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होली के बाद काम पर लौटने की होड़, सभी ट्रेनें फुल
Published / 2023-03-11 18:59:41
होली के बाद काम पर लौटने की होड़, सभी ट्रेनें फुल

यात्रियों की भीड़ को देख जागरूकता अभियान चला रहा आरपीएफटीम एबीएन, झुमरी तिलैया (कोडरमा)। होली की छुट्टियां बिताने के बाद शुक्रवार से काम पर लौटने की होड़ शुरू हो गयी है। मुंबई, दिल्ली, जयपुर सहित देश के विभिन्न राज्यों में काम करने वालों के साथ-साथ पढ़ाई करने वाले छात्र-छात्राएं भी विभिन्न ट्रेनों के जरिये लौटने लगे हैं।  कोडरमा जंक्शन के रास्ते होकर चलने वाली कई मेल एक्सप्रेस सहित राजधानी एक्सप्रेस में लंबी सूची है। धनबाद गया इंटरसिटी, हटिया पटना एक्सप्रेस, पटना रांची जनस्ताब्दी एक्सप्रेस, पूरी नयी दिल्ली पुरुषोत्तम एक्सप्रेस, हावड़ा मुंबई मेल, गंगा दामोदर सहित कई ट्रेनों में चढ़ना मुस्किल हो गया है। मार्च के तीसरे सप्ताह तक कई ट्रेनों में वेटिंग की लंबी लिस्ट है। होली पर घर आने ओर लौटने वाले यात्रियों की सुविधा के लिए रेलवे ने कई स्पेशल ट्रेनें भी चलायी है पूर्व मध्य रेलवे के अंतर्गत धनबाद रेल मंडल सहित कई मंडलों के लिए 196 विशेष रेल सेवाएं शुरू की गयी है। इधर, पूर्व मध्य रेलवे हाजीपुर के सीपीआरओ बीरेंद्र कुमार ने बताया की होली इस मौजूदा त्योहारी सीजन में यात्रियों की सुविधाओं के लिए अनारक्षित डब्बों में प्रवेश के लिए आरपीएफ कर्मचारियों को भीड़ नियंत्रण के लिए तैनात किया गया है। इसके अलावा प्लेटफार्म नंबर के साथ-साथ ट्रेनों के आवागमन और प्रस्थान के लिए लगातार समयबद्ध की घोषणा करायी जा रही है। इधर, आरपीएफ कोडरमा के निरीक्षक प्रभारी जवाहर लाल ने बताया कि कोडरमा से पहाड़पुर के बीच सभी स्टेशनों पर यात्रियों को जागरूक किया जा रहा है ताकि यात्रा में किसी प्रकार की असुविधा नहीं हो। उनके नेतृत्व में कोडरमा रेलवे स्टेशन पर ट्रेनें में यात्रियों की भीड़ को देखते हुए 10 मार्च को सुपर एक्सप्रेस, पुरुषोतम एक्सप्रेस और डेमो ट्रेन को 2 -2 मिनट अतिरिक्त ठहराव कराया गया। ताकि यात्रियों को किसी प्रकार की असुविधा न हो। वहीं उन्होंने बताया कि अकेली महिला और युवतियों के लिए मेरी सहेली अभियान के तहत आरपीएफ महिला जवानों को भी प्लेटफार्म और ट्रेनों में लगाया गया है। यात्रियों के किसी प्रकार की असुविधा के लिए 139 टोल फ्री नंबर सूचना दी जा सकती है जिस पर त्वरित कार्यवाही की जा सके।

रामनवमी : 14, 21 और 28 मार्च को निकलेगी मंगलवारी शोभायात्रा
Published / 2023-03-10 18:49:22
रामनवमी : 14, 21 और 28 मार्च को निकलेगी मंगलवारी शोभायात्रा

टीम एबीएन, रांची। राजधानी रांची में रामनवमी महोत्सव धूमधाम से मनाया जायेगा। इसे लेकर सूरज संगम रांची की बैठक शंकर प्रसाद की अध्यक्षता में हुई। जिसमें मंगलवारी शोभायात्रा 14, 21 और 28 मार्च को आयोजित की जायेगी। मंगलवारी शोभायात्रा श्री हनुमान मंदिर महावीर चौक पर निकाली जायेगी। साथ ही श्री रामनवमी महोत्सव धूमधाम से मनाने का निर्णय लिया गया।

अमरनाथ यात्रा : एक अप्रैल से शुरू होगी ऑनलाइन पंजीकरण की प्रक्रिया
Published / 2023-03-10 16:08:35
अमरनाथ यात्रा : एक अप्रैल से शुरू होगी ऑनलाइन पंजीकरण की प्रक्रिया

अमरनाथ यात्रा पर जाने वाले भक्तों के लिए बड़ी खुशखबरीएबीएन सेंट्रल डेस्क। अमरनाथ यात्रा पर जाने वाले भक्तों के लिए बड़ी खुशखबरी है। दरअसल, बोर्ड के अधिकारियों ने बताया कि 1 अप्रैल से ऑनलाइन पंजीकरण की प्रक्रिया शुरू हो सकती है। अधिकारियों का कहना है कि 1 अप्रैल इसलिए संभावित तारीख मानी जा रही है; क्योंकि फरवरी महीने में होने वाली अमरनाथ श्राइन बोर्ड के सदस्यों की बैठक फिलहाल नहीं हो पायी है। वहीं यह भी अनुमान लगाया जा रहा है कि इस बार अमरनाथ यात्रा 60 दिन की हो सकती है क्योंकि इस बार श्रावण पूर्ण्रिमा 30 अगस्त को है और पहला दर्शन एक जुलाई को होगा। अमरनाथ श्राइन बोर्ड के अधिकारी के अनुसार,  अमरनाथ यात्रा के लिए श्रद्धालुओं का पंजीकरण अप्रैल से बैंकों के जरिये शुरू होगा। रोजाना 20 हजार श्रद्धालुओं का पंजीकरण होगा।बोर्ड की ओर से मांगी गयी निविदाओं में हेलिपेड स्थल पर बर्फ हटाना, पवित्र गुफा के पास हटमेंट क्षेत्र, पंडाल क्षेत्र, बेस अस्पताल साइट, क्लाक रूम, शू रैक साइट, बुक काउंटर साइट, शेड, पवित्र गुफा के निचले क्षेत्र में बेस अस्पताल व शौचालय स्थल, कैंप डायरेक्टर, हट क्षेत्र, हेली सेवा स्टाफ आवास, सेवा प्रदाता क्षेत्र, शेषनाग कैंप, वावबाल व एमजी टाप शेषनाग आदि स्थल शामिल हैं।इसके अलावा, दक्षिण कश्मीर में पवित्र गुफा में हिमलिंग के दर्शनों के लिए आने वाले श्रद्धालुओं के वाहनों की आवाजाही के लिए आरएफआइडी आधारित ट्रैकिंग की जायेगी।

अनुसूचित जाति के लोगों को धर्मांतरण करने पर आरक्षण नहीं
Published / 2023-03-09 21:46:08
अनुसूचित जाति के लोगों को धर्मांतरण करने पर आरक्षण नहीं

एबीएन सेंट्रल डेस्क। अनुसूचित जाति के जो लोग मुसलमान अथवा ईसाई हो गए हैं उन्हें क्या दलित आरक्षण में शामिल करना चाहिए विषय पर एक गोष्ठी का आयोजन हो रहा है, इसे विश्व संवाद केंद्र एवं गौतमबुद्ध विश्वविद्यालय के संयुक्त तत्वाधान में आयोजित किया जा रहा है। 2 दिनों तक चलने वाली इस गोष्ठी में पूर्व न्यायाधीश, उपकुलपति व राजनयिकों समेत व शिक्षा क्षेत्र आदि के लगभग 150 से अधिक लोग भाग ले रहे हैं। इस गोष्ठी में बोलते हुए विश्व हिंदू परिषद कार्याध्यक्ष श्री आलोक कुमार ने कहा कि आरक्षण का आधार अस्पृश्यता व इसके कारण उत्पन्न हुआ पिछड़ापन है। मुस्लिमों व ईसाइयों में जातिगत भेद व उत्पीड़न तो हो सकता है पर अस्पृश्यता नहीं है, वैसे भी मुस्लिमों को अन्य पिछड़ा वर्ग व आर्थिक आधार पर कमजोर लोगों को दिया जाने वाला आरक्षण भी प्राप्त है। उन्हें अल्पसंख्यक अल्पसंख्यकों को दी जाने वाली सुविधाएं भी प्राप्त हैं इसलिए उन्हें अनुसूचित जाति के आरक्षण का लाभ नहीं मिलना चाहिए।  पूर्व केंद्रीय मंत्री श्री संजय पासवान ने मुख्य वक्ता के नाते धर्मान्तरित लोगों  को आरक्षण दिए जाने का विरोध करते हुए कहा कि अनुसूचित जाति के जो लोग धर्मान्तरण करके मुसलमान और ईसाई बन गये हैं, उनकी पहचान कर उन्हें आरक्षण से वंचित किया जाना चाहिए।  कार्यक्रम की अध्यक्षता पूर्व राज्यसभा सदस्य श्री नरेंद्र जाधव जी ने की। उन्होंने कहा कि हिंदू समाज के अनुसूचित जाति के लोगों के आरक्षण में किसी प्रकार की कमी या उनका हिस्सा काटा नहीं जा सकता। यदि अन्य धर्मावलंबियों के लिए सरकार को कुछ करना आवश्यक लगता है तो वह अलग से व्यवस्था बनाये। इसके पूर्व गौतमबुद्ध विश्वविद्यालय के कुलपति श्री रविंद्र कुमार सिन्हा जी ने सभी प्रतिनिधियों का स्वागत किया। उक्त जानकारी विश्व संवाद केंद्र के प्रबंधक अनिल अग्रवाल ने एक प्रेस विज्ञप्ति जारी कर दी।

शास्त्रीय संगीत ध्रुपद समारोह 12 मार्च को
Published / 2023-03-09 21:45:08
शास्त्रीय संगीत ध्रुपद समारोह 12 मार्च को

टीम एबीएन, रांची। स्वर्गीय पंडित रामवृक्ष पाठक ध्रुपद सम्राट गया घराना, स्वरात्मिका के स्मृति में शास्त्रीय संगीत ध्रुपद सामारोह को लेकर पंडित शैलेन्द्र कुमार पाठक ध्रुपद गायक स्वरात्मिका गया घराना के उन्होंने बताया कि कार्यक्रम का आयोजन 12 मार्च दिन रविवार स्थान रांची रातू रोड साक्षी उपवन में होने जा रहा है। जिसका समय दोपहर 2 बजे से रखा गया है। जिसमें विशिष्ट अतिथि के रूप मेें रांची, हटिया विधायक श्री नवीन जायसवाल जी एवं रंजीत कुमार राव केंद्र प्रमुख दूरदर्शन रांची होंगे। पंडित शैलेन्द्र कुमार पाठक जी ने बताया कि इस कार्यक्रम में विशेष रूप से डॉक्टर संतोष नाहर(वायलन) दिल्ली, श्री कृष्ण मोहन पाठक (ध्रुपद) गया, पंडित राज कुमार झा (पखावज) अयोध्या, श्री अनीश कुमार मिश्रा (सारंगी) बनारस, श्री विनोद पाठक (ध्रुपद गायन) पटना, संदीप चटर्जी (तबला) रांची, सुरेश प्रसाद गुप्ता (ध्रुपद) रांची, श्रवण कुमार पाठक (पखावज) रांची, सिरखत करेगें। कार्यक्रम को सफल बनाने हेतु श्री मृणाल पाठक, मनीष, कन्हैया पाठक, ऋतिक कर्ण पाठक, अंबर अवनिश, रोहित कुमार पाठक, बसंत कुमार, ऋषभ कुमार, अभिजीत, अंबर अवनिश, राष्ट्रीय सैनिक संस्था युवा कमांड झारखंड प्रदेश अध्यक्ष मनोज कुमार पुट्टू जी लगे हुए हैं।

चाशनी सिरियल में जलवा बिखेर रही रांची की सृष्टि सिंह
Published / 2023-03-09 21:09:18
चाशनी सिरियल में जलवा बिखेर रही रांची की सृष्टि सिंह

टीम एबीएन, रांची। बचपन के ख्वाब को भी हकीकत में बदला जा सकता है। इसे साबित कर दिखाया है, बचपन से ही अभिनय के क्षेत्र में रूचि रखने वाली रांची की सृष्टि सिंह ने। मध्यमवर्गीय परिवार से संबंध रखने वाली सृष्टि सिंह ने अपने कॅरियर की शुरुआत बतौर केबिन क्रू कतर एयरलाइंस से की लेकिन अभिनय में जबरदस्त रूझान होने के कारण नौकरी से उनका मोह भंग हो गया। नौकरी छोड़ने के बाद उन्होंने अभिनय को अपना कॅरियर बनाने की ठानी। अंतत: उन्हें अथक परिश्रम व संघर्ष के बाद सफलता भी प्राप्त हुई है। सृष्टि सिंह स्टार प्लस से प्रसारित चाशनी सीरियल में इन दिनों रोशनी के किरदार में नजर आ रही हैं। उनका अभिनय काफी आकर्षक और शानदार है। यह सीरियल स्टार प्लस पर प्रसारित हो रहा है। सृष्टि सिंह ने उसुर्लाइन कॉन्वेन्ट रांची से मैट्रिक की परीक्षा पास की है। संत जेवियर्स कॉलेज रांची से कुछ समय तक पढ़ाई करने के बाद संजय गांधी मेमोरियल कॉलेज पंडरा से इंटर और स्नातक की पढ़ाई पूरी की। उन्होंने इंस्टीटयूट आॅफ बिजनेस मैनेजमेंट स्टडी कोलकाता से एमबीए किया है। उनका शौक डांसिंग और ट्रैवलिंग करना है। उन्होंने अपने जॉब और मॉडलिंग के कारण थाइलैंड, साउथ अफ्रीका, जर्मनी, न्यूजीलैंड, जापान, चीन, इंडोनेशिया, स्विटजरलैंड, लंदन सहित कई अन्य देशों का भ्रमण किया है। उन्हें बिरयानी और गोलगप्पा खाना खूब पसंद है। नीला उनका पसंदीदा रंग है। अभिनय से पहले सृष्टि सिंह मॉडलिंग करती थीं। उन्हें बचपन से ही अभिनय और मॉडलिंग का शौक था, हालांकि इसके लिए उन्होंने कहीं से प्रशिक्षण नहीं लिया है। 2 जुलाई को जन्मी सृष्टि सिंह को उनके पिता संजय सिंह से विरासत में अभिनय का गुण प्राप्त हुआ है। संजय सिंह की भी अभिनय में रूचि रही है। उन्होंने नागपुरी फिल्म गुईया नं-1 में शानदार अभिनय भी किया है। वर्तमान में संजय सिंह आकाशवाणी राँची में कार्यरत हैं। इसके पूर्व वे विविध भारती मुम्बई में कार्यरत थे। सृष्टि सिंह की दो और बहनें अनन्या सिंह और यशस्वी सिंह हैं। अनन्या एमबीबीएस डॉक्टर हैं और यशस्वी मॉडलर। सृष्टि सिंह ने बातचीत में बताया कि उन्हें रांची और झारखंडवासियों का प्यार मिलता रहे, यही आशा है। उनका जैसा रूप है वैसा ही गुण। बेहद दयालु सृष्टि सिंह समाज के जरूरतमंदों की बढ़-चढ़कर सेवा करती हैं। उनके इस मुकाम पर पहुंचने से परिवार वाले बेहर खुश हैं।

जानें रंगों के त्योहार होली का इतिहास...
Published / 2023-03-08 10:20:34
जानें रंगों के त्योहार होली का इतिहास...

संतोष पांडेय (सोनू)एबीएन सोशल डेस्क। होली वसंत ऋतु में मनाया जाने वाला एक महत्वपूर्ण भारतीय त्योहार है। यह पर्व हिंदू पंचांग के अनुसार फाल्गुन मास की पूर्णिमा को मनाया जाता है। होली भारत का अत्यंत प्राचीन पर्व है जो होली, होलिका या होलाका नाम से मनाया जाता था। वसंत की ऋतु में हर्षोल्लास के साथ मनाए जाने के कारण इसे वसंतोत्सव और काम-महोत्सव भी कहा गया है।इतिहासकारों का मानना है कि आर्यो में भी इस पर्व का प्रचलन था लेकिन अधिकतर यह पूर्वी भारत में ही मनाया जाता था। इस पर्व का वर्णन अनेक पुरातन धार्मिक पुस्तकों में मिलता है। इनमें प्रमुख हैं, जैमिनी के पूर्व मीमांसा-सूत्र और कथा गार्ह्य-सूत्र।नारद पुराण औऱ भविष्य पुराण जैसे पुराणों की प्राचीन हस्तलिपियों और ग्रंथों में भी इस पर्व का उल्लेख मिलता है।विंध्य क्षेत्र के रामगढ़ स्थान पर स्थित ईसा से 300 वर्ष पुराने एक अभिलेख में भी इसका उल्लेख किया गया है। संस्कृत साहित्य में वसंत ऋतु और वसन्तोत्सव अनेक कवियों के प्रिय विषय रहे हैं। सुप्रसिद्ध मुस्लिम पर्यटक अलबरूनी ने भी अपने ऐतिहासिक यात्रा संस्मरण में होलिकोत्सव का वर्णन किया है। भारत के अनेक मुस्लिम कवियों ने अपनी रचनाओं में इस बात का उल्लेख किया है कि होलिकोत्सव केवल हिंदू ही नहीं कई मुसलमान भी मनाते हैं। सबसे प्रामाणिक इतिहास की तस्वीरें हैं।मुगलकालीन होली-शायस्ता खां के दरबार में होलीप्राचीन काल से अविरल होली मनाने की परंपरा को मुगलों के शासन में भी अवरुद्ध नहीं किया गया बल्कि कुछ मुगल बादशाहों ने तो धूमधाम से होली मनाने में अग्रणी भूमिका का निर्वाह किया। अकबर, हुमायूँ, जहाँगीर, शाहजहाँ और बहादुरशाह ज़फर होली के आगमन से बहुत पहले ही रंगोत्सव की तैयारियाँ प्रारंभ करवा देते थे। अकबर के महल में सोने चाँदी के बड़े-बड़े बर्तनों में केवड़े और केसर से युक्त टेसू का रंग घोला जाता था और राजा अपनी बेगम और हरम की सुंदरियों के साथ होली खेलते थे। शाम को महल में उम्दा ठंडाई, मिठाई और पान इलायची से मेहमानों का स्वागत किया जाता था और मुशायरे, कव्वालियों और नृत्य-गानों की महफि़लें जमती थीं।जहाँगीर के समय में महफि़ल-ए-होली का भव्य कार्यक्रम आयोजित होता था। इस अवसर पर राज्य के साधारण नागरिक बादशाह पर रंग डालने के अधिकारी होते थे। शाहजहाँ होली को ईद गुलाबी के रूप में धूमधाम से मनाता था। बहादुरशाह जफर होली खेलने के बहुत शौकीन थे और होली को लेकर उनकी सरस काव्य रचनाएं आज तक सराही जाती हैं। मुगल काल में होली के अवसर पर लाल किले के पिछवाड़े यमुना नदी के किनारे आम के बाग में होली के मेले लगते थे। मुगल शैली के एक चित्र में औरंगजेब के सेनापति शायस्ता खाँ को होली खेलते हुए दिखाया गया है। दाहिनी ओर दिए गए इस चित्र की पृष्ठभूमि में आम के पेड़ हैं महिलाओं के हाथ में पिचकारियाँ हैं और रंग के घड़े हैं।मुगल काल की और इस काल में होली के किस्से उत्सुकता जगाने वाले हैं। अकबर का जोधाबाई के साथ तथा जहांगीर का नूरजहाँ के साथ होली खेलने का वर्णन मिलता है। अलवर संग्रहालय के एक चित्र में जहाँगीर को होली खेलते हुए दिखाया गया है। शाहजहाँ के समय तक होली खेलने का मुगलिया अंदाज ही बदल गया था। इतिहास में वर्णन है कि शाहजहाँ के जमाने में होली को ईद-ए-गुलाबी या आब-ए-पाशी (रंगों की बौछार) कहा जाता था। अंतिम मुगल बादशाह बहादुर शाह जफर के बारे में प्रसिद्ध है कि होली पर उनके मंत्री उन्हें रंग लगाने जाया करते थे। मध्ययुगीन हिन्दी साहित्य में दर्शित कृष्ण की लीलाओं में भी होली का विस्तृत वर्णन मिलता है।इसके अतिरिक्त प्राचीन चित्रों, भित्तिचित्रों और मंदिरों की दीवारों पर इस उत्सव के चित्र मिलते हैं। विजयनगर की राजधानी हंपी के 16वी शताब्दी के एक चित्रफलक पर होली का आनंददायक चित्र उकेरा गया है। इस चित्र में राजकुमारों और राजकुमारियों को दासियों सहित रंग और पिचकारी के साथ राज दम्पत्ति को होली के रंग में रंगते हुए दिखाया गया है। 16वी शताब्दी की अहमदनगर की एक चित्र आकृति का विषय वसंत रागिनी ही है। इस चित्र में राजपरिवार के एक दंपत्ति को बगीचे में झूला झूलते हुए दिखाया गया है। साथ में अनेक सेविकाएँ नृत्य-गीत व रंग खेलने में व्यस्त हैं। वे एक दूसरे पर पिचकारियों से रंग डाल रहे हैं। मध्यकालीन भारतीय मंदिरों के भित्तिचित्रों और आकृतियों में होली के सजीव चित्र देखे जा सकते हैं। उदाहरण के लिए इसमें 17वी शताब्दी की मेवाड़ की एक कलाकृति में महाराणा को अपने दरबारियों के साथ चित्रित किया गया है। शासक कुछ लोगों को उपहार दे रहे हैं, नृत्यांगना नृत्य कर रही हैं और इस सबके मध्य रंग का एक कुंड रखा हुआ है। बूंदी से प्राप्त एक लघुचित्र में राजा को हाथीदाँत के सिंहासन पर बैठा दिखाया गया है जिसके गालों पर महिलाएँ गुलाल मल रही हैं।फाल्गुन माह में मनाए जाने के कारण इसे फाल्गुनी भी कहते हैं। होली का त्योहार वसंत पंचमी से ही आरंभ हो जाता है। उसी दिन पहली बार गुलाल उड़ाया जाता है। चारों तरफ़ रंगों की फुहार फूट पड़ती है। होली के दिन आम्र मंजरी तथा चंदन को मिलाकर खाने का बड़ा माहात्म्य है।भगवान नृसिंह द्वारा हिरण्यकशिपु का वध-होली के पर्व से अनेक कहानियाँ जुड़ी हुई हैं। इनमें से सबसे प्रसिद्ध कहानी है प्रह्ललाद की। माना जाता है कि प्राचीन काल में हिरण्यकशिपु नाम का एक अत्यंत बलशाली असुर था। अपने बल के दर्प में वह स्वयं को ही ईश्वर मानने लगा था। उसने अपने राच्य में ईश्वर का नाम लेने पर ही पाबंदी लगा दी थी। हिरण्यकशिपु का पुत्र प्रह्ललाद ईश्वर भक्त था। प्रह्ललाद की ईश्वर भक्ति से क्रुद्व होकर हिरण्यकशिपु ने उसे अनेक कठोर दंड दिए, परंतु उसने ईश्वर की भक्ति का मार्ग न छोड़ा। हिरण्यकशिपु की बहन होलिका को वरदान प्राप्त था कि वह आग में भस्म नहीं हो सकती। हिरण्यकशिपु ने आदेश दिया कि होलिका प्रह्ललाद को गोद में लेकर आग में बैठे। आग में बैठने पर होलिका तो जल गई, पर प्रह्ललाद बच गया। ईश्वर भक्त प्रह्ललाद की याद में इस दिन होली जलाई जाती है। प्रतीक रूप से यह भी माना जता है कि प्रह्ललाद का अर्थ आनन्द होता है। वैर और उत्पीड़न की प्रतीक होलिका (जलाने की लकड़ी) जलती है और प्रेम तथा उल्लास का प्रतीक प्रह्ललाद अक्षुण्ण रहता है। प्रह्ललाद की कथा के अतिरिक्त यह पर्व राक्षसी ढुंढी, राधा कृष्ण के रास और कामदेव के पुनर्जन्म से भी जुड़ा हुआ है। कुछ लोगों का मानना है कि होली में रंग लगाकर, नाच-गाकर लोग शिव के गणों का वेश धारण करते हैं तथा शिव की बारात का दृश्य बनाते हैं। कुछ लोगों का यह भी मानना है कि भगवान श्रीकृष्ण ने इस दिन पूतना नामक राक्षसी का वध किया था। इसी खु़शी में गोपियों और ग्वालों ने रासलीला की और रंग खेला था।होली के पर्व की तरह इसकी परंपराएँ भी अत्यंत प्राचीन हैं, और इसका स्वरूप और उद्देश्य समय के साथ बदलता रहा है। प्राचीन काल में यह विवाहित महिलाओं द्वारा परिवार की सुख समृद्धि के लिए मनाया जाता था और पूर्ण चंद्र की पूजा करने की परंपरा थी।वैदिक काल में इस पर्व को नवात्रैष्टि यज्ञ कहा जाता था। उस समय खेत के अधपके अन्न को यज्ञ में दान करके प्रसाद लेने का विधान समाज में व्याप्त था। अन्न को होला कहते हैं, इसी से इसका नाम होलिकोत्सव पड़ा। भारतीय च्योतिष के अनुसार चैत्र शुदी प्रतिपदा के दिन से नववर्ष का भी आरंभ माना जाता है। इस उत्सव के बाद ही चैत्र महीने का आरंभ होता है।अत: यह पर्व नवसंवत का आरंभ तथा वसंतागमन का प्रतीक भी है। इसी दिन प्रथम पुरुष मनु का जन्म हुआ था, इस कारण इसे मन्वादितिथि कहते हैं।सार्वजनिक होली मिलनभारत में मनाए जाने वाले होली में होली से अगला दिन धूलिवंदन कहलाता है। इस दिन लोग रंगों से खेलते हैं। सुबह होते ही सब अपने मित्रों और रिश्तेदारों से मिलने निकल पड़ते हैं। गुलाल और रंगों से सबका स्वागत किया जाता है। लोग अपनी ईष्या-द्वेष की भावना भुलाकर प्रेमपूर्वक गले मिलते हैं तथा एक-दूसरे को रंग लगाते हैं। इस दिन जगह-जगह टोलियाँ रंग-बिरंगे कपड़े पहने नाचती-गाती दिखाई पड़ती हैं। बच्चे पिचकारियों से रंग छोड़कर अपना मनोरंजन करते हैं। सारा समाज होली के रंग में रंगकर एक-सा बन जाता है। रंग खेलने के बाद देर दोपहर तक लोग नहाते हैं और शाम को नए वस्त्र पहनकर सबसे मिलने जाते हैं। प्रीति भोज तथा गाने-बजाने के कार्यक्रमों का आयोजन करते हैं।होली के दिन घरों में विभिन्न व्यंजन पकाए जाते हैं। इस अवसर पर अनेक मिठाइयाँ बनाई जाती हैं जिनमें गुझियों का स्थान अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। बेसन के सेव और दहीबड़े भी सामान्य रूप से उत्तर प्रदेश में रहने वाले हर परिवार में बनाए व खिलाए जाते हैं। कांजी, भांग और ठंडाई इस पर्व के विशेष पेय होते हैं। पर ये कुछ ही लोगों को भाते हैं। इस अवसर पर उत्तरी भारत के प्राय: सभी राज्यों के सरकारी कार्यालयों में अवकाश रहता है, पर दक्षिण भारत में उतना लोकप्रिय न होने की वज़ह से इस दिन सरकारी संस्थानों में अवकाश नहीं रहता ।भारत में होली का उत्सव अलग-अलग प्रदेशों में भिन्नता के साथ मनाया जाता है। ब्रज की होली आज भी सारे देश के आकर्षण का बिंदु होती है। बरसाने की लठमार होली काफ़ी प्रसिद्ध है। इसमें पुरुष महिलाओं पर रंग डालते हैं और महिलाएँ उन्हें लाठियों तथा कपड़े के बनाए गए कोड़ों से मारती हैं। इसी प्रकार मथुरा और वृंदावन में भी 15 दिनों तक होली का पर्व मनाया जाता है। कुमाऊँ की गीत बैठकी में शास्त्रीय संगीत की गोष्ठियाँ होती हैं। यह सब होली के कई दिनों पहले शुरू हो जाता है। हरियाणा की धुलंडी में भाभी द्वारा देवर को सताए जाने की प्रथा है। बंगाल की दोल जात्रा चैतन्य महाप्रभु के जन्मदिन के रूप में मनाई जाती है। जलूस निकलते हैं और गाना बजाना भी साथ रहता है। इसके अतिरिक्त महाराष्ट्र की रंग पंचमी में सूखा गुलाल खेलने, गोवा के शिमगो में जलूस निकालने के बाद सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन तथा पंजाब के होला मोहल्ला में सिक्खों द्वारा शक्ति प्रदर्शन की परंपरा है। दक्षिण गुजरात के आदिवासियों के लिए होली सबसे बड़ा पर्व है, छत्तीसगढ़ की होरी में लोक गीतों की अद्भूत परंपरा है और मध्यप्रदेश के मालवा अंचल के आदिवासी इलाकों में बेहद धूमधाम से मनाया जाता है भगोरिया, जो होली का ही एक रूप है। बिहार का फगुआ जम कर मौज मस्ती करने का पर्व है और नेपाल की होली में धार्मिक व सांस्कृतिक रंग दिखाई देता है। इसी प्रकार विभिन्न देशों में बसे प्रवासियों तथा धार्मिक संस्थाओं जैसे इस्कॉन या वृंदावन के बांके बिहारी मंदिर में अलग अलग प्रकार से होली के श्रृंगार व उत्सव मनाने की परंपरा है जिसमें अनेक समानताएं और भिन्नताएँ हैं।साहित्य में होली का इतिहास-प्राचीन काल के संस्कृत साहित्य में होली के अनेक रूपों का विस्तृत वर्णन है। श्रीमद्भागवत महापुराण में रसों के समूह रास का वर्णन है। अन्य रचनाओं में रंग नामक उत्सव का वर्णन है। भक्तिकाल और रीतिकाल के हिन्दी साहित्य में होली और फाल्गुन माह का विशिष्ट महत्व रहा है। आदिकालीन कवि विद्यापति से लेकर भक्तिकालीन सूरदास, रहीम, रसखान, पद्माकर, जायसी, मीराबाई, कबीर और रीतिकालीन बिहारी, केशव, घनानंद आदि अनेक कवियों को यह विषय प्रिय रहा है। महाकवि सूरदास ने वसन्त एवं होली पर 78 पद लिखे हैं। पद्माकर ने भी होली विषयक प्रचुर रचनाएँ की हैं। इस विषय के माध्यम से कवियों ने जहाँ एक ओर नितान्त लौकिक नायक नायिका के बीच खेली गई अनुराग और प्रीति की होली का वर्णन किया है, वहीं राधा कृष्ण के बीच खेली गई प्रेम और छेड़छाड़ से भरी होली के माध्यम से सगुण साकार भक्तिमय प्रेम और निर्गुण निराकार भक्तिमय प्रेम का निष्पादन कर डाला है। सूफ़ी संत हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया, अमीर खुसरो और बहादुर शाह ज़फ़र जैसे मुस्लिम संप्रदाय का पालन करने वाले कवियों ने भी होली पर सुंदर रचनाएं लिखी हैं जो आज भी जन सामान्य में लोकप्रिय हैं। आधुनिक हिंदी कहानियों प्रेमचंद की राजा हरदोल, प्रभु जोशी की अलग अलग तीलियाँ, तेजेंद्र शर्मा की एक बार फिर होली, ओम प्रकाश अवस्थी की होली मंगलमय हो तथा स्वदेश राणा की हो ली में होली के अलग अलग रूप देखने को मिलते हैं। भारतीय फि़ल्मों में भी होली के दृश्यों और गीतों को सुंदरता के साथ चित्रित किया गया है। इस दृष्टि से शशि कपूर की उत्सव, यश चोपड़ा की सिलसिला, वी शांताराम की झनक झनक पायल बाजे और नवरंग इत्यादि उल्लेखनीय हैं।संगीत में होली का इतिहास-वसंत रागिनी- कोटा शैली में रागमाला श्रृंखलाभारतीय शास्त्रीय, उपशास्त्रीय, लोक तथा फि़ल्मी संगीत की परम्पराओं में होली का विशेष महत्व है। शास्त्रीय संगीत में धमार का होली से गहरा संबंध है, हाँलाँकि ध्रुपद, धमार, छोटे व बड़े ख्याल और ठुमरी में भी होली के गीतों का सौंदर्य देखते ही बनता है। कथक नृत्य के साथ होली, धमार और ठुमरी पर प्रस्तुत की जाने वाली अनेक सुंदर बंदिशें जैसे चलो गुंइयां आज खेलें होरी कन्हैया घर आज भी अत्यंत लोकप्रिय हैं। ध्रुपद में गाये जाने वाली एक लोकप्रिय बंदिश है खेलत हरी संग सकल, रंग भरी होरी सखी। भारतीय शास्त्रीय संगीत में कुछ राग ऐसे हैं जिनमें होली के गीत विशेष रूप से गाए जाते हैं। बसंत, बहार, हिंडोल और काफ़ी ऐसे ही राग हैं। होली पर गाने बजाने का अपने आप वातावरण बन जाता है और जन जन पर इसका रंग छाने लगता है। उपशास्त्रीय संगीत में चैती, दादरा और ठुमरी में अनेक प्रसिद्ध होलियां हैं। होली के अवसर पर संगीत की लोकप्रियता का अंदाज़ इसी बात से लगाया जा सकता है कि संगीत की एक विशेष शैली का नाम ही होली हैं, जिसमें अलग अलग प्रांतों में होली के विभिन्न वर्णन सुनने को मिलते है जिसमें उस स्थान का इतिहास और धार्मिक महत्व छुपा होता है। जहां ब्रजधाम में राधा और कृष्ण के होली खेलने के वर्णन मिलते हैं वहीं अवध में राम और सीता के जैसे होली खेलें रघुवीरा अवध में। राजस्थान के अजमेर शहर में ख्वाजा मोईनुद्दीन चिश्ती की दरगाह पर गाई जाने वाली होली का विशेष रंग है। उनकी एक प्रसिद्ध होली है आज रंग है री मन रंग है,अपने महबूब के घर रंग है री। इसी प्रकार शंकर जी से संबंधित एक होली में दिगंबर खेले मसाने में होली कह कर शिव द्वारा श्मशान में होली खेलने का वर्णन मिलता हैं। भारतीय फिल्मों में भी अलग अलग रागों पर आधारित होली के गीत प्रस्तुत किये गए हैं जो काफी लोकप्रिय हुए हैं। सिलसिला के गीत रंग बरसे भीगे चुनर वाली, रंग बरसे और नवरंग के आया होली का त्योहार, उड़े रंगों की बौछार, को आज भी लोग भूल नहीं पाए। सनातन संस्कृति व सभ्यता का प्रतीक है रंगोत्सव का पावन पर्व होलीसनातन संस्कृति व सभ्यता का प्रतीक है रंगोत्सव का पावन पर्व होलीदेश में आज युवाओं के बहुत बड़े वर्ग के लिए होली के मायने तेजी से बदलते जा रहे हैं, कुछ लोग आधुनिकता की चकाचौंध में अपनी प्राचीन संस्कृति व सभ्यता के वास्तविक मायने तेजी से भूलते जा रहे हैं। आज चंद लोगों अपने ही देश में पश्चिमी सभ्यता के अंधानुकरण करने के चलते तेजी से बदले हुए परिवेश में होली के पावन पर्व के प्राचीन पूज्यनीय स्वरुप को परिवर्तित करने का कार्य कर रहे हैं। आज के युवाओं के एक बहुत बड़े वर्ग के लिए होली का मतलब संस्कृति सभ्यता व आध्यात्मिक दृष्टि से बिल्कुल भी नहीं है, उनके लिए यह त्यौहार डीजे के तेज शोरगुल में फिल्मु गानों पर नाचकर हुड़दंग मस्ती नशाखोरी करने का छुट्टी में एंजॉय करने का एक दिन मात्र बनता जा रहा है, जो स्थिति देश की भारतीय सनातन संस्कृति के लिए सरासर अनुचित है। आज समय की मांग है कि यह विचार किया जाए कि देश में व्यवसायिक दौड़ की आपाधापी और भागदौड़ में होली का पावन पर्व भी लोगों के बीच क्यों एक औपचारिकता बनता जा रहा है, इस पर सनातन धर्म के सभी लोग विचार करें। आज देश में कुछ लोगों के लिए दिखावा पसंद बन चुकी महानगरीय संस्कृति के चलते यह त्यौहार भी धन दौलत व ताकत के दिखावे की भेंट चढ़ता जा रहा है, चिंताजनक बात यह हैं कि कुछ लोग तो पावन पर्व होली पर शराब के नशे में चूर होकर घर परिवार व समाज के लिए बड़ी गंभीर समस्या तक उत्पन्न कर लेते हैं।होली के सामाजिक, सांस्कृतिक और साहित्यिक रंगमैं अपनी एक रचना की चंद पंक्तियों के माध्यम से होली के पावन पर्व की सभी सम्मानित देशवासियों को हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएं देता हूं -रंगों की मस्ती से सराबोर करने,होली का यह पावन पर्व है आया,लोगों के भुला आपसी बैर भाव,झोली खुशियों से भरने है आया।रंग-बिरंगे रंगों में शक्ति है इतनी,लोगों के भुलाकर क्षण में दुखदर्द,खेलकर होली व्यक्ति पल भर में ही,सकारात्मक ऊर्जा से है नहाया। वैसे होली पर शराब पीकर हुड़दंग करने वाले चंद लोगों को समय रहते समझना होगा कि चारित्रिक पतन किसी धर्म समाज सभ्यता व देश के लिए बेहद घातक है, क्योंकि चारित्रिक पतन होने से व्यक्ति रोजमर्रा के जीवन में भी अनुशासनहीनता करना शुरू कर देता है, जो स्थिति किसी परिवार, समाज व देश किसी के लिए भी उचित नहीं है। हमें समझना होगा कि रंगोत्सव का यह पावन पर्व होली रंग-बिरंगे रंगों का एक त्यौहार मात्र नहीं है, बल्कि यह दुनिया की सबसे प्राचीन सभ्यता सनातन संस्कृति का एक बेहद महत्त्वपूर्ण प्रतीक है, इसके मनाने के पीछे बहुत सारे तार्किक प्राचीन तथ्य जुड़े हुए हैं जिनका आज के आधुनिक वैज्ञानिक युग में भी उतना ही महत्व है, आज भी भारतीय जनमानस के साथ साथ दुनिया में भारत की होली का अपना एक अहम स्थान है। हमें समझना चाहिए कि होली का पावन पर्व विविधता से परिपूर्ण भारत के बहुत सारे विविध और अनूठे रंगों का एक पारस्परिक संगम भी है, जो लोगों को एक सूत्र में पिरोकर एकजुट रखने का कार्य करता है। सबसे अहम बात यह है कि कुछ वर्षों पूर्व तक देश में सनातन धर्म के अनुयायियों के साथ-साथ देश के विभिन्न धर्मों के बहुत सारे लोगों को रंगोत्सव के पावन पर्व होली के आने का पूरे वर्ष भर बेहद उत्साह के साथ इंतजार रहता है, लेकिन पिछले कुछ वर्षों में आयी कुरीतियों के चलते त्यौहार पर होने वाले बिना सिर-पैर के लड़ाई-झगड़े के चलते अब कुछ लोग तो होली पर चुपचाप अपने घरों में बंद रहना ही पसंद करते हैं, माहौल को सही करके इस स्थिति को हम सभी को जल्द बदलना होगा, होली के त्यौहार के गौरव को वापस लाना होगा, जिसके लिए हम सभी लोगों को धीरे-धीरे सामूहिक प्रयास करने होंगे।गिले-शिकवे और शत्रुता का परित्याग करने वाला है होली का त्योहारआज एकबार फिर से जरूरत है कि पल-पल पर उत्सवों के हमारे देश भारत में आज के आधुनिक युग में भी होली के पावन पर्व पर लोग फिर से रंग-बिरंगे रंगों के रंग में सराबोर होकर के हर्षोल्लास के साथ दिल से एक दूसरे के साथ अपने गंभीर से गंभीर मनमुटाव भूलकर होली के पावन पर्व को मनायें। सनातन धर्म के पूज्यनीय धर्म गुरुओं व विभिन्न ठेकेदारों से मेरा विनम्र अनुरोध है कि रंगोत्सव के बेहद पवित्र-पावन पर्व होली में आयी विभिन्न प्रकार की विकृतियों को दूर करने के लिए मंथन करके इस समस्या के स्थाई निदान करने के बारे सोचना होगा, लोगों को भारत की प्राचीन सभ्यता व सनातन संस्कृति के अनुसार होली के त्यौहार के वास्तविक अर्थ को समझकर, जनता को वसुधैव कुटुंबकम् की प्राचीन सनातन संस्कृति के मायने समझाकर, दुनिया भर के लोगों को सनातन धर्म को आत्मसात करने के लिए प्रेरित करना होगा, जिससे की भारतीय सनातन संस्कृति व सभ्यता की पताका पूरे विश्वास में गौरव के साथ लहरायेंगोकुल की खुशबु, मथुरा का हार,वृंदावन की महक, बरसाने की फुहार,राधा का भरोसा, कान्हा का प्यार,मुबारक हो आपको होली का त्यौहार।होली की की ढेर सारी बधाइयां...

कई पौराणिक कथाओं को समेटे हैं सनातन के पर्व-त्योहार
Published / 2023-03-07 00:09:28
कई पौराणिक कथाओं को समेटे हैं सनातन के पर्व-त्योहार

राजकुमारी पाण्डेयएबीएन सोशल डेस्क। सनातन धर्म में पर्वों की यही बात है कि इनके पीछे छुपे पौराणिक कथा अपनी ओर आकर्षित करते हैं। आज जाने  होलिका दहन का इतिहास। होलिका दहन का पर्व  संदेश देता है कि ईश्वर अपने अनन्य भक्तों की रक्षा के लिये सदैव अपने भक्तो के साथ रहते हैं। होलिका दहन होली के पहले दिन फाल्गुन मास की पूर्णिमा को मनाया जाता है। इसके अगले दिन रंगों से होली खेलने की परंपरा है जिसे धुलेंडी धुलंडी और धूलि आदि नामों से भी जाना जाता है। होली बुराई पर अच्छाई की विजय के उपलक्ष्य में मनायी जाती है। होलिका दहन (जिसे छोटी होली भी कहते हैं) के अगले दिन पूरी हर्षोल्लास के साथ रंग खेलने का विधान है और अबीर-गुलाल आदि एक-दूसरे को लगाकर व गले मिलकर इस पर्व को मनाया जाता है।भारत में मनाये जाने वाले सबसे शानदार त्योहारों में से एक है होली। दीवाली की तरह ही इस त्योहार को भी अच्छाई की बुराई पर जीत का त्योहार माना जाता है। हिंदुओं के लिये होली का पौराणिक महत्व भी है। इस त्योहार को लेकर सबसे प्रचलित है प्रहलाद होलिका और हिरण्यकश्यप की कहानी। लेकिन होली की केवल यही नहीं बल्कि और भी कई कहानियां प्रचलित है। वैष्णव परंपरा मे होली को होलिका-प्रहलाद की कहानी का प्रतीकात्मक सूत्र मानते हैं।होलिका दहन का नियमफाल्गुन शुक्ल अष्टमी से फाल्गुन पूर्णिमा तक होलाष्टक माना जाता है। जिसमें शुभ कार्य वर्जित रहते हैं। पूर्णिमा के दिन होलिका-दहन किया जाता है। इसके लिए मुख्यतः दो नियम ध्यान में रखने चाहिए...पहला उस दिन भद्रा न हो। भद्रा का दूसरा नाम विष्टि करण भी है जो कि 11 करणों में से एक है। एक करण तिथि के आधे भाग के बराबर होता है।दूसरी बात पूर्णिमा प्रदोषकाल-व्यापिनी होनी चाहिये। सरल शब्दों में कहें तो उस दिन सूर्यास्त के बाद के तीन मुहूर्तों में पूर्णिमा तिथि होनी चाहिये।                  होलिका दहन की पौराणिक कथापुराणों के अनुसार दानवराज हिरण्यकश्यप ने जब देखा कि उसका पुत्र प्रह्लाद सिवाय विष्णु भगवान के किसी अन्य को नहीं भजता है तो वह क्रुद्ध हो उठा और प्रहलाद को कई बार मारने की कोशिश किया अंततः उसे नही मार पाया। हिरणयकश्यप का हर कोशिश विफल हो गया। तब अंत मे उसने अपनी बहन होलिका को आदेश दिया की वह प्रह्लाद को गोद में लेकर अग्नि में बैठ जाए क्योंकि होलिका को वरदान प्राप्त था कि उसे अग्नि नुकसान नहीं पहुंचा सकती।लेकिन ऐसा नही हुआ। जब होलिका प्रहलाद को लेकर अग्नि में बैठी किन्तु हुआ इसके ठीक विपरीत होलिका खुद उस अग्नि में जलकर भस्म हो गयी और भक्त प्रह्लाद को कुछ भी नहीं हुआ। इसी घटना की याद में इस दिन होलिका दहन करने का विधान है। होली का पर्व संदेश देता है कि इसी प्रकार ईश्वर अपने अनन्य भक्तों की रक्षा के लिये  सदैव अपने भक्तो के साथ उपस्थित रहते हैं।होली की केवल यही नहीं बल्कि और भी कई कहानियां प्रचलित है। होलिका दहन के अगले दिन होली बहुत धूमधाम से मनाया जाता है।

हजारीबाग : महिला समूहों के हर्बल गुलाल की जिलेभर में मांग
Published / 2023-03-06 20:12:46
हजारीबाग : महिला समूहों के हर्बल गुलाल की जिलेभर में मांग

फूल और अन्य प्राकृतिक चीजों से पलाश समूह की महिलाएं बना रही हैं हर्बल गुलाल टीम एबीएन, हजारीबाग। जिले के दारू प्रखंड के पेटो गांव की महिलाएं समूह से जुड़कर प्राकृतिक रंगों का इस्तेमाल कर हर्बल गुलाल बना रही हैं। इस हर्बल गुलाल तैयार करने में प्राकृतिक फल एवं फूलों का इस्तेमाल किया जा रहा है, जैसे पालक, पलाश का फूल, गेंदा फूल, गुलाब फूल, बीट, जैस्मिन तेल, अरारोट, चंदन और मुल्तानी मिट्टी का इस्तेमाल कर हर्बल गुलाल तैयार किया जाता है। यह गुलाल आर्गेनिक एवं केमिकल रहित है यह गुलाल पूरी तरह आर्गेनिक एवं केमिकल रहित है जो शरीर की त्वचा एवं आंखों को नुकसान नहीं पहुंचाता। साथ ही इसमें प्रयोग किये जाने वाले ब्यूटी प्रोडक्ट जैसे जैस्मिन तेल, चंदन, मुल्तानी मिट्टी आदि त्वचा के लिए फायदेमंद हैं। यह हर्बल गुलाल के रूप में महिला समूह के द्वारा तैयार अबीर जेएसएलपीएस के पलाश मार्ट में उपलब्ध है। ऐसे तैयार करती है महिलाएं गुलाल झारखंड स्टेट लाइवलीहुड प्रमोशन सोसाइटी के जिला कार्यक्रम प्रबंधक शांति ने बताया समूह की महिलाएं, विभिन्न प्रकार के फूल-पत्ती और फलों को सबसे पहले गर्म पानी में उबालकर मिक्सर में पीसकर इसका मिश्रण तैयार करती हैं। फिर अरारोट के आटे में मिलाकर इसे अच्छी तरह से गूंथती हैं और फिर इसे फैलाकर सुखाती हैं। इसके बाद इसे अच्छी प्रकार से पीसा जाता है। इसके बाद उसमें चंदन, नायसिल पाउडर और थोड़ा- सा नेचुरल परफ्यूम मिलाकर इससे हर्बल गुलाल तैयार किया जा रहा है। गुलाल तैयार होने के बाद इसे आकर्षक पैकेट में पैकेजिंग कर जेएसएलपीएस के विभिन्न स्थानों पर स्थापित क्रय केंद्र पलाश मार्ट में बिक्री के लिए भेजा जाता है।

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