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एक सब्जी ऐसी, जिसकी कीमत बाइक जैसी...
Published / 2023-04-22 07:24:49
एक सब्जी ऐसी, जिसकी कीमत बाइक जैसी...

ये है दुनिया की सबसे महंगी सब्जी, इतनी कीमत में आप खरीद लेंगे अच्छी सी बाइकएबीएन सेंट्रल डेस्क। मार्केट में हर तरह की सब्जी मिलती है। सभी सब्जियों का स्वाद अलग-अलग होता। किसी सब्जी में विटामिन ए की मात्रा अधिक होती है, तो किसी में विटामिन बी और सी प्रचुर मात्रा में पाया जाता है। यही वजह है कि सभी सब्जियों की कीमत में भी अंतर होता है। किसी की कीमत कम होती है तो किसी की बहुत ज्यादा।लेकिन आज हम आपको एक ऐसी सब्जी के बारे में बतायेंगे, जिसकी कीमत सुनकर आपको विश्वास नहीं होगा। आपके पैरों तले जमीन खिसक जायेगी। इतनी कीमत में आप एक बाइक खरीद सकते हैं। दरअसल, हम बात कर रहे हैं हॉप शूट्स के बारे में। इस सब्जी की खेती ठंडे देशों में होती है। इसका उपयोग बीयर बनाने में जमकर किया जाता है। हॉप शूट्स हरे रंग का होता है। इसमें औषधीय गुण भी पाए जाते हैं।कहा जाता है इसकी फसल बहुत लंबे समय के बाद तैयार होती है। इसलिए, टाइम टेकिंग ज्यादा होने की वजह से बहुत से किसान इसकी खेती करने से परहेज करते हैं। साथ ही हॉप शूट्स की कटाई के दौरान किसानों को बहुत अधिक दिक्कत होती है मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक, इस फसल के तैयार होने में 3 साल का समय लगता है। साथ ही हॉप शूट्स की कटाई के दौरान भी बहुत ही सावधानी बरतनी पड़ती है। इस सब्जी के फूल को हॉप कॉन्स कहते हैं। इसका उपयोग कई रोगों के इलाज में भी किया जाता है। इसके फूल से जहां बीयर बनायी जाती है। वहीं टहनियों से लजीज सब्जी बनती है, जिसको खाने से शरीर को पर्याप्त मात्रा में विटामिन्स मिलते हैं। साथ ही शरीर चुस्त- दुरुस्त और मजबूत रहता है।हॉप शूट्स का सेवन करने से कई बीमारियों से निजात मिलती हैमार्केट में हॉप शूट्स की कीमत 90 हजार से 1 लाख रुपये के बीच हमेशा रहती है। कई बार तो उत्पादन प्रभावित होने के बाद यह इससे भी महंगा हो जाता है। ऐसे हॉप शूट्स का स्वाद तीखा होता है। इसका यूज अचार बनाने में किया जाता है। ब्रिटेन और जर्मनी में इसकी खेती बहुत अधिक होती है। हालांकि, पहले हिमाचल प्रदेश में किसान इसकी खेती करते थे। वहीं, मेडिकल रिपोर्ट में ये भी खुलासा हुआ है कि हॉप शूट्स का सेवन करने से शरीर में टीबी के खिलाफ एंटीबॉडी बनता है। इसके अलावा हॉप शूट्स की सब्जी खाने से अच्छी नींद आती है। साथ ही घबराहट, बेचैनी और चिड़चिड़ापन जैसी समस्याओं से भी निजात मिलती है।

ब्रह्मलीन बाबा ज्योति स्वरूप लोगों ने श्रद्धा के साथ दी श्रद्धांजलि
Published / 2023-04-21 18:41:22
ब्रह्मलीन बाबा ज्योति स्वरूप लोगों ने श्रद्धा के साथ दी श्रद्धांजलि

एबीएन सोशल डेस्क। ब्रह्मलीन बाबा ज्योति स्वरूप का आज अंतिम श्रद्धा कर्म आज आर्य समाज रीति से रांची अरगोड़ा स्थित उनके निवास हुआ। बाबा के इच्छा के मुताबिक श्रद्धा कर्म को काफी सादगी भरा एवं उच्च आध्यात्मिकता से भरपूर बनाया गया था जिससे मंत्र जाप हवन पूजन इत्यादि विधियों का प्रयोग किया गया था।  श्राद्ध कर्म में उपस्थित  प्रसिद्ध लोगों में से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के क्षेत्र संपर्क प्रमुख अनिल ठाकुर, प्रांत सह संघचालक अशोक श्रीवास्तव, विश्व हिंदू परिषद के अशोक अग्रवाल, ज्वाइंट सेक्रेट्री वंदना श्रीवास्तव, एंटी करप्शन ब्यूरो के पूर्व वरिष्ठ अधिकारी संजय सिंह , संत समाज के पूर्व संगठन मंत्री स्वामी दिव्य ज्ञान समेत अनेक अनेक श्रद्धालु एवं स्वजन उपस्थित थे। बाबा बाबा ज्योति स्वरूप का जन्म 4 जून 1955 को हुआ को पटना में हुआ था। वह बचपन से ही काफी मेधावी व्यक्तित्व थे। उन्होंने  रांची सेंट जेवियर्स कॉलेज से स्नातक की परीक्षा पास की तथा दिल्ली जाकर मैनेजमेंट की पढ़ाई पूरी की। 1980 के आसपास  उनके जीवन में वैराग्य की भावना आई आचार्य श्रीमाली जी के शिष्य हो गये। उनका विवाह श्रीमती बीना स्वरूप जी से हुआ तथा दोनों प्राणी गृहस्थ में रहते हुए संत का जीवन व्यतीत करते रहे। एक प्रकार से कहा जाये गृहस्थ में भी रहकर यह दोनों प्राणी ब्रह्मचारी रहे। इनके सान्निध्य का असर उनके दोनों अनुजों पर भी हुआ। इनके मंझले भाई शंकर दत इन्हीं की प्रेरणा लेकर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रचारक बने। उनके छोटे भाई राधा कृष्ण दत्त आज  बॉलीवुड के एक नामी अभिनेता हैं उन्हें भी बाबा ज्योति स्वरूप ने प्रेरणा दी एवं राधा कृष्ण दत्त आज फिल्म इंडस्ट्रीज में कभी भी भगवान शिव, कभी भगवान ब्रह्मा कभी भगवान विष्णु के रूप में देखे जाते हैं। रांची में बाबा ज्योति स्वरूप ने कई महत्वपूर्ण सामाजिक कार्य किए गौशाला से लेकर पिठौरिया में महर्षि निखिलेश विद्यालय की स्थापना की उनके भाई शंकर दत्त के मुताबिक पूरे पिठौरिया क्षेत्र में  इनके द्वारा निशुल्क शिक्षा दी जाती थी अर्थात फीस के लिए कभी किसी बच्चे पढ़ाई नहीं रुकी। बाबा ज्योति स्वरूप हमेशा प्रचार प्रसार से दूर रहे। झारखंड साधु संत समाज का इन्हें रामरेखा बाबा के साथ प्रदेश उपाध्यक्ष भी बनाया गया था।

देखें आरबीआई की लिस्ट : मई में 12 दिन बंद रहेंगे बैंक
Published / 2023-04-20 13:04:56
देखें आरबीआई की लिस्ट : मई में 12 दिन बंद रहेंगे बैंक

एबीएन सोशल डेस्क। बैंकों से हर व्यक्ति का कहीं न कहीं जुड़ाव होता है। इसलिए सभी को जानना जरूरी हो जाता है कि बैंक कब-कब बंद रहने वाले हैं। आपको बता दें कि रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया ने मई में छुट्टियों की लिस्ट जारी कर दी है। ताकि लोग समय रहते अपने काम छुट्टियों का कैलेंडर देखकर ही प्लान करें। आरबीआई के मुताबिक मई 2023 में कुल 12 दिन बैंक बंद रहेंगे। हालांकि इन 12 छुट्टियों में दूसरा और चौथा शनिवार व रविवार भी शामिल है। यदि आपका बैंक संबंधी कोई काम छुट्टियों के दिन फंस रहा है तो समय रहते निपटा लें, अन्य़था परेशानी आ सकती है।क्षेत्रीय आधार पर रहती हैं छुट्टिय़ां दरअसल, बैंकों की अधिकतर छुट्टियां क्षेत्र के आधार पर भी रहती है। जैसे 1 मई का महाराष्ट्र दिवस है। इसलिए 1 मई की छुट्टी केवल महाराष्ट्र राज्य में ही रहेगी। अन्य पूरे देश में बैंक यथावत खुलेंगे। ऐसे ही कई अवकाश होते हैं, जिन्हें क्षेत्रीय आधार पर ही समेटा गया है। बता दें कि मई 2023 में केवल 12 दिन ऐसे हैं जब सप्ताहांत सहित बैंक अवकाश के कारण कई निजी और सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक बंद रहेंगे। भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) के दिशानिर्देशों के अनुसार मई 2023 में कुल छुट्टियां भी 12 ही निर्धारित की गयी हैं।छुट्टियों की लिस्ट 1 मई दिन सोमवार को महाराष्ट्र दिवस मनाया जाता है। इसलिए केवल महाराष्ट्र में ही बैंक छुट्टी रहने वाली है। 5 मई को बुद्ध पुर्णिमा के चलते अरुणाचल प्रदेश, असम, बिहार, छत्तीसगढ़, दिल्ली, गुजरात, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, जम्मू और कश्मीर, झारखंड, लद्दाख, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, मुंबई, मिजोरम, पंजाब, त्रिपुरा, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, पश्चिम बंगाल सभी राज्यों में बैंकों की छुट्टी रहने वाली है। 9 मई को गुरू रविन्द्र नाथ टैगोर जयंती है। जिसके चलते पश्चिम बंगाल में बैंक बंद रहेंगे। 16 मई को सिक्किम का राज्य दिवस है। इसलिए सिर्फ सिक्किम में ही बैंक बंद रहेंगे। 22 मई 2023 को सोमवार है। लेकिन महाराणा प्रताप गुजरात, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, पंजाब, राजस्थान में बैंक बंद रहेंगे। 24 मई को काजी नजरूल इस्लाम जयंती के चलते त्रिपुरा में  बैंक बंद रहेंगे।

गाय के घी में छुपा है तमाम बीमारियों से मुक्ति का रहस्य : राधेश्याम सोनी
Published / 2023-04-20 12:59:57
गाय के घी में छुपा है तमाम बीमारियों से मुक्ति का रहस्य : राधेश्याम सोनी

देशी गाय के घी में कैंसर से लड़ने की अचूक क्षमताएबीएन सोशल डेस्क। गौ आधारित कृषि व पंचगव्य उत्पाद के प्रशिक्षक राधेश्याम सोनी ने बताया कि देशी गाय का घी से मानसिक तनाव सहित तमाम बीमारियों से छुटकारा मिल जाता है। जो लोग सोते समय नाक में घी का उपयोग करते हैं, उन्हें माइग्रेन होने का खतरा कम हो जाता है।उत्तर प्रदेश के उरई, झांसी जैसे जनपदों में अपने गौ सेवा व पंचगव्य उत्पाद के लिए पहचाने जाने वाले राधेश्याम सोनी ने बताया कि देशी गाय के घी को नाक में डालना चाहिए। इससे एलर्जी कम होती है, लकवा का उपचार हो जाता है, कान का पर्दा बिना आपरेशन ठीक हो जाता है, दिमाग तरोताजा रहता है, चेतना वापस आ जाती है, बालों का झड़ना कम हो जाता है और कोमा में गया मरीज भी राहत महसूस करता हैं।राधेश्याम सोनी ने बताया कि नशा के शिकार हुए व्यक्ति को देशी घी और मिश्री को मिलाकर खिलाइये, शराब भांग या गांजे का नशा बहुत हद तक कम हो जायेगा। जो लोग देशी गाय के घी का प्रतिदिन सेवन करते हैं, उन्हें गैस या कब्ज जैसी समस्या नहीं होती है। गाय का घी बल व वीर्य बढ़ाता है। हथेली या पांव के तलवे पर जलन होने पर घी से मालिश करें, तुरंत आराम मिल जायेगा। गाय के घी से माइग्रेन नामक बीमारी समाप्त होती है। नाक के रास्ते उपयोग करने से माइग्रेन न के बराबर रह जायेगा।उन्होंने हार्ट अटैक व कैंसर के उपाय को लेकर बताया कि हार्ट अटैक की समस्या आजकल आम बात हो गयी है, ऐसे में गाय के घी का सेवन करने वालों का हार्ट बेहद मजबूत रहता हैं। गाय का घी कैंसर जैसी बीमारी को पैदा होने और फैलने से रोकता है। देशी गाय के घी में कैंसर से लड़ने की अचूक क्षमता है। घी के लगातार सेवन से स्तन व आंत के खतरनाक कैंसर से भी बचा जा सकता है।उन्होंने बताया कि वजन बढ़ने की समस्या में भी गाय का घी बेहद कारगर उपाय है। गाय के घी से केस्ट्राल नहीं बढ़ता है तो इससे मोटापा स्थिर हो जाता है। और धीरे धीरे घी के सेवन से मोटापा कम होता चला जाता है। इसके साथ ही घी के सेवन से वजन पर कोई खासा असर नहीं होता।

सांस की बीमारियों से जूझ रहे हैं कोयला ढुलाई में झारखंड के मजदूर
Published / 2023-04-20 12:34:17
सांस की बीमारियों से जूझ रहे हैं कोयला ढुलाई में झारखंड के मजदूर

कोयला ढुलाई में लगे झारखंड के मजदूरों की बीमारी का कारण प्रदूषण, 25 फीसदी को सांस संबंधी रोगटीम एबीएन, रांची। झारखंड की कोयला खदानों से उत्पादन कम होने या बंद करने के मुद्दे पर अर्नेस्ट एंड यंग और क्लाइमेट ट्रेंड ने रिपोर्ट जारी की है। दोनों संस्थाओं ने मिलकर झारखंड के छह हजार मजदूरों को सर्वे में शामिल किया। इसमें पाया कि कोयला खनन से जुड़े एक तिहाई मजदूरों की बीमारी का कारण प्रदूषण है। इन बीमारियों में से 28 फीसदी मजदूर सिलिकॉसिस से पीड़ित हैं, जबकि 25 फीसदी को सांस संबंधी रोग हैं। कोलकाता में आयोजित एक कार्यक्रम में रिपोर्ट जारी की गयी। इसमें बताया गया कि झारखंड में अगर कोयले का उत्पादन कम या खत्म किया गया तो ज्यादातर मजदूर खेती को दूसरे विकल्प के रूप में अपनाना चाहेंगे। पर्यावरण प्रदूषण संबंधी समस्या को लेकर भारत ने ऊर्जा के वैसे स्त्रोतों को कम करने का निर्णय लिया है, जिससे वातावरण को नुकसान हो रहा है। इस कारण 2030 के बाद कोयले का उत्पादन कम करना है। कोयला का उत्पादन कम या खत्म होगा तो इस पेशे से जुड़े लोग क्या करेंगे, इसको रिपोर्ट में शामिल किया गया। सर्वे में पाया गया कि कोयला क्षेत्र में काम करनेवाले 50 फीसदी मजदूर मानते हैं कि वह दूसरे काम के लायक नहीं हैं। एक तिहाई कोयला मजदूरों का मानना है कि उनके पास रोजगार करने के लिए पैसा भी नहीं है। 94 फीसदी मजदूरों का मानना है कि उनको तकनीकी प्रशिक्षण नहीं मिला है। 86 फीसदी मजदूर चाहते हैं कि उनकी क्षमता का विकास हो। अर्नेस्ट एंड यंग के एसोसिएट पार्टनर अमित कुमार ने कहा कि कोयला उत्पादन कम होने के बाद कर्मियों पर क्या असर होगा, इस पर अब तक गंभीरता से चर्चा नहीं हो रही है।झारखंड जैसे राज्य में कई जिले ऐसे हैं, जहां कोयला पर निर्भरता बहुत अधिक है। बिना प्लान के खदानों के बंद होने का असर कई जिलों में दिखता है। इस पर गंभीरता से विचार करने की जरूर है। क्लाइमेट ट्रेंड की आरती खोसला ने कहा कि फॉसिल फ्यूल (जीवाश्म इंधन) से ऊर्जा की जरूरत पूरी करने को लेकर राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अभी एकमत नहीं बन पाया है।आइआइटी कानपुर के प्रदीप स्वर्णकार ने कहा कि जस्ट ट्रांजिशन विषय के कई पहलू हैं। इसमें एक मामला मजदूरों का है। इससे बड़ी संख्या में मजदूर प्रभावित होंगे। कार्यक्रम में एटक की महासचिव अमरजीत कौर, प्रो रुना सरकार, इसीएल की निदेशक आरती स्वाइन, स्वाति डिसूजा, मयंक अग्रवाल ने भी विचार रखा।

केदारनाथ धाम के सेवादार दल के वाहनों को सीएम ने किया रवाना
Published / 2023-04-20 12:26:40
केदारनाथ धाम के सेवादार दल के वाहनों को सीएम ने किया रवाना

एबीएन सेंट्रल डेस्क। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने गुरुवार को केदारनाथ धाम के सेवादार सदस्यों के दल के वाहनों को हरी झंडी दिखाकर रवाना किया। इस मौके पर मुख्यमंत्री ने कहा कि चारधाम यात्रा इस बार ऐतिहासिक होगी। चारधाम यात्रा के लिए सभी तैयारियां पूरी की गयी हैं।मुख्यमंत्री धामी ने कहा कि चारधाम यात्रा में यात्रियों को सुखद यात्रा के लिए सरकार संकल्पित होकर कार्य कर रही है। यात्रा को सभी के सहयोग से सुरक्षित और सुविधायुक्त व्यवस्था उपलब्ध करायी जायेगी। इसी के तहत सरकार चारधाम यात्रा की नियमित समीक्षा कर रही है।मुख्यमंत्री ने कहा कि चारधाम यात्रा के प्रति लोगों में काफी उत्साह है। अभी तक 16 लाख से अधिक पंजीकरण हो चुके हैं। स्वयंसेवी एवं सामाजिक संगठनों का पूरा सहयोग मिल रहा है। उन्होंने कहा कि देवभूमि उत्तराखण्ड आने वाले सभी श्रद्धालुओं को हरसंभव सुविधा दी जायेगी।21 से 25 अप्रैल तक भंडाराइन सेवादारों की ओर से केदारनाथ यात्रा मार्ग पर 21 से 25 अप्रैल तक श्रद्धालुओं के लिए उत्तराखण्ड के मुख्य सेवक के नाम पर भंडारे का आयोजन किया जायेगा। बाबा केदार की डोली के गुप्तकाशी से केदारनाथ पहुंचने तक यात्रा पड़ावों पर श्रद्धालुओं के लिए भंडारे का आयोजन किया जायेगा। 24 और 25 अप्रैल को हेलीकॉप्टर से पुष्प वर्षा भी की जायेगी।

बेहद सरल है स्वामी सत्यानंद के योग दर्शन
Published / 2023-04-19 23:39:20
बेहद सरल है स्वामी सत्यानंद के योग दर्शन

एबीएन सोशल डेस्क। स्वामी सत्यानंद के योग दर्शन या दर्शन बहुत सरल है। 1963 में शिवानंद आश्रम, लाल दरवाजा में बिहार स्कूल ऑफ योग की शुरुआत के बाद से, श्री स्वामीजी, एक योग शिक्षक के रूप में, पाठ्यक्रम और कक्षाएं सिखाएं, चिकित्सा पाठ्यक्रम, योग साधना कार्यक्रम और शिक्षक प्रशिक्षण पाठ्यक्रम चलाए। योग के अनुक्रम और घटकों को विकसित करने का उद्देश्य क्या था जो उसने किया था? उन्होंने ज्ञान मार्ग, ज्ञान मार्ग, सन्न्यासीनों की परंपरा क्यों नहीं मानी?योग के विकास की प्रक्रिया में, श्री स्वामीजी का दृष्टिकोण कुल मानव, समसामयिक मानव व्यक्तित्व का विकास था। सिर, दिल और हाथों के गुणों के उचित समन्वय, सहयोग, संघ और अभिव्यक्ति में मानव व्यक्तित्व की समानता निहित है। यह उतना ही सरल है। यह योग दर्शन का योग है जैसा स्वामी सत्यानंद द्वारा विकसित किया गया है।समय से अमर, लोगों को एक शाश्वत प्रश्न से ग्रस्त किया जाता है: मन से कैसे निपटें? भगवान गीता में अर्जुन ने कृष्ण से यही प्रश्न पूछा था। हवा से भी अधिक सूक्ष्म, और कभी पकड़ या पकड़ नहीं सकता इस मन से कोई कैसे निपट सकता है? आज हम यही सवाल पूछते हैं। हम अपने मन को कैसे प्रबंधित कर सकते हैं? हम अपनी इच्छाओं, आकांक्षाओं, विचारों और विचारों को कैसे प्रबंधित कर सकते हैं? हम उन्हें एक व्यावहारिक दृष्टिकोण कैसे दे सकते हैं? क्या प्रासंगिक और अप्रासंगिक है यह समझने के लिए हम मन की स्पष्टता और धारणा कैसे रख सकते हैं?मनुष्य को परेशान करने वाले इन विभिन्न पहलुओं को देखते हुए श्री स्वामीजी ने प्रत्यहारा की सम्पूर्ण प्रणाली विकसित की। समाज में आज भी लोगों को प्रतिशत, धराना और ध्यान में अंतर नहीं पता है। कई शिक्षक कहते हैं कि वे प्रत्यहरा और धरणा की अवधारणाओं को समझे बिना साधना सिखाते हैं। श्री स्वामीजी ने अवधारणा, लागूता और प्रधानता की तकनीकों को परिभाषित किया। उन्होंने योग निद्रा को प्रत्यहरा की पहली तकनीक के रूप में स्थापित किया। उन्होंने एकाग्रता और ध्यान की अन्य प्रणाली विकसित की जो उन्हें तन्त्रों में मिली। फलस्वरूप अंतार मौना और अजपा जप की तकनीक विकसित हुई। अजापा जप की चर्चा हजारों वर्षों से होती रही थी; हालांकि, वास्तव में किसी ने भी अभ्यास को परिभाषित नहीं किया था। श्री स्वामीजी ने मनोवैज्ञानिक मार्गों में साधना और श्वास और मंत्र की गति को स्पष्ट किया। उन्होंने प्रत्येक अभ्यास को एक व्यावहारिक, समझने योग्य और प्राप्त करने योग्य अवधारणा और संरचना दी। उन्होंने अंतार मौना, चिडकशा धरना और योग निद्रा के चरणों को परिभाषित किया।श्री स्वामीजी प्राण विद्या की प्रक्रिया, प्रमुख बिन्दुओं और तकनीकों का वर्णन करने वाले पहले थे, जिसे अपने प्राथमिक रूप में, आज रेकी के नाम से जाना जाता है। उन्होंने दैनिक योग साधना के एक भाग के रूप में प्राणायाम का परिचय दिया। बीस साल पहले लोग कहा करते थे कि प्राणायाम खतरनाक है। अन्य संस्थानों ने योग कक्षा का अभिन्न अंग नहीं सिखाया प्राणायाम, केवल सत्यानंद योग-बिहार योग परंपरा के शिक्षकों ने किया। आज आप जो प्राणायाम तकनीक सीख रहे हैं वह श्री स्वामीजी की शिक्षाएं हैं। कौन से प्राणायाम गर्म कर रहे हैं, या ठंडा कर रहे हैं, या संतुलित कर रहे हैं; उनके प्रभाव शरीर की विभिन्न राज्यों पर, दिन के विभिन्न समयों में, विभिन्न मौसमों में, विभिन्न मूड में; फेफड़ों की सांस लेने, सांस लेने की क्षमता कैसे विकसित करें: इन सब को संबोधित किया गया था अनुक्रम जैसा कि श्री स्वामीजी ने यह सिखाया।श्री स्वामीजी ने बंधों और मुद्राओं की अवधारणा को समझाया और व्यवस्थित किया। उन्होंने एक सरल संस्करण में तकनीकों को मिलाकर हथ योग षट्कर्मों की पूरी प्रणाली को सरल कर दिया: पूरन शंखप्रक्षालन। अन्य योगिक साहित्य में शंखप्रक्षालन नहीं पाया जाता, और बस्ती, धौती, नौली और नेती की अलग अलग विधि की चर्चा की जाती है।संसार में क्रिया योग की दो ही प्रणाली मौजूद हैं। एक तो बाबाजी से उतरा है, जो कहा जाता है, वह निर्माता और संस्थापक था। उस पंक्ति में कई शिक्षक हुए हैं, परमहमस योगानंद, श्री युक्तेश्वर और लहरी महाशय। क्रिया योग की अन्य प्रणाली की खोज श्री स्वामीजी ने तन्त्रों से की थी। जब क्रिया योग एक रहस्य था, इस विश्वास के साथ कि यह केवल गुरु से अंतरंग शिष्य तक पहुंच सकता है, तो श्री स्वामीजी ने तीन साल का डाक पत्रपत्र पाठ्यक्रम शुरू किया, और उस पुस्तक से जो उभरा वह योग का एकमात्र प्रामाणिक विश्वकोपीडिया है जो आज अस्तित्व में है।स्वामी विवेकानंद ने योग पर बात की, फिर भी उन्होंने कभी योग नहीं सिखाया। उन्होंने कभी आसन या प्राणायाम नहीं सिखाया, उन्होंने केवल सिद्धांत में बात की। उन्होंने योग का विकास नहीं किया; उन्होंने केवल रोजमर्रा की भाषा में योग के शास्त्रोक्त, दार्शनिक पहलू को प्रस्तुत किया। स्वामी सत्यानंद ही थे जिन्होंने योगिक अवधारणाओं को शरीर से जोड़ दिया, जैसे कि कौन चक्र किस नादी, कौन सी ग्रंथि, किस मन की स्थिति के अनुसार है। कई लोगों ने उस विषय पर शोध किया है। डॉ हीरोशी मोतोयामा, उनकी किताब सिद्धांतों के चक्र में, स्वामी सत्यानंद के दर्शन और व्यवहारों को संदर्भित करते हैं। डॉ सेरेना रोनी-डोगल, जहां विज्ञान और जादू मीट की लेखिका ने चक्रों की भूमिका, कार्यों और लाभ और मनोवैज्ञानिक प्रणाली के साथ उनके पत्राचार की खोज की। दुनिया भर के बुद्धिजीवियों और विचारकों ने इन विचारों को स्वीकार किया है और उन पर काम किया है।1968 में प्रकाशित मूल एपीएमबी के सत्तर पृष्ठ थे। आज एपीएमबी में पांच सौ से अधिक पृष्ठ हैं; फिर भी, मूल सामग्री में स्वामी सत्यानंद ने शारीरिक, मनोवैज्ञानिक और आध्यात्मिक लाभों का वर्णन किया था, जिन अनुक्रमों का हम आज अनुसरण कर रहे हैं और चिकित्सा, वैज्ञानिक और चिकित्सीय अनुसंधान ने खोज की है।

झारखंड में 15 अगस्त तक बनायी जायेंगी 5000 समितियां : विहिप
Published / 2023-04-18 20:41:07
झारखंड में 15 अगस्त तक बनायी जायेंगी 5000 समितियां : विहिप

एबीएन सोशल डेस्क। विश्व हिंदू परिषद प्रांत कार्यकारिणी की बैठक 18 अप्रैल, 2023 को पूर्वाह्न 10 बजे हरमू रोड, किशोरगंज चौक स्थित विश्व हिंदू परिषद प्रांत कार्यालय में कार्याध्यक्ष तिलक राज मंगलम की अध्यक्षता में हुई। बैठक में विश्व हिंदू परिषद के केंद्रीय संगठन महामंत्री विनायकराव देशपांडे विशेष रूप से उपस्थित थे। बैठक को संबोधित करते हुए विनायकराव देशपांडे जी ने कहा विश्व हिंदू परिषद की समिति का मापदंड सर्वव्यापी एवं सर्वस्पर्शी होनी चाहिए। उन्होंने कहा 2024 में विश्व हिंदू परिषद का षष्टिपूर्ति  (हीरक जयंती) वर्ष होगा। आज देश में 69,000 समितियां हैं, आगामी 1 वर्ष में 1,00,000 समिति गठन करने का लक्ष्य है। देश के सभी 9725 प्रखंड की समिति पूर्ण करने की योजना बनाई जा रही है। उन्होंने कहा ईसाइयों का षड्यंत्र है जिससे हिंदू समुदाय के कुछ घटक को हम हिंदू नहीं है ऐसा कहने के लिए दुष्प्रचार कराया जा रहा है। इस दुष्प्रचार के बाद ही ऐसे समुदायों का मतानतरण हो, ऐसा प्रयास हो रहा है। ऐसे विषयों पर हिंदू समाज को सचेत होने की आवश्यकता है। उन्होंने कहा विपरीत परिस्थिति में भी सकारात्मक सोच रखकर कार्य करने वाला कार्यकर्ता के निर्माण से ही हम देश को सफल बना सकते हैं तथा भारतीय पुरातन सांस्कृतिक  अवधारणाओं को अजेय बना कर रख सकते हैं। अयोध्या के भगवान श्री रामजन्मभूमि में बन रहे श्री रामलला मंदिर के संदर्भ में बताते हुए कहा श्री राम मंदिर देश का ही नहीं संपूर्ण विश्व के हिंदुओं का सांस्कृतिक, धार्मिक एवं अध्यात्मिक केंद्र होगा। यह मात्र मंदिर ही नहीं बल्कि यह राष्ट्र मंदिर के रूप में विकसित होगा। उन्होंने कहा प्रत्येक प्रखंड में एक मंदिर को चयन कर हम आदर्श मंदिर बनाने का सार्थक प्रयास सभी कार्यकर्ताओं को करना चाहिए। प्रांत मंत्री डॉ वीरेंद्र साहू ने बताया आगामी 1 वर्ष में झारखंड के सभी पंचायतों की समिति (खंड समिति) पूर्ण कर ली जायेगी, इसके लिए आगामी 15 जुलाई से 15 अगस्त तक संगठन विस्तार अभियान चलाया जाएगा। इसके तहत प्रांत के सभी प्रखंड से प्रांत तक के पदाधिकारी अपने निवास क्षेत्र में कम से कम 2 समिति का गठन करने का लक्ष्य दिया गया। कार्यकर्ताओं की दक्षता बढ़ाने की दृष्टिकोण से प्रतिवर्ष प्रशिक्षण वर्ग का आयोजन होता है। इस वर्ष विश्व हिंदू परिषद प्रशिक्षण वर्ग चक्रधरपुर के करंजो स्थित विद्यालय में आगामी 21 मई से 31 मई तक होगा। इसी स्थान पर 24 मई से 31 मई तक बजरंग दल प्रशिक्षण वर्ग भी लगेगा। डॉ साहू ने बताया दुर्गा वाहिनी-मातृशक्ति का प्रशिक्षण वर्ग 4 जून से 10 जून तक रांची के धुर्वा स्थित सरस्वती शिशु मंदिर में होगा, जिसकी तैयारियां चल रही है। डॉ साहू ने बताया 22 एवं 23  अप्रैल को झारखंड प्रांत के सभी जिलों की बैठक होगी तथा 25 से 28 अप्रैल तक प्रांत की सभी प्रखंड की बैठक होगी। आगामी 29 मई को सीता नवमी के पावन अवसर पर प्रखंड स्तर में कार्यक्रम आयोजित की जायेगी। बैठक में क्षेत्र संगठन मंत्री आनंद कुमार, क्षेत्र मंत्री वीरेंद्र विमल, प्रांत संगठन मंत्री देवी सिंह, प्रांत उपाध्यक्ष गंगा प्रसाद यादव, प्रांत उपाध्यक्ष सुभाष नेत्रगावँकर, सहमंत्री रामनरेश सिंह, सहमंत्री रंगनाथ महतो, प्रांत कोषाध्यक्ष मदन बागड़िया, मातृशक्ति प्रांत प्रमुख दीपारानी कुंज, सामाजिक समरसता प्रांत प्रमुख मिथिलेश्वर मिश्र, धर्मप्रसार के प्रावर्तन प्रमुख अनूप यादव, सत्संग प्रांत प्रमुख गणेश शंकर विद्यार्थी, धर्म प्रसार प्रांत सहप्रमुख सच्चिदानंद देव, बजरंग दल प्रांत संयोजक दीपक ठाकुर, धर्म यात्रा महासंघ प्रांत प्रमुख डॉ कश्यप बालगोविंद, मार्गदर्शक मंडल के प्रांत संयोजक कृष्ण चैतन्य ब्रह्मचारी, विशेष संपर्क प्रांत प्रमुख अरविंद सिंह, मनोज चंद्रवंशी, संजय चालक, मिथिलेश महतो, राजेश दुबे, विनय कुमार, कोलेश्वर टूडू, कुलदीप सिंह, जगदीश मंडल, विजय यादव सहित कई कार्यकर्ता उपस्थित थे। उक्त जानकारी विश्व हिंदू परिषद, झारखंड के प्रांत मंत्री डॉ वीरेंद्र साहू ने एक प्रेस विज्ञप्ति जारी कर दी।

फसलों के सम्मान का पर्व है सतुआनी
Published / 2023-04-15 14:26:52
फसलों के सम्मान का पर्व है सतुआनी

जानें इस त्योहार के बारे में खासएबीएन सोशल डेस्क। हिंदी महीने के कैलेंडर में वैशाख का महीना जब सूरज अपने उच्च ताप पर होता है। ऐसे में प्रकृति के अपने चरम उष्मा को सहने की क्षमता लोगों में हो इसके लिए लोग प्रकृति के द्वारा वरदान नयी फसल को सम्मान देने की कोशिश करते हैं। इस समय जो भी फसल तैयार होकर आती है उसमें प्रकृति के नियम के विरुद्ध उष्मा की जगह शीतलता का प्रवाह होता है। ऐसे में जहां पंजाब और हरियाणा के लोग वैशाखी के रूप में इसे मनाते हैं। वहीं इसे बिहार, झारखंड और पूर्वांचल के लोग सतुआनी त्योहार के रूप में मनाते हैं।इस त्योहार में लोग जौ, चना, मकई, मडुआ के सत्तु के साथ ताप से बचने के लिए कच्चे आम की कैरी की चटनी, प्याज और नमक के साथ मिर्च और अचार खाते हैं। बता दें कि वैशाख के शुरुआत के साथ वैशाखी फलों जैसे तरबूज, खरबूज, बेल, ककड़ी, खीरा भी सुहागन महिलाएं इस दिन बांटती हैं और फिर इसे आज से ही खाना शुरू करती हैं।कितना वैज्ञानिक है न इस त्योहार का महत्व... आपको बता दें कि इसी दिन से मिथिला के लोग जुड़शीतल का त्योहार मनाते हैं तो वहीं बंगाल में लोग इस पोहेला या पोएला वैशाख के तौर पर सेलिब्रेट करते हैं। वहीं असम में बोहाग बिहू, केरल में विशु, ओडिशा में महाविषुव संक्रांति और उत्तराखंड में विखोरी महोत्सव के रूप में पूरा देश इस दिन त्योहारों के इस आनंद में डूब जाता है।आज ही के दिन सूर्य अपना राशि परिवर्तन कर मेष राशि में प्रवेश कर जाते हैं तो और इसे मेष संक्रांति भी कहा जाता है। संक्रांति का सीधा सा मतलब है अपने अंदर की क्रांति जो आपके मन विचार और आचरण को शुद्ध करता है। ये सभी त्योहार हमारे खेती-किसानी के सेलिब्रेशन के तौर पर मनाते हैं। हिंदू मान्यता है कि इसी महीने में गंगा का अवतरण पृथ्वी पर हुआ ऐसे में इस दिन गंगा स्नान का भी खास महत्व है। इस समय रबी फसल की कटाई चरम पर होती है। इसका सेलिब्रेशन इसके तौर पर भी होता है। मिथिला में तो यह मैथिलि कैलेंडर का पहला दिन है ऐसे में जुड़शीतल पर्व के तौर पर इसे मनाया जाता है।बताते चलें कि इस सत्तू की कहानी आज की नहीं है भगवान बुद्ध के समय में भी इसके सेवन की बात सामने आयी है तो वहीं पाणिनी ने भी अपने अष्टाध्यायी में सत्तू के बारे में जिक्र किया है, जिसमें चावल को भुनकर सत्तू के रूप में प्योग किया जाता था। सत्तू को संपूर्ण आहार के तौर पर माना गया है। ऐसे में शरीर के तापमान को नियंत्रित रखने में इस सत्तू का इस्तेमाल लाभकारी है।ऐसे में सत्तू को पहले इष्ट देव को अर्पित कर फिर इसे प्रसाद के रूप में ग्रहण करने की परंपरा है। यह पर्व वैशाख माह के कृष्ण पक्ष की नवमी को मनाया जाता है। ऐसे में भगवान को अर्पण कर इसके सेवन से लू के प्रभाव से बचा जाता है। इस पर्व के एक दिन पहले मिट्टी के घड़े में जल को ढंककर रखा जाता है और अगल दिन इसे पूरे घर में छिड़का जाता है। इस दिन ही बासी खाना खाने की भी परंपरा है।

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