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सक्सेस स्टोरी... फुलो-झानो आशीर्वाद योजना ने गीता देवी कोई बनाया आत्मनिर्भर
Published / 2023-04-01 19:36:35
सक्सेस स्टोरी... फुलो-झानो आशीर्वाद योजना ने गीता देवी कोई बनाया आत्मनिर्भर

लाभुक नाम : गीता देवीपति का नाम : सरयू उरांव एसएचजी : सराईत आजीविका सखी मंडलगांव : कुर्सेपंचायत : हेसलप्रखंड : लोहरदगाजिला : लोहरदगाटीम एबीएन, लोहरदगा। गीता देवी जिला के सदर प्रखंड के हेसल पंचायत के कुर्से गांव की रहने वाली हैं। वे वर्ष 2017 से महिला स्वयं सहायता समूह से जुड़ी हुई हैं। फुलो-झानो आशीर्वाद योजना का लाभुक बनने के बाद उनकी स्थिति पहले से काफी अच्छी है। हँड़िया-दारू बिक्री का काम छोड़ इस योजना से जुड़ीं और ऋण लेने के बाद एक गाय खरीद कर दूध बेचने का कार्य करने लगीं। अब वह प्रतिमाह 12-15 हजार रुपये आसानी से कमा लेती हैं।गीता बताती हैं कि उनके पास खेती योग्य भूमि काफी कम है जिसका कुछ खास लाभ उन्हें नहीं मिल पाता था। आय का कोई साधन नहीं होने की वजह से कोई न कोई सहारा चाहिए था। इसी दौरान वे हंड़िया-दारू निर्माण व बिक्री करने वाली अन्य महिलाओं के संपर्क आयीं और खुद इस कार्य को करने लगीं। इससे ना सिर्फ अपराध होता था बल्कि सामाजिक रूप से बहिष्कृत सी हो गयी थीं।परिवार को हेय दृष्टि से समाज देखता था। गीता ने इस पीड़ा से पाने की सोची और समाज के साथ चलने की ठानी। अंततः वे सराईत आजीविका सखी मंडल जुड़ी और इसके अंतर्गत ऋण प्राप्त करने की जानकारी प्राप्त की। इसी दौरान माननीय मुख्यमंत्री श्री हेमन्त सोरेन के द्वारा फुलो-झानो आशीर्वाद योजना के अंतर्गत किये जा रहे आर्थिक सहयोग के बारे जानने का मौका मिला और वे इसकी लाभुक बनीं। आज गीता का जीवन बदल गया है। वे अपनी मेहनत व लग्न से परिवार का भरण पोषण कर रही हैं। उनके परिवार पति, चार बच्चे और सास-ससुर रहते हैं।

भारत की पर्यटन क्षमताओं को मिशन मोड में बढ़ावा
Published / 2023-03-30 18:04:27
भारत की पर्यटन क्षमताओं को मिशन मोड में बढ़ावा

पुनीत चटवाल एबीएन एडिटोरियल डेस्क। पूरी दुनिया में सबसे तेजी से उभरते पर्यटन गंतव्यों में से एक, भारत का यात्रा और पर्यटन क्षेत्र, भरोसेमंद विकास की रूपरेखा प्रदान करता है। एक महत्वपूर्ण उपलब्धि के बाद, अब यह क्षेत्र बड़े लक्ष्यों को हासिल करने के लिए तैयार है। पर्यटन क्षेत्र को एक मिशन के तौर पर विकसित करने के लिए भारत के बजट 2023 में विभिन्न पहल और योजनाओं की रूपरेखा पेश की गयी। बजट-उपरांत सत्र में प्रधानमंत्री ने भारत के विकास को गति देने में पर्यटन क्षेत्र के महत्व का उल्लेख करते हुए कहा कि यह क्षेत्र जीडीपी और रोजगार सृजन दोनों में योगदान दे सकता है। प्रधानमंत्री का यह कथन, पर्यटन क्षेत्र में मौजूद अपार संभावनाओं का प्रमाण है। उद्योग जगत के हितधारकों और सरकार के बीच सामूहिक कार्रवाई पर विशेष ध्यान केंद्रित किया गया है, ताकि इस क्षेत्र के लिए अब तक के सबसे उज्ज्वल भविष्य का निर्माण किया जा सके और यह क्षेत्र अर्थव्यवस्था तथा पूरे समाज पर सकारात्मक प्रभाव डालने में सक्षम हो सके। सहयोग की शक्ति केंद्र सरकार द्वारा पर्यटन को प्रोत्साहन देने का मूल आधार इस तथ्य की स्वीकृति है कि यात्रा और पर्यटन क्षेत्र को आगे बढ़ाने के लिए समर्थन प्रदान किए जाने की आवश्यकता है। केंद्रीय बजट ने सहयोग के लिए छह विषयों को रेखांकित किया है, जिनमें से दो विषय हैं- आपसी तालमेल और सार्वजनिक-निजी-भागीदारी। पर्यटन को विकसित करने और बढ़ावा देने के लिए सरकार, निजी क्षेत्र और स्थानीय समुदायों के बीच सहयोग के महत्व पर बहुत अधिक जोर दिया गया है। विकास का एक प्रमुख कारक होने के अलावा; यह आपसी सहयोग, रचनात्मकता को प्रोत्साहन देता है, प्रतिस्पर्धा बढ़ाता है और दूरदर्शी परिणाम प्राप्त करता है। यदि संबंधित पक्ष अलग-अलग काम करते हों, तो इन परिणामों को हासिल करना एक कठिन कार्य हो सकता है। उदाहरण के लिए, काशी विश्वनाथ धाम मंदिर में आगंतुकों की संख्या, पिछले साल के औसत 80 लाख से बढ़कर 7 करोड़ हो गयी है। स्टैच्यू आफ यूनिटी के आसपास नव विकसित स्थल को अंतिम रूप दिए जाने के बाद, एक वर्ष की अवधि में 27 लाख लोगों ने देखा। पर्यटन, बदलाव के दौर में पर्यटन क्षेत्र को बढ़ावा देने के लिए जिन छह विषयों को रेखांकित किया गया है, उनमें पहला है- पर्यटन स्थल केंद्रित दृष्टिकोण। यह भविष्य के पर्यटन केंद्रों के रूप में 50 पर्यटन-स्थलों को प्रोत्साहन देने के लिए शासन के विभिन्न प्रभागों को एक साथ लाने की बात करता है। प्रधानमंत्री ने काशी, केदारनाथ, स्टैच्यू आफ यूनिटी और पावागढ़ जैसे स्थानों का उदाहरण दिया, यह बताने के लिए कि कैसे एकीकृत दृष्टिकोण के साथ सरकार के विभिन्न विभागों के एक साथ आने से इन स्थानों पर आने वाले पर्यटकों की संख्या में भारी वृद्धि हो सकती है। हमने देखा है कि प्रधानमंत्री के आत्मनिर्भर भारत के आह्वान और देखो अपना देश... की पहल ने घरेलू पर्यटन को बढ़ावा दिया, जिससे आतिथ्य-सत्कार क्षेत्र की कंपनियों को सभी क्षेत्रों में आपूर्ति बढ़ाने का अवसर मिला- व्यवसाय, विलासितापूर्ण संपत्तियों, होम स्टे, विला आदि से लेकर बजट होटलों तक। इन 50 पर्यटन-स्थलों के विकास से आने वाले वर्षों में न केवल स्थितियां बेहतर होंगी, बल्कि भारत में पर्यटन क्रांति की भी शुरुआत होगी। पर्यटन एक सामाजिक-आर्थिक गतिविधि है और विकास के लिए एक दीर्घकालिक दृष्टिकोण है, जो सामाजिक-आर्थिक उद्देश्यों के साथ पर्यावरण आधारित उचित प्रबंधन को संतुलित करता है। इस वर्ष के बजट के प्रमुख विषयों में शामिल हैं- स्थानीय संस्कृति का लाभ उठाना, विरासत को संरक्षित करना, कल्याण और आध्यात्मिक पर्यटन को बढ़ावा देना तथा सभी प्रकार के नीति निर्माण में सतत विकास को ध्यान में रखते हुए जमीनी स्तर पर जीवन स्तर में सुधार करना। प्रौद्योगिकी का लाभ पर्यटन क्षेत्र को बढ़ावा देने वाले विषयों की सूची में एक महत्वपूर्ण विषय है- इस क्षेत्र में चल रही डिजिटलीकरण और नवाचार की प्रक्रिया। डिजिटल तकनीक, एआर/वीआर और कृत्रिम बुद्धिमत्ता (आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस); यात्रा और पर्यटन उद्योग में क्रांति लाने के लिए तैयार हैं। यात्रा-अनुभव, पहले से कहीं अधिक व्यक्ति-केन्द्रित, बहु-आयामी और आपसी संवाद आधारित होते जा रहे हैं। एआर और वीआर यात्रियों को उनकी यात्रा से पहले ही गंतव्य-स्थलों के बारे में जानकारी प्राप्त करने में मदद कर सकते हैं, प्रसिद्ध स्थानों, ऐतिहासिक स्थलों और सांस्कृतिक अनुभवों के वर्चुअल पर्यटन की सुविधा दे सकते हैं और पर्यटन स्थल के चुनाव के बारे में सहायता कर सकते हैं।एआई-संचालित चैटबॉट और डिजिटल सहायक, यात्रियों को उनकी यात्रा-योजना बनाने में मदद कर सकते हैं, व्यक्तिगत गतिविधियों की सिफारिश कर सकते हैं और यात्रा के दौरान वास्तविक समय पर सहायता प्रदान कर सकते हैं। उभरती हुई तकनीकें भी, इस क्षेत्र में कार्बन उत्सर्जन, इसके स्थायित्व और अति-पर्यटन के खतरों की निगरानी रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगी। प्रौद्योगिकी को अपनाने से समन्वित दृष्टिकोण को बढ़ावा मिलता है, जो कम खर्च करने वाले विदेशी पर्यटकों से जुड़ी समस्या का समाधान करने में देश की मदद कर सकता है। औसत आधार पर, हम पाते हैं कि विदेशी पर्यटक, संयुक्त राज्य अमेरिका की तुलना में भारत में 33 प्रतिशत कम खर्च करते हैं और आॅस्ट्रेलिया की तुलना में यह कमी 60 प्रतिशत से भी अधिक है। समय की मांग कारोबार में आसानी दृष्टिकोण को अब यात्रा, पर्यटन और आतिथ्य-सत्कार क्षेत्र में भी शुरू करने की आवश्यकता है। भारत की अपार पर्यटन क्षमता के उपयोग के लिए एक व्यापक रणनीति की आवश्यकता है, जो योजना, स्थान, लोग, नीति, प्रक्रिया और प्रचार के छह प्रमुख स्तंभों को शामिल करे। यह रेखांकित करना महत्वपूर्ण है कि बजट-उपरांत सत्र में इन घटकों पर प्रभावी तरीके से विचार-विमर्श किया गया, जिनमें शामिल हैं- गंतव्य योजना और प्रबंधन, अवसंरचना विकास, स्थायित्व और सुरक्षा, मानव पूंजी का विकास तथा केंद्र और राज्यों के बीच समन्वय के लिए नीति व प्रक्रिया आधारित कार्यक्रमों के साथ-साथ भारतीय पर्यटन के नैरेटिव को बढ़ावा देना। संवैधानिक रूप से, पर्यटन एक राज्य-सूची का विषय है और केंद्रीय पर्यटन विभाग इसे समवर्ती-सूची में स्थानांतरित करने के लिए जोर दे रहा है, ताकि केंद्र और राज्य दोनों स्तरों पर नीति निर्माण की अनुमति मिल सके। उदाहरण के लिए, कुछ भारतीय राज्यों ने पहले ही पर्यटन को उद्योग का दर्जा प्रदान कर दिया है, जो दशकों से इस क्षेत्र की प्रमुख मांग रही है। पर्यटन को उद्योग का दर्जा देने से इस क्षेत्र के विकास को और गति मिलेगी। राष्ट्रीय पर्यटन बोर्ड का गठन, सरकार के पास विचाराधीन है। सही नीतियों और पहलों के साथ, यह भारत को विश्व स्तर पर शीर्ष-3 यात्रा और पर्यटन अर्थव्यवस्थाओं में शामिल करने के लिए एक आदर्श लॉन्च पैड सिद्ध होगा। (लेखक, एचएआई के अध्यक्ष और पर्यटन व आतिथ्य पर सीआईआई की राष्ट्रीय समिति के अध्यक्ष हैं।)

30 हजार यात्राओं से संपूर्ण राममय हुआ भारत : डॉ सुरेंद्र जैन
Published / 2023-03-30 17:57:27
30 हजार यात्राओं से संपूर्ण राममय हुआ भारत : डॉ सुरेंद्र जैन

एबीएन सेंट्रल डेस्क। बंगाल के सिलीगुड़ी शहर में रामनवमी के शुभ अवसर पर आज श्री रामनवमी महोत्सव समिति द्वारा एक भव्य एवं विशाल धार्मिक शोभायात्रा निकाली गई। समिति के सचिव श्री लक्ष्मण बंसल ने बताया कि शहर एवं आसपास के क्षेत्रों से लगभग 5 लाख रामभक्त इस शोभायात्रा में शामिल हुए हैं।भव्यता एवं संख्या के मामले में यह शोभायात्रा पूर्ण पश्चिम बंगाल में  प्रथम स्थान पर है जो कि हिन्दू सनातन समाज का श्री राम के प्रति समर्पण एवं उत्साह का प्रतीक है।  उन्होंने बताया कि इस शोभायात्रा में 81 झांकियां शामिल हुईं जिसमें मुख्य रूप से अयोध्या में राम मंदिर, काशी विश्वनाथ मंदिर, मथुरा के कृष्ण मंदिर, पर्यावरण रक्षा, सामाजिक समरसता, गौ रक्षा की झांकियां और बी एस एफ बैंड आकर्षण का केंद्र रहा।  मल्लागुड़ी स्थित हनुमान मंदिर में आयोजित कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में आये हुए विश्व हिन्दू परिषद् के अखिल भारतीय संयुक्त महामंत्री माननीय श्री सुरेन्द्र जैन ने अपने वक्तव्य में कहा कि जय श्री राम... आज के युग का क्रांति घोष बन गया है। देश भर में आज तीस हजार से अधिक शोभा यात्राएं निकल रही है।पुरा देश हर्ष और उल्लास के साथ जय श्री राम के उद्घोष लगाता हुआ राम नवमी उत्सव मना रहा है। जैसे जैसे राम मंदिर का निर्माण पूर्णता की ओर बढ़ रहा है राम भक्तों का उत्साह उतना ही प्रबलता के साथ बढ़ता जा रहा है। बंगाल में यह उत्साह अद्वितीय है। जिस बंगाल में कुछ राजनेताओं ने वोट बैंक की राजनीति के कारण जय श्री राम के उद्घोष को अपराध बनाने की कोशिश की थी आज उसी बंगाल में दो हजार से अधिक यात्राएं निकल रही है। ऐसा लगता है बंगाल का चप्पा-चप्पा राममयी हो गया है। समाज के सभी वर्गो के लोग जनजाति, युवा एवं महिलाएं अत्यधिक उमंग के साथ भागीदारी कर रही है। बंगाल में राम और दुर्गा में विभेद करने वाले विफल हो गये और जैसे राम ने त्रेता में मां दुर्गा की पुजा की थी वैसे ही बंगाल में आज सभी दुर्गा भक्त जाति, पंथ एवं सम्प्रदाय से उपर राम की भी पूजा कर रहे हैं। कार्यक्रम में विश्व हिन्दू परिषद् के क्षेत्रिय संगठन मंत्री श्री स्वप्न मुखर्जी एवं विशिष्ट सामाजिक और धार्मिक व्यक्तियों की  उपस्थित रही।  बौद्ध धर्म गुरु ने कहा कि रामनवमी के इतने बड़े उत्सव पर बंगाल में सरकारी छुट्टी होनी चाहिए। हनुमान मंदिर में 10 बजकर 15 मिनट पर  प्रभु श्री राम की पूजा अर्चना के बाद  शोभायात्रा का शुभारंभ हुआ। शहर के वेनस मोड़ पर शहर के विभिन्न क्षेत्रों से आयी हुई झांकियां एवं श्रद्धालुओं को साथ लेते हुए यह शोभायात्रा एक विशाल सागर में परिणत हो गयी। लोगों का उत्साह एवं उमंग देखते ही बनता है । पूरा शहर जय श्री राम के नारों से गूंजायमान हो गया। शोभायात्रा शहर की परिक्रमा करते हुए एस एफ रोड स्थित हिन्दी हाई स्कूल पहुंची, जहां भक्तों के लिए महाप्रसाद की व्यवस्था की गई। कार्यक्रम का समापन भजन कीर्तन एवं प्रभु श्री राम की आरती के साथ हुआ।  समिति के अध्यक्ष श्री देवब्रत मित्र ने बताया कि यह शोभायात्रा सामाजिक समरसता की मिशाल है इसमें जाति पंथ से उपर उठकर  सभी हिन्दू शामिल हुए हैं। उन्होंने धार्मिक एवं सामाजिक संस्थाओं का आभार प्रकट किया जिन्होंने यात्रा मार्ग में जगह जगह भक्तों के लिए पानी, जूस, लड्डू, बुंदिया इत्यादि की व्यवस्था की। उक्त जानकारी परिषद के विनोद बंसल ने एक प्रेस विज्ञप्ति जारी कर दी।

बचपन बचाओ आंदोलन... ने ईंट भट्ठे से छुड़वाये 36 बंधुआ बाल मजदूर
Published / 2023-03-29 23:22:13
बचपन बचाओ आंदोलन... ने ईंट भट्ठे से छुड़वाये 36 बंधुआ बाल मजदूर

चित्‍तौड़गढ़ में प्रशासन, पुलिस के साथ की गयी छापामार कार्रवाई एबीएन सेंट्रल डेस्क। नोबेल शांति पुरस्‍कार से सम्‍मानित कैलाश सत्‍यार्थी द्वारा स्‍थापित बचपन बचाओ आंदोलन और उसके सहयोगी संगठन श्री आसरा विकास संस्‍थान ने चित्‍तौड़गढ़ के भूपाल सागर थाना इलाके के तीन ईंटभट्टे पर छापामार कार्रवाई करते हुए 36 बंधुआ बाल श्रमिकों को मुक्‍त करवाया है। चित्‍तौड़गढ़ जिला पुलिस, जिला प्रशासन, लेबर डिपार्टमेंट और एंटी ह्यूमन ट्रैफिकिंग यूनिट की मदद से यह कार्रवाई की गयी। आजाद करवाये गये बच्‍चों में 13 लड़कियां और 23 लड़के हैं। इन सभी की उम्र चार से 16 साल है। यह छापामार कार्रवाई एडीशनल एसपी शहाना खानम की देखरेख में जिला एसपी आईपीएस राजन दुष्‍यंत के नेतृत्‍व में की गयी।सभी छुड़ाये गये 36 बच्‍चे पढ़ाई छोड़कर बालश्रम में लगे हुए थे। मुक्‍त हुए ज्‍यादातर बच्‍चे उत्‍तर प्रदेश के चित्रकूट जिले के हैं जबकि कुछ झारखंड व राजस्‍थान के हैं। इन बच्‍चों ने बताया कि उनसे रात में दो बजे से मजदूरी करवायी जाती थी और दो शिफ्टों में काम करवाया जाता था। मजदूरी के नाम पर इन बच्‍चों को प्रति ईंट 50 पैसे दिया जाता था।पुलिस पूछताछ में पता चला कि उत्‍तर प्रदेश का ही रहने वाला राजा भइया नाम का ठेकेदार ही इन लोगों को यहां लाया था। पुलिस ने उसे हिरासत में ले लिया है जबकि तीनों ईंट भट्ठे के मालिक कालू की तलाश जारी है। ईंट भट्ठे के मालिक ने यहां पर एक पति-पत्‍नी और उसके दो बच्‍चों को बंधुआ मजदूर भी बना रखा था। मालिक द्वारा पति को किसी दूसरे भट्टे पर भेजा जाना था, जिसका विरोध करने पर उसकी बुरी तरह से पिटाई की गयी। इसके बाद उसकी पत्‍नी ने किसी तरह से श्री आसरा विकास संस्‍थान से संपर्क किया। फिर श्री आसरा विकास संस्‍थान ने बचपन बचाओ आंदोलन के कार्यकर्ताओं को इसकी जानकारी दी गयी। बचपन बचाओ आंदोलन ने राजस्‍थान पुलिस मुख्‍यालय में इस संबंध में लिखित शिकायत की, जिसके बाद मुख्‍यालय से कार्रवाई का आदेश जारी किया गया। सुबह पांच बजे से शुरू हुई कार्रवाई को पूरी तरह से गुप्‍त रखा गया। यह करीब तीन घंटे तक चली, जिसके बाद बच्‍चों को मुक्‍त करवाया जा सका और घटनास्‍थल से 60 किमी दूर चित्‍तौड़गढ़ लाया गया और वहां आजाद करवाये गये सभी बच्‍चों को चाइल्‍ड वेलफेयर कमेटी के सामने प्रस्‍तुत किया गया।ईंटभट्टों पर काम करने वाले बाल श्रमिकों व बंधुआ परिवारों की स्थिति पर चिंता जताते हुए बचपन बचाओ आंदोलन के निदेशक मनीष शर्मा ने कहा कि यह बहुत ही चिंताजनक व भयावह है कि आज भी इस तरह से बच्‍चों व उनके माता-पिता को बंधक बनाकर श्रम करवाया जा रहा है। ट्रैफिकर्स अच्‍छे काम और पैसे का लालच देकर दूसरे राज्‍यों से लोगों को लाते हैं और फिर उन्‍हें बंधुआ बनाकर मजदूरी करवाते हैं। यह बहुत ही अमानवीय है। सरकार को चाहिए कि वह बच्‍चों का बचपन सुरक्षित बनाने के लिए पुलिस व जांच एजेंसियों को और भी ज्‍यादा सक्रिय व सशक्‍त करे, ताकि बच्‍चों को एक खुशहाल व उज्ज्वल भविष्‍य दिया जा सके।उन्‍होंने प्रशासन व पुलिस को धन्‍यवाद देते हुए कहा कि ये बच्‍चे तो मुक्‍त हो गये, लेकिन अन्‍य स्‍थानों पर भी जांच की जानी चाहिए कि कहीं बाल बंधुआ मजदूरी तो नहीं करवायी जा रही है? बचपन बचाओ आंदोलन, हर जगह प्रशासन व पुलिस के साथ सहयोग करता रहेगा। साथ ही मनीष शर्मा ने कहा कि हमारी सरकार से मांग है कि चाइल्‍ड ट्रैफिकिंग पर रोक लगाने के लिए वह जल्‍द से जल्‍द एंटी ट्रैफिकिंग बिल को संसद में पास करवाये।

रामचरितमानस राम का पावन चरित, प्रबंधन (मैनेजमेंट) का सर्वश्रेष्ठ ग्रंथ है...
Published / 2023-03-29 13:53:46
रामचरितमानस राम का पावन चरित, प्रबंधन (मैनेजमेंट) का सर्वश्रेष्ठ ग्रंथ है...

रवि रंजनएबीएन सोशल डेस्क। उमा राम गुन गूढ़ पंडित मुनि पावहिं बिरति। पावहिं मोह बिमूढ़ जे हरि बिमुख न धर्म रति॥भावार्थ : हे पार्वती! श्री रामजी के गुण गूढ़ हैं, पण्डित और मुनि उन्हें समझकर वैराग्य प्राप्त करते हैं, परन्तु जो भगवान से विमुख हैं और जिनका धर्म में प्रेम नहीं है, वे महामूढ़ (उन्हें सुनकर) मोह को प्राप्त होते हैं। आजकल टीम वर्क की बहुत बात होती है, कोई टीम लीडर अपने टीम के सदस्यों को कैसे प्रेरित कर सकता है, कैसे उनकी प्रतिभा का अधिकतम उपयोग कर सकता है, कैसे उसके गुणों और विशेषताओं को उभार सकता है, कैसे अपने से ऊपर के अधिकारियों को भी यथायोग्य मान-सम्मान देते हुए अपने नीचे वाले को भी वैसा ही सीखा सकता है, इन सब बातों की आज बाकायदा ट्रेनिंग दी जाती है। अब्दुल कलाम, रतन टाटा जैसे सफल व्यक्तियों के जीवन से उदाहरण देकर टीम-लीडरशीप का वैसा ही गुण विकसित करने की प्रेरणा दी जाती है। अगर हम अकेले भगवान राम के जीवन चरित का अनुगमन करें तो हमें न तो ऐसी किसी ट्रेनिंग की आवश्यकता होगी, न ही कहीं और से उदाहरण ढूंढने होंगे। राम का व्यक्तित्व इन मायनों में भी सर्वोपरि है कि एक कुशल प्रबंधक, एक टीम-लीडर और सबके लिये सम्मान की उनकी सामूहिक विशेषता का दर्शन हर क्षण होता था। अपने जीवन में जहां उन्होंने अपने से छोटों को मान दिया, उन्हें प्रेरित किया, वहीं अपने सहयोगियों के साथ समादर और गुरुजनों तथा वरिष्ठों के लिए आदर का भाव रखा। जब लंका विजय हुई तो विजय के उपलक्ष्य में प्रभु ने सब वानर-भालुओं को बुलाया, उनसे प्रेम से बात की और कहा, ये विजय मेरी नहीं है, न ही रावण वध अकेले मेरे बल का परिणाम था बल्कि ये विजय आप सबके बल से प्राप्त हुआ है और आज तीनों लोक आप सबका यशोगान गा रहा है। अपने इन सहयोगियों के प्रति राम ने तब भी आभार प्रकट करते हुए उन्हें विजय का श्रेय दिया था जब वो चौदह वर्ष के वनवास के बाद अयोध्या लौटे थे, अपने कुल गुरु वशिष्ठ से सबका परिचय कराते हुए राम ने कहा था, गुरुवर ! ये सब मेरे वो मित्र हैं जिन्होनें मेरे लिए अपने प्राणों की बाजी लगा दी, ये सब मुझे भरत से भी अधिक प्रिय हैं। लंकाकाण्ड में आता है कि जब विभीषण के राज्याभिषेक की बात हो रही थी तब राम ने विभीषण के लंका चलने के अनुरोध को ये कहते हुए ठुकरा दिया था कि मैं पिता की आज्ञानुसार चौदह वर्ष पूर्व नगर में नहीं जा सकता पर आपके राज्याभिषेक के लिए मैं "अपने समान" सब वानरों को भेजता हूं। राम ने वानरों को अपने समान बताया। राम से अधिक समाजवादी कोई दुनिया के किसी किताब, किसी वृत से, किसी इतिहास ग्रन्थ से निकाल कर दिखा दे। अपने सहयोगियों के प्रति राम मालिक और सेवक का भाव नहीं रखते थे, बल्कि सबके गुणों की मुक्त कंठ से प्रशंसा करते थे। कुछ नीच बुद्धि कहते हैं कि हनुमान के प्रति राम का व्यवहार मालिक और सेवक का था और चूंकि सेवक ने मालिक का काम किया इसलिए राम ने उनकी प्रशंसा की होगी पर इन निर्बुद्धियों ने ठीक से रामायण नहीं पढ़ी। राम की नज़र में हनुमान सेवक नहीं थे, राम ने कई बार हनुमान को अपना पुत्र बताया है। वो हनुमान से कहते हैं-"सुन सुत तोहि उरिन मैं नाहीं"यानि हे पुत्र ! सुन मैं तुझसे उरिन नहीं हो सकता। ये आरोप भी गलत है कि चूंकि हनुमान ने उनका काम किया था। इसलिए राम उनकी प्रशंसा करते थे। किष्किंधा में जब राम और हनुमान की पहली भेंट हुई थी तब राम ने हनुमान के बारे में लक्ष्मण से जो कहा वो स्पष्ट बताता है कि राम हनुमान का कितना आदर करते थे। राम हनुमान के पांडित्य, वार्तालाप की शैली और उनके शब्द और भाव संप्रेषण की कला से अभिभूत थे। चित्रकूट में अपने अनुज भरत को राज्य-संचालन की शिक्षा देते समय राम उनसे कहतें हैं, हमारे पिता के असमय निधन के पश्चात् भी अगर अयोध्या बनी रही है तो उसका समस्त श्रेय हमारे गुरुजनों को जाता है, अतः हे भरत ! राज्य का संचालन सदैव गुरुजनों और वशिष्ठजनों के आदेश पर ही करना क्योंकि अगर इनकी कृपा रही तो हमें स्वप्न में भी क्लेश नहीं हो सकता। सुमंत राम के पिता दशरथ के मंत्री थे पर उनके प्रति भी राम का व्यवहार पितातुल्य ही था। राम सुमंत से कहते हैं-"तुम्ह पुनि पितु सम अति हित मोरे, बिनती करऊँ तात कर जोरे"अर्थात हे तात ! आप भी पिता के समान ही मेरे हितैषी हैं इसलिए मैं आपसे हाथ जोड़कर विनती करता हूं। ऐसा ही सम्मान भाव उनका अपने पिता के मित्रों के प्रति और गुरुओं के लिए भी था। जटायु को उन्होंने अपने पिता तुल्य माना। जब वनवास के बाद अयोध्या लौटे तो अपने गुरु वशिष्ठ के चरणों में प्रणाम करते हुए अपने मित्रों से कहा कि ये हमारे कुल के पूज्य है और इनकी कृपा से ही हमने युद्ध में सब राक्षसों को मारा है। कैकेई के चलते उन्हें वनवास मिला था पर भरत-मिलाप के प्रसंग में कई बार ये आता है कि उन्होंने सबसे यही कहा, मेरी सब माताओं का ख्याल रखना। राम का पावन चरित कार्यक्षेत्र से लेकर घर-परिवार, समाज और राष्ट्रजीवन के लिए मैनेजमेंट की सर्वश्रेष्ठ किताब है। राम-चरित का अनुगमन करेंगे तो अपने आसपास, अपने घर-परिवार और अपने कार्यक्षेत्र में हो रहे सहज परिवर्तनों को स्वयं महसूस करेंगे।राम चरित जे सुनत अघाहीं। रस बिसेष जाना तिन्ह नाहीं॥ जीवनमुक्त महामुनि जेऊ। हरि गुन सुनहिं निरंतर तेऊ॥भावार्थ : श्री रामजी के चरित्र सुनते-सुनते जो तृप्त हो जाते हैं (बस कर देते हैं), उन्होंने तो उसका विशेष रस जाना ही नहीं। जो जीवन्मुक्त महामुनि हैं, वे भी भगवान्‌ के गुण निरंतर सुनते रहते हैं।

प्रासंगिक हैं जन-जन के श्रीराम
Published / 2023-03-29 13:38:18
प्रासंगिक हैं जन-जन के श्रीराम

सुरेन्द्र किशोरीएबीएन सोशल डेस्क। दुनिया में जहां कहीं भी सनातन धर्मावलंबी हैं, वहां मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम की पूजा आदर्श के रूप में होती है। खासकर भारतीय धर्म-संस्कृति में भगवान श्रीराम का अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है। कोटि-कोटि हृदयों में प्रभु श्रीराम के प्रति गहन आस्था है।राष्ट्र जागरण एवं विश्व परिवर्तन के वर्तमान परिवेश में वह और भी अधिक प्रासंगिक एवं पूजनीय बन चुके हैं। उनका शौर्य, उनकी मर्यादा, उनका संघर्ष, उनका अनीति उन्मूलन के प्रति प्रचंड पुरुषार्थ एवं आदर्श राज्य व्यवस्था रामराज्य के सर्व कल्याण की प्रेरक प्रतिष्ठापनाएं जन-जन में उत्कृष्ट भाव-संवेदनाएं जगाती है। प्रखर पुरुषार्थ पराक्रम के लिए प्रेरित करती हैं।वर्तमान में जब अंधकार का युग तिरोहित हो रहा है, नवयुग का सूर्योदय हो रहा है, प्रभु श्रीराम का महान गौरवशाली जीवन दिव्य प्रकाशस्तंभ की तरह मार्गदर्शन करने को पूर्ण तत्पर है। भारतीय संस्कृति की अति महत्वपूर्ण विशेषताएं जो विश्व जनमानस की धरोहर हैं। उन्हें अपनाने, अपना आदर्श बनाने की आत्मीयता एवं श्रद्धापूर्ण अभीष्ट अभीप्सा अगणित धर्मवानों-राष्ट्रभक्तों के हृदय में उमड़ने-उभरने लगी है।महान भविष्यवक्ताओं, दिव्यदर्शी महापुरुषों और अखिल विश्व गायत्री परिवार के संस्थापक आचार्य श्रीराम शर्मा आचार्य ने अनंत कालचक्र के वर्तमान खंड को मानव मात्र के लिए दिव्य संभावनाओं, उपलब्धियों, योजनाओं के साकार होने का समय बताया है। जिसमें सभी के लिए उज्ज्वल भविष्य, समृद्ध, सुसंस्कृत जीवन एवं सर्वोच्च भौतिक आत्मिक प्रगति का सुलभ होना सुनिश्चित माना गया है।इसका आधार बन रहा है सनातन धर्म-संस्कृति का ज्ञान-विज्ञान एवं ऋषियों-मुनियों, अवतारी चेतनाओं का आदर्श व्यक्तित्व। प्रभु श्रीराम का व्यक्तित्व आदर्श अवतार का रहा है, जिसके कारण भारत ही नहीं, विश्व भर के बहुत सारे लोगों में उनके प्रति परम आस्था एवं श्रद्धा का सघन भाव रहा है, जो आज प्रकट होकर क्रियान्वयन में निरत है। श्रीराम चरित्र एक समुद्र की तरह है, जिसमें सर्वसाधारण से लेकर विशिष्ट जनों तक के लिए प्रेरक चिंतन के अमूल्य मोती विद्यमान हैं।आज जब कुछ स्वघोषित बुद्धिवादियों द्वारा श्रीराम चरित्र से जुड़े ग्रंथों पर कुतार्किक प्रहार किया जा रहा है। ऐसे में यह अत्यंत आवश्यक हो गया है कि हम उनके महान आदर्शों को धूमिल नहीं होने दें। बल्कि समर्पण एवं निष्ठा के साथ कुटिल आक्षेपों का निराकरण करते हुए तथ्यों की वास्तविकता को जनसमुदाय के समक्ष स्पष्टतापूर्वक रखें। आध्यात्मिक-सांस्कृतिक प्रगति का जो राष्ट्र अभियान गति पकड़ चुका है, उस पर कोई ग्रहण, धब्बा नहीं लग सके।प्रभु श्रीराम आदर्श पुरुष, आदर्श पुत्र, आदर्श भाई, आदर्श शिष्य, आदर्श सम्राट आदि का हृदयग्राही परम अनुकरणीय कर्म-पथ प्रस्तुत करते हैं। आज अत्यंत आवश्यकता है कि हम सभी उनके दिव्य स्वरूप को भली भांति जानें, समझें एवं अनुगमन करें, ताकि पूरी मानवता का भविष्य शानदार और श्रेष्ठ बनाया जा सके।

नवरात्र : 2.45 लाख श्रद्धालु पहुंचे माता वैष्णो देवी के दरबार
Published / 2023-03-29 11:20:31
नवरात्र : 2.45 लाख श्रद्धालु पहुंचे माता वैष्णो देवी के दरबार

एबीएन सोशल डेस्क। मां वैष्णो देवी के दर्शनों को आने वाले श्रद्धालुओं की संख्या में दिन-प्रतिदिन वृद्धि हो रही है। अब तक चैत्र नवरात्रों के दौरान 2.45 लाख श्रद्धालुओं ने वैष्णो देवी भवन पर नमन कर मां भगवती से आशीर्वाद प्राप्त किया। 9 नवरात्रों में यह आंकड़ा 3 लाख के पार होने की संभावना है।पंजीकरण कक्ष से मिले आंकड़ों के अनुसार पहले नवरात्र पर 33,850 श्रद्धालुओं ने मां के समक्ष नमन किया था। दूसरे नवरात्रे पर 32,678 श्रद्धालुओं ने मां भगवती से आशीर्वाद प्राप्त किया तो वहीं तीसरे नवरात्रे पर 33,400, चौथे पर 40,000 श्रद्धालुओं ने मां भगवती के दरबार में नमन किया वहीं 5वें नवरात्रे पर 43,000 श्रद्धालु वैष्णो देवी भवन में नतमस्तक हुए।सोमवार को 35,000 श्रद्धालुओं ने मां वैष्णो देवी के दर्शन किये तो मंगलवार को खबर लिखे जाने तक 30,000 श्रद्धालुओं ने यात्रा पर्ची आरएफआईडी लेकर वैष्णो देवी भवन की ओर प्रस्थान कर दिया था।

तुलसी के राम अपने राम...
Published / 2023-03-28 18:49:21
तुलसी के राम अपने राम...

एबीएन सोशल डेस्क। तुलसीदास की सबसे प्रमुख कृति है। इसकी रचना संवत 1631 ईस्वी की रामनवमी को अयोध्या में प्रारंभ हुई थी किन्तु इसका कुछ अंश काशी (वाराणसी) में भी निर्मित हुआ था, यह इसके किष्किन्धा काण्ड के प्रारम्भ में आने वाले एक सोरठे से निकलती है, उसमें काशी सेवन का उल्लेख है। इसकी समाप्ति संवत 1633 ईस्वी की मार्गशीर्ष, शुक्ल 5, रविवार को हुई थी किंतु उक्त तिथि गणना से शुद्ध नहीं ठहरती, इसलिए विश्वसनीय नहीं कही जा सकती। यह रचना अवधी बोली में लिखी गयी है। इसके मुख्य छन्द चौपाई और दोहा हैं, बीच-बीच में कुछ अन्य प्रकार के भी छन्दों का प्रयोग हुआ है। प्राय: 8 या अधिक अर्द्धलियों के बाद दोहा होता है और इन दोहों के साथ कड़वक संख्या दी गयी है। इस प्रकार के समस्त कड़वकों की संख्या 1074 है। रामचरितमानस चरित-काव्य रामचरितमानस एक चरित-काव्य है, जिसमें राम का सम्पूर्ण जीवन-चरित वर्णित हुआ है। इसमें चरित और काव्य दोनों के गुण समान रूप से मिलते हैं। इस काव्य के चरितनायक कवि के आराध्य भी हैं, इसलिए वह चरित और काव्य होने के साथ-साथ कवि की भक्ति का प्रतीक भी है। रचना के इन तीनों रूपों में उसका विवरण इस प्रकार है- संक्षिप्त कथा रामचरितमानस की कथा संक्षेप में इस प्रकार है- दक्षों से लंका को जीतकर राक्षसराज रावण वहां राज्य करने लगा। उसके अनाचारों-अत्याचारों से पृथ्वी त्रस्त हो गयी और वह देवताओं की शरण में गयी। इन सब ने मिलकर हरि की स्तुति की, जिसके उत्तर में आकाशवाणी हुई कि हरि दशरथ-कौशल्या के पुत्र राम के रूप में अयोध्या में अवतार ग्रहण करेंगे और राक्षसों का नाश कर भूमि-भार हरण करेंगे। इस आश्वासन के अनुसार चैत्र के शुक्ल पक्ष की नवमी को हरि ने कौशल्या के पुत्र के रूप में अवतार धारण किया। दशरथ की दो रानियां और थीं- कैकेयी और सुमित्रा। उनसे दशरथ के तीन और पुत्रों-भरत, लक्ष्मण और शत्रुघ्न ने जन्म ग्रहण किया। विश्वामित्र के आश्रम में राम इस समय राक्षसों का अत्याचार उत्तर भारत में भी कुछ क्षेत्रों में प्रारम्भ हो गया था, जिसके कारण मुनि विश्वामित्र यज्ञ नहीं कर पा रहे थे। उन्हें जब यह ज्ञात हुआ कि दशरथ के पुत्र राम के रूप में हरि अवतरित हुए हैं, वे अयोध्या आये और जब राम बालक ही थे, उन्होंने राक्षसों के दमन के लिए दशरथ से राम की याचना की। राम तथा लक्ष्मण की सहायता से उन्होंने अपना यज्ञ पूरा किया। इन उपद्रवकारी राक्षसों में से एक सुबाहु था, जो मारा गया और दूसरा मारीच था, जो राम के बाणों से आहत होकर सौ योजन की दूरी पर समुद्र के पार चला गया। जिस समय राम-लक्ष्मण विश्वामित्र के आश्रम में रह रहे थे, मिथिला में धनुर्यज्ञ का आयोजन किया गया था, जिसके लिए मुनि को निमन्त्रण प्राप्त हुआ। अत: मुनि राम-लक्ष्मण को लेकर मिथिला गये।मिथिला के राजा जनक ने देश-विदेश के समस्त राजाओं को अपनी पुत्री सीता के स्वयंवर हेतु आमन्त्रित किया था। रावण और बाणासुर जैसे बलशाली राक्षस नरेश भी इस आमन्त्रण पर वहां गये थे किन्तु अपने को इस कार्य के लिए असमर्थ मानकर लौट चुके थे। दूसरे राजाओं ने सम्मिलित होकर भी इसे तोड़ने का प्रयत्न किया, किंतु वे अकृत कार्य रहे। राम ने इसे सहज ही तोड़ दिया और सीता का वरण किया। विवाह के अवसर पर अयोध्या निमंत्रण भेजा गया। दशरथ अपने शेष पुत्रों के साथ बारात लेकर मिथिला आये और विवाह के अनंतर अपने चारों पुत्रों को लेकर अयोध्या लौटे। कैकेयी और कोपभवन दशरथ की अवस्था धीरे-धीरे ढलने लगी थी, इसलिए उन्होंने राम को अपना युवराज पद देना चाहा। संयोग से इस समय कैकेयी-पुत्र भरत सुमित्रा-पुत्र शत्रुघ्न के साथ ननिहाल गये हुए थे। कैकेयी की एक दासी मन्थरा को जब यह समाचार ज्ञात हुआ, उसने कैकेयी को सुनाया। पहले तो कैकेयी ने यह कहकर उसका अनुमोदन किया कि पिता के अनेक पुत्रों में से ज्येष्ठ पुत्र ही राज्य का अधिकारी होता है, यह उसके राजकुल की परम्परा है किन्तु मन्थरा के यह सुझाने पर कि भरत की अनुपस्थिति में जो यह आयोजन किया जा रहा है, उसमें कोई दुरभि-सन्धि है, कैकेयी ने उस आयोजन को विफल बनाने का निश्चय किया और कोप भवन में चली गयी। तदनन्तर उसने दशरथ से, उनके मनाने पर, दो वर देने के लिए वचन; एक से राम के लिए 14 वर्षों का वनवास और दूसरे से भरत के लिए युवराज पद मांग लिये। इनमें से प्रथम वचन के अनुसार राम ने वन के लिए प्रस्थान किया तो उनके साथ सीता और लक्ष्मण ने भी वन के लिए प्रस्थान किया। कुछ ही दिनों बाद जब दशरथ ने राम के विरह में शरीर त्याग दिया, भरत ननिहाल से बुलाये गये और उन्हें अयोध्या का सिंहासन दिया गया, किन्तु भरत ने उसे स्वीकार नहीं किया और वे राम को वापस लाने के लिए चित्रकूट जा पहुंचे, जहां उस समय राम निवास कर रहे थे किन्तु राम ने लौटना स्वीकार न किया। भरत के अनुरोध पर उन्होंने अपनी चरण-पादुकाएं उन्हें दे दीं, जिन्हें अयोध्या लाकर भरत ने सिंहासन पर रखा और वे राज्य का कार्य देखने लगे। चित्रकूट से चलकर राम दक्षिण के जंगलों की ओर बढ़े। जब वे पंचवटी में निवास कर रहे थे रावण की एक भगिनी शूर्पणखा एक मनोहर रूप धारण कर वहां आयी और राम के सौन्दर्य पर मुग्ध होकर उनसे विवाह का प्रस्ताव किया। राम ने जब इसे अस्वीकार किया तो उसने अपना भयंकर रूप प्रकट किया। यह देखकर राम के संकेतों से लक्ष्मण ने उसके नाक-कान काट लिये। इस प्रकार कुरूप की हुई शूर्पणखा अपने भाइयों-खर और दूषण के पास गयी और उन्हें राम से युद्ध करने को प्रेरित किया। खर-दूषण ने अपनी सेना लेकर राम पर आक्रमण कर दिया किन्तु वे अपनी समस्त सेना के साथ युद्ध में मारे गये। तदनन्तर शूर्पणखा रावण के पास गयी और उसने उसे सारी घटना सुनायी। रावण ने मारीच की सहायता से, जिसे विश्वामित्र के आश्रम में राम ने युद्ध में आहत किया था, सीता का हरण किया, जिसके परिणामस्वरूप राम को रावण से युद्ध करना पड़ा। राम और रावण युद्ध इस परिस्थिति में राम ने किष्किन्धा के वानरों की सहायता ली और रावण पर आक्रमण कर दिया। इस आक्रमण के साथ रावण का भाई विभीषण भी आकर राम के साथ हो गया। राम ने अंगद नाम के वानर को रावण के पास दूत के रूप में अंतिम बार सावधान करने के लिए भेजा कि वह सीता को लौटा दे, किंतु रावण ने अपने अभिमान के बल से इसे स्वीकार नहीं किया और राम तथा रावण के दलों में युद्ध छिड़ गया। उस महायुद्ध में रावण तथा उसके बंधु-बांधव मारे गये। तदनंतर लंका का राज्य उसके भाई विभीषण को देकर सीता को साथ लेकर राम और लक्ष्मण अयोध्या वापस आये। राम का राज्याभिषेक किया गया और दीर्घकाल तक उन्होंने प्रजारंजन करते हुए शासन किया। इस मूल कथा के पूर्व रामचरितमानस में रावण के कुछ पूर्वभवों की तथा राम के कुछ पूर्ववर्ती अवतारों की कथाएं हैं, जो संक्षेप में दी गयी है। कथा के अन्त में गरुड़ और काग भुशुण्डि का एक विस्तृत संवाद है, जिसमें अनेक प्रकार के आध्यात्मिक विषयों का विवेचन हुआ है। कथा के प्रारंभ होने के पूर्व शिव-चरित्र, शिव-पार्वती संवाद, याज्ञवल्क्य-भारद्वाज संवाद तथा काग भुशुण्डि-गरुड़ संवाद के रूप में कथा की भूमिकाएं हैं। और उनके भी पूर्व कवि की भूमिका और प्रस्तावना है। रामचरितमानस चरित की दृष्टि से यह रचना पर्याप्त सफल हुई है। इसमें राम के जीवन की समस्त घटनाएँ आवश्यक विस्तार के साथ एक पूवार्कार की कथाओं से लेकर राम के राज्य-वर्णन तक कवि ने कोई भी प्रासंगिक कथा रचना में नहीं आने दी है। इस संबंध में यदि वाल्मीकीय तथा अन्य अधिकतर राम-कथा ग्रन्थों से रामचरितमानस की तुलना की जाय तो तुलसीदास की विशेषता प्रमाणित होगी। अन्य रामकथा ग्रन्थों में बीच-बीच में कुछ प्रासंगिक कथाएँ देखकर अनेक क्षेपककारों ने रामचरितमानस में प्रक्षिप्त प्रसंग रखे और कथाएँ मिलायीं, किन्तु राम-कथा के पाठकों ने उन्हें स्वीकार नहीं किया और वे रचना को मूल रूप में ही पढ़ते और उसका पारायण करते हैं। चरित-काव्यों की एक बड़ी विशेषता उनकी सहज और प्रयासहीन शैली मानी गयी है, और इस दृष्टि से मानस एक अत्यंत सफल चरित है। रचना भर में तुलसीदास ने कहीं भी अपना काव्य कौशल, अपना पांडित्य, अपनी बहुज्ञता आदि के प्रदर्शन का कोई प्रयास नहीं किया है। सर्वत्र वे अपने वर्ण्य विषय में इतने तन्मय रहे हैं कि उन्हें अपना ध्यान नहीं रहा। रचना को पढ़कर ऐसा लगता है कि राम के चरित ने ही उन्हें वह वाणी प्रदान की है, जिसके द्वारा वे सुन्दर कृति का निर्माण कर सके। उत्कृष्ट महाकाव्य काव्य की दृष्टि से रामचरितमानस एक अति उत्कृष्ट महाकाव्य है। भारतीय साहित्य-शास्त्र में महाकाव्य के जितने लक्षण दिये गये हैं, वे उसमें पूर्ण रूप से पाये जाते हैं। कथा-प्रबंध का सर्गबद्ध होना, उच्चकुल संभूत धीरोदात्त नायक का होना, श्रृंगार, शांत और वीर रसों में से किसी एक का उसका लक्ष्य होना आदि सभी लक्षण उसमें मिलते हैं। पाश्चात्य साहित्यालोचन में इपिक की जो विभिन्न आवश्यकताएं बतलायी गयी हैं, यथा- उसकी कथा का किसी गौरवपूर्ण अतीत से संबद्ध होना, अतिप्राकृत शक्तियों का उसकी कथा में भाग लेना, कथा के अन्त में किन्हीं आदर्शों की विजय का चित्रित होना आदि, सभी रामचरितमानस में पाई जाती हैं। इस प्रकार किसी भी दृष्टि से देखा जाय तो रामचरितमानस एक अत्यन्त उत्कृष्ट महाकाव्य ठहरता है। मुख्यत: यही कारण है कि संसार की महान् कृतियों में इसे भी स्थान मिला है। रामचरितमानस में छन्दों की संख्या रामचरितमानस में विविध छन्दों की संख्या निम्नवत है- चौपाई : 9388 दोहा : 1172 सोरठा : 87 श्लोक : 47 (अनुष्टुप्, शार्दूलविक्रीडित, वसन्ततिलका, वंशस्थ, उपजाति, प्रमाणिका, मालिनी, स्रग्धरा, रथोद्धता, भुजङ्गप्रयात, तोटक) छन्द : 208 (हरिगीतिका, चौपैया, त्रिभङ्गी, तोमर) कुल 10902 (चौपाई, दोहा, सोरठा, श्लोक, छन्द)तुलसीदास की भक्ति तुलसीदास की भक्ति की अभिव्यक्ति भी इसमें अत्यन्त विशद रूप में हुई है। अपने आराध्य के संबंध में उन्होंने रामचरितमानस और विनय-पत्रिका में अनेक बार कहा है कि उनके राम का चरित्र ही ऐसा है कि जो एक बार उसे सुन लेता है, वह अनायास उनका भक्त हो जाता है। वास्तव में तुलसीदास ने अपने आराध्य के चरित्र की ऐसी ही कल्पना की है। यही कारण है कि इसने समस्त उत्तरी भारत पर सदियों से अपना अद्भुत प्रभाव डाल रखा है और यहां के आध्यात्मिक जीवन का निर्माण किया है। घर-घर में रामचरितमानस का पाठ पिछली साढ़े तीन शताब्दियों से बराबर होता आ रहा है। और इसे एक धर्म ग्रन्थ के रूप में देखा जाता है। इसके आधार पर गांव-गांव में प्रतिवर्ष रामलीलाओं का भी आयोजन किया जाता है। फलत: जैसा विदेशी विद्वानों ने भी स्वीकार किया है। उत्तरी भारत का यह सबसे लोकप्रिय ग्रंथ है और इसने जीवन के समस्त क्षेत्रों में उच्चाशयता लाने में सफलता प्राप्त की है। लोकप्रिय ग्रंथ यहां पर स्वभावत: यह प्रश्न उठता है कि तुलसीदास ने राम तथा उनके भक्तों के चरित्र में ऐसी कौन-सी विलक्षणता उपस्थित की है, जिससे उनकी इस कृति को इतनी अधिक लोकप्रियता प्राप्त हुई है। तुलसीदास की इस रचना में अनेक दुर्लभ गुण हैं किंतु कदाचित अपने जिस महान् गुण के कारण इसने यह असाधारण सम्मान प्राप्त किया है, वह है ऐसी मानवता की कल्पना, जिसमें उदारता, क्षमा, त्याग, निवैरता, धैर्य और सहनशीलता आदि सामाजिक शिवत्व के गुण अपनी पराकाष्ठा के साथ मिलते हों और फिर भी जो अव्यावहारिक न हों। रामचरितमानस के सर्वप्रमुख चरित्र-राम, भरत, सीता आदि इसी प्रकार के हैं। उदाहरण के लिए राम और कौशल्या के चरित्रों को देखते हैं- वाल्मीकि रामायण में राम जब वनवास का दु:संवाद सुनाने कौशल्या के पास आते हैं, वे कहते हैं : देवि, आप जानती नहीं हैं, आपके लिए, सीता के लिए और लक्ष्मण के लिए बड़ा भय आया है, इससे आप लोग दु:खी होंगे। अब मैं दंडकारण्य जा रहा हूं, इससे आप लोग दुखी होंगे। भोजन के निमित्त बैठने के लिए रखे गये इस आसन से मुझे क्या करना है? अब मेरे लिए कुशा आसन चाहिये, आसन नहीं। निर्जन वन में चौदह वर्षो तक निवास करूँगा। अब मैं कन्द मूल फल से जीविका चलाऊँगा। महाराज युवराज का पद भरत को दे रहे हैं और तपस्वी वेश में मुझे अरण्य भेज रहे है। अध्यात्म रामायण में राम ने इस प्रसंग में कहा है कि माता मुझे भोजन करने का समय नहीं है, क्योंकि आज मेरे लिए यह समय शीघ्र ही दण्डकारण्य जाने के लिए निश्चित किया गया है। मेरे सत्य-प्रतिज्ञ पिता ने माता कैकेयी को वर देकर भरत को राज्य और मुझे अति उत्तम वनवास दिया। वहां मुनि वेश में चौदह वर्ष रहकर मैं शीघ्र ही लौट आऊंगा, आप किसी प्रकार की चिंता न करें। रामचरितमानस में यह प्रसंग इस प्रकार है- मातृ वचन सुनि अति अनुकूला। जनु सनेह सुरतरू के फूला।। सुख मकरंद भरे श्रिय मूला। निरखि राम मन भंवरू न भूला।। धरम धुरीन धरम गनि जानी। कहेउ मातृ सन अमृत वानी।। पिता दीन्ह मोहिं कानन राजू। जहं सब भांति मोर बड़ काजू।। आयसु देहि मुदित मन माता। जेहिं मुद मंगल कानन जाता।। जनि सनेह बस डरपति मोरे। आबहुं अंब अनुग्रह तोरे।। तुलनात्मक अध्ययन यहां पर दर्शनीय यह है कि तुलसीदास वाल्मीकि-रामायण के राम को ग्रहण न कर अध्यात्म रामायण के राम को ग्रहण किया है। वाल्मीकि के राम में भरत की ओर से अपने स्नेही स्वजनों के सम्बन्ध में जो अनिष्ट की आशंका है, वह अध्यात्म रामायण के राम में नहीं रह गयी है और तुलसीदास के राम में भी नहीं आने पायी है किंतु इसी प्रसंग में पिता की आज्ञा के प्रति लक्ष्मण के विद्रोह के शब्दों को सुनकर राम ने संसार की अनित्यता और देहादि से आत्मा की भिन्नता का एक लम्बा उपदेश दिया है, जिस पर उन्होंने माता से नित्य विचार करने के लिए अनुरोध किया है, हे मात:! तुम भी मेरे इस कथन पर नित्य विचार करना और मेरे फिर मिलने की प्रतीक्षा करती रहना। तुम्हें अधिक काल तक दु:ख न होगा। कर्म-बंधन में बंधे हुए जीवों का सदा एक ही साथ रहना-सहना नहीं हुआ करता, जैसे नदी के प्रवाह में पड़कर बहती हुई डोंगियां सदा साथ-साथ ही नहीं चलती। तुलसीदास जी भगवान राम, लक्ष्मण और हनुमान जी को रामचारितमानस का पाठ सुनाते हुए। व्यावहारिकता तुलसीदास इस अध्यात्मवाद की दुहाई न देकर अपने आदर्शवाद को अव्यावहारिक होने से बचा लेते हैं। वे राम को एक धर्म-निष्ठ नायक के रूप में ही चित्रित करते हैं, जो पिता की आज्ञा का पालन करना अपना एक परम पुनीत कर्तव्य समझता है, इसलिए उन्होंने कहा है: धरम धुरीन धरम गतिजानी। कहेउ मातु सन अति मृदु बानी।। दूसरा प्रसंग वनवास के दु:ख संवाद को जब राम सीता को सुनाने जाते हैं, वाल्मीकीय रामायण में वे कहते हैं: मैं निर्जन वन में जाने के लिए प्रस्तुत हुआ हूं और तुमसे मिलने के लिए यहां आया हूं। तुम भरत के सामने मेरी प्रशंसा न करना, क्योंकि समृद्धिवान लोग दूसरों की स्तुति नहीं सह सकते, इसलिए भरत के सामने तुम मेरे गुणों का वर्णन न करना। भरत के आने पर तुम मुझे श्रेष्ठ न बतलाना, ऐसा करना भरत के प्रतिकूल आचरण कहा जायेगा और अनुकूल रहकर ही भरत के पास रहना सम्भव हो सकता है। परम्परागत राज्य राजा ने भरत को ही दिया है: तुमको चाहिये कि तुम उसे प्रसन्न रखो, क्योंकि वह राजा है। अध्यात्म रामायण में इस प्रसंग में राम ने इतना ही कहा है, हे शुभे! मैं शीघ्र ही उसका प्रबंध करने के लिए वहां जाऊंगा। मैं आज ही वन को जा रहा हूं। तुम अपनी सासू के पास जाकर उनकी सेवा-शुश्रुषा में रहो। मैं झूठ नहीं बोलता।...हे अनघे! महाराज ने प्रसन्नतापूर्वक कैकयी को वर देकर भरत को राज्य और मुझे वनवास दिया है। देवी कैकेयी ने भरत को राज्य और मुझे वनवास दिया है। देवी कैकेयी ने मेरे लिए चौदह वर्ष तक वन में रहना मांगा था, सो सत्यवादी दयालु महाराज ने देना स्वीकार कर लिया है। अत: हे भामिनि! मैं वहां शीघ्र ही जाऊंगा, तुम इसमें किसी प्रकार का विघ्न न खड़ा करना। रामचरितमानस में इस प्रकार सीता से विदा लेने गये हुए राम नहीं दिखलाये जाते हैं, इसमें सीता स्वयं कौशल्या के पास उस समय वनवास का समाचार सुनकर आ जाती हैं, जब राम कौशल्या से वन गमन की आज्ञा लेने के लिए आते हैं और सीता की राम के साथ वन जाने की इच्छा समझकर कौशल्या ही राम से उनकी इच्छा का निवेदन करती हैं। अध्यात्म रामायण में ही भरत के प्रति किसी प्रकार की आशंका और सन्देह के भाव राम के मन में नहीं चित्रित किये गये, रामचरितमानस में भी राम के उसी उदार व्यक्तित्व को अंकित किया गया है। भरत प्रेम तुलसीदास राम के चरित्र में भरत प्रेम का एक अद्भुत विकास करते हैं, जो अन्य राम-कथा ग्रन्थों में नहीं मिलता। उदाहरणार्थ- चित्रकूट में राम के रहन-सहन का वर्णन करते हुए वे कहते है- जब-जब राम अवध सुधि करहीं। तब-तब बारि बिलोचन भरहीं। सुमिरि मातु पितु परिजन भाई। भरत सनेह सील सेवकाई। कृपासिन्धु प्रभु होहिं दुखारी। धीरज धरहिं कुसमय बिचारी॥  भरत के आगमन का समाचार सुनकर लक्ष्मण जब राम के अनिष्ट की आशंका से उनके विरुद्ध उत्तेजित हो उठते हैं, राम कहते हैं- कहीं तात तुम्ह नीति सुनाई। सबतें कठिन राजमद भाई॥ जो अँचवत मातहिं नृपतेई। नाहिंन साधु समाजिहिं सेई॥ सुनहु लषन भल भरत सरीखा। विधि प्रपंच महं सुना न दीषा॥ भरतहिं होई न राज मद, विधि हरिहर पद पाइ।  कबहुं कि कांजी सीकरनि छीर सिन्धु बिनसाइ॥ तिमिर तरून तरिनिहि मकु गिलई। गगन मगन मकु मेघहि मिलई॥ गोपद जल बूड़ति घट जोनी। सहज क्षमा बरू छाड़इ छोनी॥ मसक फूंक मकु मेरू उड़ाई। होइ न नृप पद भरतहि भाई॥ लषन तुम्हार सपथ पितु आना। सुचि सुबंधु नहिं भरत समाना॥ सगुन क्षीर अवगुन जल ताता। मिलइ रचइ परपंच विधाता॥ भरत हंस रवि बंस तड़ागा। जनमि लीन्ह गुन शेष विभागा॥ गहि गुन पय तजि अवगुन बारी। निज जस जगत कीन्ह उजियारी॥ कहत भरत सुन सील सुभाऊ। प्रेम पयोधि मगन रघुराऊ॥ चित्रकूट में भरत की विनय सुनने के लिए किये गये वशिष्ठ के कथन पर राम कह उठते हैं- गुरु अनुराग भरत पर देखी। राम हृदय आनन्द विसेषी॥ भरतहिं धरम धुरन्धर जानी।। निज सेवक तन मानस बानी॥ बोले गुरु आयसु अनुकूला। बचन मंजु मृदु मंगल मूला॥ नाथ सपथ पितु चरन दोहाई। भयउ न भुवन भरत सन भाई॥ जो गुरु पर अंबुज अनुरागी। ते लोक हूं वेदहुं बड़ भागी॥ लखि लघु बंधु बुद्धि सकुचाई। करत बदन पर भरत बड़ाई॥ भरत कहहिं सोइ किये भलाई। अस कहि राम रहे अरगाई॥ ये तीनों विस्तार मौलिक हैं और रामचरितमानस के पूर्व किसी राम-कथा ग्रंथ में नहीं मिलते। भरत के प्रति राम के प्रेम का यह विकास तुलसीदास की विशेषता है और पूरे रामचरितमानस में उन्होंने इसका निर्वाह भली भांति किया है। भरत ननिहाल से लौटते हैं तो कौशल्या से उनसे मिलने के लिए दौड़ पड़ती हैं और उनके स्तनों से दूध की धारा बहने लगती है। राम-माता का यह चित्र अध्यात्म रामायण में भी नहीं है, यद्यपि उसमें भरत के प्रति कौसल्या की वह संकीर्ण-हृदयता भी नहीं है, जो वाल्मीकि रामायण में पायी जाती है। वाल्मीकि-रामायण में तो कौशल्या भरत से कहती हैं, यह शत्रुहीन राज्य तुम को मिला, तुमने राज्य चाहा और वह तुम्हें मिला। कैकेयी ने बड़े ही निंदित कर्म के द्वारा इस राज्य को राजा से पाया है... धन-धान्य से युक्त हाथी, घोड़ों और रथों से पूर्ण यह विशाल राज्य कैकेयी ने राजा से लेकर तुमको दे दिया है। इस प्रकार अनेक कठोर वचनों से कौशल्या ने भरत का तिरस्कार किया, जिनसे वे घाव में सुई छेदने के समान पीड़ा से दुखी हुए। रामचरितमानस की लोकप्रियता इसी प्रकार भरत, सीता, कैकेयी और कथा के अन्य प्रमुख पात्रों में भी तुलसीदास ने ऐसे सुधार किये हैं कि वे सर्वथा तुलसीदास के हो गये हैं। इन चरित्रों में मानवता का जो निष्कलुष किन्तु व्यावहारिक रूप प्रस्तुत किया गया है, वह न केवल तत्कालीन साहित्य में नहीं आया, तुलसी के पूर्व राम-साहित्य में भी नहीं दिखाई पड़ा। कदाचित इसलिए तुलसीदास के रामचरितमानस ने वह लोकप्रियता प्राप्त की, जो तब से आज तक किसी अन्य कृति को नहीं प्राप्त हो सकी। भविष्य में भी इसकी लोकप्रियता में अधिक अंतर न आयेगा, दृढ़तापूर्वक यह कहना तो किसी के लिए भी असंभव होगा किन्तु जिस समय तक मानव जाति आदर्शों और जीवन-मूल्यों में विश्वास रखेगी, रामचरितमानस को सम्मानपूर्वक स्मरण किया जाता रहेगा, यह कहने के लिए कदाचित किसी भविष्यत-वक्ता की आवश्यकता नहीं है।

झारखंड : नवरात्र, छठ और रमजान को लेकर सज गये फलों के बाजार
Published / 2023-03-27 11:41:15
झारखंड : नवरात्र, छठ और रमजान को लेकर सज गये फलों के बाजार

टीम एबीएन, रांची। नवरात्र, रमजान और चैती छठ को लेकर फलों का बाजार गुलजार है। लोगों में उत्साह देखा जा रहा है। नवरात्र और चैती छठ की पूजा में भक्त लीन हैं। इसके साथ मुस्लिम समुदाय का रमजान भी चल रहा है। ऐसे में लोग बढ़ चढ़ कर खरीदारी कर रहे हैं। फल दुकान में भीड़ ज्यादा दिख रही है।रांची के डेली मार्केट सहित सेब, संतरा, अंगूर, अनार, नारियल, केला, तरबूज आदि फलों की सैकड़ों दुकानें और ठेले लगे हैं। सोमवार को चैती छठ का पहला अर्घ्य है और इसे लेकर फलों का बाजार पूरी तरह से सज कर तैयार है। इसके अलावा रमजान और नवरात्र को लेकर भी फलों की डिमांड बढ़ गयी है।बड़े पैमाने पर लोग फलों की खरीदारी करने बाजार पहुंच रहे हैं। थोक बाजार में फलों की कीमतों में मामूली बढ़त देखी जा रही है। इसके बावजूद खुदरा बाजार में फलों की कीमत सामान्य बनी हुई है, जिसके कारण यहां की खरीदारी पर कोई खास प्रभाव नहीं पड़ा है।

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