एबीएन सेंट्रल डेस्क। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की चीन यात्रा केवल एक कूटनीतिक दौरा नहीं, बल्कि दुनिया के सबसे हाई-सिक्योरिटी आॅपरेशनों में से एक बन गयी है। अमेरिका और चीन के बीच तनावपूर्ण संबंधों और साइबर निगरानी की आशंकाओं के चलते ट्रंप की सुरक्षा के लिए बेहद सख्त प्रोटोकॉल लागू किये गये हैं।
अमेरिकी राष्ट्रपति के किसी भी विदेशी दौरे की तैयारी लगभग तीन महीने पहले शुरू हो जाती है। इसके लिए एक एडवांस सर्वे ग्रुप बनाया जाता है जिसमें कई अमेरिकी एजेंसियों के अधिकारी शामिल होते हैं। यह टीम एयर ट्रैफिक कंट्रोल, एयरपोर्ट आॅपरेटर और स्थानीय सुरक्षा एजेंसियों से समन्वय करती है। ट्रंप के विमान के रूट, एयरपोर्ट और यात्रा मार्गों की गहन जांच की जाती है।
रिपोर्ट के अनुसार, सुरक्षा एजेंसियां राष्ट्रपति के दौरे वाले इलाकों के आसपास मौजूद मानसिक स्वास्थ्य संस्थानों की भी जांच करती हैं। हाल ही में छोड़े गये मरीजों की जानकारी तक खंगाली जाती है। यह प्रोटोकॉल 1981 में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप पर हुए हमले के बाद और सख्त किया गया था, जब एक मानसिक रूप से बीमार व्यक्ति ने उन पर गोली चला दी थी। ट्रंप जिन रास्तों से गुजरते हैं, वहां हर वाहन हटाया जाता है। सड़क किनारे पार्किंग पूरी तरह प्रतिबंधित रहती है। हर इमारत, छत और सड़क की सुरक्षा जांच की जाती है।
ट्रंप के एयरफोर्स वन से पहले अमेरिकी सेना के उ-17 ग्लोबमास्टर कार्गो विमान रवाना होते हैं। इनमें हेलिकॉप्टर, हथियार, कम्युनिकेशन सिस्टम और राष्ट्रपति की विशेष लिमोजिन द बीस्ट भेजी जाती है। एयर फोर्स वन को अत्याधुनिक सुरक्षा तकनीक से लैस माना जाता है। इसमें मेडिकल यूनिट, आॅपरेशन रूम, सुरक्षित कम्युनिकेशन सिस्टम और मिसाइल डिफेंस फीचर्स मौजूद रहते हैं। ट्रंप जिस विशेष कार में सफर करते हैं, उसे कैडिलैक वन या द बीस्ट कहा जाता है। यह कार बुलेटप्रूफ, गैस-प्रूफ और विस्फोटरोधी होती है। रिपोर्टों के मुताबिक इसमें राष्ट्रपति के ब्लड ग्रुप का खून भी रखा जाता है ताकि आपात स्थिति में तुरंत इलाज हो सके।
जिस होटल में अमेरिकी राष्ट्रपति ठहरते हैं, उसके आसपास पार्किंग बंद कर दी जाती है। कई मंजिलों पर अमेरिकी सीक्रेट सर्विस का नियंत्रण रहता है। कमरों की खिड़कियों पर बुलेटप्रूफ सुरक्षा लगायी जाती है और बाथरूम तक की निगरानी होती है। कुछ रिपोर्टों में दावा किया गया है कि बायो-सिक्योरिटी कारणों से राष्ट्रपति का जैविक कचरा भी वापस ले जाया जाता है। चीन यात्रा के दौरान अमेरिकी अधिकारियों को अपने निजी फोन और लैपटॉप इस्तेमाल करने की अनुमति नहीं होती। उन्हें क्लीन डिवाइसेज दिये जाते हैं ताकि साइबर जासूसी से बचा जा सके।
विशेषज्ञों का मानना है कि चीन दुनिया के सबसे आक्रामक साइबर निगरानी वाले देशों में शामिल है, इसलिए अमेरिकी टीम पूरी तरह नियंत्रित डिजिटल माहौल में काम करती है। रिपोर्ट में रूसी राष्ट्रपति ब्लादिमिर पुतिन की सुरक्षा का भी जिक्र किया गया है। बताया गया कि उनकी बख्तरबंद औरस सेनाट लिमोजिन भी चलती-फिरती किले जैसी होती है, जो बम, गोली और रासायनिक हमलों से सुरक्षा देती है।
एबीएन सेंट्रल डेस्क। रूस का मालवाहक जहाज उरसा मेजर दिसंबर 2024 में भूमध्य सागर में डूब गया था। अब इस घटना को लेकर बड़ा खुलासा सामने आया है। स्पेन सरकार के एक दस्तावेज के अनुसार जहाज में ऐसे हिस्से मौजूद हो सकते थे जो पनडुब्बियों में इस्तेमाल होने वाले परमाणु रिएक्टरों से जुड़े थे।
यह जहाज Saint Petersburg से रूस के पूर्वी शहर Vladivostok जा रहा था। 23 दिसंबर 2024 को स्पेन और अल्जीरिया के बीच समुद्र में जहाज के इंजन कक्ष में विस्फोट हुआ, जिसके बाद वह डूब गया। हादसे में दो चालक दल के सदस्यों की मौत हो गई थी जबकि 14 लोगों को बचा लिया गया था।
स्पेन सरकार के दस्तावेज में कहा गया है कि बचाए जाने के बाद जहाज के कप्तान ने अधिकारियों को बताया था कि जहाज में पनडुब्बियों में इस्तेमाल होने वाले दो परमाणु रिएक्टरों जैसे उपकरणों के हिस्से मौजूद थे। यह जानकारी स्पेन की संसद में जमा एक आधिकारिक दस्तावेज में सामने आई है।
जहाज की मालिक रूसी सरकारी कंपनी Oboronlogistika ने पहले दावा किया था कि जहाज पर आतंकी हमला हुआ था। कंपनी के अनुसार जहाज के पानी की सतह के पास तीन शक्तिशाली विस्फोट हुए थे, जिससे जहाज को भारी नुकसान पहुंचा। यह कंपनी रूस के रक्षा मंत्रालय से जुड़ी मानी जाती है और उस पर पहले से ही अमेरिका तथा यूरोपीय संघ के प्रतिबंध लगे हुए हैं।
इस खुलासे के बाद अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर चिंता बढ़ गई है कि क्या जहाज सैन्य या परमाणु तकनीक से जुड़ा संवेदनशील सामान ले जा रहा था। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि जहाज में वास्तव में परमाणु रिएक्टरों से जुड़े हिस्से थे, तो यह मामला केवल समुद्री दुर्घटना नहीं बल्कि वैश्विक सुरक्षा से जुड़ा बड़ा मुद्दा बन सकता है।
एबीएन सेंट्रल डेस्क। अमेरिका और ईरान के बीच जारी तनाव अब एक अहम मोड़ पर पहुंच गया है, जहां दोनों देश युद्ध समाप्त करने के बेहद करीब बताये जा रहे हैं। अमेरिकी अधिकारियों के अनुसार, एक पन्ने के समझौता ज्ञापन (एमओयू) पर सहमति बनने की दिशा में तेजी से काम हो रहा है, जो इस लंबे संघर्ष को खत्म करने का रास्ता खोल सकता है।
सूत्रों के मुताबिक, इस समझौते में कई महत्वपूर्ण प्रावधान शामिल हैं। ईरान अपने परमाणु संवर्धन कार्यक्रम पर रोक लगाने और कभी भी परमाणु हथियार विकसित न करने का वादा कर सकता है। वहीं अमेरिका ईरान पर लगाये गये आर्थिक प्रतिबंधों को धीरे-धीरे हटाने और विदेशों में फंसे अरबों डॉलर के फंड को जारी करने पर सहमत हो सकता है।
इस संभावित डील का सबसे अहम पहलू स्ट्रेट आॅफ होर्मुज से जुड़ा है। इस जलडमरूमध्य से वैश्विक तेल और गैस की 20 प्रतिशत से अधिक आपूर्ति गुजरती है। समझौते के तहत दोनों पक्ष इस रास्ते पर लगी पाबंदियों को हटाने और जहाजों की आवाजाही सामान्य करने पर सहमत हो सकते हैं, जिससे वैश्विक ऊर्जा संकट में बड़ी राहत मिल सकती है। अमेरिकी प्रशासन को उम्मीद है कि अगले 48 घंटों में ईरान की ओर से अहम जवाब मिल जाएगा।
हालांकि अभी तक किसी भी बिंदु पर अंतिम सहमति नहीं बनी है, लेकिन यह पहला मौका है जब दोनों देश इतने करीब पहुंचे हैं। इस समझौते के तहत 30 दिनों की एक वार्ता अवधि भी प्रस्तावित है, जिसमें दोनों पक्ष विस्तृत समझौते पर काम करेंगे। इस दौरान धीरे-धीरे अमेरिका अपनी नौसैनिक नाकेबंदी हटायेगा और ईरान भी जलडमरूमध्य पर लगाये गये प्रतिबंध कम करेगा।
परमाणु मुद्दे पर बातचीत भी इस डील का बड़ा हिस्सा है। अमेरिका चाहता है कि ईरान कम से कम 12 से 15 साल तक यूरेनियम संवर्धन पर रोक लगाये, जबकि ईरान ने 5 साल का प्रस्ताव दिया है। अंतिम समझौते में इस अवधि को लेकर सहमति बनाना सबसे बड़ी चुनौती माना जा रहा है। इसके अलावा, ईरान अंतरराष्ट्रीय निरीक्षण व्यवस्था को स्वीकार कर सकता है, जिसमें संयुक्त राष्ट्र के निरीक्षकों द्वारा अचानक जांच भी शामिल होगी।
यह अमेरिका की प्रमुख शर्तों में से एक है। इस पूरी प्रक्रिया में डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन की भूमिका अहम मानी जा रही है, जिसने हाल ही में होर्मुज क्षेत्र में सैन्य कार्रवाई को सीमित करने का फैसला लिया है। वहीं मार्को रुबियो ने कहा है कि यह एक जटिल प्रक्रिया है और अंतिम समझौते तक पहुंचने में समय लग सकता है।
एबीएन सेंट्रल डेस्क। चीन ने एक बड़े फैसले में अमेरिकी टेक कंपनी मेटा की 2 अरब डॉलर की आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) डील को रोक दिया है। यह डील अक स्टार्टअप मानस के अधिग्रहण से जुड़ी थी, जिसे अब राष्ट्रीय सुरक्षा चिंताओं के चलते रद कर दिया गया है।
रिपोर्ट के मुताबिक, चीन के प्रमुख आर्थिक नियामक एनडीआरसी ने 2021 में लागू विदेशी निवेश सुरक्षा नियमों के तहत इस सौदे को वापस लेने का आदेश दिया। यह फैसला दिखाता है कि चीन अब अपनी तकनीक, डेटा और टैलेंट को विदेश जाने से रोकने के लिए और सख्त रुख अपना रहा है।
हालांकि मानस ने बाद में अपना बेस विदेश में शिफ्ट कर लिया था और उसे अमेरिकी निवेश भी मिला था, लेकिन चीनी अधिकारियों ने माना कि कंपनी के तकनीकी संसाधन, डेटा और रिसर्च अभी भी चीन से जुड़े हुए हैं। इसी वजह से इस डील को संवेदनशील माना गया। रिपोर्ट में कहा गया है कि इस फैसले के तहत अब मेटा और मानस के बीच हुए निवेश, शेयर ट्रांसफर और बौद्धिक संपत्ति को वापस करना होगा। अक जैसे सेक्टर में यह प्रक्रिया काफी जटिल मानी जाती है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यह कदम सिर्फ एक डील तक सीमित नहीं है, बल्कि यह एक बड़ा संकेत है कि चीन अब एआई जैसे रणनीतिक क्षेत्रों में विदेशी कंपनियों, खासकर अमेरिकी कंपनियों, को लेकर ज्यादा सतर्क हो गया है। इस फैसले का असर वैश्विक निवेशकों पर भी पड़ सकता है।
अब क्रॉस-बॉर्डर टेक डील्स में जोखिम बढ़ेगा और कंपनियां भविष्य में अपने आॅपरेशन, डेटा और रिसर्च को अलग-अलग रखने की कोशिश कर सकती हैं, ताकि ऐसे नियमों से बचा जा सके। कुल मिलाकर, यह मामला दिखाता है कि दुनिया में टेक्नोलॉजी और डेटा को लेकर प्रतिस्पर्धा और तनाव लगातार बढ़ रहा है, और एआई इस संघर्ष का सबसे अहम केंद्र बन चुका है।
एबीएन सेंट्रल डेस्क। कई देशों ने बच्चों की सुरक्षा और आॅनलाइन जोखिम कम करने के लिए सोशल मीडिया पर उम्र आधारित प्रतिबंध या सख्त नियम लागू किये हैं। इसी कड़ी में एक और देश का नाम जुड़ गया है। तुर्किये की संसद ने बुधवार देर रात एक विधेयक पारित किया, जिसमें 15 वर्ष से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया मंचों तक पहुंच सीमित करने का प्रावधान शामिल है। सरकारी मीडिया ने यह जानकारी दी। यह कानून बच्चों और किशोरों को आॅनलाइन खतरनाक गतिविधियों से बचाने की वैश्विक प्रवृत्ति के मद्देनजर लाया गया है।
सोशल मीडिया कंपनियों को चेतावनी
यह विधेयक ऐसे समय में पारित हुआ है जब एक सप्ताह पहले काहरामानमाराश (दक्षिणी तुर्किये) में हुई गोलीबारी की घटना में 14 वर्षीय एक लड़के ने स्कूल में नौ छात्रों और एक शिक्षक की हत्या कर दी थी। इस घटना में हमलावर की भी मौत हो गयी थी। पुलिस हमलावर की आॅनलाइन गतिविधियों की जांच कर रही है ताकि हमले के पीछे की मंशा का पता लगाया जा सके।
तुर्किये की सरकारी समाचार एजेंसी अनाडोलू के अनुसार नए कानून के तहत सोशल मीडिया कंपनियों को आयु सत्यापन प्रणाली लागू करनी होगी, अभिभावक नियंत्रण (पैरेंटल कंट्रोल) के साधन उपलब्ध कराने होंगे और हानिकारक मानी जाने वाली सामग्री (कंटेंट) पर तेजी से कार्रवाई करनी होगी। अब इस विधेयक को कानून बनने के लिए राष्ट्रपति रजब तैयब एर्दोआन की मंजूरी की आवश्यकता है, जिन्हें 15 दिनों के भीतर इस पर निर्णय लेना होगा। काहरामानमाराश की घटना के बाद एर्दोआन ने बच्चों की सुरक्षा और निजता के लिए आॅनलाइन जोखिम कम करने की आवश्यकता पर बल दिया था।
एर्दोआन ने सोमवार को टेलीविजन पर अपने एक संबोधन में कहा, हम ऐसे दौर में जी रहे हैं जहां कुछ डिजिटल प्लेटफॉर्म हमारे बच्चों के दिमाग को खराब कर रहे हैं और सोशल मीडिया मंच साफ शब्दों में कहें तो गंदगी का अड्डा बन गये हैं। मुख्य विपक्षी दल रिपब्लिकन पीपुल्स पार्टी (सीएचपी) ने इस प्रस्ताव की आलोचना करते हुए कहा है कि बच्चों की सुरक्षा प्रतिबंधों से नहीं बल्कि अधिकार-आधारित नीतियों से सुनिश्चित की जानी चाहिए।
कानून के तहत यूट्यूब, टिकटॉक, फेसबुक और इंस्टाग्राम जैसे सोशल मीडिया मंच 15 वर्ष से कम उम्र के बच्चों को अकाउंट बनाने से रोकेंगे और अभिभावक नियंत्रण प्रणाली लागू करेंगे। इसके अलावा, आॅनलाइन गेम कंपनियों को भी तुर्किये में एक प्रतिनिधि नियुक्त करना होगा ताकि वे नये नियमों का पालन सुनिश्चित कर सकें। उल्लंघन की स्थिति में इंटरनेट बैंडविड्थ में कमी और जुमार्ने जैसे दंड का प्रावधान है। तुर्किये सरकार पर हाल में आॅनलाइन मंचों पर प्रतिबंध लगाने के आरोप लगते रहे हैं, खासकर जब ये प्लेटफॉर्म असहमति व्यक्त करने का माध्यम बने हैं।
एबीएन सेंट्रल डेस्क। जापान के उत्तरी इलाके में एक बार फिर विनाशकारी भूकंप ने सभी को डरा दिया है। जिस कारण सुनामी का खतरा भी मंडरा रहा है। सोमवार दोपहर करीब 4:53 बजे (भारतीय समयानुसार दोपहर लगभग 1:23 बजे) सानरिकु तट के पास समुद्र के अंदर शक्तिशाली भूकंप के झटके महसूस किये गये। भूकंप की तीव्रता इतनी अधिक थी कि जापान मौसम विज्ञान एजेंसी ने तुरंत तटीय क्षेत्रों के लिए सुनामी की चेतावनी जारी कर दी है।
शुरूआती आंकड़ों के मुताबिक इस भूकंप की तीव्रता 7.4 दर्ज की गई है। भूकंप का केंद्र समुद्र तल से करीब 10 किलोमीटर (6 मील) की गहराई पर था। कम गहराई पर केंद्र होने के कारण भूकंप के झटके काफी तेज थे और इससे समुद्र की लहरों में हलचल पैदा होने का खतरा बढ़ गया है।
जापान के सार्वजनिक टेलीविजन एनएच ने अलर्ट जारी करते हुए कहा है कि उत्तरी जापान के तटीय इलाकों में 3 मीटर (लगभग 10 फीट) तक ऊंची सुनामी की लहरें जल्द ही टकरा सकती हैं। प्रशासन ने तटीय क्षेत्रों, बंदरगाहों और समुद्री तटों के पास रहने वाले लोगों को तुरंत घर खाली कर सुरक्षित और ऊंचाई वाले स्थानों पर जाने का निर्देश दिया है। चेतावनी में कहा गया है कि सुनामी की पहली लहर के बाद और भी कई लहरें आ सकती हैं जो पहली लहर से ज्यादा खतरनाक हो सकती हैं।
भूकंप के बाद जापानी प्रशासन पूरी तरह अलर्ट मोड पर है। सानरिकु तट के पास स्थित रिहायशी इलाकों और औद्योगिक इकाइयों में नुकसान का आकलन किया जा रहा है। फिलहाल किसी बड़े जान-माल के नुकसान की तत्काल खबर नहीं है लेकिन सुनामी के खतरे को देखते हुए अगले कुछ घंटे बेहद संवेदनशील बताए जा रहे हैं।
एबीएन सेंट्रल डेस्क। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान के खिलाफ अब तक का सबसे आक्रामक रुख अख्तियार किया है। उन्होंने ईरान को सैन्य तबाही की चेतावनी दी है। ट्रंप ने कहा कि अगर ईरान ने मौजूदा समझौते की शर्तों को स्वीकार नहीं किया, तो अमेरिका उसके तमाम पावर प्लांट और पुलों को जमींदोज कर देगा।
ट्रंप ने दावा किया कि ईरान ने होर्मुज में गोलीबारी कर मौजूदा सीजफायर समझौते की धज्जियां उड़ा दी हैं। उन्होंने बताया कि ईरानी हमलों का निशाना फ्रांस और ब्रिटेन के जहाज बने हैं। ट्रंप के मुताबिक, ईरान का यह कदम उसकी हताशा को दर्शाता है।
इस तनाव के बीच ट्रंप ने कूटनीतिक रास्ते का आखिरी विकल्प भी खुला रखा है। अमेरिकी प्रतिनिधियों का एक दल कल शाम पाकिस्तान की राजधानी इस्लाबाद पहुंच रहा है। वहां ईरान के साथ निर्णायक बातचीत होनी है। ट्रंप ने कहा कि यह ईरान के पास आखिरी मौका है।
ईरान की ओर से होर्मुज जलडमरूमध्य को बंद करने की घोषणा पर तंज कसते हुए ट्रंप ने कहा कि अमेरिकी नाकेबंदी ने उसे पहले ही बंद कर रखा है। इससे ईरान को रोजाना 50 करोड़ डॉलर का भारी नुकसान हो रहा है। उन्होंने कहा कि दुनिया भर के जहाज अब तेल और माल लोडिंग के लिए अमेरिका के टेक्सास, लुइसियाना और अलास्का के बंदरगाहों का रुख कर रहे हैं, जिससे अमेरिका को कोई नुकसान नहीं है।
ट्रंप ने अपने चिर-परिचित अंदाज में कहा कि पिछले 47 वर्षों से जो काम किसी राष्ट्रपति ने नहीं किया, उसे अब वो अंजाम देंगे। उन्होंने चेतावनी दी कि अगर डील नहीं हुई, तो ईरान के बुनियादी ढांचे को पूरी तरह तबाह कर दिया जाएगा।
इस बीच समाचार एजेंसी तसनीम की ताजा रिपोर्ट के अनुसार, तेहरान ने पाकिस्तान में होने वाली आगामी राजनयिक वार्ता में अपना प्रतिनिधिमंडल भेजने से साफ इनकार कर दिया है। ईरानी अधिकारियों ने स्पष्ट किया है कि जब तक डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन की ओर से ईरान के बंदरगाहों पर लगाई गई नौसैनिक नाकेबंदी प्रभावी रहेगी, तब तक बातचीत की कोई मेज नहीं सजेगी।
एबीएन सेंट्रल डेस्क। मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव के बीच भारत से जुड़ी एक बड़ी घटना सामने आई है। ओमान के पास एक भारतीय-ध्वज वाले कच्चे तेल के टैंकर पर ईरानी नौसेना द्वारा फायरिंग किये जाने की खबर है। यह टैंकर करीब 20 लाख बैरल इराकी तेल लेकर जा रहा था। घटना के बाद क्षेत्र में स्थिति और तनावपूर्ण हो गयी है।
रिपोर्ट्स के मुताबिक, यह विशाल तेल टैंकर होर्मुज के पास से गुजर रहा था तभी उस पर फायरिंग की गयी। हालांकि अभी तक किसी बड़े नुकसान या हताहत की जानकारी सामने नहीं आयी है। यह घटना ऐसे समय में हुई है जब पहले से ही अमेरिका और ईरान के बीच टकराव जारी है और होर्मुज क्षेत्र अत्यधिक संवेदनशील बना हुआ है।
रिपोर्ट्स के अनुसार, इस घटना के बाद दो भारतीय-ध्वज वाले जहाजों को सुरक्षा कारणों से वापस लौटना पड़ा। यह कदम इसलिए उठाया गया ताकि किसी भी संभावित खतरे से बचा जा सके। इससे साफ है कि समुद्री मार्ग पर स्थिति सामान्य नहीं है और जहाजों की आवाजाही प्रभावित हो रही है।
घटना के बाद भारत सरकार ने तुरंत कूटनीतिक स्तर पर कार्रवाई शुरू कर दी है। जानकारी के मुताबिक, विदेश मंत्रालय ने ईरान के राजदूत को तलब कर इस पूरे मामले पर कड़ा विरोध दर्ज कराया है। सरकार जल्द ही इस पर आधिकारिक बयान जारी कर सकती है।
होर्मुज जलडमरूमध्य दुनिया के सबसे अहम तेल मार्गों में से एक है, जहां से वैश्विक तेल आपूर्ति का बड़ा हिस्सा गुजरता है। इस क्षेत्र में किसी भी तरह की सैन्य गतिविधि या बाधा का असर पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है। ईरान और अमेरिका के बीच जारी तनाव के चलते पहले ही इस क्षेत्र में अनिश्चितता बनी हुई थी, और अब भारतीय जहाज से जुड़ी यह घटना स्थिति को और गंभीर बना रही है।
हाल ही में ईरान की ओर से कहा गया था कि भारतीय जहाजों को सुरक्षित रास्ता दिया जायेगा और इसको लेकर दोनों देशों के बीच संपर्क भी बना हुआ है। इसके बावजूद हुई यह घटना कई सवाल खड़े करती है और समुद्री सुरक्षा को लेकर चिंता बढ़ाती है।
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