अहोई अष्टमी पर श्री कृष्ण प्रणामी मंदिर में उमड़े श्रद्धालु291वें अन्नपूर्णा सेवा महाप्रसाद में हजारों भक्तों ने ग्रहण किया प्रसादएबीएन सोशल डेस्क। अहोई अष्टमी के पावन अवसर पर पुंदाग स्थित श्री राधा-कृष्ण प्रणामी मंदिर में श्रद्धा, भक्ति एवं आध्यात्मिक उल्लास का भव्य संगम देखने को मिला।एम.आर.एस. श्री कृष्ण प्रणामी सेवा धाम ट्रस्ट द्वारा संचालित श्री कृष्ण प्रणामी मंगल राधिका सदानंद सेवाधाम में परमहंस डॉ. संत शिरोमणि स्वामी सदानंद महाराज जी के सानिध्य में अहोई अष्टमी पूजा एवं 291वें श्री कृष्ण प्रणामी अन्नपूर्णा सेवा महाप्रसाद का श्रद्धापूर्वक आयोजन किया गया। इस अवसर पर हजारों श्रद्धालुओं ने भगवान श्री राधा-कृष्ण के दर्शन कर आशीर्वाद प्राप्त किया। मंदिर में श्री राधा रानी जी का आकर्षक आभूषणों एवं मनोहारी पुष्पों से दिव्य और अलौकिक श्रृंगार किया गया।दोपहर 12 बजे मंदिर के पुजारी पंडित अरविंद कुमार पांडेय ने विधिवत पूजा-अर्चना एवं मंत्रोच्चार के साथ भगवान को महाप्रसाद का भोग अर्पित किया। इसके पश्चात श्रद्धालुओं के बीच मसालेदार वेजिटेबल खिचड़ी, जूस एवं आलू चिप्स के पैकेट वितरित किए गए। मंदिर परिसर में उपस्थित दो हजार से अधिक श्रद्धालुओं ने श्रद्धापूर्वक महाप्रसाद ग्रहण किया। इस अवसर पर आयोजित भजन संध्या में ट्रस्ट के सुप्रसिद्ध भजन गायक मनीष सोनी ने सुमधुर एवं मनमोहक भजनों की प्रस्तुति देकर श्रद्धालुओं को भावविभोर कर दिया। भजनों की मधुर धुन पर श्रद्धालु झूम उठे। राधे-कृष्ण एवं श्याम प्रभु के जयकारों से पूरा मंदिर परिसर भक्तिमय हो गया। इसके पश्चात सामूहिक महाआरती का आयोजन किया गया, जिसमें श्रद्धालुओं ने सुख, शांति एवं समृद्धि की कामना की।ट्रस्ट के प्रवक्ता सह मीडिया प्रभारी संजय सर्राफ ने बताया कि अहोई अष्टमी के पावन अवसर पर सुबह से ही मंदिर में श्रद्धालुओं का तांता लगा रहा। लगभग तीन हजार से अधिक भक्तों ने भगवान के दर्शन किए। उन्होंने कहा कि ट्रस्ट द्वारा नियमित रूप से आयोजित अन्नपूर्णा सेवा महाप्रसाद धार्मिक आस्था के साथ सेवा, समर्पण एवं मानव कल्याण का संदेश देता है।कार्यक्रम को सफल बनाने में ट्रस्ट के उपाध्यक्ष राजेंद्र प्रसाद अग्रवाल, सुरेश अग्रवाल, पूर्णमल सर्राफ, अरविंद अग्रवाल, मधुसूदन जाजोदिया, विष्णु सोनी, पवन पोद्दार, सुरेश भगत, मनीष सोनी, संजय सर्राफ, ज्ञान चंद्र शर्मा, धीरज कुमार सहित अन्य सदस्यों का महत्वपूर्ण योगदान रहा।
जरूरतमंदों की सेवा ही ईश्वर की सच्ची आराधना: संजय सर्राफ टीम एबीएन, रांची। परमहंस डा० संत शिरोमणी श्री श्री 108 स्वामी सदानंद जी महाराज के सान्निध्य में एमआरएस श्री कृष्ण प्रणामी सेवा धाम ट्रस्ट रांची के द्वारा संचालित विगत 3 वर्षों से चल रहे पीड़ित मानव सेवा के पावन तीर्थ स्थल श्री कृष्ण प्रणामी मंगल राधिका सदानंद सेवाधाम रांची पुंदाग के प्रांगण में सद्गुरु कृपा अपना घर आश्रम (सत्य-प्रेम सभागार) में रह रहे 48 मंदबुद्धि दिव्यांग निराश्रित प्रभु जी एवं आश्रम में रहकर उनकी सेवा मे समर्पित सेवादारों को प्रतिदिन तीनों समय विभिन्न व्यंजनों के साथ अन्नपूर्णा सेवा भोजन प्रसादी का विधिवत आश्रम के किचन में स्वादिष्ट एवं पौष्टिक भोजन बनवाकर भोजन खिलाया जा रहा है। सद्गुरु कृपा अपना घर आश्रम के प्रवक्ता सह मीडिया प्रभारी संजय सर्राफ ने बताया कि 17 से 31 अक्टूबर तक 15 दिनों में लगभग 3200 निराश्रित प्रभुजी एवं उनकी देखभाल करने वाले सेवादारों को भोजन कराया गया। उन्होंने बताया कि आश्रम के रसोई घर में पूरी स्वच्छता एवं सात्विकता के साथ विभिन्न प्रकार के पौष्टिक व्यंजन तैयार किया जाते हैं। प्रत्येक निराश्रित प्रभुजन को सम्मान पूर्वक, स्नेह और आत्मीयता के साथ भोजन कराया जाता है। इस सेवा में कई लोगों ने सहयोग देते हुए स्वयं भोजन सेवा का दायित्व निभाया, इसके अलावे कई लोगों द्वारा आश्रम में रह रहे निराश्रितों, मंदबुद्धि, दीनबंधुओं के लिए खाद्य सामग्री एवं जरूरत के समान प्रदान किया गया। उन्होंने कहा कि सेवा कार्यों को समाज के हर वर्ग का सहयोग और प्रोत्साहन मिलना चाहिए। इस आश्रम में सत्यनारायण पोद्दार चैरिटेबल ट्रस्ट, बाबूलाल प्रेमसंस ग्रुप का पूर्ण सहयोग निरंतर मिलता है। उन्होंने कहा कि मानव प्रभु सेवा से बढ़कर कोई सेवा नहीं है। जरूरतमंदों की सेवा ही ईश्वर की सच्ची अराधना है। अन्नपूर्णा सेवा के पुनीत कार्य में चैरिटेबल ट्रस्ट के निदेशक पंकज पोद्दार, कृष्ण प्रणामी सेवा धाम ट्रस्ट के अध्यक्ष डुंगरमल अग्रवाल, उपाध्यक्ष राजेंद्र प्रसाद अग्रवाल, निर्मल जालान, मनोज चौधरी, निर्मल छावनिका, सज्जन पाड़िया, पुजारी अरविंद पांडे, पुरणमल सर्राफ, शिव भगवान अग्रवाल, सुरेश अग्रवाल, नंद किशोर चौधरी, मनीष साहू, संजय सर्राफ, विशाल जालान, सुनील पोद्दार, मधुसूदन जाजोदिया, अंजनी अग्रवाल, विष्णु सोनी, सुरेश चौधरी, अरविंद अग्रवाल, सुरेश भगत, पवन पोद्दार सहित अन्य सदस्यगण उपस्थित थे।
संतान की सुख-समृद्धि और दीर्घायु के लिए मातृशक्ति की अटूट आस्था का पर्व : संजय सर्राफ एबीएन सोशल डेस्क। झारखंड प्रांतीय मारवाड़ी सम्मेलन के संयुक्त महामंत्री सह श्री कृष्ण प्रणामी सेवा धाम ट्रस्ट के प्रांतीय प्रवक्ता संजय सर्राफ ने कहा है कि भारतीय संस्कृति में मां और संतान का रिश्ता प्रेम, त्याग, समर्पण एवं अटूट विश्वास का प्रतीक माना गया है। इसी मातृभावना और संतान के कल्याण की मंगलकामना को समर्पित है अहोई अष्टमी का पावन पर्व। यह पर्व माताओं की श्रद्धा, तपस्या और संतान के प्रति उनके नि:स्वार्थ प्रेम को अभिव्यक्त करता है। हिंदू धर्म में अहोई अष्टमी का विशेष धार्मिक एवं आध्यात्मिक महत्व है। इस वर्ष अहोई अष्टमी का व्रत 1 नवंबर दिन रविवार को मनाया जायेगा। यह पर्व दीपावली से लगभग आठ दिन पूर्व और करवा चौथ के चार दिन बाद आता है। अहोई अष्टमी कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को मनाई जाती है। इस दिन माताएं अपनी संतान की लंबी आयु, उत्तम स्वास्थ्य, सुख-समृद्धि, खुशहाली और उज्ज्वल भविष्य की कामना से व्रत रखती हैं। परंपरागत रूप से यह व्रत पुत्रों के कल्याण के लिए किया जाता था, लेकिन वर्तमान समय में माताएं पुत्र-पुत्रियों सहित अपनी समस्त संतानों के सुखमय जीवन के लिए यह व्रत करती हैं। यह पर्व मां के वात्सल्य और पारिवारिक संस्कारों की सुंदर अभिव्यक्ति है। अहोई अष्टमी के दिन महिलाएं प्रात:काल स्नान कर व्रत का संकल्प लेती हैं। अनेक महिलाएं सूर्योदय से लेकर तारों के दर्शन तक निर्जला व्रत रखती हैं। संध्याकाल में घर की दीवार पर गेरू से अहोई माता का चित्र बनाया जाता है अथवा उनके चित्र की स्थापना की जाती है। माता के चित्र के साथ स्याहू और उसके बच्चों का चित्रण भी किया जाता है। पूजा में रोली, चावल, पुष्प, दीपक, मिठाई और जल अर्पित किया जाता है। इसके बाद अहोई माता की व्रत कथा सुनी जाती है। तारों को अर्घ्य देकर व्रत का पारण किया जाता है। विभिन्न क्षेत्रों में पूजा-विधि और पारण की परंपराओं में अंतर भी देखने को मिलता है। लोककथा के अनुसार, एक साहूकार की पत्नी जंगल में मिट्टी खोदते समय अनजाने में स्याहू के एक बच्चे को चोट पहुंचा देती है, जिससे उसके सातों पुत्रों पर संकट आ जाता है। पुत्र-वियोग से दुखी माता अहोई माता की श्रद्धापूर्वक आराधना करती है। उसकी सच्ची भक्ति और पश्चाताप से प्रसन्न होकर माता उसे संतान सुख का आशीर्वाद देती हैं। तभी से अहोई माता की पूजा और व्रत की परंपरा प्रचलित हुई। अहोई अष्टमी केवल उपवास और पूजा का पर्व नहीं, बल्कि संतान के प्रति माता के निस्वार्थ प्रेम, त्याग और समर्पण का प्रतीक है। यह पर्व परिवार में सुख, शांति, सद्भाव और संस्कारों को मजबूत करने का संदेश देता है। अहोई माता की आराधना के माध्यम से माताएं अपनी संतानों के मंगलमय जीवन की कामना करती हैं और परिवार की खुशहाली के लिए ईश्वर के प्रति अपनी श्रद्धा व्यक्त करती हैं।
एबीएन न्यूज नेटवर्क, भंडरा। राजधानी रांची में टाईम्स आॅफ इंडिया के तत्वावधान में आयोजित समारोह में शिक्षा के क्षेत्र में उत्कृष्ट कार्य एवं उल्लेखनीय योगदान के लिए दूसरी बार शिक्षाविद् डॉ बिंदेश्वर उरांव को प्रतिष्ठित ह्यकैटेलिस्ट आॅफ एजुकेशन एक्सीलेंसह्ण अवार्ड से सम्मानित किया गया। समारोह में डा. उरांव को झारखंड शिक्षा परियोजना परिषद् के राज्य परियोजना निदेशक शशि रंजन और रांची विश्वविद्यालय की कुलपति प्रो. सरोज शर्मा न यह सम्मान प्रदान किया। यह अवार्ड शिक्षा में उत्कृष्टता को प्रोत्साहित करने और सकारात्मक योगदान देने के उनके प्रयासों की सराहना है। इस उपलब्धि से उनके विद्यालय परिवार, गांव एवं क्षेत्र के लोगों में खुशी है। क्षेत्र के एक शिक्षाविद् को राजधानी में सम्मानित किए जाने से स्थानीय स्तर पर शिक्षा के प्रति समर्पण और बेहतर कार्य करने की प्रेरणा को बल मिला है। डा. उरांव ने इस सम्मान के लिए आयोजकों एवं अतिथियों के प्रति आभार व्यक्त किया। उन्होंने अपनी उपलब्धि को विद्यालय के शिक्षकों, विद्यार्थियों, अभिभावकों तथा क्षेत्रवासियों के सहयोग और विश्वास से जोड़ते हुए शिक्षा के क्षेत्र में निरंतर बेहतर कार्य करने की प्रतिबद्धता जताई। विद्यालय परिवार एवं क्षेत्रवासियों ने भी आयोजकों को धन्यवाद देते हुए इस उपलब्धि को पूरे क्षेत्र के लिए गौरव का अवसर बताया। बता दें कि सप्ताह भर पूर्व डॉ उरांव को मंत्री शिल्पा नेहा तिर्की द्वारा लाइफ लाईन आॅफ झारखंड अवार्ड से सम्मानित किया गया था।
विश्व हिन्दू परिषद के प्रत्येक कार्यकर्ता का दायित्व है सत्संग को बढ़ावा देना : अरुण नेटके रांची विभाग की बैठक में संगठनात्मक गतिविधियों, सत्संग एवं आगामी योजनाओं पर हुई चर्चा टीम एबीएन, रांची। विश्व हिन्दू परिषद, रांची विभाग की महत्वपूर्ण विभाग बैठक बुधवार, 28 अक्टूबर 2026 को एयरपोर्ट के समीप स्थित होटल ग्रीन एकर्स में आयोजित की गयी। बैठक में विश्व हिन्दू परिषद के केंद्रीय सहमंत्री अरुण नेटके का मार्गदर्शन प्राप्त हुआ। इस दौरान संगठनात्मक गतिविधियों, कार्यकर्ताओं के दायित्वों, सत्संग के महत्व तथा आगामी योजनाओं पर चर्चा की गयी। बैठक को संबोधित करते हुए अरुण नेटके जी ने कहा कि विश्व हिन्दू परिषद के प्रत्येक कार्यकर्ता का दायित्व है कि वह सत्संग को बढ़ावा दे और समाज में धार्मिक एवं सांस्कृतिक जागरूकता के लिए सक्रिय भूमिका निभाये। सत्संग के माध्यम से समाज में आपसी समन्वय, संस्कार और संगठन के प्रति जागरूकता को मजबूत किया जा सकता है। उन्होंने कार्यकर्ताओं से अपने-अपने क्षेत्रों में संगठनात्मक गतिविधियों को नियमित रूप से संचालित करने का आह्वान किया। अरुण नेटके जी विश्व हिन्दू परिषद के केंद्रीय सहमंत्री के साथ-साथ अखिल भारतीय मंदिर एवं अर्चक-पुरोहित संपर्क प्रमुख तथा धर्मयात्रा महासंघ के अखिल भारतीय सहप्रमुख का दायित्व भी संभाल रहे हैं। बैठक में रांची विभाग के अंतर्गत आने वाले क्षेत्र, प्रांत एवं विभाग स्तर के दायित्ववान कार्यकर्ताओं के साथ जिला समितियों के पदाधिकारी, विभिन्न आयामों के प्रतिनिधि, प्रखंड अध्यक्ष, मंत्री तथा बजरंग दल के संयोजक शामिल हुए। बैठक में संगठन के कार्यों की समीक्षा करने के साथ आगामी कार्यक्रमों को प्रभावी ढंग से संचालित करने पर भी जोर दिया गया। इसके अतिरिक्त हितचिंतक अभियान के निर्धारित प्रारूप को पूर्ण रूप से भरकर जमा करने तथा संबंधित पदाधिकारियों को अपना अद्यतन कार्यवृत्त प्रस्तुत करने के निर्देश दिये गये। कार्यकर्ताओं से संगठनात्मक कार्यों में समयबद्धता, अनुशासन और सक्रिय सहभागिता बनाये रखने की अपील की गयी। प्रमुख पदाधिकारी एवं कार्यकर्ता रहे उपस्थित बैठक में प्रांत अध्यक्ष चंद्रकांत रायपत, प्रांत मंत्री मिथिलेश्वर मिश्र, प्रांत उपाध्यक्ष गंगा प्रसाद यादव, प्रांत संयोजक रंगनाथ महतो, प्रांत संगठन मंत्री चितरंजन कुमार, प्रांत मातृशक्ति प्रमुख अनिमा पाण्डेय, प्रांत दुर्गावाहिनी प्रमुख कृति गौरव, प्रांत सेवा सह प्रमुख अशोक अग्रवाल, प्रांत विद्यालय संपर्क प्रमुख अमर प्रसाद तथा रांची विभाग मंत्री रवि शंकर सहित अनेक पदाधिकारी एवं कार्यकर्ता उपस्थित रहे।इसके अलावा रोबिन महतो, कैलाश केशरी, रामेश्वर दयाल सिंह, राजीव झा, बिनोद जायसवाल, शिवराज सिंह, विकास मिश्रा, फूल कुमारी, अनिल कुमार, शाश्वत झा, लाल लोकनाथ शाहदेव सहित अन्य कार्यकर्ताओं ने भी बैठक में सहभागिता की। उक्त जानकारी विश्व हिंदू परिषद, झारखंड के प्रांत प्रचार प्रमुख प्रमुख प्रकाश रंजन ने दी।
अखंड भारत के शिल्पी सरदार पटेल के आदर्शों को आत्मसात करने का संकल्प : संजय सर्राफ एबीएन सोशल डेस्क। हिंदी साहित्य भारती के उपाध्यक्ष सह झारखंड पेरेंट्स एसोसिएशन के प्रांतीय प्रवक्ता संजय सर्राफ ने कहा है कि भारत की विविधता में एकता उसकी पहचान और शक्ति है। अनेक धर्मों, भाषाओं और संस्कृतियों से समृद्ध देश राष्ट्रीय एकता और अखंडता के सूत्र में बंधा है। इसी भावना को सुदृढ़ करने तथा लौह पुरुष सरदार वल्लभभाई पटेल के योगदान को स्मरण करने के लिए प्रत्येक वर्ष 31 अक्टूबर को राष्ट्रीय एकता दिवस मनाया जाता है। इस वर्ष यह दिवस शनिवार को मनाया जायेगा। यह राष्ट्रप्रेम और एकजुटता का संदेश देता है। सरदार पटेल का योगदान सरदार वल्लभभाई पटेल का जन्म 31 अक्टूबर 1875 को गुजरात के नडियाद में हुआ था। वे स्वतंत्र भारत के प्रथम उपप्रधानमंत्री एवं गृह मंत्री थे। स्वतंत्रता के बाद सैकड़ों रियासतों को एकीकृत कर अखंड राष्ट्र बनाना बड़ी चुनौती थी। पटेल ने दृढ़ इच्छाशक्ति, दूरदर्शिता और कुशल नेतृत्व से 560 से अधिक रियासतों का भारतीय संघ में विलय कराया। उन्होंने आधुनिक भारत की नींव मजबूत की। इसी कारण उन्हें लौह पुरुष और राष्ट्रीय एकता का शिल्पी कहा जाता है।भारत सरकार ने वर्ष 2014 में पटेल की जयंती को राष्ट्रीय एकता दिवस के रूप में मनाने की शुरूआत की। इसका उद्देश्य देश की एकता, अखंडता और सुरक्षा मजबूत करना तथा नागरिकों में राष्ट्रीय चेतना, सामाजिक सद्भाव विकसित करना है। यह दिवस जाति, धर्म, भाषा और क्षेत्रीय भेदभाव से ऊपर उठकर राष्ट्रहित को सर्वोपरि रखने की प्रेरणा देता है। युवाओं को राष्ट्र की जिम्मेदारी के प्रति जागरूक करना भी इसका महत्वपूर्ण उद्देश्य है। इस अवसर पर देशभर में रन फॉर यूनिटी, राष्ट्रीय एकता शपथ, प्रभात फेरी, संगोष्ठी, भाषण और सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। विद्यालयों, महाविद्यालयों, सरकारी कार्यालयों तथा सामाजिक संस्थाओं में पटेल के जीवन एवं विचारों पर चर्चा कर एकता का संदेश दिया जाता है। ये आयोजन सहयोग, अनुशासन और राष्ट्रसेवा की भावना को प्रोत्साहित करते हैं। राष्ट्रीय एकता दिवस हमें याद दिलाता है कि भारत की वास्तविक शक्ति उसकी विविधता और एकजुटता में निहित है। पटेल के आदर्शों को अपनाकर प्रत्येक नागरिक को राष्ट्रीय एकता, अखंडता, शांति और समृद्धि के लिए योगदान देना चाहिए। आपसी सम्मान और संवैधानिक मूल्यों से सशक्त समावेशी भारत का निर्माण संभव है। यही लौह पुरुष के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि और अखंड भारत के सपने को आगे बढ़ाने का संकल्प है।
मानवता की मिसाल, आश्रम में निराश्रितों की संख्या 48 हुई टीम एबीएन, रांची। मानवता, सेवा और करुणा की भावना को आत्मसात करते हुए परमहंस डॉ. संत शिरोमणि स्वामी सदानंद जी महाराज के मार्गदर्शन एवं सान्निध्य में संचालित एमआरएस श्री कृष्ण प्रणामी सेवा धाम ट्रस्ट द्वारा असहाय एवं निराश्रित लोगों की सेवा निरंतर की जा रही है।इसी सेवा अभियान के अंतर्गत सोमवार को बड़ा तालाब स्थित नागरमल सेवा सदन के समीप लावारिस अवस्था में भटक रहे एक असहाय व्यक्ति को रेस्क्यू कर सद्गुरु कृपा अपना घर आश्रम (सत्य-प्रेम सभागार), पुंदाग में आश्रय प्रदान किया गया। आश्रम के उपाध्यक्ष राजेंद्र प्रसाद अग्रवाल एवं प्रवक्ता सह मीडिया प्रभारी संजय सर्राफ ने बताया कि आश्रम की सेवा टीम को सूचना मिली थी कि एक व्यक्ति अत्यंत अस्वच्छ अवस्था में असहाय होकर भटक रहा है। सूचना मिलते ही सेवा टीम ने तत्परता दिखाते हुए उसे सुरक्षित रेस्क्यू कर आश्रम पहुंचाया। इस अभियान में सेवा साथी मुकुंद यादव, आशीष कुमार एवं सूरज प्रमाणिक की महत्वपूर्ण भूमिका रही।आश्रम पहुंचने के बाद व्यक्ति की चिकित्सकीय जांच करायी गयी। पूछताछ के दौरान उसके नाम, पते एवं परिवार के संबंध में कोई जानकारी प्राप्त नहीं हो सकी। उसकी स्मरणशक्ति भी काफी कमजोर पायी गयी। ट्रस्ट ने उसकी देखभाल एवं पहचान के उद्देश्य से उसका नाम नंदलाल रखा है। प्रवक्ता संजय सर्राफ ने बताया कि आश्रम में मंदबुद्धि, दिव्यांग, असहाय एवं निराश्रित लोगों की नि:शुल्क सेवा जनवरी 2024 से निरंतर की जा रही है। दो दिन पूर्व भी एक निराश्रित व्यक्ति को आश्रम में आश्रय दिया गया था। नंदलाल के आगमन के साथ ही आश्रम में रहने वाले निराश्रितों की संख्या बढ़कर 48 हो गई है। उन्होंने कहा कि गुरुजी सदानंद जी महाराज की प्रेरणा एवं आशीर्वाद से आश्रम में निवासरत सभी प्रभुजनों को परिवार जैसा स्नेहपूर्ण वातावरण प्रदान किया जाता है। उनके भोजन, चिकित्सा, स्वच्छता, सुरक्षा एवं दैनिक आवश्यकताओं का विशेष ध्यान रखा जाता है। आश्रम का उद्देश्य केवल आश्रय देना ही नहीं, बल्कि उपेक्षित एवं असहाय लोगों के जीवन में सम्मान, आत्मीयता और विश्वास का संचार करना है।
करवाचौथ अटूट प्रेम, विश्वास और अखंड सौभाग्य का पावन पर्व : संजय सर्राफ एबीएन सोशल डेस्क। श्री कृष्ण प्रणामी सेवा धाम ट्रस्ट एवं विश्व हिंदू परिषद सेवा विभाग के प्रांतीय प्रवक्ता संजय सर्राफ ने कहा है कि भारतीय संस्कृति में पर्व-त्योहार केवल धार्मिक आस्था के प्रतीक नहीं, बल्कि पारिवारिक संबंधों में प्रेम, विश्वास और समर्पण की भावना को सुदृढ़ करने के माध्यम भी हैं। करवाचौथ ऐसा ही एक पावन पर्व है, जो पति-पत्नी के अटूट प्रेम, दांपत्य जीवन की मधुरता और अखंड सौभाग्य की मंगलकामना का प्रतीक माना जाता है। इस दिन सुहागिन महिलाएं अपने पति की लंबी आयु, उत्तम स्वास्थ्य और सुख-समृद्धि के लिए पूरे दिन निर्जला उपवास रखती हैं तथा रात्रि में चंद्रदेव के दर्शन और पूजन के पश्चात व्रत का पारण करती हैं। इस वर्ष करवाचौथ का पर्व 29 अक्टूबर दिन गुरुवार को मनाया जायेगा। हिंदू पंचांग के अनुसार यह कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि को मनाया जाता है। इस दिन प्रात:काल सरगी ग्रहण करने के पश्चात व्रत का संकल्प लिया जाता है। महिलाएं दिनभर उपवास रखकर संध्या के समय भगवान शिव, माता पार्वती, भगवान गणेश और करवा माता की पूजा-अर्चना करती हैं। करवाचौथ का धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व अत्यंत व्यापक है। मान्यता है कि इस व्रत के प्रभाव से पति-पत्नी के जीवन में सुख, शांति, प्रेम और समृद्धि बनी रहती है। यह पर्व नारी के त्याग, तपस्या, श्रद्धा और समर्पण का प्रतीक है। करवाचौथ में मिट्टी के करवे का विशेष महत्व है।करवे में जल भरकर पूजा की जाती है तथा चंद्रदेव को अर्घ्य अर्पित किया जाता है। चंद्रमा को शीतलता, शांति और सौम्यता का प्रतीक माना गया है। करवाचौथ से जुड़ी वीरवती की कथा अत्यंत प्रचलित है। वीरवती सात भाइयों की इकलौती बहन थी। उसने अपने पति की लंबी आयु के लिए करवाचौथ का व्रत रखा। भूख-प्यास से व्याकुल बहन की स्थिति देखकर भाइयों ने छलपूर्वक पेड़ पर दीपक जलाकर चंद्रमा निकलने का भ्रम उत्पन्न कर दिया। वीरवती ने उसे चंद्रमा समझकर अर्घ्य दिया और भोजन कर लिया। इसके परिणामस्वरूप उसके पति की मृत्यु हो गयी। बाद में वीरवती ने पूर्ण श्रद्धा और विधिपूर्वक व्रत किया, जिससे उसका पति पुन: जीवित हो उठा। यह कथा व्रत की निष्ठा, संकल्प और अटूट विश्वास का संदेश देती है। करवा चौथ का मूल उद्देश्य दांपत्य जीवन में प्रेम, समर्पण, विश्वास और पारस्परिक सम्मान को मजबूत करना है। बदलते समय में पति-पत्नी दोनों द्वारा एक-दूसरे के स्वास्थ्य और सुख-समृद्धि की कामना करना इस पर्व को और अधिक आत्मीय बना रहा है। करवाचौथ भारतीय संस्कृति की उस परंपरा का प्रतीक है, जिसमें रिश्तों की मजबूती और परिवार की खुशहाली को सर्वोच्च स्थान दिया गया है।
टीम एबीएन, रांची। गायत्री शक्तिपीठों, प्रज्ञापीठों, आनलाइन राष्ट्रीय स्वाध्याय एवं जप अनुष्ठान मंडलों के माध्यम से शरदपूर्णिमा के पावन अवसर पर शक्तिपीठ सेक्टर टू सहित कई प्रज्ञापीठ व मण्डलों, प्रखंडों, इकाइयों में अखंड जप एवं यज्ञीय अनुष्ठान विधान किये गए।शनिवार चाय बगान नामकुम स्थित पंचमुखी दिव्य हनुमान मंदिर में दीपयज्ञ किया गया।कल रविवार एवं आज सोमवार गायत्री शक्तिपीठ सेक्टर टू में 5 कुण्डीय यज्ञ रणवीर व प्रमोद कुमार यज्ञ पुरोहित के सानिध्य में किए गए।दीपयज्ञ में प्रखंड समन्वयक विजय कुमार,परिव्राजक प्रमोद कुमार एवं जिला समन्वयक जेएनपी के सानिध्य में तथा मंदिर पुजारी व समिति सदस्यगण के माध्यम से 108 दीपकों का दीपयज्ञ विधान हुआ। दीपयज्ञ विधान में गुरुवरश्रीपूज्यवर वेदमूर्ति-तपोनिष्ठ पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य की बतायी गयी।ईश्वरीय चेतना की अवतार परम्परा पर ऋषि परम्परा और संस्कार परंपरा के पुनर्जागरण, साथ ही उपासना साधना सफल व सार्थक कैसे हो विषय पर प्रकाश डाला गया। पुरोहित प्रमोद कुमार ने बताया कि अपनी जीवन दिनचर्या में नित्य ईश्वरीय उपासना, साधना अनुष्ठान में ऊर्जा शक्ति बढ़ानी चाहिए और अपनी दोष दुर्गुण कषाय कलमषों का परिष्कार करना चाहिए।कहा कि श्रेष्ठ कर्म - धर्म से मन निर्मल होता है साधना की ओर मन उन्मुख होता है।अपनी अर्जित जप तप की ऊर्जा शक्ति का श्रेष्ठ कर्म में नियोजित करना चाहिए। यज्ञ में बीके सिंह, सत्यानन्द सिन्हा, प्रेमलता दीदी, आशा, सुशीला, शान्ति आदि अनेक श्रद्धालु दीदियों ने सहयोग कर सफल बनाये। यज्ञीय विधान उपरान्त सामान्य प्रसाद सहित ज्ञान प्रसाद में प्रज्ञा अभियान पाक्षिक, युग निर्माण व अखंड ज्योति पत्रिका तथा गायत्री माता का प्रतिमास्टीकर वितरित कर देव स्थापना कराया गया। आज पांच कुण्डीय महायज्ञ कराने वाले यजमान समूह ने यज्ञ साधकों को अमृताशन प्रसाद का भंडारा कराया। उक्त जानकारी गायत्री परिवार के विजय कुमार और जय नारायण प्रसाद ने दी।
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