एबीएन सोशल डेस्क। किसी सामाजिक मुद्दे पर पहले शायद ही देखी गयी। इस तरह की एकजुटता और उसके साथ सरकार के मार्गदर्शन के नतीजे में झारखंड के 24 जिलों के सैकड़ों गांवों में आयोजित किये गये जागरूकता कार्यक्रमों को अभूतपूर्व समर्थन मिला।महिलाओं के नेतृत्व में इन जिलों में मशाल जुलूस निकाले गये और लाखों स्त्रियों, पुरुषों व बच्चों ने जाति-धर्म भूल कर राज्य से बाल विवाह के पूरी तरह खात्मे के लिए शपथ ली। खासतौर से रांची, कोडरमा, धनबाद, खूंटी, गोड्डा, लातेहार, साहेबगंज, बोकारो, चतरा और दुमका जिलों में लोगों ने बढ़-चढ़ कर इस अभियान में हिस्सा लिया। इससे पहले, झारखंड सहित कई राज्य सरकारों ने विभिन्न विभागों और अन्य हितधारकों को पत्र लिख कर उनसे बाल विवाह के खिलाफ अभियान में बढ़-चढ़ कर हिस्सा लेने और राज्य को बाल विवाह मुक्त बनाने के लिए लोगों को शपथ दिलाने का निर्देश दिया था।नतीजे में कचहरी से लेकर पुलिस थानों, शहरों के चौराहों से लेकर गांव की चौपालों, पूरे देश में बच्चों से लेकर बाल विवाह की पीड़ित महिलाओं तक करोड़ों लोग बाल विवाह मुक्त भारत अभियान से जुड़े और बाल विवाह के खिलाफ शपथ ली। बाल विवाह मुक्त भारत अभियान 2030 तक पूरे देश में बाल विवाह के पूरी तरह खात्मे के उद्देश्य से महिलाओं की अगुआई में 160 गैर सरकारी संगठनों द्वारा 300 से ज्यादा जिलों में चलाया जा रहा है।तमाम तरह के जागरूकता कार्यक्रमों की वजह से झारखंड के विभिन्न हिस्सों में पूरे दिन उत्सव और उल्लास का माहौल रहा और शाम ढलने के बाद महिलाओं के नेतृत्व में मशाल जुलूस निकाला गया जिसमें समाज के सभी वर्गों के लोगों ने बाल विवाह बंद करो-बंद करो, बाल विवाह करवाओगे तो जाओगे जेल, मेरी बेटी अभी पढ़ेगी-ब्याह की शूली नहीं चढ़ेगी के नारों के साथ यह संदेश दिया कि अब इस राज्य में बाल विवाह के लिए कोई जगह नहीं है।यूनीसेफ का अनुमान है कि अगर बाल विवाह के खिलाफ लड़ाई में भारत की प्रगति की यही दर जारी रही तो 2050 तक देश में लाखों और बच्चियों को बाल विवाह के दलदल में फंसने से नहीं बचाया जा सकता। लेकिन प्रख्यात बाल अधिकार कार्यकर्ता एवं अधिवक्ता भुवन ऋभु की किताब व्हेन चिल्ड्रेन हैव चिल्ड्रेन- टिपिंग प्वाइंट टू एंड चाइल्ड मैरेज जिसका अभियान के हिस्से के रूप में पिछले सप्ताह लोकार्पण किया गया 2030 तक ही बाल विवाह के खात्मे के लिए जरूरी टिपिंग प्वाइंट यानी वह बिंदु जहां से छोटे बदलावों और घटनाओं की श्रृंखला इतनी बड़ी हो जाती है जो एक बड़ा और आमूल परिवर्तन कर सकें, तक पहुंचने का खाका पेश करती है। इस किताब ने बाल विवाह मुक्त भारत अभियान से जुड़े 160 सहयोगी संगठनों की इस साझा लड़ाई को एक रणनीतिक औजार मुहैया कराया है और अभियान में नई जान फूंकी है। बाल विवाह की त्रासद सच्चाइयों और इसके दुष्परिणामों पर बेबाकी से बात करते हुए किताब कहती है, बाल विवाह बच्चों से बलात्कार है। इसका परिणाम बाल गर्भावस्था के रूप में आता है जिसके नतीजे में बच्चे की मौत हो सकती है।सरकार के मार्गदर्शन में बाल विवाह मुक्त भारत अभियान को मिले अपार जनसमर्थन पर खुशी जाहिर करते हुए कैलाश सत्यार्थी चिल्ड्रेन्स फाउंडेशन (केएससीएफ) के कंट्री हेड रवि कांत ने कहा कि बाल विवाह सदियों से हमारे सामाजिक ताने-बाने का हिस्सा रहा है और कानूनन अपराध होने के बावजूद इस पर विराम नहीं लग पा रहा है। लेकिन समाज के सभी वर्गों से मिले अप्रत्याशित और अभूतपूर्व समर्थन को देखते हुए मुझे लगता है कि हम नया इतिहास रचने की दहलीज पर हैं। आज यह अभियान जंगल की आग की तरह फैल रहा है और राज्य सरकारों ने इसके लिए जैसी प्रतिबद्धता दिखायी है, हमारे बच्चे अंतत: शायद एक ऐसे देश में पलें-बढ़ें जहां उनके अधिकार सुरक्षित और संरक्षित हों। यह प्रशंसनीय है कि सभी राज्य सरकारें बाल विवाह के खात्मे के लक्ष्य पर काम कर रही हैं जो इसे एक नई रफ्तार और विश्वास दे रहा है। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वे-5 (एनएफएचएस 2019-21) के आंकड़े बताते हैं कि देश में 20 से 24 के आयु वर्ग की 23.3 प्रतिशत लड़कियों का विवाह 18 वर्ष की आयु से पहले ही हो गया था जबकि झारखंड में यह आंकड़ा 32.2 प्रतिशत है। इससे संबंधित अधिक जानकारी और सहयोग के लिए जितेंद्र परमार (8595950825) से भी संपर्क कर सकते हैं।
मंदिरों पर सरकारी नियंत्रण को लेकर जताया विरोध, हस्तक्षेप करने की मांगटीम एबीएन, रांची। झारखंड हिंदू धार्मिक ट्रस्ट बोर्ड अधिनियम को समाप्त करने और हिंदू देवी देवताओं के मंदिर पर राज्य के नियंत्रण से मुक्त करने के संबंध में विश्व हिंदू परिषद का एक प्रतिनिधिमंडल राज्यपाल सीपी राधाकृष्णन से राजभवन में मुलाकात की। विहिप झारखंड प्रांत के प्रतिनिधिमंडल ने राज्यपाल से मिलकर कहा कि पूरे देश की तरह हिंदू धार्मिक के ट्रस्ट बोर्ड अधिनियम को समाप्त करने एवं हिंदू देवी देवताओं के मंदिरों को झारखंड राज्य हिंदू धार्मिक ट्रस्ट बोर्ड अधिनियम के प्रावधानों के तहत हिंदू धार्मिक ट्रस्ट बोर्ड के नाम पर राज्य सरकार के नियंत्रण एवं आधिपत्य में है, अविलंब समाप्त होना चाहिए।प्रतिनिधिमंडल ने कहा कि हिंदुओं की धार्मिक संस्थानों पर राज्य सरकार का नियंत्रण 1947 से पहले की अंग्रेजी शासन की गुलामी के तहत ही है। जबकि 1947 में स्वतंत्रता के बाद हिंदू धर्म को छोड़कर अन्य सभी धार्मिक संस्थाएं बिना सरकार के हस्तक्षेप के अपनी संस्था को स्थापित करने और चलने के लिए पूर्णत: स्वतंत्र है।प्रतिनिधिमंडल ने ज्ञापन सौंपते हुए कहा झारखंड हिंदू धार्मिक न्यास बोर्ड अधिनियम के विरुद्ध महत्वपूर्ण बिंदु इस प्रकार है : अनुच्छेद 25 और 26 भारत का संविधान हिंदू धर्म और अन्य धर्म के बीच अंतर नहीं करता है और ऐसे में राज्य द्वारा हिंदू धर्म को अन्य धर्म से अलग मानने का कोई औचित्य नहीं है। हिंदू धर्म को छोड़कर बाकी सभी धर्म अपनी धार्मिक संस्थाएं स्थापित करने और चलने के लिए स्वतंत्र हैं। सत्ता में रहने वाले राजनीतिक दल द्वारा विभिन्न मंदिरों एवं ट्रस्ट समितियों के प्रबंधन के लिए राजनिष्ठा रखने वाले व्यक्तियों को अध्यक्ष और सदस्य नियुक्त किया जा रहा है। यह सोचना अपने आप में गलत होगा कि राज्य की राजधानी में बैठे एक निकाय को मंदिरों के मामले में मंदिरों की व्यक्तिगत न्यास समितियां से बेहतर जानकारी और समझ होगी। यह भी गलत है कि किसी भी आवेदन पर बोर्ड या जिला न्यायाधीश न्यास समितियों के लिए बेहतर व्यक्तियों को नियुक्त कर सकता है। वर्तमान व्यवस्था में अन्य धर्म से संबंधित व्यक्ति/ अधिकारी भी किसी न किसी मंदिर के प्रबंधन में प्रशासक बन जाते हैं। यह बिल्कुल बेतुका है कि केवल हिंदू ही उनके द्वारा स्थापित संस्थाओं में अपना कामकाज नहीं संभाल सकेंगे। यहां यह उल्लेख करना प्रासंगिक होगा कि सरकारें धार्मिक निकायों को कोई वित्तीय सहायता नहीं देती है, खासकर हिंदू धर्म के मामले में। हिंदू संस्थाओं के मामलों में सरकार जबरन हस्तक्षेप करती है और उसके इस तरह के हस्तक्षेप के लिए शुल्क लेना प्रारंभ कर देती है। यहां यह बताना प्रासंगिक होगा कि प्रारंभ में ऐसे कानून ब्रिटिश सरकार द्वारा केवल कानून के नाम पर दान हड़पकर अपनी खजाना भरने के लिए बनाये गये थे। लेकिन आजादी के बाद भी वही औपनिवेशिक कानून हिंदुओं पर थोपा जा रहा है। झारखंड राज्य हिंदू धार्मिक ट्रस्ट बोर्ड अधिनियम एक विशेष राजनीतिक दल के सदस्यों को खुश करने का एक उपकरण मात्र है जो केवल हिंदू धार्मिक संस्थाओं में अराजकता पैदा करती है। पूरे देश में ऐसा सबूत/ मिसाल नहीं है जहां किसी एक या दूसरे राज्य के धार्मिक बोर्ड में किसी मामले के लिए कोई अच्छा कार्य किया हो बल्कि ऐसा स्पष्ट उदाहरण है जहां उन्होंने मंदिर के मामले में समस्या उत्पन्न किया है। यदि हिंदू समुदाय के व्यक्तियों को अपने धार्मिक संस्थाओं के संचालन के मामले में स्वतंत्रता नहीं है तो यह बिल्कुल असंवैधानिक है। कोई भी अन्य निजी संस्थान सरकार के अपने प्रतिबंधात्मक नियंत्रण में नहीं है। देश के अन्य निजी संस्थान केवल देश के सामान्य कानून के अनुसार भी कार्यरत है। हिंदू धार्मिक संस्थाओं के लिए भी ऐसा ही होना चाहिए। यह धारणा की हिंदू धर्म को हिंदू संस्था के मामले को संचालन या नियंत्रण करने के लिए एक संरक्षक निकाय की आवश्यकता है, जो हिंदू समुदाय के खिलाफ एक साजिश है, जो पूरे सामुदायिक हो अपमानित कर रही है। सरकार का उद्देश्य सिर्फ हिंदू संस्थानों की संसाधनों को लूटने के लिए उसके संरक्षक बनने का अभिनय करने जैसा है। प्रतिनिधि मंडल ने कहा उपरोक्त तथ्यों और परिस्थितियों को देखते हुए इस औपनिवेशिक कानून को खत्म करना आवश्यक है और इस तरह हिंदू धार्मिक संस्थाओं को नियंत्रण से मुक्त किया जाना चाहिए। हिंदू समुदाय के मन में अपने संस्थानों के प्रति स्वतंत्रता की भावना जागृत करने की आवश्यकता है। राज्यपाल के माध्यम से राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू से आग्रह किया गया कि कृपया इस गंभीर विषय पर संज्ञान लेते हुए कार्यकारी तंत्र को आवश्यक कार्रवाई करने के निर्देश देने की कृपा करें। महामहिम से मिलने के लिए प्रतिनिधि मंडल में चंद्रकांत रायपत प्रांत उपाध्यक्ष विश्व हिंदू परिषद, सुनील गुप्ता प्रांत उपाध्यक्ष विश्व हिंदू परिषद, डॉ वीरेंद्र साहू प्रांत मंत्री विश्व हिंदू परिषद, कैलाश केसरी अध्यक्ष रांची महानगर, मि मिथिलेश्वर मिश्र प्रांत प्रमुख सामाजिक समरसता शामिल थे। उक्त जानकारी विश्व हिंदू परिषद के प्रांत प्रचार प्रसार सहप्रमुख प्रकाश रंजन (9334433338) ने एक प्रेस विज्ञप्ति जारी कर दी।
नवरात्रि स्पेशलएबीएन सोशल डेस्क। मां दुर्गा की तीसरी शक्ति हैं चंद्रघंटा। नवरात्रि में तीसरे दिन इसी देवी की पूजा-आराधना की जाती है। देवी का यह स्वरूप परम शांतिदायक और कल्याणकारी है। इसीलिए कहा जाता है कि हमें निरंतर उनके पवित्र विग्रह को ध्यान में रखकर साधना करना चाहिए।उनका ध्यान हमारे इहलोक और परलोक दोनों के लिए कल्याणकारी और सद्गति देने वाला है। इस देवी के मस्तक पर घंटे के आकार का आधा चंद्र है। इसीलिए इस देवी को चंद्रघंटा कहा गया है। इनके शरीर का रंग सोने के समान बहुत चमकीला है। इस देवी के दस हाथ हैं। वे खड्ग और अन्य अस्त्र-शस्त्र से विभूषित हैं। सिंह पर सवार इस देवी की मुद्रा युद्ध के लिए उद्धत रहने की है। इसके घंटे सी भयानक ध्वनि से अत्याचारी दानव-दैत्य और राक्षस कांपते रहते हैं।नवरात्रि में तीसरे दिन इसी देवी की पूजा का महत्व है। इस देवी की कृपा से साधक को अलौकिक वस्तुओं के दर्शन होते हैं। दिव्य सुगंधियों का अनुभव होता है और कई तरह की ध्वनियां सुनाईं देने लगती हैं। इन क्षणों में साधक को बहुत सावधान रहना चाहिए। इस देवी की आराधना से साधक में वीरता और निर्भयता के साथ ही सौम्यता और विनम्रता का विकास होता है।इसलिए हमें चाहिए कि मन, वचन और कर्म के साथ ही काया को विहित विधि-विधान के अनुसार परिशुद्ध-पवित्र करके चंद्रघंटा के शरणागत होकर उनकी उपासना-आराधना करना चाहिए। इससे सारे कष्टों से मुक्त होकर सहज ही परम पद के अधिकारी बन सकते हैं। यह देवी कल्याणकारी है।
नवरात्रि स्पेशलएबीएन सोशल डेस्क। मां दुर्गा की नवशक्ति का दूसरा स्वरूप ब्रह्मचारिणी का है। यहां ब्रह्म का अर्थ तपस्या से है। मां दुर्गा का यह स्वरूप भक्तों और सिद्धों को अनंत फल देने वाला है। इनकी उपासना से तप, त्याग, वैराग्य, सदाचार और संयम की वृद्धि होती है।ब्रह्मचारिणी का अर्थ तप की चारिणी यानी तप का आचरण करने वाली। देवी का यह रूप पूर्ण ज्योतिर्मय और अत्यंत भव्य है। इस देवी के दाएं हाथ में जप की माला है और बाएं हाथ में यह कमण्डल धारण किये हैं।पूर्वजन्म में इस देवी ने हिमालय के घर पुत्री रूप में जन्म लिया था और नारदजी के उपदेश से भगवान शंकर को पति रूप में प्राप्त करने के लिए घोर तपस्या की थी। इस कठिन तपस्या के कारण इन्हें तपश्चारिणी अर्थात् ब्रह्मचारिणी नाम से अभिहित किया गया। एक हजार वर्ष तक इन्होंने केवल फल-फूल खाकर बिताये और सौ वर्षों तक केवल जमीन पर रहकर शाक पर निर्वाह किया।कुछ दिनों तक कठिन उपवास रखे और खुले आकाश के नीचे वर्षा और धूप के घोर कष्ट सहे। तीन हजार वर्षों तक टूटे हुए बिल्व पत्र खाये और भगवान शंकर की आराधना करती रहीं। इसके बाद तो उन्होंने सूखे बिल्व पत्र खाना भी छोड़ दिये। कई हजार वर्षों तक निर्जल और निराहार रह कर तपस्या करती रहीं। पत्तों को खाना छोड़ देने के कारण ही इनका नाम अपर्णा पड़ गया।
एबीएन सोशल डेस्क। नवरात्रि में दुर्गा पूजा के अवसर पर दुर्गा देवी के नौ रूपों की पूजा-उपासना बहुत ही विधि विधान से की जाती है। इन रूपों के पीछे तात्विक अवधारणाओं का परिज्ञान धार्मिक, सांस्कृतिक और सामाजिक विकास के लिए आवश्यक है।आइए जानते हैं मां शैलपुत्री के बारे में... मां दुर्गा को सर्वप्रथम शैलपुत्री के रूप में पूजा जाता है। हिमालय के वहां पुत्री के रूप में जन्म लेने के कारण उनका नामकरण हुआ शैलपुत्री। इनका वाहन वृषभ है, इसलिए यह देवी वृषारूढ़ा के नाम से भी जानी जाती हैं। इस देवी ने दाएं हाथ में त्रिशूल धारण कर रखा है और बाएं हाथ में कमल सुशोभित है। यही देवी प्रथम दुर्गा हैं। ये ही सती के नाम से भी जानी जाती हैं। उनकी एक मार्मिक कहानी है।एक बार जब प्रजापति ने यज्ञ किया तो इसमें सारे देवताओं को निमंत्रित किया, भगवान शंकर को नहीं। सती यज्ञ में जाने के लिए विकल हो उठीं। शंकरजी ने कहा कि सारे देवताओं को निमंत्रित किया गया है, उन्हें नहीं। ऐसे में वहां जाना उचित नहीं है। सती का प्रबल आग्रह देखकर शंकरजी ने उन्हें यज्ञ में जाने की अनुमति दे दी। सती जब घर पहुंचीं तो सिर्फ मां ने ही उन्हें स्नेह दिया। बहनों की बातों में व्यंग्य और उपहास के भाव थे। भगवान शंकर के प्रति भी तिरस्कार का भाव है। दक्ष ने भी उनके प्रति अपमानजनक वचन कहे। इससे सती को क्लेश पहुंचा।वे अपने पति का यह अपमान न सह सकीं और योगाग्नि द्वारा अपने को जलाकर भस्म कर लिया। इस दारुण दुःख से व्यथित होकर शंकर भगवान ने उस यज्ञ का विध्वंस करा दिया। यही सती अगले जन्म में शैलराज हिमालय की पुत्री के रूप में जन्मीं और शैलपुत्री कहलायीं।पार्वती और हेमवती भी इसी देवी के अन्य नाम हैं। शैलपुत्री का विवाह भी भगवान शंकर से हुआ। शैलपुत्री शिवजी की अर्द्धांगिनी बनीं। इनका महत्व और शक्ति अनंत है।
प्रतिभा सम्मान व प्रोत्साहन सम्मान से छात्र-छात्राओं को सम्मानित किया गयामहाराजा अग्रसेन पौराणिक कर्मयोगी लोकनायक समाजवाद के युगपुरुष रामराज्य के समर्थक थे : राजकुमार अग्रवालटीम एबीएन, रांची। अग्रवाल सभा रांची के तत्वाधान में श्रीअग्रसेन जयंती महोत्सव सह 47वें 15 दिवसीय वार्षिकोत्सव हर्षोल्लास के साथ महाराजा अग्रसेन भवन में मनाया गया। आज अग्रसेन जयंती महोत्सव में प्रतिभा सम्मान एवं प्रोत्साहन सम्मान समारोह के मुख्य अतिथि प्रधान महालेखाकार भारत सरकार के राजकुमार अग्रवाल एवं मुख्य वक्ता समाजसेवी पुनीत कुमार पोद्दार अग्रवाल सभा के अध्यक्ष नंदकिशोर पाटोदिया ने महाराजा अग्रसेन जी के चित्र पर माल्यार्पण कर एवं दीप प्रज्ज्वलित कर समारोह का शुभारंभ किया।उर्मिला पाड़िया ने गणेश वंदना तथा शशि सर्राफ ने अग्रसेन ध्वज वंदना की। अग्रवाल सभा के पदाधिकारियों ने महोत्सव में आये सभी आगंतुक अतिथियों का पुष्पगुच्छ एवं महाराजा अग्रसेनजी का प्रतीक चिह्न देकर सम्मानित किया। मुख्य अतिथि राजकुमार अग्रवाल ने कहा कि महाराजा अग्रसेन जी एक पौराणिक कर्मयोगी लोकनायक समाजवाद के युगपुरुष रामराज्य के समर्थक और महादानी माने जाते थे। उन्होंने कहा कि मानव जीवन मिला है, तो हम सबों को इसे मानव सेवा में लगाना चाहिए उन्होंने कहा अग्रवाल सभा द्वारा किए जा रहे हैं सामाजिक कार्यों की सराहना की। मुख्य वक्ता उद्योगपति सह समाजसेवी पुनीत कुमार पोद्दार ने कहा कि भगवान अग्रसेन का ध्वज अहिंसा और सूर्य का प्रतीक है तथा सूर्य की 18 किरणें 18 पुत्रों का प्रतिनिधित्व करती है। ध्वज में चांदी के रंग की एक ईट और एक रुपया भाईचारे एवं परस्पर सहयोग प्रदान करता है आध्यात्मिक के माध्यम से बच्चों को संस्कार देना चाहिए।कार्यक्रम की अध्यक्षता अग्रवाल सभा के अध्यक्ष नंदकिशोर पाटोदिया ने की। उन्होंने अग्रसेन महाराज जी की 5177 वां जन्मोत्सव पर सभी को शुभकामनाएं दी। अग्रवाल सभा के मंत्री मनोज चौधरी ने अग्रवाल सभा के किए गए कार्यों की विस्तृत जानकारी दी। जयंती संयोजक सज्जन पाड़िया ने अग्रवाल सभा द्वारा आयोजित 15 दिवसीय अग्रसेन जयंती महोत्सव की पूरी रिपोर्ट प्रस्तुत की। मंच का संचालन अग्रवाल सभा के पूर्व अध्यक्ष ललित कुमार पोद्दार ने किया। प्रतिभा प्रोत्साहन सम्मान में रांची क्षेत्र के सभी अग्रवंशी छात्र-छात्राएं जिन्होंने वर्ष 2022-23 की परीक्षाओं में निर्धारित मापदंड के अनुसार अंक प्राप्त किये हैं। जिसमें आईसीएसई- 10 के 12 बच्चों को तथा सीबीएससी- 10 के 20 बच्चों को झारखंड बोर्ड- 10 कक्षा के 2 छात्र को पुरस्कृत कर सम्मानित किया गया।सीबीएसई एवं आईसीएसई 10 एवं 12वीं के बोर्ड परीक्षा में 95 प्रतिशत से अधिक अंक लाने वाले 18 छात्र- छात्राओं को गंगा प्रसाद बुधिया पुरस्कार से सम्मानित किया गया। नन्दलाल मोदी खेलकूद पुरस्कार अद्वितीय आर्यन पटवारी को दिया गया। एमबीबीएस, सीए, बीटेक, एलएलबी, सीएफए, पीएचडी के प्रोफेशनल डिग्री प्राप्त करने वाले 19 छात्र- छात्राओं को मोमेंटो देकर सम्मानित किया गया।अग्रवाल समाज का सर्वोच्च सम्मान अग्रसेन सम्मान समाजसेवी ओमप्रकाश अग्रवाल को दिया गया। ओम प्रकाश अग्रवाल को मुख्य अतिथि एवं अग्रवाल सभा के पूर्व अध्यक्ष गण मोमेंटो, पुष्प गुच्छ एवं शाल ओढाकर सम्मानित किया।श्री हनुमान सरावगी कला संस्कृति साहित्य व शिक्षण सम्मान नरेश बंका को दिया गया। प्रतिभा सम्मान पुरस्कार के संयोजक सुरेश चंद्र अग्रवाल एवं सह संयोजक विनोद कुमार जैन ने कार्यक्रम का संचालन किया।15 दिवसीय अग्रसेन महोत्सव में आयोजित सभी प्रतियोगिताओं के विजेता एवं उपविजेता को पुरस्कृत कर सम्मानित किया गया।मौके पर भागचंद पोद्दार, नंदकिशोर पाटोदिया, मनोज चौधरी, राजेंद्र केडिया, रतनलाल बंका, गोवर्धन प्रसाद गाड़ोदिया, राजकुमार केडिया, अरुण बुधिया, प्रमोद अग्रवाल, संजय सर्राफ, अनिल अग्रवाल, कौशल राजगढ़िया, पवन पोद्दार, अशोक कुमार नारसरिया, सुरेश चंद्र अग्रवाल, विनोद कुमार जैन, ललित कुमार पोद्दार, प्रदीप राजगढ़िया, किशन पोद्दार, नरेश बंका, कमल कुमार केडिया,चंडी प्रसाद डालमिया, निर्मल बुधिया, विजय खोवाल, कमल खेतावत, विश्वनाथ जाजोदिया, अजय डीडवानिया, पवन शर्मा, सौरभ बजाज, विनय अग्रवाल, अजय अग्रवाल, राजेश भरतिया, जितेश अग्रवाल, प्रमोद बगड़िया, सरवन अग्रवाल, आकाश अग्रवाल, सुरेश चौधरी, रवि शर्मा, श्यामसुंदर बजाज, रमेश खेमका, भरत कुमार बगड़िया, सुनील पोद्दार, सज्जन पाड़िया, अशोक कुमार लाठ, पवन कनोई, रमन बोडा, विनोद टिबरेवाल, मनोज बजाज, किशन साबू, प्रमोद सारस्वत, नरेंद्र लखोटिया, एसपी अजमेरा, श्वेता भाला, नारायण विजय वर्गीय, शैलेश अग्रवाल, अमित शर्मा, रोहित पोद्दार, मनीष लोधा, रमाशंकर बगड़िया, किशन अग्रवाल, सतीश तुलसियान, गजानंद अग्रवाल, रीना सुरेखा, ऋचा अग्रवाल, मंजू केडिया, वीना मोदी, मंजू लोहिया के अलावा बड़ी संख्या में लोग उपस्थित थे। उक्त जानकारी अग्रवाल सभा के प्रवक्ता सह मीडिया प्रभारी संजय सर्राफ ने दी।
समाजसेवी अनुप गुप्ता ने गरीब बच्चों के बीच जन्मदिन मनायाटीम एबीएन, रांची। अक्सर लोग अपने जन्मदिन को आलीशान होटलों एवं प्रतिष्ठानों में घर-परिवार या फिर अपने अजीज दोस्तो के साथ मनाते है लेकिन कुछ ऐसे लोग भी होते हैं। जो अपने किसी भी खुशी के पलों को गरीबों के बीच जाकर खुशियां बांटते हैं। इन्हीं वाक्यों को चरितार्थ के करते हुए समाजसेवी सह बिजनेस मैन अनुप गुप्ता ने अपने से जन्मदिन को गांव में वंचित तबके के बीच गरीब बच्चों के बीच मनाकर मिसाल पेश किया। गरीब बस्तियों में पहुंचकर छोटे बच्चों के का बीच जाकर किताब पेन व के बिस्किट, चॉकलेट बाँटकर व पेट मिठाई खिलाकर अपनी खुशियां साझा की।समाजसेवी सह बिजनेस मैन अनुप गुप्ता ने कहा कि मानवता ही सबसे बड़ी सेवा है। यही काम आपको औरों से अलग रखता है। इससे आपको को जो संतुष्टि व प्यार मिलता है उसे शब्दों में बयां करना संभव नहीं। यही सोचकर ये निःस्वार्थ भाव से सामाजिक कार्यों में लगे हुए हैं। जब ईश्वर हमें मनुष्य का जन्म दिया तब ही उसने हमें इस लायक बना दिया और इस जीवन को लोगों की मदद में लगाना चाहिए। मदद न करने के लिए बहाने तो लाखों मिल जाते हैं परंतु एक बार किसी की मदद कर जो सुकून मिलता है। वह तमाम ऐशोआराम आपको नहीं दे सकते। जीवन में हमें जब भी कुछ अच्छा करने को मौका मिला तो अपने जीवन का वह हर एक मूल्यवान समय ऐसे ही सामाजिक कार्यो में समर्पित करता रहा हूं।वर्तमान में तो हर एक इंसान सिर्फ अपनों में ही व्यस्त जिये जा रहा तो हम यदि इसी समय में अपनों से निकलकर ऐसे जीवंत सामाजिक कार्यो के करने से एकाकी जीवन से निकल कर आत्मिक सुकून को प्राप्त करता हूँ जिसकी अनुभूति हो जीवन जीने का एक मात्र साध्य है।
बहरूपियों आयो रे सुरों का संग्राम बिस्कुट री कला जैसे कार्यक्रमों की रही धूमटीम एबीएन, झुमरीतिलैया। श्री अग्रसेन जयंती समारोह को ले श्री अग्रसेन भवन में विविध कार्यक्रमों का आयोजन किया गया। इसमें बच्चों से लेकर बड़ों तक ने अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाया। बिस्कुट री कला में जूनियर ग्रुप में प्रथम वाणी बंसल, द्वितीय आर्ची अग्रवाल, तृतीय दिव्यांश खाटूवाला सीनियर ग्रुप में प्रथम साक्षी सरावगी, द्वितीय नृत्य अग्रवाल, तृतीय समृद्धि राजगढ़िया घोषित किये गये।वहीं निर्णायक की भूमिका काजल गुप्ता व वंदना अग्रवाल थी। जबकि इसके परियोजना निदेशक ममता बंसल, नीतू बंसल ने निभायी। बहरूपियों आयो रे में ग्रुप ए में प्रथम रियांश चौधरी, द्वितीय अपूर्व हिसारिया ग्रुप बी में प्रथम निहित संघई, द्वितीय विवान चौधरी ग्रुप सी में रचित सरावगी द्वितीय देवांशी संघई घोषित किये गये। इसके निर्णायक शालू चौधरी और स्वीटी खेतान थी। जबकि इसके परियोजना निदेशक की भूमिका में रुही संघई और स्नेहा अग्रवाल ने निभायी। वहीं सुरों का महासंग्राम में विजेता तनीषा अग्रवाल, तविषि अग्रवाल, शिल्पा अग्रवाल, प्रियंका अग्रवाल की टीम रही। इसके परियोजना निदेशक श्रेया केडिया व स्नेहा खेतान थी। वहीं कथा वाचन में जूनियर ग्रुप में प्रथम सारांश लड्ढ़ा, द्वितीय अर्पित गुप्ता, तृतीय रचित सरावगी वहीं सीनियर ग्रुप में प्रथम मनीषा राजगढ़िया, द्वितीय नीतू बंसल, तृतीय राशि बंसल विजेता घोषित किये गये। निर्णायक की भूमिका कृतिका मोदी और ममता नरेड़ी ने निभायी। वहीं 15 अक्टूबर को सुबह 10 बजे पूजा अर्चना व आरती का आयोजन होगा। इसके बाद रंगोली प्रतियोगिता की जायेगी। 3 बजे सीताराम जी की ठाकुरबाड़ी श्याम बाबा पथ से निकलकर अग्रसेन भवन पहुंच कर संपन्न होगी। इसके बाद सभा का आयोजन होगा। अंतत: सांस्कृतिक कार्यक्रम के अलावा विभिन्न प्रतियोगिता के विजेताओं एवं समाज के शिक्षा के क्षेत्र में बेहतर करने वाले का सम्मान किया जायेगा। कार्यक्रम की सफलता के लिए समाज के अध्यक्ष गोपीकृष्ण अग्रवाल, सचिव हिमांशु केडिया, कोषाध्यक्ष प्रदीप बंसल, जयंती संयोजक अरविंद चौधरी, सह संयोजक नेहा बजाज, प्रगति चौधरी, संजीव खेतान, संजय नरेड़ी, संतोष लड्ढ़ा, विपुल चौधरी, यश बंसल, हर्षित मोदी, अनुराग हिसारिया, वत्सल कंदोई सहित समाज के कई सक्रिय सदस्य लगे हुए हैं।
एबीएन सोशल डेस्क। हे भारत के भरत.! सभी जीवात्माओं में दैवत्व बीज रूप में विद्यमान है। लेकिन इस अखंड सत्य शाश्वत अविनाशी स्वरूप का बोध न होना ही दु:ख का मूल कारण है। जैसे मां सीता जी की खोज के लिए हनुमान जी को लंका जाने के लिए समुद्र लांघना था, लेकिन वे हिचकिचाहट कर रहे थे। तब जामवंत जी ने उनको याद दिलाया कि आप में वह शक्ति वह क्षमता है। तो हनुमान जी ने समुद्र लांघ कर लंका में प्रवेश कर गये। इसी तरह सद्गुरु की कृपा से आसानी से समझ में आ जाता है। आध्यात्मिक विचारों द्वारा अंत:करण को ब्रह्म-रसाभिसिक्त शक्ति में भिंगोते रहे। आत्मसत्ता का बोध हमेशा कल्याण करने वाला है। अपने शाश्वत अविनाशी स्वरूप का बोध न होने के कारण मानव अपनी अनंतता से अपरिचित है। अत: आध्यात्मिक पथ का अवलंबन एवं आत्म-अवबोध की तत्परता जगायें। स्वयं में समाहित भगवद-तत्त्व चिन्मय एवं अखण्ड आनन्द लबालब है। उस शाश्वत और नित्य स्वरूप का बोध मांगल्य-मोद और मुक्ति प्रदाता है। अत: साधन विधियों में आत्म अनुसंधान और सदगुरू अनुग्रह लेते रहे। नित्य सनातन एवं शाश्वत-स्वरूप का बोध श्रीमद्भागवत से सहज संभव है। श्रीमद्भागवत भवतारक साधन है।अपने वास्तविक स्वरूप की स्मृति और बोध का फलादेश है-निर्भयता और अखण्ड-आनन्द के अनुभव का स्थायी बन जाना। अत: आत्मस्थ रहें। जीव अपने स्वरूप को माया के कारण भूल जाता है। जिस प्रकार सूर्य की किरणें सूर्य से पृथक नहीं हैं, उसी प्रकार जीव भी वास्तव में ब्रह्म से पृथक नहीं है। अज्ञान के कारण ही जीव अपने उस वास्तविक रूप को नहीं पहचान पाता, जिस अंशी का वह अंश है। चेतन जीव अपना संबंध जड़ शरीर, मन, बुद्धि, अहंकार अथवा किसी कल्पित रूप से मान बैठता है। जीव का यही अज्ञान आत्मज्ञान की कमी के अतिरिक्त कुछ नहीं है। आत्मज्ञान का बौद्ध होते ही प्रभु की सद्गुरु रूपी शक्ति प्रकट हुई है। संत-सद्गुरु ही प्रभु प्राप्ति कराने के मूल साधन हैं। मनुष्य शरीर पूर्ण मुक्त है, पर पूर्ण सद्गुरु के मिलने पर ही वास्तविकता का ज्ञान होता है। अपने चैतन्य स्वरूप को तभी जान पायेंगे, जब मन स्थिर और शांत होगा। अशांत मन से कभी भी अपने आत्म-स्वरूप का बोध नहीं कर सकते। क्योंकि मन बड़ा हटी है यह तब पूर्णरूप से शांत होगा, जब हम अपनी अन्तर सत्ता के प्रति समरूप से जागरूक एवं सचेत होंगे तथा जागरूकता के उस बोध में पूर्णतया अवस्थित होंगे। तभी अपने आत्म-स्वरूप का बोध होगा। बंधुओं, अपने पूर्वजन्म कृत कर्मों से कोई जीव बच नहीं सकता, यही ईश्वरीय न्याय है। मनीषियों ने इस विषय में हमारा मार्गदर्शन किया है। वे कहते हैं कि हर समय मनुष्य को ईश्वर याद बनी रहे। कैसी भी अवस्था क्यों न हो, उसी की शरण में रहना। इसका अर्थ यही है कि अपने सभी दैनिक कार्यों और दायित्वों का भली-भांति निर्वहण करते हुए परम प्रभु याद बनी रहे। सभी द्वन्द्वों को सहन करते हुए अपने संपूर्ण शुभाशुभ कर्मों का फल उस ईश्वर को अर्पित करते रहना चाहिए। व्यवहार में ऐसा करने वाला व्यक्ति कभी अभिमानी नहीं बनता। श्रीगीता में यही उपदेश दिया है कि केवल कर्म करना ही मनुष्य का अधिकार है, फल की कामना नहीं। कर्मफल का हेतु बनने पर मनुष्य में अकर्मन्यता का भाव आने लगता है। कर्म किये बिना और कोई उपाय नहीं है। दु:ख हो या सुख हर समय प्रभु का स्मरण करता है, उसके जीवन में सुख आये अथवा दु:ख, वह हर स्थिति में समान रहता है। दोनों को प्रसाद समझकर ग्रहण करता है। जिसका मन उस निरंकार प्रभु से जुड़ा रहता है, उसे ही प्रभु की प्राप्ति होती है। आना और जाना इस चक्रव्यूह से मुक्त होता है। परम प्रभु को सच्चिदानंद स्वरूप कहा गया है। विराट का ही एक अंश होने से जीवात्मा भी उन्हीं गुणों से सुशोभित है। सत्, चित और आनंद-ये तीनों मिलकर कारण शरीर का ढांचा बनाते हैं। सत् अर्थात् शाश्वत अजर-अमर और अविनाशी स्वरूप। चित् अर्थात् चेतना, दिव्य गुणों से सुसज्जित, उच्चस्तरीय आदर्शों, आस्थाओं से युक्त। आनंद अर्थात् भाव-संवेदनाओं, सरसता, मृदुलता से सिक्त अंत:करण आशा उत्साह, संतोष के परस्पर समन्वय पर आधारित जीवनक्रम है। आत्मा का सहज स्वभाव है-ऊंचा उठना, अपने विराट स्वरूप की स्वयं को प्रतिमूर्ति बनाने के लिए इन्हीं गुणों से स्वयं को समृद्ध करना तथा अंतत: समस्त आवरणों को हटाते हुए अपने चरम लक्ष्य को प्राप्त करना। परिष्कृत जीवात्मा इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए आध्यात्मिक पुरुषार्थ करती है एवं जीव ब्रह्म सम्मिलन से निस्सृत परमानन्द की स्थिति को प्राप्त करती है। आत्म तत्व की गहराई को समझना सबसे बड़ी उपलब्धि माना गया है। जिसने स्वयं को जानकार जीवन लक्ष्य की पूर्ति की आवश्यकता को समझ लिया, वह महामानव बनता है और देव समुदाय में सम्मिलित होकर अपना ही नहीं, बल्कि अन्य असंख्यों का कल्याण भी करता है। अपने में ओत-प्रोत ब्रह्मसत्ता को जागृत करना और स्वयं में देवत्व का उदय करना ही आत्मबोध का परिणाम है और यह बोध ही ज्ञान साधना का चरम लक्ष्य है।जो स्वयं को नहीं जानता है, वह सत्य को कैसे जान सकता है? सत्य को जानने का द्वार स्वयं से होकर ही आता है। इसलिए जिसने स्वयं को जान लिया उसने संसार को इच्छानुकूल बनाने और पदार्थों तथा प्राणियों को उल्लास प्रदान कर सकने का मार्ग हस्तगत कर लिया। जय राजेश्वर राधे-राधे जय श्री कृष्णा राम राम हरि ॐ
Subscribe to our website and get the latest updates straight to your inbox.