Breaking
ताज़ा समाचार लोड हो रहा है...
होम देश झारखंड खेल समाचार राज काज कानून व्यवस्था करियर बिजनेस वर्ल्ड हेल्थ विचार ज्ञान विज्ञान समाज वन और पर्यावरण मनोरंजन बिहार विज्ञापन

समाज

View All
सौरव दुबे ने शास्त्रीय संगीत को दी खास पहचान
Published / 2023-06-20 20:33:24
सौरव दुबे ने शास्त्रीय संगीत को दी खास पहचान

विश्व संगीत दिवस पर विशेष टीम एबीएन, पलामू/ रांची। पलामू के जाने-माने शास्त्रीय संगीतज्ञ सौरव दुबे ने संगीत को खास पहचान दी है। आज विश्व संगीत दिवस के समय हम चर्चा सौरव दुबे जी की करेंगे, जो खुद भी संगीत को साध रहे हैं और पलामू व झारखंड के कई जिलों के बच्चों तक संगीत सिखा रहे हैं व पहुंचा रहे हैं।पलामू में संगीत का रिश्ता काफी पुराना रहा है। कई कलाकार संगीत की शिक्षा अपने स्तर से दे रहे हैं। इन सब में सौरव दुबे एकमात्र ऐसे शास्त्रीय गायक व शिक्षक हैं, जिनकी शिक्षा लोकप्रिय एवं सराहनीय है। सौरव पलामू व झारखंड के अन्य जिलों में शास्त्रीय व सुगम संगीत को सिखा रहे हैं। वह उनको बढ़ा रहे हैं। रागों व तलों का व्याकरण, सूर का लगाव, तानपुरे के साथ गायकी व लय का समझ पर विशेष जानकारी देना एक उत्कृष्ट शिक्षक की पहचान है। नाद ब्रह्म संगीत कला केंद्र के अंतर्गत कई विद्यार्थी आज संगीत की शिक्षा पलामू में व अन्य राज्यों में भी ले रहे हैं। सौरव का कहना है कि शुद्ध शास्त्रीय संगीत का प्रचार व प्रसार होना बड़ा आवश्यक है।

किसानों को आत्मनिर्भर बना रही लाह की खेती
Published / 2023-06-19 21:13:32
किसानों को आत्मनिर्भर बना रही लाह की खेती

झारखंड में लाह की खेती से चमक रही किसानों की जिंदगीटीम एबीएन, रांची। लाह की खेती ने झारखंड के बारह जिलों में किसानों को आत्मनिर्भरता की राह दिखायी है। कुछ इलाकों में लाह की सामुदायिक खेती से किसान सालाना लाखों में कमाई कर रहे हैं। रांची जिले के ओरमांझी प्रखंड के एक नवोन्मेषी किसान देवेंद्र नाथ ने तो अपने गांव के डेढ़ सौ किसानों को लाह की सामूहिक खेती से जोड़ लिया है। वे राज्य के दूसरे जिलों के किसानों को भी लाह की खेती से जोड़ने में अहम भूमिका निभा रहे हैं। झारखंड सरकार के ग्रामीण विकास विभाग के अंतर्गत कार्यरत झारखंड स्टेट लाइवलीहुड प्रमोशन सोसाइटी का दावा है कि महिला किसान सशक्तिकरण योजना के तहत प्रदेश के 73000 से अधिक ग्रामीण परिवारों को लाह की वैज्ञानिक खेती से जोड़ा गया है। लाह का उपयोग मुख्य रूप से चूड़ी, गोंद, लहठी, क्रीम, विद्युत यंत्र बनाने, पॉलिश बनाने में, विशेष प्रकार की सीमेंट और स्याही बनाने, ठप्पा देने की स्टिक बनाने और पॉलिशों के निर्माण आदी में होता है। इसके अलावा काठ के खिलौनों को रंगने और सोने, चांदी के आभूषण बनाने में भी इसका उपयोग किया जाता है। ओरमांझी के नवोन्मेषी किसान देवेंद्र नाथ बताते हैं कि उन्हें इतना तो पता था कि लाह की खेती झारखंड में अच्छी हो सकती है, लेकिन इसके तौर-तरीके का आइडिया उन्हें नहीं था। ऐसे में उन्होंने लाह की खेती का प्रशिक्षण हासिल करने की बात सोची और इसी कोशिश में पहुंच गये रांची के नामकुम स्थित भारतीय लाह अनुसंधान केंद्र, जिसे अब राष्ट्रीय द्वितीयक कृषि संस्थान के रूप में जाना जाता है। यहां उन्होंने वैज्ञानिकों और जानकारों के साथ छह दिनों तक लाह की खेती का प्रशिक्षण हासिल किया और प्रशिक्षण पूरा करने के बाद गांव लौट गये। रवींद्रनाथ ने ओरमांझी ब्लाक के हसातु गांव स्थित अपनी दस एकड़ जमीन में से शुरूआत में उन्होंने केवल दस डिसमिल जमीन में लाह की खेती की। शुरुआत में तो उन्हें अच्छा फायदा नहीं हुआ लेकिन उन्हें यह अंदाजा तो हो ही गया कि लोगों को जोड़कर और बड़े पैमाने पर लाह की खेती की जाये तो मुनाफा भी अच्छा होगा और गांव के लोगों की जिंदगी भी बदल जायेगी। इसके बाद आमदनी बढ़ाने की मंशा पर काम करते हुए उन्होंने धीरे धीरे ग्रामीणों को इससे जोड़ना शुरू कर दिया। फिर क्या था, धीरे-धीरे लाह की खेती से बड़ी संख्या में युवा और ग्रामीण इससे जुड़ने लगे और आज युवा संघ और वन सुरक्षा समिति के 150 सदस्य पूरे राज्य में काम कर रहे हैं। उन्होंने बताया कि हसातु गांव के सिर्फ एक हिस्से में 2329 पलाश के पेड़ों को न सिर्फ संरक्षित किया गया है। बल्कि इसमें रंगीनी और सेमियालता के पौधे पर कुसुमी लाह की खेती कर ग्रामीण अच्छा मुनाफा भी कमा रहे हैं। लाह की खेती से आमदनी तो बढ़ ही रही है साथ ही क्षेत्र के पेड़-पौधों की रक्षा भी की जा रही है। हसातु निवासी जुगनू उरांव कहते हैं कि देवेंद्रनाथ के सहयोग से हमलोग गांव में ही 7 एकड़ जमीन में लाह खेती कर रहे हैं और सालाना 3-4 लाख रुपये कमा रहे हैं। इसके साथ पर्यावरण की रक्षा में भी योगदान दे रहे हैं। इसी तरह पश्चिमी सिंहभूम के गोइलकेरा प्रखंड के रुमकूट गांव की रंजीता देवी लाह की खेती से सालाना तीन लाख रुपये तक की कमाई कर रही हैं। रंजीता देवी ने सखी मंडल में शामिल होने के बाद लाह की उन्नत खेती का प्रशिक्षण प्राप्त किया। इसके बाद से वो इससे अच्छा मुनाफा कमा रही हैं।

रन फॉर योगा में दौड़ी रांची
Published / 2023-06-18 23:31:16
रन फॉर योगा में दौड़ी रांची

अगर हम योग करेंगे तो हमें किसी भी दवा की कभी भी कोई जरूरत नहीं पड़ेगी : डॉ दिवाकर चंद्र झा (नोडल पदाधिकारी, हेल्थ एंड वैलनेस सेंटर) 21 जून को मेकन स्टेडियम में 4000 से अधिक लोग एक साथ  करेंगे योग : डॉ राजीव कुमारटीम एबीएन, रांची। नौवें अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस के उपलक्ष्य में आयुष विभाग के सात दिवसीय योग काउंटडाउन कार्यक्रम के चौथे दिन के पहले सत्र में रन फॉर योगा का आयोजन किया गया। रन की शुरुआत राज्य योग केंद्र, रांची से शुरू हुई।इस अवसर पर डॉ दिवाकर चंद्र झा (नोडल पदाधिकारी, हेल्थ एंड वैलनेस सेंटर),  डॉ मुकुल कुमार दीक्षित (प्रभारी, राज्ययोग केंद्र), डॉ अमरेंद्र कुमार पाठक, डॉ विक्रम सम्राट, डॉ जफर इकबाल,  डॉ अशोक पासवान,  डॉ राजीव कुमार, डॉ अनुज कुमार मंडल, डॉ सच्चिदानंद सिंह, अलतमश, डॉ अर्चना कुमारी के अलावा आयुष निदेशालय के कई पदाधिकारी मौजूद थे।रन फॉर योगा राज्ययोग केंद्र से शुरू हुई जो न्यूक्लियस मॉल, जेल चौक, अल्बर्ट एक्का चौक से होते हुए वापस राज्ययोग केंद्र में समाप्त हुई। इस रन में हर उम्र के लोगों ने उत्साह से भाग लिया, जिसमें बड़ी संख्या में महिलाएं मौजूद थी।कार्यक्रम के अंत में राज्ययोग केंद्र मे शवासन और ध्यान का आयोजन किया गया। हेल्थ एंड वैलनेस सेंटर के नोडल पदाधिकारी डॉ दिवाकर चंद्र झा ने इस अवसर पर कहा कि योग के लिए लोगों को प्रेरित करना हमारा उद्देश्य है। हर घर आंगन में योग हो ताकि सभी स्त्री-पुरुष स्वस्थ रह सकते हैं। उन्होंने कहा कि योग सभी चिकित्सा पध्दतियो से सर्वश्रेष्ठ है।अगर हम योग करेंगे तो हमें किसी भी दवा की कभी भी कोई जरूरत नहीं पड़ेगी। अंत में उन्होंने नौवें अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस की लोगों को ढेर सारी शुभकामनाएं दी और सभी के अच्छे स्वास्थ्य की कामना की। डॉ राजीव कुमार ने कहा की 21 जून को मेकन स्टेडियम में 4000 से अधिक लोग एक साथ योग करेंगे।उन्होंने बहुत अच्छा संयोग झारखंड आयुष करा रहा है योग का नारा दिया और सभी को 21 जून को मेकन स्टेडियम में आने का निमंत्रण भी दिया। इस अवसर पर कल्याणी, अलका, मरियम, अनीता, उत्तम, सौरभ आदि के अलावा शहर के कई लोग भी उपस्थित थे। आज के दूसरे सत्र में चित्रांकन प्रतियोगिता हुई जो तीन ग्रुप में विभाजित थी।सुपर सीनियर ग्रुप - 25 साल से 35 सालसीनियर ग्रुप -  15 से 25 सालजूनियर ग्रुप - 8 से 15 सालप्रतियोगिता का विषय था योगा इन आईकॉनिक प्लेस, जिसमें लगभग 45 से ज्यादा प्रतिभागियों ने भाग लिया। प्रतियोगिता में डॉ जाहिद अनवर, डॉ आरिफ रजा ने निर्णायक की भूमिका निभायी।कार्यक्रम का संचालन राज्य योग केंद्र की योग प्रशिक्षिका डॉ अर्चना कुमारी ने किया।आज की प्रतियोगिता के पुरस्कारों का वितरण 20 जून को राज्ययोग केंद्र में होगा। 19 जून 2023  कार्यक्रम इस प्रकार है।सुबह 6 बजे से 8 बजे तक अंतरराष्ट्रीय योग प्रोटोकॉल का अभ्यासशाम 4 बजे से 6 बजे तक बच्चों का योगाभ्यास

द्वापर के बाद पुरी में निवास कर भगवान बने जगन्नाथ
Published / 2023-06-18 22:31:23
द्वापर के बाद पुरी में निवास कर भगवान बने जगन्नाथ

एबीएन सोशल डेस्क। भारत की सनातन संस्कृति धर्म-अध्यात्म पर ही टिका है। माना जाता है कि भगवान विष्णु जब चारों धामों पर बसे अपने धामों की यात्रा पर जाते हैं तो हिमालय की ऊंची चोटियों पर बने अपने धाम बद्रीनाथ में स्नान करते हैं। पश्चिम में गुजरात के द्वारिका में वस्त्र पहनते हैं। पुरी में भोजन करते हैं और दक्षिण में रामेश्वरम में विश्राम करते हैं। द्वापर के बाद भगवान कृष्ण पुरी में निवास करने लगे और बन गये जग के नाथ अर्थात जगन्नाथ। पुरी का जगन्नाथ धाम चार धामों में से एक है। यहां भगवान जगन्नाथ बड़े भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा के साथ विराजते हैं। जगन्नाथ रथयात्रा : श्रद्धालुओं के आकर्षण का केंद्र  हिन्दुओं की प्राचीन और पवित्र 7 नगरियों में पुरी उड़ीसा राज्य के समुद्री तट पर बसा है। जगन्नाथ मंदिर विष्णु के 8वें अवतार श्रीकृष्ण को समर्पित है। भारत के पूर्व में बंगाल की खाड़ी के पूर्वी छोर पर बसी पवित्र नगरी पुरी उड़ीसा की राजधानी भुवनेश्वर से थोड़ी दूरी पर है। आज का उड़ीसा प्राचीनकाल में उत्कल प्रदेश के नाम से जाना जाता था। यहां देश की समृद्ध बंदरगाहें थीं, जहां जावा, सुमात्रा, इंडोनेशिया, थाईलैंड और अन्य कई देशों का इन्हीं बंदरगाह के रास्ते व्यापार होता था। पुरी यानी धरती का बैकुंठ पुराणों में इसे धरती का बैकुंठ कहा गया है। यह भगवान विष्णु के चार धामों में से एक है। इसे श्रीक्षेत्र, श्रीपुरुषोत्तम क्षेत्र, शाक क्षेत्र, नीलांचल, नीलगिरि और श्री जगन्नाथ पुरी भी कहते हैं। यहां लक्ष्मीपति विष्णु ने तरह-तरह की लीलाएं की थीं। ब्रह्म और स्कंद पुराण के अनुसार यहां भगवान विष्णु पुरुषोत्तम नीलमाधव के रूप में अवतरित हुए और सबर जनजाति के परम पूज्य देवता बन गसे। सबर जनजाति के देवता होने के कारण यहां भगवान जगन्नाथ का रूप कबीलाई देवताओं की तरह है। पहले कबीले के लोग अपने देवताओं की मूर्तियों को काष्ठ से बनाते थे। जगन्नाथ मंदिर में सबर जनजाति के पुजारियों के अलावा ब्राह्मण पुजारी भी हैं। ज्येष्ठ पूर्णिमा से आषाढ़ पूर्णिमा तक सबर जाति के दैतापति जगन्नाथजी की सारी रीतियां करते हैं। नीलगिरि में होती है पुरुषोत्तम हरि की पूजा पुराण के अनुसार नीलगिरि में पुरुषोत्तम हरि की पूजा की जाती है। पुरुषोत्तम हरि को यहां भगवान राम का रूप माना गया है। सबसे प्राचीन मत्स्य पुराण में लिखा है कि पुरुषोत्तम क्षेत्र की देवी विमला है और यहां उनकी पूजा होती है। रामायण के उत्तराखंड के अनुसार भगवान राम ने रावण के भाई विभीषण को अपने इक्ष्वाकु वंश के कुल देवता भगवान जगन्नाथ की आराधना करने को कहा। आज भी पुरी के श्री मंदिर में विभीषण वंदापना की परंपरा कायम है। क्या है शंख और उसकी पूजा का रहस्य स्कंद पुराण में पुरी धाम का भौगोलिक वर्णन मिलता है। स्कंद पुराण के अनुसार पुरी एक दक्षिणवर्ती शंख की तरह है और यह 5 कोस यानी 16 किलोमीटर क्षेत्र में फैला है। माना जाता है कि इसका लगभग 2 कोस क्षेत्र बंगाल की खाड़ी में डूब चुका है। इसका उदर है समुद्र की सुनहरी रेत जिसे महोदधी का पवित्र जल धोता रहता है। सिर वाला क्षेत्र पश्चिम दिशा में है जिसकी रक्षा महादेव करते हैं। शंख के दूसरे घेरे में शिव का दूसरा रूप ब्रह्म कपाल मोचन विराजमान है। माना जाता है कि भगवान ब्रह्मा का एक सिर महादेव की हथेली से चिपक गया था और वह यहीं आकर गिरा था, तभी से यहां पर महादेव की ब्रह्म रूप में पूजा करते हैं। शंख के तीसरे वृत्त में मां विमला और नाभि स्थल में भगवान जगन्नाथ रथ सिंहासन पर विराजमान है। मंदिर का इतिहास इस मंदिर का सबसे पहला प्रमाण महाभारत के वनपर्व में मिलता है। कहा जाता है कि सबसे पहले सबर आदिवासी विश्?ववसु ने नीलमाधव के रूप में इनकी पूजा की थी। आज भी पुरी के मंदिरों में कई सेवक हैं जिन्हें दैतापति के नाम से जाना जाता है। राजा इंद्रदयुम्न ने बनवाया था यहां मंदिर राजा इंद्रदयुम्न मालवा का राजा था जिनके पिता का नाम भारत और माता सुमति था। राजा इंद्रदयुम्न को सपने में हुए थे जगन्नाथ के दर्शन। कई ग्रंथों में राजा इंद्रदयुम्न और उनके यज्ञ के बारे में विस्तार से लिखा है। उन्होंने यहां कई विशाल यज्ञ किए और एक सरोवर बनवाया। एक रात भगवान विष्णु ने उनको सपने में दर्शन दिए और कहा नीलांचल पर्वत की एक गुफा में मेरी एक मूर्ति है उसे नीलमाधव कहते हैं। तुम एक मंदिर बनवाकर उसमें मेरी यह मूर्ति स्थापित कर दो। राजा ने अपने सेवकों को नीलांचल पर्वत की खोज में भेजा। उसमें से एक था ब्राह्मण विद्यापति। विद्यापति ने सुन रखा था कि सबर कबीले के लोग नीलमाधव की पूजा करते हैं और उन्होंने अपने देवता की इस मूर्ति को नीलांचल पर्वत की गुफा में छुपा रखा है। वह यह भी जानता था कि सबर कबीले का मुखिया विश्?ववसु नीलमाधव का उपासक है और उसी ने मूर्ति को गुफा में छुपा रखा है। चतुर विद्यापति ने मुखिया की बेटी से विवाह कर लिया। आखिर में वह अपनी पत्नी के जरिए नीलमाधव की गुफा तक पहुंचने में सफल हो गया। उसने मूर्ति चुरा ली और राजा को लाकर दे दी। विश्ववसु अपने आराध्य देव की मूर्ति चोरी होने से बहुत दुखी हुआ। अपने भक्त के दुख से भगवान भी दुखी हो गये। भगवान गुफा में लौट गये, लेकिन साथ ही राज इंद्रदयुम्न से वादा किया कि वो एक दिन उनके पास जरूर लौटेंगे बशर्ते कि वो एक दिन उनके लिए विशाल मंदिर बनवा दे। राजा ने मंदिर बनवा दिया और भगवान विष्णु से मंदिर में विराजमान होने के लिए कहा। भगवान ने कहा कि तुम मेरी मूर्ति बनाने के लिए समुद्र में तैर रहा पेड़ का बड़ा टुकड़ा उठाकर लाओ, जो द्वारिका से समुद्र में तैरकर पुरी आ रहा है। राजा के सेवकों ने उस पेड़ के टुकड़े को तो ढूंढ लिया लेकिन सब लोग मिलकर भी उस पेड़ को नहीं उठा पाए। तब राजा को समझ आ गया कि नीलमाधव के अनन्य भक्त सबर कबीले के मुखिया विश्ववसु की ही सहायता लेना पड़ेगी। सब उस वक्त हैरान रह गये, जब विश्ववसु भारी-भरकम लकड़ी को उठाकर मंदिर तक ले आये। जानें भगवान की अधूरी मूर्ति का रहस्य अब बारी थी लकड़ी से भगवान की मूर्ति गढ़ने की। राजा के कारीगरों ने लाख कोशिश कर ली लेकिन कोई भी लकड़ी में एक छैनी तक भी नहीं लगा सका। तब तीनों लोक के कुशल कारीगर भगवान विश्वकर्मा एक बूढ़े व्यक्ति का रूप धरकर आये। उन्होंने राजा को कहा कि वे नीलमाधव की मूर्ति बना सकते हैं, लेकिन साथ ही उन्होंने अपनी शर्त भी रखी कि वे 21 दिन में मूर्ति बनायेंगे और अकेले में बनायेंगे। कोई उनको बनाते हुए नहीं देख सकता। उनकी शर्त मान ली गयी। लोगों को आरी, छैनी, हथौड़ी की आवाजें आती रहीं। राजा इंद्रदयुम्न की रानी गुंडिचा अपने को रोक नहीं पायी। वह दरवाजे के पास गयी तो उसे कोई आवाज सुनायी नहीं दी। वह घबरा गयी। उसे लगा बूढ़ा कारीगर मर गया है। उसने राजा को इसकी सूचना दी। अंदर से कोई आवाज सुनायी नहीं दे रही थी तो राजा को भी ऐसा ही लगा। सभी शर्तों और चेतावनियों को दरकिनार करते हुए राजा ने कमरे का दरवाजा खोलने का आदेश दिया। जैसे ही कमरा खोला गया तो बूढ़ा व्यक्ति गायब था और उसमें 3 अधूरी मूर्तियां मिली पड़ी मिलीं। भगवान नीलमाधव और उनके भाई के छोटे-छोटे हाथ बने थे, लेकिन उनकी टांगें नहीं, जबकि सुभद्रा के हाथ-पांव बनाये ही नहीं गये थे। राजा ने इसे भगवान की इच्छा मानकर इन्हीं अधूरी मूर्तियों को स्थापित कर दिया। तब से लेकर आज तक तीनों भाई बहन इसी रूप में विद्यमान हैं। वर्तमान में जो मंदिर है वह 7वीं सदी में बनवाया था। हालांकि इस मंदिर का निर्माण ईसा पूर्व 2 में भी हुआ था। यहां स्थित मंदिर 3 बार टूट चुका है। 1174 ईस्वी में ओडिसा शासक अनंग भीमदेव ने इसका जीर्णोद्धार करवाया था। मुख्य मंदिर के आसपास लगभग 30 छोटे-बड़े मंदिर स्थापित हैं। हवा के विपरीत लहराता ध्वज श्री जगन्नाथ मंदिर के ऊपर स्थापित लाल ध्वज सदैव हवा के विपरीत दिशा में लहराता है। ऐसा किस कारण होता है यह तो वैज्ञानिक ही बता सकते हैं लेकिन यह निश्चित ही आश्चर्यजनक बात है।  रोज बदलता है ध्वज यह भी आश्चर्य है कि प्रतिदिन सायंकाल मंदिर के ऊपर स्थापित ध्वज को मानव द्वारा उल्टा चढ़कर बदला जाता है। ध्वज भी इतना भव्य है कि जब यह लहराता है तो इसे सब देखते ही रह जाते हैं। ध्वज पर शिव का चंद्र बना हुआ है। नहीं बनती गुंबद की छाया यह दुनिया का सबसे भव्य और ऊंचा मंदिर है। यह मंदिर 4 लाख वर्गफुट में क्षेत्र में फैला है और इसकी ऊंचाई लगभग 214 फुट है। मंदिर के पास खड़े रहकर इसका गुंबद देख पाना असंभव है। मुख्य गुंबद की छाया दिन के किसी भी समय अदृश्य ही रहती है। हमारे पूर्वज कितने बड़े इंजीनियर रहे होंगे यह इस एक मंदिर के उदाहरण से समझा जा सकता है। पुरी के मंदिर का यह भव्य रूप 7वीं सदी में निर्मित किया गया।  चमत्कारिक सुदर्शन चक्र पुरी में किसी भी स्थान से आप मंदिर के शीर्ष पर लगे सुदर्शन चक्र को देखेंगे तो वह आपको सदैव अपने सामने ही लगा दिखेगा। इसे नीलचक्र भी कहते हैं। यह अष्टधातु से निर्मित है और अति पावन और पवित्र माना जाता है।  हवा की दिशा सामान्य दिनों के समय हवा समुद्र से जमीन की तरफ आती है और शाम के दौरान इसके विपरीत, लेकिन पुरी में इसका उल्टा होता है। अधिकतर समुद्री तटों पर आमतौर पर हवा समुद्र से जमीन की ओर आती है, लेकिन यहां हवा जमीन से समुद्र की ओर जाती है।  गुंबद के ऊपर नहीं उड़ते पक्षी मंदिर के ऊपर गुंबद के आसपास अब तक कोई पक्षी उड़ता हुआ नहीं देखा गया। इसके ऊपर से विमान नहीं उड़ाया जा सकता। मंदिर के शिखर के पास पक्षी उड़ते नजर नहीं आते, जबकि देखा गया है कि भारत के अधिकतर मंदिरों के गुंबदों पर पक्षी बैठ जाते हैं या आसपास उड़ते हुए नजर आते हैं। दुनिया का सबसे बड़ा रसोईघर 500 रसोइये 300 सहयोगियों के साथ बनाते हैं भगवान जगन्नाथजी का प्रसाद। लगभग 20 लाख भक्त कर सकते हैं यहां भोजन। कहा जाता है कि मंदिर में प्रसाद कुछ हजार लोगों के लिए ही क्यों न बनाया गया हो लेकिन इससे लाखों लोगों का पेट भर सकता है। मंदिर के अंदर पकाने के लिए भोजन की मात्रा पूरे वर्ष के लिए रहती है। प्रसाद की एक भी मात्रा कभी भी व्यर्थ नहीं जाती। मंदिर की रसोई में प्रसाद पकाने के लिए 7 बर्तन एक-दूसरे पर रखे जाते हैं और सब कुछ लकड़ी पर ही पकाया जाता है। इस प्रक्रिया में शीर्ष बर्तन में सामग्री पहले पकती है फिर क्रमश: नीचे की तरफ एक के बाद एक पकती जाती है अर्थात सबसे ऊपर रखे बर्तन का खाना पहले पक जाता है। है न चमत्कार! समुद्र की ध्वनि मंदिर के सिंहद्वार में पहला कदम प्रवेश करने पर ही (मंदिर के अंदर से) आप सागर द्वारा निर्मित किसी भी ध्वनि को नहीं सुन सकते। आप (मंदिर के बाहर से) एक ही कदम को पार करें, तब आप इसे सुन सकते हैं। इसे शाम को स्पष्ट रूप से अनुभव किया जा सकता है। इसी तरह मंदिर के बाहर स्वर्ग द्वार है, जहां पर मोक्ष प्राप्ति के लिए शव जलाए जाते हैं लेकिन जब आप मंदिर से बाहर निकलेंगे तभी आपको लाशों के जलने की गंध महसूस होगी।  रूप बदलती मूर्ति यहां श्रीकृष्ण को जगन्नाथ कहते हैं। जगन्नाथ के साथ उनके भाई बलभद्र (बलराम) और बहन सुभद्रा विराजमान हैं। तीनों की ये मूर्तियां काष्ठ की बनी हुई हैं। यहां प्रत्येक 12 साल में एक बार होता है प्रतिमा का नव कलेवर। मूर्तियां नयी जरूर बनायी जाती हैं लेकिन आकार और रूप वही रहता है। कहा जाता है कि उन मूर्तियों की पूजा नहीं होती, केवल दर्शनार्थ रखी गयी हैं। विश्व की सबसे बड़ी रथयात्रा आषाढ़ माह में भगवान रथ पर सवार होकर अपनी मौसी रानी गुंडिचा के घर जाते हैं। यह रथयात्रा 5 किलोमीटर में फैले पुरुषोत्तम क्षेत्र में ही होती है। रानी गुंडिचा भगवान जगन्नाथ के परम भक्त राजा इंद्रदयुम्न की पत्नी थी इसीलिए रानी को भगवान जगन्नाथ की मौसी कहा जाता है। अपनी मौसी के घर भगवान 8 दिन रहते हैं। आषाढ़ शुक्ल दशमी को वापसी की यात्रा होती है। भगवान जगन्नाथ का रथ नंदीघोष है। देवी सुभद्रा का रथ दर्पदलन है और भाई बलभद्र का रक्ष तल ध्वज है। पुरी के गजपति महाराज सोने की झाड़ू बुहारते हैं जिसे छेरा पैररन कहते हैं। हनुमानजी करते हैं जगन्नाथ की समुद्र से रक्षा माना जाता है कि 3 बार समुद्र ने जगन्नाथजी के मंदिर को तोड़ दिया था। कहते हैं कि महाप्रभु जगन्नाथ ने वीर मारुति (हनुमानजी) को यहां समुद्र को नियंत्रित करने हेतु नियुक्त किया था, परंतु जब-तब हनुमान भी जगन्नाथ-बलभद्र एवं सुभद्रा के दर्शनों का लोभ संवरण नहीं कर पाते थे। वे प्रभु के दर्शन के लिए नगर में प्रवेश कर जाते थे, ऐसे में समुद्र भी उनके पीछे नगर में प्रवेश कर जाता था। केसरीनंदन हनुमानजी की इस आदत से परेशान होकर जगन्नाथ महाप्रभु ने हनुमानजी को यहां स्वर्ण बेड़ी से आबद्ध कर दिया। यहां जगन्नाथपुरी में ही सागर तट पर बेदी हनुमान का प्राचीन एवं प्रसिद्ध मंदिर है। भक्त लोग बेड़ी में जगड़े हनुमानजी के दर्शन करने के लिए आते हैं।  अंत में जानिये मंदिर के बारे में कुछ अज्ञात बातें... महान सिख सम्राट महाराजा रणजीत सिंह ने इस मंदिर को प्रचुर मात्रा में स्वर्ण दान किया था, जो कि उनके द्वारा स्वर्ण मंदिर, अमृतसर को दिये गये स्वर्ण से कहीं अधिक था। पांच पांडव भी अज्ञातवास के दौरान भगवान जगन्नाथ के दर्शन करने आये थे। श्री मंदिर के अंदर पांडवों का स्थान अब भी मौजूद है। भगवान जगन्नाथ जब चंदन यात्रा करते हैं तो पांच पांडव उनके साथ नरेन्द्र सरोवर जाते हैं। कहते हैं कि ईसा मसीह सिल्क रूट से होते हुए जब कश्मीर आए थे तब पुन: बेथलेहम जाते वक्त उन्होंने भगवान जगन्नाथ के दर्शन किए थे। 9वीं शताब्दी में आदिशंकराचार्य ने यहां की यात्रा की थी और यहां पर उन्होंने चार मठों में से एक गोवर्धन मठ की स्थापना की थी।  इस मंदिर में गैर-भारतीय धर्म के लोगों का प्रवेश प्रतिबंधित है। माना जाता है कि ये प्रतिबंध कई विदेशियों द्वारा मंदिर और निकटवर्ती क्षेत्रों में घुसपैठ और हमलों के कारण लगाए गए हैं। पूर्व में मंदिर को क्षति पहुंचाने के प्रयास किये जाते रहे हैं।

गपकवान की खातिर मौसी के घर जाते हैं भगवान जगन्नाथ
Published / 2023-06-18 18:40:28
गपकवान की खातिर मौसी के घर जाते हैं भगवान जगन्नाथ

मौसी के घर का पकवान भगवान जगन्नाथ को है पसंद इसलिए चले जाते हैं उनके घर; जानें रथ यात्रा का महत्व एबीएन सोशल डेस्क। आषाढ़ महीने के शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि से उड़ीसा के पुरी में स्थित जगन्नाथ रथ यात्रा निकाली जाती है। इस पूरे 10 दिनों के उत्सव को काफी धूमधाम से मनाया जाता है। जबकि, इस साल जगन्नाथ रथ यात्रा 20 जून 2023 को निकाली जायेगी, जिसके लिए सभी तैयारियां पूरी कर ली गयी है। धार्मिक मान्यता है कि भगवान जगन्नाथ की इस रथ यात्रा में शामिल होने वाले भक्त को सभी तीर्थों के फल मिलते हैं। आइये भगवान जगन्नाथ की रथयात्रा के बारे में जानते हैं। दरअसल, सनातन धर्म में भगवान जगन्नाथ को भगवान विष्णु का अवतार माना जाता है। जिनके नाम का अर्थ पूरे जगत के नाथ या फिर कहें ब्रह्मांड का स्वामी होता है। दुनिया भर में प्रसिद्ध भगवान जगन्नाथ की रथ यात्रा जिस शहर में हर साल निकलती है, उसे श्रीजगन्नाथ पुरी के नाम से भी जाना जाता है। रथयात्रा के दौरान भगवान जगन्नाथ, भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा की प्रतिमाओं को रथ में बैठाकर नगर भ्रमण कराया जाता है। रथ यात्रा में भाई-बहन संग मौसी के घर जाते हैं भगवान धार्मिक मान्यता के अनुसार जगन्नाथ रथ यात्रा के दौरान रथ पर सवार होकर भगवान जगन्नाथ मौसी के घर गुंडिचा जाते हैं। गुंडिचा मंदिर को भगवान जगन्नाथ की मौसी का घर माना गया है। जिसमें भगवान जगन्नाथ अपनी बहन सुभद्रा और भाई बलभद्र के साथ भ्रमण के लिए जाते हैं। एक हफ्ते तक वहीं ठहरते हैं। जहां पर उनका काफी आदर-सत्कार होता है। माना जाता है कि मौसी के घर पर भाई बहन संग भगवान खूब पकवान खाते हैं, जिसके बाद वे करीब 15 दिन के लिए बीमार भी पड़ जाते हैं। इसके बाद वो अज्ञातवास में चले जाते हैं। भगवान के स्वस्थ होने के बाद ही भक्तों को दर्शन देते हैं। इसके बाद जगन्नाथ रथ यात्रा निकाली जाती है। रथ यात्रा पर्व का क्या है धार्मिक महत्व कथा पुराणों के अनुसार, माना जाता है कि भगवान जगन्नाथ की रथयात्रा में शामिल होने से साधक को 100 यज्ञों के बराबर पुण्य का फल मिलता है। इस कारण ही दुनिया भर से लोग अपनी और अपने परिवार की खुशहाली और मनोकामना के लिए इस रथयात्रा में शामिल होने के लिए पहुंचते हैं। बता दें कि, इस रथ यात्रा के अलावा देश के दूसरे भाग में भी इस यात्रा को धूमधाम से मनाया जाता है।

झारखंड राज्य हिंदू धार्मिक न्यास बोर्ड के नवनियुक्त अध्यक्ष जयशंकर पाठक ने किया पदभार ग्रहण
Published / 2023-06-17 21:54:24
झारखंड राज्य हिंदू धार्मिक न्यास बोर्ड के नवनियुक्त अध्यक्ष जयशंकर पाठक ने किया पदभार ग्रहण

एबीएन सोशल डेस्क। झारखंड राज्य हिंदू धार्मिक न्यास बोर्ड के नवनियुक्त अध्यक्ष जयशंकर पाठक और सदस्य राकेश सिन्हा, संजीव तिवारी, अजय मिश्रा ने आज यहां पदभार ग्रहण किया। देवघर, रजरप्पा, जगन्नाथपुर मंदिर रांची के पुजारियों ने वैदिक मंत्रोच्चारण के साथ स्वास्तिक गायन किया। इस अवसर पर झारखंड प्रदेश कांग्रेस कमिटी के अध्यक्ष राजेश ठाकुर, कृषि मंत्री बादल पत्रलेख नवनियुक्त तमाम सदस्यों को बधाई दी। पदभार ग्रहण करने के उपरांत बोर्ड के अध्यक्ष जयशंकर पाठक ने कहा कि राज्य के तमाम मंदिरों जिर्णोद्धार और श्रद्धालुओं को मुलभूत सुविधाएं उपलब्ध कराना पहली प्राथमिकता होगी ताकि राज्य और देश के कोने-कोने से जो श्रद्धालु देवघर, रजरप्पा या भद्रकाली मंदिर पूजा करने आते हैं उनको किसी प्रकार से कोई कठिनाइयों का सामना न करना पड़े। वैसे मंदिरों में भी लोगों के सहयोग से पीपी मॉडल पर धर्मशाला का निर्माण कराया जायेगा जहां लोगों को ठहरने की भी व्यवस्था हो सके। पदभार ग्रहण करने के उपरांत बोर्ड के सदस्य राकेश सिन्हा ने कहा कि रांची का पहाड़ी मंदिर रांची के हृदय स्थली के साथ-साथ राज्य का एक प्रमुख मंदिरों के शुमार में आता है। सावन माह में श्रद्धालुओं की काफी भीड़ रहती है। बहुत जल्द पहाड़ी मंदिर में कैसे श्रद्धालुओं को सुविधा मिले ये तय किया जायेगा। लापूंग में जो सांई मंदिर है उस मंदिर को भी विकसित करने का काम धार्मिक न्यास बोर्ड करेगी।

19 जून को नेत्रदान के साथ शुरू हो जायेगा रांची का प्रख्यात जगन्नाथपुर मेला
Published / 2023-06-17 10:53:53
19 जून को नेत्रदान के साथ शुरू हो जायेगा रांची का प्रख्यात जगन्नाथपुर मेला

एबीएन सोशल डेस्क। 332 वर्षों के इतिहास और परंपरा को सहेजे राजधानी रांची के जगन्नाथपुर रथ मेले के आयोजन की तैयारी चरम पर है। आगामी 19 जून आषाढ़ शुक्ल पक्ष प्रतिपदा के दिन भगवान श्री जगन्नाथ जी का नेत्रदान होगा यानी उनका महाश्रृंगार होगा और उसके अगले दिन रथ यात्रा निकाली जायेगी।332 वर्ष पहले हुई थी जगन्नाथ मंदिर की स्थापनाकभी ये यात्रा छोटानागपुर के बड़का गढ़ स्टेट की राजधानी हटिया में हुआ करती थी। जहां सन् 1691 ईसवी में ठाकुर ऐनी नाथ शाहदेव ने पुरी के तर्ज पर जगन्नाथपुर में श्री भगवान जगन्नाथ की मंदिर की स्थापना को आज 332 वर्ष हो चुके हैं, लेकिन वहीं परंपरा वहीं इतिहास को सहेजे हुए भगवान जगन्नाथ की पूजा पाठ विधि विधान से होती आयी है।दरअसल, एकांतवास के बाद भगवान श्री जगन्नाथ अपने मौसी के यहां अपनी बहन सुभद्रा और भाई बलभद्र के साथ 10 दिनों के प्रवास में आते हैं जो मेले का रूप ले लेता है। मेले में एक बार फिर झूले सज रहे हैं। खाने पीने के स्टॉल लग रहे है। परंपरागत हथियार वाद्य यंत्र कृषि उपकरण समेत कई विलुप्त होती चीज इस मेले में नजर आती है।

हजारीबाग : आज इन इलाकों में नहीं रहेगी बिजली
Published / 2023-06-16 12:35:38
हजारीबाग : आज इन इलाकों में नहीं रहेगी बिजली

टीम एबीएन, हजारीबाग/ रांची। हजारीबाग में मानसून आने से पहले शहर के विभिन्न इलाकों में पेड़ की टहनी की कटाई को लेकर बिजली विभाग ने अभियान शुरू किया है। इसके तहत शुक्रवार को शहर के कई इलाकों में टहनी काटने का कार्य किया जायेगा। विद्युत विभाग के सहायक अभियंता सुनील कुमार ने बताया कि कार्य के दौरान जबरा फीडर सुबह नौ से दोपहर 12.30 बजे तक बंद रहेगा। शहर के झिंझरिया पुल, पुराना नया बस स्टैंड, धोबिया तालाब, संत कोलंबा कॉलेज, हरनगंज इलाके में बिजली आपूर्ति ठप रहेगी। रिलायंस फीडर में दोपहर 1.30 से शाम 4.30 बजे तक बिजली बंद रहेगी। इससे मटवारी गांधी मैदान के चारों ओर, लोचनर पथ, मटवारी पेट्रोल पंप के आसपास और कृष्णापुरी में बिजली नहीं रहेगी। कारगिल फीडर में सुबह नौ से दोपहर 12.30 बजे तक बिजली नहीं रहेगी। इस फीडर के अंतर्गत आनेवाली फॉरेस्ट कॉलोनी, मजिस्ट्रेट कॉलोनी, कार्मेल स्कूल रोड, पंडितजी रोड में बिजली ठप रहेगी। फीडर नंबर दो में दोपहर 1.30 से शाम 4.30 बजे तक बिजली नहीं रहेगी। इससे शहर के दीपूगढ़ा और कनहरी रोड में बिजली बाधित रहेगी। डीवीसी फीडर में सुबह नौ बजे से दोपहर 1.30 बजे तक बिजली आपूर्ति बाधित रहेगी. इससे डीवीसी कॉलोनी, कचहरी रोड, झील इलाके में बिजली आपूर्ति ठप रहेगी। मार्खम कॉलेज क्षेत्र में दोपहर दो से शाम 4.30 बजे तक बिजली आपूर्ति ठप रहेगी। इससे मार्खम कॉलेज इलाका, जयप्रभा नगर, विवेकानंद सेंट्रल स्कूल का क्षेत्र प्रभावित होगा।

इस सदी के अंत तक 1,533 मिलियन पार कर जायेगी भारत की आबादी
Published / 2023-06-15 21:19:56
इस सदी के अंत तक 1,533 मिलियन पार कर जायेगी भारत की आबादी

सदी के अंत तक भारत में ही होगी सबसे अधिक आबादी, जानिए पाकिस्तान, चीन और यूएस में कितनी होगी जनसंख्याएबीएन सेंट्रल डेस्क। वैश्विक स्तर पर इस सदी की सबसे गंभीर समस्याओं में से एक है बढ़ती जनसंख्या। जनसंख्या के बढ़ने से कई सारी परेशानियों का सामना करना पड़ता है। अब तक दुनिया की आबादी आठ अरब के पार हो चुकी है। साल 2100 तक आबादी 10.4 बिलियन तक पहुंच सकती है।भारत तीन महीने पहले ही मार्च में चीन को पछाड़कर विश्व में सबसे अधिक जनसंख्या वाला देश बन चुका है। जनसंख्या बढ़ने के कई कारण होते हैं। इनमें घटती मृत्यु दर, परिवार नियोजन की कमी, गर्भनिरोधकों की कमी, सांस्कृतिक और धार्मिक मान्याताएं, अपर्याप्त शिक्षा, गरीबी और जागरूकता सहित कई पहलू शामिल हैं। आज हम आपको बताते हैं उन 10 देशों के बारे में जो संयुक्त राष्ट्र की जनसंख्या डिवीजन के अनुसार 21वीं सदी के अंत तक सबसे अधिक आबादी वाले देशों की सूची में शामिल होंगे। भारत : इसी साल मार्च में भारत की आबादी 1,425,775,850 हो चुकी है। भारत मार्च में चीन को पछाड़कर विश्व का सबसे अधिक जनसंख्या वाला देश बन चुका है। उम्मीद है कि इस सदी के अंत तक भारत की आबादी 1,533 मिलियन को पार कर जायेगी। चीन : चीन फिलहाल जनसंख्या की समस्या से जूझ रहा है। चीन की वर्तमान जनसंख्या 1,295.33 मिलियन है। उम्मीद है कि चीन को इस सदी के अंत तक राहत मिल सकती है। देश की आबादी 771 मिलियन होने का अनुमान है।  नाइजीरिया : देश की वर्तमान जनसंख्या 221,168,109 है। सदी की शुरुआत में आबादी 122.9 मिलियन थी। वहीं सदी के अंत तक जनसंख्या 546 मिलियन होने की संभावना है। पाकिस्तान : पाकिस्तान की वर्तमान जनसंख्या 233,515,417 है। सदी की शुरुआत में पाकिस्तान की आबादी 15.44 मिलियन थी। फिलहाल जनसंख्या के नजरिये से पाकिस्तान विश्व में पांचवें पायदान पर है। 2100 तक पाकिस्तान विश्व का चौथा सबसे अधिक आबादी वाला देश बन जायेगा, जिसकी जनसंख्या 487 मिलियन होगी। कॉन्गो : अफ्रीकी देश की आबादी 97,574,097 है, जो सदी की अंत में 431 मिलियन तक पहुंच सकती है। यूएस : अमेरिका की आबादी फिलहाल 336,708,490 है। सदी की अंत तक 394 मिलियन आबादी के साथ अमेरिका विश्व में पांचवा सबसे अधिक आबादी वाला देश बन जाएगा। इथोपिया : सदी की अंत में आबादी 323 मिलियन तक पहुंच जाएगी। फिलहाल देश की आबादी 123,347,685 है। इंडोनेशिया : सबसे अधिक मुस्लिम जनसंख्या वाले देश की आबादी 282,022,033 है। सदी की अंत तक आबादी 287 मिलियन तक पहुंच सकती है। तंजानिया : देश की वर्तमान आबादी 64,745,038 है, जो साल के अंत तक 244 मिलियन तक पहुंचने की संभावना है। इजिप्ट : देश की आबादी वर्तमान मंं 109.3 मिलियन है, जो सदी की अंत तक करीब दोगुनी 205 मिलियन हो जायेगी। इसके अलावा ब्राजील 185 मिलियन, मैक्सिको 116 मिलियन, रूस 112 मिलियन, अफगानिस्तान 110 मिलियन, तुर्किये 82 मिलियन, यूके 70 मिलियन, जर्मनी 68 मिलियन, फ्रांस 60 मिलियन, कनाडा 53 मिलियन और आॅस्ट्रेलिया की आबादी सदी की अंत तक 38 मिलियन पहुंचने की संभावना है।

Newsletter

Subscribe to our website and get the latest updates straight to your inbox.

We do not share your information.