एबीएन सोशल डेस्क। हिंदी साहित्य भारती के उपाध्यक्ष एवं झारखंड पेरेंट्स एसोसिएशन के प्रांतीय प्रवक्ता संजय सर्राफ ने कहा है कि हर वर्ष 8 मार्च को पूरे विश्व में अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस मनाया जाता है। यह दिन महिलाओं के अधिकारों, सम्मान, समानता और उनके सामाजिक-आर्थिक योगदान को मान्यता देने के उद्देश्य से मनाया जाता है। यह केवल एक उत्सव का दिन नहीं है, बल्कि महिलाओं के अधिकारों, समान अवसरों और उनके सशक्तिकरण के लिए जागरूकता फैलाने का भी महत्वपूर्ण अवसर है। अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस की शुरुआत 20वीं शताब्दी की शुरूआत में हुई थी। वर्ष 1908 में अमेरिका के न्यूयॉर्क शहर में हजारों महिला श्रमिकों ने अपने अधिकारों, बेहतर कार्य परिस्थितियों, उचित वेतन और मतदान के अधिकार की मांग को लेकर प्रदर्शन किया था। इसके बाद वर्ष 1910 में डेनमार्क के कोपेनहेगन में आयोजित अंतरराष्ट्रीय समाजवादी महिला सम्मेलन में जर्मनी की समाजसेवी क्लारा जेटकिन ने अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस मनाने का प्रस्ताव रखा। उनके प्रस्ताव को स्वीकार करते हुए वर्ष 1911 से कई देशों में इस दिवस को मनाना शुरू किया गया। बाद में वर्ष 1975 में संयुक्त राष्ट्र ने आधिकारिक रूप से 8 मार्च को अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस के रूप में मान्यता दी।अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस का मुख्य उद्देश्य महिलाओं को समान अधिकार दिलाना, लैंगिक भेदभाव को समाप्त करना और समाज में महिलाओं की भागीदारी को बढ़ावा देना है। यह दिन हमें याद दिलाता है कि समाज के विकास में महिलाओं की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। शिक्षा, राजनीति, विज्ञान, साहित्य, कला, खेल, व्यवसाय और प्रशासन जैसे हर क्षेत्र में महिलाएं अपनी प्रतिभा और क्षमता का उत्कृष्ट प्रदर्शन कर रही हैं।इस दिवस का महत्व इसलिए भी बढ़ जाता है क्योंकि आज भी दुनिया के कई हिस्सों में महिलाओं को समान अवसर नहीं मिल पाते हैं। कई स्थानों पर उन्हें शिक्षा, रोजगार और निर्णय लेने के अधिकार से वंचित रखा जाता है। ऐसे में यह दिन समाज को यह संदेश देता है कि महिलाओं को सम्मान, सुरक्षा और समान अवसर प्रदान करना प्रत्येक समाज और राष्ट्र की जिम्मेदारी है।अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस की विशेषता यह है कि इस दिन विभिन्न देशों में महिलाओं की उपलब्धियों को सम्मानित किया जाता है और उनके अधिकारों के प्रति जागरूकता फैलाने के लिए अनेक कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। स्कूल-कॉलेजों, सामाजिक संस्थाओं, सरकारी संगठनों और विभिन्न मंचों पर सेमिनार, सांस्कृतिक कार्यक्रम, जागरूकता अभियान तथा सम्मान समारोह आयोजित किये जाते हैं। इसके माध्यम से महिलाओं के आत्मविश्वास और आत्मनिर्भरता को बढ़ावा देने का प्रयास किया जाता है। आज के समय में महिलाएं हर क्षेत्र में नयी ऊंचाइयों को छू रही हैं और समाज के विकास में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं। अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस हमें यह प्रेरणा देता है कि हम महिलाओं के सम्मान, अधिकार और समानता के लिए मिलकर कार्य करें तथा एक ऐसा समाज बनाएं जहां हर महिला सुरक्षित, सम्मानित और सशक्त महसूस करे।इस प्रकार अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस केवल महिलाओं का उत्सव नहीं, बल्कि समानता, सम्मान और मानवाधिकारों के प्रति समाज की प्रतिबद्धता का प्रतीक है।
टीम एबीएन, रांची। आज सदर अस्पताल में 77वां खिचड़ी वितरण प्रोजेक्ट सफलतापूर्वक संपन्न हुआ। इस सेवा कार्यक्रम के अंतर्गत लगभग 800 लोगों को खिचड़ी वितरित की गयी। आज के इस सेवा कार्य के प्रायोजक एफजेसीसीआई के सेक्रेटरी जनरल रोहित अग्रवाल जी रहे। उनके सहयोग से यह कार्यक्रम बहुत ही सुचारू और सफलतापूर्वक संपन्न हुआ। मौके पर एफजेसीसीआई के प्रेसिडेंट आदित्य मल्होत्रा भी उपस्थित रहे और उन्होंने इस सेवा कार्य की सराहना की। कार्यक्रम में लायंस क्लब ग्लोबल रांची के सेक्रेटरी संतोष अग्रवाल, ट्रेजरर अल्तमाश आलम तथा खिचड़ी को-आर्डिनेटर मोनिका गोयनका भी उपस्थित थीं। सभी के सहयोग से यह सेवा कार्य सफलतापूर्वक पूरा किया
सदगुरु कृपा अपना घर आश्रम में उमंग के साथ मनाया गया होली उत्सवटीम एबीएन, रांची। संत शिरोमणि स्वामी सदानंद महाराज जी के सानिध्य में श्री कृष्ण प्रणामी सेवा धाम ट्रस्ट द्वारा संचालित पुंदाग रांची स्थित सदगुरु कृपा अपना घर आश्रम में रह रहे 50 से अधिक निराश्रितों, दिव्यांग प्रभुजनों के बीच होली का पावन उत्सव अत्यंत हर्षोल्लास और भक्तिभाव के साथ मनाया गया। यह आयोजन श्री राधा कृष्ण प्रणामी मंदिर के प्रांगण में संपन्न हुआ, जहां रंगों के इस महापर्व ने सेवा, समर्पण और सामाजिक समरसता का सुंदर संदेश दिया।कार्यक्रम की शुरुआत मंदिर के पुजारी पंडित अरविंद पांडे द्वारा श्री राधा रानी की विधिवत पूजा-अर्चना एवं महाभोग अर्पण से हुई। वैदिक मंत्रोच्चार और भक्तिमय वातावरण के बीच उपस्थित श्रद्धालुओं ने भगवान से सुख-शांति एवं समृद्धि की कामना की। पूजा के उपरांत आश्रम में रह रहे निराश्रित जनों, दिव्यांगों एवं सेवादारों के बीच अबीर-गुलाल के साथ होली खेली गई।होली के पारंपरिक गीतों और भजनों की मधुर धुन पर सभी ने एक-दूसरे को रंग लगाकर प्रेम और भाईचारे का परिचय दिया। आश्रम परिसर रंगों से सराबोर हो उठा और हर चेहरे पर मुस्कान खिल उठी। विशेष रूप से निराश्रित एवं दिव्यांग प्रभुजनों के चेहरे पर उत्साह और आत्मीयता की झलक ने कार्यक्रम को भावुक और प्रेरणादायक बना दिया।इस अवसर पर ट्रस्ट के अध्यक्ष डूंगरमल अग्रवाल, उपाध्यक्ष राजेंद्र प्रसाद अग्रवाल एवं प्रवक्ता सह मीडिया प्रभारी संजय सर्राफ ने उपस्थित सभी लोगों को होली की शुभकामनाएं दीं। उन्होंने अपने उद्बोधन में कहा कि होली केवल रंगों का त्योहार नहीं, बल्कि आपसी प्रेम, सद्भाव और सामाजिक एकता का प्रतीक है। समाज के अंतिम पंक्ति में खड़े लोगों के साथ पर्व मनाना ही सच्ची सेवा और मानवीयता है।कार्यक्रम के अंत में सभी के बीच स्वादिष्ट व्यंजनों का वितरण किया गया, जिसका सभी ने आनंद लिया। इस प्रकार सेवा, श्रद्धा और सौहार्द के वातावरण में होली का यह उत्सव यादगार बन गया। यह जानकारी ट्रस्ट के प्रवक्ता संजय सर्राफ ने दी।
एबीएन सोशल डेस्क। फाल्गुन मास के पूर्णिमा को होलिका दहन के साथ संवत काटते हुए नव वर्ष का स्वागत एवं अपने आनंद की अभिव्यक्ति चैत्र मास के प्रथम दिवस को होली के त्यौहार के रूप में मनाया जाता है, जिसमें विभिन्न रंगों के रंग एवं अबीर गुलाल लगाकर एक दूसरे के प्रति शुभकामनाओं का आदान प्रदान करते हैं। हमारी प्रकृति विभिन्न रंगों से सजी हुई है और रंगों का व्यापक प्रभाव हमारी चेतना, भावना, संवेदना तथा बुद्धि के ऊपर होती हैलाल रंग क्रोध का, भगवा सामूहिकता का, हरा समृद्धि का, पीला ज्ञान विज्ञान कला साहित्य विवेक का, गुलाबी प्रेम का, नीला शांति एवं विस्तार का तथा श्वेत रंग तप एवं त्याग का, और रंगों का सूक्ष्म प्रभाव हमारे व्यक्तित्व कृतित्व के ऊपर सीधा पड़ता है। विभिन्न रंगों से युक्त यह जीवन एक उत्सव ही है और उत्सव का रंगों के साथ शुभारंभ हमारे मनोविज्ञान में संतुलन स्थापित करता है।होली के पर्व के बाद वसंत ऋतु का पवित्र एवं शक्ति साधना नवरात्र के साथ नव वर्ष आरंभ हो जाता है। नवरात्रि के नौ दिनों में हम प्रकृति से सानिध्य स्थापित करते हुए उसकी सूक्ष्म शक्तियों को धारण करने का अनुष्ठान करते हैं और आने वाले वर्ष भर के लिए स्वयं को अपने भीतर संकल्प एवं चरित्र की शक्ति से अभिसिंचित करते हैं। होली का त्यौहार मात्र औपचारिकता न रह जाए। सतही शुभकामनाओं के आदान-प्रदान भर से काम चलने वाला नहीं है। अपने विभिन्न रंगों की भावनाओं को खुलकर बहने दें जिसकी सुखद फुहार की अनुभूति सबको मिल पाये।
होलिका दहन बुराई पर अच्छाई की विजय तथा नकारात्मकता के दहन का है प्रतीक : संजय सर्राफ टीम एबीएन, रांची। रांची सहित झारखंड के विभिन्न शहरों में मारवाड़ी समाज की महिलाओं ने परंपरा, आस्था और उत्साह के साथ होली पर्व का शुभारंभ किया। झारखंड प्रांतीय मारवाड़ी सम्मेलन के संयुक्त महामंत्री सह प्रवक्ता संजय सर्राफ ने बताया कि समाज की महिलाओं ने राजस्थानी पारंपरिक वेशभूषा, विशेष रूप से रंग-बिरंगी ओढ़नी धारण कर विधि-विधानपूर्वक डांडा रोपण की रस्म निभाई। इसके पश्चात ठंडी होली की पूजा श्रद्धा और भक्ति भाव से संपन्न की गयी। उन्होंने कहा कि डांडा रोपण मारवाड़ी समाज की प्राचीन परंपरा है, जो होली पर्व के शुभारंभ का प्रतीक मानी जाती है। महिलाएं पारंपरिक गीतों का गायन करते हुए परिवार और समाज की सुख-समृद्धि की कामना करती हैं। ठंडी होली की पूजा के दौरान विशेष रूप से मंगलकामना, सुख-शांति और समृद्धि के लिए प्रार्थना की जाती है। 3 मार्च को प्रात: लगभग 5 बजे पूरे विधि-विधान के साथ होलिका दहन किया गया। इस अवसर पर समाज के गणमान्य लोग एवं बड़ी संख्या में परिवार उपस्थित रहे। होलिका दहन बुराई पर अच्छाई की विजय तथा नकारात्मकता के दहन का प्रतीक है। श्रद्धालुओं ने अग्नि की परिक्रमा कर नयी ऊर्जा और सकारात्मकता के साथ जीवन में आगे बढ़ने का संकल्प लिया। संजय सर्राफ ने कहा कि इस प्रकार के धार्मिक एवं सांस्कृतिक आयोजन समाज को एकजुट करने के साथ-साथ नयी पीढ़ी को अपनी परंपराओं से जोड़ने का कार्य करते हैं।
टीम एबीएन, रांची। रांची के चुटिया नगरी की ऐतिहासिक होली के अवसर पर बीते रविवार को परंपरा के अनुसार होलिका दहन फगुआ का रस्म पूरी करने की तैयारी है। लगभग 500 वर्षों से होलिका दहन और होली उत्सव की एक अनूठी परंपरा निभायी जा रही है, जो झारखंड में सबसे पहले होलिका दहन के लिए जानी जाती है। देर रात मुहूर्त के अनुसार सर्वप्रथम ग्राम पाहन स्नान कर नये वस्त्र पहन एक लोटा जल व फरसा लेकर डोल जतरा मैदान में फगुआ काटने के लिए आये और एक ही वार में अरंडी की डाल काट कर बिना पीछे मुड़े घर प्रस्थान किया। इसके बाद श्रीराम मंदिर के महंत ने पूजा अर्चना कर होलिका प्रज्ज्वलित कर आरती की। इससे पूर्व रंगारंग कार्यक्रम प्रस्तुत किये गये। राजधानी रांची का ऐतिहासिक स्थल चुटिया, जो कभी नागवंशी राजाओं की राजधानी रही। आज भी अपनी समृद्ध परंपराओं और आस्था की विरासत को संजोए हुए है। वर्ष 1685 में स्थापित राम मंदिर, जिसे राधाबल्लभ मंदिर के नाम से भी जाना जाता है, यहां की धार्मिक पहचान का केंद्र है। इसी मंदिर परिसर के पास लगभग 500 वर्षों से होलिका दहन और होली उत्सव की एक अनूठी परंपरा निभायी जा रही है, जो झारखण्ड में सबसे पहले होलिका दहन के लिए जानी जाती है। चुटिया में होलिका दहन केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि इतिहास, संस्कृति और श्रद्धा का जीवंत प्रतीक है। मान्यता है कि नागवंशी राजाओं के समय से यह परंपरा निरंतर चली आ रही है। जैसे ही यहां होलिका दहन संपन्न होता है, पूरे क्षेत्र में होली के उत्सव की शुरूआत मानी जाती है। आज होलिका दहन किया गया जिसमें सैकड़ों श्रद्धालु इस पावन क्षण के साक्षी बनने के लिए एकत्र हुए। राम मंदिर ट्रस्ट के सदस्य कैलाश कुमार केसरी ने बताया कि 16वीं शताब्दी में महाराजा उदयनाथ प्रताप सहदेव चुटियागढ़ के राजा हुआ करते थे और चुटिया नागवंशी राजा की राजधानी हुआ करती थे। उस समय की प्रथा थी कि होली के दो दिन पहले दूसरे राज्यों के राजाओं को होली का न्यौता भेजा जाता था। राजा पहले फगुआ काटेंगे उसके बाद ही अन्य लोग फगुआ काटेंगे। वहीं मान्यता अब भी चलती आ रही है कि यहां होली से दो दिन पहले ही राम मंदिर अगजा कटती है और यह अगजा पाहन काटते हैं। पाहन मुंडा समाज से आते हैं। पाहन के अगजा काटने के बाद राम मंदिर के महंत पूजा पाठ करके आरती होलिका का करते हैं। वहीं चार मार्च को फगडोल जतरा यात्रा निकाली जायेगी। साहू ने बताया कि चार मार्च को लोग सुबह से ही रंगोंवाली होली खेलेंगे। दोपहर एक बजे के बाद नहा-धोकर नये वस्त्र पहनकर लोग फग डोल जतरा यात्रा के लिए निकलेंगे। दिन के लगभग दो बजे प्राचीन राम मंदिर से भगवान के विग्रहों को डोली में बिठाकर निकाला जायेगा। राम मंदिर के पास स्थित डोल जतरा मैदान में विग्रहों को चबूतरा में रखा जायेगा। चुटिया के अन्य प्राचीन मंदिर जैसे लोअर चुटिया स्थित राधा कृष्ण मंदिर, साहू टोली स्थित राम मंदिर व हनुमान मंदिर से भी भगवान के विग्रहों को डोली में बिठाकर डोल जतरा मैदान में लाया जायेगा। साहू ने बताया कि चुटिया में फग डोल जतरा यात्रा वृंदावन की तर्ज पर होता है। यहां यह परंपरा वर्ष 1685 से चली आ रही है।
आचार्य 108 विशुद्ध सागर जी महाराज के परम शिष्य पूज्य मुनि श्री 108 आराध्य सागर जी महाराज संघ राँची अपर बाजार जैन मंदिर में विराजमान हैंप्रातः 8.15 बजे प्रवचन के दौरान उन्होंने कहा कि सम्यक्त्रय की साधना : जीवन का वास्तविक मार्गएबीएन सोशल डेस्क। आज प्रातःकालीन वंदनीय वाणी में गुरुदेव ने जैन दर्शन के मूल तत्व सम्यक दर्शन, सम्यक ज्ञान और सम्यक चरित्र की महिमा का अत्यंत सरल और गूढ़ विवेचन किया। पहले दर्शन, फिर ज्ञान, फिर चरित्र, मुनी श्री ने स्पष्ट कहा - आध्यात्मिक उन्नति का क्रम उल्टा नहीं होता पहले सम्यक दर्शन होता है सही दृष्टिकोण, सही श्रद्धा। उसके बाद सम्यक ज्ञान प्रकट होता है। वस्तु को जैसी है वैसी जानना। जब ज्ञान शुद्ध हो जाता है, तब चरित्र स्वतः सम्यक बन जाता है। यदि दृष्टि ही विकृत हो, तो ज्ञान भी विकृत होगा और आचरण भी असंतुलित रहेगा। इसलिए जैन धर्म में सबसे पहले श्रद्धा की शुद्धि पर बल दिया गया है। उन्होंने दर्पण का उदाहरण से बताया की आत्मा का स्वभाव किस प्रकार का होता हैं। गुरुदेव ने अत्यंत सुंदर उदाहरण दिया दर्पण का कार्य छवि को झलकाना नहीं है, बल्कि उसका स्वभाव ही ऐसा है कि जो उसके संपर्क में आता है, वह प्रतिबिंबित हो जाता है। इसी प्रकार आत्मा का स्वभाव शुद्ध, चेतन और ज्ञानमय है। परंतु जब वह कर्मों के संपर्क में आती है, तो उसकी शुद्धता ढँक जाती है। दर्पण स्वयं गंदा नहीं होता, उस पर धूल जम जाती है। आत्मा अशुद्ध नहीं होती, उस पर कर्मों का आवरण आ जाता है। इसलिए हमें दर्पण को तोड़ना नहीं, बल्कि धूल हटानी है। उसी प्रकार आत्मा को बदलना नहीं, कर्मों को क्षीण करना है।यह देह नहीं, यह नाम नहीं, यह संबंध नहीं, इन सब से परे जो चेतना है, वही आत्मा स्वरूप मैं हूँ। फिर प्रश्न आता है मैं कौन हूँ? क्या मैं शरीर हूँ? क्या मैं पद-प्रतिष्ठा हूँ? या मैं शुद्ध, अनंत ज्ञान-स्वरूप आत्मा हूँ? जब यह विवेक जागता है, तब तीसरा प्रश्न उठता है मुझे क्या करना है? और यहीं से साधना प्रारंभ होती है । जैन आगमों में कहा गया है कि मोक्ष का मार्ग सम्यक्त्रय से ही प्रशस्त होता है।सही श्रद्धा, सही ज्ञान, सही आचरण। यदि श्रद्धा दृढ़ है, तो ज्ञान प्रकाशित होगा। यदि ज्ञान प्रकाशित है, तो आचरण पवित्र होगा। और जब आचरण पवित्र होगा, तब आत्मा का स्वभाव स्वतः प्रकट होगा। आज के प्रवचन का सार यही है हम बाहर की दुनिया को बदलने में लगे हैं, परंतु वास्तविक साधना भीतर की है। दर्पण को साफ कीजिए, प्रतिबिंब स्वयं उज्ज्वल होगा। आत्मा को कर्म मल से मुक्त कीजिए, अनंत ज्ञान, अनंत दर्शन और अनंत सुख स्वयं प्रकट हो जाएगा। प्रवचन के दौरान मंत्री जीतेन्द्र छाबड़ा, अध्यक्ष प्रदीप बाकलीवाल, प्रमोद झाँझरी, विनोद झाँझरी , धर्मचन्द पाटोदी, के अलावा कई श्रद्धालु उपस्थित थे।यह जानकारी मीडिया प्रभारी राकेश काशलीवाल ने दी।
टीम एबीएन, रांची। श्रीराम नगर, चुटिया स्थित श्री राम मंदिर परिसर में विराट हिंदू सम्मेलन का भव्य आयोजन श्रद्धा, उत्साह और व्यापक जनभागीदारी के साथ संपन्न हुआ। सम्मेलन में शहर एवं आसपास के क्षेत्रों से बड़ी संख्या में समाज के विभिन्न वर्गों के लोग उपस्थित हुए। कार्यक्रम का उद्देश्य समाज में एकता, समरसता, सांस्कृतिक चेतना और राष्ट्रभाव को सुदृढ़ करना बताया गया। कार्यक्रम का शुभारंभ चुटिया स्थित्त राममंदिर के प्रांगण से कलश यात्रा निकली गयी, जिसमें बड़ी संख्या में मत्री शक्ति ने बढ़ चढ़ कर भाग लियो एवं इस शोभा यात्रा में हनुमान गाढ़ी में महंत एवं राम मंदिर के महंत जी को रथ पर बिठाकर कार्यक्रम स्थल तक गाजे बजे के साथ लाया गया। कार्यक्रम वैदिक मंत्रोच्चार एवं दीप प्रज्वलन के साथ हुआ। प्रारंभिक संबोधन में श्री राम मंदिर, चुटिया के महंत ने कहा कि सम्मेलन में उपस्थित जनसमूह केवल संख्या नहीं, बल्कि जागृत और संगठित समाज की प्रतीक शक्ति है। उन्होंने वेद मंत्र संगच्छध्वं संवदध्वं का उल्लेख करते हुए कहा कि साथ चलना, साथ बोलना और एक लक्ष्य के लिए संगठित होना ही समाज की वास्तविक शक्ति है। उन्होंने कहा कि वर्तमान समय में सनातन समाज को संगठित करने की आवश्यकता पहले से अधिक है और ऐसे सम्मेलन समाज को दिशा देने का कार्य करते हैं। अयोध्या के हनुमान गढ़ी के महंत श्री राजू दास जी ने अपने ओजस्वी उद्बोधन में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के शताब्दी वर्ष के संदर्भ में आयोजित इस सम्मेलन के व्यापक उद्देश्य पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि पिछले 100 वर्षों में संघ ने समाज को संगठित करने, राष्ट्रभक्ति की भावना जागृत करने और सांस्कृतिक मूल्यों की रक्षा करने का निरंतर प्रयास किया है। उन्होंने प्रश्न रखा कि देश सुरक्षित कैसे रहे, आने वाली पीढ़ियां अपनी पहचान और परंपरा से जुड़ी कैसे रहें और भारत पुन: किसी प्रकार की दासता का शिकार न हो—इन सभी विषयों पर संघ ने निरंतर चिंतन और कार्य किया है। उन्होंने अयोध्या में राम मंदिर निर्माण के लिए हुए दीर्घकालिक संघर्ष और लाखों रामभक्तों के त्याग एवं बलिदान का उल्लेख करते हुए कहा कि यह केवल मंदिर निर्माण का विषय नहीं, बल्कि सांस्कृतिक स्वाभिमान का प्रतीक है। उन्होंने कहा कि ऐसे ऐतिहासिक संघर्षों की स्मृति हमें संगठित रहने और अपनी आस्था व परंपराओं की रक्षा करने की प्रेरणा देती है। उन्होंने बताया कि शताब्दी वर्ष के अवसर पर देश के लगभग एक लाख गांवों में हिंदू सम्मेलन आयोजित किये जा रहे हैं, जिनमें करोड़ों लोगों की भागीदारी सुनिश्चित की जा रही है। संघ के सह-सरकार्यवाह आलोक जी ने अपने विस्तृत संबोधन में संगठन की शक्ति और एकता के महत्व को महाभारत के प्रसंग के माध्यम से स्पष्ट किया। उन्होंने देवताओं और असुरों के युद्ध की कथा का उदाहरण देते हुए कहा कि बिखराव पराजय का कारण बनता है, जबकि एकता विजय का मार्ग प्रशस्त करती है। संगच्छध्वं संवदध्वं संवो मनांसि जानताम् मंत्र का अर्थ समझाते हुए उन्होंने कहा कि जब लोग साथ चलते और साथ बोलते हैं, तो उनके मन भी एक हो जाते हैं और यही एकता किसी भी चुनौती का सामना करने की वास्तविक शक्ति है। उन्होंने कहा कि हिंदू समाज अपनी विविधता और उदारता के लिए जाना जाता है। अलग-अलग उपासना पद्धतियां, देवी-देवताओं के प्रति अलग-अलग आस्थाएं और विभिन्न परंपराएं हमारी सांस्कृतिक समृद्धि का प्रतीक हैं। किंतु समय-समय पर एक नाम और एक उद्देश्य के लिए संगठित होना भी उतना ही आवश्यक है। उन्होंने सामाजिक समरसता पर बल देते हुए छुआछूत की भावना समाप्त करने का आह्वान किया। संत रविदास, मीराबाई और महर्षि वाल्मीकि जैसे महापुरुषों का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि भारतीय परंपरा में जन्म नहीं, बल्कि कर्म और भक्ति को सर्वोच्च स्थान दिया गया है। उन्होंने पंच परिवर्तन की अवधारणा को रेखांकित करते हुए कहा कि समाज में समरसता, परिवार प्रबोधन, पर्यावरण संरक्षण, स्वदेशी भावना और नागरिक कर्तव्य का पालन ये सभी परिवर्तन आवश्यक हैं। उन्होंने कहा कि परिवार भारतीय समाज की मूल इकाई है और परिवार में संवाद, संस्कार एवं सामूहिकता की परंपरा को पुनर्जीवित करना समय की आवश्यकता है। भारत ने अनेक आक्रमणों और चुनौतियों के बावजूद अपनी सांस्कृतिक पहचान को इसलिए सुरक्षित रखा क्योंकि परिवारों ने अपने मूल्यों को जीवित रखा। पर्यावरण संरक्षण पर बोलते हुए उन्होंने रांची की बदलती पर्यावरणीय स्थिति की ओर ध्यान आकर्षित किया और कहा कि जो शहर कभी स्वच्छ वातावरण के लिए प्रसिद्ध था, वहां आज वायु गुणवत्ता चिंताजनक स्तर पर पहुंच रही है। इसे संतुलित करने के लिए सामूहिक जागरूकता और प्रयास आवश्यक हैं। साथ ही उन्होंने संविधान के अनुरूप नागरिक कर्तव्यों के पालन, सामाजिक सद्भाव और सकारात्मक आचरण को समाज की प्रगति का आधार बताया। कार्यकम मे बच्चों द्वारा रानी लक्ष्मीबाई की वीरता एवं लव जेहाद पर प्रस्तुत किये गये लघु नाटिका आकर्षण का केंद्र रही। सम्मेलन में संत समाज के प्रतिनिधियों, मातृ शक्ति, गायत्री परिवार, विश्व हिंदू परिषद, हिंदू जागरण मंच, मंदा पूजा समिति चुटिया तथा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के अनेक कार्यकर्ताओं और पदाधिकारियों की सक्रिय उपस्थिति रही। कार्यक्रम में गिरधारीलाल महतो, विशाल जी, गोपाल शर्मा, मिथिलेश्वर मिश्र, अशोक प्रधान, राजीव बिट्टू, विजय कुमार, राजू शर्मा, शिवम केशरी, शंकर सिंह, रत्न केशरी, शैलेंद्र कुमार, अरुण कुमार, विक्रम शर्मा, महेंद्र जी एवं विभाग प्रचारक मंटू जी सहित अनेक गणमान्यजन उपस्थित रहे। कार्यक्रम का समापन राष्ट्रगीत एवं सामूहिक संकल्प के साथ हुआ, जिसमें समाज की एकता, समरसता और राष्ट्रभक्ति को सुदृढ़ करने का आह्वान किया गया। सम्मेलन ने उपस्थित जनसमूह में संगठन, संस्कार और सामाजिक उत्तरदायित्व की भावना को और अधिक प्रगाढ़ करने का संदेश दिया।
टीम एबीएन, रांची। श्री जैन श्वेतांबर ओसवाल संघ का होली मिलन समारोह आज धूमधाम से डोरंडा कन्या पाठशाला में संपन्न हुआ। आज के कार्यक्रम में सभी ने एक- दूसरे को रंग लगाकर उनका स्वागत किया! बच्चों एवं बच्चियों ने रंगारंग सांस्कृतिक कार्यक्रमों के साथ साथ होली के नृत्य पेश किया। रिद्धि बांठिया ने नवकार महामंत्र के साथ नृत्य प्रस्तुत करते हुए कार्यक्रम की शुरुआत की। राजस्थान से पधारे कलाकार पंकज दोजख, रवि दोजख एवं उनके साथी कलाकारों ने चंग, ढ़ोल बजाते हुए होली के मन भावन गीतों को प्रस्तुत किया तथा मनोहर नृत्य प्रस्तुत किये गये। होली के पारंपरिक गीतों में मुख्य रूप से बाईसा रा वीरा... जयपुर आता तों लाज्यो... तारा री चुनरी, थारे साथे कोनी चालू... ओ रे बालम रसिया, रंग बरसे... भीगे चुनर वाली..., झीनी-झीनी उड़े रे गुलाल आज म्हारे आंगन में... आदि मधुर गीत कलाकारों ने प्रस्तुत किये। साथ ही बच्चों में आयशा, दर्शिका, दिविषा, एलीना, जयेश, लाव्या, ईशा, रूही, वेदिका, शिवानी, दीपिका, ट्विंकल, पूजा आदि ने भी मनमोहक नृत्य प्रस्तुत किया। मंच का संचालन सोनू पारख, ज्योति दस्सानी ने संयुक्त रूप से किया। रांची मंडल के अध्यक्ष बालबीर बोथरा तथा मंत्री संजय कोठारी ने बताया कि होली में हर वर्ष कि भांति मधुबन शिखर जी, पारसनाथ में आयोजित समारोह में होली कल सुबह 6 बजे बस से भारी संख्या में रांची संघ के लोग प्रस्थान करेंगे। ओसवाल संघ के अध्यक्ष सुभाष चंद बोथरा, सचिव विमल दस्साणी ने समाज के सभी लोगों को कार्यक्रम को सफल बनाने के लिए धन्यवाद दिया। आज के कार्यक्रम को सफल बनाने में छोटे लाल चोरड़िया, घेवर चंद नाहटा, अशोक सुराणा, लब्धि जैन, प्रकाश चंद नाहटा, अमर चंद बैंगानी, विनय नाहटा, राजेश पींचा, अक्षय सेठिया आदि ने मुख्य रूप से योगदान दिया। उक्त जानकारी मीडिया प्रभारी सुरेश जैन ने दी।
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