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Published / 2026-05-28 09:47:19
रुपया, ज्ञान, संपर्क एवं क्रिया...

रुपया, ज्ञान, संपर्क एवं क्रिया...

त्रिवेणी दास

एबीएन एडिटोरियल डेस्क। आजकल एक प्रचलन प्रसिद्धि पर है, जिसको अंग्रेजी में Motivational Speech और हिंदी में उत्प्रेरित करने वाला भाषण कहते हैं। श्रोता खर्च करके ऐसे आयोजनों में जाते हैं और वक्ता के भाषण को ध्यानपूर्वक कम सुनते हैं और ताली अधिक बजाते हैं।

विचार करने योग्य है कि जीवन में किस चीज का महत्व सबसे अधिक है। व्यावहारिक रूप से तो यही दिखाई दे रहा है कि बचपन से उस दिशा में उत्प्रेरित किया जाता है, जिससे पैसे की आमदनी हो सके। ज्ञान इसलिए अर्जित किया जाता है कि रुपया कमाया जा सके। रुपया इसलिए कि भौतिक सुख सुविधा तो देता ही देता है और जमाना पता नहीं क्यों धनवान को सम्मान भी देता है।

यथार्थ है कि धन अपने आप में बहुत बलशाली है, लेकिन उसके नियोजन के ऊपर निर्भर करता है कि जीवन सुखी रहेगा अथवा विभिन्न प्रकार के रोग-शोक का कारण बन जाएगा। जीवन में संपर्क एवं सानिध्य धनबल से अधिक शक्तिशाली तथा सामर्थ्यवान होता है। संगति क्रिया को प्रभावित करती है, और क्रिया (Action) ही अंततोगत्वा प्रतिक्रिया के स्वरूप में परिणाम उत्पन्न करती है।

रुपया, ज्ञान और संपर्क की की ताकत का परिणाम बुद्धि आधारित हो सकता है, परंतु सबसे महत्वपूर्ण क्रिया का किया जाना जब तक विवेक के ऊपर आधारित नहीं होगा तो सब कुछ रहते हुए भी जिसको वास्तविक सुख एवं संतोष की संज्ञा दी जाती है, उसे प्राप्त नहीं किया जा सकता है।

जब संसार से विदाई लेना ही लेना है तब अंतिम क्षण में मृत्यु का स्वागत तभी किया जा सकेगा जब संतोष से दिल भरा हुआ हो.. और संतोष तब प्राप्त किया जा सकता है जब धन, ज्ञान तथा क्रिया का क्रियान्वयन विवेक-युक्त दिशा की ओर किया जाता रहे।

Published / 2026-05-24 11:21:35
आदिवासी/जनजाति सांस्कृतिक समागम...

आदिवासी/जनजाति सांस्कृतिक समागम...

त्रिवेणी दास

एबीएन एडिटोरियल डेस्क। आज 24 मई  2026 को दिल्ली के लाल किला मैदान में आदिवासी  सांस्कृतिक समागम का आयोजन किया गया है जिसमें देश भर से आदिवासी समाज के नारी एवं नर भारी संख्या में दिल्ली पहुंच चुके हैं जिसके लिए कई राज्यों से विशेष रेल की परिचालन की गई है।

झारखंड के भगवान बिरसा मुंडा की 150 वीं जयंती के शुभ अवसर पर यह समागम आयोजित की गई है। इस समागम में भारत सरकार के गृह मंत्री श्री अमित शाह मुख्य अतिथि के रूप में संबोधित करने वाले हैं। झारखंड से भी लगभग 5,000 से अधिक जनजातीय समुदाय के लोग दिल्ली पहुंच चुके हैं।

आदिवासी समाज के प्रवक्ताओं ने कहा है कि समाज के जो लोग माथांतरण करते हुए ईसाई बन चुके हैं उन्हें आरक्षण के लाभ से वंचित किया जाना चाहिए। आज के समागम में इस विषयक प्रस्ताव पारित किए जाने वाले हैं जिन्हें देश के सर्वोच्च राजनीतिक पदाधिकारी को ज्ञापित किया जाएगा। 

जनजातीय सभ्यता, संस्कृति, भाषा और प्रकृति के संरक्षण तथा उन्हें अक्षुण बनाए रखने के लिए संकल्प लिए जाएंगे। आदिवासी समागम का यह कार्यक्रम समय के ऐसे कालखंड में किया जा रहा है जब आदिवासी समाज अपने अधिकारों के प्रति सजग, जागरूक एवं प्रगतिशील हो चुका है।

दुर्भाग्य से आदिवासी समाज के मध्य से ही कुछ आदिवासी नेता इस प्रकार के आयोजन का विरोध कर रहे हैं जिसके पीछे उनका अपना स्वार्थ है, लेकिन वह समय अब आ गया है कि आदिवासियों को उनका संपूर्ण सम्मान एवं स्वाभिमान वापस दिया जाए। (लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं और ये उनके निजी विचार हैं।) 

Published / 2026-05-18 13:39:05
बॉडी शेमिंग: खामोश ज़हर जो आत्मविश्वास निगल जाता है

  • बॉडी शेमिंग: खामोश ज़हर जो आत्मविश्वास निगल जाता है

ऐश्वर्या सिंघानिया

एबीएन एडिटोरियल डेस्क। अगर हर इंसान आत्मविश्वासी होता तो दुनिया कितनी आसान होती। पर अफसोस, बॉडी शेमिंग आज लाखों लोगों के लिए एक दर्दनाक हकीकत है। यह न सिर्फ आत्मविश्वास तोड़ती है, बल्कि इंसान को बिना वजह खुद पर शर्मिंदा कर देती है। जबकि सच यह है कि हर तरह की बॉडी शेप को गर्व से अपनाया जा सकता है। 

आमतौर पर माना जाता है कि बॉडी शेमिंग का शिकार सिर्फ ओवरवेट लोग होते हैं। लेकिन हकीकत में, जो भी व्यक्ति मॉडल जैसी कद-काठी का नहीं है, उसे निशाना बनाया जाता है। रंग, कद, दुबलापन, चेहरा, यहाँ तक कि सफल अभिनेता और मॉडल भी तानों से नहीं बच पाते क्योंकि उनका पेशा ही शरीर से जुड़ा है। 

बॉडी शेमिंग दो तरह की होती है। पहली, सीधी और कठोर व्यक्तिगत टिप्पणी। दूसरी, समाज और मीडिया द्वारा फैलाया गया वह ज़हर जहाँ परफेक्ट बॉडी को ही सुंदर माना जाता है। इसका नतीजा होता है डिप्रेशन, ईटिंग डिसऑर्डर, आत्म-सम्मान में कमी और कई बार तो किशोरों द्वारा आत्महत्या तक। अध्ययनों के अनुसार, बॉडी शेमिंग गहरा मनोवैज्ञानिक आघात पहुंचाती है। कई लोग न खाने और फिर ओवर-ईटिंग के चक्र में फंस जाते हैं। वे खुद को आईने में आलोचनात्मक नज़र से देखते हैं। 

हर व्यक्ति एक खास शरीर के साथ पैदा होता है और उसे बदलने की ज़रूरत नहीं है। बॉडी शेमिंग तब शुरू होती है जब हम खुद को स्वीकार नहीं करते। याद रखें, ईश्वर की हर रचना सुंदर है। कभी-कभी माता-पिता भी अनजाने में बच्चों को नियंत्रित करने के लिए शरीर पर टिप्पणी कर देते हैं। ज़रूरत है खुद पर गर्व करने की। जब हम अपनी बॉडी की इज़्ज़त करेंगे, तो बुलीज़ के ताने बेअसर हो जाएंगे। अपनी पहचान पर गर्व कीजिए, क्योंकि आप जैसे हैं, वैसे ही खूबसूरत हैं।

Published / 2026-05-09 21:51:02
स्वदेशी शक्ति से वैश्विक होता भारत का रक्षा क्षेत्र : अहम है डीआरडीओ का योगदान

डॉ. मयंक चतुर्वेदी 

एबीएन एडिटोरियल डेस्क। भारत का रक्षा क्षेत्र आज वहां आ पहुंचा है, जहां तकनीक, अनुसंधान और स्वदेशी क्षमताएं राष्ट्रीय शक्ति का नया आधार बनती जा रही हैं। हाल के वर्षों में सरकार ने रक्षा अनुसंधान को नीति के केंद्र में स्थापित किया है, जिससे देश की सुरक्षा व्यवस्था अधिक सशक्त, आधुनिक और आत्मनिर्भर बन रही है। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह द्वारा व्यक्त विचार इस दिशा में स्पष्ट संकेत देते हैं कि आने वाला समय तकनीकी श्रेष्ठता का होगा और भारत इस दौड़ में पीछे रहने वाला देश नहीं है। 

वस्तुत: आज केंद्र सरकार द्वारा रक्षा अनुसंधान एवं विकास को सर्वोच्च प्राथमिकता देना एक दूरदर्शी कदम माना जा सकता है। रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (डीआरडीओ) द्वारा अब तक 2,200 से अधिक तकनीकों का उद्योगों को हस्तांतरण इस बात का प्रमाण है कि देश में शोध और उत्पादन के बीच मजबूत पुल तैयार हो चुका है। इस प्रक्रिया ने रक्षा उत्पादन को गति दी है और निजी क्षेत्र को भी नए अवसर प्रदान किए हैं। अनुसंधान पर निरंतर ध्यान बनाए रखना भविष्य के युद्धों में बढ़त दिलाने वाला कारक बन सकता है। 

रक्षा अनुसंधान एवं विकास बजट का 25 प्रतिशत हिस्सा उद्योगों, अकादमिक संस्थानों और स्टार्टअप्स के लिए निर्धारित किया जाना एक क्रांतिकारी पहल है। इन संस्थाओं द्वारा 4,500 करोड़ रुपये से अधिक का उपयोग यह दर्शाता है कि देश में नवाचार की ऊर्जा तेजी से बढ़ रही है। इससे एक ओर जहां नयी तकनीकों का विकास संभव हुआ है, वहीं युवाओं को भी रक्षा क्षेत्र में योगदान देने का अवसर मिला है। 

नयी टेक्नोलॉजी ट्रांसफर नीति के तहत शुल्क समाप्त करना उद्योगों के लिए एक बड़ा प्रोत्साहन साबित हुआ है। इससे विकास और उत्पादन में साझेदारी को बढ़ावा मिला है। साथ ही पेटेंट्स को मुफ्त उपलब्ध कराने की नीति ने तकनीकी विकास को नयी गति दी है। परीक्षण सुविधाओं को उद्योगों के लिए खोलना भी सहयोगात्मक विकास की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। 

यही कारण है कि भारत अब डायरेक्टेड एनर्जी वेपन्स, हाइपरसोनिक हथियार, क्वांटम तकनीक, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और मशीन लर्निंग जैसे अत्याधुनिक क्षेत्रों में तेजी से आगे बढ़ रहा है। ये तकनीकें भविष्य के युद्धों की दिशा तय करेंगी। इन क्षेत्रों में निवेश और अनुसंधान भारत को वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी बना रहे हैं। हमने पिछले साल देखा भी है कि आॅपरेशन सिंदूर जैसे अभियानों में स्वदेशी तकनीकों का सफल उपयोग देश की बढ़ती सैन्य क्षमता को दशार्ता है। आकाशतीर, आकाश मिसाइल सिस्टम और ब्रह्मोस जैसी उन्नत प्रणालियां इस बात का प्रमाण हैं कि भारत अब आत्मनिर्भर रक्षा शक्ति बनने की दिशा में मजबूती से आगे बढ़ रहा है। यह उपलब्धि हर भारतीय के लिए गर्व का विषय है। 

इसके साथ ही कहना होगा कि भारत के लिए वित्त वर्ष 2025-26 में रक्षा उत्पादन का 1.54 लाख करोड़ रुपए तक पहुंचना एक ऐतिहासिक उपलब्धि है। रक्षा निर्यात का 38,424 करोड़ रुपए तक पहुंचना इस बात का संकेत है कि भारत अब वैश्विक बाजार में अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज करा रहा है। पिछले एक दशक में 174 प्रतिशत की वृद्धि और निर्यात में कई गुना विस्तार देश की बदलती पहचान को दशार्ता है। जिसमें कि रक्षा निर्यात में निजी क्षेत्र का लगभग 15,000 करोड़ रुपये का योगदान इस क्षेत्र में आये बड़े बदलाव को दर्शा रहा है। अब रक्षा निर्माण सरकारी संस्थानों की पहुंच से आगे उद्योगों और स्टार्टअप्स की सक्रियता में एक व्यापक इकोसिस्टम बन चुका है। 

स्वभाविक तौर पर इससे नवाचार और प्रतिस्पर्धा दोनों को बढ़ावा मिला है। आज इनोवेशंस फॉर डिफेंस एक्सीलेंस, एडीआईटीआई और टेक्नोलॉजी डेवलपमेंट फंड जैसी योजनाएं रक्षा क्षेत्र में नयी ऊर्जा का संचार कर रही हैं। इन पहलों ने युवाओं और उद्यमियों को रक्षा तकनीकों के विकास में भाग लेने का अवसर दिया है। इससे देश में नवाचार की संस्कृति मजबूत हो रही है। 

ऐसे में यह भी ध्यान में आता है कि भारत का लक्ष्य अब तकनीकी संप्रभुता हासिल करना है, जिसमें महत्वपूर्ण तकनीकों का विकास, स्वामित्व और संरक्षण देश के भीतर ही हो। क्वांटम-सिक्योर कम्युनिकेशन जैसी उपलब्धियां इस दिशा में बड़ी प्रगति को दशार्ती हैं। यह क्षमता भविष्य के युद्धों में निर्णायक साबित हो सकती है। बजट 2026-27 में रक्षा क्षेत्र के लिए 6.81 लाख करोड़ रुपए का आवंटन सरकार की प्रतिबद्धता को दर्शाता है। यह पिछले वर्ष की तुलना में उल्लेखनीय वृद्धि है, जोकि रक्षा तैयारियों को और मजबूत बनायेगी। 

अत: हम सभी के लिए आज गौरव की बात है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारत की रक्षा यात्रा एक ऐसे मुकाम पर पहुंच चुकी है, जहां आत्मनिर्भरता, तकनीकी श्रेष्ठता और वैश्विक पहचान एक साथ आकार ले रही हैं। यह परिवर्तन हर भारतीय के लिए गर्व का विषय है। यह तो हम सभी जानते हैं कि देश का रक्षा क्षेत्र सुरक्षा का प्रतीक है, किंतु कहना होगा कि इस दिशा में हो रहे नवाचार आज शक्ति और आत्मविश्वास का भी प्रतिनिधित्व करते हुए दिखाई देते हैं, जोकि हर भारतीय को आशा और उत्साह से भर रहे हैं। (लेखक वरिष्ठ स्तंभकार हैं और ये उनके निजी विचार हैं।)

Published / 2026-05-09 21:38:49
बंगाल से आयी यह तस्वीर...

बंगाल से आयी यह तस्वीर  

कह गयी अनमोल कहानी  

भारतीय संस्कृति की यह  

सर्वोत्तम है बन गयी निशानी 

त्रिवेणी दास 

एबीएन एडिटोरियल डेस्क। मातृभूमि के सेवा के लिए जिस संगठन की नींव त्याग, तपस्या और राष्ट्र-साधना रूपी ईंट के उपर रखी गयी हो, उस संगठन का कार्यकर्ता अपना पूरा जीवन एक विचारधारा तथा राष्ट्रभक्ति की भावना को समर्पित कर देता है। 

आज कोलकाता के ऐतिहासिक ब्रिगेड मैदान में भारतीय जनता पार्टी की सरकार के गठन के शपथ ग्रहण समारोह में ऐसा ही एक भावभीनी गौरवपूर्ण परिदृश्य विशाल जनसमूह के सामने आया जिसने देशवासियों में गहरा एवं अमिट छाप छोड़ गया। 

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 98 वर्षीय वरिष्ठ कार्यकर्ता माखनलाल सरकार  का चरण स्पर्श एवं शाल ओढ़ा कर उनका आशीर्वाद लिया। यह उस साधना, तपस्या, संघर्ष और समर्पण का चरण स्पर्श था जिसने दशकों पहले जनसंघ और राष्ट्रवादी विचारधारा की मजबूत नींव रखी थी। 

माखनलाल सरकार वही राष्ट्र-साधक हैं, जिन्होंने डॉ श्यामा प्रसाद मुखर्जी के साथ कंधे से कंधा मिलाकर संघर्ष किया, जेल और उनके साथ कश्मीर की यात्रा की उनके मृत शरीर को लेकर वापस लौटे और राष्ट्र सेवा में अपना सर्वस्व समर्पित कर दिया। 

राजनीति में किसी भी व्यक्ति का पद एवं सत्ता की शक्ति की आयु एक अवधि के बाद समाप्त हो जाती है, परंतु उसके द्वारा स्थापित आदर्श, संस्कृति, चरित्र और विचारधारा चिरस्थाई हो जाते हैं। (लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं और ये उनके निजी विचार हैं।) 

Published / 2026-05-07 17:54:40
जय सोमनाथ...

एबीएन एडिटोरियल डेस्क। वर्ष 2026 की शुरुआत में मुझे सोमनाथ स्वाभिमान पर्व में सम्मिलित होने का सौभाग्य मिला। यह सोमनाथ मंदिर पर हुए पहले आक्रमण के एक हजार वर्ष बाद भी मंदिर के शाश्वत और अविनाशी होने का पर्व था। अब 11 मई को मुझे एक बार फिर सोमनाथ जाने का सुअवसर प्राप्त हो रहा है।

इस बार यह यात्रा पुनर्निर्मित सोमनाथ मंदिर के लोकार्पण की 75वीं वर्षगांठ के उपलक्ष्य में है। मैं उस क्षण को फिर जीने जा रहा हूं जब भारत के प्रथम राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद जी ने मंदिर का लोकार्पण किया था। उस दिन, सोमनाथ में विध्वंस से सृजन तक की यात्रा फिर से जीवंत होगी। छह महीनों के भीतर सोमनाथ के इतिहास से जुड़े इन दो अत्यंत महत्वपूर्ण पड़ावों का साक्षी बनना मेरे लिए बहुत सौभाग्य की बात है।  

सोमनाथ केवल एक मंदिर नहीं, हमारी सभ्यता का अटूट संकल्प है। इसके सामने लहराता विशाल समुद्र अनंत काल की अनूभूति कराता है। इसकी लहरें हमें सिखाती हैं कि तूफान चाहे कितने भी विकराल क्यों न हों, मनुष्य का साहस और आत्मबल हर बार फिर से उठ खड़ा होने में सक्षम है। तट से टकराती लहरें सदियों से यह उद्घोष कर रही हैं कि मानवीय चेतना को लंबे समय तक दबाया नहीं जा सकता है।  

हमारे प्राचीन शास्त्रों में लिखा है: प्रभासं च परिक्रम्य पृथिवीक्रमसंभवम्। अर्थात दिव्य प्रभास (सोमनाथ) की परिक्रमा पूरी पृथ्वी की परिक्रमा के समान है! जब लोग यहां दर्शन-पूजन के लिए आते हैं, तब उन्हें उस सभ्यता की अद्भुत निरंतरता का भी अनुभव होता है, जिसकी ज्योति कभी बुझायी नहीं जा सकी। कई साम्राज्य आये और गये, समय बदला और इतिहास ने ढेरों उतार-चढ़ाव देखे, फिर भी सोमनाथ हमारे हृदय में हमेशा बना रहा। 

यह समय उन असंख्य महान विभूतियों के स्मरण का भी है, जो क्रूर आक्रांताओं के सम्मुख अडिग रहे। लकुलीश और सोम शर्मा जैसे मनीषियों ने प्रभास को शैव दर्शन का महान केंद्र बनाया। चक्रवर्ती महाराज धारसेन चतुर्थ ने सदियों पहले वहां दूसरा मंदिर बनवाया था। समय की कठिन परीक्षा के बीच भीम प्रथम, जयपाल और आनंदपाल जैसे शासकों ने आक्रमणों के विरुद्ध अपनी सभ्यता की ढाल बनकर मंदिर की रक्षा की थी। 

ऐसा माना जाता है कि महान राजा भोज ने भी इस पावन स्थल के पुनर्निर्माण में अपना अमूल्य योगदान दिया था। कर्णदेव सोलंकी और जयसिंह सिद्धराज ने गुजरात की राजनीतिक और सांस्कृतिक शक्ति को पुनर्स्थापित करने में अहम भूमिका निभायी। भाव बृहस्पति, कुमारपाल सोलंकी और पाशुपताचार्यों ने इस तीर्थ को आराधना और ज्ञान के केंद्र के रूप में स्थापित करने में अमूल्य योगदान दिया। 

विशालदेव वाघेला और त्रिपुरांतक ने इसकी बौद्धिक और आध्यात्मिक परंपराओं की रक्षा की। महिपाल चूड़ासमा और राव खंगार चूड़ासमा ने विध्वंस के बाद पूजा-पाठ की परंपरा को पुनर्जीवित किया। पुण्यश्लोक अहिल्याबाई होल्कर, जिनकी 300वीं जयंती मनायी जा रही है, उन्होंने सबसे चुनौतीपूर्ण समय में भी भक्ति की परंपरा को जीवंत रखा। बड़ौदा के गायकवाड़ों ने तीर्थयात्रियों के अधिकारों की रक्षा की। इसके साथ ही हमारी यह धरती वीर हमीरजी गोहिल, वीर वेगड़ाजी भील जैसे पराक्रमियों से धन्य हुई है। उनके साहस और बलिदान को आज भी याद किया जाता है।  

1940 के दशक में स्वतंत्रता की भावना पूरे भारत में फैल रही थी। सरदार पटेल जैसे महान नेताओं के नेतृत्व में स्वतंत्र भारत की नींव रखी जा रही थी। ऐसे में एक बात जो उन्हें बहुत व्यथित करती थी, वह थी- सोमनाथ की दुर्दशा। 13 नवंबर 1947 को, दिवाली के समय, उन्होंने सोमनाथ के जर्जर अवशेषों के सामने खड़े होकर, समुद्र का जल हाथ में लेकर संकल्प लिया, इस (गुजराती) नववर्ष पर हमारा निश्चय है कि सोमनाथ का पुनर्निर्माण होगा। सौराष्ट्र के लोगों को इसके लिए हर तरह से अपना योगदान देना होगा। यह एक पावन कार्य है, जिसमें हर किसी को भागीदारी निभानी होगी। उनके इस आह्वान ने सिर्फ गुजरात ही नहीं, बल्कि संपूर्ण भारतवर्ष को नये उत्साह से भर दिया।  

दुर्भाग्यवश, सरदार पटेल अपने उस सपने को साकार होते नहीं देख सके, जिसके लिए उन्होंने स्वयं को समर्पित कर दिया था। इससे पहले कि जीर्णोद्धार के बाद सोमनाथ मंदिर भक्तों के लिए खुलता, उन्होंने इस दुनिया को अलविदा कह दिया। इसके बावजूद, प्रभास पाटन की पावन धरती पर उनका प्रभाव निरंतर महसूस किया जाता रहा है। उनके विजन को केएम मुंशी ने आगे बढ़ाया, जिन्हें नवानगर के जामसाहेब का समर्थन मिला। 1951 में मंदिर का पुनर्निर्माण पूरा होने पर राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद को उद्घाटन के लिए आमंत्रित किया गया। तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित नेहरू के विरोध के बावजूद, डॉ. प्रसाद ने समारोह में हिस्सा लेकर इसे ऐतिहासिक बना दिया। 

मुझे अक्टूबर 2001 का वह समय आज भी अच्छे से याद है, जब मैंने मुख्यमंत्री के रूप में दायित्व संभाला था। 31 अक्टूबर 2001 को सरदार पटेल की जयंती के अवसर पर गुजरात सरकार ने सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण की 50वीं वर्षगांठ का भव्य आयोजन किया। इसी समय सरदार पटेल की 125वीं जयंती भी मनायी जा रही थी। इस कार्यक्रम में तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी और तत्कालीन गृहमंत्री लालकृष्ण आडवाणी की मौजूदगी ने इसे और भी गरिमापूर्ण बना दिया।  

11 मई 1951 को अपने भाषण में डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने कहा था कि सोमनाथ मंदिर दुनिया को यह संदेश देता है कि अद्वितीय श्रद्धा और विश्वास को कभी नष्ट नहीं किया जा सकता। उन्होंने आशा व्यक्त की, कि यह मंदिर सदैव लोगों के हृदय में बसा रहेगा। उन्होंने यह भी कहा कि मंदिर के पुनर्निर्माण से सरदार पटेल का सपना साकार हुआ है। उन्होंने इस बात पर भी बल दिया कि सरदार पटेल की भावनाओं के अनुरूप लोगों के जीवन में समृद्धि भी लानी होगी। इसको लेकर उनके संदेश अत्यंत प्रेरणादायी रहे हैं।    

पिछले एक दशक से हम इसी मार्ग पर चल रहे हैं। विकास भी, विरासत भी के मंत्र  से प्रेरित होकर सोमनाथ से काशी, कामाख्या से केदारनाथ, अयोध्या से उज्जैन और त्रयंबकेश्वर से श्रीशैलम तक, हमने अपने आध्यात्मिक केंद्रों को आधुनिक सुविधाओं से सुसज्जित किया है। इसके साथ ही उनकी पारंपरिक पहचान को भी बनाए रखा है। आज बेहतर कनेक्टिविटी से ज्यादा से ज्यादा लोग यहां आ पा रहे हैं। इससे स्थानीय अर्थव्यवस्था को बल मिल रहा है, आजीविका सुरक्षित हो रही है, साथ ही एक भारत, श्रेष्ठ भारत की भावना और सशक्त हो रही है। 

सोमनाथ की रक्षा और इसके पुनर्निर्माण के लिए जिन्होंने अपना सर्वस्व बलिदान किया, उनका संघर्ष हम कभी नहीं भुला सकते। भारत के विभिन्न हिस्सों से आए लोगों ने इसकी भव्यता और दिव्यता को लौटाने में अपना अद्भुत योगदान दिया। उनकी ऐसी ही आस्था पूरे भारतवर्ष को लेकर भी थी। वे एकता की ऐसी अद्भुत डोर से बंधे थे, जिसे जमीनी सीमाओं में नहीं बांटा जा सकता। 

आज की विभाजित दुनिया में, सोमनाथ से मिलने वाली एकता की यह सीख पहले से कहीं अधिक प्रासंगिक है। सोमनाथ अपनी गौरवशाली परंपरा के साथ हमेशा खड़ा रहेगा, क्योंकि यह हमारी साझा सभ्यता का प्रतीक है। इसी गौरव को नमन करते हुए बलिदान देने वाले वीरों की स्मृति में और दानवीरों की उदारता को याद करते हुए अगले एक हजार दिनों तक यहां विशेष पूजा आयोजित की जाएगी। यह देखकर बहुत प्रसन्नता हो रही है कि बड़ी संख्या में लोग इस पुनीत कार्य में अपना योगदान दे रहे हैं।  

सोमनाथ हमें याद दिलाता है कि जब कोई समाज अपनी आस्था, अपनी संस्कृति और अपनी एकता से जुड़ा रहता है, तब उसे लंबे समय तक दबाया नहीं जा सकता। आज भी हमारी सबसे बड़ी शक्ति यही साझा चेतना है, यही एकात्म भाव है। यही भावना हमें विभाजन से ऊपर उठकर राष्ट्रहित में साथ चलने की प्रेरणा देती है। 

मैं सभी देशवासियों से आग्रह करता हूं कि इस पावन अवसर पर पवित्र सोमनाथ धाम की यात्रा करें और इसकी भव्यता के साक्षात दर्शन करें। जब आप सोमनाथ के तट पर खड़े होंगे, तब उसकी प्राचीन प्रतिध्वनियों को अपने भीतर महसूस करेंगे। वहां आपको केवल भक्ति का अनुभव नहीं होगा, बल्कि उस सभ्यतागत चेतना की सशक्त धड़कन भी सुनाई देगी, जो कभी रुकी नहीं, जिसकी तीव्रता कभी कम नहीं हुई। 

वहां आप भारत की उस अपराजित आत्मा का अनुभव करेंगे, जिसने हर आघात के बावजूद अपनी पहचान और अपनी संस्कृति को अक्षुण्ण बनाये रखा। आप समझ पायेंगे कि इतने प्रयासों के बाद भी क्यों हमारी सभ्यता मिट नहीं सकी। वहां आपको चिर विजय के उस दर्शन का अनुभव होगा, जो सदियों से भारत की शक्ति बना हुआ है। मुझे पूरा विश्वास है कि आपके लिए यह एक अविस्मरणीय अनुभव होगा।

Published / 2026-05-07 17:52:19
पलामू की धरती पर आत्मनिर्भरता का नया अध्याय — दीपिका पांडेय सिंह की विकास दृष्टि

हृदयानंद मिश्र  

एबीएन एडिटोरियल डेस्क। झारखंड के पलामू प्रमंडल (विशेषकर चैनपुर और मेदिनीनगर) आज एक ऐसी पहल का साक्षी बनकर इतिहास के पन्नों में अपना नाम दर्ज किया है, जो केवल एक सरकारी कार्यक्रम नहीं, बल्कि सामाजिक-आर्थिक परिवर्तन की सशक्त प्रस्तावना है। झारखंड ग्रामीण विकास विभाग के अंतर्गत जेएसएलपीएस द्वारा स्वयं सहायता समूह की महिलाओं के माध्यम से अंत:वस्त्र उत्पादन इकाई का शुभारंभ, ग्रामीण अर्थव्यवस्था के पुनर्निर्माण की दिशा में एक क्रांतिकारी कदम है। 

यह पहल कई स्तरों पर महत्वपूर्ण है। प्रथम, यह ग्रामीण महिलाओं को पारंपरिक सीमाओं से बाहर निकालकर उन्हें उत्पादन और उद्यमिता की मुख्यधारा से जोड़ती है। द्वितीय, यह स्थानीय संसाधनों और श्रमशक्ति के उपयोग के माध्यम से लोकल टू ग्लोबल की अवधारणा को साकार करने की दिशा में ठोस प्रयास है। 

तृतीय, यह सामाजिक संरचना में महिलाओं की भूमिका को निर्भर से निर्माता में परिवर्तित करने का सशक्त माध्यम बन रही है। स्वयं सहायता समूहों की अवधारणा भारत में लंबे समय से ग्रामीण विकास का आधार रही है, लेकिन झारखंड में इसे जिस प्रकार नवाचार और व्यावसायिक दृष्टिकोण के साथ जोड़ा जा रहा है, वह उल्लेखनीय है। 

अंत:वस्त्र उत्पादन जैसे क्षेत्र में महिलाओं की भागीदारी न केवल रोजगार सृजन करेगी, बल्कि बाजार में उनकी सीधी हिस्सेदारी भी सुनिश्चित करेगी। इससे ग्रामीण अर्थव्यवस्था में नकदी प्रवाह बढ़ेगा और आत्मनिर्भरता का वास्तविक अर्थ साकार होगा। 

इस कार्यक्रम की विशेषता यह भी रही कि इसमें राज्य के वित्त मंत्री राधा कृष्ण किशोर एवं मनिका विधायक रामचंद्र सिंह की गरिमामयी उपस्थिति ने इसे राजनीतिक और प्रशासनिक समर्थन का स्पष्ट संकेत दिया। यह दशार्ता है कि राज्य सरकार ग्रामीण विकास को केवल घोषणाओं तक सीमित नहीं रखना चाहती, बल्कि उसे धरातल पर उतारने के लिए प्रतिबद्ध है। 

इससे पूर्व मेदिनीनगर टाउन हॉल में आयोजित मुखिया सम्मेलन भी इस यात्रा का एक महत्वपूर्ण पड़ाव था। ग्रामीण विकास मंत्री दीपिका पांडेय सिंह ने जिस स्पष्टता और विस्तार से पंचायती राज व्यवस्था, मुखियाओं के अधिकार और कर्तव्यों पर प्रकाश डाला, वह प्रशासनिक पारदर्शिता और जवाबदेही की दिशा में एक सकारात्मक पहल है। 

उत्कृष्ट कार्य करने वाले मुखियाओं को सम्मानित करना न केवल प्रोत्साहन का माध्यम है, बल्कि यह एक स्वस्थ प्रतिस्पर्धा और जवाबदेही की संस्कृति को भी जन्म देता है। दीपिका पांडेय सिंह की कार्यशैली में एक स्पष्ट दृष्टि और संवेदनशीलता का समावेश दिखाई देता है। 

वे केवल योजनाओं की घोषणा तक सीमित नहीं रहतीं, बल्कि उनके प्रभावी क्रियान्वयन पर भी समान रूप से ध्यान देती हैं। उनकी यह सक्रियता यह संकेत देती है कि झारखंड में ग्रामीण विकास अब केवल एक विभागीय कार्य नहीं, बल्कि एक व्यापक सामाजिक आंदोलन का रूप ले रहा है। 

हालांकि, इस प्रकार की पहलों की सफलता केवल शुभारंभ तक सीमित नहीं होनी चाहिए। इसके लिए आवश्यक है कि उत्पादन इकाइयों को निरंतर प्रशिक्षण, बाजार तक पहुंच, वित्तीय सहायता और तकनीकी मार्गदर्शन उपलब्ध कराया जाए। साथ ही, उत्पाद की गुणवत्ता और ब्रांडिंग पर भी विशेष ध्यान देना होगा, ताकि यह पहल दीर्घकालिक रूप से टिकाऊ बन सके। 

अंतत:, पलामू की यह यात्रा यह संदेश देती है कि यदि राजनीतिक इच्छाशक्ति, प्रशासनिक दक्षता और सामाजिक सहभागिता का समन्वय हो, तो कोई भी क्षेत्र विकास की नयी ऊंचाइयों को छू सकता है। महिलाओं के नेतृत्व में शुरू हुआ यह प्रयास न केवल आर्थिक सशक्तिकरण का प्रतीक है, बल्कि यह एक नए सामाजिक बदलाव की नींव भी रख रहा है। 

झारखंड के लिए यह एक प्रेरणादायक क्षण है और यदि इस दिशा में निरंतरता बनी रही, तो वह दिन दूर नहीं जब पलामू जैसे क्षेत्र आत्मनिर्भर भारत के सबसे सशक्त स्तंभ के रूप में उभरेंगे। (लेखक हृदयानंद मिश्र एडवोकेट सह झारखंड प्रदेश कांग्रेस के समन्वय समिति सदस्य हैं।)

Published / 2026-05-07 10:00:32
पश्चिम बंगाल का चुनाव और भाजपा

पश्चिम बंगाल का चुनाव और भाजपा

त्रिवेणी दास

एबीएन एडिटोरियल डेस्क । 2026 के बंगाल चुनाव में 4 मई को आया परिणाम को ऐतिहासिक कहना कोई अतिशयोक्ति नहीं होगा। 1952 में पहली बार बंगाल विधानसभा का चुनाव हुआ उस समय देश में स्वतंत्रता आंदोलन के कारण कांग्रेस की लोकप्रियता थी, इसीलिए कांग्रेस जीत गई। 

25 वर्षों तक कांग्रेस की सरकार रही। फिर 34 वर्षों तक वाम दल CPI(M) की सरकार रही उसके बाद 15 वर्षों तक ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस(TMC) की सरकार रही। इस बार के विधानसभा के चुनाव में भारतीय जनता पार्टी ने बंगाल के राजनीति की इतिहास एवं भूगोल को पूरी तरह से बदल के रख दिया है। 

बंगाली श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने राजनीति की जिस विचारधारा के नींव की स्थापना की थी उसका परचम पूरे देश में लहरा रहा था, परंतु इस बार बंगाल की जनता ने अपनी क्रांतिकारी निर्णय से बंगाल को भी भगवा के रंग में रंग दिया है।

ममता बनर्जी का बाहरी भीतरी का नारा इस बार काम नहीं आया। मछली-मांस के मुद्दा के ऊपर झाल-मुड़ी का मुद्दा भारी पड़ गया। चुनाव परिणाम ने यह प्रमाणित कर दिया कि मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण कोई मुद्दा था ही नहीं जिसे मुद्दा बनाने की टीएमसी ने भरपूर कोशिश की थी। चुनाव में 93% मतदान जहां अप्रत्याशित था वहीं महिलाओं की लंबी कतार ने सिद्ध कर दिया कि महिला सम्मान एवं उनकी सुरक्षा महिलाओं की पहली प्राथमिकता थी।

मुस्लिम बहुल मालदा, उत्तरी दिनाजपुर और वीरभूम में भाजपा के प्रदर्शन से यह भी प्रमाणित हो रहा है कि अब मुस्लिम समाज को तुष्टीकरण के नाम पर और अधिक ठगा नहीं जा सकता है।

बंगाल में ममता बनर्जी और तमिलनाडु में एम के स्टालिन ने अपने क्षेत्रीय पार्टी को अपनी निजी जागीर में बदल दिया था, और इस बार के चुनाव परिणाम ने यह भी सिद्ध कर दिया कि इस प्रकार के दादागिरी को जनता बर्दाश्त लंबे समय तक नहीं करती है। 

2024 के लोकसभा चुनाव के परिणाम के बाद अन्य राजनीतिक दलों को भारतीय जनता पार्टी निस्तेज दिखने लगी थी, परंतु नरेंद्र मोदी एवं अमित शाह की जोड़ी ने उसे स्थिति को बड़ी कुशलता पूर्वक संभाला और भाजपा की प्रभामंडल को और भी तेजवान बनाया। असम में भाजपा की हैट्रिक इस बात का प्रमाण है कि भाजपा अपने कार्यों के द्वारा प्रो-इनकंबेंसी क्रिएट करने में सफलता अर्जित करती जा रही है। 

ममता बनर्जी के द्वारा इस्तीफा नहीं दिए जाने की घोषणा बाल-हठ के अतिरिक्त और कुछ नहीं है क्योंकि राज्यपाल को संवैधानिक अधिकार है कि वह अल्पमत वाली सरकार को बर्खास्त कर देंगे और चुनाव आयोग के द्वारा घोषित परिणाम के आधार पर बहुमत वाली दल को सरकार बनाने के लिए निमंत्रण दे देंगे।

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