एबीएन एडिटोरियल डेस्क। झारखंड की धरती केवल खनिज, वन और प्राकृतिक सौंदर्य के लिए ही नहीं जानी जाती, बल्कि यह भूमि भारत की प्राचीन सनातन साधना, तपस्या और आध्यात्मिक चेतना की भी जीवंत साक्षी रही है। इसी पवित्र धरती पर अवस्थित टांगीनाथ धाम न केवल एक धार्मिक स्थल है, बल्कि यह झारखंड की सांस्कृतिक आत्मा, सनातनी परंपरा और आध्यात्मिक इतिहास का एक मौन किंतु सशक्त घोषणापत्र है। टांगीनाथ शब्द अपने आप में गूढ़ आध्यात्मिक अर्थ समेटे हुए है।
लोकमान्यता के अनुसार, यहां स्थापित शिवलिंग और उससे जुड़ी टांगी (फरसा) शक्ति, तप और त्याग की प्रतीक है। यह स्थान केवल पूजा-अर्चना का केंद्र नहीं, बल्कि सनातन साधकों की कठोर तपस्या, वैराग्य और ब्रह्मानुभूति का साक्ष्य है। यह धाम गुमला जिले के चैनपुर डुमरी प्रखंड के घने वनों और पर्वतीय क्षेत्र में स्थित है, जहां प्रकृति स्वयं ध्यान और साधना की सहचरी बन जाती है। यही कारण है कि टांगीनाथ को आदिकाल से ही तपस्थली के रूप में मान्यता प्राप्त रही है।
टांगीनाथ धाम को लेकर झारखंड सहित आसपास के क्षेत्रों में एक अत्यंत प्राचीन और सुदृढ़ मान्यता प्रचलित है कि यह स्थल भगवान परशुराम की तप:स्थली रहा है। यह मान्यता केवल लोककथा नहीं, बल्कि भारत की सनातन तपस्वी परंपरा, शैव-वैष्णव समन्वय और भौगोलिक साक्ष्यों से भी जुड़ती दिखाई देती है। भगवान परशुराम को भारतीय परंपरा में विष्णु का छठा अवतार माना जाता है। जिनको त्रेता युग के प्रारंभिक काल का महापुरुष चिरंजीवी (अमर) तपस्वी योद्धा माना गया है।
अधिकांश विद्वान परशुराम को ईसा से लगभग 3000-4000 वर्ष पूर्व के कालखंड में स्थापित करते हैं। वे केवल योद्धा नहीं, बल्कि शैव साधक, कठोर तपस्वी और ब्रह्मचारी योगी थे। अब प्रश्न यह उठता है कि क्या टांगीनाथ परशुराम की तप:स्थली थी? तो ग्रंथों में टांगीनाथ नाम से सीधा उल्लेख नहीं मिलता, किंतु स्कंद पुराण, वायु पुराण, शिव पुराण में ऐसे वनांचल, पर्वतीय तपोवनों का उल्लेख है जहां परशुराम ने शिव-साधना की।
झारखंड का यह क्षेत्र उस समय दंडकारण्य और उत्तर कोसल क्षेत्र की सीमाओं से जुड़ा हुआ माना जाता है। अत: भौगोलिक संगति पूरी तरह बनती है। टांगीनाथ में अवस्थित त्रिशूल/टांगी को लेकर स्थानीय जनमान्यता है कि यह स्वयं भगवान परशुराम द्वारा स्थापित है। यह उनकी तपस्या का प्रतीक है। इसी टांगी स्थानीय भाषा में (त्रिशूल) के कारण स्थान का नाम टांगीनाथ पड़ा होगा। ऐतिहासिक दृष्टि से यह त्रिशूल धातु-विशेष (लोहे/मिश्र धातु) का बना है। इसका रूप आधुनिक नहीं, बल्कि प्राचीन लौह युगीन शस्त्र शैली से मेल खाता है।
अनुमानत: यह 2000 वर्ष से अधिक पुराना हो सकता है, हालाँकि इसकी कार्बन डेटिंग या वैज्ञानिक जांच आज तक नहीं कराई गई, यह प्रशासनिक उपेक्षा का बड़ा उदाहरण है। भगवान परशुराम को शास्त्रों में परम शिवभक्त कहा गया है। उनके जीवन का एक बड़ा भाग शिव आराधना, तप, क्षत्रिय दमन के पश्चात प्रायश्चित में व्यतीत हुआ। स्थानीय मान्यताओं के अनुसार परशुराम ने एक निश्चित संकल्प संख्या के अंतर्गत शिवलिंग स्थापित किये, ये शिवलिंग प्राकृतिक शिलाओं से निर्मित हैं। पूरे टांगीनाथ पर्वत परिसर में सैकड़ों शिवलिंग बिखरे हुए हैं।
यह संख्या संयोग नहीं, बल्कि तपस्या की गणना आधारित साधना पद्धति का संकेत देती है। स्थानीय पुजारियों और शोधकर्ताओं के अनुसार 300 से 500 के बीच शिवलिंग होने की संभावना व्यक्त की जाती है। कई अब वनस्पति और मिट्टी में दब चुके हैं, स्थानीय लोग तो यह भी बताते हैं कि कई आसामाजिक तत्वों ने शिवलिंग को यहां से उठाकर कहीं-कहीं और भी ले गये हैं जिसका पता नहीं। परिसर में जो शिवलिंग हैं वह कुछ खंडित अवस्था में हैं। यह संख्या दशार्ती है कि यह स्थल एक सामान्य तपोभूमि नहीं रहा होगा। बल्कि एक दीर्घकालीन तपोवन परिसर रहा है।
ग्रंथीय संकेत और लोकपरंपरा दोनों के आधार पर परशुराम ने कई चरणों में तपस्या की। प्रत्येक तपस्या 12 वर्षों की मानी जाती है। कुल अवधि 36 से 60 वर्षों तक की मानी जाती है। यह तपस्या शिव-अनुग्रह, आत्मशुद्धि और लोककल्याण के लिए थी। यह स्पष्ट करना आवश्यक है कि वर्तमान मंदिर संरचना परशुराम काल की नहीं है। परंतु यहां पर जीर्ण-शीर्ण अवस्था में पड़े हुए मंदिर के अवशेषों से यह अनुभव होता है कि यहां संभवत: 9वीं-12वीं शताब्दी के बीच नागवंशी या किसी स्थानीय शैव शासकों द्वारा मंदिर का निर्माण कराया गया होगा जिसके अवशेष अभी भी परिसर में मौजूद है।
परंतु मूल तप:स्थली उससे हजारों वर्ष पुरानी रही होगी। स्थानीय मान्यताओं में यह कथा प्रचलित है कि किसी छत्तीसगढ़ क्षेत्र के शासक ने सत्ता संघर्ष या धार्मिक अहंकार में टांगीनाथ मंदिर को आंशिक रूप से खंडित करवाया। ऐतिहासिक दस्तावेजों में इसका स्पष्ट प्रमाण नहीं मिलता है, लेकिन खंडित शिलाएं, टूटी मूर्तियां, पुनर्निर्माण के संकेत इस कथा को पूर्णत: असत्य भी नहीं ठहराया जा सकता। यह संभवत: मध्यकालीन सत्ता संघर्ष, धार्मिक टकराव या संसाधन लूट का परिणाम रहा हो। धर्मग्रंथों में टांगीनाथ का नाम से उल्लेख नहीं मिलता है, किंतु यह स्थल शिव तपोवन श्रेणी में आता है।
परशुराम से जुड़ी वनस्थली साधना परंपरा का सशक्त प्रमाण है। सनातन परंपरा में कई स्थलों के नाम कालांतर में परिवर्तित हो गए, पर उनकी आध्यात्मिक ऊर्जा स्थिर रही। देश के इतिहास के पन्नों में टांगीनाथ को वह स्थान नहीं मिला, जिसका वह अधिकारी है। जबकि यह सर्वविदित है कि झारखंड क्षेत्र प्राचीन काल से ही शैव, वैष्णव और शक्ति उपासना की त्रिवेणी रहा है। टांगीनाथ इसी परंपरा की एक मजबूत कड़ी है। जनश्रुतियों और स्थानीय परंपराओं के अनुसार, यहां सिद्ध महात्माओं और योगियों ने वर्षों तक कठोर साधना की।
यह स्थल वैदिक और उत्तरवैदिक सनातन परंपरा से जुड़ा हुआ रहा है, जहां ब्रह्म, आत्मा और प्रकृति के सामंजस्य को जीवन-दर्शन के रूप में स्वीकार किया गया। यदि सनातन को केवल कर्मकांड तक सीमित न रखकर उसके दार्शनिक और आध्यात्मिक मर्म को समझा जाये, तो टांगीनाथ का संबंध सीधे श्रीकृष्ण तत्व से जुड़ता है। श्रीकृष्ण गीता में कहते हैं योगस्थ: कुरु कर्माणि (अध्याय 2, श्लोक 48) अर्थात योग में स्थित होकर, आसक्ति को त्यागकर कर्म करो। टांगीनाथ की परंपरा भी कर्म, तप और ध्यान के समन्वय पर आधारित है।
यहाँ की साधना पद्धति में निष्काम कर्म, आत्मसंयम और ईश्वर से तादात्म्य का भाव स्पष्ट दिखाई देता है, जो श्रीकृष्ण के योग-दर्शन का ही विस्तार है। झारखंड की आदिवासी सनातन चेतना भी श्रीकृष्ण के प्रकृतिझ्रकेन्द्रित दर्शन से मेल खाती है, जहां वन, पर्वत, नदी और जीव-जंतु सभी ईश्वरीय सत्ता के प्रतीक माने जाते हैं। टांगीनाथ केवल मंदिर नहीं, बल्कि झारखंड की लोक-संस्कृति, आस्था और सामूहिक चेतना का केंद्र है। यहां लगने वाले मेले, धार्मिक अनुष्ठान और पारंपरिक आयोजन झारखंड की सांस्कृतिक निरंतरता को जीवित रखते हैं।
यह स्थल बताता है कि झारखंड की संस्कृति किसी बाहरी प्रभाव की देन नहीं, बल्कि सनातन भारतीय संस्कृति की मूलधारा का अभिन्न अंग है। यदि टांगीनाथ का समुचित विकास किया जाए, तो यह स्थल आध्यात्मिक पर्यटन, सांस्कृतिक पर्यटन, प्रकृति एवं वन पर्यटन, शोध एवं अध्ययन पर्यटन का प्रमुख केंद्र बन सकता है। यहां की भौगोलिक स्थिति, प्राकृतिक सौंदर्य और आध्यात्मिक ऊर्जा इसे झारखंड का केदारनाथ बनने की क्षमता प्रदान करती है।
दुर्भाग्यपूर्ण है कि इतनी समृद्ध विरासत होने के बावजूद टांगीनाथ आज भी आधारभूत सुविधाओं की कमी समुचित सड़क और परिवहन व्यवस्थाओं के अभाव से जूझ रहा है। प्रचार-प्रसार की उपेक्षा, संरक्षण और शोध की कमी जैसी समस्याओं से जूझ रहा है। यह प्रशासनिक अनदेखी केवल एक स्थल की नहीं, बल्कि झारखंड की आत्मा की उपेक्षा है।
यदि टांगीनाथ को केंद्र में रखकर सनातन सांस्कृतिक सर्किट, धार्मिक पर्यटन नीति, स्थानीय युवाओं को रोजगार, शोध एवं दस्तावेजीकरण जैसे प्रयास किए जायें, तो यह झारखंड की आर्थिक, सांस्कृतिक और आध्यात्मिक समृद्धि का मजबूत आधार बन सकता है। टांगीनाथ झारखंड की केवल एक धरोहर नहीं, बल्कि सनातन चेतना का जीवंत प्रतीक है। यह स्थल हमें याद दिलाता है कि झारखंड की पहचान केवल खनिज से नहीं, बल्कि उसकी आध्यात्मिक विरासत, सांस्कृतिक आत्मबोध और सनातनी परंपरा से है।
आज आवश्यकता है कि हम टांगीनाथ को केवल अतीत की स्मृति न बनाकर, उसे झारखंड के सांस्कृतिक पुनर्जागरण और विकास का केंद्र बनायें। ठीक उसी प्रकार जैसे श्रीकृष्ण ने कर्म और चेतना के संतुलन से समाज को दिशा दी थी। (लेखक सांस्कृतिक शोधकर्ता, रंग निर्देश सह असिस्टेंट प्रोफेसर हैं।)
हरियाली दिख जाए तो
भैंस लगाए दौड़,
राह में जो भी आ जाए
देता सिंग से फोड़...
देता सिंग से फोड़
सनकी ट्रंप का यही व्यवहार,
ग्रीनलैंड की देख हरियाली
मुंह से टपकाए लार...
मुंह से टपकाए लार
हर जगह करता घुसपैठ,
क्यों दिया जाए नोबेल पुरस्कार
है बना हुआ बिगड़ैल लठैत...
एबीएन सोशल डेस्क। एक समय की बात है वृंदावन में एक महाराज जी बड़ी ही सुंदर कथा सुना रहे थे। यमुना नदी के उस पार गांव से दो सखियां वृंदावन में रोज सब्जी बेचने आती थी। उन दोनों में से एक का नाम था मंगला और दूसरी का सुमंगला। मंगला और सुमंगला दोनों सब्जी की टोकरी सिर पर रख आती और रोज वृंदावन में सब्जी बेचती। वह दोनों घर से अचार और रोटी लेकर आती और वापस यमुना के तट पर जाकर पेड़ की छाया में बैठकर अचार-रोटी खाती। यमुना जी का पानी पीती। बड़े ही आनंद के साथ नाव में बैठकर किराया देकर अपने घर चली जाती थी। वह दोनों वृंदावन के पास यमुना नदी के उस पार एक गांव में रहने वाली थी। परंतु कभी उन्होंने भगवान श्री कृष्ण का नाम नहीं सुना था।
भक्ति क्या होती है पूजा पाठ क्या होता है उन्होंने कभी नहीं जाना। केवल अपना गुजारा करती और अपना पेट भरना जानती थी। वह दोनों बड़ी सहज थी। झूठ बोलना तो मानो उन्होंने अपने जीवन में जाना ही नहीं था। कपट क्या होता है मंगला और सुमंगला ये नहीं समझती थी। आज तक उन्होंने झूठ नहीं बोला था। उनके अंदर रति भर कपट नहीं था। जैसी ही वह दोनों बाहर से थी वैसे ही भीतर से भी।
एक दिन दोनों सखियां सब्जी बेचने वृंदावन आयी। उनकी सब्जी जल्दी बिक गयी। सब्जी जल्दी बिकने पर देखा कि जहां वह सब्जी बेचने गयी थी, वहां एक बड़े ही ज्ञान की कथा चल रही थी। मंगला ने कहा- सुनो बहन सुमंगला, सब्जी तो आज जल्दी बिक गयी। हम इतनी जल्दी भी घर जाकर क्या करेंगे? यह महाराज जी कथा सुना रहे हैं, चलो कथा सुन लेते हैं। सुमंगला ने कहा कि बहन मंगला, कथा क्या होती है? मंगला बोली बहन यह तो मुझे भी नहीं मालूम। पर चलो सब लोग कहते हैं कि कथा हो रही है तो चलो आज हम भी सुन ही लेंगे कि कथा क्या होती है? मंगला-सुमंगला दोनों सब्जी की टोकरी एक जगह रख कथा में गयी और सबसे पीछे पंडाल में जाकर बैठ गयी। दोनों ही बड़ी श्रद्धा से कथा सुनने लगी।
महाराज जी कथा सुना रहे थे। कह रहे थे कि जिसने भगवान से प्रेम नहीं किया, उनका जीवन बेकार है। जिनका प्रेम कृष्ण के चरणों में नहीं हुआ उनका जीवन बेकार है। अरे आपने अगर भगवान को नहीं देखा, तो फिर क्या देखा? भगवान को नहीं पाया तो फिर क्या पाया? महाराज जी बड़े प्यार से भगवान की चर्चा सुना रहे थे। भगवान को प्राप्त कर लेना ही जीव मात्र, मनुष्य मात्र की सार्थकता है। महाराज जी कथा में कह रहे थे आप सबको पता है कि इस धरती पर आपका जन्म क्यों हुआ है? अरे भगवान को पाने के लिए आसे हो, तुम भगवान को खोजने के लिए आये हो। परंतु यहां आप लोग केवल अपना पेट भरने में लगे हो। पैसा इकट्ठा करने में लगे हो। भूल गये कि आने का उद्देश्य क्या था?
जब महाराज जी ने इस तरह से कथा में समझाया और सुनाया तो मंगला और सुमंगला दोनों सखियां बड़ी प्रभावित हुई। मंगला ने कहा बहन सुमंगला देखो महाराज जी ने क्या कहा है कि श्री कृष्ण चरणों में प्रेम नहीं हुआ तो जीवन बेकार है। तो सुमंगला ने कहा कि बहन मंगला तो क्या हमारा जीवन बेकार हो जायेगा। क्या हमारी जिंदगी बेकार चली गयी? मंगला ने कहा- बहन लगता तो ऐसा ही है। अब कथा चल रही थी। इधर मंगला और सुमंगला को यमुना नदी पार करके वापस अपने गांव जाना था। इसलिए वह दोनों सखियां कथा से उठकर के चली गयी, परंतु दोनों सखियां रास्ते में यही चर्चा करती रही।
बहन तू बता कभी तूने क्या कृष्ण को देखा है? भगवान को देखा है? मंगला बोली- बहन मैं तो हमेशा तेरे साथ रहती हूं। भला मैंने भगवान को कहां देखा है? तो सुमंगला बोली- बहन तो फिर हमें भगवान को देखना चाहिए। महाराज जी ने कहा कि यदि भगवान को नहीं देखा और भगवान से प्रेम नहीं किया तो जीवन बेकार है।
सुमंगला ने कहा- यह बताओ फिर भगवान मिलेंगे? कहां मिलेंगे? तो मंगला ने कहा- मुझे लगता है भगवान साधु संतों के पास जरूर मिलेंगे। फिर दोनों सखियां बातें करते-करती यमुना नदी के तट पर पहुंच गयी। यमुना नदी के तट पर बैठकर वह दोनों अचार-रोटी खाने लगी और बस यही चर्चा कर रही थी कि हम तो तुच्छ प्राणी हैं। हम दोनों अभागी हैं। हमें कहां भगवान मिलेंगे? उन्होंने कहा साधुओं को भगवान मिलते होंगे। तभी यमुना के किनारे पर एक महाराज आते हैं। महाराज जी आये। उन्होंने अपना कमंडल और झोला यमुना के तट पर रखा और जंगल में शौच के लिए चले गये।
जैसे ही महाराज जी जंगल में झाड़ियों के बीच जाकर बैठे, तो मंगला और सुमंगला आपस में कहने लगी- सुनो यह महाराज जी हैं और इनका सामान यहां रखा हुआ है। जरूर भगवान यहीं होंगे। महाराज जी तो यहां से बिल्कुल लंगोटी लगाकर के गये हैं। उनके शरीर पर तो कोई कपड़ा था नहीं। भगवान तो उन्होंने कहीं छुपाया नहीं था। जरूर उनके सामान में भगवान होंगे। मंगला बोली चलो फिरजल्दी से उन्होंने अपनी रोटी और अचार को छोड़ दिया और दोनों दौड़ कर गई और महाराज जी का जो सामान था कमंडल खोला तो उसमें कुछ नहीं मिला फिर झोला निकाला तो उसमें उनका पूजा पाठ का सामान था। वह कहने लगे अरे बहन इस झोली में तो भगवान नहीं हैं। देखो। ध्यान से देखो। भगवान तो महाराज जी के पास होते हैं। जरूर भगवान इनके पास होंगे, तुम्हें दिखाई नहीं दे रहे हैं। वह दोनों सखियां इतनी भोली भाली थी कि उन्हें यह भी नहीं पता कि भगवान कहां है?
उन्हें तो यह लगा कि भगवान साधुओं के पास होते हैं और साधु का झोला और सामान यहीं रखा हुआ है। अब उन्होंने महाराज जी का झोला पलट दिया पूरे झोले को खाली कर दिया। जब झोले को पूरा खाली कर दिया तो उसमे से एक छोटा सा डिब्बा निकला। अब जैसे ही उस डिब्बे को खोला तो उस डिब्बे के अंदर छोटे से लड्डू गोपाल जी बैठे हुए थे। लड्डू गोपाल जी को देखकर सुमंगला ने कहा- बहन भगवान मिल गये। देखो यह रहे भगवान। मंगला रोने लगी तो सुमंगला बोली- बहन रोती क्यों हो?
महाराज जी जरूर आपको डांटते होंगे। मंगला बोली- प्रभु अभी महराज जी नहीं है। महाराज जी अभी जंगल में गये हैं। आप एक काम करो, थोड़ी देर जब तक हम दोनों सखियां यहीं पर हैं आप अपना पांव सीधा कर लो। अब आपको डरने की कोई जरूरत नहीं है। आपको कोई डांटेगा नहीं। आप ने महाराज जी के डर के कारण पांव टेढ़ा करके रखा है। इतने छोटे से डिब्बे में बैठे हो आप। मेरे साथ चलेंगे तो मैं आपको अपनी टोकरी में बैठाउंगी। मंगला ने कहा- लगता है भगवान ज्यादा ही डरे हैं। सुमंगला ने कहा- लाओ हम पांव सीधा कर देते हैं। भगवान को पकड़ा और लड्डू गोपाल जी का पांव पकड़ कर खींचने लगी। सुमंगला ने जब लड्डू गोपाल जी को पकड़ कर खींचा। उनके पैर को सीधा किया और कहा कि प्रभु अब आपको डरने की कोई जरूरत नहीं है।
महाराज जी नहीं है आप अपना पांव सीधा कर लो थोड़ी देर आपको अच्छा लगेगा पांव सीधा करके। जब सुमंगला ने पांव सीधा किया, तो भगवान उसकी सहजता और उसकी सरलता पर रिझ गये। न जाने कौन से गुण पर दयानिधि रिझ जाते हैं। भगवान उस मंगला और सुमंगला ने जब पांव पकड़ कर खींचा, तो श्याम सुंदर ने अपना पांव सीधा कर लिया। एक पांव नहीं, एक पांव मंगला ने खींचा तो सीधा हो गया और दूसरा पांव सुमंगला ने खींचा तो वह भी सीधा हो गया। अब तो भगवान बड़े हो गये। अभी टेढ़े पांव थे तो छोटे पांव सीधे हो गये। मंगला और सुमंगला ने ठाकुर जी को खड़ा किया। उनकी जो अचार रोटी बची हुई थी खाने के बाद उन्होंने कहा- प्रभु हमको लगता है आप भूखे हैं? आप खाना खा लीजिये।
तो भगवान उनके प्रेम में रिझ कर उनकी बासी रोटी और अचार खाने लगे लड्डू गोपाल जी का मुंह खुला और वह भगवान को खिलाने लगी। भगवान उनकी तरफ देख कर मंद मंद मुस्कुराते जा रहे थे। मंगला और सुमंगला खिलाती जा रही थी। तब तक महराज जी जंगल के झाड़ियों से निकल कर आ गये और जब आये तो महराज जी ने देखा की हमारी झोली के पास दो महिलाएं खड़ी है। महराज जी तुरंत बोले अरे कौन हो चोर हो क्या? क्या चुराने आयी हो? महाराज जी दौड़े। कहने लगे पकड़ो, पकड़ो। अब मंगला और सुमंगला बोली- बहन भागो। फिर दोनों सखियां भगवान से कहने लगी- प्रभु फिर मिलेंगे हम। आपसे दोबारा आपके कब दर्शन होंगे? ऐसा कह कर भगवान को वहीं छोड़कर मंगला और सुमंगला भागी और अपनी टोकरी उठाकर तुरंत भाग गयी। अब महाराज जी बड़े गुस्से में आये और देखा तो पूरा सामान नीचे पड़ा हुआ था।
झोली दूर पड़ी हुई थी। अब झोली को उठाया महराज जी ने अपना सामान रखा लड्डू गोपाल जी का डिब्बा देखा तो डिब्बा खुला हुआ था। देखा अरे डिब्बा खुला है। भगवान कहां हैं? यहां वहां देखा तो भगवान पड़े थे बालू रेत में। अब जैसे ही महाराज जी ने अपने भगवान जी को डिब्बे में रखा तो भगवान डिब्बे में आये ही नहीं। अब डिब्बे से पांव बाहर निकल रहे थे। भगवान डिब्बे में नहीं आ रहे थे। फिर जब महाराज जी ने ध्यान से देखा तो भगवान के दोनों पांव सीधे थे। यह देख कर महाराज जी लड्डू गोपाल के चरणों में गिर पड़े और कहने लगे- प्रभु यह क्या लीला है? तब मंगला ने आवाज लगायी। महाराज जी भगवान को इतना डराना मत, आपने इन्हें डरा करके रखा था।
यह टेढ़ा पांव करके बैठे थे। हम दोनों सखियों ने इनका पांव सीधा किया है। अब उनके पांव टेढ़ा न करवाना। मंगला यह कह कर चली गयी और वह साधु बस एक नजर से मंगला और सुमंगला को देखते रहे। कहने लगे- रुक जाओ, रुक जाओ। मुझे अपने चरणों की धूल ले लेने दो। लेकिन मंगल और सुमंगला नहीं रुकी। वह दोनों सखियां चली गयी। उन्हें लग रहा था कि महाराज जी कहीं हमें पकड़ कर मार लगायेंगे। फिर महाराज जी बोले- हे नाथ मेरी सारी जिंदगी निकल गयी आपकी सेवा करते-करते।
परंतु आपका पांव मैं सीधा नहीं कर पाया। और यह दोनों गांव की स्त्रियां, इन्होंने आपको अचार और रोटी का भोग लगाया और उनके कहने से आप ने भोग ग्रहण कर लिया। उनके कहने से अपना पांव सीधा कर लिया। वह महाराज जी भगवान के चरणों में गिरकर प्रणाम करते हुए कहने लगे- हे नाथ मैं अभागा हूं। मैंने सिर्फ आपको अपनी झोली में रखकर केवल वजन ढोया है। जैसा प्रेम उन दोनों ने कर लिया आपसे, जितनी सहजता और सरलता मेरे भीतर नहीं आयी। जिसके कारण आपने मुझे कभी दर्शन नहीं दिये।
एबीएन एडिटोरियल डेस्क। आज प्रतिष्ठा द्वादशी अयोध्या में श्रीराम जन्मभूमि मंदिर में रामलल्ला मूर्ति की स्थापना के एक साल पूरे होने के उपलक्ष्य में ध्वस्त खंडहरों में भव्य मंदिर का निर्माण श्रीराम जन्मभूमि मंदिर: अयोध्या आंदोलन जिसने भारतीय राष्ट्र को जगाया और राष्ट्रीय चेतना को बढ़ाया।
विषय में प्रवेश करने से पहले, आइये श्री राम जन्मभूमि आंदोलन की पृष्ठभूमि की समीक्षा करें। यह आश्चर्य की बात है कि देश में मंदिर निर्माण के लिए इतनी बड़ी संख्या में लोगों ने आंदोलन किया।
विद्वानों से लेकर देश के आम लोगों ने श्रीराम को आदर्श माना, और यह भी आश्चर्य की बात है कि उन्हें अपने आराध्य भगवान की जन्मभूमि के लिए पीढ़ियों तक संघर्ष करना पड़ा, जिनके मन में उनके प्रति अटूट सम्मान और आस्था थी। यह संघर्ष 1528 से लेकर आज तक, मंदिर निर्माण पूरा होने के बाद भी जारी है। लोगों के लंबे संघर्ष ने इस देश के स्वाभिमान और लोगों की राष्ट्रीय भावना को जन्म दिया है।
यही बात डेविड फ्रॉली ने भी कही, जो प्रसिद्ध अमेरिकन काउंसिल आफ वैदिक एंड एस्ट्रोलॉजी के अध्यक्ष रह चुके हैं। अयोध्या श्रीराम जन्मभूमि आंदोलन सिर्फ मंदिर के लिए नहीं, यह आंदोलन भारत के सांस्कृतिक गौरव के पुनरुत्थान की शुरुआत है।
अयोध्या मंदिर के लिए 80 युद्धों और चार लाख लोगों के बलिदान के बाद, स्वतंत्र भारत के लोकतांत्रिक संघर्ष में जीत के बाद, 5 अगस्त, 2020 को अयोध्या में भूमि पूजन हुआ। यह सिर्फ मंदिर निर्माण की शुरुआत नहीं है, बल्कि देश की जनता की राष्ट्रीय विचारधारा की भी शुरुआत है। हमारे देश में श्री राम के मंदिरों की कमी नहीं है। गांव-गांव में हैं, इसलिए यह कहना काफी नहीं है कि यह सिर्फ एक मंदिर का संघर्ष है।
यह संघर्ष न तो धार्मिक है, न क्षेत्रीय, न किसी समुदाय विशेष का और न ही राजनीतिक। यह संघर्ष हमारे राष्ट्र की चेतना को जगाने का है। अगर यह धार्मिक है, तो जब यह आंदोलन जोरों पर चल रहा था, जब लाखों कारसेवक अयोध्या जा रहे थे, तो उनके रास्ते में कई गैर-हिंदुओं के पूजा स्थल थे, उनमें से कई उनके आगे और बीच में भी गये..., लेकिन किसी भी कारसेवक ने किसी गैर-हिंदू या उसके पूजा स्थल को नुकसान नहीं पहुंचाया। इसलिए, यह आंदोलन किसी के खिलाफ नहीं था।
अयोध्या श्री राम जन्मभूमि आंदोलन हमारे देश और हिंदू समुदाय के स्वाभिमान के लिए एक संघर्ष था, हिंदू जाति के साथ हो रहे अन्याय पर सवाल उठाकर न्याय के लिए एक संघर्ष, विदेशी हमलावरों के हाथों नष्ट हुए इस देश के अस्तित्व को बचाने के लिए एक संघर्ष, प्राचीन परंपराओं, रीति-रिवाजों और जीवन शैली को फिर से स्थापित करने के लिए एक संघर्ष, देश के लोगों द्वारा एकजुट होकर किये गये इन संघर्षों ने हमारे राष्ट्र को बहुत ताकत दी, और यह ताकत देश के सम्मान और प्रतिष्ठा को भी बढ़ाती है।
अगर हर गांव से लोगों की भागीदारी के लिए एक ईंट अयोध्या भेजी जाये, तो यह भावना और मजबूत होगी कि यह मंदिर हमारा है, यह मंदिर एकता का प्रतीक बनेगा, हमारे हारे हुए देश और हिंदू समाज की जीत का प्रतीक बनेगा। इसी भावना ने 495 साल तक श्री राम जन्मभूमि आंदोलन को प्रेरित किया। उस समय, श्री राम शिला पूजा के बाद, हमने आंदोलनकारियों से आंदोलन के खर्च के लिए पैसे देने को कहा, जब एक करोड़ परिवारों ने प्रति घर 1.25 रुपये दिये, तो न केवल आप बल्कि पूरी दुनिया हैरान रह गयी।
तब से, कभी भी पैसे की कमी नहीं हुई क्योंकि भक्त श्रीराम के काम और मंदिर निर्माण में आर्थिक रूप से मदद कर रहे हैं। 2020 में, देश भर के पांच लाख 13 हजार से ज्यादा गांवों के 14 करोड़ परिवारों द्वारा दिये गये चढ़ावे की राशि 4 हजार करोड़ रुपये से ज्यादा थी। उस पैसे से, इस मंदिर का, मुख्य मंदिर का निर्माण पूरा हुआ, और उप-मंदिरों का काम अभी भी चल रहा है।
यह मंदिर सिर्फ एक भव्य इमारत बनाने के इरादे से नहीं बनाया जा रहा है, हमने यह आंदोलन इस इरादे से किया है कि हर आम आदमी को खुद महसूस हो कि यह मेरा मंदिर है, एक पूजा स्थल है जिसकी मेरे पूर्वज सम्मान के साथ रक्षा करते आ रहे हैं, शायद मुझे लगता है कि भविष्य में आंदोलन की जरूरत नहीं पड़ेगी। देश में श्री राम के आम भक्त की भी श्री राम और हमारे देश में आस्था है, ऐसी आस्था ही किसी भी देश के लिए सबसे बड़ी ताकत होती है। इस मायने में, अयोध्या में श्री राम मंदिर का निर्माण सीधे राष्ट्र का निर्माण है।
यह देश के हितों और राष्ट्र की आस्था से जुड़ा है। अयोध्या मंदिर में बलराम की सुंदर मूर्ति की स्थापना, वहां होने वाली आरती और भजन ही नहीं, बल्कि श्री राम के जीवन के आदर्शों को भी अपने जीवन में अपनाना चाहिए, हमें उनके जीवन में अपनाए गए रास्ते पर चलना चाहिए, भेदभाव न करना, आसुरी शक्तियों का दमन करना, दिए गए वचन को निभाना, सामाजिक मूल्यों और पारिवारिक नियमों को प्राथमिकता देना और यहां तक कि शासकों द्वारा प्रजा के नियमों का पालन करना जैसे कई गुण हैं जिनका हमारे वर्तमान देशवासी पालन करते हैं। यह मंदिर एक विश्व संस्कृति बनेगा। हां, यह कहना कोई अतिशयोक्ति नहीं है कि एक प्रभावी मंदिर 100 पुलिस स्टेशनों की स्थापना को कम कर सकता है।
अगर हम आज भी किसी आदर्श व्यवस्था की बात करें तो वह श्री राम राज्यम है। महात्मा गांधी ने भी कई भाषणों में कहा था कि देश में राम राज्यम आना चाहिए। चाहे वह आम आदमी हो, पढ़ा-लिखा व्यक्ति हो, अमीर व्यक्ति हो, कोई भी पार्टी हो, हमारा भारतीय संविधान हो, या कोई और हो, हर कोई श्री राम का राज्य चाहता है। व्यवस्थाएं बदलती रहती हैं, समय के साथ नई बनती हैं। लेकिन, एक ऐसा देश जहां सभी लोग बिना किसी समझौते के असली मूल्यों के साथ रह सकें और जहां समृद्ध प्रगतिशील विचारों वाली राज्य व्यवस्था हो, उसे राम राज्यम कहते हैं। इस तरह, राम राज्यम एक आदर्श व्यवस्था की अवधारणा है।
श्री राम जन्मभूमि आंदोलन में सभी जातियों, धर्मों, भाषाओं, क्षेत्रों, सामाजिक स्थितियों, गरीब, अमीर, पढ़े-लिखे और अनपढ़ लोगों ने इस आंदोलन में शामिल होकर एक बड़ी ताकत के रूप में खड़े हुए और पूरी दुनिया ने उस ताकत को देखा। उस समय अयोध्या में हुए संघर्ष का विश्लेषण करें तो तथाकथित बुद्धिजीवियों की यह बातें झूठी थीं कि हिंदू समाज खत्म हो गया है, और इस आंदोलन ने घोषणा की कि यह समाज मरा नहीं है। यह समाज शायद कुछ समय के लिए ही सुप्त अवस्था में आया था। इस आंदोलन ने दिखाया कि हिंदू समाज जब जागेगा तो कैसा दिखेगा।
वर्तमान में इस आंदोलन के माध्यम से हमारा देश प्राचीन गौरव को प्राप्त कर विश्व गुरु बनना चाहता है और भारत की यह जिम्मेदारी है कि वह न केवल अपने राष्ट्रीय कल्याण बल्कि विश्व का कल्याण भी करे, लेकिन वह केवल राज्य शक्ति से प्राप्त नहीं हो सकता, यह तभी संभव है जब यहां का आम आदमी भी हमारे राष्ट्र के लिए आस्था के साथ खड़ा हो और काम करे, तभी हमारा देश दुनिया को मार्गदर्शन दे सकता है।
आम लोगों को अनैतिक ताकतों से बचाना। दुनिया के हर इंसान को सम्मान के साथ जीने में मदद करना। संख्या बल या बाहुबल के आधार पर कोई भी मानव समूह को खतरा न बने, इसके लिए एक शक्तिशाली ताकत का साथ देना होगा। नियति ने तय किया है कि यह काम सिर्फ भारत को करना चाहिए। इस काम को करने के लिए इस देश के लोगों की भावना, उनकी भावनाओं और उनकी मान्यताओं को एक साथ लाना जरूरी है।
इस लिहाज से यह अयोध्या मंदिर प्रेरणा और शक्ति का स्रोत है। इसलिए, मुझे लगता है कि मंदिर जाने वाला हर व्यक्ति भगवान में आस्था, देश में आस्था और अपनी राष्ट्रीय पहचान को बनाए रखने के दृढ़ निश्चय के साथ वहां जाएगा और कम से कम जाने के बाद वह इस मुकाम पर पहुंचेगा। चाहे वह इस देश के गांवों में रहने वाला आम आदमी हो, झुग्गी-झोपड़ियों में रहने वाला आदिवासी हो, किसी सुदूर वन क्षेत्र में रहने वाला हो या पड़ोस के इलाके में रहने वाला पड़ोसी हो, इस देश के लिए काम करने वाला कोई पढ़ा-लिखा, बुद्धिमान, बहादुर व्यक्ति होना चाहिए।
हर किसी को इस देश में योगदान देना चाहिए। यह काम सरकार और सामाजिक संगठनों, स्वयंसेवी संगठनों को करना चाहिए, ऐसा करने से ही सामूहिक शक्ति जागृत होगी। श्री राम जन्मभूमि आंदोलन नामक प्रयास ने भारत के लोगों की एकता को बढ़ाया है और विकास को और तेज किया है..., इसकी शुरुआत शिक्षा से होनी चाहिए, इसकी शुरुआत अर्थव्यवस्था से होनी चाहिए, कृषि से होनी चाहिए, मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति करने वाली व्यवस्थाओं से होनी चाहिए, नागरिकों के बीच स्वस्थ प्रतिस्पर्धा के साथ, औद्योगिक क्षेत्र में प्रगति होनी चाहिए, जैसा कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सर कार्यवाह श्री भैयाजी जोशी ने कहा था, अपना काम करते हुए सभी को श्री राम के रामत्व की अवधारणा के साथ कर्तव्यनिष्ठा से करना चाहिए।
श्री राम की अवधारणा देश की अवधारणा है, जो बहुत गंभीर है। इस अर्थ में श्री राम मंदिर सभी सामाजिक क्षेत्रों को प्रभावित करता है, सभी को प्रेरणा देता है। यह केंद्र केवल भक्तों के लिए ही नहीं, बल्कि अन्य किसी भी व्यक्ति के लिए जिसके मन में कुछ कर गुजरने की मंशा, इच्छा और दृढ़ संकल्प की भावना है, यह एक ऐसा शक्ति केंद्र बनेगा जहां वे अपने दिलों में उद्देश्य की मजबूत भावना बना सकते हैं और अपनी क्षमता को बढ़ा सकते हैं।
इस सेंटर की नींव 1989 में श्री कामेश्वर चौपाल ने रखी थी, जो एक ऐसे समुदाय में पैदा हुए थे जिसे पीढ़ियों से नजरअंदाज किया गया था। इसकी नींव 5 अगस्त, 2020 को भारत के प्रधानमंत्री और पूज्य मोहन भागवत की मौजूदगी में रखी गयी थी। इसमें दुनिया भर के 150 देशों के प्रतिनिधि, 5500 स्वामी, पीठाधीप, मठाधीप, एक हजार दुनिया भर में मशहूर राम भक्त और आंदोलन को आर्गनाइज करने वाले संगठनों के प्रतिनिधि शामिल हुए।
पिछले साल, प्रतिष्ठा द्वादशी के दिन (22 जनवरी, 2023) प्रेरणा देने वाले भगवान श्री रामचंद्र ने बल राम का रूप लिया था। और पिछले 25 नवंबर को मंदिर के स्वर्ण शिखर पर, राज्य की शक्ति के प्रतीक के रूप में कोविधारा वृक्ष के साथ पवित्र भगवा ध्वज, भारत के प्रधानमंत्री और धार्मिक शक्ति के लिए विशेष रूप से समर्पित दो आदरणीय सर संघचालकों ने फहराया और हमने दुनिया को बताया कि न केवल गिरे हुए खंडहरों पर भव्य मंदिरों के पुनर्निर्माण का काम पूरा हो गया है, बल्कि हिंदू शक्ति को पुनर्जीवित करने का काम भी शुरू हो गया है।
हजारों वर्षों की गुलामी से बाहर निकलने और आस्था के साथ अपने रास्ते पर चलने में कुछ समय लगेगा, लेकिन श्री राम का बताया सटीक मार्ग आज भी हमारे सामने है, इतने आंदोलन करने के बाद हमारे मन में दृढ़ इच्छाशक्ति है, हमने जो सपने देखे हैं, वे हमारी आंखों के सामने साफ दिखाई दे रहे हैं। प्रगति के मार्ग पर चलने के लिए आवश्यक ऊर्जा ऐसे शक्ति केंद्रों से प्राप्त होती है। भविष्य का भारत अनेक अग्रदूतों, सामाजिक विचार और व्यवस्था निर्माण क्षमता वाले लोगों और सामाजिक-धार्मिक संगठनों के सामूहिक प्रयासों से ही उभरेगा। इस मंदिर के निर्माण से हम सभी के मन में यह विश्वास जगा है कि वैश्विक स्तर पर भारत को जो जिम्मेदारी निभानी है, उसे हम अवश्य निभा सकते हैं।
अयोध्या में श्री राम जन्मभूमि मंदिर के दर्शन करने वहां जाने वाला प्रत्येक व्यक्ति इसी भावना से प्रेरित होकर अपने जीवन की दिशा तय करता है। यह मेरा विश्वास है, इसीलिए मुझे लगता है कि भविष्य का भारत एक उज्ज्वल भारत होने वाला है, जो विश्व के लिए सही दिशा निर्धारित करेगा। इसी आधार पर विश्व में सद्भाव और शांति का वातावरण बनेगा। तब विश्व की वर्तमान यात्रा पहले से भी अधिक ऊंचा और व्यापक मार्ग बन जायेगी और इसे प्राप्त करने के लिए हम सभी अयोध्या श्री रामचंद्र के साक्षी बनने का संकल्प लें। (लेखक आकरापु केशवराजु, विश्व हिंदू परिषद के केंद्रीय संयुक्त सचिव हैं।)
एबीएन एडिटोरियल डेस्क। कांग्रेस की केंद्रीय कार्य समिति (CWC) की की बैठक चल रही थी इस बीच कांग्रेस के वरिष्ठ नेता दिग्विजय सिंह जिन्हें राहुल गांधी के गरीबी माना जाता है; सोशल मीडिया में एक तस्वीर जारी करते हुए अपनी अनुभूति साझा कर दी जिसने देश भर के लोगों का ध्यान आकृष्ट किया है।
उन्होंने पोस्ट में लिखा कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का एक स्वयंसेवक एवं भारतीय जनता पार्टी का जमीन से जुड़ा हुआ कार्यकर्ता जमीन में बैठकर मुख्यमंत्री तथा बाद में प्रधानमंत्री बन जाता है। फोटो के संबंध में उन्होंने लिखा कि फोटो संगठन के शक्ति का परिचायक है।
ध्यान देने योग्य बात यह भी है कि उन्होंने अपने पोस्ट को मल्लिकार्जुन खड़गे, सोनिया गांधी और राहुल गांधी को भी टैग किया। यह कोई पहली घटना नहीं है कि कांग्रेस के किसी बड़े नेता ने पार्टी के दुर्बलताओं की ओर स्पष्ट इंगित किया हो, परंतु कांग्रेस में कोई परिवर्तन होता हुआ दिखाई नहीं दे रहा है।
कांग्रेस पार्टी में उसी की चलती है जो गांधी परिवार का गुणगान करता है अथवा चाटुकारिता की कुशलता में पारंगत होता है। कहने और देखने में तो मल्लिकार्जुन खड़गे कांग्रेस के अध्यक्ष हैं परंतु वह कहते रहते हैं कि कोई भी निर्णय आला-कमान करेगा; जबकि लोगों को पता है कि कांग्रेस में आलाकमान का अर्थ क्या होता है।
यथार्थ है कि कांग्रेस पार्टी की शक्ति एवं नियंत्रण गांधी परिवार के पास है जिसका उपयोग अपनी पार्टी को सबल बनाने में न करते हुए प्रधानमंत्री भाजपा एवं संस्थाओं के ऊपर दोष मढ़ने में बर्बाद किया जाता रहा है। (लेखक स्वतंत्र स्तंभकार हैं।)
एबीएन एडिटोरियल डेस्क। राजनीति में अंततोगत्वा प्रत्येक स्तर पर नेतृत्व ही महत्वपूर्ण हो जाता है। पक्ष विपक्ष का शीर्ष नेतृत्व अपने राजनीतिक दल, सरकार एवं प्रतिपक्ष तथा संसदीय कार्यवाही का दिशा एवं दशा तय करता है।
नेतृत्व के विश्वसनीयता अथवा अविश्वसनियता पार्टी की प्रभाव एवं लोकप्रियता का आधार बन जाता है। लोकतंत्रीय राजनीतिक व्यवस्था में चुनाव की प्रक्रिया सबसे अधिक अर्थ रखता है। चुनाव में जीतने या हारने के परिणाम में नेतृत्व की भूमिका सर्वोपरि होती है।
वर्तमान राजनीतिक परिवेश में राष्ट्रीय चुनाव हो अथवा राज्यों का चुनाव भारतीय जनता पार्टी मोदी जी के नेतृत्व एवं नाम के गारंटी/आश्वासन के आधार पर चुनाव लड़ती है और परिणाम भी प्रभावित होता रहा है। कांग्रेस पार्टी में राहुल गांधी का नेतृत्व विपक्ष के अन्य नेताओं के साथ तालमेल बिठाने में असफल रहा है।
सरकार से वे संवाद करते नहीं हैं। संसद के बाहर और संसद के अंदर उनका बॉडी लैंग्वेज अत्यंत असहज, कठोर तथा अव्यवहारिक दिखाई देता है; इन सभी का प्रभाव चुनाव परिणाम में दिखाई देता रहा है।
इस तथ्य को अस्वीकार नहीं किया जा सकता है कि भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में नेतृत्व सदैव महत्वपूर्ण रहा है, और आज की तिथि में श्री नरेंद्र मोदी राजनीति के इसी चरित्र को दर्शाते हुए दिखाई दे रहे हैं।
एबीएन एडिटोरियल डेस्क। भारतीय चिंतन, मनन एवं दर्शन शास्त्र में एक स्थापित सूत्र है कि मनुष्य का आंतरिक जगत जितनी सुलझी एवं व्यवस्थित होती है उसी के अनुपात में आदमी का बाहरी दुनिया सुलझी एवं व्यवस्थित रहती है।
मनुष्य के द्वारा अविष्कारित विज्ञान के माध्यम से निर्मित उपकरण ने जीवन से संबंधित संसाधन, तेज गति और अधिक से अधिक जानकारी के लिए सरल विधि दिया है; लेकिन आज का जीवनशैली अस्त-व्यस्त एवं भागमभाग की होकर रह गयी है।
अति व्यस्तता तथा सक्रियता ऊर्जा का मापदंड हो सकता है, परंतु असंतुलित और उद्देश्यहीन चंचलता कोई इक्षित परिणाम उत्पन्न नहीं कर पता है।आर्थिक समृद्धि जहां एक और जीवन के लिए आवश्यक है, वहां दूसरी ओर वह सामाजिक मान सम्मान और प्रतिष्ठा का मान्यता प्राप्त मानक हो गया है और यही आकर्षण ने व्यक्ति को एकाकी करते हुए पारिवारिक संवाद, सामाजिक संवाद एवं संबंध से दूर कर दिया है।
व्यक्ति की समस्या और तनाव आजीवन बना रहता है। हद तो यह हो गयी है कि व्यस्तता की दृष्टि रात और दिन में अंतर नहीं रह गया है। बेचैनी एक विकराल समस्या होकर रह गयी है।
सभी जानते हैं कि शांत व्यवस्थित, स्थिर एवं संतुलित मन मस्तिष्क उत्तम सक्रियता एवं परिणाम प्रस्तुत कर सकता है, परंतु इन सद्गुणों के प्रति उदासीनता संकट एवं दु:ख का मुख्य कारण बना हुआ है।
एबीएन एडिटोरियल डेस्क। पंद्रह नवंबर का दिन झारखंड की आत्मा को झकझोरता है। यह वह पवित्र दिन है जब हमारे महान जनजातीय नायक भगवान बिरसा मुंडा का जन्म हुआ था। यही वह दिन है जब सन 2000 में झारखंड का जन्म हुआ। किंतु आज पच्चीस वर्ष बाद हमारा राज्य खुद अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष कर रहा है। यह संघर्ष केवल राजनीतिक नहीं है। यह संघर्ष आर्थिक शोषण के विरुद्ध है। यह संघर्ष उपभोक्ताओं की सुरक्षा के लिए है।
झारखंड का आज का दृश्य चिंताजनक है। नागरिक (ग्राहक) जो हर दिन बाजार जाते हैं, उन्हें पता नहीं कि वे क्या खरीद रहे हैं। एक दवाई जो जान बचानी चाहिए, वह जान ले रही है। खाद्य पदार्थों में मिलावट की महामारी ने हर घर को असुरक्षित बना दिया है। साइबर अपराधियों का तांडव सामान्य मनुष्य की जेब काट रहा है और इसी बीच भ्रष्टाचार जनता के विश्वास को निगलते जा रहा है। यह संकट उसी तरह का है जिसका सामना बिरसा मुंडा ने किया था, किंतु इस बार दुश्मन अंग्रेज नहीं है, बल्कि हमारे अपने संस्थान हैं।
झारखंड में नकली दवाओं का कारोबार पूरी तरह अनियंत्रित हो गया है। राज्य में मात्र बारह दवा निरीक्षक हैं, जबकि आवश्यकता बयालीस की है। इसका अर्थ यह है कि एक निरीक्षक के पास चार-चार जिले हैं। ऐसे में दवा की सप्लाई चेन में हर स्तर पर जांच नहीं हो पाती है। नतीजा यह है कि दवा निमार्ता से लेकर दुकानदार तक, नकली माल का व्यापार निर्बाध रूप से चलता है।
हाल ही में सुखदेव नगर थाने के क्षेत्र में स्थित एक सरकारी स्वास्थ्य केंद्र में नकली एंटीबायोटिक टैबलेट पकड़ी गई। जांच में पता चला कि दवा निमार्ता, सप्लायर और दोनों के पते सब फर्जी थे। टैबलेट में संबंधित दवा के सक्रिय तत्व तक नहीं थे। रोगी को गलत दवा दे कर उसके संक्रमण को बढ़ाना एक राष्ट्रीय शर्म का विषय है।
ब्रांडेड दवाओं के नाम पर नकली और सब-स्टैंडर्ड दवाओं का धंधा तेजी से बढ़ रहा है। दर्द निवारक, बुखार की दवाएं, शुगर, हाई ब्लड प्रेशर, थायरॉयड, गर्भनिरोधक गोलियां, विटामिन सप्लिमेंट्स- ये सभी वस्तुएं अवैध कारोबारियों के कब्जे में चली गई हैं। मरीज दवा का कोर्स पूरा करते हैं, किंतु राहत नहीं मिलती, क्योंकि उन्हें नकली दवा दे दी गई है। चिकित्सकों को बार-बार दवाएं बदलनी पड़ती हैं। यह न केवल स्वास्थ्य के साथ खिलवाड़ है, बल्कि गरीब परिवारों के सीमित संसाधनों पर सीधा हमला है।
सरकार ने क्यूआर कोड लागू करने की कोशिश की है, जिससे असली और नकली दवा की पहचान की जा सके। किंतु यह समाधान अधूरा है। समस्या यह है कि जांच सुविधाएं अपर्याप्त हैं। अन्य जिलों में मानक जांच भी संभव नहीं है। क्या हमारे नागरिकों के जान का मूल्य इतना कम है कि हम उन्हें पर्याप्त संसाधन भी नहीं दे सकते?
खाद्य सुरक्षा प्रणाली झारखंड में पूरी तरह ध्वस्त हो गई है। राज्य की इकलौती खाद्य परीक्षण प्रयोगशाला को राष्ट्रीय प्रत्यायन बोर्ड (एनएबीएल) ने मान्यता से वंचित कर दिया है, क्योंकि यह अपग्रेड नहीं की गई। नतीजा यह है कि अब राज्य में खाद्य पदार्थों में मिलावट की कानूनी जांच ही नहीं हो सकती। पहले यहां हर साल 1200 से अधिक सैंपलों की जांच होती थी, जिसमें से 40 प्रतिशत में मिलावट पायी जाती थी। अब तो यह जांच ही बंद हो गयी है।
इसका मतलब साफ है कि मिलावट करने वाले अब निर्बाध रूप से अपना काम करेंगे। अनाज में चूरा, मसालों में जहरीले रंग, दूध में मिलावट, सब्जियों में कीटनाशक - ये सब अब बिना किसी बाधा के बिकेंगे। गरीब परिवार जो सब्जी मंडी से सस्ते दाम पर सब्जियां खरीदते हैं, वे नहीं जानते कि वे अपने बच्चों को जहर खिला रहे हैं।
पिछले वर्ष मसालों में मिलावट के खिलाफ एफएसएसएआई द्वारा अक्टूबर माह में अभियान चलाया गया। जांच में पाया गया कि काली मिर्च में स्टार्च, मिर्च पाउडर में हानिकारक रंग, हल्दी पाउडर में मिट्टी - सब कुछ मिलावट के लिए उपयोग हो रहा है। ये रंग कैंसर का कारण बन सकते हैं। किंतु न तो सरकार के पास संसाधन हैं और न ही राजनीतिक इच्छा है कि इस महामारी को रोका जा सके।
झारखंड हाईकोर्ट ने भी मिलावटी खाद्य पदार्थों की बिक्री को लेकर गंभीर चिंता व्यक्त करते हुए राज्य सरकार को निर्देश दिए हैं कि खाद्य सुरक्षा अधिकारियों की नियुक्ति जल्द से जल्द की जाए।किंतु अब तक इस निर्देश का पालन नहीं हुआ है।
साइबर अपराध में झारखंड का नाम शर्म से जुड़ा हुआ है। जनवरी से जून 2025 तक महज छ: महीने में 11910 शिकायतें दर्ज हुईं। यानी हर दिन औसतन 66 शिकायतें। इसी अवधि में 767 साइबर अपराधी गिरफ्तार किए गए। फिर भी संकट थमता नहीं दिख रहा। जनवरी 2024 से जून 2025 तक डेढ़ साल में 390 करोड़ रुपये का साइबर फ्रॉड हुआ है। कल्पना कीजिए, देश का यह हिस्सा कितना असुरक्षित है जहां हर दिन इतनी बड़ी ठगी होती है। पेंशनभोगी, अकेली महिलाएं, छोटे व्यापारी-सभी अपने जीवन भर की बचत को खो देते हैं।
बैंकों को धोखा दिया जाता है, आधार के नाम पर बिना अनुमति के खाते खोले जाते हैं, व्यक्तिगत डेटा चोरी होता है। सबसे दर्दनाक बात यह है कि पीड़ितों को उनका पैसा वापस नहीं मिलता। हालांकि हाल ही में हाईकोर्ट के निर्देश के बाद पुलिस को पीड़ितों को पैसा लौटाने की व्यवस्था करने का आदेश दिया गया है, किंतु यह प्रक्रिया अभी शुरूआती चरण में है। जामताड़ा से लेकर देवघर तक, साइबर अपराधियों का जाल फैला हुआ है।
ये गिरोह विदेशी सर्वर का इस्तेमाल करते हैं। डिजिटल गिरफ्तारी करके पीड़ितों को ब्लैकमेल किया जाता है। यह केवल व्यक्तिगत हानि नहीं है। यह राष्ट्रीय सुरक्षा का मुद्दा है। हर वह नागरिक असुरक्षित है जो इंटरनेट का उपयोग करता है। बुजुर्ग, किशोर, महिलाएं, सभी निशाने पर हैं। आॅनलाइन शॉपिंग, बैंकिंग, सोशल मीडिया- हर क्षेत्र में खतरा है।
भ्रष्टाचार ने झारखंड की नसों में जहर घोल दिया है। अबुआ आवास जैसी सरकारी योजनाओं में भी गरीब लाभुकों से घूस मांगी जाती है। कुछ गरीब कर्ज़ लेकर पैसे देते हैं ताकि उन्हें आवास मिल सके। स्वास्थ्य विभाग में अधिकारियों की मिलीभगत से ही नकली दवाओं का सिलसिला चलता है।
पूर्व डीजीपी अनुराग गुप्ता के समय एनजीओ शाखा के प्रभारी इंस्पेक्टर गणेश सिंह के विरुद्ध भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो ने जांच दर्ज की है। आरोप है कि उन्होंने विभिन्न फाइलों के निष्पादन के बदले में अवैध वसूली की। जब सत्ता का संरक्षण होता है, तो भ्रष्टाचार पनपता है। यह इस बात का स्पष्ट संकेत है कि झारखंड में भ्रष्टाचार व्यवस्थागत समस्या बन गयी है, न कि अपवाद।
सबसे बड़ी विडंबना यह है कि उपभोक्ता मामलों का मंत्रालय और राज्य के आयोग खुद ही सोये हुए हैं। उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम 2019 को लागू हुए पांच वर्ष हो गये हैं, किंतु झारखंड में इसकी क्रियान्वयन व्यवस्था और स्ट्रक्चर अभी भी कमजोर है। केंद्रीय उपभोक्ता संरक्षण प्राधिकरण (सीसीपीए) के गठन के बाद भी झारखंड में इसकी कार्यप्रणाली स्पष्ट नहीं हुई है।
बिरसा मुंडा की जयंती और झारखंड स्थापना दिवस केवल राजनीतिक उत्सव नहीं हैं। ये अवसर हैं हमारे प्रतिबद्धता को नवीकृत करने का। झारखंड सरकार को तत्काल निम्नलिखित कदम उठाने चाहिए:
साथ ही, हर झारखंडवासी को भी अपने दायित्व के बारे में जागरूक होना चाहिए। अपने अधिकारों के बारे में जानें। संदिग्ध उत्पादों की शिकायत दर्ज करें। स्थानीय स्तर पर उपभोक्ता समूह बनाएं। सरकारी योजनाओं के कार्यान्वयन पर निगरानी रखें। इंटरनेट के उपयोग में सावधानी बरतें। शिक्षा को बढ़ावा दें।
बिरसा मुंडा को 150 साल पहले राजनीतिक स्वतंत्रता की लड़ाई लड़नी पड़ी थी। आज हमें आर्थिक स्वतंत्रता की लड़ाई लड़नी है। नकली दवा, खाद्य मिलावट, साइबर अपराध, भ्रष्टाचार - ये सब नए अंग्रेज हैं, जो आंतरिक रूप से हमें लूट रहे हैं। हर गली में, हर मोहल्ले में, हर गांव में उपभोक्ता जागरूकता समूह बनने चाहिए। यह नई क्रांति होगी - आंतरिक शत्रुओं के विरुद्ध, आर्थिक न्याय के लिए, सामाजिक कल्याण के लिए।
बिरसा कहते थे: अबुआ राज तोहरो काज। हमारा राज्य, हमारा काम। आज हर झारखंडवासी को यह आह्वान दोहराना चाहिए। अपने राज्य को बचाने के लिए, अपने परिवार को सुरक्षित करने के लिए, अपने भविष्य को सुरक्षित करने के लिए, हर नागरिक को सचेष्ट होना चाहिए। यह समय परिवर्तन का है। यह समय आंदोलन का है। यह समय क्रांति का है। जय बिरसा मुंडा! जय झारखंड! (लेखक अखिल भारतीय ग्राहक पंचायत के क्षेत्र संगठन मंत्री हैं।)
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