*विश्व हिंदू परिषद्,झारखंड*================प्रेस विज्ञप्ति =========*महाकुंभ विराट हिंदू समाज का पुनर्निर्माण –अम्बरीष जी*======================23 फरवरी 2025, रामगढ़: *विश्व हिंदू परिषद झारखंड प्रांत कार्य समिति बैठक प्रारंभ* तीन दिवसीय प्रांत बैठक मारवाड़ी धर्मशाला, रामगढ़ में 22 फरवरी से 24 फरवरी तक चलेगा। बैठक की अध्यक्षता चन्द्रकांत रायपत ने की। इस बैठक में विश्व हिंदू परिषद, बजरंग दल ,मातृशक्ति, दुर्गावाहिनी एवं विहिप के अन्य सभी आयाम के प्रान्त, ज़िला अधिकारी एवं कार्यकर्ता बैठक में शामिल हुए। इस बैठक की शुरुआत दीप प्रज्वलित, एकात्मता मंत्र, परिचय के साथ शुरू हुआ । बैठक के उद्बोधन भाषण में अम्बरीष जी ने कहा कि महाकुंभ मेला समरसता का महापर्व देखने को मिला इस महाकुंभ में विराट हिंदू समाज का पुनर्निर्माण हुआ है, हमलोग एक हैं इसलिए हमारी परंपरा एक हैं हमारे देवी देवता एक हैं, हम सब एक सम्मान हैं. जब जन्म के आधार पर कोई बड़ा हो गया जन्म के आधार पर कोई छोटा हो गया था इसलिए हम गुलाम हो गए थे. इस गुलामी में अपने बहुत सारे विचारों के लोग समाप्त हो गए। परंतु गंगा स्नान बंद नहीं हुआ, कुंभ मेला बंद नहीं हुआ, मंदिर बंद नहीं हुआ, हमारे कर्मकांड बंद नहीं हुए। श्री अम्बरीष जी ने कहा कि संत महंतों की यात्रा प्रारंभ रही, शक्ति पीठ यात्रा, चार धाम यात्रा चलता रहा जो लोग इस यात्रा में शामिल नहीं हो रहे हैं, धर्म को बचाने के लिए ये यात्रा बहुत जरूरी है आज बहुत से स्थान में धर्मांतरण हो रहे हैं समाज को फिर से छोटे छोटे टुकड़ों में फिर से बांटने का कार्य किया जा रहा है श्री सिंह धर्मांतरण, लव जिहाद, घुसपैठ, लैंड जिहाद पर चिंता व्यतीत किए। तीन दिवसीय इस बैठक में सभी जिला में विगत 6 माह में किए गए कार्यो की समीक्षा की जाएगी तथा अगामी होने वाले कार्यक्रम के सन्दर्भ में योजना बनाई जानी हैं l इस बैठक में अम्बरीष जी केंद्रीय मंत्री सह विशेष संपर्क प्रमुख, वीरेंद्र विमल पटना क्षेत्रीय मंत्री, बीरेंद्र साहू चंद्रकांत रायपत प्रांत अध्यक्ष,तिलक राज मंगलम प्रांत कार्यकारी अध्यक्ष,गंगा प्रसाद यादव प्रांत उपाध्यक्ष, राजेंद्र मुंडा प्रांत उपाध्यक्ष, मिथिलेश्वर मिश्र प्रांत मंत्री,देवी सिंह प्रांत संगठन मंत्री, मनोज पोद्दार प्रांत सह मंत्री, रंगनाथ महतो प्रांत संयोजक सह प्रान्त सहमंत्री,कृष्ण चैतन्य ब्रह्मचारी, मार्गदर्शक मंडल संयोजक, देवेन्द्र गुप्ता अर्चक पुरोहित प्रांत प्रमुख, प्रांत मनोज पांडे मंदिर अर्चक पुरोहित प्रांत सहप्रमुख, कमलेश सिंह प्रांत गौ रक्षा प्रमुख, दीपक ठाकुर प्रांत गौ रक्षा सहप्रमूख,प्रकाश रंजन प्रांत प्रचार प्रसार सहप्रमुख, संजय चौरसिया धर्म प्रसार ,सच्चिदानंद धर्म प्रसार सहप्रमूख , रंजन कुमार सिंह सत्संग सहप्रमूख, कीर्ति गौरव दुर्गा वाहिनी विभाग संयोजिका, रामनरेश सिंह एवं अन्य प्रांत, विभाग,जिला प्रखंड के दायित्व कार्यकर्ता मौजूद थे। उक्त जानकारी
99 वीं जयंती पर विशेष मृत्युंजय प्रसाद टीम एबीएन, रांची। छोटानागपुर विधि महाविद्यालय के प्रोफेसर एवं सिल्ली प्रखण्ड के प्रथम प्रमुख स्व. प्रो. विष्णु चरण महतो कानून के ज्ञाता के साथ ही उच्च विचार और सादगी के प्रतिमूर्ति थे। प्रो. महतो आजीवन गरीबों की सेवा एवं क्षेत्र के सर्वांगीण विकास के लिए कार्य किया। इसी का परिणाम है कि आज भी झारखण्ड खासकर रांची जिले, की जनता एक बुद्धिजीवी, समाज सुधारक, कुरमाली भाषा के अस्तित्व के रक्षक एवं न्यायप्रिय नेता के रूप में याद करती है। प्रो. विष्णु चरण महतो का जन्म सिल्ली प्रखण्ड के कांटाडीह गांव में 23 फरवरी 1926 को एक साधारण किसान परिवार में हुआ था। स्व. महतो बचपन से ही एक प्रतिभाशाली विद्यार्थी थे। उन्होंने रांची जिला स्कूल से मैट्रिक की परीक्षा पास की थी। इसके बाद उच्च शिक्षा के लिए वे पटना चले गये। उन्होंने आईए एवं बीए की पढ़ाई पटना विश्वविद्यालय से पूरी की थी। स्नातक के बाद एमए की पढ़ाई के लिए बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय में दाखिला लिया , लेकिन कानून के प्रति विशेष रूचि के कारण वह पटना विधि विश्वविद्यालय में नामांकन कराया और वहीं स्नातक विधि की परीक्षा पास की। इसके बाद पटना उच्च न्यायालय के कार्यालय में उनकी नियुक्ति हुई, लेकिन वकालत करने के उद्देश्य से वह रांची वापस आ गये। रांची में वह पुरुलिया रोड स्थित अपने निजी मकान में रहते थे। यहीं रहकर वह वकालत करने के साथ ही छोटानागपुर विधि महाविद्यालय में अध्यापन का भी कार्य करते थे।स्व. महतो झारखण्ड आन्दोलन में भी बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया था। मारांग गोमके जयपाल सिंह के आह्वान पर न सिर्फ आंदोलन में कूद पड़े बल्कि उस आंदोलन में बढ़-चढ़ कर मारांग गोमके के साथ कंधे से कंधा मिलाकर भाग लिया। स्व. महतो ने सिल्ली विधानसभा क्षेत्र से झारखण्ड पार्टी के टिकट पर 1952 एवं 1957 में चुनाव लड़ा। दोनों ही बार उन्होंने कांग्रेस के उम्मीदवार को जबरदस्त टक्कर दी, लेकिन दोनों ही बार मामूली वोट के अन्तर से हार गये। स्व. महतो के लिए चुनाव हारना कोई मायने नहीं रखता था। चुनाव हारने के बाद भी उनके चेहरे पर हमेशा योद्धाभाव झलकता रहता था। स्व. महतो शिक्षा के विकास पर बहुत जोर देते थे। उनका मानना था कि शिक्षा के विकास के बिना समाज का विकास नहीं हो सकता है। उनके सम्पर्क में जो भी लोग आते थे उनसे वह अक्सर कहा करते थे सूखी रोटी खाओ, माड़-भात खाओ, लाल चाय पियो, लेकिन अपने बच्चों को अधिक से अधिक शिक्षा देने का कार्य करो। नारी शिक्षा पर भी वह विशेष रूप से जोर देते थे। उनका मानना था कि इससे स्त्रियों में आत्म विश्वास बढ़ेगा, स्वावलंबी बनेंगी तथा अपने पैरों पर खड़ा होकर घर-परिवार का कायाकल्प करेंगी। स्व. महतो ने सिल्ली प्रखण्ड प्रमुख रहते हुए कई कार्य किए। सिंगपुर से अपने गांव कांटाडीह तक श्रमदान से सड़क बनवायी, गांव में बिजली पहुंचायी। किसानों के लिए लिफ्ट एरिगेशन के तहत सिंचाई की सुविधा भी उपलब्ध करवायी। स्व. महतो ने तत्कालीन जिला बोर्ड के उपाध्यक्ष पॉल दयाल के सहयोग से सिल्ली क्षेत्र के सैकड़ों बेरोजगार युवकों को शिक्षक की नौकरी दिलायी थी। इसके साथ ही सिंगपुर (मुरी) में भारत माता अस्पताल के निर्माण के लिए अपनी जमीन दान में दी थी। स्व. महतो कुरमाली भाषा के विकास लिए भी जीवन पर्यन्त कार्य करते रहे। वह हमेशा कुरमाली भाषा की चिंता करने वाले नवयुवकों से घिरे रहते थे। उनके प्रोत्साहन एवं मार्गदर्शन के कारण ही कई लोगों ने कुरमाली लोक-साहित्य एवं लोक परंपराओं पर शोध कर पीएचडी की उपाधि ली, लेकिन वह इतने से संतुष्ट नहीं थे, उनकी इच्छा थी कि कुरमाली का एक शोध केन्द्र हो। स्व. महतो ने कुरमी जाति को पुन: अनुसूचित जनजाति की सूची में शामिल कराने के लिए भी जीवन पर्यन्त संघर्ष किया। उन्होंने रांची विश्वविद्यालय में कुरमाली भाषा की पढ़ाई शुरू कराने में भी अहम भूमिका निभायी थी। स्व. महतो क्षेत्र के युवकों की सफलता पर काफी हर्षित होते थे और उनका सही मार्गदर्शन किया करते थे। एक बार की बात है सिल्ली के जबला ग्राम निवासी नन्दलाल महतो बिहार लोक सेवा आयोग द्वारा आयोजित 27वीं संयुक्त परीक्षा में उपसमाहर्ता के पद पर अंतिम चयन होने पर विष्णु बाबू से मिलने गये। उन्होंने नंदलाल महतो को देखकर गदगद स्वर में कहा क्या समाचार है, नंदलाल जी? नंदलाल ने बड़ी विनम्र स्वर में कहा- सर बिहार लोकसेवा आयोग द्वारा आयोजित 27वीं संयुक्त प्रतियोगिता परीक्षा में मेरा अंतिम चयन उपसमाहर्ता के पद पर हुआ है। नंदलाल ने आगे कहा-सर, आपको तो मालूम ही है मैं यूनाइटेड बैंक आफ इण्डिया में हेड कैशियर के पद पर कार्यरत हूं और इसी वर्ष मेरी प्रोन्नति भी होने वाली है। विष्णु बाबू उठ खड़े हुए और नंदलाल महतो से कहा यू आर द सेकेण्ड कुरमी आफ छोटानागपुर रीजन आफ्टर ठाकुर दास महतो हू वाज द कलक्टर एण्ड डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट आफ पूर्णिया। उन्हीं की सलाह पर नंदलाल ने बैंक की नौकरी छोड़कर बिहार प्रशासनिक सेवा के उपसमाहर्ता संवर्ग में योगदान किया था। उसी तरह सन 1955 में जब सोनाहातू के पाण्डू?डीह निवासी डा. हलधर महतो मैट्रिक की परीक्षा में उत्तीर्ण हुए और रांची कालेज में नामांकन हेतु आवेदन देने में देर होने लगी तो विष्णु बाबू ने हलधर महतो को एक पत्र भेजा। पत्र में लिखा था- हलधर तुम पत्र पाते के साथ रांची चले आओ और मुझसे भेंट करो। मैं जानता हूं कि तुम एक गरीब किसान के पुत्र हो, हमलोग चंदा करेंगे फिर भी तुम्हें आगे पढ़ायेंगे। तुम एक मेधावी छात्र हो। अत: तुम अपने मस्तिष्क रूपी सुमन की कली को मुरझाने मत दो। ऐसे ओजस्वी महान विभूति का स्वर्गवास दीपावली के दिन एक नवंबर 1986 को एचईसी प्लांट अस्पताल में हो गया। दीपावली के दिन जहां दीप जलने थे, लेकिन विष्णु बाबू जैसा दीपक सदा के लिए बुझ गया। आज कुरमाली भाषा परिषद और बाईसी कुटुम जैसी संस्था उनके विचारों पर चलकर उनके अधूरे सपनों को साकार करने में लगा हुआ है।
टीम एबीएन, रांची। श्री श्याम मंडल, रांची का तीन दिवसीय विराट फाल्गुन सतरंगी महोत्सव दिनांक 9 से 11 मार्च तक अत्यंत श्रद्धा एवं धूमधाम से आयोजित किया जायेगा। सभी कार्यक्रम अग्रसेन पथ स्थित श्री श्याम मंदिर में आयोजित होंगे। महोत्सव की तैयारी को अंतिम रूपरेखा देने हेतु मंडल के सदस्यगण पूर्ण समर्पण भाव से कार्य कर रहे हैं। इसको लेकर पूरे मंदिर की साफ-सफाई के पश्चात आकर्षक ढंग से सुसज्जित किया जा रहा है। 9 मार्च को अपराह्न 3 बजे श्री लक्ष्मीनारायण मंदिर (सेवा सदन हॉस्पिटल के निकट) से विधि विधान से निशान (ध्वजा) यात्रा प्रारंभ जो नगर के प्रमुख मार्गों का भ्रमण करते हुए अग्रसेन पथ स्थित श्री श्याम मंदिर पहुंचेगी। निशान यात्रा में दिव्य रथ पर विराजमान श्री श्याम प्रभु नगर वासियों को आशीष प्रदान करेंगे। साथ ही इस अवसर पर मुख्य तौर पर 700 नर-नारी अपने कंधों पर श्री श्याम नाम रूपी निशान लहराते हुए चलेंगे। साथ ही भजन गायक की टोली संपूर्ण मार्ग में भजनों की अमृत वर्षा करेंगे। इस अवसर पर भक्तजनों के लिए संपूर्ण मार्ग में प्रसाद वितरण की व्यवस्था रहेगी। 10 मार्च को रात्रि 9 बजे से मंदिर में मुख्य कार्यक्रम प्रारंभ होगा। श्री श्याम मंडल रांची द्वारा प्रकाशित भजन पुस्तिका 21वें बसंत उत्सव का विमोचन किया जायेगा। इस 3 दिवसीय फाल्गुन सतरंगी मोहत्सव के द्वितीय दिवस पर श्री श्याम प्रभु का भव्य एवं नयनाभिराम श्रृंगार, अखंड ज्योत, छप्पन भोग, सवामणि प्रसाद, संगीतमय संकीर्तन व श्री श्याम प्रभु के साथ केसरिया होली का आयोजन होगा। कार्यक्रम रात्रि 9 बजे से सुबह 4 बजे तक आयोजित है। दिनांक 11 मार्च को श्री श्याम प्रभु का द्वादशी दर्शन, 251 सवामणि भोग, अखंड ज्योत व द्वादशी पूजन आयोजित होगा। इस अवसर पर मंदिर के पट विशेष रूप से संपूर्ण दिवस खुले रहेंगे व संपूर्ण दिवस श्री श्याम प्रभु का प्रिय खीर चूरमा का प्रसाद वितरण किया जायेगा। नोट : फाल्गुन एकादशी दिनांक 24 फरवरी 2025 को खाटू धाम जाने वाले पवित्र निशान पूजन कर मंदिर में दिनांक 27 फरवरी प्रात: 11 बजे तक स्थापित रहेंगे। उक्त जानकारी श्री श्याम मंडल श्री श्याम मंदिर, अग्रसेन पथ रांची के मीडिया प्रभारी सुमित पोद्दार (9835331112) ने दी।
अनाथ से सनाथ हो गयी लोहरदगा की सड़कों पर घूमती मिली मुन्नी टीम एबीएन, रांची। लोहरदगा की रहने वाली एक जनजातीय महिला मुन्नी गुरकी जो असन्तुलित मानसिक अवस्था में 21 वर्ष पूर्व (वर्ष 2004) में लोहरदगा की सड़कों पर घूमती हुई मिली थी। उसको वाहन से उठाकर रांची स्थित निर्मल हृदय आश्रम में लाकर रखा गया और उसका मानसिक इलाज करवाया गया। चार वर्ष पूर्व वह स्तान कैंसर से पीड़ित हो गयी, निरंतर आश्रम में उसकी चिकित्सा हुई। अन्तत: कैंसर से उसका निधन हो गया। विश्व हिंदू परिषद सेवा विभाग के प्रवक्ता संजय सर्राफ ने बताया कि उनकी आयु 68 वर्ष थी और उसका घरवालों से कोई सम्पर्क नहीं रहा था, उसके नाते रिश्तेदारों का भी कोई अता पता नहीं था। उसके शवदाह के लिए विश्व हिंदू परिषद सेवा विभाग की ओर से रांची लायंस क्लब रांची की अनाथ दिव्यांग लोगों के प्रति संवेदनशीलता को देखते हुए अध्यक्ष अरुण कुमार सिंह से आग्रह करने पर क्लब के सभी सदस्य इस मानवीय सेवा हेतु मुन्नी गुरकी के दाह संस्कार के लिए तैयार हो गए। स्वर्गीय मुन्नी गुरकी के पार्थिव देह को पूरे सम्मान के साथ हरमू स्थित मुक्ति धाम लाया गया। चिता को जनजातिय समाज के विजय मिंज उनके दोनों पुत्र आशीष मिंज और अभय मिंज ने तैयार किया। पार्थिव देह को पंचतत्व में विलीन करने के लिए विधिवत वैदिक रीति से सभी संस्कार मुक्ति धाम हरमूघाट रांची पर किये गये। इस अवसर पर लाइंस क्लब के सदस्य प्रोफेसर हरविंदर सिंह वीर जी ने सिख परंपरा के अनुसार अरदास की और मुन्नी गुरकी की आत्मा की शांति के लिए सभी उपस्थित लोगों ने प्रार्थना की। संतोष अग्रवाल ने नम आंखो से मुन्नी गुरकी को मुखाग्नि दी। सेवा विभाग के प्रांतीय सह सेवा प्रमुख अशोक कुमार अग्रवाल ने बताया कि अब से 14 वर्ष पूर्व संतोष अग्रवाल की माता का अयोध्या नगर (उ.प्र.) में अकेले रहते हुए देहांत हो गया था, उस समय उनके परिवार का कोई भी सदस्य उनके साथ नहीं था, यह पीड़ा आज भी उनके मन में है, अत: उन्होने निर्णय लिया कि जब भी किसी अनाथ की मृत्यु होगी वह उसके दाह संस्कार में आगे बढ़कर मुखाग्नि की सेवा देंगे। सेवा विभाग, विश्व हिंदू परिषद झारखंड के सह प्रांत प्रमुख अशोक कुमार अग्रवाल ने बताया की सेवा विभाग की ओर से अभी तक पिछले 11 वर्षों में लगभग एक हजार से अधिक अनाथ, निराश्रित, एकाकी लोगों का दाह संस्कार किया गया है। इस मर्मस्पर्शी मानवीय कार्य में रांची नगर के लोगों के लोगों ने और समाजिक संस्थाओं ने बढ़ चढ़कर सहयोग किया है ताकि हिंदू समाज के किसी भी मृत व्यक्ति के शव को लावारिस न कहा जाये। स्वर्गीय मुन्नी गुरकी को अंतिम विदाई देने के लिए लायंस क्लब आफ रांची के अध्यक्ष अरुण कुमार सिंह, लायन राजेश चौधरी, लायन हरविंदर सिंह वीर, लायन जसवीर खुराना, लाइन सुबोध वर्मा और क्लब के बहुत से सदस्य, विश्व हिंदू परिषद रांची महानगर के अध्यक्ष कैलाश केसरी, के प्रांतिय उपाध्यक्ष राजेंद्र सिंह मुंडा, ग्राम काटम कुल्ली पिठूरिया से मनोज मुंडा, कांके से जितेंद्र महतो, कांके से बहुत से जनजातिय समाज के लोग, सृजन हेल्प परिवार रांची के संजय कुमार, नारनौलीय अग्रवाल सभा से राजेश अग्रवाल और उनके कई मित्र, अपर बाजार से कृष्ण कुमार गाड़ोदिया, राधेश्याम शर्मा, कांके रोड से ओम प्रकाश सर्राफ वा मारवाडी समाज के बहुत से लोगों ने मृतक की आत्मा की शान्ति के लिए विनम्र भाव से श्रद्धांजली दी। उक्त जानकारी विश्व हिन्दू परिषद् झारखंड के प्रांत सह सेवा प्रमुख अशोक कुमार अग्रवाल (8862823043, 8789300579) और प्रवक्ता सेवा विभाग संजय सर्राफ ने दी।
सरकारों, नीति-निमार्ताओं, गैरसरकारी संगठनों के प्रतिनिधियों सहित नौ दक्षिण एशियाई देशों के हितधारकों ने ह्यूमन ट्रैफिकिंग के खिलाफ सुरक्षित प्रवासन को बढ़ावा संगोष्ठी में लिया हिस्सा इस दक्षिण एशियाई संगोष्ठी का आयोजन एसोसिएशन फॉर वॉलंटरी एक्शन ने किया, जिसमें जस्ट राइट्स फॉर चिल्ड्रन तकनीकी भागीदार के रूप में शामिल रहा मादक पदार्थों और हथियारों की तस्करी के बाद 32 बिलियन अमेरिकी डॉलर की अवैध कमाई के साथ मानव दुर्व्यापार दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा संगठित अपराध है जस्ट राइट्स फॉर चिल्ड्रन बाल अधिकारों और बाल संरक्षण के लिए दुनिया के 39 देशों में कार्यरत नागरिक संगठनों का वैश्विक नेटवर्क है एबीएन सोशल डेस्क। मौजूदा समय में दुनिया भर में जारी असुरक्षित प्रवासन के संकट के मद्देनजर नई दिल्ली में नौ दक्षिण एशियाई देशों की सरकारों, नीति-निमार्ताओं, कानून प्रवर्तन एजेंसियों, संयुक्त राष्ट्र और नागरिक समाज संगठनों के प्रतिनिधियों ने ह्यूमन ट्रैफिकिंग (मानव दुव्यार्पार) के खिलाफ सुरक्षित प्रवासन को प्रोत्साहन के लिए दक्षिण एशियाई संगोष्ठी में शिरकत की। एसोसिएशन फॉर वालंटरी एक्शन की पहल पर इस एकदिवसीय संगोष्ठी में समग्र, अधिकार-आधारित रणनीति को अपनाने की आवश्यकता पर जोर दिया गया, जिससे कि पूरे क्षेत्र में प्रवासन नीतियों का समन्वय किया जा सके और अंतरराष्ट्रीय एवं क्षेत्रीय मानकों के अनुरूप कानूनी और नीतिगत सुधार किये जा सकें। इस संगोष्ठी में भारत के अलावा बांग्लादेश, नेपाल, पाकिस्तान और अफगानिस्तान के ट्रैफिकिंग के पीड़ित भी मौजूद थे जिन्होंने अपनी पीड़ा और अनुभव साझा करते हुए इसकी रोकथाम के लिए सुझाव दिये। बाल अधिकारों और बाल संरक्षण के लिए दुनिया के 39 देशों में कार्यरत संगठनों का वैश्विक नेटवर्क जस्ट राइट्स फॉर चिल्ड्रन इस परामर्श का तकनीकी सहयोगी था। ट्रैफिकिंग के खिलाफ तत्काल एक बहुआयामी रणनीति की आवश्यकता पर जोर देते हुए जस्ट राइट्स फॉर चिल्ड्रन के संस्थापक भुवन ऋभु ने कहा, मानव दुर्व्यापार भारी मुनाफे वाला एक संगठित अपराध है, जो विशेष रूप से बच्चों और मजबूर युवाओं के शोषण के सहारे फल-फूल रहा है। इससे निपटने के लिए हमें बहु-आयामी रणनीति अपनाने की आवश्यकता है जिसमें ट्रैफिकिंग के आर्थिक ढांचे को नेस्तनाबूद करना, संगठित आपराधिक गिरोहों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई से उनकी कमर तोड़ना और ट्रैफिकिंग गिरोहों के बारे में सूचनाओं के आदान-प्रदान के लिए वैश्विक रजिस्टर रखना और इसके माध्यम से स्थानीय, राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर खुफिया समन्वय को मजबूत करने जैसे कदमों की जरूरत है।हाल ही में बेड़ियों में डाल कर भारत भेजे गए और इसी हालात में फंसे अन्य लोगों में पसरे डर पर चिंता जाहिर करते हुए उन्होंने कहा कि यह भयावह वास्तविकता इस संगठित अपराध के खिलाफ वैश्विक प्रतिक्रिया की तात्कालिक आवश्यकता को दर्शाती है। उन्होंने कहा, मैं भारत, अमेरिका और अन्य सरकारों से अपील करता हूं कि वे इन ट्रैफिकिंग गिरोहों के खिलाफ राष्ट्रीय स्तर पर कठोर कार्रवाई शुरू करें। ट्रैफिकिंग के इस नेटवर्क को खत्म करने के लिए भारत, अमेरिका और उन सभी देशों के बीच जहां से ये गिरोह पीड़ितों को लेकर जाते हैं, के बीच समन्वित प्रयास आवश्यक है। हमें पीड़ितों से मिली जानकारी का विश्लेषण करना होगा, वित्तीय लेन-देन का पता लगाना होगा और इस अपराध को बढ़ावा देने वाले गिरोहों को ध्वस्त करना होगा, ताकि शोषण के इस दुष्चक्र को तोड़ा जा सके। ऋभु ने इस सत्य को रेखांकित किया कि प्रवासन मानव स्वभाव की बुनियादी प्रवृत्ति है जो विकास, अवसरों और प्रगति की तलाश से जुड़ी है। हालांकि, जब इसमें शोषण, जबरन नियंत्रण और धोखाधड़ी जुड़ जाती है, तो प्रवासन मानव दुर्व्यापार में बदल जाता है।संगोष्ठी को संबोधित करते हुए राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (एनएचआरसी) के सदस्य और राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग (एनसीपीसीआर) के पूर्व अध्यक्ष प्रियंक कानूनगो ने कहा, जागरूकता एक महत्वपूर्ण पहलू है, जिस पर ध्यान देना जरूरी है। सबसे पहले पीड़ितों को यह समझना होगा कि उनका शोषण हो रहा है और उन्हें अपने अधिकारों के लिए खड़ा होना होगा। अक्सर वे अपने साथ हो रही नाइंसाफियों से अनजान रहते हैं। जागरूकता को देश के आखिरी व्यक्ति तक पहुंचाना होगा, ताकि सबसे कमजोर तबकों की आवाज सुनी जा सके, उन्हें सुरक्षा मिले और उनका सशक्तीकरण हो सके। वैश्विक समझौते (ग्लोबल कॉम्पैक्ट), सुरक्षित, सुव्यवस्थित और नियमित प्रवासन (जीसीएम) तथा दक्षिण एशिया में कोलंबो प्रक्रिया के कार्यान्वयन की प्रगति और चुनौतियां सत्र को संबोधित करते हुए माइग्रेंट फोरम इन एशिया (दक्षिण एशिया) की कार्यकारी समिति की सदस्य बिजया कुमारी श्रेष्ठ ने नेपाल सरकार से श्रमिक गंतव्यों की संख्या 110 से बढ़ाकर 160 करने का आग्रह किया। उन्होंने बताया कि उनके फोरम ने 50 और देशों की पहचान की है जहां नेपाली युवा काम की तलाश में जा रहे हैं और जहां उनके शोषण की संभावनाएं हो सकती हैं। अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन के डीसेंट वर्क टेक्निकल सपोर्ट टीम (डीडब्ल्यूटी) के दक्षिण एशिया विशेषज्ञ इंसाफ निजाम ने जोर देकर कहा कि प्रवासन को रोकने के लिए कार्यस्थल पर गरिमा और मानवाधिकारों की सुरक्षा सुनिश्चित करना आवश्यक है। संयुक्त राष्ट्र के मादक पदार्थ एवं अपराध कार्यालय (यूएनओडीसी) की दीपिका नरुका ने बताया कि ट्रैफिकिंग इन पर्सन 2024 रिपोर्ट के अनुसार बंधुआ मजदूरी कराने के मकसद से ह्यूमन ट्रैफिकिंग में इजाफा हो रहा है लेकिन इन मामलों में दोषसिद्धि नगण्य है। नेपाल के लुंबिनी प्रांत के पूर्व मुख्यमंत्री दिल्ली बहादुर चौधरी ने कहा कि सुरक्षित प्रवासन सुनिश्चित करने के लिए नागरिक समाज संगठनों, सरकार और निजी संस्थानों को एक साथ आना चाहिए। मलेशिया स्थित अवर जर्नी की निदेशक सुमिता शांतिन्नि किशना ने ह्यूमन ट्रैफिकिंग की चुनौती से निपटने के लिए बाल-केंद्रित नीतियों की अहमियत को रेखांकित किया। श्रीलंका के विदेश मंत्रालय के अतिरिक्त सचिव डॉ एमएमएसएसबी यालेगामा और नेपाल के मानवाधिकार एवं अंतरराष्ट्रीय संधि समझौता प्रभाग के संयुक्त सचिव राजेंद्र थापा ने जोर दिया कि मानव दुव्यार्पार से निपटने के लिए क्षेत्रीय स्तर पर मजबूत प्रतिबद्धता और विभिन्न हितधारकों के बीच समन्वय की आवश्यकता है।एसोसिएशन फॉर वॉलंटरी एक्शन के कार्यकारी निदेशक धनंजय टिंगल ने कहा प्रवासन से सबसे अधिक प्रभावित बच्चे होते हैं। काम की तलाश में चाहे उनके माता-पिता नयी जगह चले जायें और वे पीछे छूट जायें, या उन्हें साथ ले जायें— हर स्थिति में सबसे ज्यादा परेशानी उन्हें ही होती है क्योंकि इससे उनकी देखभाल पर असर पड़ता है। उन्होंने कहा, आने जाने की समस्या के अलावा ऐसी स्थिति में कमजोर परिवारों के बच्चों का भविष्य अनिश्चित हो जाता है। इसके अलावा यह समझना जरूरी है कि ट्रैफिकिंग गिरोहों के नेटवर्क स्रोत (सोर्स) से लेकर पारगमन (ट्रांजिट) और गंतव्य तक, हर स्तर पर सक्रिय रहते हैं। कानून प्रवर्तन एजेंसियों, सामुदायिक जागरूकता और ठोस कार्रवाई के बीच समन्वय से ही हम सुनिश्चित कर सकते हैं कि प्रवासन सुरक्षित हो और स्वैच्छिक हो।संगोष्ठी मुख्य रूप से जीसीएम के कुछ प्रमुख उद्देश्यों पर केंद्रित थी जैसे कि प्रवासन की असुरक्षा, अंतरराष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य में ह्यूमन ट्रैफिकिंग की रोकथाम और नियंत्रण, प्रवासियों के लिए बुनियादी सेवाओं की उपलब्धता, तथा प्रवासियों एवं समाज को समावेश और सामाजिक सामंजस्य के लिए सशक्त बनाना। जीसीएम पहला अंतर-सरकारी समझौता है जो अंतरराष्ट्रीय प्रवासन को समग्र और व्यापक रूप से कवर करता है।दक्षिण एशिया क्षेत्र में सुरक्षित प्रवासन सुनिश्चित करने के लिए संगोष्ठी में कुछ सिफारिशें भी पेश की गईं। इनमें सरकारों, नागरिक समाज संगठनों और प्रवासन-संबंधी अंतरराष्ट्रीय निकायों के बीच मजबूत समन्वय और साझेदारी को बढ़ावा, शिक्षा और जागरूकता के उपायों जैसे कि सामुदायिक निगरानी प्रणाली, इन मुद्दों को स्कूल पाठ्यक्रम में शामिल करना, और जोखिम में रह रहे प्रवासियों के क्षमता निर्माण के अलावा प्रौद्योगिकी का उपयोग, जिसमें डिजिटल उपकरण, कृत्रिम बुद्धिमत्ता और डिजिटल पहचान प्रणाली शामिल हैं।इस संगोष्ठी में भारतीय पुलिस फाउंडेशन के अध्यक्ष ओ.पी. सिंह, नेपाल के मानवाधिकार एवं अंतरराष्ट्रीय संधि समझौता प्रभाग के संयुक्त सचिव राजेंद्र थापा, श्रीलंका के विदेश मंत्रालय के अतिरिक्त सचिव डॉ एमएमएसएसबी यालेगामा, श्रीलंका के इंस्टीट्यूट आॅफ पालिसी रिसर्च के माइग्रेशन एंड पालिसी रिसर्च की प्रमुख डॉ बिलेशा वीरारत्ने, भारत सरकार के श्रम एवं रोजगार मंत्रालय के सलाहकार ओंकार शर्मा और महाराष्ट्र पुलिस की विशेष पुलिस महानिरीक्षक अश्वती दोरजे भी शामिल थीं।
पीड़ित मानव सेवा के पावन तीर्थ रांची के सद्गुरु कृपा अपना घर आश्रम में भोजन का वितरण एबीएन सोशल डेस्क। परमहंस डॉ संत शिरोमणि श्री श्री 108 स्वामी सदानंद महाराज के सानिध्य में श्री कृष्ण प्रणामी सेवा धाम ट्रस्ट के तत्वावधान में विगत 1 वर्ष से चल रहे पीड़ित मानव सेवा के पावन तीर्थस्थल मंगल राधिका सदानंद सेवाधाम पुंदाग के प्रांगण में सद्गुरु कृपा अपना घर आश्रम (सत्य-प्रेम सभागार) रांची में आज मंगलवार 18 फरवरी को समाज के धर्मप्रेमी श्रद्धालुओं एवं एमआरएस श्री कृष्ण प्रणामी सेवा धाम ट्रस्ट के पदाधिकारी गण एवं ट्रस्ट के सदस्यों के सौजन्य से आश्रम में रह रहे 37 मंदबुद्धि दिव्यांग निराश्रित प्रभु जी एवं आश्रम में रहकर उनकी सेवा करने वाले सेवादार साथियों के बीच अन्नपूर्णा सेवा भोजन प्रसादी का विधिवत आश्रम के किचन में भोजन बनवाकर भोजन खिलाया गया। अपना घर आश्रम के प्रवक्ता संजय सर्राफ ने बताया कि 6 फरवरी से 17 फरवरी तक 12 दिनों में लगभग 2540 निराश्रित प्रभुजी एवं उनकी देखभाल करने वाले सेवादार साथियों के बीच अन्नपूर्णा सेवा भोजन प्रसाद का वितरण किया गया। इस पुनीत कार्य को रिशी टॉक, राकेश कुमार, नरेश डालमिया, निर्मल अग्रवाल, दिनेश कुंवर, आलोक कुमार, प्रमोद प्रसाद, अशोक नारसरिया, अशोक अग्रवाल, सरिता केजरीवाल, अशोक कुमार के सौजन्य से सभी निराश्रित प्रभुजी को भोजन प्रसादी खिलाकर सेवा की गयी। सभी ने ट्रस्ट के सदस्यों को बहुत बहुत धन्यवाद एवं अपना अमूल्य आशीर्वाद दिया। अन्नपूर्णा सेवा के पुनीत कार्य में ट्रस्ट के अध्यक्ष डुंगरमल अग्रवाल, उपाध्यक्ष निर्मल जालान, राजेन्द्र प्रसाद अग्रवाल सचिव मनोज कुमार चौधरी संस्था के वरिष्ठ सदस्य पुर्णमल सर्राफ, चिरंजीलाल खण्डेलवाल, सुरेश अग्रवाल, सज्जन पाड़िया, नन्द किशोर चौधरी, संजय सर्राफ, विशाल जालान, पवन कुमार पोद्दार सहित अन्य सदस्यगण उपस्थित थे। उक्त जानकारी सद्गुरु कृपा अपना घर आश्रम के प्रवक्ता सह मीडिया प्रभारी संजय सर्राफ ने दी।
20-25 साल के युवा बड़ी संख्या में महाकुंभ पहुंचे 20-25 साल के युवा भी बड़ी संख्या में इस बार प्रयागराज में जारी महाकुंभ में पहुंचे, गूगल व सोशल मीडिया पर भी महाकुंभ संबंधी कंटेंट की खोज की। संगम के जल में पवित्र डुबकी लगाने के बाद अपनी धार्मिक जिज्ञासाएं जाहिर करते नजर आये। तो क्या इसे युवा आध्यात्मिकता का एक नया ट्रेंड कहा जाये? यह भी कि नयी पीढ़ी के लिए धार्मिकता और आध्यात्मिकता जैसी धारणाओं के मायने क्या हैं? कहीं यह मात्र रील-प्रेरित सतही आध्यात्मिकता तो नहीं डॉ संजय वर्मा एबीएन एडिटोरियल डेस्क। अध्येताओं ने किशोर और युवावस्था के दौर की व्याख्या इस रूप में की है कि यह उम्र तीव्र वैचारिक भूख, जीवन के अर्थ व उद्देश्य की खोज और रिश्तों से जुड़ाव की इच्छा की होती है। इस उम्र में वह मानसिक द्वंद्व भी नजर आता है, जिसमें वे यह फैसला नहीं कर पाते हैं कि कोई विचार उनके जीवन के विकास और दिशा को किस प्रकार प्रभावित कर सकता है। अटकाव और भटकाव के इस दौर में अक्सर ये किशोर और युवा वहां पहुंचने की कोशिश करते हैं जहां उन्हें अपने अंदर उठ रहे सवालों के जवाब मिल सकें। यह अकारण नहीं है कि इस बार प्रयागराज महाकुंभ 2025 में जुटे करोड़ों श्रद्धालुओं में एक बड़ी संख्या उन युवाओं की रही- जिन्हें जेनरेशन जेड कहा जाता है। जेनरेशन जेड में वे लोग आते हैं, जिनका जन्म 1990 और 2010 के बीच हुआ है। इनमें से ज्यादातर छात्र हैं या कुछ ऐसे हैं जिन्होंने कुछ साल पहले कोई नौकरी या कारोबार शुरू किया है। इस पीढ़ी के युवाओं की एक पहचान और है। इसी पीढ़ी ने अपने जवान होने की उम्र में फेसबुक, इंस्टाग्राम और व्हाट्सएप को पैदा होते और इन सोशल मीडिया मंचों को जवान होते हुए देखा है। इस पीढ़ी का महाकुंभ से जुड़ाव इस रूप में भी देखा जा सकता है कि इन युवाओं ने प्रयाग में डुबकी लगाने से पहले गूगल पर महाकुंभ के बारे में सर्च किया। इंस्टाग्राम पर आईआईटियन बाबा और चेहरे-मोहरे की सुंदरता के बल पर वायरल हुई युवती मोनालिसा को देखकर जिज्ञासावश जमघट लगाया। पर क्या उनकी इस जिज्ञासा और संशय की स्थिति को कहीं से भी उस युवा आध्यात्मिकता से जोड़ा जा सकता है- जिसकी इन दिनों महाकुंभ के प्रयोजन से चर्चा छिड़ी हुई है। तीर्थाटन में बढ़ी रुचि के मायने यात्राओं और होटल आदि की बुकिंग करने वाली वेबसाइट एलएक्सआईगो के आंकड़ों को सही मानें तो इस बार महाकुंभ में 20-25 साल के युवाओं की तादाद 45 या इससे ज्यादा की उम्र वालों की तुलना में काफी ज्यादा रही। बीते एक साल में धार्मिक स्थलों की यात्रा संबंधी बुकिंग में 150 फीसदी इजाफा हुआ है। शायद इसी बदलाव का असर है कि प्रयागराज के साथ-साथ काशी और अयोध्या पहुंचने वाले श्रद्धालुओं की भीड़ में उन युवाओं की भागीदारी ज्यादा दिखी जो शायद पहली बार इस तरह की धार्मिक-आध्यात्मिक यात्रा पर निकले हैं। लेकिन क्या उनकी इस यात्रा को आध्यात्मिकता की खोज कहें। या यह सिर्फ छापामार पर्यटन है जिसमें युवा हर दिन कुछ नया खोजने यहां से वहां जाने का उपक्रम करते दिखते हैं। एक बात तो बेखटके कही जा सकती है कि जिस फोमो (एफओएमओ) फीयर आफ मिसिंग आउट यानी कुछ छूट जाने या खो जाने का भय युवाओं को सताने लगा है, धर्मस्थलों की ओर उनकी दौड़ उस डर को कुछ अंशों में अभिव्यक्त करती है। ये युवा सोशल मीडिया पर अपना स्टेटस अपडेट करना चाहते हैं। दिखाना चाहते हैं कि महाकुंभ के दुर्लभ संयोग में संगम स्नान का पुण्य उन्होंने भी अर्जित किया है। कुछ अलग फील करने की चाह (जो कई बार युवाओं को नशे की राह पर ले जाती है) भी एक वजह है जो उन्हें इस आयोजन तक खींच ले गई। लेकिन उनकी उत्सुकता इतनी सतही भी नहीं कही जानी चाहिए। महाकुंभ पहुंचने वाले युवाओं में एक तबका ऐसा भी है जो भक्ति के रंग में रंगा, उत्साह से लबरेज और भारतीय संस्कृति को करीब से जानने-समझने की ललक लेकर वहां पहुंचा। उसे यह महसूस हुआ कि विविधि संस्कृतियों वाले इस महादेश को और उसकी आध्यात्मिकता की वास्तविकता को समझने के लिए इससे बेहतर कोई और जगह नहीं हो सकती। अध्यात्म के प्रति जिज्ञासा का भाव साधुओं की संगत में बैठकर स्मार्टफोन लेकर यह पूछते हुए वीडियो बनाते तमाम युवाओं को भी इस बार नोटिस किया गया, जो यह पूछ रहे थे कि आखिर सनातन धर्म क्या है, यह दूसरे धर्मों से कैसे और कितना अलग है? साधुओं का हठयोग क्या है? ये साधु कैसे न्यूनतम संसाधनों पर जीवित रह पाते हैं और कठिनतम स्थितियों का सामना कर पाते हैं? हालांकि युवाओं को इन आध्यात्मिक सवालों का समाधान जल्दी में चाहिए, पर उनकी इस जिज्ञासा को हल्के में नहीं लेना चाहिए। हो सकता है कि उनका अध्यात्म के प्रति जो आरंभिक रुझान है, वह उन्हें सच्ची आध्यात्मिकता की ओर ले जाए। आईआईटियन बाबा के रूप में मशहूर शख्स को एक मिसाल माना जा सकता है, जो युवा आध्यात्मिकता के नए ट्रेंड की पड़ताल करने और उसे सहेजने की मांग करता है। इन जिज्ञासाओं, व्याख्याओं और सोशल मीडिया पर प्रसारित-प्रचारित इंस्टा-रील्स के प्रसंग से यह सवाल उठा है कि क्या ये सब चीजें हमारे युवाओं के आध्यात्मिक रुझान को सही परिप्रेक्ष्य में प्रस्तुत कर रही हैं। और क्या यही वह युवा आध्यात्मिकता है, जिसे भारत ही नहीं, पूरी दुनिया को जरूरत है। निश्चय ही इसमें पहला प्रसंग आईआईटी वाले बाबा का उठता है। दावा किया गया कि आईआईटी- बॉम्बे से डिग्री ले चुका और एक कंपनी में सालाना लाखों का वेतन पाने वाला एक युवा संन्यासी बन गया और बाबा के रूप में महाकुंभ में शामिल होकर उसने आध्यात्मिकता के नए पहलुओं को सामने रखा। वैसे तो कथित सांसारिकता से विमुख हुए आईआईटियन बाबा की अस्पष्ट सी बातों-व्याख्याओं में से अध्यात्म की गहरी समझ हासिल करने का दावा करना जल्दबाजी होगा, लेकिन एक पढ़े-लिखे शख्स के मुंह से अध्यात्म की बातें सुनना युवाओं को खूब भाया। इससे युवाओं की यह जिज्ञासा सामने आ गई है कि आखिर अध्यात्म में ऐसा क्या है कि वह पढ़े-लिखे लोगों को अपनी ओर खींच लेता है। एकाग्रता की कमी से जुड़े पहलू असल में जेनरेशन जेड कहलाने वाले युवाओं की दुनिया में इंटरनेट और खास तौर पर सोशल मीडिया मंचों ने जो बड़े बदलाव किए हैं, उनमें एक तो उनमें एकाग्रता की कमी (अटेंशन डेफिसिट) की शक्ल में किया है। मोबाइल इंटरनेट की तकनीकी ने युवाओं के दिमागों को उलझाने के लिए इतनी तेज गति से दृश्यों और सूचनाओं की बौछार शुरू की है जिसमें उन्हें हर क्षण खुद को व्यस्त रखने के लिए कुछ नया और रोमांचक चाहिए होता है। सोशल मीडिया पर सक्रिय ये युवा किसी एक चीज से बड़ी जल्दी ऊब जाते हैं। किसी एक मुद्दे पर ध्यान केंद्रित नहीं कर पाते। उन्हें किसी बहुत बड़ी तलब की तरह थोड़ी-थोड़ी देर में कुछ अप्रत्याशित और आवेगपूर्ण कंटेंट की जरूरत होती है। इससे युवा दुनिया में एक नए किस्म के मनो-सामाजिक विकास का चरण कायम हुआ है, जिसमें वे अपनी एक मुकम्मल पहचाने बनाने के संकट से जूझ रहे हैं। इसमें कभी उन्हें साथियों और माता-पिता की अपेक्षाओं का दबाव झेलना पड़ता है तो कभी डिजिटल स्क्रीनों पर दिख रहे व तेजी से बदल रहे दृश्यों और सूचनाओं से तालमेल बिठाने की जरूरत महसूस होती है। ऐसी स्थितियों में वे कई बार खुद के बारे में वास्तविक और ईमानदार होने के बजाय इन चीजों का अभिनय मात्र करते हैं। ऐसा दूसरे लोगों द्वारा सोशल मीडिया पर प्रदर्शित उदाहरणों के दबाव में होता है। अगर युवाओं का यह व्यवहार जारी रहता है, तो यह उन्हें छद्म किस्म की आत्म-अस्वीकृति और आत्म-धोखे की ओर ले जा सकता है। इन दबावों में वे यह सीख नहीं पाते हैं कि खुद के प्रति सच्चा होना क्या होता है और अपनी कमजोरियों को व्यक्त करते व स्वीकारते हुए कैसे आगे बढ़ा जाता है। ऐसे में वे आईआईटी बाबा के नाम से मशहूर हुए शख्स की तरह जटिल व्यक्तित्व बन सकते हैं। ऐसे युवाओं में सतत चिंता और अवसाद के लक्षण विकसित हो जाते हैं। यह दशा उनके स्वाभाविक विकास, कैरियर, रिश्तों और उनकी सामाजिक हैसियत को प्रभावित करती है। इनसे बचाव के लिए युवाओं को एक ऐसे सुरक्षात्मक माहौल की जरूरत होती है, जिसमें उनका परिवार, दोस्त, योग शिक्षक, एक संरक्षक या आध्यात्मिक गुरु उनका सही मार्गदर्शन कर सकता है। रील-प्रेरित आध्यात्मिकता हालांकि इस मामले में विडंबना यह है कि इसके लिए भी बहुत से युवा सोशल मीडिया की शरण में चले जाते हैं। वे उस रील-प्रेरित आध्यात्मिकता के जाल में फंस जाते हैं, जो छद्म है और खोखली है। ऐसे में उन्हें यह बताने की जरूरत है कि वह कौन सी आध्यात्मिकता है जिसकी उन्हें सच में जरूरत है। इस संबंध में कुछ महत्वपूर्ण शोध हुए हैं, जो बताते हैं कि युवा किस किस्म की आध्यात्मिकता में यकीन करते हैं। शोधकर्ता गैलप और बेजिला ने जो रिसर्च की है, वह बताती है कि नई पीढ़ी के युवाओं की आध्यात्मिकता ईश्वर में आस्था से जुड़ी है। इस शोध के मुताबिक अमेरिका में 95 फीसदी किशोर और युवा ईश्वर में विश्वास करते हैं। इसमें यह भी माना गया है कि आध्यात्मिकता और धार्मिक आयोजनों में भागीदारी को अमेरिकी समाज किशोरों के विकास का एक महत्वपूर्ण आयाम मानता है। सबसे दिलचस्प आंकड़े द प्रोजेक्ट टीन कनाडा में मिले। इसमें शोधकर्ताओं ने पाया कि उत्तरदाताओं ने खुद को एक धर्म के सदस्य के रूप में माना। अध्ययन में शामिल 60 फीसदी युवाओं ने आध्यात्मिकता को महत्वपूर्ण माना, जबकि 48 प्रतिशत युवाओं ने ऐसे संकेत दिए कि उनकी आध्यात्मिक जरूरतें हैं। संयुक्त राज्य अमेरिका के 236 कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में 112,232 नये छात्रों पर आधारित अध्ययन में बताया गया कि 77 फीसदी छात्र इस बात से सहमत थे कि वे आध्यात्मिक प्राणी हैं। ये अध्ययन निश्चय ही आध्यात्मिकता को लेकर युवाओं के रुझान को स्पष्ट करते हैं, लेकिन समस्या यह है कि इनमें से ज्यादातर से यह पता नहीं चलता है कि आखिर वे किस आध्यात्मिकता की बात कर रहे हैं या जिसे वे आध्यात्मिकता कह रहे हैं, क्या वास्तव में वह अवधारणा इसकी परिभाषाओं से मेल खाती है। शोध अध्ययनों के अनुसार किशोरों और युवाओं के लिए आध्यात्मिकता के अर्थ सोशल मीडिया या रील-प्रेरित हैं और अत्यधिक सतही हैं। वे जीवन के लक्ष्यों, समाज और परिवार से संबंधों के बारे में अमूर्त ढंग से सोचते हैं और ऐसे समाधानों के प्रति आकर्षित हो जाते हैं जो अव्यावहारिक हैं। ऐसे युवाओं को कुछ देर सांस रोककर ध्यान में बैठ जाना ही आध्यात्मिकता लगता है। बहुत हुआ तो पालतू पशुओं को खाना खिला देना ही उनके लिए आध्यात्मिकता है। इस आध्यात्मिकता में न तो उन्हें अपने चित्त-मन को शांत करना सिखाया जाता है और न ही यह बताया जाता है कि जीवन का असली मतलब क्या है।जिंदगी के अर्थ से जुड़े गंभीर प्रश्नजिंदगी के बारे में वे (युवा) अक्सर कुछ सवाल तो उठाते हैं, लेकिन उनके प्रश्न ह्लजीवन के अर्थह्व या ह्लजीवन में उद्देश्यह्व के उस बड़े दायरे को लेकर संबोधित नहीं होते हैं जो तीन परस्पर संबंधित मुद्दों से जुड़े होते हैं। ये तीन मुद्दे हैं- एक, जीवन का अर्थ क्या है। अर्थात हमारा या मनुष्य का जीवन क्या दशार्ता है, इसके अस्तित्व का क्या महत्व है। दो, जीवन की सार्थकता किसमें है। यानी क्या जीवन जीने योग्य या उद्देश्यपूर्ण है। और तीन, जीवन में हमारा उद्देश्य क्या है। यह मुद्दा जीवन के लक्ष्य, पूरा किए जाने वाले कार्य से संबंधित है। इतिहास देखें तो युवाओं और किशोरों के व्यवहार में अध्यात्म प्रेरित जीवन के अर्थ का महत्व और स्पष्ट होता है। जैसे, 1930 के दशक में युवाओं ने नाजी जर्मनी में हिटलर का समर्थन किया था क्योंकि तब उनका मानना था कि जातीय रूप से श्रेष्ठ जर्मनी का निर्माण उनका जीवन मिशन था। इसी तरह 1960 के दशक में कम्युनिस्ट चीन में सांस्कृतिक क्रांति के दौरान, रेड गार्ड्स ने सर्वहारा वर्ग के दुश्मनों के खिलाफ जमकर लड़ाई लड़ी। क्योंकि उन्होंने पाया था कि कम्युनिस्ट यूटोपिया का निर्माण उनका पवित्र जीवन लक्ष्य था। इसी तरह, अफ्रीका के कई युवा अपने देशों के लिए बदलावों की चाहत में सैन्य गतिविधियों में भाग लेते हैं। ये सारी गतिविधियां समय, काल और परिवेश के अनुसार आध्यात्मिक आदर्श कही जा सकती हैं। साफ है कि ऐसे उद्देश्यों के बिना अध्यात्म को जानने, समझने या समझाने की कोई प्रेरणा ऊपरी चमक-दमक से प्रेरित है। इस आध्यात्मिकता से कोई भला नहीं हो सकता है।युवाओं के लिए आध्यात्मिकता क्यों जरूरीबहुत से लोगों का मत है कि आध्यात्मिकता को जानने, समझने और हासिल करने की एक उम्र होती है जो बुढ़ापे की ओर अग्रसर व्यक्तियों के लिए जरूरी है। जबकि सच यह है कि आध्यात्मिकता युवाओं के लिए भी उतनी ही महत्वपूर्ण है जितनी कि किसी अन्य आयु वर्ग के लिए। जबकि किशोरावस्था या युवावस्था में आध्यात्मिकता की सहज खोज का फायदा यह है कि कम उम्र में ही उन मुद्दों और तत्वों पर ध्यान केंद्रित किया जा सकता है जो किसी के जीवन को और जिंदगी जीने के नजरिये को और बेहतर बना सकते हैं। युवाओं के लिए आध्यात्मिकता से जुड़ाव का पहला विशेष कारण यह है कि इससे युवा अपनी मानसिक क्षमताओं का सही दिशा में इस्तेमाल करना सीख सकते हैं। कई बाहरी और आंतरिक दबाव झेल रहे और भय, चिंता, पछतावे, बेचैनी और अति-उत्साह से भरी जिंदगी में आध्यात्मिक चेतना युवाओं को सही रास्ता दिखा सकती है। हालांकि युवाओं को आध्यात्मिकता की आरंभिक समझ देना ही काफी नहीं है। आध्यात्मिकता के विकास में उनका सक्रियता से चिंतन करना और आध्यात्मिकता के वास्तविक स्वरूप को अनुभव करना भी महत्वपूर्ण है। जैसे, उनमें यह समझ विकसित होनी चाहिए कि इस पृथ्वी पर एक मनुष्य के रूप में हम क्यों मौजूद हैं? हमारे जीवन का उद्देश्य क्या है और हम कहां जा रहे हैं? यदि हम सचेत हैं तो हमें क्या करना चाहिए? ये महत्वपूर्ण आध्यात्मिक प्रश्न हैं जो सचेत चिंतन की मांग करते हैं। अधिक अनुभव पाने और चिंतन करने के अलावा, धार्मिक समूहों और समारोहों में शामिल होना आध्यात्मिकता विकसित करने का एक अच्छा अवसर प्रदान करता है। शोधकर्ताओं ब्रूस और कॉकरेहम ने समाजसेवा या सामूहिक कार्यों में भागीदारी को अनिवार्य करने के रूप में युवाओं में आध्यात्मिकता को बढ़ावा देने के विभिन्न तरीकों का प्रस्ताव दिया। इन शोधकर्ताओं का सुझाव युवाओं में आध्यात्मिकता को बढ़ावा देने के लिए पाठ्यक्रम-आधारित कार्यक्रमों का उपयोग करने का भी है। आध्यात्मिक चेतना कैसे सोशल मीडिया और जीवन के उलझावों के बीच कैसे एक बेहतर राह सुझा सकती है, इसे एक लकड़हारे का उदाहरण देकर लेखक स्टीफन कोवे ने अपनी किताब- द सेवन हैबिट्स आफ हाइली इफेक्टिव पीपल में समझाया है। उन्होंने लिखा कि लकड़हारा पेड़ों को काटने में इतना व्यस्त रहता है कि उसके पास अपनी कुल्हाड़ी और आरी की धार को तेज करने का समय नहीं होता है। इससे भोथरी धार वाली कुल्हाड़ी या आरी से पेड़ों को काटने में अतिरिक्त श्रम और समय लगता है। इस कारण लकड़हारा अपनी दक्षता खो देता है और लक्ष्य हासिल करने में नाकाम होता है। लेकिन जब आध्यात्मिकता की मदद से उसमें मन को शांत और एकाग्र करने वाले गुणों का विकास होता है, तो वह धैर्यवान बनता है और अपनी क्षमताओं और दक्षताओं का सही दिशा में इस्तेमाल कर पाता है। असल में, आध्यात्मिकता की समझ विकसित होने से जीवन की चुनौतियों का सामना करने के लिए आंतरिक शक्ति का विकास होता है। ऐसी आध्यात्मिकता हमारे जीवन को एक उच्च अर्थ और उद्देश्य देती है। यह समझ विकसित होती है कि सफलता बाहरी उपलब्धियों में निहित नहीं है। बल्कि अगर किसी के पास मन की शांति, अच्छा स्वास्थ्य और परिवार और दोस्तों से सौहार्दपूर्ण संबंध नहीं हैं, तो पैसे, प्रसिद्धि और ताकत से मिली सफलता बेमानी है। -लेखक मीडिया यूनिवर्सिटी में एसोसिएट प्रोफेसर हैं।
टीम एबीएन, रांची। श्री श्याम ध्वजा पदयात्रा समिति के तत्वावधान में 2 मार्च 2025 दिन- रविवार को रांची नगर में राजस्थान के खाटू श्रीश्याम जी के परंपरा के अनुसार ही श्री श्याम ध्वजा निशान पदयात्रा का आयोजन होने जा रहा है। जिसकी तैयारियां जोरों पर है। श्री श्याम ध्वजा पदयात्रा समिति के संयोजक गोपाल मुरारका एवं प्रवक्ता संजय सर्राफ ने बताया कि 2 मार्च को श्री श्याम ध्वजा पदयात्रा रांची के नेवरी विकास विद्यालय के समीप श्री दुर्गा मंदिर से सुबह 8 बजे बाबा श्री श्याम का ध्वजा पदयात्रा शुरू होकर नगर के प्रमुख मार्गो बूटी मोड़ बरियातू रोड, सर्कुलर रोड, कचहरी रोड, मेन रोड, अप्पर बाजार भ्रमण करते हुए श्री खाटू श्री श्याम मंदिर हरमू रोड में ध्वजा समर्पण के साथ समाप्त होगी। इस यात्रा की दूरी श्री खाटू धाम की परंपरा अनुसार 17 किलोमीटर रिंगस से खाटू धाम की है। यूं तो इस पावन माह में कई ध्वजा पदयात्राएं होती है पर इस यात्रा का विशेष महत्व है। मान्यता है कि जो भी भक्त श्री श्याम प्रभु की निशान को अपनी मन की बात कहता है और उसे सच्चे विश्वास से श्री श्याम प्रभु को अर्पित करता है तो बाबा उन भक्तों की सारी मुरादे पूरी करते हैं।इसी परंपरा के अनुसार रांची में विगत 3 वर्षों से श्री श्याम ध्वजा पदयात्रा समिति द्वारा यह आयोजन हो रहा है। उन्होंने बताया कि 2 मार्च को श्री श्याम ध्वजा पदयात्रा के निशान कार्ड हेतु श्याम प्रेमी मोबाइल नं- 9835 111002, 82922 61009, 95340 33233, 82355 75481,से अतिशीघ्र संपर्क कर अपना नाम लिखवाकर ध्वजा निशान कार्ड प्राप्त कर सकते हैं।कार्यक्रम को सफल बनाने हेतु- हरिशंकर परशुरामपुरिया, ललित कुमार पोद्दार, गोपाल मुरारका, राजेश ढांढनियां, अशोक लाडिया, रवि चौधरी, संजय परशुरामपुरिया, मनोज खेतान, प्रवीण सिंघानिया, विष्णु चौधरी, हेमंत जोशी, आनंद चौधरी, प्रदीप अग्रवाल, रोहित अग्रवाल, प्रमोद परशुरामपुरिया, अमित शर्मा, संजय सर्राफ, नवीन डोकानियां, निकुंज पोद्दार, सूरज लोधा सहित अन्य श्याम भक्त जोर-शोर से तैयारियां में लगे हैं। उक्त जानकारी श्री श्याम ध्वजा पदयात्रा समिति, रांची के प्रवक्ता सह मीडिया प्रभारी संजय सर्राफ ने दी।
भगवान शिव की पुत्री अशोक सुंदरी के जन्म और विवाह की कथा राजकुमारी पाण्डेयएबीएन सोशल डेस्क। भगवान शिव की एक पुत्री का नाम अशोक सुंदरी था। हालांकि महादेव की और भी पुत्रियां थीं जिन्हें नागकन्या माना गया- जया, विषहर, शामिलबारी, देव और दोतलि। अशोक सुंदरी को भगवान शिव और पार्वती की पुत्री बताया गया इसलिए वह गणेशजी की बहन है। इनका विवाह राजा नहुष से हुआ था।पद्मपुराण अनुसार अशोक सुंदरी देवकन्या हैं। दरअसल, माता पार्वती के अकेलेपन को दूर करने हेतु कल्पवृक्ष नामक पेड़ के द्वारा ही अशोक सुंदरी की रचना हुई थी। एक बार माता पार्वती विश्व में सबसे सुंदर उद्यान में जाने के लिए भगवान शिव से कहा। तब भगवान शिव अपनी पत्नी पार्वती को नंदनवन ले गये। वहां माता को कल्पवृक्ष से लगाव हो गया और वे उस वृक्ष को लेकर कैलाश आ गईं।कल्पवृक्ष मनोकामना पूर्ण करने वाला वृक्ष है। पार्वती ने अपने अकेलेपन को दूर करने हेतु उस वृक्ष से यह वर मांगा कि उन्हें एक कन्या प्राप्त हो। तब कल्पवृक्ष द्वारा अशोक सुंदरी का जन्म हुआ। माता पार्वती ने उस कन्या को वरदान दिया कि उसका विवाह देवराज इंद्र जैसे शक्तिशाली युवक से होगा।इसी वरदान के असर के कारण एक बार अशोक सुंदरी अपनी दासियों के साथ नंदनवन में विचरण कर रही थीं तभी वहां हुंड नामक राक्षस आया। जो अशोक सुंदरी की सुंदरता से मोहित हो गया और उसने अशोक सुंदरी के सामने विवाह का प्रस्ताव रखा।लेकिन अशोक सुंदरी ने अपने वरदान और विवाह के बारे में बताया कि उनका विवाह नहुष से ही होगा। यह सुनकर राक्षस ने कहा कि वह नहुष को मार डालेगा। ऐसा सुनकर अशोक सुंदरी ने राक्षस को शाप दिया कि जा दुष्ट तेरी मृत्यु नहुष के हाथों ही होगी। यह सुनकर वह राक्षस घबरा गया। तब उसने राजकुमार नहुष का अपहरण कर लिया। लेकिन नहुष को राक्षस हुंड की एक दासी ने बचा लिया। इस तरह महर्षि वशिष्ठ के आश्रम में नहुष बड़े हुए और उन्होंने हुंड का वध किया। इसके बाद नहुष तथा अशोक सुंदरी का विवाह हुआ हुआ। विवाह के बाद अशोक सुंदरी ने ययाति जैसे वीर पुत्र तथा सौ रुपवती कन्याओं को जन्म दिया। ययाति भारत के चक्रवर्ती सम्राटों में से एक थेऔर उन्हीं के पांच पुत्रों से संपूर्ण भारत पर राज किया था। उनके पांच पुत्रों का नाम था- 1. पुरु, 2. यदु, 3. तुर्वस, 4. अनु और 5. द्रुहु। इन्हें वेदों में पंचनंद कहा गया है।
Subscribe to our website and get the latest updates straight to your inbox.