राजकुमारी पाण्डेयएबीएन सोशल डेस्क। सनातन धर्म में होलिका दहन का बड़ा विशेष महत्व है। सनातन धर्मावलंबियों को इसका बड़ा बेसब्री से इंतजार रहता है। वर्षभर के अच्छे-बुरे कार्यों और उनके शुभ-अशुभ फलाफल से पार पाने का भी इंतजार इस दिन खत्म होता है। यही कारण है कि लोग इसे बड़े ही इंतजार के साथ आयोजित करते हैं। इस वर्ष होलिका दहन आज यानी छह मार्च को मनाया जायेगा। पूर्णिमा तिथि पर भद्रा का साया होने के कारण इसे रात्रि 12:26 के बाद मनाया जा सकेगा। मंगलवार को दिनभर पूर्णिमा तिथि होने और चैत्र कृष्ण प्रतिपदा का सूर्योेदयकालीन तिथि बुधवार को होने के चलते होली बुधवार यानी आठ मार्च को मनाया जायेगा। होलिका दहन पूजा विधि सबसे पहले नहा-धोकर स्वच्छ कपड़े धारण करें। फिर पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुंह करके बैठे सभी पूजन सामग्री को एक थाली में रखें। फिर भगवान गणेश, मां दुर्गा, हनुमान जी, भगवान नरसिंह, गिरिराज भगवान और राधा-राधी का स्मरण करें। फिर पूजा की थाली उन्हें अर्पित करें और अपने और परिवार की सुख-शांति की प्रार्थना करें। फिर होलिका यावनी लकड़ी पर अक्षत, धूप, पुष्प, मूंग दाल, हल्दी के टुकड़े, नारियल और गाय के गोबर से बनी माला अर्पित करें। इसके बाद उसमें आग लगायें और चारों ओर परिक्रमा करें। होलिका अग्नि को जल अर्पित करें। आरती करें और अग्नि को प्रणाम करें।
टीम एबीएन, रांची। लायंस इंटरनेशनल के मार्गदर्शन और कई सेवाओं में से एक महिलाओं के स्वस्थ्य संबंधी कार्यों को प्राथमिकता दी गयी है। इस उद्देश्य की पूर्ति होने से लायंस क्लब आॅफ रांची ईस्ट के लिए आज का दिन बहुत खास है। आज एक बहुप्रतीक्षित स्थायी परियोजना वनिता कुटीर उद्योग (सेनेटरी पैड बनाने का एक उद्योग), गांधी नगर, कांके रोड, रांची का उद्घाटन रांची सांसद संजय सेठ ने किया। उन्होंने कहा कि एक लायन सदस्य होने के नाते ऐसी सेवाएं मेरे दिल से जुड़ी हुई हैं। महिलाएं राष्ट्र के विकास मे सहायक हैं और उनमें सृजन की शक्ति है। इस परियोजना का लाभ महिलाओं को अवश्य मिलेगा। इस परियोजना के प्रायोजक बंसल परिवार के सोहन लाल बंसल हैं। मौके पर उप महापौर संजीव विजयवर्गीय, प्रथम उप जिलापाल कमल जैन, चेंबर अध्यक्ष किशोर मंत्री, अनुपमा लोचन, अध्यक्ष अध्यक्ष रतन अग्रवाल, उपाध्यक्ष भारतेंदु झा, सचिव सुनील माथुर, कोषाध्यक्ष अमरचंद बेगानी, परियोजना प्रभारी सुनीता अग्रवाल, पूर्व अध्यक्ष नेमी अग्रवाल, अमरजीत गिरधर, रवि आनंद, राम कृष्ण सहित कई सदस्य वहां मौजूद थे। यह जानकारी क्लब के उपाध्यक्ष भारतेंदु झा ने दी।
टीम एबीएन, खूंटी। आधुकिता के इस दौर में बहुत की परपंराएं अपना अस्तित्व खोती जा रही हैं, पर कुछ रीति-रिवाज ऐसे हैं, जो बड़े-बड़े झंझावातों के बीच भी अपने को बचाकर रखने में सफल रही हैं। उन्ही परंपराओं में एक है फाग या फगुआ काटना जिसे संवत काटना भी कहते हैं। आमतौर पर रंगों के त्योहार होली के पूर्व फाल्गुन पूर्णिमा को होलिका दहन किया जाता है, जिसमें लकड़ियों को जमाकर उसे जलाया जाता है, लेकिन जनजातीय समाज और दक्षिणी छोटानागपुर के खूंटी, गुमला, लोहरदगा, सिमडेगा, सिंहभूम आदि जिले में गैर आदिवासियों द्वारा होलिका दहन की नहीं, फाग काटने की परंपरा है। फाल्गुन पूर्णिमा की रात को शुभ मुहूर्त में गांव के पाहन द्वारा सेमल या एरंड की डालियों पर खेर घास या पुआल लपेटकर उसे जलाया जाता है और जलती हुई डालियों को गांव के लोग तलवार या दूसरे धारदार हथियारों से काटते हैं। पूजा के दौरान पाहन द्वारा पूजा-अर्चना के बाद मुर्गे की बलि दी जाती है। फाग जलने से उठने वाले धुएं की दिशा देखकर पाहन भविष्यवाणी करता है कि उस वर्ष वर्षा कैसी होगी और खेती-किसानी की स्थिति क्या होगी। फाग काटने के पूर्व रात को गांव के पुरुष और बच्चे सामूहिक रूप से नाचते-गाते फाग काटने वाले स्थान जिसे फगुवा टांड़ कहा जाता है। वहां पहुंचते हैं और पाहन द्वारा पूजा-अर्चना के बाद फाग या संवत काटते है। पहला फाग काटने का अधिकार गांव के पाहन को ही है। पाहन के बाद ही गांव के लोग संवत काटते हैं।दूसरे दिन अर्थात होली के दिन गांव के लोग ढोल-मांदर की थाप पर नाचते-गाते फगुवा टांड़ पहुंचते हैं और वहां की राख का लगाते हैं और दूसरे को भी भस्म का टीका लगाकर एक दूसरे को होली और नव वर्ष की शुभकामनाएं देते हैं।
काफी दिन से आ रही है खांसी तो हो जायें अलर्टएबीएन सोशल डेस्क। इन दिनों जहां देखों वहां खांसी का कहर जारी है। अमूमन ऐसी भयंकर खांसी की दिक्कत तब देखी गयी थी जब कोरोना अपने पीक पर था और लोगों के अंदर उसकी दहशत थी, लेकिन अब बिल्कुल वैसा ही टॉर्चर लोग फिर महसूस कर रहे हैं। लोगों में इस बात को लेकर कंफ्यूजन है कि क्या ये कोरोना का ही रूप है या कोई नया वायरस जिसकी चपेट में अभी हर चौथा या पांचवां शख्स है। ये ऐसी खांसी है जो एक बार आने के बाद जाने का नाम नहीं ले रही। खांसते-खांसते लोगों के फेफड़े हिल जाते हैं। सांस फूलने लगती है। गले में दर्द होने लगता है। कई बार तो पूरी-पूरी रात खांसते हुए गुज़र जाती है। चिंता की बात ये है कि पहले जो खांसी 5 या 6 दिनों में ठीक हो जाती थी। उसे इस बार में जाने में 25 से 30 दिन तक का समय लग रहा है। लेकिन क्या आप इसकी वजह जानते हैं। क्या आपको इस बात का अंदाज़ा है कि इस बार खांसी इतनी खतरनाक क्यों है। आपको इस खांसी से बचने के लिए किस तरह की तैयारी करनी होगी। इस खबर में जानिये क्या है यह वायरस और इससे बचने के उपाय...दरअसल इसके पीछे एक ऐसा अदृश्य वायरस है, जो कोरोना तो नहीं है लेकिन इसके लक्षण बिल्कुल कोरोना जैसे हैं। लेकिन आप मिनी कोविड भी कह सकते हैं लेकिन इसका नाम हैं इंफ्लूएंजा ए – एच3एन2। जो इस वक्त देश के कई शहरों में तेज़ी से फैल चुका है। और हर दिन के साथ इसके मरीज़ों की संख्या बढ़ती जा रही है। आईसीएमआर ने भी इस वायरस को लेकर देश में खतरे का अलार्म बजा दिया है और बिल्कुल कोविड वाली सावधानी बरतने की सलाह की है। क्योंकि कोरोना की तरह इस वायरस से भी संक्रमित लोगों को सबसे ज़्यादा दिक्कत खांसी और बुखार की है।करीब 92 फीसदी लोग ऐसे हैं। जो इंफ्लूएंजा ए नाम के इस वायरस की चपेट में आने के बाद बुखार से पीड़ित हैं।86% लोग ऐसे हैं जिन्हें ऐसी खांसी आ रही है, जो एक बार शुरू होने के बाद रुकने का नाम नहीं लेती।27% लोगों को खांसी के साथ साथ सांस लेने में दिक्कत भी महसूस हुई है।जबकि 10 फीसदी मरीज़ ऐसे हैं। जिन्हें खांसी और सांस लेने में दिक्कत की वजह से ऑक्सीजन तक की ज़रूरत पड़ गयी।इंफ्लूएंजा ए – एच3एन2 से पीड़ित 7 प्रतिशत मरीज़ों को तो आईसीयू में भर्ती कराने की नौबत आ गयी।खांसी और बुखार के लिए ज़िम्मेदार इंफ्लूएंजा ए को मिनी कोविड क्यों कहा जा रहा है। आप भी उस खतरे को समझिये।जिस तरह कोरोना सीधे फेफड़ों पर अटैक करता है। वैसे ही इस वायरस की वजह से भी फेफड़ों में बेहद खतरनाक संक्रमण हो रहा है।जैसे कोरोना एक शख़्स से दूसरे शख़्स में फैलता है ठीक वैसे ही इंफ्लूएंजा ए नाम का ये वायरस भी एक दूसरे के संपर्क में आने से तेज़ी से फैलता जाता है।जिस तरह कोरोना के कई केसेस में मरीज़ों को ठीक करने के लिए डॉक्टर्स स्टेरॉयड का इस्तेमाल कर रहे थे। वैसे ही इस बार भी कुछ मरीज़ों को ठीक करने के लिए स्टेरॉयड की ज़रूरत पड़ रही है।जैसे खतरनाक कोरोना वायरस ने शहर-शहर अस्पतालों में लंबी लाइनें लगवा दी थी। ठीक वैसे ही इस वायरस की वजह से भी अस्पतालों में मरीज़ों की संख्या बढ़ती जा रही है।हालांकि जब कोई समस्या होती है, तो उसका समाधान भी निश्चित होता है। आप खुद इस बात के गवाह हैं कि कोरोना के ख़िलाफ लड़ी गई सबसे बड़ी जंग को देश ने कैसे वैक्सीन और अपनी सावधानी से जीत लिया। एक बार फिर बिल्कुल वैसी ही सावधानी बरतने की जरूरत है। जैसी आपने कोविड काल में दिखाई थी। आईसीएमआर ने जो गाइडलाइंस जारी की हैं उन्हें यहां पढ़िये…हाथों को बार-बार साबुन से धोएंभीड़ वाले इलाकों में जाने से बचेंघर से बाहर निकलते वक्त मास्क का इस्तेमाल करेंखांसते और छींकते समय मुंह पर हाथ रखेंबिना हाथों को धोए अपनी आंखों और मुंह को ना छुएंगर्म पानी पिएं और खांसी के लक्षण दिखने पर भाप लेंनमक के गुनगुने पानी से गरारा करेंबुखार या बदन दर्द की स्थिति में पैरासिटामॉल लेंसबसे जरूरी शुरुआती लक्षण दिखने पर खुद को आइसोलेट करेंगौर करें तो ये सारी वहीं सावधानियां हैं, जो आपसे कोरोना के दौर में रखने के लिए कही जा रही थीं। क्योंकि इंफ्लूएंजा ए को भी डॉक्टर कोरोना जैसा ही बता रहे हैं। इसीलिए एक बार फिर से अलर्ट मोड में आने का वक्त आ चुका है। क्योंकि सावधानी से ही आपकी सेहत की सत्ता दुरुस्त रहेगी।
राजकुमारी पांडेयएबीएन सोशल डेस्क। हिंदू पंचांग के मुताबिक, फाल्गुन माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को रंगभरी एकादशी कहा जाता है। इस एकादशी व्रत का हिंदू धर्म में अधिक महत्व है। इस बार रंगभरी एकादशी व्रत 03 मार्च दिन को है। रंगभरी एकादशी को आमलकी एकादशी के नाम से जाना जाता है।हिंदू मान्यता के अनुसार, रंगभरी एकादशी के दिन भगवान शिव और माता पार्वती पहली बार काशी आये थे। इसलिए यह एकादशी वाराणसी में अधिक उत्साह के साथ मनायी जाती है। इस दिन भगवान विष्णु के साथ भगवान शिव की पूजा अर्चना करने का विधान है। अगर आप एकादशी व्रत रख रहे हैं तो आपको एकादशी व्रत कथा का पाठ जरूर करना चाहिए।मान्यता है कि व्रत कथा सुनने या पढ़ने से भगवान विष्णु की कृपा से सभी मनोकामनाएं पूरी होती है और मृत्यु के बाद मोक्ष की प्राप्ति होती है। इसके अलावा समस्त पापों से छुटकारा मिलता है। चलिये आपको बताते हैं रंगभरी एकादशी व्रत कथा के बारे में। रंगभरी एकादशी व्रत कथा प्राचीन काल में चित्रसेन नामक राजा राज्य करता था। उसके राज्य में एकादशी व्रत का अधिक महत्व था और सभी लोग एकादशी के व्रत को रखते थे। वहीं आमलकी एकादशी (रंगभरी एकादशी) के प्रति अधिक श्रद्धा थी। एक दिन जंगल में राजा में शिकार करते हुए दूर निकल गये। तब पहाड़ी और जंगली डाकुओं ने राजा को घेर लिया। इसके बाद उन्होंने राजा पर हमला कर दिया। लेकिन देव कृपा से राजा पर जो भी शस्त्र चलाये जाते वो पुष्प में बदल जाते। डाकू अधिक थे और राजा संज्ञाहीन होकर धरती पर गिर गये। तब शरीर से एक दिव्य शक्ति प्रकट हुई और समस्त राक्षसों को मारकर गायब हो गयी। इसके बाद जब राजा की चेतना वापस लौटी तो उसने सभी राक्षसों को मरा हुआ देखा। राजा इस दृश्य को देखकर आश्चर्य हुआ कि इन डाकुओं को किसने मारा? तभी आकाशवाणी हुई- हे राजन!यह सब राक्षस तुम्हारे आमलकी एकादशी का व्रत करने से मारे गये हैं। तुम्हारे शरीर से आमलकी एकादशी की शक्ति से इन लोगों का संहार किया है। इन सभी को मारकर वहां दुबारा से तुम्हारे शरीर में प्रवेश कर गयी। इस बात को राजा सुनकर बेहद प्रसन्न हुआ और वापस लौटकर राज्य में सबको एकादशी का महत्व के बारे में बताया।रंगभरी तथा आमलकी एकादशी व्रत कथारंगभरी एकादशी को फाल्गुन शुक्ल पक्ष की एकादशी कहा जाता है। इसे आमलकी एकादशी व्रत कहते हैं। रंगभरी एकादशी के दिन भगवान विष्णु की पूजा के साथ आंवले की पूजा की जाती है। धार्मिक मान्यता है कि इस एकादशी के दिन भगवान शिव पहली बार माता पार्वती को काशी लाये थे। इसलिए यह एकादशी बाबा विश्वनाथ के भक्तों के लिए महत्वपूर्ण मानी जाती है।रंगभरी एकादशी व्रत कथाप्राचीन काल में चित्रसेन नामक राजा था। उसके राज्य में एकादशी व्रत का बहुत महत्व था। राजा समेत सभी प्रजाजन एकादशी का व्रत श्रद्धा भाव के साथ किया करते थे। राजा की आमलकी एकादशी के प्रति बहुत गहरी आस्था थी। एक बार राजा शिकार करते हुए जंगल में बहुत दूर निकल गये। उसी समय कुछ जंगली और पहाड़ी डाकुओं ने राजा को घेर लिया और डाकू शस्त्रों से राजा पर प्रहार करने लगे, परंतु जब भी डाकू राजा पर प्रहार करते वह शस्त्र ईश्वर की कृपा से पुष्प में परिवर्तित हो जाते। डाकुओं की संख्या अधिक होने के कारण राजा संज्ञाहीन होकर भूमि पर गिर गये। तभी राजा के शरीर से एक दिव्य शक्ति प्रकट हुई और उस दिव्य शक्ति ने समस्त दुष्टों को मार दिया, जिसके बाद वह अदृश्य हो गयी।जब राजा की चेतना लौटी, तो उसने सभी डाकुओं को मरा हुआ पाया। यह दृश्य देखकर राजा को आश्चर्य हुआ। राजा के मन में प्रश्न उठा कि इन डाकुओं को किसने मारा। तभी आकाशवाणी हुई कि हे राजन! यह सब दुष्ट तुम्हारे आमलकी एकादशी का व्रत करने के प्रभाव से मारे गये हैं। तुम्हारी देह से उत्पन्न आमलकी एकादशी की वैष्णवी शक्ति ने इनका संहार किया है। इन्हें मारकर वह पुन: तुम्हारे शरीर में प्रवेश कर गयी। यह सारी बातें सुनकर राजा को अत्यंत प्रसन्नता हुई, एकादशी के व्रत के प्रति राजा की श्रद्धा और भी बढ़ गयी। तब राजा ने वापस लौटकर राज्य में सबको एकादशी का महत्व बतलाया।
आठ मार्च को मनेगी रंगों का त्यौहार होली30 साल बाद कुंभ राशि में त्रिग्रही योगटीम एबीएन, कोडरमा। होलिका दहन का पर्व हर वर्ष फाल्गुन मास की पूर्णिमा तिथि को मनाया जाता है। चैत्र कृष्ण प्रतिपदा को लोग रंगोत्सव के रूप में होली का त्योहार मनाते हैं। इस साल होली पर तिथियों का ऐसा संयोग बना है, जिससे लोगों में उलझन है। इस बारे में मां तारा ज्योतिष संस्थान के आचार्य अनिल मिश्रा ने बताया कि पंचांग की गणना के अनुसार होलिका दहन इस साल व्रत की पूर्णिमा के साथ 6 मार्च सोमवार को रात्रि के अंतिम प्रहर (ब्रह्म मुहूर्त) में भद्रा समाप्त होने पर 4:49 बजे के बाद शुभ योगों में किया जायेगा। 7 मार्च मंगलवार को स्नान दान की पूर्णिमा का पर्व मनाया जायेगा। अनिल मिश्रा ने कहा क इस वर्ष होली पर दो पूर्णिमा होने के कारण रंगोत्सव, रंग गुलाल वाली होली 8 मार्च बुधवार को मनायी जायेगी। दरअसल इस साल फाल्गुन पूर्णिमा तिथि का आरंभ 6 मार्च को अपराह्नकाल पर होगा, जिसके कारण प्रदोष व्यापिनी व्रत की पूर्णिमा का मान रहेगा एवं 7 मार्च को सायंकाल तक काल तक रहने के कारण उदय कालीन स्नान दान पूर्णिमा का मान होगा। उन्होंने कहा कि शास्त्र के अनुसार भद्रा मुक्त प्रदोष व्यापिनी पूर्णिमा पर ही होलिका दहन होना चाहिए। परंतु प्रदोष व्यापिनी पूर्णिमा में रात्रि के तीनों प्रहर भद्रा युक्त होने के कारण होलिका दहन 6 मार्च सोमवार को रात्रि के अंतिम प्रहर 4:49 बजे के बाद करना उत्तम होगा। जबकि कुछ अन्य पंचांगों ने भद्रा पुच्छ (मध्यरात्रि) में हीं होलिका दहन कर लेने का निर्णय दिया है एवं रंगों वाली होली 8 मार्च को खेली जायेगी। उन्होंने कहा कि इस साल होली का त्योहार ज्यादा खास रहने वाला है। दरअसल, होली के मौके पर शनि 30 साल बाद स्वराशि कुंभ और 12 साल बाद देव गुरु बृहस्पति स्वराशि मीन में विराजमान रहने वाले हैं। इसके अलावा, कुंभ राशि में त्रिग्रही योग बना रहेगा। होली पर ग्रहों की ऐसी स्थिति पूरे 30 वर्ष बाद बन रही है।
एबीएन सेंट्रल डेस्क। कृषि विज्ञान मेला इस बार दो से चार मार्च तक पूसा में आयोजित किया जायेगा, जिसमें नवीनतम कृषि तकनीक प्रदर्शित की जायेगी। भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान के निदेशक अशोक कुमार सिंह ने बुधवार को यहां संवाददाता सम्मेलन में मेले की जानकारी देते हुए कहा कि कृषि मंत्री नरेन्द्र सिंह तोमर मेले का उद्घाटन करेंगे।इस बार मेले का विषय श्री अन्न द्वारा पोषण और खाद्यान्न सुरक्षा रखा गया है। श्री अन्न में शामिल आठ अनाज प्रतिकूल जलवायु में भी बेहतर पैदावार देते हैं। ये पर्याप्त मात्रा में आयरन, जिंक, प्रोटीन और फालिक एसिड उपलब्ध कराते हैं। डॉ सिंह ने बताया कि मेले के दौरान श्री अन्न से संबंधित सभी पक्षों को बुलाया गया है जिनमें वैज्ञानिक, किसान, किसान उत्पादक समूह और स्टार्ट अप भी शामिल हैं। उन्होंने बताया कि इस बार किसानों को बासमती धान की नवीनतम किस्म पूसा बासमती 1847, 1885 और 1886 का बीज भी पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध कराया जायेगा। पिछले साल किसानों को इन किस्मों का बीज एक एक किलो उपलब्ध कराया गया था जिससे 400 से 500 किलो बीज तैयार किया गया था। उन्होंने कहा कि धान की इन किस्मों पर झुलसा रोग का कोई प्रभाव नहीं होता है जिससे कीटनााशकों के छिड़काव की जरुरत नहीं होती है। इससे प्रति हेक्टेयर किसानों को करीब 3000 रुपये की बचत होती है। इस बार मेले में गेहूं, सरसों और चने की नयी प्रजातियों का भी प्रदर्शन किया जायेगा। कुछ फलों के पौधे भी उपलब्ध कराये जायेंगे। उन्होंने कहा कि मेले में पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश से बड़ी संख्या में किसान हिस्सा लेगे। बिहार और कुछ अन्य राज्यों के किसान भी कार्यक्रम में हिस्सा लेंगे। इस दौरान विभिन्न विषयों पर किसान गोष्ठी और कई अन्य कार्यक्रम भी आयोजित किये जायेंगे।
आम जनता पर फिर पड़ी महंगाई की मारएबीएन सोशल डेस्क। होली से पहले आम आदमी को एक बार फिर मंहगाई की मार पड़ गयी है। एलपीजी की कीमतों में बढ़ोतरी हुई है। इस बार घरेलू सिलेंडर में 50 रूपए की वृद्धि की गयी है। दिल्ली में 14.2 किलोग्राम के घरेलू रसोई गैस सिलेंडर बढ़कर 1103 रुपये का हो गया है।19 किलो वाले कमर्शियल सिलेंडर की कीमतों में 350.50 रुपए की बढ़ोतरी हुई है और अब 2119.50 में मिलेगा। इन सिलेंडरों की नई दरें आज 1 मार्च से लागू की जायेगी। बता दें कि गैस कंपनियां हर महीने की पहली और 16 तारीख को गैस की कीमतें अपडेट करती हैं। पिछले महीनें गैस के दाम में कोई बदलाव नहीं किया गया था।
टीम एबीएन, कटिहार (पटना)। मोटे अनाजों के प्रति जन जागरूकता और इनकी पैदावार को बढ़ाने के उद्देश्य से मंगलवार को नाबार्ड एवं कृषि विज्ञान केंद्र, कटिहार के तत्वाधान में प्रशिक्षण शिविर का आयोजन किया गया। जिले के विभिन्न प्रखंड क्षेत्र के किसानों एवं भोला पासवान कृषि विश्वविद्यालय, पूर्णियां के छात्राओं ने इस शिविर में भाग लिया। मौके पर लीड बैंक कटिहार के प्रबंधक मनोज कुमार मधुकर ने किसानों को संबोधित करते हुए कहा कि मोटे अनाज को बढ़ावा देने हेतु सरकार ने वर्ष 2023 को मिलेट वर्ष घोषित किया है। मोटे अनाज का सेवन स्वास्थ्य के लिए काफी लाभदायक है। अभी भी कई घरों में गेहूं की जगह मोटे अनाजों की रोटी पसंद की जाती है। मोटा अनाज खाने से हड्डियों में मजबूती आती है, कैल्शियम की कमी से बचाव, पाचन को दूरुस्त करने में मदद मिलती है। डायबिटीज रोगियों के लिए काफी लाभकारी होता है। कृषि विज्ञान केंद्र के वरीय वैज्ञानिक सह प्रधान डॉ रीता सिंह ने अपने संबोधन में कहा कि मोटे अनाज जैसे- ज्वार, बाजरा, रागी, सावां, कंगनी, चीना, कोदो आदि में मिनरल, विटामिन, एंजाइम और इन सॉल्युबल फाइबर के साथ-साथ मैक्रो और माइक्रो जैसे पोषक तत्व भी भारी मात्रा में मौजूद होते हैं। इसके अलावा मोटे अनाजों में बीटा-कैरोटीन, नाइयासिन, विटामिन-बी6, फोलिक एसिड, पोटेशियम, मैग्नीशियम, जस्ता जैसे खनिज लवण भी पाये जाते हैं। डॉ रीता सिंह ने कहा कि किसानों को नाबार्ड द्वारा मोटे अनाज को बढ़ावा देने हेतु हर संभव प्रयास किया जायेगा। यह कार्यक्रम मोटे अनाज की खेती को बढ़ावा देने का एक प्रयास है। मौके पर डॉ सुशील कुमार सिंह, विकास कुमार, ओम प्रकाश भारती एवं विश्वजीत दत्ता सहित केंद्र के वैज्ञानिक उपस्थित थे।
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