टीम एबीएन, रांची। दिनांक 27/08/22 दिन रविवार को डंगरा टोली स्थित स्वर्ण भूमि हॉल में राजस्थानी वेशभूषा में महिलाओं द्वारा आदि शक्ति श्री जीण माता का सिंधारा एवं श्रृंगार करेंगी। जिसमें मशहूर भजन गायिका शीतल कटारुका एवं उनकी टीम द्वारा भजनों की गंगा प्रवाहित की जायेगी। कार्यक्रम दोपहर 3 बजे से संध्या 7 बजे तक होगा।
एबीएन सोशल डेस्क। हिंदू धर्म में एकादशी तिथि को विशेष रूप से फलदायी माना जाता है। ऐसी मान्यता है कि इस दिन जो व्यक्ति भी व्रत और उपवास करता है उसकी समस्त मनोकामनाओं की पूर्ति होती है। वहीं शास्त्रों में लिखे नियमों के अनुसार इस दिन चावल खाने की मनाही होती है। मान्यता यह भी है कि जो व्यक्ति इस दिन चावल खाता है उसे विष्णु पूजन का पूर्ण फल नहीं मिलता है।यहीं नहीं चावल का उपभोग करने वाला पाप का भागी बनता है। दरअसल शास्त्रों में ऐसी न जानें कितनी बातों का जिक्र है जिनका पता लगा पाना मुश्किल है और ज्योतिष एक्सपर्ट उन बातों की सच्चाई के बारे में बता पाते हैं।शास्त्रों की मानें तो जो व्यक्ति इस दिन चावल का एक भी दाना खाता है उसे मुक्ति नहीं मिलती है और वो अगले जन्म में जीव का रूप धारण करता है। यदि हम शास्त्रों और ज्योतिष की बात करें तो इस दिन चावल खाने से व्यक्ति के लिए मुक्ति के द्वार बंद हो जाते हैं।यहीं नहीं चावल खाना इस दिन पाप के समान माना जाता है और यदि आपके घर में कोई भी व्यक्ति एकादशी का उपवास करता है तो चावल के साथ तामसिक भोजन खाना भी वर्जित होता है।शास्त्रों में प्रचलित कथा के अनुसार प्राचीन काल में महर्षि मेधा ने एक बार यज्ञ में आये हुए एक भिखारी का अपमान कर दिया जिसकी वजह से माता दुर्गा अत्यंत नाराज हो गयी। माता को मनाने और प्रायश्चित के लिए महर्षि मेधा ने अपना शरीर त्याग दिया।शरीर त्यागने के बाद उसके अंश धरती में समा गये और उस प्रायश्चित से प्रसन्न होकर माता दुर्गा ने महर्षि को एक आशीष दिया कि उनके अंग भविष्य में अन्न के रूप में धरती से उगेंगे। महर्षि के पृथ्वी पर दबे हुए अंश चावल और जौ अन्न के रूप में प्रकट हुए। उस दिन एकादशी तिथि थी और तभी से चावल और जौ को जीव माना गया। यही वजह है कि एकादशी तिथि को चावल खाना जीव का उपभोग करने के समान माना जाता है और इस दिन चावल खाने की मनाही होती है।एकादशी में चावल खाना मांसाहार के समानपौराणिक कथा की मानें तो एकादशी तिथि के दिन भगवान विष्णु का व्रत उपवास किया जाता है और जो व्यक्ति इस दिन चावल खाता है उसे मांसाहार खाने के समान माना जाता है। ऐसे व्यक्ति की कोई भी पूजा स्वीकार्य नहीं होती है।क्या हैं वैज्ञानिक कारणएकादशी के दिन चावल न खाने के वैज्ञानिक कारणों की बात की जाए तो चूंकि चावल में पानी की मात्रा अधिक होती है और पानी का जुड़ाव चन्द्रमा से होता है। चंद्रमा का प्रभाव पानी में अधिक होता है और व्यक्ति के शरीर का 70 प्रतिशत हिस्सा भी पानी ही होता है।चंद्रमा मस्तिष्क और हृदय को प्रभावित करता है चूंकि इसे मन का कारक माना जाता है। चंद्रमा के प्रभाव की वजह से ही एकादशी के दिन चावल खाने से व्यक्ति को मानसिक और हृदय संबंधी बीमारियां हो सकती हैं।
टीम एबीएन, रांची। आदि शक्ति श्री जीण माता प्रचार समिति रांची द्वारा मारवाड़ी भवन हरमू रोड मे बैठक सम्पन्न हुई। बैठक मे आगामी 23 अगस्त 2023 दिन रविवार को स्थानीय डंगरा टोली स्थित स्वर्ण भूमि बैंक्विट हॉल में जीण माता जी के सावन सिंधरा महोत्सव का आयोजन दोपहर 3 बजे से संध्या 7 बजे तक किया जायेगा। महोत्सव में मशहूर भजन गायिका शीतल कटारुका एवं उनकी टीम द्वारा समुधुर भजनों की गंगा प्रवाहित की जायेगी।महोत्सव में राजस्थानी पारंपरिक राजस्थानी वेशभूषा में महिला सदस्यों द्वारा आदि शक्ति श्री जीण माता का सिंधारा एवं श्रृंगार किया जायेगा। इसके तहत माता का मेहंदी महोत्सव गजरा महोत्सव, चुंदड़ी महोत्सव, झूला उत्सव कार्यक्रम किया जायेगा। महोत्सव का समापन माता की महाआरती के साथ किया जायेगा। आदि शक्ति श्री जीण माता के सिंधाराम महोत्सव समिति के उपाध्यक्ष विजय पालीवाल एवं परिवार के सौजन्य से किया जा रहा है। कार्यक्रम को सफल बनाने में समिति के सदस्य योगदान दे रहे हैं। समिति के अध्यक्ष ओम प्रकाश अग्रवाल, सचिव नारायण विजयवर्गीय ने समिति के सदस्यों से आग्रह किया है कि समय से पधार कर कार्यक्रम को सफल बनायें और उन्होंने बताया की प्रसाद भजन संध्या के पश्चात महाप्रसाद की व्यवस्था की गयी है।आज की बैठक में ओम प्रकाश अग्रवाल, विजय पारलीवाल, नारायण विजयवर्गीय, बजरंग सोमानी, प्रदीप शर्मा, संदीप शर्मा, शिव शर्मा, संदीप विजयवर्गीय, सुनीता मित्तल, कविता सोमानी, नीरा शर्मा, सविता शर्मा, उषा शर्मा, निधि विजयवर्गीय व अन्य सदस्य उपस्थित थे।
राजधानी रांची में आकर्षण का केंद्र है श्री मातंगी महामृत्युंजय नाथ मंदिर का शिवलिंग जानें कैसे बनी श्री मातंगी महामृत्युंजय नाथ मंदिर की परिकल्पना दुनिया का दूसरा बड़ा नर्मदेश्वर शिवलिंग- 6 फिट 11 इंच, वजन 2500+ किलो, तैयार होकर अर्घा की ऊंचाई- 1मी, चौड़ाई- 7 फिट 11 इंच, ऊंचाई शिवलिंग की जमीन से 8 फिटआदमकद मां मातंगी की प्रतिमा का निर्माण प्रस्तावितकैसे मिली महामृत्युंजय नाथ और इनकी परिकल्पना रामदेव पाण्डेय मैं जब अपनी आंख खोला तो हमारे करीब मां भद्रकाली मंदिर ईटखोरी, चतरा देखा। इसे पहले लोग भदुली माई कहते थे। पर यह कौन देवी हैं, स्पष्ट नहीं था। संयोग कि मूर्ति 1968 में चोरी चली गयी। मेरे दादा स्व मुनीश्वर पाण्डेय ने पुराणों की खोजबीन और अनुसंधान कर इस देवी नाम भद्रकाली दिया। यह मंदिर के मार्बल शिलापट्ट पर बरगद पेड़ के नीचे आज भी लिखा है कि मंदिर की जानकारी का स्रोत भद्रकाली महात्म्य के लेखक मुनीश्वर पाण्डेय ने लिखा है।इसी मंदिर के पास सहस्त्र शिवलिंग की पूजा दादा जी के साथ करते थे, तो मन में एक भावना आती थी कि क्या ऐसे बड़े शिव जी पुन: स्थापित हो सकते हैं। इसी क्रम में सदैव कामाख्या धाम और विंध्येश्वरी धाम जाता रहता था। इस बीच मुझे 2005 के करीब विंधाचल में रामेश्वरम् मंदिर (जहां राम सीता लखन जी ने वनवास के क्रम में अष्टभुजी देवी के करीब विशाल शिवलिंग की स्थापना की थी, यह शिव लिंग मोटा है) में गया और मन ही मन सोचा कि कुछ इसी तरह के शिव लिंग की स्थापना की कोशिश करूंगा। इसी तरह का शुक्रेश्वर महादेव का शिवलिंग कामाख्या गौहाटी (किनारा ब्रह्मपुत्र नदी) में देखा, तो मन में पूर्ण संकल्प किया कि झारखंड में अपनी जन्मभूमि के लिए कुछ करना है। अब मन में एक आंदोलन जैसी बात चल रही थी और एक बड़ा मनोरम शिवलिंग का दर्शन हो रहा था। इस दर्शन के कारण मैं दूसरे शिवलिंग को समझ नहीं पा रहा था। हमें डेढ़ फीट (31 किलो) का सफेद कवार्ज शिवलिंग मिला, जो बहुत ही महंगा और दूध की तरफ सफेद था। मैं नर्मदेश्वर शिव लिंग ही चाहता था और बड़ा लगभग 4 या 5 फिट का। इसके लिए उज्जैन, ओम्कारेश्वर, नीमच, महेश्वर के व्यापारी के संपर्क में गया और एक सप्ताह तक भटकता रहा। सभी लोगों ने अपना व्यापार बढ़ाने के क्रम में बहुत जानकारी दी। मैं सभी जगहों पर गया। समझा। लोग बोले कि बकावां गांव जाइये। 300 किलोमीटर का चक्कर काट सबकी बात सुना। अंत में मैं बकावां गया। पर हर जगह वही व्यापार की बात थी। हमें संतुष्टि नहीं मिल रही थी। यहां बडेÞ-बडेÞ शिवलिंग देखे, जो नर्मदेश्वर न होकर नीमच की खान के पत्थर के बने थे। सभी ने कहा कि 3 फिट से बड़ा नहीं मिलेगा। मैं कही भी जाता, पर रात को उज्जैन या ओम्कारेश्वर ही आकर रूकता। क्यों न मुझे दो सौ किलोमीटर बाइक चलानी पड़े। डर भी लगता था। पर मुझे बार-बार सपने और चिंतन में दिखता कि बड़ा शिव लिंग की पूजा कर रहे हैं। यह मुझे अक्टूबर 2018 में भी दिखा। तब इस बात की खोज में निकला था।बकावां गांव जहां मिलते हैं नर्मदेश्वर बाणलिंग अर्थात नर्मदेश्वर की पूजा करने से घर की गरीबी दूर चली जाती है और धन, ऐश्वर्य एवं मोक्ष, चारों पुरुषार्थ की प्राप्ति होती है। यदि आप लंबे समय से बीमार हैं तो रोजाना महामृत्युंजय मंत्र बोलते हुए शिवलिंग का जलाभिषेक करें, इससे सभी रोगों से मुक्ति मिलती है। श्रावण के महीने में इसकी पूजा विशेष फलदायी मानी गयी है और भगवान शिव की कृपा से हर मुंहमांगी इच्छा पूरी होती है। भगवान शंकर ज्ञान के देवता हैं और लिंगाष्टक में कहा गया है : बुद्धिवि वर्धन कारण लिंगम्, अत: शिवलिंग पूजा बुद्धि का वर्धन करती है तथा साधक को अक्षय विद्या प्राप्त हो जाती है। नर्मदेश्वर शिव लिंग में ब्रह्मा, विष्णु, पार्वती और शिव तीनों का वास होता है। इनकी पूजा से सृष्टिकर्ता ब्रह्मा, पालक विष्णु, शक्ति शिवा और संहारक शिव की पूजा एक साथ होती है। नया विश्वनाथ मंदिर मीरघाट काशी (स्थापित श्री करपात्री जी महाराज) में स्थापित बाबा विश्वनाथ जी भी नर्मदेश्वर शिव लिंग है। यह भी मधु कलर का है और रांची के महामृत्युंजय नाथ भी नर्मदेश्वर मधु कलर के हैं। दोनों नर्मदेश्वर शिवलिंग और दुनिया का पहला नर्मदेश्वर शिवलिंग ऊंचाई 8 फिट जो इंदौर में स्थित है। बकावां गांव के पास नर्मदा नदी से ही प्राप्त हुआ है। इस गांव में मैं 4 जनवरी को आया। पर शाम हो गयी तो फिर भटक गया। भूल गया। सभी कारखानों में गया पर बात नहीं बनी। मैं किसी के यहां रूकना नहीं चाहता था और 70 किमी दूर होटल था, जहां उदास होकर लौट गया। फिर 6 जनवरी 2019 (शनिश्चरी अमावस्या) को ओमकारेश्वर से लगभग 70 किलोमीटर दूर नर्मदा नदी के तट पर स्थित बकावां गांव है जो इंदौर, खंडवा और खरगोन जिला के समीप नर्मदा के किनारे बसा है। यहीं मुझे दूसरे दिन कृष्णा केवट मिला। यहीं आसपास नर्मदेश्वर शिव लिंग अद्भुत रंगों में पाया जाता है। फिर इसमें घिसाई कर पत्थर के अंदर के रंग को निकाला जाता है। शिव नर्मदा नदी के पत्थर और शालीग्राम गंडक नदी के पत्थर का ही पूजा जाता है। सीमेंट या अन्य पत्थर के शिवलिंग या किसी मूर्ति की पूजा का प्रावधान शास्त्रीय नहीं है। बकावां में उस दिन हम कृष्णा केवट से मिले। बहुत ही सहृदय वह मुझे कई कारखानों पर ले गया। सब जगह वही नीमच का पत्थर था। कई दलाल मिले। बहुत समझाया। पर कृष्णा ने कहा घर चलिये। अब शाम हो जायेगा। चाय पी लीजिये। मैं फिर उदास हताश था। कृष्णा की पत्नी ने चाय पिलाई और इलायची दिया। बोली- आज रात आप रूक जाइये। पर मैं उचित नहीं समझ रहा था। उसी के कहने पर कृष्णा मुझे दौर नदी किनारे छोटे वर्कशॉप की ओर ले गया। सैकड़ों शिवलिंग निर्मित, अर्धनिर्मित सभी आकार के थे। पर 3 फिट से बडेÞ नहीं थे। इसी बीच मुझे एक लंबा शिवलिंग का आकार दिखा जो गर्दे से भरा था। मैंने पहली बार देखा, तो ध्यान नहीं दिया। फिर आगे से जाकर वापस लौटा, तो फिर शिवलिंग दिखा। मैंने कृष्णा से पूछा कि यह क्या है? कृष्णा ने कहा- नर्मदेश्वर पिंड आॅरिजनल। मैंने कहा- पक्का। कृष्णा बोला- हां, मैंने पूछा लंबाई- उसने कहा 6 फिट। मैंने कहा- इसके मालिक से बात करो। उसने कहा- उससे हमारी बात नहीं होती है। पर नाम उसका नाम हरे राम है। मैंने कहा- फिर उसके सामान की गारंटी तुम कैसे लेते हो? कृष्णा ने कहा- जो सच है वो है। मैं दूसरे व्यक्ति से बात करा दूंगा। कुछ दूर चला, तो हरे राम और अपना कामन मित्र राजेश को बुलाया। परिचय कराया तथा शिवलिंग की खरीद की बात की। उसने शिवलिंग की बात सुनते ही कहा कि इसे सालों पहले खर्डी गांव के पास से नर्मदा नदी से हम और हरे राम लाये थे और घटना सुनायी। फिर कृष्णा चला गया और हरे राम को बुलाया गया। उसने आते ही कहा कि खर्डी गांव के पास से तुमने लाया था। अब मैं शुद्धता पर खरा देख रहा था। शिवलिंग को धोया गया जो 6 फिट 11 इंच था। वजन 1100+ किलो। ऊपर मधु कलर का अद्भुत चमकदार। मैंने फोटो खिंचवायी। अब मुझे दक्षिणा तय करनी थी। हरे राम के घर बैठे चाय पिया वो बोला ढाई लाख रुपये। खैर मामला पटा। मैं किसी भी तरह से पिछड़ना नहीं चाहता था। पर दूसरी ओर रुपया भगवान नहीं है। पर भगवान भी इसी से हैं। जो हो सब तय हुआ। मन से थक गया था। हरे राम भी आज मेहमानी पर रोक रहा था। मैं किंकर्त्तव्यविमूढ़, थका और जीता हुआ था। अपनी औकात से भारी भरकम रकम और मिलने की सफलता। हर्ष और धन का तनाव दोनों था। अब शिवजी को पाने के लिए कई आर्थिक प्लान की ओर सोच रहा था। खैर अब तो कागजात और संकल्प दोनों हो चुका था। बकावां में जहां इसे पहले भी दुनिया का पहला नर्मदेश्वर शिवलिंग 8 फिट मिला था। जो अभी इंदौर में स्थापित है। दूसरे न पर यह झारखंड का शिवलिंग अब तक है। कैसे हुआ महामृत्युंजय का नामकरण इसी ऊहापोह के दौर में था। तब तक मेरे एक आईएएस मित्र डॉ माधव सिंह भैया का फोन आया। दोनों दंपति का फोन और व्हाट्सएप्प था कि इस कुंडली को देखें और उपाय बतायें। आप कहा हैं? मैंने उन्हें कहा- त्र्यम्बकेश्वर (नासिक) में। जबकि मैं ओमकारेश्वर के करीब था। एक कुंडली थी 1988 की। मेरा सॉफ्टवेयर उज्जैन में था। अब मुझे तत्काल उज्जैन आना था। बकावां से 200 किलोमीटर घने जंगल और घाटी को पार करना था। 6 जनवरी 2019 की शाम 4 बज चुका था। दिया गया कुंडली रांची के बड़े आइएएस की पत्नी की थी। बुध में शनि का मारकेश था। मैडम दिल्ली के बड़े अस्पताल में आईसीयू में भर्ती थी। मैंने बाबा से कहा कि अब आप मैडम को बचायें। मैंने ग्रंथों के अनुसार जल चढ़ाया और आमंत्रण किया। मैडम 6 जनवरी को अस्वस्थ थी और 12 जनवरी 2019 को दिव्य पुत्र संतान की प्राप्ति हुई, तो आप महामृत्युंजय नाथ कहे जाओगे। मैडम आज प्रसन्न हैं। इसी बीच कांके रोड के डी शर्मा जी को ईएनटी की दिक्कत हुई। मैं उज्जैन में ही था। यह 7 जनवरी की बात है। शर्मा जी के परिजन विनय जी फोन किये इनका स्वास्थ्य का कुछ कीजिये। महीनों से बीमार थे और रांची के प्रतिष्ठित डॉ ने कैंसर की संभावना जतायी थी। इससे परिवार और भयभीत था। हमने फोटो भेजकर विनय और विभा दी को कहा- कुछ नहीं होगा। पूरी जांच में कैंसर नहीं पाया गया। इस तरह बाबा भोला कई को जीवन देकर अपना नाम खुद महामृत्युंजय नाथ रखने को प्रेरित किये। 6 मार्च 2019 को झारखंड रांची की धरती पर बाबा पधारे। इस बीच रांची के कई जगहों पर बाबा की स्थापना की। बात मन में आयी। तब तक बाबा की रोज पूजा हो इसलिए मनन विद्यालय रांची के अंदर स्थित मंदिर में जुलाई 2019 तक रखा गया, जहां पूजा होती रही। इसके बाद डायमंड सिटी ओइना रांची (ईस्टर्न इस्टेट डेवलपर प्रा लि) के संस्थापक संजीव कुमार श्रीवास्तव से बात हुई। इस बीच भादो पूर्णिमा 2019 को बाबा को बैठाया गया। क्योकि बड़ा शिव लिंग होने के कारण पहले स्थापित कर बाद में मंदिर बनाया जायेगा। इसमें शिव सपरिवार और महाविद्या मातंगी देवी की स्थापना का प्रस्ताव है, जो संभवत: 2022 के करीब पूरा हो सकता है। विशेषता महामृत्युंजय नाथ के मंदिर का 24गुणा 24 फिट का गर्भ गृह होगा। इसके साथ छह फिट का परिक्रमा स्थल होगा। मुख्य मंदिर में पूरब, दक्षिण और उत्तर से दरवाजा होगा। आप जिस दरवाजे पर होंगे, तो प्रतिमा आपको जरूर दिखेगी, जिसमें एक महामृत्युंजय नाथ का मन दिखेंगे। मंदिर के आश्रमआश्रम में गृहस्थ महंत के अलावे अन्य पुजारी रहेंगे। इसमें वैदिक संस्कृति के लिए बच्चों का प्रशिक्षण होगा। भगवान का भोग कच्ची पक्की दोनों होगा। मंदिर की पूजन व्यवस्था मंदिर सुबह 6 बजे खुलेगा। 6:30 बजे प्रात: कालीन आरती होगी। दोपहर 12 बजे मंदिर का पट बंद होगा। दोपहर 3:30 बजे मंदिर का पट खुलेगा। शाम 7 बजे संध्या आरती होगी। रात 9 बजे मंदिर का पट बंद हो जायेगा। मंदिर में रिहाईशी इलाका लगभग तीस एकड़ में फैला हुआ है। इसमें मंदिर के आगंतुक को देखते हुए मॉल, मार्केट आदि भी मंदिर परिसर में ही होगा। मंदिर परिसर में नवग्रह और सभी सताइस नक्षत्र के पौधे और पेड़ तथा तरह-तरह के फूल के पौधे रहेंगे। स्थापना मेरे मित्र यजमान संजीव श्रीवास्तव और उनकी पत्नी अनु श्रीवास्तव (सीइओ- ईस्टर्न इस्टेट रांची- डायमंड सिटी) ने इरवा के पास इसे स्थापित करने की पेशकश रखी। इस जगह मैं इस संदर्भ में एक जगह गया, जहां निर्देशन स्वप्न या ख्याल में था, तो वह देखकर मैं आश्चर्यचकित हो गया। यहां फलदार बेल, पांकर, नीम, आम, धतुरा, अकवन आदि के वर्षों पुराने पेड़ तो पहले से तीर्थ जैसा है। जैसा अभी दिख रहा है।
राष्ट्रपति मुर्मू भी रहीं कार्यक्रम में मौजूदएबीएन सोशल डेस्क। कश्मीर के बारामूला में 2004 में आतंकवादियों की गोलियों का शिकार हुए लांस नायक राज कुमार महतो की पत्नी जया प्रभा महतो ने भावुक होते हुए कहा, जब जम्मू-कश्मीर में आतंकवाद विरोधी अभियान में मेरे पति की मृत्यु हो गयी, तो दुख में मेरी साड़ी केसरिया, सफेद और हरी हो गयी।रांची निवासी महिला ने सोमवार को यहां आर्मी वाइव्स वेलफेयर एसोसिएशन (एडब्ल्यूडब्ल्यूए) द्वारा आयोजित एक कार्यक्रम में बोलते हुए खुद को वीर नारी बताया। उन्होंने कहा-विधवा शब्द कमजोरी की भावना को व्यक्त करता है, लेकिन वीर नारी सशक्तिकरण की भावना देता है। कार्यक्रम में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू भी मौजूद थीं। अपने गृह राज्य के एक सरकारी स्कूल में विज्ञान की शिक्षिका जया प्रभा की शादी कम उम्र में ही हो गयी थी और शादी के सात साल बाद ही 2004 में उनके पति शहीद हो गये थे। दो बच्चों की मां जया प्रभा ने कहा- उन्हें 1994 में सेना की जाट रेजिमेंट में कमीशन मिला था और फिर सियाचिन और सिक्किम सहित कई स्थानों पर उनके कार्यकाल के बाद उन्होंने दिल्ली में एनएसजी के साथ तीन साल का कार्यकाल पूरा किया। जब संसद पर आतंकवादी हमला हुआ तब वह दिल्ली में तैनात थे।उन्होंने कहा कि एनएसजी के बाद वह राष्ट्रीय राइफल्स में थे और पांच आरआर में सेवा के दौरान जम्मू-कश्मीर में आतंकवाद रोधी अभियान के दौरान गोली लगने से घायल हो गये थे। उन्होंने यहां मानेकशॉ सेंटर में आयोजित एक कार्यक्रम से इतर कहा कि उनकी मौत की खबर और तारीख मेरी स्मृति में अंकित है, वह चार जून, 2004 थी। राष्ट्रपति मुर्मू अस्मिता : इंस्पिरेशनल स्टोरीज कार्यक्रम में मुख्य अतिथि थीं, जिसमें महतो और केरल निवासी संजना नायर ने अपने जीवन के संघर्षों और मजबूत, स्वतंत्र और साहसी महिलाओं के रूप में अपने जीवन की कहानियां बतायीं।नायर एक सामाजिक कार्यकर्ता और उद्यमी हैं, जो कला, चिकित्सा के क्षेत्र में लोगों की मदद भी करती हैं। उन्होंने यौन उत्पीड़न के बारे में बात की, जब वह कम उम्र की थीं। उन्होंने कहा कि मैं एक दुष्कर्म पीड़िता थी। मेरे माता-पिता और मेरे परिवार ने मुझे अपने टूटे हुए आत्मविश्वास के पुनर्निर्माण में मदद की, जब मैंने सारी उम्मीद खो दी थी। उन्होंने कहा- मैं एक सैनिक की बेटी हूं और मैं लड़ सकती हूं।
टीम एबीएन, रांची। विश्व हिंदू परिषद के बाल्मीकि नगर संरक्षक एवं हनुमान क्लब बड़ागांई के उपाध्यक्ष अशोक साहू के नेतृत्व में आज पूर्वाह्न 11:30 बजे सावन मास के नाग पंचमी, सोमवारी पूजन हेतु बाजे-गाजे के साथ नाचते-गाते हुए व बोल बंम के जयघोष लगाते हुए बड़ागांई स्थित शिवालय में पूजा अर्चना के पश्चात खूंटी स्थित अमरेश्वर धाम के लिए रवाना हुए। इस कांवरिया यात्रा में बड़ागांई, खिजुर टोली, बूटी सहित कई गांव के लगभग 500 श्रद्धालुओं शामिल थे जिन्होंने शाम 5:00बजे खूंटी के अमरेश्वर धाम में जलार्पण कर भगवान शिव का आशीर्वाद लिये।कार्यक्रम में विशेष रूप से मनीष साहु, शेखर साहू सहित कई कार्यकर्ताओं का योगदान रहा। विश्व हिंदू परिषद रांची महानगर के बाल्मीकि नगर संरक्षक अशोक साहू ने एक प्रेस विज्ञप्ति जारी कर दी।
श्रीराम के दर्शन जरूर करें सभी हिंदू...राम जन्मभूमि मंदिर का गर्भ गृह तैयार, इस शुभ मुहूर्त में स्थापित होगी रामलला की मूर्तिएबीएन सोशल डेस्क। अयोध्या में बन रहे भव्य श्रीराम जन्मभूमि मंदिर का गर्भ गृह तैयार हो गया है और पहली मंजिल का निर्माण पूरा होने के साथ ही अगले साल मकर संक्रांति के बाद 16 से 24 जनवरी के बीच रामलला की प्राण प्रतिष्ठा की जायेगी। रविवार को यहां पहुंचे राम मंदिर तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के महामंत्री चंपत राय ने संतों से मिलकर उन्हें मंदिर निर्माण की प्रगति की जानकारी दी और उन्हें मंदिर में रामलला की प्राण प्रतिष्ठा समारोह में आने का न्योता भी दिया। उन्होंने कहा कि करोड़ों राम भक्तों का सपना अब पूरा होने वाला है और वर्षों चले विवाद के बाद रामलला अब अयोध्या में अपने भव्य मंदिर में विराजमान होने वाले हैं। श्री राय ने कहा- मकर संक्रांति के बाद 16 से 24 जनवरी, 2024 के बीच किसी भी तिथि को मंदिर के गर्भगृह में रामलला की मूर्ति की प्राण प्रतिष्ठा कर दी जायेगी। उन्होंने कहा कि प्राण प्रतिष्ठा के लिए साधु-संतों को फिलहाल मौखिक निमंत्रण दिया जा रहा है और विधिवत निमंत्रण नवंबर में दिया जायेगा। उन्होंने बताया कि देश के सभी परंपराओं के साधु-संतों को प्राण प्रतिष्ठा समारोह में आमंत्रित किया जायेगा। मंदिर निर्माण की प्रगति के बारे में उन्होंने संतों को विस्तार से जानकारी देते हुए बताया कि गर्भ गृह में रामलला की भव्य मूर्ति की प्राणप्रतिष्ठा का स्थान पूरी तरह से तैयार हो गया है। उन्होंने कहा कि दोमंजिला मंदिर की पहली मंजिल की छत का काम अस्सी प्रतिशत पूरा हो चुका है। राय ने बताया कि मंदिर में भक्तों के दर्शन के साथ-साथ उसका निर्माण कार्य भी चलता रहेगा और इससे किसी प्रकार की बाधा उत्पन्न नहीं होगी। अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद के अध्यक्ष महंत रवींद्र पुरी ने कहा कि भगवान श्रीराम ने अपने मंदिर के निर्माण कार्य की जिम्मेदारी चंपत राय को दी है और हमारा मानना है कि उन्हें (चंपत राय) देखने मात्र से ही संतों को भगवान राम के दर्शन हो जाते हैं। उन्होंने कहा कि सभी साधु संतों और राम को मानने वाले लोगों को अयोध्या में बन रहे भव्य राम मंदिर में मूर्ति की प्राण प्रतिष्ठा तथा मंदिर के उद्घाटन समारोह में शामिल होना चाहिए। महंत पुरी ने उम्मीद जताई कि 2024 के लोकसभा चुनाव के बाद एक बार फिर से नरेन्द्र मोदी ही प्रधानमंत्री बनेंगे और भारत विकास की राह पर आगे बढ़ता रहेगा।
राजकीयकृत कन्या मध्य विद्यालय - भरनो, जिला - गुमला में 315 पौधौं का रोपण सह वितरण कार्यक्रम का आयोजनटीम एबीएन, गुमला/ रांची। आज दिनांक 20.08.2023 (दिन - रविवार) को श्री सर्वेश्वरी समूह - शाखा रांची (औघड़ भगवान राम आश्रम, अघोर पथ, लेक रोड पश्चिम, रांची) के द्वारा सर्वेश्वरी वृक्षारोपण अभियान : वर्ष- 2023 के पांचवें चरण का आयोजन राजकीयकृत कन्या मध्य विद्यालय, भरनो, जिला- गुमला में किया गया। कार्यक्रम में आम, अमरूद, मोहगनी, सागवान, आंवला, जामुन, बेल इत्यादि के 315 पौधों का रोपण एवं वितरण किया गया।कार्यक्रम की शुरुआत में विद्यालय परिसर के अन्दर लगभग 25 पौधों का रोपण किया गया। उसके बाद ग्रामीण बंधुओं के बीच एक लघु गोष्ठी का आयोजन किया गया जिसमें श्री सर्वेश्वरी समूह का संक्षिप्त परिचय देते हुए समूह द्वारा किये जा रहे जनकल्याणकारी कार्यक्रमों के बारे में भी ग्रामीण बंधुओं को अवगत कराया गया। साथ ही वृक्षों के कमी से हो रहे दुष्परिणामों के बारे में अवगत करते हुए वृक्षों के बचाव के प्रति जागरूक करने का प्रयास किया गया। गोष्ठी के बाद ग्रामीण बंधुओं के बीच लगभग 290 पौधों का वितरण किया गया।सर्वेश्वरी वृक्षारोपण अभियान के माध्यम से लोगों को वृक्ष लगाने एवं वृक्षों को बचाने के प्रति जागरूक करने का प्रयास किया जा रहा है। ज्ञात हो कि आज के कार्यक्रम के पूर्व ग्राम - गंगड़ा (जिला गुमला) एवं ग्राम - जुरकेला (जिला सिमडेगा), ग्राम - कोइन्जारा (जिला - गुमला), ग्राम - गुडू (जिला - रांची) में भी समूह शाखा द्वारा लगभग 1,500 से अधिक पौधों का रोपण एवं वितरण किया जा चुका है।कार्यक्रम में भरनो प्रखण्ड प्रमुख पारस नाथ, उप-प्रमुख एतवा उरांव, सांसद प्रतिनिधि मुन्ना साही, बीआरपी शमीम इजाज भी शामिल हुए। विद्यालय की ओर से समस्त कार्यक्रम के कुशल आयोजन में रमेश पाण्डेय, स्नेहा कुमारी, हरिकान्त शर्मा, दुनहा उरांव का विशेष सहयोग प्राप्त हुआ।श्री सर्वेश्वरी समूह - शाखा रांची के शशिभूषण मिश्रा, हेमन्त नाथ शाहदेव, वीरेन्द्र चौबे, उमा शंकर नन्द, आदित्य नाथ शाहदेव, समरेन्द्र सिंह, राधा मोहन मिश्रा, मनन्द सिंह, हिमांशु ठाकुर, सुधांशु ठाकुर, गौरीशंकर षाड़ंगी, राजेन्द्र प्रसाद, शिव शंकर षाड़ंगी, सोमेश कुमार पाण्डेय के साथ लगभग 35 श्रद्धालु-सदस्यगण शामिल हुए।
टीम एबीएन, रांची। आज सृजन हेल्प परिवार प्रांगण में फॉरेस्ट आॅफिसर्स वाइव्स एसोसिएशन की ओर से सृजन हेल्प के विशेष दिव्यांग मंदबुद्धि एवं मूक बधिर बच्चों के बीच शिव उपासना के स्वरूप प्रत्येक दिव्यांग बच्चों को भगवान शिव का गण मानते हुए चंदन टीका से विशेष दिव्यांगों का पूजन किया गया। उनके पूजन के बाद दिव्यांग को प्रसाद स्वरूप उनकी ओर से सुस्वादु जलपान कराया गया। प्रत्येक को एक-एक छाता बरसात से बचने के लिए भेंट स्वरूप दिया गया। सभी बच्चों को डोसा, इडली, मिठाई, बादाम बर्फी, समोसा और कॉपी पेंसिल रबर टोफियां चॉकलेट पूजा की सामग्री के रूप में वितरित की गयी।समाज के अंतिम छोर पर बैठे इन दिव्यांग बच्चों के लिए एसोसिएशन की अध्यक्षा ने कहा कि इनकी देखभाल करना इनके बीच उठना-बैठना इनको बराबर का सम्मान देना यह हम सब का कर्त्तव्य है। पांचों उंगलियां बराबर नहीं होती। ईश्वर ने इनको अगर इस रूप में बनाया है, तो हमारा आपका सबका कर्त्तव्य है कि हम सब उनकी सेवा ईश्वर का रूप मान कर करें और इनको भी अपने परिवार के सदस्य के रूप में आत्मसात करें। इनको सम्मान दें, इनको प्यार दें और इनके बीच एक सद्भाव का का एक ऐसा वातावरण बनाएं जैसे हम अपने परिवार में कमजोर से कमजोर बच्चों को देखते हैं। उसी प्रकार हमारा कर्तव्य है कि इन बच्चों को भी हम सब देखें और समाज की मुख्यधारा से इन सबको जोड़ें इनका शोषण इनका तिरस्कार न हो इन्हें सम्मान और प्यार मिले यह हम सब का कर्तव्य है। विश्व हिंदू परिषद सेवा विभाग के प्रांतीय प्रवक्ता संजय सर्राफ ने बताया कि रांची में यह एकमात्र विशेष दिव्यांग एनं मूक-बधिर बच्चों की संस्था है जिसमें अत्यंत पिछड़े वर्ग, अनुसूचित जाति और जनजाति के निम्न आय वर्ग से बच्चे आते है। नगर के संभ्रांत और समाज सेवी संगठनों से लोग बराबर आते हैं। आज फॉरेस्ट आफिसर्स वाइफ एसोसिएशन ने यह पुनीत कार्य किया है। इस कार्यक्रम में एसोसिएशन अध्यक्षा विभा श्रीवास्तव, वाइस प्रेसिडेंट रुचि उपाध्याय, सचिव सनन्दिता दास, कोषाध्यक्ष मीनू पांड्यान, पूर्व अध्यक्षा सविता मिश्रा, अंजू सिंह, रंजना सावंत और कलावती पांडे को सम्मान देने के लिए कार्यक्रम में कैलाश केसरी अध्यक्ष विश्व हिंदू परिषद रांची महानगर ने रामनाम का पट्ठा दिया। कार्यक्रम में राजेंद्र प्रसाद सिंह मुंडा रांची विभाग सेवा प्रमुख, अशोक कुमार अग्रवाल प्रांत सह-सेवा प्रमुख, गुंजन गुप्ता निदेशिका, संजय कुमार संचालक, प्रकाश बजाज, ज्ञान प्रजापति, संध्या उरांव सृजन हेल्प परिवार के अन्य कार्यरत सहयोगी और बड़ी संख्या में दिव्यांगों के अभिभावक उपस्थित थे। उक्त जानकारी विश्व हिन्दू परिषद् झारखंड के प्रांत सह-सेवा प्रमुख अशोक कुमार अग्रवाल (8862823043, 8789300579) ने एक प्रेस विज्ञप्ति जारी कर दी।
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