सरहुल संस्कृति, सामाजिक एकता, प्रकृति और आस्था का अद्भुत पर्व : संजय सर्राफ टीम एबीएन, रांची। हिंदी साहित्य भारती के उपाध्यक्ष सह झारखंड पेरेंट्स एसोसिएशन के प्रांतीय प्रवक्ता संजय सर्राफ ने कहा है कि भारत की समृद्ध सांस्कृतिक परंपराओं में आदिवासी समाज का विशेष स्थान है, जहां प्रकृति को ही ईश्वर का स्वरूप मानकर पूजा की जाती है। इन्हीं प्रमुख पर्वों में से एक है सरहुल, झारखंड और आसपास के इलाकों में मनाया जाने वाला सरहुल पर्व आदिवासी समाज का एक प्रमुख और पवित्र त्योहार है। यह उत्सव प्रकृति की पूजा और उसके संरक्षण का प्रतीक माना जाता है।सरहुल के दौरान साल वृक्ष की पूजा, पारंपरिक नृत्य, गीत और सामुदायिक भोज का विशेष महत्व होता है। इस पर्व के माध्यम से लोग प्रकृति, सूर्य और पृथ्वी के प्रति आभार व्यक्त करते हैं। सरहुल का त्योहार खासतौर पर झारखंड के उरांव, मुंडा और अन्य आदिवासी समुदायों के बीच बड़े उत्साह के साथ मनाया जाता है। इस अवसर पर गांवों में खुशी और उत्सव का माहौल देखने को मिलता है। सरहुल पर्व वसंत ऋतु के आगमन का प्रतीक है जब सखुआ (साल) वृक्ष में नये फूल खिलते हैं। सरहुल पर्व चैत्र शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को मनाया जाता है। इस वर्ष सरहुल 21 मार्च को मनाया जायेगा। यह पर्व प्रकृति, विशेषकर वृक्षों और धरती माता के प्रति कृतज्ञता प्रकट करने का अवसर है। आदिवासी समाज मानता है कि धरती और वनस्पति ही जीवन का आधार हैं, इसलिए उनकी पूजा करना मानव का कर्तव्य है। सरहुल का अर्थ ही होता है सरई (साल) के फूलों की पूजा। इस दिन साल वृक्ष के फूलों को पवित्र मानकर पूजा की जाती है। सरहुल केवल एक धार्मिक पर्व नहीं, बल्कि प्रकृति संरक्षण का संदेश देने वाला उत्सव है। यह पर्व मनुष्य और प्रकृति के बीच संतुलन बनाए रखने की प्रेरणा देता है। आदिवासी समाज का मानना है कि यदि जंगल सुरक्षित रहेंगे, तो जीवन भी सुरक्षित रहेगा। इस दिन लोग वर्षा, अच्छी फसल और समाज की सुख-समृद्धि की कामना करते हैं। सरहुल सामाजिक एकता और सामूहिकता का भी प्रतीक है। गांव के सभी लोग एक साथ मिलकर पूजा करते हैं, नृत्य-गीत करते हैं और आपसी भाईचारे को मजबूत बनाते हैं। यह पर्व पर्यावरण संरक्षण के प्रति जागरूकता फैलाने का भी एक महत्वपूर्ण माध्यम है। सरहुल पर्व से जुड़ी एक प्रमुख कथा के अनुसार, धरती माता और सूर्य देव के मिलन से सृष्टि का निर्माण हुआ। इस मिलन का प्रतीक ही सरहुल पर्व है।आदिवासी समाज के पुजारी, जिन्हें पाहन कहा जाता है, इस दिन विशेष पूजा-अर्चना करते हैं। वे गांव के सरना स्थल (पवित्र उपवन) में जाकर साल वृक्ष के फूलों से पूजा करते हैं और प्रकृति देवता से आशीर्वाद मांगते हैं। पूजा के बाद पाहन गांववासियों को प्रसाद के रूप में साल के फूल और पवित्र जल वितरित करते हैं। इसके बाद पूरे गांव में पारंपरिक नृत्य और गीतों का आयोजन होता है, जिसमें महिलाएं और पुरुष रंग-बिरंगे पारंपरिक वस्त्र पहनकर भाग लेते हैं। सरहुल पर्व आदिवासी संस्कृति की जीवंतता, प्रकृति के प्रति सम्मान और सामाजिक एकता का अद्भुत उदाहरण है। यह पर्व हमें सिखाता है कि प्रकृति के बिना मानव जीवन संभव नहीं है, इसलिए उसका संरक्षण अत्यंत आवश्यक है। आज के आधुनिक युग में, जब पर्यावरण संकट गहराता जा रहा है, सरहुल जैसे पर्व हमें प्रकृति के साथ सामंजस्य स्थापित करने की प्रेरणा देते हैं। यही इस पर्व की सबसे बड़ी विशेषता और प्रासंगिकता है।
जनसंख्या असंतुलन, तीर्थ क्षेत्रों की समुचित विकास एवं देश के सभी नागरिकों के लिए अनुच्छेद 29 और 30 के प्रावधान एक हो विषयों पर मिलेंगे सांसदों से : डॉ बिरेन्द्र साहु टीम एबीएन, रांची। विश्व हिन्दू परिषद, पटना क्षेत्र (झारखंड बिहार) के प्रतिनिधि मंडल सांसद संपर्क अभियान के तहत दोनों सदनों के सभी सांसदों से दिल्ली में 16 से 20 मार्च तक मिलकर तीन विशेष विषयों पर चर्चा करेंगे। क्षेत्र मंत्री डॉ बिरेन्द्र साहु ने बताया कि विहिप पटना क्षेत्र के प्रतिनिधि मंडल देश के कानून निर्माताओं से निवेदन करेंगे कि वर्तमान समय में जनसंख्या असंतुलन पर एक व्यापक राष्ट्रीय चिंतन की आवश्यकता है। पिछली अनेक सरकारों ने इस बारे में अपने-अपने तरीके से काम किया लेकिन अब आवश्यकता इस बात की है कि इसकी बारीकियों पर चिंतन कर एक प्रभावी जनसंख्या नीति बने और नारी सशक्तिकरण, स्वास्थ्य सेवाओं के विस्तार तथा क्षेत्रीय और सांप्रदायिक जनसंख्या संतुलन नीतियों जैसे माध्यमों के साथ जन-मन की सहभागिता से यह कार्य आगे बढ़े। डॉक्टर साहु ने बताया कि भारत धर्मप्राण देश है, जिसकी आत्मा तीर्थों में बसती है। तीर्थ विकास के बिना भारत के विकास की कल्पना अधूरी है। तीर्थ यात्राओं का देश की अर्थव्यवस्था में उल्लेखनीय योगदान है। इसलिए क्षेत्र के सभी सांसदों से निवेदन करेंगे कि तीर्थक्षेत्रों का समुचित विकास हो और वे भारत की अर्थव्यवस्था, संस्कृति और स्वाभिमान के केंद्र बिंदु बनकर, पुन: धर्म, आध्यात्म और मानव कल्याण के वैश्विक प्रहरी बनें। मंदिरों को सरकारी नियंत्रण से मुक्ति मिले, हिंदू का पैसा हिंदू हित में काम आये तथा तीर्थाटन के विकास के लिए संस्कृति मंत्रालय में एक स्वतंत्र विभाग का गठन कर इनका चहुंमुखी विकास हो। तीसरे विषय के रूप में संविधान के अनुच्छेद 29 और 30 के प्रावधानों को देश के सभी नागरिकों के लिए समान रूप से लागू करने के लिए सांसदों से निवेदन करेंगे, जिससे सभी धर्मों को धार्मिक शिक्षा का भेदभाव रहित सामान संवैधानिक अधिकार सुनिश्चित हो सके। साथ ही अल्पसंख्यक को परिभाषित करने की आवश्यकता को भी रेखांकित करेंगे। डॉ साहु ने कहा विहिप प्रतिनिधि मंडल बिना किसी राजनीतिक या विचार भेदभाव के हर दल के, हर मत- पंथ- संप्रदाय के और क्षेत्र के सभी सांसद से मिलकर खुलकर अपनी बात उनके समक्ष रखेंगे। प्रतिनिधि मंडल के रूप में झारखंड प्रांत से प्रांत अध्यक्ष चंद्रकांत रायपत, प्रांत सहमंत्री मनोज पोद्दार, विशेष संपर्क प्रांत प्रमुख अरबिंद सिंह व विशेष संपर्क प्रांत सहप्रमुख संतोष कुमार, उत्तर बिहार से प्रांत सहमंत्री इंदु शेखर, प्रांत सहमंत्री विकास भारती व सामाजिक समरसता प्रांत प्रमुख रवि प्रकाश तथा दक्षिण बिहार से विशेष संपर्क प्रांत सह प्रमुख विकास कुमार, सामाजिक समरसता प्रांत प्रमुख मैकू राम, नागेंद्र नागमणी, राकेश सिन्हा व संजय कुमार सिंह होंगे। उक्त जानकारी पटना क्षेत्र (झारखंड बिहार) विश्व हिंदू परिषद के डॉ बिरेन्द्र साहु (7033541040) ने दी।
चैत्र नवरात्रि शक्ति उपासना, आस्था, श्रद्धा और नवसृजन का पावन पर्व : संजय सर्राफ टीम एबीएन, रांची। श्री कृष्ण प्रणामी सेवा धाम ट्रस्ट एवं विश्व हिंदू परिषद सेवा विभाग के प्रांतीय प्रवक्ता संजय सर्राफ ने कहा है कि भारतीय संस्कृति में नवरात्रि का पर्व देवी शक्ति की आराधना और आध्यात्मिक साधना का महत्वपूर्ण अवसर माना जाता है। इस वर्ष चैत्र नवरात्रि 19 मार्च से 27 मार्च तक मनायी जायेगी। इन नौ दिनों में माता दुर्गा के नौ स्वरूपों की पूजा-अर्चना की जाती है। यह पर्व न केवल धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है, बल्कि भारतीय नववर्ष और वसंत ऋतु के आगमन का भी प्रतीक है। पौराणिक मान्यता के अनुसार, जब असुरों का अत्याचार पृथ्वी पर बढ़ गया था, तब देवताओं की प्रार्थना पर देवी दुर्गा ने अवतार लेकर महिषासुर का वध किया था। इसी विजय की स्मृति में नवरात्रि के दौरान शक्ति की उपासना की जाती है। शास्त्रों में वर्णित है कि इन नौ दिनों में माता दुर्गा के नौ स्वरूप- शैलपुत्री, ब्रह्मचारिणी, चंद्रघंटा, कूष्मांडा, स्कंदमाता, कात्यायनी, कालरात्रि, महागौरी और सिद्धिदात्री की पूजा की जाती है। प्रत्येक दिन देवी के एक स्वरूप की आराधना से भक्तों को अलग-अलग प्रकार की आध्यात्मिक शक्ति और आशीर्वाद प्राप्त होता है।नवरात्रि से जुड़ी एक प्रमुख कथा के अनुसार भगवान ब्रह्मा ने सृष्टि की रचना चैत्र मास की प्रतिपदा से ही आरंभ की थी। इसी कारण यह दिन भारतीय नवसंवत्सर का प्रारंभ भी माना जाता है। एक अन्य मान्यता के अनुसार, भगवान श्रीराम ने लंका विजय से पहले देवी दुर्गा की आराधना कर शक्ति प्राप्त की थी। उनकी विजय के पीछे माता दुर्गा की कृपा मानी जाती है, इसलिए नवरात्रि का पर्व धर्म, सत्य और विजय का भी प्रतीक है। चैत्र नवरात्रि का उद्देश्य केवल पूजा-पाठ तक सीमित नहीं है, बल्कि आत्म शुद्धि,संयम और सकारात्मक ऊर्जा को जीवन में स्थापित करना भी है। इस दौरान श्रद्धालु उपवास रखते हैं, दुर्गा सप्तशती का पाठ करते हैं और भक्ति भाव से माता की आराधना करते हैं। मंदिरों और घरों में कलश स्थापना, अखंड ज्योति तथा कन्या पूजन जैसे धार्मिक अनुष्ठान किये जाते हैं। नवरात्रि के नौ दिन साधना, संयम और आध्यात्मिक उन्नति के लिए अत्यंत शुभ माने जाते हैं। ऐसा विश्वास है कि सच्चे मन से की गयी देवी की उपासना से जीवन की बाधाएं दूर होती हैं और सुख-समृद्धि का मार्ग प्रशस्त होता है। समाज में यह पर्व सकारात्मक ऊर्जा, धार्मिक जागरूकता और सांस्कृतिक एकता को भी मजबूत करता है।चैत्र नवरात्रि भारत की सनातन परंपरा में आस्था, श्रद्धा और शक्ति की उपासना का प्रतीक है। यह पर्व हमें सिखाता है कि सत्य और धर्म की विजय अवश्य होती है तथा जीवन में सकारात्मकता और आत्मविश्वास बनाये रखना चाहिए। नवरात्रि के इन पावन दिनों में मां दुर्गा की कृपा से भक्तों के जीवन में सुख, शांति और समृद्धि का संचार होता है, इस प्रकार चैत्र नवरात्रि केवल धार्मिक उत्सव ही नहीं, बल्कि आध्यात्मिक जागरण, नवचेतना और सांस्कृतिक विरासत को सहेजने का महत्वपूर्ण पर्व है।
टीम एबीएन, रांची। रांची में हिंदू समाज की एकता, जागरण और सांस्कृतिक चेतना को सुदृढ़ करने के उद्देश्य से रांची महानगर मे आज 3 स्थानों पर कार्यक्रम हुए 1. टाटी सिलवे 2. डोरंडा एवं 3. कडरू कपिलदेव मैदान मे विराट हिंदू सम्मेलन का भव्य आयोजन किया गया। महानगर में आयोजित इन सम्मेलनों में समाज के विभिन्न वर्गों के लोगों ने उत्साहपूर्वक भाग लिया। कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य समाज में संगठन की भावना को मजबूत करना, सांस्कृतिक मूल्यों के संरक्षण के प्रति जागरूकता बढ़ाना तथा राष्ट्रहित में समाज की सक्रिय भागीदारी सुनिश्चित करना था। कार्यक्रम में समाज से आए बड़ी संख्या में मातृशक्ति एवं सज्जन वृंद उपस्थित रहे। तीनों कार्यक्रम मे लगभग 1100 से अधिक लोगों की सहभागिता ने इस आयोजन को अत्यंत सफल और प्रेरणादायी बना दिया। कार्यक्रम का शुभारंभ वैदिक मंत्रोच्चार, हवन एवं दीप प्रज्वलन के साथ हुआ। इसके पश्चात मंचासीन अतिथियों का स्वागत पुष्पगुच्छ और अंगवस्त्र भेंट कर किया गया। सम्मेलन में विभिन्न क्षेत्रों से आए वक्ताओं ने समाज, संस्कृति, संगठन और राष्ट्र के विषयों पर अपने विचार व्यक्त किए। सम्मेलन को संबोधित करते हुए स्वामी सत्यनारायण सौमित्र ने अपने उद्बोधन में कहा कि भारतीय संस्कृति का मूल संदेश धर्मो रक्षति रक्षित: है।उन्होंने कहा कि जब समाज अपने धर्म, संस्कृति और मूल्यों की रक्षा करता है, तभी धर्म भी उसकी रक्षा करता है। उन्होंने कहा कि हिंदू समाज को अपनी पहचान, अपने इतिहास और अपनी परंपराओं के प्रति जागरूक होना आवश्यक है। यदि समाज संगठित और जागृत रहेगा तो कोई भी शक्ति उसे कमजोर नहीं कर सकती। उन्होंने युवाओं का आह्वान करते हुए कहा कि उन्हें अपने गौरवशाली इतिहास से प्रेरणा लेकर समाज और राष्ट्र के निर्माण में सक्रिय भूमिका निभानी चाहिए। स्वामी सौमित्र जी ने कहा कि भारतीय संस्कृति सहिष्णुता, समरसता और मानवता का संदेश देती है, लेकिन इसके साथ-साथ समाज को अपनी सुरक्षा और आत्मसम्मान के प्रति भी सजग रहना चाहिए। उन्होंने कहा कि आज के समय में परिवार, समाज और राष्ट्र के प्रति जिम्मेदारी को समझना अत्यंत आवश्यक है। यदि समाज का प्रत्येक व्यक्ति अपने कर्तव्यों का पालन करेगा तो राष्ट्र स्वत: मजबूत होगा। कार्यक्रम में निशा उरांव ने सरना और सनातन परंपराओं के संबंध पर अपने विचार रखते हुए कहा कि आदिवासी समाज और सनातन समाज की जड़ें एक ही सांस्कृतिक परंपरा से जुड़ी हुई हैं। उन्होंने कहा कि दोनों ही परंपराएं प्रकृति को पूजनीय मानती हैं और धरती को माता के रूप में सम्मान देती हैं। उन्होंने बताया कि आदिवासी समाज की पूजा पद्धति और परंपराएं अत्यंत प्राचीन हैं और इन्हें संरक्षित रखने की आवश्यकता है। निशा उरांव जी ने कहा कि भारतीय संस्कृति की सबसे बड़ी विशेषता विविधता में एकता है। अलग-अलग पूजा पद्धतियों और परंपराओं के बावजूद सभी का लक्ष्य मानवता, प्रकृति और समाज के प्रति सम्मान की भावना को बढ़ाना है। उन्होंने कहा कि समाज को विभाजित करने वाली शक्तियों से सावधान रहने की आवश्यकता है और सभी को मिलकर सांस्कृतिक विरासत की रक्षा के लिए प्रयास करना चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि आदिवासी समाज की परंपराएं, गीत, संगीत और सांस्कृतिक धरोहर अत्यंत मूल्यवान हैं और इन्हें आने वाली पीढ़ियों तक सुरक्षित रूप से पहुंचाना हम सभी की जिम्मेदारी है। सम्मेलन में अन्य वक्ताओं ने भी समाज के विभिन्न विषयों पर अपने विचार रखते हुए कहा कि आज आवश्यकता इस बात की है कि समाज में आपसी सहयोग, समरसता और संगठन की भावना को मजबूत किया जाए। उन्होंने कहा कि हिंदू समाज की शक्ति उसकी एकता में है। जब समाज एकजुट होकर आगे बढ़ता है, तभी वह किसी भी चुनौती का सामना करने में सक्षम होता है। कार्यक्रम के मुख्य वक्ता दीपक जी, (रांची महानगर कार्यवाह, आरएसएस) ने अपने संबोधन में सामाजिक समरसता पर विशेष बल दिया। उन्होंने कहा कि जाति, वर्ग या क्षेत्र के आधार पर किसी भी प्रकार का भेदभाव समाज को कमजोर करता है। भारतीय संस्कृति का मूल संदेश सर्वे भवन्तु सुखिन: और वसुधैव कुटुम्बकम् है, जो पूरे विश्व को एक परिवार के रूप में देखने की प्रेरणा देता है। इसलिए सभी को मिलकर समाज में समानता और भाईचारे की भावना को बढ़ावा देना चाहिए। कार्यक्रम में परिवार व्यवस्था और संस्कारों के महत्व पर भी विस्तृत चर्चा की गई। वक्ताओं ने कहा कि परिवार ही समाज की आधारशिला है। यदि परिवार मजबूत होगा तो समाज और राष्ट्र भी मजबूत होंगे। बच्चों और युवाओं को भारतीय संस्कृति, नैतिक मूल्यों और राष्ट्रभक्ति की भावना से जोड़ना समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है। माता-पिता और परिवार के वरिष्ठ सदस्यों की जिम्मेदारी है कि वे नई पीढ़ी को अच्छे संस्कार दें और उन्हें अपने इतिहास और परंपराओं से परिचित कराएं। सम्मेलन में पर्यावरण संरक्षण के विषय पर भी महत्वपूर्ण विचार रखे गए। वक्ताओं ने कहा कि भारतीय संस्कृति सदैव से प्रकृति के संरक्षण और संतुलित जीवन का संदेश देती आई है। पेड़-पौधों, नदियों, पर्वतों और धरती को माता के रूप में सम्मान देने की परंपरा भारत की सांस्कृतिक पहचान है। आज जब पूरी दुनिया पर्यावरण संकट का सामना कर रही है, तब भारतीय जीवन शैली और परंपराएं पूरे विश्व के लिए मार्गदर्शक बन सकती हैं। कार्यक्रम में स्वदेशी जीवन शैली, भारतीय भाषा, वेशभूषा और भोजन के महत्व पर भी जोर दिया गया। वक्ताओं ने कहा कि हमें अपनी मातृभाषा, अपनी संस्कृति और अपनी परंपराओं पर गर्व होना चाहिए। भारतीय वेशभूषा, भोजन और जीवन पद्धति केवल परंपरा ही नहीं बल्कि हमारे सांस्कृतिक आत्मसम्मान का प्रतीक भी है। सम्मेलन में युवाओं की भूमिका पर विशेष चर्चा की गयी। वक्ताओं ने कहा कि युवा शक्ति किसी भी समाज और राष्ट्र की सबसे बड़ी ताकत होती है। यदि युवा अपने इतिहास, संस्कृति और राष्ट्र के प्रति जागरूक होंगे तो देश का भविष्य उज्ज्वल होगा। युवाओं को शिक्षा के साथ-साथ सामाजिक कार्यों और राष्ट्र निर्माण की गतिविधियों में भी सक्रिय भागीदारी निभानी चाहिए। इस अवसर पर वक्ताओं ने समाज के सभी वर्गों से एकजुट होकर राष्ट्रहित में कार्य करने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि समाज की एकता, सांस्कृतिक जागरूकता और सकारात्मक सोच ही राष्ट्र की प्रगति का आधार है। यदि हम अपनी परंपराओं, संस्कारों और मूल्यों को अपनाते हुए आगे बढ़ेंगे तो भारत विश्व में एक मजबूत और आदर्श राष्ट्र के रूप में स्थापित होगा। कार्यक्रम के दौरान पूरे वातावरण में उत्साह और प्रेरणा का माहौल देखने को मिला। बड़ी संख्या में उपस्थित मातृशक्ति एवं सज्जन वृंद ने कार्यक्रम को सफल बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। समाज के विभिन्न क्षेत्रों से आए लोगों ने एकजुट होकर समाज और राष्ट्र की उन्नति के लिए कार्य करने का संकल्प लिया। कार्यक्रम के अंत में सभी उपस्थित लोगों ने सामूहिक रूप से भारत माता की आरती की। आरती के साथ ही देश, समाज और संस्कृति की उन्नति तथा विश्व शांति की कामना की गई। इसके पश्चात सभी उपस्थित श्रद्धालुओं को प्रसाद वितरण किया गया और सभी ने श्रद्धापूर्वक प्रसाद ग्रहण किया। इस प्रकार उत्साह, श्रद्धा और सामाजिक जागरूकता से परिपूर्ण यह विराट हिंदू सम्मेलन समाज को एकजुट करने और सांस्कृतिक चेतना को मजबूत करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम साबित हुआ।
टीम एबीएन, रांची। बिरसा आबा की धरती रांची में आगामी 1 से 6 अप्रैल तक श्री दिगंबर जैन पंचायत के तत्वावधान में भव्य पंचकल्याणक प्रतिष्ठा महोत्सव का आयोजन होगा। यह कार्यक्रम सरकुलर रोड स्थित बिरसा मुंडा फन पार्क में आचार्य श्री विद्या सागर जी महाराज के परम प्रभावक शिष्य परम पूज्य गुरुदेव 108 श्री प्रमाण सागर जी महाराज संघ के सान्निध्य में होगा। महोत्सव के सफल संचालन के लिए तैयारियों की शुरुआत हो चुकी है। जहां आयोजन स्थल पर भव्य पंडाल बनाया जा रहा है। इसके साथ अलग-अलग समितियों का गठन कर तैयारियां की जा रही है। इसमें श्रद्धालुओं के लिए स्थल पर भोजन,आवास की भव्य व्यवस्था की जा रही है। जहां महोत्सव को लेकर पांच दिनों तक पूरी राजधनी में मुनिश्री के सानिध्य में ज्ञान की गंगा बहती रहेगी और वातावरण भक्तिमय, अनुशासित और आध्यात्मिक ऊर्जा से भरा रहेगा। यह महोत्सव आत्मा से परमात्मा बनने की प्रक्रिया का प्रतीक है।मुख्य संयोजक बने पूरनमल सेठी उप संयोजक पंकज पांड्या, मनोज काला होंगे, जिनमें अध्यक्ष प्रदीप बाकलीवाल मंत्री जीतेन्द्र छाबड़ा मुख्य संयोजक पूरणमल सेठी, संजय छाबड़ा, धर्मेंद्र छाबड़ा, मनोज काला, चेतन पाटनी, मनीष गंगवाल, पंकज पांड्या, राकेश गंगवाल, मनीष बड़जात्या, विनीता सेठी, मोनिका ठोल्या, कैलाश बड़जात्या, महेन्द्र झांझरी, अशोक काशलीवाल, और अन्य लोगों के बीच अलग-अलग विभागों की जिम्मेंवारी सौंपी गई है।
हिन्दू नववर्ष में विहिप/ बजरंग दल द्वारा भव्य भगवा ध्वज पूजन, भारत माता आरती तथा सामूहिक हनुमान चालीसा आयोजन किया जायेगा: रितेश कुमार एबीएन न्यूज नेटवर्क, लोहरदगा। विश्व हिंदू परिषद तथा बजरंग दल के द्वारा यह निर्णय लिया गया कि आगामी हिन्दू नववर्ष चैत्र शुक्ल प्रतिपदा विक्रम संवत 2083, अंग्रेजी कलेंडर अनुसार 19 मार्च दिन वृहस्पतिवार को सुबह 9 बजे स्थानीय वीर शिवा जी चौक अवस्थित सिद्धि दात्री दुर्गा मंदिर प्रांगण में भगवा ध्वज पूजन, भारत माता आरती तथा सामूहिक हनुमान चालीसा का आयोजन के साथ प्रसाद वितरण कार्यक्रम किया जायेगा। इस निमित्त नव निर्वाचित नगर परिषद अध्यक्ष अनिल उरांव के साथ युवा भाजपा प्रदेश उपाध्यक्ष अजातशत्रु, भाजपा जिलाध्यक्ष अजय पंकज, युवा भाजपा जिलाध्यक्ष बाल्मीकि कुमार, विश्व हिंदू परिषद जिलाध्यक्ष रितेश कुमार, बजरंग दल संयोजक पवन प्रजापति, केंद्रीय महावीर मंडल अध्यक्ष विपुल तामेड़ा, केंद्रीय दुर्गा पूजा समिति अध्यक्ष संतोष लकड़ा की विशेष उपस्थिति के साथ साथ विश्व हिंदू परिषद तथा बजरंग दल के सभी पदाधिकारी, सदस्य तथा जिला के सनातनी युवा एवं गणमान्य उपस्थित रहेंगे। कार्यक्रम की सफलता हेतु सम्पर्क अभियान भी चलाया जायेगा।
सेवा कार्यों को समाज के हर वर्ग का सहयोग एवं प्रोत्साहन मिलना चाहिए : संजय सर्राफ टीम एबीएन, रांची। परमहंस डॉ संत शिरोमणी श्री श्री 108 स्वामी सदानंद जी महाराज के सानिध्य में श्री कृष्ण प्रणामी सेवा धाम ट्रस्ट के द्वारा संचालित विगत 2 वर्षों से चल रहे पीड़ित मानव सेवा के पावन तीर्थ स्थल मंगल राधिका सदानंद सेवाधाम पुंदाग के प्रांगण में सद्गुरु कृपा अपना घर आश्रम (सत्य-प्रेम सभागार) रांची में आज मदनलाल लाखोटिया एवं उनके परिवार के सौजन्य से आश्रम में रह रहे 45 मंदबुद्धि दिव्यांग निराश्रित प्रभु जी एवं आश्रम में रहकर उनकी सेवा करने वाले सेवादार साथियों के बीच विभिन्न व्यंजनों के साथ अन्नपूर्णा सेवा भोजन प्रसादी का विधिवत आश्रम के किचन में भोजन बनवाकर भोजन खिलाया गया। सद्गुरु कृपा अपना घर आश्रम के प्रवक्ता सह मीडिया प्रभारी संजय सर्राफ ने बताया कि 19 फरवरी से 15 मार्च तक 25 दिनों मे 5550 निराश्रित प्रभुजी एवं उनकी देखभाल करने वाले सेवादार साथियों के बीच अन्नपूर्णा सेवा भोजन प्रसाद का वितरण किया गया। मंगल राधिका सदानंद सेवाधाम सदगुरू कृपा अपना घर (सत्य-प्रेम सभागार) में-सावित्री देवी, विजय प्रकाश अग्रवाल, कविता गाडोदिया, प्रेमचंद्र मिश्रा, मनोज कुमार, उमेश भगत, श्याम सुंदर, विकास कुमार, अभिषेक कुमार, मधु छावनिका, विजय पोद्दार, योगेंद्र प्रसाद सिंह, निष्क नारायण, ललिता पोद्दार, अभिनव सिंह, शरद पोद्दार, दिगंबर सिंह, रजनी गुप्ता, झलक कुमारी, शंकर लाल पेडिवाल, सुरेश अग्रवाल, विद्या देवी अग्रवाल, रमन बोड़ा के सौजन्य से सभी निराश्रित प्रभुजी को भोजन प्रसादी खिलाकर सेवा की गयी। सभी ने ट्रस्ट के सदस्यों को बहुत बहुत धन्यवाद एवं अपना अमूल्य आशीर्वाद दिया। ट्रस्ट के प्रवक्ता संजय सर्राफ ने बताया कि इसके अलावे कई लोगों द्वारा आश्रम में रह रहे निराश्रितों, मंदबुद्धि, दीनबंधुओं के लिए खाद्य सामग्री एवं जरूरत के समान प्रदान किया गया। उन्होंने कहा कि सेवा कार्यों को समाज के हर वर्ग का सहयोग और प्रोत्साहन मिलना चाहिए। उन्होंने कहा कि मानव प्रभु सेवा से बढ़कर कोई कार्य नहीं है। अन्नपूर्णा सेवा के पुनीत कार्य में ट्रस्ट के अध्यक्ष डुंगरमल अग्रवाल, उपाध्यक्ष राजेंद्र प्रसाद अग्रवाल, निर्मल जालान, मनोज कुमार चौधरी, निर्मल छावनिका, सज्जन पाड़िया, पुजारी अरविंद पांडे, पुरणमल सर्राफ, शिव भगवान अग्रवाल, सुरेश अग्रवाल, नंद किशोर चौधरी, संजय सर्राफ, विशाल जालान, सुनील पोद्दार, मधुसूदन जाजोदिया, विष्णु सोनी, सुरेश भगत सहित अन्य सदस्यगण उपस्थित थे। उक्त जानकारी सद्गुरु कृपा अपना घर आश्रम और श्री कृष्ण प्रणामी सेवा धाम ट्रस्ट के प्रवक्ता सह मीडिया प्रभारी संजय सर्राफ ने दी।
एबीएन न्यूज नेटवर्क, नामकुम (रांची)। लायंस क्लब आॅफ रांची अम्बर की अध्यक्ष दीपाली रस्तोगी एवं सचिव रश्मि सिंह के नेतृत्व में ग्राम बराम, बराम पंचायत, नामकुम में लाइफ केयर डायग्नोस्टिक सेंटर, रांची के सहयोग से ग्रामीण महिलाओं के लिए नि:शुल्क स्वास्थ्य जांच शिविर का आयोजन किया गया। इस शिविर में 200 से अधिक ग्रामीण महिलाओं की स्वास्थ्य जांच की गयी। जांच के दौरान डायबिटीज, हाइपरटेंशन (ब्लड प्रेशर), हीमोग्लोबिन, बीएमआई (बॉडी मास इंडेक्स) तथा बॉडी फैट की जांच की गयी और स्वास्थ्य संबंधी परामर्श भी दिया गया। शिविर में चिकित्सा टीम का नेतृत्व लायन सिमू रवि तथा डाइटिशियन रवि महतो ने किया। उनकी टीम ने भी ग्रामीण महिलाओं को स्वास्थ्य संबंधी महत्वपूर्ण जानकारी दी। कार्यक्रम को सफल बनाने में लायन माधवेश, योगेंद्र, राधिका, मन्नू, अनुज, रवि, लायन ज्योति एवं लायन रंजीता सहित क्लब की पूरी टीम का विशेष सहयोग रहा। सभी के संयुक्त प्रयास से यह स्वास्थ्य शिविर ग्रामीण महिलाओं के लिए काफी लाभदायक साबित हुआ।
विश्व उपभोक्ता दिवस 15 मार्च कोउपभोक्ताओं को जागरूक सशक्त और जिम्मेदार बनाने तथा अधिकारों की जागरूकता का वैश्विक अभियान: संजय सर्राफएबीएन सोशल डेस्क। झारखंड पेरेंट्स एसोसिएशन के प्रांतीय प्रवक्ता सह हिंदी साहित्य भारती के उपाध्यक्ष संजय सर्राफ ने कहा है कि हर वर्ष 15 मार्च को पूरे विश्व में विश्व उपभोक्ता अधिकार दिवस मनाया जाता है। इस दिवस का उद्देश्य उपभोक्ताओं को उनके अधिकारों के प्रति जागरूक करना, उन्हें शोषण से बचाना तथा बाजार व्यवस्था में पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करना है। आज के आधुनिक उपभोक्तावादी युग में यह दिवस अत्यंत महत्वपूर्ण बन गया है क्योंकि बाजार में वस्तुओं और सेवाओं की बढ़ती प्रतिस्पर्धा के साथ-साथ उपभोक्ताओं के हितों की रक्षा भी आवश्यक हो गई है।विश्व उपभोक्ता दिवस मनाने की प्रेरणा अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति जॉन एफ. केनेडी के उस ऐतिहासिक भाषण से मिली, जो उन्होंने 15 मार्च 1962 को अमेरिकी संसद में दिया था। इस भाषण में उन्होंने उपभोक्ताओं के चार मूलभूत अधिकारों- सुरक्षा का अधिकार,जानकारी का अधिकार,चयन का अधिकार और अपनी बात सुने जाने का अधिकार-को मान्यता दी। इसी ऐतिहासिक पहल की स्मृति में बाद में उपभोक्ता संगठनों द्वारा 15 मार्च को विश्व उपभोक्ता अधिकार दिवस के रूप में मनाया जाने लगा। वर्ष 1983 से यह दिवस वैश्विक स्तर पर नियमित रूप से मनाया जा रहा है।इस दिवस का मुख्य उद्देश्य उपभोक्ताओं को उनके अधिकारों और कर्तव्यों के प्रति जागरूक करना है। उपभोक्ता किसी भी अर्थव्यवस्था का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा होते हैं, क्योंकि बाजार की पूरी व्यवस्था उन्हीं की आवश्यकताओं और मांगों के आधार पर संचालित होती है। यदि उपभोक्ता जागरूक और सशक्त होंगे तो व्यापारिक संस्थान भी ईमानदारी और पारदर्शिता के साथ कार्य करने के लिए बाध्य होंगे। इसलिए इस दिन विभिन्न देशों में सेमिनार, जागरूकता अभियान, कार्यशालाएं और जनसंवाद कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं।भारत में भी उपभोक्ता अधिकारों की सुरक्षा के लिए कई महत्वपूर्ण कदम उठाए गए हैं। वर्ष 1986 में भारत सरकार ने उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम 1986 लागू किया, जिसे बाद में और अधिक प्रभावी बनाने के लिए उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम 2019 लागू किया गया। इस कानून के माध्यम से उपभोक्ताओं को धोखाधड़ी, मिलावटी वस्तुओं, गलत विज्ञापन और खराब सेवाओं से सुरक्षा प्रदान की जाती है। इसके तहत जिला, राज्य और राष्ट्रीय स्तर पर उपभोक्ता आयोग स्थापित किए गए हैं, जहां उपभोक्ता अपनी शिकायत दर्ज करा सकते हैं। विश्व उपभोक्ता दिवस का महत्व केवल अधिकारों की जानकारी तक सीमित नहीं है, बल्कि यह जिम्मेदार उपभोक्ता बनने का संदेश भी देता है। आज के समय में डिजिटल खरीदारी, ऑनलाइन सेवाएं और ई-कॉमर्स के बढ़ते प्रभाव के कारण उपभोक्ताओं के सामने नई चुनौतियां भी सामने आ रही हैं।इसलिए यह आवश्यक है कि उपभोक्ता वस्तुओं की गुणवत्ता, कीमत, गारंटी और सेवा संबंधी सभी जानकारी प्राप्त करने के बाद ही खरीदारी करें तथा किसी भी प्रकार की धोखाधड़ी होने पर अपने अधिकारों का उपयोग करें। कहा जा सकता है कि विश्व उपभोक्ता दिवस केवल एक औपचारिक दिवस नहीं, बल्कि उपभोक्ताओं को जागरूक, सशक्त और जिम्मेदार बनाने का वैश्विक अभियान है। यदि उपभोक्ता अपने अधिकारों के प्रति सजग होंगे तो बाजार व्यवस्था में पारदर्शिता बढ़ेगी, अनुचित व्यापारिक गतिविधियों पर रोक लगेगी और समाज में न्यायपूर्ण एवं संतुलित आर्थिक व्यवस्था का निर्माण संभव हो सकेगा। इसलिए प्रत्येक नागरिक को इस दिवस के महत्व को समझते हुए अपने अधिकारों के साथ-साथ अपने कर्तव्यों के प्रति भी सजग रहना चाहिए।
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