंड के सरकार के विरुद्ध जमकर भड़ास निकला है। खनन माफिया, सरकार के कामकाज और जिलों के डीसी की भूमिका पर सवाल उठाये हैं। समझा जा सकता है कि बात अब सीमा से आगे बढ़ गयी है। इस प्रकरण का असर इंडिया गठबंधन के ऊपर तो निश्चित ही पड़ेगा और राजनीति के जानकारी के द्वारा इसकी भी संभावना व्यक्त की जा रही है कि झारखंड में सरकार का परिदृश्य परिवर्तित हो सकता है।
एबीएन एडिटोरियल डेस्क। प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी की प्रशंसा दुनिया भर में होने के कुछ विशेष आधार हैं। जीवन के कठिन संघर्ष में ने उन्हें ऐसा व्यक्तित्व प्रदान किया है जो विरले ही देखने सुनने में आता है।
मोदीजी सदैव व्यवस्थित दृष्टिगोचर होते हैं। उनका पहरावा सादगी परंतु गरिमामयी होता है जो सहज ही व्यापक प्रभावशाली होता है। मोदीजी की बॉडी लैंग्वेज एवं चाल-ढाल आत्मविश्वास से भरा हुआ दिखाई देता है।
भगवा एवं ध्यान मुद्रा में तपस्वी की तरह, सेना के पोशाक में सैनिक के जैसा और सामान्य दिनचर्या में दिव्य आभा मंडल से युक्त दिखाई देते हैं। देशभक्ति, अनुशासन तथा मर्यादा उनके व्यक्तित्व से उद्भाषित होते रहता है, क्योंकि उनकी विचारधारा एवं भावनाएं उनके व्यवहार के अनुकूल है।
भले ही वह दुनिया के किसी भी बड़ा नेता के साथ खड़े हों उनका आत्मविश्वास उन्हें बड़ा बनाए रखना है। वादा, शिलान्यास और उद्घाटन उनके कार्यशैली की विशेषता है और यही उनकी लोकप्रियता का रहस्य है।
देश के शीर्ष तथा इतनी शक्तिशाली होने के बाद भी परिवार का मोह उन्हें छू भी नहीं सका है। राजनीति में इस प्रकार का चरित्र दुर्लभ ही होता है।
कभी बीमार नहीं पड़ना, कभी छुट्टी नहीं लेना, निश्चित समय पर कार्यालय जाना, 18 घंटे तक काम करना, निडर होकर निर्णय लेना, अध्ययन, स्मरण शक्ति, विचार संप्रेषित करने की कला, जिम्मेवारी एवं मातृभूमि के लिए सर्वस्व समर्पण किसी एक व्यक्ति में होना कोई साधारण वस्तु नहीं है।
मोदी जी से किसी ने पूछा कि आपके आंतरिक शक्ति का राज क्या है? मोदी जी ने कहा कि मैं रोज गाली खाता रहता हूं और यही मेरे ताकत का रहस्य है। सहनशक्ति का बल अद्भुत है और आश्चर्य चकित करता है।
राजनीति के दांव-पेंच, चुनाव जीतने की चुनौती और राजनीतिक गलियारों में विचरण करते विभिन्न प्रकार के जीव-जंतुओं का सामना इत्यादि कितना कठिन कार्य है सरलता से समझा जा सकता है लेकिन मोदीजी इन विषयों को सुलझाते चले जा रहे हैं।
कर्तव्य पथ के राही श्रीमान नरेंद्र मोदीजी कहते रहते हैं कि उनकी वास्तविक शक्ति का केंद्र बिंदु 144 करोड़ देशवासियों का आशीर्वाद और शुभकामना ही है। मोदी जी अपने राजनीतिक जीवन में अनेक झूठे आरोप, लांछन और और छवि धूमिल करने के कुत्सित प्रयास से बेदाग निकलते रहे हैं और इन दिनों जिस प्रकार के घटिया एवं अविश्वसनीय लांछन उनके ऊपर थोपे जा रहे हैं, उससे उनका कुछ बिगड़ता वाला नहीं है क्योंकि देशवासियों का विश्वास उनके साथ जुड़ा हुआ है।
एबीएन एडिटोरियल डेस्क। जैन धर्म के 24वें एवं अंतिम तीर्थंकर महावीर का जन्म बिहार वैशाली के कुंडा ग्राम में राजा सिद्धार्थ तथा मां त्रिशला के यहां ईसा पूर्व 6ठी शताब्दी हुआ था। 30 वर्ष की आयु में उन्होंने गृह का त्याग किया और सत्य के अन्वेषण के लिए 12 वर्षों तक कठोर तपस्या की।
जैन धर्म की परंपरा में आज का दिन आत्म स्मरण की दिशा की ओर ले जाता है। मनुष्य के बाहरी संघर्ष से भी बड़ा संघर्ष उसके भीतर चलते रहता है। अहिंसा बाहरी आचरण के अतिरिक्त वास्तव में एक आंतरिक अनुशासन है। खोने का डर एवं पाने की लालसा में उद्विग्न आदमी हिंसक बन जाता है, और यही हिंसा आदमी को मानवता एवं शांति से दूर कर देता है।
अहिंसा कायरता का प्रतीक नहीं है और ना ही निष्क्रियता का संदेश देता है। जब जीवन है, जब तक जीवन की यात्रा है और जब तक चिर-विश्राम (मृत्यु) की अवस्था नहीं आ जाती है तब तक सहयोग, सहकार, एक दूसरे के दुख-सुख में भागीदार, सामाजिक समरसता और वसुधैव कुटुम्बकम् की अवधारणा के आचरण के साथ जीवन यात्रा पूरी करने का संदेश भगवान महावीर स्वामी की जयंती से हमें प्राप्त होता है।
एबीएन एडिटोरियल डेस्क। हर आदमी का अपना एजेंडा होता है और वह अपने एजेंडा का प्रोपेगेंडा भी अपने ताकत भर करता है। एजेंडा का प्रकार तथा स्टैंडर्ड हर किसी का अपने औकात के हिसाब से ही होता है। किसी का छोटा एजेंडा बड़ा प्रचार तो किसी का खाली प्रचार कोई एजेंडा नहीं और किसी का बड़ा प्रोपेगेंडा छोटा एजेंडा।
एजेंडा और प्रोपेगेंडा के बीच गहरी रिश्तेदारी है और चोली-दामन वाला दोस्ती है। हमारे मोहल्ले में एक नेताजी रहते हैं। उनके पास कोई एजेंडा नहीं होता है, लेकिन वे कुर्ता पजामा बंडी धारण करने वाले प्रोपेगेंडा के कुशल कलाकार हैं। हमारा ही एक मित्र निठल्ला नाम से मशहूर है, लेकिन उसकी प्रोपेगेंडा देखने लायक होती है।
हमारे गुरुजी अपने मोटिवेशनल स्पीच में बड़े आत्मविश्वास के साथ समझाने का प्रयास करते हैं कि इस संसार में प्रोपेगेंडा से बड़ा कोई दूसरा नशा नहीं है जो एक बार चढ़ता है तो कभी उतरता ही नहीं है, बाकी सब किस्म का नशा चढ़ने के बाद निर्धारित समय के बाद उतर जाता है और इसीलिए उसे बार-बार चढ़ाने के लिए चिलम गरम करना पड़ता है। वह नशा ही क्या जिसे छुपाया जा सके। स्कूल के दिनों में रटा हुआ छंद का अर्थ अब जाकर बुढौती में समझ में आ रहा है कि
एबीएन एडिटोरियल डेस्क। इस समय भारतीय लोकतांत्रिक व्यवस्था में कांग्रेस मुख्य विपक्ष की भूमिका में है। कांग्रेस के नेता राहुल गांधी लीडर आॅफ अपोजिशन के पद पर विराजमान हैं। वर्तमान कांग्रेस के प्रकृति में लगता है कि राष्ट्रीय संकट के समय रचनात्मक सहयोग जैसा कोई वस्तु है ही नहीं।
अमेरिका-इजरायल तथा ईरान के बीच चल रहे युद्ध के कारण ऊर्जा के कच्चा तेल एवं प्राकृतिक गैस की आपूर्ति चैनल में रुकावट पैदा हुई है जिसका प्रभाव भारत समेत दुनिया भर में दिखाई दे रहा है। आरंभ से ही कांग्रेस मोदीजी की सरकार के ऊपर हमलावर है, जैसे इस युद्ध के कारण उत्पन्न स्थिति में भारत की भी कोई भूमिका है।
ईरान भारत को अपना मित्र देश बात कर होर्मूज जल मार्ग से भारतीय जहाज को निकलने दे रहा है। 60 दिनों तक के लिए भारत के पास ऊर्जा का संग्रहण है। दुनिया के कई देशों में तेल का राशनिंग किया गया है जबकि भारत में सब कुछ सामान्य स्वरूप में चल रहा है। सर्वदलीय बैठक में कांग्रेस जाएगी नहीं, समस्या से निपटने के लिए कोई सुझाव देगी नहीं और देश को घबराहट की स्थिति में लाने के लिए उल्टा सीधा बयान देगी।
सच पूछा जाए तो इस समय पूरे देश को एकजुट रहना राष्ट्रीय हित में आवश्यक है। प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने आह्वान किया है कि सभी राज्य सरकारों को केंद्र सरकार के साथ मिलकर टीम इंडिया की तरह काम करना होगा और इसी क्रम में आज मोदी जी सभी मुख्यमंत्री से संवाद करने वाले हैं।
लोहरदगा में पैनिक जैसा कुछ नहीं दिखाई दे रहा है। आवश्यक ऊर्जा की आपूर्ति सामान्य स्वरूप में चल रही है। अगर किन्हीं को दिखाई नहीं दे रहा है तो उन्हें अपनी दृष्टिदोष का उपचार कराना चाहिए...
एबीएन एडिटोरियल डेस्क। सांसारिक व्यवस्था में हर कोई शक्तिशाली बनना चाहता है। पैसे की ताकत, पद की ताकत और प्रतिष्ठा की ताकत पाने की इच्छा सभी की होती है; बहुत लोग की इच्छा पूरी भी होती है, परंतु विरले लोग ही अपनी ताकत का इस्तेमाल सही समय, सही दिशा और सही तरीका से कर पाते हैं।
7 अक्टूबर 2001 को उन्होंने पहली बार गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ग्रहण किया था और 26 मई 2014 को उन्होंने प्रथम बार देश के प्रधानमंत्री के रूप में शपथ लिया था, तब से लेकर आज तक लगभग 25 वर्षों से वे शासनाध्यक्ष के स्वरूप में पावरफुल रहे हैं और अपनी पावर का प्रयोग देश हित और जनहित में करते चले आ रहे हैं।
आलोचना, विरोध तथा दुष्प्रचार राजनीति का आवश्यक अंग है, जिसका सामना लगातार मोदीजी भी करते चले आ रहे हैं; लेकिन वह अपने मुख्य उद्देश्य से कभी विचलित हुए नहीं हैं जो किसी भी शक्तिशाली मानव के लिए कोई सरल बात नहीं है।
पद-पावर-प्रतिष्ठा के उचित नियोजन के लिए सामान्य व्यक्तित्व काफी नहीं होता है, इसके लिए तो प्रखर, संवेदनशील, दृढ़निश्चयी, निडर तथा अपने संगठन के लिए अडिग सिद्धांतवादी व्यक्तित्व चाहिए जिसे हमारे यशस्वी प्रधानमंत्री ने अपने संघर्ष के बल पर प्राप्त किया है और जिसके आधार पर वे नित नए-नए सफलता के इतिहास गढ़ रहे हैं।
एबीएन एडिटोरियल डेस्क। शिवकुमार तिवारी वाराणसी गदोलिया के रहने वाले मेरे रिश्तेदार के घर मैं अतिथि स्वरूप रात्रि में रुका हुआ था। उसी दिन संध्या वहां से सांसद नरेंद्र मोदी तीन दिवसीय अपने चुनाव क्षेत्र में प्रवास के बाद वापस दिल्ली लौटे थे।
मेरे रिश्तेदार तिवारी जी बताने लगे कि मोदी जी लगातार तीन दिनों से बनारस में रैली कर रहे थे। प्रतिदिन लगातार 14 घंटे का व्यस्ततम कार्यक्रम (भाषण, दर्शन, बयान, कार्यकर्ताओं से मिलना और अभिवादन स्वीकार करना, प्रशासनिक पदाधिकारियों से विमर्श) प्रात: उनकी व्यक्तिगत दिनचर्या के पश्चात पुन: वही परिश्रम वही व्यस्तता।
तिवारी जी की जिज्ञासा थी कि मोदी जी किस मिट्टी के बने हुए हैं; न थकते हैं न रुकते हैं और न ही धैर्य खोते हैं। रोज 18 घंटे काम करना, पैसे के लिए नहीं, खानदान के लिए नहीं; मात्र अपने देश के लिए उनका हर एक पल समर्पित होता है।
तिवारी जी कल्पना कर रहे थे कि अभी रात में मोदी जी अपने निवास स्थान दिल्ली पहुंचेंगे। थका मांदा, पूरे दिन भर के अनुभव, क्रिया प्रतिक्रिया का मन में बोझ, दुनिया भर की चिंता लिए निर्जीव मशीन की तरह काम करते भावहीन कर्मचारियों के बीच एकदम अकेला... लोग बताते हैं कि मोदी जी केवल चार घंटे की ही नींद लेते हैं।
कोई सुधि लेने वाला आसपास नहीं। राजनीति का क्रूर, कठोर और भावहीन मार्ग, चाटूकार और स्वार्थी लोगों का जमावड़ा, विरोधियों की गाली, बद्दुआ, हाय, श्राप सब कुछ सहते झेलते मां भारती के सेवा में अनवरत व्रतधारी।
तिवारी जी ने मुझसे पूछा है कि मोदी जी का जीवन तो बहुत रूखा-सूखा होगा? अब मेरे बोलने की बारी थी। मैंने कहा कि जिस व्यक्ति के साथ 144 करोड़ देशवासियों की सहानुभूति हो, समर्थन हो, आशीर्वाद हो और जिसके जीवन का आधार आध्यात्मिक हो; उसका जीवन रूखा-सूखा कैसे हो सकता है? कर्त्तव्य पथ का राही असंतुष्ट कैसे रह सकता है?
मोदी जी का अपना व्यक्तिगत जीवन अनेक रंगों से भरा हुआ है। संतुष्टि एवं आनंद में मग्न रहते हैं। यह अलग बात है कि राजनीतिक विषयों एवं राष्ट्रीय हित के विषय पर नीतिगत अत्यंत कठोर निर्णय लेते हुए उसका अनुपालन भी करते/कराते हैं। अंत में हम और तिवारी जी इस बात से सहमत हो गये कि विभूतियों का मूल्यांकन एवं आकलन हम दोनों के सामर्थ्य से बाहर की विषय-वस्तु है। (लेखक स्वतंत्र स्तंभकार हैं। ये उनके निजी विचार हैं।)
एबीएन एडिटोरियल डेस्क। भारतीय समाज में नारी को सदैव अत्यंत सम्मान की दृष्टि से देखा गया है। हमारे धर्मग्रंथों और सांस्कृतिक परंपराओं में नारी को केवल व्यक्ति नहीं, बल्कि शक्ति, सृजन और करुणा का प्रतीक माना गया है। वैदिक वचन यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता: अर्थात जहां नारी का सम्मान होता है वहां देवताओं का वास होता है। भारतीय संस्कृति की मूल भावना को स्पष्ट करता है। इसी आदर्श के कारण भारतीय समाज में नारी को मातृशक्ति के रूप में प्रतिष्ठित किया गया।
परंतु आधुनिक सामाजिक विमर्श में एक नया प्रश्न उठ रहा है, क्या महिलाओं को दिए गए अधिकारों और संरक्षण का कहीं-कहीं दुरुपयोग भी हो रहा है? क्या समानता की यात्रा में कभी-कभी असंतुलन की स्थिति भी बन जाती है? यह प्रश्न इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि न्याय और अधिकार का उद्देश्य किसी एक वर्ग को विशेषाधिकार देना नहीं, बल्कि समाज में संतुलन स्थापित करना है।
भारतीय धर्मग्रंथों में नारी के अनेक महान और प्रेरणादायी रूप मिलते हैं। सीता का त्याग और धैर्य, सावित्री का सत्यवान के लिए यमराज से संघर्ष, गर्गी और मैत्रेयी का वैदिक ज्ञान में योगदान, ये उदाहरण बताते हैं कि भारतीय संस्कृति में नारी केवल परिवार का हिस्सा नहीं, बल्कि ज्ञान, शक्ति और नीति की धुरी रही है। साथ ही हमारे ग्रंथ यह भी बताते हैं कि मनुष्य चाहे वह पुरुष हो या स्त्री पूर्णत: त्रुटिहीन नहीं होता।
उदाहरण के लिए: कैकेयी द्वारा वरदान के कारण रामायण में भगवान राम को वनवास जाना पड़ा। मंथरा की कुटिल सलाह ने भी उस घटना को जन्म दिया। शूर्पणखा की घटना ने आगे चलकर युद्ध की पृष्ठभूमि तैयार की। महाभारत में गांधारी का पुत्रमोह और कुंती के जीवन के निर्णय कई जटिल परिस्थितियों को जन्म देते हैं।
इन उदाहरणों का उद्देश्य किसी स्त्री को दोषी ठहराना नहीं है, बल्कि यह दिखाना है कि मनुष्य के चरित्र में अच्छाई और दुर्बलता दोनों हो सकती हैं चाहे वह पुरुष हो या स्त्री। इतिहास के लंबे कालखंड में महिलाओं ने अनेक सामाजिक अन्याय झेले हैं शिक्षा से वंचित रहना, संपत्ति अधिकार का अभाव, बाल विवाह, दहेज प्रथा, घरेलू हिंसा आदि।
इन परिस्थितियों को सुधारने के लिए आधुनिक भारत में कई कानून बनाये गये जैसे घरेलू हिंसा से संरक्षण कानून, कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न से सुरक्षा, दहेज निषेध कानून इत्यादि इन कानूनों का उद्देश्य महिलाओं को सुरक्षा देना और उन्हें समान अवसर प्रदान करना है। वास्तव में इन कानूनों ने लाखों महिलाओं को न्याय दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। सामाजिक यथार्थ यह भी बताता है कि कभी-कभी किसी भी कानून का दुरुपयोग संभव होता है।
यह समस्या केवल महिला कानूनों तक सीमित नहीं है; लगभग हर कानून में ऐसा संभावित खतरा रहता है। कुछ मामलों में यह आरोप लगाया जाता है कि झूठे उत्पीड़न के मामले दर्ज किये जाते हैं, कार्यस्थल पर व्यक्तिगत मतभेद को कानूनी विवाद बना दिया जाता है। इस संदर्भ में न्यायालयों ने भी कई बार कहा है कि कानून का उपयोग न्याय के लिए होना चाहिए, प्रतिशोध के लिए नहीं।
इसलिए आवश्यक है कि हर मामले की निष्पक्ष जांच हो और दोषी चाहे कोई भी हो—उसे दंड मिले। आज स्त्री-पुरुष दोनों ही समाज के हर क्षेत्र में साथ काम कर रहे हैं शिक्षा, प्रशासन, राजनीति, विज्ञान और उद्योग। यह सकारात्मक परिवर्तन है। लेकिन कभी-कभी संवाद की कमी, पूर्वाग्रह या असुरक्षा की भावना के कारण संबंध तनावपूर्ण हो सकते हैं।
यदि किसी महिला अधिकारी के अधीन पुरुष कर्मचारी काम करते हैं या इसके उलट स्थिति होती है, तो भी परस्पर सम्मान और पेशेवर आचरण अत्यंत आवश्यक है। समाधान का मार्ग यह है कि कार्यस्थलों पर स्पष्ट नियम, पारदर्शिता और संवाद की संस्कृति विकसित हो। समाज में यह चर्चा भी बढ़ रही है कि कुछ मामलों में पुरुष भी मानसिक, सामाजिक या पारिवारिक उत्पीड़न का सामना करते हैं।
इसलिए कई विशेषज्ञ यह सुझाव देते हैं कि पारिवारिक विवादों में लैंगिक-निरपेक्ष कानून पर विचार हो, पुरुषों की मानसिक स्वास्थ्य और पारिवारिक समस्याओं पर भी विमर्श हो, सहायता और परामर्श केंद्र सभी के लिए उपलब्ध हों। दुनिया के कई देशों में पुरुषों की समस्याओं पर भी संस्थागत चर्चा शुरू हो चुकी है।
भारत में भी इस विषय पर संतुलित और संवेदनशील संवाद की आवश्यकता है। समाज को यह समझना होगा कि स्त्री और पुरुष एक-दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि पूरक हैं। भारतीय दर्शन में अर्धनारीश्वर की अवधारणा यही बताती है कि सृष्टि का संतुलन स्त्री-पुरुष के सामंजस्य से ही संभव है। इसलिए समाधान किसी एक पक्ष को दोषी ठहराने में नहीं, बल्कि संतुलन स्थापित करने में है।
महिलाओं को सम्मान और सुरक्षा मिलनी चाहिए। पुरुषों के अधिकार और समस्याएं भी सुनी जानी चाहिए। कानून का उद्देश्य न्याय हो, विशेषाधिकार नहीं। समाज में संवाद और पारस्परिक विश्वास का वातावरण बने। नारी शक्ति का सम्मान भारतीय संस्कृति की आत्मा है। परंतु सम्मान और अधिकार तभी सार्थक होते हैं जब वे न्याय और संतुलन के साथ जुड़े हों।
यदि किसी भी स्तर पर अधिकार का दुरुपयोग होता है चाहे वह पुरुष द्वारा हो या स्त्री द्वारा तो समाज को निष्पक्ष दृष्टि से उसका समाधान करना चाहिए। समानता का अर्थ प्रतिस्पर्धा नहीं, बल्कि सहयोग है। स्त्री और पुरुष दोनों जब एक-दूसरे के सम्मान, अधिकार और गरिमा को स्वीकार करेंगे तभी एक स्वस्थ, न्यायपूर्ण और संतुलित समाज का निर्माण संभव होगा। (लेखक सांस्कृतिक शोधकर्ता, रंगनिर्देशक, असिस्टेंट प्रोफेसर और स्वतंत्र स्तंभकार हैं। ये उनके निजी विचार हैं।)
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