उत्तराखंड श्रमजीवी पत्रकार यूनियन की संगोष्ठी में डीपफेक और फर्जी खबरों के प्रति किया सचेत एबीएन सेंट्रल डेस्क (हरिद्वार)। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) पत्रकारिता में खबरों के विश्लेषण, आंकड़ों की पड़ताल और रिपोर्टिंग को तेज करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है, लेकिन इसकी विश्वसनीयता के लिए तथ्यों का सत्यापन और संपादकीय विवेक जरूरी है। एआई पत्रकार का विकल्प नहीं, बल्कि सहायक उपकरण है। यह बात शनिवार को उत्तराखंड श्रमजीवी पत्रकार यूनियन की हरिद्वार इकाई की ओर से आयोजित संगोष्ठी में विशेषज्ञों ने कही। होटल पार्क ग्रांड में एआई पत्रकारिता में चुनौतियां एवं अवसर विषय पर आयोजित एक दिवसीय संगोष्ठी की अध्यक्षता अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद के राष्ट्रीय मीडिया संयोजक महामंडलेश्वर करौली शंकर महादेव महाराज ने की। कार्यक्रम में राज्यमंत्री ओमप्रकाश जमदग्नि और अनुसूचित जाति आयोग के सदस्य मनोज गौतम मुख्य अतिथि के रूप में शामिल हुए। वरिष्ठ पत्रकार एवं एआई विशेषज्ञ पीयूष पांडेय मुख्य वक्ता रहे। पीयूष पांडेय ने कहा कि एआई बड़े आंकड़ों के विश्लेषण, आॅडियो-वीडियो के लिप्यंतरण, भाषा अनुवाद और खबरों के शुरुआती मसौदे तैयार करने में उपयोगी है। हालांकि, यह उपलब्ध आंकड़ों के आधार पर परिणाम देता है, इसलिए किसी भी सामग्री को प्रकाशित करने से पहले तथ्यों और स्रोतों की जांच आवश्यक है। उन्होंने डीपफेक और एआई से तैयार की जाने वाली फर्जी खबरों को पत्रकारिता के लिए चुनौती बताते हुए इनके प्रति सतर्क रहने की जरूरत पर जोर दिया। महामंडलेश्वर करौली शंकर महादेव महाराज ने कहा कि तकनीक का इस्तेमाल सकारात्मक उद्देश्यों के लिए होना चाहिए। पत्रकारिता की मूल भावना मानवीय संवेदना और सत्यनिष्ठा में निहित है। मशीन तेजी से सूचनाएं जुटा सकती है, लेकिन तथ्यों की वास्तविकता परखने में पत्रकार की सजगता और विवेक की भूमिका महत्वपूर्ण है। यूनियन के प्रदेश अध्यक्ष अरुण शर्मा ने कहा कि पत्रकारों को तकनीकी नवाचारों को अपनाते हुए बदलते दौर की चुनौतियों को अवसर में बदलना होगा। मौके पर गुलशन नैयर, बृजेंद्र हर्ष, जगदीश शर्मा, अविक्षित रमन, संजय आर्य, संजय रावल, राजेंद्र नाथ गोस्वामी, ओम गौतम फक्कड़ और अवधेश शिवपुरी सहित दो दर्जन वरिष्ठ पत्रकारों को सम्मानित किया गया। कार्यक्रम का संचालन डॉ. रजनीकांत शुक्ला ने किया, जबकि अनिरुद्ध भाटी ने आभार व्यक्त किया।
प्रख्यात न्यायविद नवनाथेम नवी पिल्लै को नोबल पुरस्काररंगभेद के खिलाफ संघर्ष से पुरस्कार तक, ये है भारतीय मूल की नवी पिल्लै का प्रेरक सफरदक्षिण अफ्रीका में रंगभेद के दौर में नेल्सन मंडेला समेत अन्य लोगों का बचाव कियारवांडा नरसंहार से जुड़े मामलों में न्यायाधीश रहीं, संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार उच्चायुक्त के रूप में भी दी सेवाएंएबीएन सेंट्रल डेस्क। वर्ष 2026 का नोबेल शांति पुरस्कार दक्षिण अफ्रीका की प्रख्यात न्यायविद नवनाथेम नवी पिल्लै को देने की घोषणा की गयी है। नॉर्वे की नोबेल समिति ने उन्हें शांति और अंतरराष्ट्रीय कानून को बढ़ावा देने के प्रयासों के लिए इस प्रतिष्ठित सम्मान के लिए चुना है। समिति के अनुसार, पिल्लै ने वैश्विक कानूनी व्यवस्था को अधिक व्यापक बनाने और युद्ध अपराधों, मानवता के खिलाफ अपराधों तथा नरसंहार के मामलों में दोषियों पर मुकदमा चलाने की दिशा में अहम भूमिका निभायी है।नवी पिल्लै का लंबा करियर मानवाधिकारों, न्याय और कानून के शासन के प्रति उनकी प्रतिबद्धता के लिए जाना जाता है। दक्षिण अफ्रीका के डरबन में भारतीय तमिल मूल के परिवार में जन्मीं पिल्लै ने रंगभेद के दौर में गहरे सामाजिक भेदभाव और अलगाव का सामना किया। वकील बनने के बाद उन्होंने नेल्सन मंडेला और रंगभेद के खिलाफ आवाज उठाने वाले अन्य लोगों का बचाव किया।अंतरराष्ट्रीय अदालतों में निभायी अहम भूमिकानवी पिल्लै ने दक्षिण अफ्रीका के उच्च न्यायालय, रवांडा के लिए गठित अंतरराष्ट्रीय आपराधिक न्यायाधिकरण और अंतरराष्ट्रीय आपराधिक न्यायालय में न्यायाधीश के रूप में सेवाएं दी हैं। वह संयुक्त राष्ट्र की मानवाधिकार उच्चायुक्त भी रह चुकी हैं।इसके अलावा, उन्होंने फलस्तीन के कब्जे वाले क्षेत्र से संबंधित संयुक्त राष्ट्र के स्वतंत्र अंतरराष्ट्रीय जांच आयोग की अध्यक्षता भी की। नोबेल समिति के मुताबिक, पिल्लै ने अंतरराष्ट्रीय कानून के दायरे और प्रभाव को बढ़ाने में उल्लेखनीय योगदान दिया है। उन्होंने ऐसे मामलों में न्यायिक कार्रवाई की अहमियत स्थापित करने में भूमिका निभाई, जिनमें युद्ध अपराध, मानवता के खिलाफ अपराध और नरसंहार जैसे गंभीर अपराध शामिल हैं।यौन हिंसा और नरसंहार से जुड़े मामलों में ऐतिहासिक योगदानरवांडा नरसंहार से संबंधित मुकदमों में नवी पिल्लै की भूमिका को महत्वपूर्ण माना जाता है। इन मामलों में उनके योगदान ने यह स्थापित करने में मदद की कि बलात्कार और यौन हिंसा कुछ परिस्थितियों में मानवता के खिलाफ अपराध के साथ-साथ नरसंहार का भी हिस्सा हो सकते हैं। इसी न्यायिक प्रक्रिया में नरसंहार के लिए उकसाने से संबंधित एक महत्वपूर्ण कानूनी पहलू भी सामने आया। प्रचार के माध्यम से नरसंहार के लिए उकसाने के आरोपों पर सुनवाई ने अंतरराष्ट्रीय आपराधिक कानून के विकास में योगदान दिया।अंतरराष्ट्रीय कानून को बताया स्थायी शांति का आधारनोबेल समिति ने अपने वक्तव्य में कहा कि दुनिया में युद्ध और संघर्ष बढ़ने के दौर में अंतरराष्ट्रीय कानून शांति और सुरक्षा के लिए केवल एक अतिरिक्त उपाय नहीं, बल्कि अनिवार्य आवश्यकता है। समिति ने चिंता जताई कि अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं और कानून के शासन पर दबाव बढ़ रहा है तथा कई बार शक्तिशाली देश जवाबदेही से बच निकलते हैं। समिति के अनुसार, स्थायी शांति मजबूत देशों की इच्छा या शक्ति संतुलन पर नहीं, बल्कि कानूनी सिद्धांतों, कूटनीति और शांतिपूर्ण तरीके से विवादों के समाधान पर आधारित होनी चाहिए। नवी पिल्लै ने अपने विभिन्न पदों पर रहते हुए इस बात पर जोर दिया कि व्यक्तियों और देशों, दोनों की जिम्मेदारी है कि वे कानून के शासन का पालन करें। नोबेल समिति ने कहा कि पिल्लै का करियर न्याय, मानव गरिमा और अंतरराष्ट्रीय कानून के प्रति प्रतिबद्धता का उदाहरण है। उनका काम उन लोगों के लिए उम्मीद और प्रेरणा है, जो अधिक शांतिपूर्ण दुनिया बनाने के प्रयास में जुटे हैं।
चिकित्सा क्षेत्र के तीन वैज्ञानिकों को मिला नोबेल पुरस्कारनोबेल 2026 : चिकित्सा क्षेत्र में तीन वैज्ञानिकों को पुरस्कार, किस खोज से बदला मस्तिष्क को समझने का तरीका?एबीएन नॉलेज डेस्क। नोबेल पुरस्कार की घोषणा शुरू हो गयी। फिजियोलॉजी या मेडिसिन के नोबेल पुरस्कार के लिए कार्ल डाइसेरोथ, पीटर हेगेमैन और जॉर्ज नागेल को संयुक्त रूप से चुना गया है। तीनों वैज्ञानिकों को प्रकाश से नियंत्रित होने वाले आयन चैनलों और आॅप्टोजेनेटिक्स से जुड़ी खोजों के लिए यह सम्मान दिया गया है। उनकी खोज ने वैज्ञानिकों को यह समझने में नयी मदद दी कि दिमाग की खास तंत्रिका कोशिकाएं यादों, भावनाओं और व्यवहार को किस तरह प्रभावित करती हैं।आॅप्टोजेनेटिक्स क्या है और इसका संबंध नोबेल पुरस्कार से कैसे है?आॅप्टोजेनेटिक्स ऐसी वैज्ञानिक तकनीक है, जिसमें प्रकाश की मदद से तंत्रिका कोशिकाओं को नियंत्रित किया जाता है। इसकी नींव पीटर हेगेमैन और जॉर्ज नागेल के काम से पड़ी। दोनों ने एक कोशिका वाले शैवाल क्लैमाइडोमोनास पर अध्ययन किया। उन्होंने इसकी सतह पर चैनलरोडॉप्सिन नाम का एक प्रोटीन खोजा। नीली रोशनी पड़ने पर यह प्रोटीन एक चैनल खोलता है। इसके जरिए आवेशित कण अंदर-बाहर होते हैं और विद्युत संकेत पैदा होता है।कार्ल डाइसेरोथ ने इस खोज को दिमाग तक कैसे पहुंचाया?कार्ल डाइसेरोथ ने चैनलरोडॉप्सिन से जुड़ी खोज को तंत्रिका कोशिकाओं पर इस्तेमाल किया। उन्होंने इस प्रोटीन का जीन चूहे की तंत्रिका कोशिकाओं में पहुंचाया। इसके बाद जब इन कोशिकाओं पर नीली रोशनी डाली गई तो उनमें तंत्रिका संकेत पैदा किया जा सका। डाइसेरोथ ने 2005 में इस महत्वपूर्ण सफलता को प्रकाशित किया। इसके दो साल बाद उन्होंने यह भी दिखाया कि प्रकाश से नियंत्रित किया जाने वाला यह स्विच जीवित चूहों के दिमाग में भी काम कर सकता है।इस तकनीक ने दिमाग को समझने का तरीका कैसे बदला?आॅप्टोजेनेटिक्स के आने के बाद वैज्ञानिकों के लिए दिमाग की खास तंत्रिका कोशिकाओं को अलग से सक्रिय करना संभव हुआ। इससे वे यह पता लगा सकते हैं कि दिमाग की कौन सी कोशिकाएं किसी खास याद, भावना या व्यवहार से जुड़ी हैं। पहले वैज्ञानिकों के सामने यह चुनौती थी कि दिमाग में एक साथ काम कर रही अलग-अलग तंत्रिका कोशिकाओं की भूमिका को कैसे पहचाना जाये। प्रकाश की मदद से कोशिकाओं को नियंत्रित करने की क्षमता ने इस अध्ययन को ज्यादा सटीक बना दिया।इंसानों के लिए इस खोज का क्या महत्व है?आॅप्टोजेनेटिक्स ने मस्तिष्क से जुड़े शोध के लिए नयी दिशा खोली है। वैज्ञानिक इस तकनीक की मदद से तंत्रिका कोशिकाओं के काम को बेहतर तरीके से समझने की कोशिश कर रहे हैं। इसका इस्तेमाल अभी मुख्य रूप से शोध के क्षेत्र में हो रहा है।इसके साथ ही वैज्ञानिक दृष्टिबाधित लोगों की आंखों की रोशनी बहाल करने की संभावनाओं पर भी काम कर रहे हैं। इस तरह तीनों वैज्ञानिकों की खोज ने मस्तिष्क और तंत्रिका तंत्र को समझने के साथ भविष्य के उपचारों के लिए भी नयी संभावनाएं पैदा की हैं।इन तीनों वैज्ञानिकों की रिसर्च क्या है? आसान भाषा में समझेंपीटर हेगेमैन और जॉर्ज नागेल ने शुरुआत की : दोनों वैज्ञानिकों ने एक कोशिका वाले शैवाल क्लैमाइडोमोनास का अध्ययन किया। इसी दौरान उन्हें चैनलरोडॉप्सिन नाम का प्रोटीन मिला।चैनलरोडॉप्सिन क्या करता है : जब इस प्रोटीन पर नीली रोशनी पड़ती है तो यह एक छोटा चैनल खोल देता है। इसके जरिए आवेशित कण कोशिका के अंदर-बाहर जाते हैं और विद्युत संकेत पैदा होता है।कहां से मिली बड़ी वैज्ञानिक संभावना : वैज्ञानिकों को समझ आया कि अगर इसी तरह के प्रकाश-संवेदनशील प्रोटीन को तंत्रिका कोशिकाओं में इस्तेमाल किया जाए तो रोशनी की मदद से नसों की गतिविधि को नियंत्रित किया जा सकता है।कार्ल डाइसेरोथ ने इसे तंत्रिका कोशिकाओं पर आजमाया : उन्होंने चैनलरोडॉप्सिन का जीन चूहे की तंत्रिका कोशिकाओं में पहुंचाया। इसके बाद नीली रोशनी डालने पर उन कोशिकाओं में तंत्रिका संकेत पैदा किया जा सका।फिर इसे जीवित दिमाग में दिखाया गया : 2005 में डाइसेरोथ ने अपनी सफलता प्रकाशित की। 2007 में उन्होंने दिखाया कि यह प्रकाश से नियंत्रित स्विच जीवित चूहे के दिमाग में भी काम कर सकता है।इस तकनीक का नाम पड़ा आॅप्टोजेनेटिक्स : इसमें प्रकाश यानी आॅप्टो और जेनेटिक्स यानी जीन से जुड़ी तकनीक का इस्तेमाल होता है। इसका मकसद खास तंत्रिका कोशिकाओं को प्रकाश के जरिए नियंत्रित करना है।
स्मार्ट इंडिया हैकाथन 2026गोस्सनर कॉलेज में छात्रों ने प्रस्तुत किये तकनीकी समाधानयुवा देश के प्रमुख मानव संसाधन : प्रो इलानी पूर्तीएबीएन नॉलेज डेस्क। गोस्सनर कॉलेज के BSC CA एवं IT विभाग में स्मार्ट इंडिया हैकाथन प्रतियोगिता 2026 का आयोजन किया गया। प्रतियोगिता के मुख्य अतिथि योगदा सत्संग महाविद्यालय के BSC CA विभाग के विभागध्यक्ष डॉ अभिषेक कुमार विश्वकर्मा ने कहा कि हैकाथन प्रतियोगिता सर्वप्रथम कनाडा में वर्ष 1999 में आयोजित हुई थी। भारत में स्मार्ट इंडिया हैकाथन की शुरुआत वर्ष 2017 में शिक्षा मंत्रालय, भारत सरकार एवं AICTE के संयुक्त तत्वावधान में हुई।उन्होंने हैकाथन प्रतियोगिता के बारे में विद्यार्थियों को जानकारी देते हुए बताया कि हैकाथन एक राष्ट्रव्यापी इनोवेशन और प्रॉब्लम-सॉल्विंग प्रतियोगिता है, जिसमें छात्रों को एक ऐसा मंच प्रदान किया जाता है, जहां वे विश्व की विभिन्न समस्याओं का तकनीक का इस्तेमाल कर सॉफ्टवेयर आधारित समाधान तैयार करते हैं।उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय स्तर पर आयोजित होने वाली हैकाथन प्रतियोगिता के माध्यम से छात्र इंडस्ट्री विशेषज्ञों और सरकार के साथ जुड़कर समस्याओं पर संवाद कर सकते हैं। इससे देश में इनोवेशन की संस्कृति का विकास होता है और विकसित भारत 2045 के लक्ष्य को पूरा करने में छात्रों की महत्वपूर्ण भूमिका हो सकती है।वहीं, कॉलेज की प्रो. इंचार्ज ईलानी पूर्ति ने कहा कि भारत की आर्थिक और सामाजिक प्रगति में छात्रों का योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण है। हैकाथन प्रतियोगिता छात्रों को ऐसा मंच प्रदान करती है, जहां वे टीमवर्क और क्रिएटिविटी के माध्यम से विभिन्न समस्याओं के सॉफ्टवेयर आधारित समाधान तैयार कर सकते हैं। युवा देश के प्रमुख मानव संसाधन हैं। प्रतियोगिता में BSC CA एवं IT विभाग केकॉर्डिनेटर डॉ वाई एन महतो , विभागध्यक्ष प्रो. रंजीत मिश्रा, प्रो. जय प्रकाश केशरी, प्रो. सुशील कुमार, प्रो. प्रियंका टोप्पो, प्रो. ज्योति चौधरी, प्रो. अभिजीत कुमार, प्रो संतोष कुमार, डॉ. प्रशांत गौरव सहित BSC CA एवं IT विभाग के सभी छात्र मौजूद थे। मंच संचालन इतिहास विभाग की अंबा श्री रमन ने किया, जबकि धन्यवाद ज्ञापन विभागध्यक्ष प्रो रंजीत मिश्रा ने किया। प्रतियोगिता में बिग बस्टर टीम को प्रथम स्थान प्राप्त हुआ वहीं कोड क्रॉफ्ट पैराडॉक्स को द्वितीय स्थान प्राप्त हुआ।
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इस गणेश चतुर्थी शुभकामनाओं को दें अनोखा और रचनात्मक अंदाज एबीएन नॉलेज डेस्क। गणेश चतुर्थी भारत में मनाये जाने वाली सबसे लोकप्रिय त्योहारों में से एक है। लोग पंडाल दर्शन, घरों की सजावट, आरती के यादगार क्षण, परिवार के साथ बिताये खास पल और त्योहार की शुभकामनाएं सोशल मीडिया के विभिन्न मंचों पर साझा कर रहे हैं। आज त्योहारों का उत्सव मनाना केवल प्रत्यक्ष रूप से अनुभव करने तक सीमित नहीं रह गया है। लोग इन खास पलों को डिजिटल रूप से कैप्चर करते हैं, रचनात्मक कंटेंट तैयार करते हैं और उसे दूसरों के साथ साझा करते हैं। कंपनी से जुड़े मोहम्मद मुमताज ने बताया कि ग्राहकों को सर्वोपरि रखने की अपनी सोच के तहत, एयरटेल केवल बेहतरीन नेटवर्क अनुभव उपलब्ध कराने तक सीमित नहीं है। कंपनी ऐसे डिजिटल लाभ भी मुहैया करा रही है, जो ग्राहकों को अपनों से जुड़े रहने, अपनी रचनात्मकता को अभिव्यक्ति देने और उन पलों को साझा करने में मदद करते हैं जो उनके लिए सबसे अधिक मायने रखते हैं। इस त्योहार के माहौल में एयरटेल ग्राहक एडोबी एक्सप्रेस प्रीमियम की मदद से सोशल मीडिया पर अपने जश्न को रचनात्मक अंदाज में साझा कर सकते हैं। जिन ग्राहकों ने अभी तक इस सुविधा का लाभ नहीं उठाया है, वे जनवरी 2027 तक एडोबी एक्सप्रेस प्रीमियम का एक्सेस एक्टिवेट कर सकते हैं। प्रीमियम टेम्पलेट्स, एआई-संचालित क्रिएटिव टूल्स, इमेजेज, फॉन्ट्स और डिजाइन एसेट्स की मदद से ग्राहक इंस्टाग्राम, फेसबुक, व्हाट्सएप और अन्य सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर साझा करने के लिए आकर्षक उत्सवी कंटेंट तेजी से तैयार कर सकते हैं, जो सोशल मीडिया पर उन्हें अलग नजर आने में मदद करता है। इस गणेश चतुर्थी पर ग्राहक आम फॉरवर्ड के बजाय पर्सनलाइज्ड त्योहार की शुभकामनाएं बनायें और ज्यादा अर्थपूर्ण बनायें। गणपति की सजावट, आरती सेलिब्रेशन और फैमिली मोमेंट्स दिखाने वाली इंस्टाग्राम स्टोरीज और रील्स डिजाइन करें। कम्युनिटी इवेंट्स, सोसाइटी सेलिब्रेशन और त्यौहार के समारोहों के लिए आकर्षक डिजिटल इनवाइट बनायें। क्रिएटिव एडिट्स, इफेक्ट्स और फेस्टिव थीम्स के साथ दर्शन के पलों को शेयर करने लायक पोस्ट में बदलें। गणपति स्थापना से लेकर विसर्जन तक के सफर को कैप्चर करते हुए हाइलाइट वीडियो और मेमोरी रील्स बनायें। जैसे-जैसे ग्राहक त्योहारों का जश्न मनाने और एक-दूसरे से जुड़े रहने के लिए सोशल मीडिया का अधिक उपयोग कर रहे हैं, एडोबी एक्सप्रेस प्रीमियम उन्हें ऐसा कंटेंट बनाने की सुविधा देता है, जो अधिक व्यक्तिगत और आकर्षक हो और उनके उत्सव मनाने के अनूठे अंदाज को दर्शायें।
राष्ट्रीय अंतरिक्ष दिवस 23 अगस्त कोचांद से आगे अंतरिक्ष की नई उड़ान विकसित भारत के संकल्प का प्रतीक : संजय सर्राफएबीएन नॉलेज डेस्क। हिंदी साहित्य भारती के उपाध्यक्ष सह झारखंड पेरेंट्स एसोसिएशन के प्रांतीय प्रवक्ता संजय सर्राफ ने कहा है कि भारत में राष्ट्रीय अंतरिक्ष दिवस प्रत्येक वर्ष 23 अगस्त को मनाया जाता है। यह दिन देश के अंतरिक्ष इतिहास की उस गौरवपूर्ण उपलब्धि की स्मृति में समर्पित है, जब 23 अगस्त 2023 को भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) के चंद्रयान-3 मिशन के विक्रम लैंडर ने चंद्रमा की सतह पर सफल सॉफ्ट लैंडिंग की और प्रज्ञान रोवर ने वहां वैज्ञानिक कार्य शुरू किया। इस ऐतिहासिक उपलब्धि के सम्मान में भारत सरकार ने 23 अगस्त को राष्ट्रीय अंतरिक्ष दिवस घोषित किया। चंद्रयान-3 की सफलता भारत के वैज्ञानिक सामर्थ्य, तकनीकी दक्षता, आत्मनिर्भरता और दृढ़ संकल्प का विश्वस्तरीय उदाहरण बनी। भारत चंद्रमा पर सफलतापूर्वक उतरने वाला दुनिया का चौथा देश बना और चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुवीय क्षेत्र के निकट पहुंचने वाला पहला देश बना। चंद्रयान-3 के लैंडिंग स्थल को शिव शक्ति प्वाइंट नाम दिया गया।राष्ट्रीय अंतरिक्ष दिवस का उद्देश्य केवल चंद्रयान-3 की सफलता का उत्सव मनाना नहीं, बल्कि देश की नई पीढ़ी में विज्ञान, तकनीक, अनुसंधान और नवाचार के प्रति रुचि पैदा करना भी है। इस अवसर पर विद्यार्थियों, शिक्षकों, शोधार्थियों और आम नागरिकों को अंतरिक्ष विज्ञान तथा उसके अनुप्रयोगों से परिचित कराने के लिए विभिन्न कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। इसका लक्ष्य युवाओं को अंतरिक्ष विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी को करियर के रूप में अपनाने तथा वैज्ञानिक सोच विकसित करने के लिए प्रेरित करना है।अंतरिक्ष तकनीक आज केवल रॉकेट और उपग्रहों तक सीमित नहीं है। मौसम की सटीक जानकारी, कृषि, संचार, नेविगेशन, आपदा प्रबंधन, जल संसाधनों की निगरानी, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे अनेक क्षेत्रों में उपग्रह तकनीक आम जनजीवन को लाभ पहुंचा रही है।इस प्रकार अंतरिक्ष कार्यक्रम देश के आर्थिक और सामाजिक विकास में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है।राष्ट्रीय अंतरिक्ष दिवस 2026 का विषय है-विकसित भारत की दिशा में नवाचार, सहयोग और वैश्विक अंतरिक्ष नेतृत्व की आकांक्षा। यह विषय भारत के अंतरिक्ष क्षेत्र को नई ऊंचाइयों तक ले जाने के साथ-साथ आत्मनिर्भर और विकसित भारत के निर्माण की दिशा में वैज्ञानिक प्रगति के महत्व को रेखांकित करता है। राष्ट्रीय अंतरिक्ष दिवस हमें यह संदेश देता है कि आकाश सीमा नहीं, बल्कि नई संभावनाओं का द्वार है। चंद्रयान-3 की सफलता ने देश के करोड़ों युवाओं में यह विश्वास जगाया है कि भारतीय प्रतिभा और परिश्रम के बल पर कोई भी लक्ष्य असंभव नहीं। आज भारत चंद्रमा से आगे सूर्य, मंगल और मानव अंतरिक्ष यात्रा जैसे महत्वाकांक्षी अभियानों की ओर बढ़ रहा है। ऐसे में राष्ट्रीय अंतरिक्ष दिवस वैज्ञानिक उपलब्धियों का उत्सव होने के साथ-साथ नवाचार, आत्मनिर्भरता और विकसित भारत के सपने को साकार करने का प्रेरणापर्व भी है।
जानें वार के अनुसार पंचक का फल और नाम एबीएन नॉलेज डेस्क। जब भी कोई शुभ कार्य किया जाता है, तो उसमें पंचक का विशेष ख्याल रखा जाता है। आखिर लोग पंचक को इतना अशुभ क्यों मानते हैं। आइये जानते हैं वार के अनुसार पंचक का क्या फल और नाम है। रविवार (रोग पंचक): इस दिन शुरू होने से शारीरिक कष्ट, रोग और मानसिक तनाव का डर रहता है। सोमवार (राज पंचक): इस दिन से शुरू होने वाला पंचक शुभ माना जाता है। इसमें सरकारी कार्य और संपत्ति से जुड़े काम पूरे होते हैं। मंगलवार (अग्नि पंचक): इस दिन आग लगने का भय, दुर्घटना या कोर्ट-कचहरी के विवादों में नुकसान की संभावना रहती है। बुधवार और गुरुवार: इन दोनों वारों से शुरू होने वाले पंचक में सामान्य नियम रहते हैं और विशेष कार्यों को छोड़कर बाकी काम किए जा सकते हैं। शुक्रवार (चोर पंचक): इस दिन से शुरू होने पर धन की हानि, व्यापार में घाटा या चोरी का खतरा रहता है। शनिवार (मृत्यु पंचक): इस दिन पंचक लगने से मृत्यु के समान कष्ट, बड़े हादसे या भारी नुकसान का योग बनता है। पंचक के दौरान क्या न करें लकड़ी या ईधन इकट्ठा करना: पंचक में लकड़ी खरीदना या घर में लाना मना है। निर्माण कार्य: घर की छत डलवाना या नई नींव रखना वर्जित माना गया है। यात्रा: दक्षिण दिशा की ओर यात्रा करना अशुभ माना जाता है।
अंतर्राष्ट्रीय चंद्रमा दिवस 20 कोमानव जिज्ञासा, विज्ञान और अंतरिक्ष अन्वेषण का उत्सव : संजय सर्राफएबीएन नॉलेज डेस्क। हिंदी साहित्य भारती के उपाध्यक्ष सह झारखंड पेरेंट्स एसोसिएशन के प्रांतीय प्रवक्ता संजय सर्राफ ने कहा है कि अंतर्राष्ट्रीय चंद्रमा दिवस प्रत्येक वर्ष 20 जुलाई को मनाया जाता है। क्योंकि इसी दिन वर्ष 1969 में मानव इतिहास की सबसे बड़ी वैज्ञानिक उपलब्धियों में से एक, अपोलो-11 मिशन के अंतर्गत अमेरिकी अंतरिक्ष यात्री नील आर्मस्ट्रांग और बज एल्ड्रिन ने पहली बार चंद्रमा की सतह पर कदम रखा था। यह घटना विज्ञान, तकनीक और मानव साहस की ऐतिहासिक विजय का प्रतीक मानी जाती है। अंतर्राष्ट्रीय चंद्रमा दिवस का मुख्य उद्देश्य चंद्रमा के वैज्ञानिक अध्ययन, शांतिपूर्ण उपयोग तथा अंतरिक्ष अनुसंधान के प्रति वैशिक सहयोग को बढ़ावा देना है। यह दिवस लोगों, विशेषकर युवाओं और विद्यार्थियों में विज्ञान, प्रौद्योगिकी, इंजीनियरिंग और गणित के प्रति रुचि जागृत करने का भी महत्वपूर्ण माध्यम है। साथ ही यह अंतरिक्ष अन्वेषण के क्षेत्र में भविष्य की संभावनाओं और मानवता के साझा प्रयासों को रेखांकित करता है। चंद्रमा पृथ्वी का एकमात्र प्राकृतिक उपग्रह है, जिसका पृथ्वी के पर्यावरण और जीवन पर गहरा प्रभाव पड़ता है। समुद्र में ज्वार-भाटा, पृथ्वी की धुरी की स्थिरता तथा कई प्राकृतिक प्रक्रियाएं चंद्रमा से प्रभावित होती हैं। प्राचीन काल से ही चंद्रमा मानव सभ्यता, संस्कृति, साहित्य, कला और धार्मिक परंपराओं का महत्वपूर्ण हिस्सा रहा है। आज आधुनिक विज्ञान चंद्रमा को भविष्य के अंतरिक्ष अभियानों, अनुसंधान केंद्रों तथा अन्य ग्रहों की यात्राओं के लिए आधार के रूप में देख रहा है। भारत के लिए भी यह दिवस अत्यंत गौरव का विषय हैभारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) ने चंद्रयान-1, चंद्रयान-2 तथा चंद्रयान-3 जैसे सफल अभियानों के माध्यम से विश्व अंतरिक्ष विज्ञान में अपनी विशिष्ट पहचान बनायी है। विशेष रूप से चंद्रयान-3 की सफलता ने भारत को चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव के निकट सफलतापूर्वक सॉफ्ट लैंडिंग करने वाला विश्व का पहला देश बनाया, जिसने भारतीय वैज्ञानिक क्षमता का लोहा पूरी दुनिया को मनवाया इस दिवस का संदेश है कि अंतरिक्ष किसी एक देश की संपत्ति नहीं, बल्कि समस्त मानवता की साझा धरोहर है। चंद्रमा का उपयोग केवल शांतिपूर्ण, वैज्ञानिक और मानव कल्याण के उद्देश्यों के लिए होना चाहिए। अंतर्राष्ट्रीय चंद्रमा दिवस हमें विज्ञान के प्रति जिज्ञासा, नवाचार, सहयोग और सतत विकास की भावना को मजबूत करने की प्रेरणा देता है। यह दिवस नयी पीढ़ी को बड़े सपने देखने, वैज्ञानिक सोच अपनाने और अंतरिक्ष विज्ञान के क्षेत्र में नये कीर्तिमान स्थापित करने के लिए प्रेरित करता है। मानवता के उज्ज्वल भविष्य की दिशा में चंद्रमा आज भी आशा, अनुसंधान और असीम संभावनाओं का प्रतीक बना हुआ है।
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