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पीएम मोदी ने पुतिन से की यूक्रेन से युद्घ रोकने की अपील
Published / 2026-08-31 23:05:29
पीएम मोदी ने पुतिन से की यूक्रेन से युद्घ रोकने की अपील

राष्ट्रपति पुतिन से मिले प्रधानमंत्री मोदी: यूक्रेन युद्ध रोकने की मांग; पीएम मोदी बोले- अब शांति की ओर बढ़ने का वक्तएबीएन सेंट्रल डेस्क। रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने शंघाई सहयोग संगठन (SCO) शिखर सम्मेलन के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाकात की। इस दौरान प्रधानमंत्री मोदी ने यूक्रेन संघर्ष को सुलझाने के लिए भारत की ओर से सभी शांतिपूर्ण प्रयासों के समर्थन को दोहराया। मोदी ने कहा कि युद्ध का हर गुजरता दिन मानवता को पीछे धकेल रहा है और अब हिंसा को समाप्त करने की दिशा में गंभीरता से काम करने की जरूरत है।मोदी ने शांतिपूर्ण समाधान पर दिया जोरमीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक,  प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने यूक्रेन संघर्ष का शांतिपूर्ण समाधान तलाशने की भारत की प्रतिबद्धता दोहराई। उन्होंने स्पष्ट कहा कि युद्ध का एक-एक दिन मानवता के लिए नुकसानदेह है और इससे दुनिया आगे बढ़ने के बजाय पीछे जा रही है। मोदी ने सभी पक्षों से शत्रुता समाप्त करने और संघर्ष को खत्म करने के लिए प्रयास तेज करने की आवश्यकता पर जोर दिया।पुतिन ने भारत-रूस संबंधों को बताया मजबूतरूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने कहा कि भारत और रूस के बीच संबंध लगातार मजबूत हो रहे हैं। उन्होंने इस मजबूती में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के व्यक्तिगत ध्यान और दोनों देशों के बीच सहयोग को महत्वपूर्ण बताया। पुतिन ने भारत-रूस संबंधों को आगे बढ़ाने में मोदी की भूमिका की भी सराहना की।ब्रिक्स समिट में आने का दिया न्यौताबैठक के बाद दोनों नेताओं ने मीडिया को संबोधित किया। इस दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने रूस के राष्ट्रपतिल व्लादिमीर पुतिन ने 12 और 13 सितंबर को नई दिल्ली में होने वाले ब्रिक्स समिट में शामिल होने के लिए औपचारिक न्यौता दिया। उन्होंने पुतिन को न्यौता देते हुए कहा कि आपके और आपके डेलिगेशन के लिए भारत के लोग बहुत ज्यादा उत्सुक हैं। आपकी यात्रा से हमारे द्विपक्षीय संबंधों को बल मिलेगा और ब्रिक्स के अंतर्गत संवाद और सहयोग भी सशक्त होगा।2025 में 16 फीसदी बढ़ा पर्यटक आदान-प्रदानस्पुतनिक की रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2025 में भारत और रूस के बीच पर्यटकों का आदान-प्रदान 16 प्रतिशत बढ़ा। दोनों देशों के बीच बढ़ते पर्यटन संपर्क को द्विपक्षीय संबंधों में मजबूती के एक अहम संकेत के तौर पर देखा जा रहा है।

नेपाल त्रासदी कहीं चीनी साजिश तो नहीं?
Published / 2026-08-31 19:51:41
नेपाल त्रासदी कहीं चीनी साजिश तो नहीं?

ड्रैगन के गेम की खुली पोल : नेपाल ने 3 महीने पहले ही मांगी थी चीन से मदद, अब तबाही के बाद दिखा रहा झूठी सहानुभूति एबीएन सेंट्रल डेस्क। नेपाल में विनाशकारी बाढ़ ने 900 से ज्यादा लोगों की जान ले ली और हजारों लोग अब भी लापता हैं। लेकिन इस त्रासदी के बीच एक बड़ा सवाल सामने आया है क्या नेपाल ने इस खतरे को लेकर चीन से पहले ही मदद और अहम जानकारी नहीं मांगी थी? एक रिपोर्ट के मुताबिक, बाढ़ से करीब तीन महीने पहले नेपाल और चीन के अधिकारियों की बैठक हुई थी, जिसमें ग्लेशियर, बाढ़ और सीमा-पार आपदाओं की निगरानी को लेकर सहयोग बढ़ाने पर चर्चा हुई थी। नेपाली अधिकारियों का कहना है कि बैठक के बाद उन्हें चीन से उतना डेटा नहीं मिला, जितना उन्होंने मांगा था। 27 मई को काठमांडू में नेपाल और चीन के अधिकारियों तथा विशेषज्ञों की बैठक हुई थी।  संभावित खतरों पर दोनों देशों की हुई थी बात इस बैठक में नेपाल की तरफ से करीब 10 अधिकारी और चीन की तरफ से लगभग एक दर्जन अधिकारी शामिल हुए थे। इनमें तिब्बत के अधिकारी भी थे। बैठक का मुद्दा बेहद संवेदनशील था हिमालयी क्षेत्र में बाढ़, खराब मौसम, ग्लेशियर और ग्लेशियल झीलों से पैदा होने वाले खतरे। यानी जिस क्षेत्र में तीन महीने बाद भयावह तबाही हुई, उससे जुड़े संभावित खतरों पर दोनों देशों के अधिकारी पहले ही बातचीत कर चुके थे। बैठक में नेपाली पक्ष ने ग्लेशियल झीलों की सूची तैयार करने, जोखिम वाले इलाकों की मैपिंग और आपदा की शुरुआती चेतावनी व्यवस्था मजबूत करने जैसे मुद्दे उठाये थे। नेपाल के हाइड्रोलॉजिस्ट सौहार्द्र जोशी (जो उस बैठक में शामिल थे) ने बताया कि नेपाल चाहता था कि अगर ग्लेशियर या उसके आसपास के इलाके में कोई शुरुआती बदलाव दिखे तो उसे पहले से जानकारी मिल सके। यानी नेपाल की मांग सिर्फ सामान्य मौसम पूर्वानुमान तक सीमित नहीं थी। वह ग्लेशियर की गतिविधियों और पानी के स्तर में संभावित बदलाव की अग्रिम जानकारी चाहता था। लेकिन नेपाली अधिकारियों को पर्याप्त डेटा नहीं मिला।चीन की भूमिका पर सबसे बड़ा सवाल यहीं से चीन की भूमिका पर सबसे बड़ा सवाल उठता है। नेपाल के दो अधिकारियों ने कहा कि मई की बैठक के बाद उन्हें ग्लेशियर से जुड़े खतरों और जलस्तर के बारे में उतनी जानकारी नहीं मिली, जितनी उन्होंने मांगी थी। नेपाल के अधिकारियों का कहना है कि चीन मौसम संबंधी पूर्वानुमान और भारी बारिश की जानकारी साझा करता था, लेकिन दूसरे गंभीर खतरों खासकर ग्लेशियर में बदलाव के बारे में सूचना पर्याप्त नहीं थी। नेपाल में चीनी दूतावास का कहना है कि दोनों देश लगातार संपर्क में थे और मई की बैठक में सीमा-पार आपदा संबंधी जानकारी साझा करने में काफी प्रगति हुई थी। चीनी पक्ष ने यह भी कहा कि हिमालय के बेहद दुर्गम इलाकों में खतरे की निगरानी करना बहुत कठिन है और चीनी तथा अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञों को वहां कई व्यावहारिक चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। दूतावास के अनुसार, चीनी टीमों ने नेपाल के साथ महत्वपूर्ण जानकारी समय पर साझा की थी। इसलिए फिलहाल उपलब्ध तथ्यों में नेपाल का आरोप और चीन का बचाव दोनों मौजूद हैं। ग्लेशियर बना आपदा का प्रमुख कारण सबसे बड़ा सवाल है कि क्या चेतावनी मिलती तो नुकसान कम होता? दरअसल, 26 अगस्त को नेपाल-तिब्बत सीमा के पास ग्लेशियर का एक हिस्सा टूटकर बर्फ और चट्टानों का विशाल मलबा नदी में जा गिरा। इसके बाद अचानक बाढ़ ने नेपाल के कई इलाकों में भारी तबाही मचाई। सैटेलाइट तस्वीरों की समीक्षा में ग्लेशियर के टूटने और बड़े पैमाने पर मलबा जमा होने के संकेत मिले थे। विशेषज्ञों ने भी ग्लेशियर के अस्थिर होने को आपदा का प्रमुख कारण माना। नेपाल ने पिछले साल भी इसी इलाके में आयी बाढ़ के बाद चीन के सामने सीमा-पार जल और ग्लेशियर संबंधी जानकारी साझा करने की जरूरत उठायी थी। उस घटना में नेपाल में कम से कम नौ लोगों की मौत हुई थी और कई लोग लापता हुए थे। यानी दोनों देशों के बीच हिमालयी आपदा और डेटा शेयरिंग का सवाल पहले से मौजूद था। नेपाल और चीन की सीमा का बड़ा हिस्सा अत्यंत संवेदनशील हिमालयी क्षेत्र में आता है। इस क्षेत्र में ग्लेशियर, नदियां और ऊंचाई वाले इलाके सीधे दोनों देशों की सुरक्षा और बुनियादी ढांचे से जुड़े हैं। ऐसे में वास्तविक समय में सैटेलाइट डेटा, ग्लेशियर की गतिविधियों और जलस्तर की जानकारी साझा करना केवल पर्यावरणीय सहयोग नहीं, बल्कि सीमा-पार सूचना सहयोग भी बन जाता है। यही कारण है कि नेपाल लंबे समय से अधिक औपचारिक और भरोसेमंद डेटा-शेयरिंग व्यवस्था चाहता है। चीन की मदद सच्ची या... अब नेपाल चीन के साथ भारत जैसी औपचारिक व्यवस्था चाहता है, जिससे उसे बर्फ की गतिविधियों और पानी के स्तर की रीयल-टाइम जानकारी मिल सके। दिलचस्प बात यह है कि सूचना को लेकर सवालों के बीच चीन अब नेपाल के राहत और बचाव अभियान में सक्रिय भूमिका निभा रहा है। चीन ने 2,100 से ज्यादा बचावकर्मी भेजे हैं और राहत कार्यों के लिए करीब 3.3 करोड़ डॉलर का प्रावधान किया है। चीन और भारत दोनों के विशेषज्ञ नेपाल के बचाव अभियान में शामिल हैं। यानी तस्वीर पूरी तरह एकतरफा नहीं है चीन इस समय नेपाल की मदद भी कर रहा है, लेकिन आपदा से पहले डेटा साझा करने को लेकर उठे सवाल खत्म नहीं हुए हैं।नेपाल के लिए अब सबसे बड़ा मुद्दा यह है कि अगली आपदा से पहले उसे कितनी जल्दी और कितनी सटीक जानकारी मिल सकती है।

कतर की एलएनजी सप्लाई में 96% की गिरावट
Published / 2026-08-26 19:48:02
कतर की एलएनजी सप्लाई में 96% की गिरावट

कतर की एलएनजी सप्लाई पर युद्ध का कहर, निर्यात 96% गिरा, अरबों डॉलर का नुकसान एबीएन सेंट्रल डेस्क। अमेरिका-ईरान युद्ध के छह महीने पूरे होने के बीच कतर की अर्थव्यवस्था को भारी नुकसान हुआ है। दुनिया के प्रमुख एलएनजी निर्यातकों में शामिल कतर का लिक्विफाइड नेचुरल गैस निर्यात 96 फीसदी तक गिर गया है। आंकड़ों के अनुसार, इस दौरान कतर को गैस बिक्री से करीब 24 अरब डॉलर का नुकसान हुआ है, जो 2025 के आधार पर देश की लगभग पांच महीने की आय के बराबर है। 509 से घटकर सिर्फ 18 एलएनजी खेप डेटा इंटेलिजेंस फर्म आईसीआईएस के आंकड़ों के अनुसार, युद्ध के पिछले छह महीनों में कतर केवल 18 एलएनजी खेप निर्यात कर पाया। पिछले साल इसी अवधि में यह आंकड़ा 509 था। युद्ध से पहले कतर दुनिया की रोजाना एलएनजी मांग का करीब पांचवां हिस्सा पूरा करता था। दो कतर-संबंधित एलएनजी टैंकरों पर हमले भी हुए हैं। कतर की परेशानी की बड़ी वजह स्ट्रेट आॅफ होर्मुज में समुद्री आवाजाही में बाधा है। एलएनजी निर्यात के लिए इस मार्ग पर भारी निर्भरता के कारण क्षेत्रीय संघर्ष ने कतर की ऊर्जा आय को दूसरे खाड़ी देशों की तुलना में ज्यादा प्रभावित किया है। गैस उत्पादन ढांचे पर भी असर संघर्ष के दौरान कतर के रास लाफान एलएनजी परिसर को भी नुकसान पहुंचा। इसके चलते देश की एलएनजी निर्यात क्षमता प्रभावित हुई है। कतर ने आपूर्ति बनाये रखने के लिए अमेरिका से एलएनजी की अतिरिक्त खेपें खरीदने का रास्ता अपनाया है। जुलाई में रिपोर्ट सामने आयी थी कि कतर एजेंसी ने एशियाई ग्राहकों को आपूर्ति बनाये रखने के लिए अमेरिका से 33 स्पॉट एलएनजी कार्गो खरीदे। यूरोप पर भी बढ़ा गैस संकट कतर की सप्लाई में भारी गिरावट की भरपाई के लिए अमेरिकी एलएनजी निर्यात बढ़ा है लेकिन वैश्विक बाजार पर दबाव पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है। यूरोप में गैस भंडारण इस समय के हिसाब से ऐतिहासिक रूप से निचले स्तर पर पहुंच गया है। अगर आने वाली सर्दियों में मौसम ज्यादा ठंडा रहा, तो यूरोपीय बाजार में गैस की कीमतों में तेज उछाल का जोखिम बढ़ सकता है। कतर सरकार ने घटाया खर्च एलएनजी कारोबार में रुकावट का असर कतर के सरकारी वित्त पर भी पड़ा है। सरकार ने कई विभागों के बजट में 30 फीसदी तक कटौती की है, जबकि विदेशों को दी जाने वाली सहायता में करीब 85 फीसदी की कमी की गयी है। आईएमएफ ने 2026 में कतर की अर्थव्यवस्था में 8.6 फीसदी संकुचन का अनुमान लगाया है, जो खाड़ी सहयोग परिषद के देशों में सबसे बड़ी गिरावट होगी। हालांकि, कतर के पास संकट से निपटने के लिए बड़ा वित्तीय कुशन मौजूद है। देश के करीब 500 अरब डॉलर के कतर इन्वेस्टमेंट आॅथोरिटी फंड समेत वित्तीय भंडार सरकार को लंबे संकट से निपटने में मदद कर सकते हैं। भारत के लिए भी यह स्थिति महत्वपूर्ण है। भारत के प्रमुख एलएनजी आयातक पेट्रोनेट एलएनजी ने सितंबर में कतर से मिलने वाली गैस की आपूर्ति को लेकर अनिश्चितता जतायी है और वैकल्पिक स्रोतों से एलएनजी जुटाने की कोशिश की जा रही है।

जापान : 7.1 तीव्रता के भूकंप से भारी तबाही
Published / 2026-07-28 20:53:08
जापान : 7.1 तीव्रता के भूकंप से भारी तबाही

शॉपिंग मॉल की दूसरी मंजिल ढही, 50 से अधिक लोग घायल; ट्रेन पलटी एबीएन सेंट्रल डेस्क। दक्षिणी जापान में 7.1 तीव्रता के भूकंप से व्यापक नुकसान हुआ है। कुमामोटो प्रांत में कई इमारतों में आग लग गयी, ट्रेनें पटरी से उतर गयीं और एक शॉपिंग मॉल को भी भारी नुकसान पहुंचा। राहत एवं बचाव दल आग बुझाने और बचाव कार्य में जुटे हैं। काशिमा शहर स्थित एक शॉपिंग मॉल की दूसरी मंजिल ढह गयी, जिससे 50 से अधिक लोगों के घायल होने की खबर है। शुरुआती जानकारी के अनुसार, कई लोग घायल हुए हैं। भारी नुकसान की आशंका भूकंप के कारण हजारों घरों की बिजली आपूर्ति बाधित हो गयी। कई सड़कों में दरारें आ गयीं। अधिकारियों के मुताबिक, अब तक कम से कम 50 लोगों के घायल होने की जानकारी है। इनमें कुछ लोग आंशिक रूप से ढहे शॉपिंग मॉल के अंदर फंसे हुए हैं। सामने आये वीडियो दिख रहा है कि जापान में कई जगहों पर इमारतें क्षतिग्रस्त हो गयी हैं। कुछ जगहों पर नदी के उपर बने पुल टूट गये हैं। इसके अलावा ट्रेन के डिब्बे-इंजन पटरी से उतरकर पलट गये।

यूरोप का तापमान 40 डिग्री के पार
Published / 2026-07-01 19:03:16
यूरोप का तापमान 40 डिग्री के पार

भीषण गर्मी से बेहाल यूरोप: 40 डिग्री सेल्सियस पार तापमान, सड़कें पिघली, अस्पतालों पर दबाव; फिर भी एसी का विरोध क्यों? एबीएन सेंट्रल डेस्क। यूरोप में इस समय बहुत तेज गर्मी पड़ रही है। कई जगह तापमान 40 डिग्री सेल्सियस से ऊपर पहुंच गया है। ऐसे में गर्म देशों से आने वाले लोगों के मन में एक सवाल उठता है कि यूरोप के इतने सारे घरों, विद्यालयं और यहां तक कि अस्पतालों में भी एयर कंडीशनर (एसी) क्यों नहीं हैं? वॉल स्ट्रीट जर्नल (डब्ल्यूएसजे) की एक रिपोर्ट में इस बात की पड़ताल की गई है कि यूरोप में लंबे समय से एसी लगाने को क्यों नापसंदगी रही है। इसके पीछे जलवायु (क्लाइमेट) से जुड़े लक्ष्य, पुरानी ऐतिहासिक इमारतों को सुरक्षित रखना, शोर की शिकायतें और शहरों की योजना (अर्बन प्लानिंग) जैसे कई कारण हैं। अब इस सवाल पर और चर्चा होने लगी है, क्योंकि हाल की भीषण गर्मी ने यूरोप की व्यवस्था पर बहुत दबाव डाल दिया है। सड़कें पिघल गयी हैं, ट्राम की पटरियां टेढ़ी हो गयी हैं, ट्रेन सेवाएं प्रभावित हुई हैं, बिजली व्यवस्था पर दबाव बढ़ गया है और अस्पतालों को भी मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है। कई देशों में रिकॉर्ड तोड़ गर्मी पड़ी है। इसके बावजूद एसी के यूरोप का संबंध जटिल बना हुआ है। हम अमेरिका जैसा नहीं दिखना चाहते यूरोप के कई शहरों के योजनाकारों का मानना है कि इमारतों के बाहर लगी एसी की बड़ी-बड़ी मशीनें देखने में अच्छी नहीं लगतीं और ऐतिहासिक इलाकों की सुंदरता खराब कर देती हैं। वॉल स्ट्रीट जर्नल के अनुसार, पेरिस की डिप्टी-मेयर आॅद्रे पुलवार ने कहा, हम ऐसा नहीं चाहते कि हमारे शहर कुछ इटली, ब्राजील या अमेरिका के शहरों जैसे दिखें, जहां इमारतों के बाहर एसी की लंबी-लंबी कतारें लगी हों, जो बहुत शोर करती हों और गर्मी व जहरीली गैसें छोड़ती हों। पेरिस जैसे शहरों में अगर किसी इमारत के बाहर दिखाई देने वाला एसी वहां की प्रसिद्ध पुरानी चूना-पत्थर वाली इमारतों की सुंदरता बिगाड़ता है, तो उसे लगाने की अनुमति नहीं मिलती। बहुत शोर करता है यूरोप के कुछ हिस्सों में एसी लगाना केवल घर के मालिक का फैसला नहीं होता। अपार्टमेंट में रहने वाले लोगों को पहले अपने पड़ोसियों की मंजूरी लेनी पड़ सकती है। इसके अलावा, स्थानीय प्रशासन भी निर्माण के नियमों, ऊर्जा बचत के लक्ष्यों या शोर की वजह से दखल दे सकता है। रिपोर्ट के अनुसार, फ्रांस के कानून में इमारतों की सोसायटी को यह अधिकार है कि अगर एसी तय सीमा से ज्यादा आवाज करता है, तो वे उसका विरोध कर सकते हैं। यह सीमा लगभग हल्की हवा की आवाज के बराबर है। शोर से जुड़े मामलों के वकील क्रिस्टोफ सैंसन ने बताया कि उनकी कंपनी अब एसी से जुड़े 100 से ज्यादा मामलों को संभाल रही है। उन्होंने कहा, यह ऐसी आवाज है जो कंक्रीट की दीवारों के पार भी सुनाई दे सकती है। यह बहुत तेज होती है और लोगों को काफी परेशान कर सकती है। 32 साल के लूका फुनारो को एक दुर्लभ आनुवंशिक (जेनेटिक) बीमारी है। वह पिछले दो साल से पेरिस के मरे इलाके में अपने अपार्टमेंट की इमारत के आंगन में एसी लगाने की अनुमति लेने की कोशिश कर रहे हैं। लेकिन उनके पड़ोसी बार-बार यह कहकर विरोध कर रहे हैं कि एसी बहुत शोर करेगा। जलवायु से जुड़ी चिंता यूरोप लंबे समय से एसी को ऐसी मशीन मानता रहा है, जो बहुत ज्यादा बिजली खर्च करती है और जलवायु संबंधी लक्ष्यों को नुकसान पहुंचा सकती है। इसलिए वहां की सरकारों ने बेहतर इन्सुलेशन (दीवारों और छतों को ऐसा बनाना जिससे गर्मी कम आए), प्राकृतिक हवा, खिड़कियों पर शटर, ज्यादा पेड़ लगाने और शहरों को हराभरा बनाने जैसे उपायों को बढ़ावा दिया। लेकिन रिपोर्ट में कहा गया है कि जलवायु परिवर्तन पर अंतर-सरकारी पैनल (आईपीसीसी) का मानना है कि भीषण गर्मी के समय लोगों की सुरक्षा के लिए एसी सबसे प्रभावी उपायों में से एक है।  वहीं, शहरों में हरियाली बढ़ाने या केवल वेंटिलेशन जैसी व्यवस्थाओं को लंबे समय तक चलने वाली गर्मी में कम प्रभावी माना गया है। आॅक्सफोर्ड विश्वविद्यालय की जलवायु वैज्ञानिक राधिका खोसला ने कहा कि देशों को बेहतर इमारतों की डिजाइन और एसी दोनों का इस्तेमाल करना चाहिए, केवल किसी एक पर निर्भर नहीं रहना चाहिए। उन्होंने कहा, एसी का इस्तेमाल वहीं करना चाहिए, जहां उसकी सच में जरूरत हो। इसे हर समस्या का पहला समाधान नहीं बनाना चाहिए।  फ्रांस की जलवायु मंत्री मोनिक बारबू ने भी कहा कि हर जगह एसी लगाना संभव नहीं है। उन्होंने कहा, जो लोग कहते हैं कि हर जगह एसी लगा दो, यह सुनकर मुझे हैरानी होती है। क्या आपको लगता है कि इससे जंगलों में लगने वाली आग रुक जायेगी? क्या इससे फसलें सूखने से बच जायेंगी? 40 डिग्री गर्मी के लिए तैयार नहीं था यूरोप यूरोप की ज्यादातर सड़कें, इमारतें और दूसरी व्यवस्थाएं उस समय बनायी गयी थीं, जब वहां 40 डिग्री सेल्सियस से ऊपर का तापमान बहुत कम होता था। रिपोर्ट के अनुसार, फ्रांस में केवल करीब 25 प्रतिशत घरों में एसी है, जबकि ब्रिटेन में यह संख्या केवल पांच प्रतिशत है। वहीं, इटली में लगभग 56 प्रतिशत घरों में एसी है। हाल की भीषण गर्मी के दौरान हजारों विद्यालय बंद करने पड़े, कई कारोबारों ने अपना काम कम कर दिया और रेल सेवाएं प्रभावित हुईं। आईएनजी (आईएनजी) के अर्थशास्त्रियों ने कहा कि इन हालात ने उन्हें कोविड महामारी के लॉकडाउन की याद दिला दी। पिछले हफ्ते पेरिस में तापमान 40 डिग्री सेल्सियस के पार पहुंच गया। 19वीं सदी से पेरिस में तापमान का आधिकारिक रिकॉर्ड रखा जा रहा है। तब से लेकर अब तक केवल चार बार ही तापमान 40 डिग्री सेल्सियस से ऊपर पहुंचा है। आॅद्रे पुलवार ने कहा, हम हमेशा सोचते थे कि ऐसी स्थिति शायद 2030 के बाद आयेगी। लेकिन अब हमें समझ आ गया है कि हम तो पहले ही उस दौर में पहुंच चुके हैं।

अमेरिका-ईरान में फिर टकराव ने बढ़ायी पश्चिम एशिया की टेंशन
Published / 2026-06-27 21:19:15
अमेरिका-ईरान में फिर टकराव ने बढ़ायी पश्चिम एशिया की टेंशन

अमेरिका-ईरान सीजफायर पर फिर संकट: बहरीन पर अटैक के बाद अब होर्मुज में टैंकर पर हमला, पश्चिम एशिया में बढ़ी टेंशन एबीएन सेंट्रल डेस्क। दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री तेल मार्गों में से एक होर्मुज जलडमरूमध्य में शनिवार को एक वाणिज्यिक टैंकर पर हमला हुआ। यह घटना ऐसे समय हुई है जब खाड़ी क्षेत्र में तनाव एक बार फिर बढ़ता दिखायी दे रहा है। ब्रिटेन की सेना के यूनाइटेड किंगडम मैरीटाइम ट्रेड आॅपरेशंस ने घटना की पुष्टि करते हुए बताया कि हमले में जहाज के सभी चालक दल के सदस्य सुरक्षित हैं और पर्यावरण को किसी प्रकार का नुकसान नहीं पहुंचा है।हालांकि, हमले की प्रकृति, इस्तेमाल किए गए हथियार और टैंकर को हुई क्षति के बारे में तत्काल विस्तृत जानकारी जारी नहीं की गयी है। समाचार लिखे जाने तक किसी संगठन या देश ने इस हमले की जिम्मेदारी नहीं ली है। इसलिए यह स्पष्ट नहीं है कि घटना के पीछे कौन था। बहरीन के आरोप के बीच हुई घटना। यह हमला ऐसे समय हुआ है जब खाड़ी देश बहरीन ने आरोप लगाया है कि ईरान ने उसे निशाना बनाकर कई ड्रोन भेजे। ईरान ने इन आरोपों पर अभी तक कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं दी है। इससे पहले बृहस्पतिवार को भी ओमान तट के पास, फारस की खाड़ी से बाहर निकलने की कोशिश कर रहे एक जहाज पर हमला हुआ था। विभिन्न रिपोर्टों में उस घटना के लिए ईरान को जिम्मेदार ठहराने के आरोप लगाये गये थे, हालांकि उन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है और ईरान की ओर से आधिकारिक स्वीकारोक्ति भी सामने नहीं आयी। बता दें कि होर्मुज जलडमरूमध्य दुनिया के सबसे रणनीतिक समुद्री मार्गों में गिना जाता है। दुनिया के समुद्री मार्ग से होने वाले कच्चे तेल के बड़े हिस्से का परिवहन इसी रास्ते से होता है। सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात, कुवैत, कतर, इराक और ईरान के तेल और गैस निर्यात के लिए यह सबसे महत्वपूर्ण मार्ग है। इस क्षेत्र में किसी भी प्रकार की सैन्य या सुरक्षा घटना का सीधा असर वैश्विक ऊर्जा बाजार और तेल की कीमतों पर पड़ सकता है। यह घटनाक्रम ऐसे समय सामने आया है जब हाल ही में ईरान और अमेरिका के बीच तनाव कम करने के उद्देश्य से अंतरिम समझ की खबरें आयी थीं और दोनों पक्ष व्यापक समझौते की दिशा में बातचीत की इच्छा जता चुके हैं। हालांकि, समुद्री हमलों और क्षेत्रीय सुरक्षा घटनाओं से यह संकेत मिलता है कि पश्चिम एशिया में हालात अब भी पूरी तरह स्थिर नहीं हुए हैं और किसी भी नई घटना से तनाव फिर बढ़ सकता है।

6.2 की तीव्रता से डोली अफगान की धरती
Published / 2026-06-27 21:12:45
6.2 की तीव्रता से डोली अफगान की धरती

अफगानिस्तान में 6.2 तीव्रता का भूकंप, कश्मीर से हरियाणा तक डोली धरती एबीएन सेंट्रल डेस्क। कश्मीर के कई इलाकों में भूकंप के झटके महसूस किये गये हैं। बताया जा रहा है कि भूकंप का केंद्र अफगानिस्तान में था। कश्मीर के अलावा अफगानिस्तान में भी लोगों ने भूकंप के झटके महसूस किये, जिसकी तीव्रता 6.2 बतायी जा रही है। चंडीगढ़ में भी शनिवार शाम को भूकंप के झटके महसूस किये गये। इसके चलते कई इलाकों के निवासी एहतियात के तौर पर अपने घरों और दफ्तरों से बाहर निकल आये। हालांकि तत्काल किसी के हताहत होने या संपत्ति को नुकसान पहुंचने की कोई खबर नहीं है। चंडीगढ़, पंजाब और हरियाणा के साथ ही हिमाचल प्रदेश में भी भूकंप के झटके महसूस किये गये।

भीषण भूकंप से वेनेजुएला में भारी तबाही
Published / 2026-06-25 19:51:14
भीषण भूकंप से वेनेजुएला में भारी तबाही

एबीएन सेंट्रल डेस्क। वेनेजुएला की राजधानी कराकास में कुछ ही सेकंड के अंतराल पर दो बड़े भूकंप आये। पहला भूकंप 7.2 तीव्रता का था, जबकि दूसरा 7.5 तीव्रता का था। इस भूकंप में मरने वालों की संख्या बढ़कर 164 हो गयी है। समाचार एजेंसी रॉयटर्स और एएफपी के अनुसार, वेनेजुएला की अंतरिम राष्ट्रपति डेल्सी रॉड्रिगेज ने कहा है कि बुधवार रात देश में आये भूकंप से मरने वालों की संख्या अब 164 हो गयी है। इस हादसे में अब तक करीब एक हजार लोगों से घायल होने की भी सूचना है। हालांकि भूकंप से इससे कहीं भारी जनहानि और व्यापक तबाही की आशंका जतायी जा रही है। यूनाइटेड स्टेट्स जीयोलॉजिकल सर्वे के अनुसार, इस बात की 44% आशंका है कि मृतकों की संख्या 10 हजार से ज्यादा हो सकती है। वेनेजुएला की कार्यवाहक राष्ट्रपति डेल्सी रॉड्रिगेज ने राष्ट्र को संबोधित करते हुए आपातकाल की घोषणा कर दी है। वेनेजुएला में बिजली कटौती की समस्या काफी आम है और भूकंप के बाद प्रभावित इलाकों में इंटरनेट कनेक्टिविटी पर भी असर पड़ा है, इसलिए भूकंप से प्रभावित लोगों और इसके असर की जानकारी मिलने में भी काफी परेशानी हो रही है। बुधवार शाम एक मिनट से भी कम समय के अंतराल में दो शक्तिशाली भूकंप आये। पहला भूकंप 7.2 तीव्रता का था, जिसका केंद्र याराकुई राज्य के सैन फेलिपे में था। इसके सिर्फ 39 सेकंड बाद दूसरा और अधिक शक्तिशाली भूकंप आया, जिसकी तीव्रता 7.5 दर्ज की गयी। कार्यवाहक राष्ट्रपति डेल्सी रॉड्रिगेज ने अब तक 164 लोगों की मौत की पुष्टि की है। आशंका है कि दूसरे बड़े भूकंप के बाद मृतकों की संख्या 10,000 से अधिक हो सकती है। राजधानी काराकास में भी तेज झटके महसूस किये गये, जहां कई इमारतें गिर गयी हैं, पेट्रोल की आपूर्ति बाधित हो गयी है और मलबे के नीचे फंसे लोगों को बचाने की कोशिश जारी है। गृह मंत्री ने लोगों से अपने घर तुरंत खाली करने की अपील की है।

फ्रांंस : गर्मी के कारण कार में दम तोड़ दिये दो मासूम
Published / 2026-06-23 20:07:05
फ्रांंस : गर्मी के कारण कार में दम तोड़ दिये दो मासूम

यहां गर्मी का टूटा रिकार्ड: कार में छूटे 2 मासूमों की निकल गयी जान, दुर्लभ रेड अलर्ट जारी एबीएन सेंट्रल डेस्क। यूरोप इस समय रिकॉर्डतोड़ गर्मी की चपेट में है। फ्रांस के दक्षिणी शहर कारपेंट्रास में सोमवार को दो और चार साल के दो बच्चों के शव एक कार से बरामद किये गये। प्रारंभिक जांच में माना जा रहा है कि अत्यधिक गर्मी उनकी मौत की सबसे संभावित वजह है। जांचकर्ताओं के अनुसार, बच्चों के शव एक आवासीय पार्किंग क्षेत्र में खड़ी पारिवारिक कार के अंदर मिले। बताया जाता है कि मां को मालूम नहीं था कि उनके बच्चे कार में चुपके से चढ़ गये हैं। मां कार से उतरकर घर के अंदर चली गयी और उसे लॉक कर दिया। बाद में जब खोजबीन शुरू हुई तो दोनों बच्चे कार के अंदर मृत मिले। घटना ने पूरे फ्रांस को झकझोर दिया है और हीटवेव के खतरों को लेकर नयी चिंता पैदा कर दी है।  फ्रांस में टूटा तापमान रिकॉर्ड मौसम एजेंसी मीटियो फ्रांस के अनुसार, फ्रांस का औसत तापमान जून महीने के लिए अब तक के सबसे ऊंचे स्तर पर पहुंच गया है। देश में दिन और रात का औसत तापमान 29.2 डिग्री सेल्सियस दर्ज किया गया, जो पिछले रिकॉर्ड से अधिक है। कई इलाकों में तापमान 40 से 43 डिग्री सेल्सियस तक पहुंचने का अनुमान है। स्थिति की गंभीरता को देखते हुए फ्रांस में 1,350 से अधिक स्कूल बंद कर दिए गए हैं, जबकि लगभग 3.9 करोड़ लोग रेड अलर्ट वाले क्षेत्रों में रह रहे हैं। ब्रिटेन में दुर्लभ रेड अलर्ट फ्रांसीसी सरकार ने लोगों को नदियों और झीलों जैसे असुरक्षित जल स्रोतों में तैरने से बचने की चेतावनी दी है। सप्ताहांत में देशभर में डूबने से 13 लोगों की मौत हो गई, जिनमें एक 13 वर्षीय लड़की भी शामिल थी। उधर, जर्मनी में भी सप्ताहांत के दौरान तैराकी दुर्घटनाओं में पांच लोगों की मौत की खबर है। ब्रिटेन की मौसम एजेंसी मेट आफिस ने अत्यधिक गर्मी को लेकर दुर्लभ रेड वार्निंग जारी की है। यह एजेंसी का सबसे उच्च स्तर का चेतावनी अलर्ट है, जो जीवन और बुनियादी ढांचे के लिए गंभीर खतरे का संकेत देता है। ब्रिटेन में तापमान 40 डिग्री सेल्सियस तक पहुंचने की संभावना जतायी गयी है। कई स्कूलों ने समय से पहले छुट्टी देने का फैसला किया है, जबकि रेल सेवाओं पर भी असर पड़ा है। स्कूलों में बच्चे हुए बीमार फ्रांस की राजधानी पेरिस में कई अभिभावकों ने शिकायत की है कि स्कूलों के कक्षाओं में तापमान असहनीय हो गया है। एक अभिभावक ने बताया कि अत्यधिक गर्मी के कारण कई बच्चों को उल्टी और चक्कर आने जैसी समस्याएं हुईं, जिसके बाद आपातकालीन सेवाओं को बुलाना पड़ा। विशेषज्ञों का कहना है कि लगातार बढ़ रही हीटवेव क्लाईमेट चेंज का स्पष्ट संकेत है। वैज्ञानिकों के अनुसार भविष्य में ऐसी गर्मी की लहरें और अधिक बार, अधिक लंबी अवधि तक तथा अधिक तीव्रता के साथ देखने को मिल सकती हैं। यूरोप के कई देशों में प्रशासन लोगों से घरों में रहने, पर्याप्त पानी पीने और बुजुर्गों व बच्चों का विशेष ध्यान रखने की अपील कर रहा है।

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