राजकुमारी पाण्डेयएबीएन सोशल डेस्क। भारत के उत्तर प्रदेश बिहार तथा झारखंड राज्य में छठ का पर्व बड़ी धूमधाम से मनाया जाता है। छठ पूजा की शुरुआत कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि से होती है तथा यह पर्व 4 दिनों तक मनाया जाता है। इस पर्व में महिलाएं लगभग 36 घंटों का निर्जला व्रत रखती हैं। यही कारण है कि इसे महापर्व कहते हैं। छठ पर्व को लेकर बहुत ही धार्मिक मान्यताएं प्रचलित हैं। यह माना जाता है कि इस दिन व्रत करने से भगवान सूर्य एवं छठी मैया का आशीर्वाद प्राप्त होता है यह वरदान संतान एवं परिवार के लिए उत्तम है। ऐसा भी कहा जाता है कि इस पर्व को विधि विधान से संपन्न करने पर हर मनोकामना सूर्यदेव पूरा करते हैं, यह पूजा मुख्य रूप से सूर्य भगवान को अर्घ्य देने के साथ छठी मैया की पूजा से संबंधित है जो कि हर साल भारत में मनाया जाता है।छठ पूजा विधिपहले दिन सबसे पहले आपको नहाय-खाय के साथ छठ पूजा प्रारंभ करनी चाहिए।इस दिन सबसे पहले घर की साफ-सफाई की जाती है।इसके लिए आपको सुबह जल्दी उठकर स्नान करके व्रत का संकल्प लेना चाहिए तथा उसके बाद कुछ दान भी करना चाहिए।इस दिन व्रत लेने वाला व्यक्ति खाने में चना की दाल, कद्दू की सब्जी, चावल एवं प्रसाद खाता है।दूसरा दिन खरना का दिन है जिस दिन व्रत की शुरुआत होती है।किसी किसी जगह खरना को लोहंडा के नाम से भी जाना जाता है।इस दिन महिलाएं पूरा दिन व्रत रखती है।इसके बाद शाम को मिट्टी के चूल्हे पर खीर का प्रसाद बनाया जाता है।लेकिन आपको यह ध्यान रखना है कि खीर में केवल गुड़ का प्रयोग ही होना चाहिए।शाम को छठी मैया की पूजा की जाती है तथा गुड़ की खीर को प्रसाद के रूप में बांटा जाता है।उसके बाद खीर खाकर 36 घंटे का कठिन निर्जला व्रत की शुरुआत की जाती है।तीसरा दिन छठी मैया तथा सूर्य देव वरुण देव की पूजा-अर्चना करनी चाहिए।इसी दिन निर्जला व्रत रखा जाता है।इसके बाद शाम को नदी या तालाब के किनारे ऋतु फल तथा शुद्ध घी से बने हुए पकवान इसे अस्त हो रहे सूर्य की पूजा अर्चना की जाती है।छठ पर्व के चौथे दिन उगते हुए सूर्य को अर्घ्य देने के बाद व्रत का पारण किया जाता है।छठ माता से संतान की रक्षा और पूरे परिवार की सुख शांति का वर मांगा जाता है।पूजा के बाद व्रत रखने वाला व्यक्ति कच्चे दूध का शरबत पीकर और थोड़ा प्रसाद खाकर पारण करते हैं।सुबह के अर्घ्य के साथ ही इस व्रत की समाप्ति हो जाती है।नहाय खाय (पहला दिन)छठ पूजा के पहले दिन में सबसे पहले स्नान के पश्चात साफ सफाई की जाती है और मन को तामसिक प्रवृत्ति से बचाने के लिए शाकाहारी भोजन ग्रहण किया जाता है।खरना (दूसरा दिन)यह छठ पूजा का दूसरा दिन होता है जिसे खरना भी कहा जाता है जिसका अर्थ होता है उपवास। इस दिन जो भी घर में व्रत रखता है वह एक बूंद भी जल की ग्रहण नहीं करता है। संध्या के समय पर गुड़ की खीर एवं घी लगी हुई रोटी तथा फलों का सेवन करते हैं, और बाकी सदस्यों को इसे प्रसाद के तौर पर दिया जाता है।संध्या अर्घ्य (तीसरा दिन)छठ पर्व का तीसरा दिन कार्तिक शुक्ल की षष्ठी को आता है इस दिन संध्या के समय सूर्य देव को अर्घ्य दिया जाता है तथा शाम को बांस की टोकरी में फल, ठेकुआ, चावल के लड्डू आदि से अर्घ्य का सूप सजाया जाता है। जिसके पश्चात व्रति अपने परिवार के साथ सूर्य को अर्घ्य देते हैं। अर्घ्य देते समय सूर्य को जल तथा दूध चढ़ाया जाता है और प्रसाद भरे सूप से छठी मैया की पूजा की जाती है, तथा इसके पश्चात रात्रि में छठी माता के गीत गाये जाते हैं और व्रत कथा सुनायी जाती है।उषा अर्घ्य (चौथा दिन)छठ पर्व के अंतिम दिन भी सुबह को सूर्यदेव को अर्घ्य दिया जाता है। इस दिन सूर्योदय से पहले नदी के घाट पर पहुंचकर उगते सूर्य को अर्घ्य देते हैं। इसके बाद छठ माता से संतान की रक्षा एवं पूरे परिवार की सुख-शांति का वरदान मांगा जाता है। पूजा के पश्चात व्रती कच्चे दूध का शरबत पीकर और थोड़ा प्रसाद ग्रहण करके अपना व्रत तोड़ते हैं, जिसे पारण या परना कहा जाता है।छठ पूजा सामग्रीप्रसाद रखने के लिए बांस की दो-तीन बड़ी टोकरी, कैराव, कपूर, कुमकुम, शहद की डिब्बी, पान और साबुत सुपारी, दूध और जल के लिए ग्लास, थाली, धूप और बड़ा दीपक, गन्ना जिसमें पत्ता लगा हो, सुथनी और शकरकंदी, चावल, नाशपाती और बड़ा वाला मीठा नींबू, हल्दी और अदरक का पौधा (हरा हो तो अच्छा है), लोटा (जिसे टाब भी कहते हैं), बांस या पीतल के बने तीन सूप, नए वस्त्र साड़ी-कुर्ता पजामा, पानी वाला नारियल, लाल सिंदूर, चन्दन, मिठाई।
राजकुमारी पाण्डेयएबीएन सोशल डेस्क। छठ पर्व षष्ठी का अपभ्रंश है। कार्तिक मास की अमावस्या को दिवाली मनाने के 6 दिन बाद कार्तिक शुक्ल को मनाये जाने के कारण इसे छठ कहा जाता है। यह चार दिनों का त्योहार है और इसमें साफ-सफाई का खास ध्यान रखा जाता है। इस त्योहार में गलती की कोई जगह नहीं होती। इस व्रत को करने के नियम इतने कठिन हैं, इस वजह से इसे महापर्व और महाव्रत के नाम से संबोधित किया जाता है।कौन हैं छठी मइया...मान्यता है कि छठ देवी सूर्य देव की बहन हैं और उन्हीं को प्रसन्न करने के लिए जीवन के महत्वपूर्ण अवयवों में सूर्य व जल की महत्ता को मानते हुए, इन्हें साक्षी मान कर भगवान सूर्य की आराधना तथा उनका धन्यवाद करते हुए मां गंगा-यमुना या किसी भी पवित्र नदी या पोखर (तालाब) के किनारे यह पूजा की जाती है। षष्ठी मां यानी छठ माता बच्चों की रक्षा करने वाली देवी हैं। इस व्रत को करने से संतान को लंबी आयु का वरदान मिलता है। मार्कण्डेय पुराण में इस बात का उल्लेख मिलता है कि सृष्टि की अधिष्ठात्री प्रकृति देवी ने अपने आप को छह भागों में विभाजित किया है। इनके छठे अंश को सर्वश्रेष्ठ मातृ देवी के रूप में जाना जाता है, जो ब्रह्मा की मानस पुत्री हैं। वो बच्चों की रक्षा करने वाली देवी हैं। कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की षष्ठी को इन्हीं देवी की पूजा की जाती है। शिशु के जन्म के छह दिनों बाद इन्हीं देवी की पूजा की जाती है। इनकी प्रार्थना से बच्चे को स्वास्थ्य, सफलता और दीर्घायु होने का आशीर्वाद मिलता है। पुराणों में इन्हीं देवी का नाम कात्यायनी बताया गया है, जिनकी नवरात्रि की षष्ठी तिथि को पूजा की जाती है।छठ व्रत कथाकथा के अनुसार प्रियव्रत नाम के एक राजा थे। उनकी पत्नी का नाम मालिनी था। दोनों की कोई संतान नहीं थी। इस बात से राजा और उसकी पत्नी बहुत दुखी रहते थे। उन्होंने एक दिन संतान प्राप्ति की इच्छा से महर्षि कश्यप द्वारा पुत्रेष्टि यज्ञ करवाया। इस यज्ञ के फलस्वरूप रानी गर्भवती हो गयीं।नौ महीने बाद संतान सुख को प्राप्त करने का समय आया तो रानी को मरा हुआ पुत्र प्राप्त हुआ। इस बात का पता चलने पर राजा को बहुत दुख हुआ। संतान शोक में वह आत्म हत्या का मन बना लिया। लेकिन जैसे ही राजा ने आत्महत्या करने की कोशिश की उनके सामने एक सुंदर देवी प्रकट हुईं। देवी ने राजा को कहा कि मैं षष्ठी देवी हूं। मैं लोगों को पुत्र का सौभाग्य प्रदान करती हूं। इसके अलावा जो सच्चे भाव से मेरी पूजा करता है, मैं उसके सभी प्रकार के मनोरथ को पूर्ण कर देती हूं। यदि तुम मेरी पूजा करोगे तो मैं तुम्हें पुत्र रत्न प्रदान करूंगी। देवी की बातों से प्रभावित होकर राजा ने उनकी आज्ञा का पालन किया।राजा और उनकी पत्नी ने कार्तिक शुक्ल की षष्टी तिथि के दिन देवी षष्टी की पूरे विधि-विधान से पूजा की। इस पूजा के फलस्वरूप उन्हें एक सुंदर पुत्र की प्राप्ति हुई। तभी से छठ का पावन पर्व मनाया जाने लगा।छठ व्रत के संदर्भ में एक अन्य कथा के अनुसार जब पांडव अपना सारा राजपाट जुए में हार गये, तब द्रौपदी ने छठ व्रत रखा। इस व्रत के प्रभाव से उसकी मनोकामनाएं पूरी हुईं तथा पांडवों को राजपाट वापस मिल गया।
भगवान बिरसा मुंडा जयंती पर रांची के बिरसा चौक स्थित उनकी प्रतिमा पर विहिप के माल्यार्पण व उन्हें नमन किया गया टीम एबीएन, रांची। आज 15 नवंबर 2023 को भगवान बिरसा मुंडा जयंती पर विश्व हिंदू परिषद् रांची ने बिरसा चौक स्थित उनकी प्रतिमा पर माल्यार्पण कर उन्हें नमन किया। मौके पर विश्व हिंदू परिषद के प्रांत सामाजिक समरसता प्रमुख मिथिलेश्वर मिश्र ने कहा कि भगवान बिरसा मुंडा झारखंड के ऐसे स्वतंत्रता सेनानी थे, जो देश की स्वतंत्रता के लिए जीवनपर्यंत अंग्रेजों से लड़ते रहे। उन्होंने अंग्रेज मिशनरियों द्वारा जनजाति समाज के बीच सेवा और शिक्षा की आड़ में कराये जा रहे धर्मांतरण का पुरजोर विरोध किया। वे राष्ट्र के साथ-साथ स्वधर्म के भी रक्षक थे। उन्होंने जनजाति समाज के संस्कृति और परंपरा को बचाए रखने की दिशा में निरंतर प्रयास किया। श्री मिश्र ने कहा कि उनके द्वारा धारण किया हुआ धनुष-बाण शौर्य और पराक्रम की गाथा तथा उनका जनेऊ सामाजिक समरसता का प्रतीक है। आज उनकी जन्म जयंती पर झारखंड के साथ-साथ समस्त देश जनजातीय गौरव दिवस मना रहा है। राष्ट्र एवं स्वधर्म के लिए उनके कृतित्व का स्मरण करते हुए उनके दिखाये मार्ग पर चलकर झारखंड की समस्याओं का निदान करते हुए इसके विकास के लक्ष्य को प्राप्त करना उनके प्रति श्रद्धांजलि होगी। भगवान बिरसा मुंडा को श्रद्धा सुमन अर्पित करने वालों में विश्व हिंदू परिषद के प्रांत मातृशक्ति प्रमुख दीपारानी कुंज, रांची महानगर अध्यक्ष कैलाश केसरी, महानगर मंत्री चंद्रदीप दुबे, महानगर सहमंत्री विश्वरंजन कुमार, मुकेश गिरी, विजय कुमार मिश्र, शुभम केसरी, चंदा देवी सहित अन्य लोग उपस्थित थे। उक्त जानकारी विश्व हिंदू परिषद, झारखंड के प्रचार प्रसार प्रांत सह प्रमुख प्रकाश रंजन (9334433338) ने एक प्रेस विज्ञप्ति जारी कर दी।
क्या है रक्षाबंधन और भाई दूज में अंतर... राजकुमारी पाण्डेय एबीएन सोशल डेस्क। भैया दूज पर्व कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि को मनाया जाता है। इस दिन बहनें रोली एवं अक्षत से अपने भाई का तिलक कर उसके उज्ज्वल भविष्य के लिए आशीष देती हैं। भैया दूज पौराणिक कथा भैया दूज के संबंध में पौराणिक कथा इस प्रकार से है। सूर्य की पत्नी संज्ञा से 2 संतानें थीं, पुत्र यमराज तथा पुत्री यमुना। संज्ञा सूर्य का तेज सहन न कर पाने के कारण अपनी छायामूर्ति का निर्माण कर उन्हें ही अपने पुत्र-पुत्री को सौंपकर वहां से चली गयी। छाया को यम और यमुना से अत्यधिक लगाव तो नहीं था, किंतु यमुना अपने भाई यमराज से बड़ा स्नेह करती थीं। यमुना अपने भाई यमराज के यहां प्राय: जाती और उनके सुख-दु:ख की बातें पूछा करती। तथा यमुना, यमराज को अपने घर पर आने के लिए भी आमंत्रित करतीं, किंतु व्यस्तता तथा अत्यधिक दायित्व के कारण वे उसके घर न जा पाते थे। एक बार कार्तिक शुक्ल द्वितीया को यमराज अपनी बहन यमुना के घर अचानक जा पहुंचे। बहन के घर जाते समय यमराज ने नरक में निवास करने वाले जीवों को मुक्त कर दिया। बहन यमुना ने अपने सहोदर भाई का बड़ा आदर-सत्कार किया। विविध व्यंजन बनाकर उन्हें भोजन कराया तथा भाल पर तिलक लगाया। जब वे वहां से चलने लगे, तब उन्होंने यमुना से कोई भी मनोवांछित वर मांगने का अनुरोध किया। यमुना ने उनके आग्रह को देखकर कहा : भैया! यदि आप मुझे वर देना ही चाहते हैं तो यही वर दीजिए कि आज के दिन प्रतिवर्ष आप मेरे यहां आया करेंगे और मेरा आतिथ्य स्वीकार किया करेंगे। इसी प्रकार जो भाई अपनी बहन के घर जाकर उसका आतिथ्य स्वीकार करे तथा इस दिन जो बहन अपने भाई को टीका करके भोजन खिलाये, उसे आपका भय न रहे। इसी के साथ उन्होंने यह भी वरदान दिया कि यदि इस दिन भाई-बहन यमुना नदी में डुबकी लगायेंगे तो वे यमराज के प्रकोप से बचे रहेंगे। यमुना की प्रार्थना को यमराज ने स्वीकार कर लिया। तभी से बहन-भाई का यह त्यौहार मनाया जाने लगा। भैया दूज त्यौहार का मुख्य उद्देश्य, भाई-बहन के मध्य सद्भावना, तथा एक-दूसरे के प्रति निष्कपट प्रेम को प्रोत्साहित करना है। भैया दूज के दिन ही पांच दीनो तक चलने वाले दीपावली उत्सव का समापन भी हो जाता है। इस दिन अगर अपनी बहन न हो तो ममेरी, फुफेरी या मौसेरी बहनों को उपहार देकर ईश्वर का आशीर्वाद प्राप्त कर सकते हैं। जो पुरुष यम द्वितीया को बहन के हाथ का खाना खाता है, उसे धर्म, धन, अर्थ, आयुष्य और विविध प्रकार के सुख मिलते हैं। साथ ही यम द्वितीय के दिन शाम को घर में बत्ती जलाने से पहले घर के बाहर चार बत्तियों से युक्त दीपक जलाकर दीप-दान करना भी फलदायी होता है। भाई दूज एवं रक्षाबंधन के बीच समानता व अंतर भाई दूज एवं रक्षाबंधन दोनो ही भाई व बहन के बीच मनाया जाने वाले पर्व है। दोनों में पूजा करने के नियम भी लगभग समान ही हैं। रक्षाबंधन में बहने अपने भाई की कलाई पर रक्षासूत्र बंधती हैं जबकि भाई दूज के दिन माथे पर तिलक लगातीं हैं। भाई दूज पर मुख्यतया भाइयों का अपनी विवाहित बहनों के घर जाकर तिलक लगवाते हैं। जबकि रक्षाबंधन के दिन बहने अपने भाई के घर आकर राखी/रक्षासूत्र बांधती हैं। भाई दूज के पूजा विधि इस दिन बहनें पूजा की थाली सजाती हैं। अपने भाई को तिलक लगाती हैं और आरती करती हैं। थाली में फल, फूल, मिठाई, कुमकुम, चंदन, रोली, सुपारी आदि सामग्री रखी जाती है। चावल के आटे से चौक बनाकर वहां अपने भाई का बिठायें उसके बाद शुभ मुहूर्त देखकर भाई का तिलक करें। माथे पर तिलक और चावल लगायें। मिठाई खिलायें। इसके बाद उसे फूल, सुपारी, काले चने, बताशे, सूखा नारियल आदि चीजें दें। फिर अंत में आरती करें। इसके बाद भाई अपनी बहनों को तोहफा देकर हमेशा उसकी रक्षा करने का वचन देते हैं।
एबीएन सोशल डेस्क। दिवाली बीतते ही सनातन धर्म में हर रोज कोई न कोई पूजा होती होती है, जिनमें गोवर्धन पूजा प्रमुख है।एक समय की बात है श्रीकृष्ण अपने मित्र ग्वालों के साथ पशु चराते हुए गोवर्धन पर्वत जा पहुंचे। वहां उन्होंने देखा कि बहुत से व्यक्ति एक उत्सव मना रहे हैं। श्रीकृष्ण ने इसका कारण जानना चाहा, तो वहां उपस्थित गोपियों ने उन्हें कहा कि आज यहां मेघ व देवों के स्वामी इंद्रदेव की पूजा होगी और फिर इंद्रदेव प्रसन्न होकर वर्षा करेंगे। फलस्वरूप खेतों में अन्न उत्पन्न होगा और ब्रजवासियों का भरण-पोषण होगा। यह सुनकर श्रीकृष्ण सबसे बोले कि इंद्र से अधिक शक्तिशाली तो गोवर्धन पर्वत है, जिनके कारण यहां वर्षा होती है और इसलिए सभी को गोवर्धन पर्वत की पूजा करनी चाहिए। श्रीकृष्ण की बात से सहमत होकर सभी गोवर्धन पर्वत की पूजा करने लगे। जब यह बात इंद्रदेव को पता चली, तो उन्होंने क्रोधित होकर मेघों को आज्ञा दी कि वे गोकुल में जाकर मूसलाधार बारिश करें। बारिश से भयभीत होकर सभी गोपियां-ग्वाले श्रीकृष्ण के पास गये और उन्हें इस बारे में जानकारी दी। यह जानकर श्रीकृष्ण ने सबको गोवर्धन-पर्वत की शरण में चलने के लिए कहा। सभी गोपियां-ग्वाले अपने पशुओं समेत गोवर्धन पर्वत की शरण में आ गये। तत्पश्चात श्री कृष्ण ने गोवर्धन पर्वत को अपनी कनिष्ठा पर उठाकर छाते-सा तान दिया। इन्द्रदेव के मेघ सात दिन तक निरंतर बरसते रहे, किन्तु श्री कृष्ण के सुदर्शन चक्र के प्रभाव से ब्रजवासियों पर जल की एक बूंद भी नहीं पड़ी। यह अद्भुत चमत्कार देखकर इन्द्रदेव असमंजस में पड़ गये। तब ब्रह्मा जी ने उन्होंने बताया कि श्रीकृष्ण भगवान विष्णु के अवतार हैं। सत्य जानकर इंद्रदेव श्रीकृष्ण से क्षमा याचना करने लगे।श्रीकृष्ण ने इन्द्रदेव के अहंकार को चूर-चूर कर दिया था। अत: उन्होंने इन्द्रदेव को क्षमा किया और सातवें दिन गोवर्धन पर्वत को भूमि तल पर रखा और ब्रजवासियों से कहा कि अब वे हर वर्ष गोवर्धन पूजा कर अन्नकूट का पर्व मनायें। तभी से यह पर्व प्रचलित है और आज भी पूर्ण श्रद्धा भक्ति से मनाया जाता है। गोवर्धन व्रत की पूजा विधि लोग अपने घर में गोबर से गोवर्धन पर्वत का चित्र बनाकर उसे फूलों से सजाते हैं। गोवर्धन पर्वत के पास पेड़ पौधों की आकृति बनायी जाती है। इसके बीच में भगवान कृष्ण की मूर्ति रखी जाती है। गोवर्धन पूजा सुबह के समय की जाती है। पूजा के समय गोवर्धन पर धूप, दीप, जल, फल, नैवेद्य चढ़ाये जाते हैं और तरह-तरह के पकवानों का भोग लगाया जाता है। इसके बाद गोवर्धन पूजा की व्रत कथा सुनी जाती है और प्रसाद सभी में बांटा जाता है। पूजा के बाद गोवर्धन जी की सात परिक्रमाएं लगाते हुए उनकी जय बोली जाती है। गोवर्धन पूजा की सामग्री गोबर, रोली, मौली, चावल, कच्चा दूध, फूल, फूलों की माला, गन्ने, बताशे, चावल, मिट्टी का दिया, धूप, दीपक, नैवेद्य, फल, मिठाई, दूध, दही, शहद, घी, शक्कर, भगवान कृष्ण की फोटो।
सज-धज कर तैयार शहरएबीएन सोशल डेस्क। दीपावली करीब आते ही बाजार, गली मोहल्ले सजने लगे हैं। चारों तरफ दिवाली की रौनक नजर आ रही है। सजावट के सामान से बाजार भर गया है। लौहनगरी जमशेदपुर शहर में भी दीपावली की रौनक देखते ही बन रही है। हर घर को दुल्हन की तरह सजाया संवारा जा रहा है, वहीं सजावट के लिए बाजार में कई शानदार झालर और मोतियों से बने सामान बिक रहे हैं। लोगों ने अपने-अपने घरों को सजाने के लिए खरीदारी कर रहे हैं। प्रदेशभर में लोग जोर शोर से रंग-बिरंगे आकर्षक झालरों और सजावट की सामान खरीदने में व्यस्त है। इसे बाजार में रौकन बढ़ती जा रही है खरीदारों में भी जबरदस्त उत्साह देखने को मिल रहा है। बाजार में बड़ी संख्या में सजावट के समान की दुकानों पर भीड़ नजर आ रही है।दीपावली पर माटी की खुशबू से महक उठावहीं इस बार बाजार में गंगा मिट्टी के बने दीपावली घर, दीये और घर में सजावट के समान लोगों को अपनी ओर बेहद आकर्षित कर रहा है। देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी लोगों से लोकल का स्वर को बढ़ावा देने की अपील की है। उसका असर जमशेदपुर शहर में देखने को मिल रहा है। इस बार जमशेदपुर शहर के लोग दीपावली पर कुम्हार के हाथों से बने मिट्टी के दीये की खरीदारी जम कर रहे हैं।बोकारो से आये कुम्हार दीये और घर में सजावट के सामान बनाकर शहर में बेच रहे हैं। कुम्हारों का कहना है कि हमें एक साल का इंतजार रहता है। दीपावली आने से पहले हम मेहनत में जुट जाते है और इसकी तैयारी करते हैं। जिसे लोग जमकर पसंद करते हैं और इसकी बिक्री भी खूब होती है।शहर के लोगों का कहना है कि देश के प्रधानमंत्री ने भी लोकल का स्वर को बढ़ावा देने के लिए अपील की है। अपील को लेकर भी हम लोग मिट्टी के सामानों का ज्यादा से ज्यादा उपयोग करते हैं। जिससे हमारे पर्यावरण भी सुरक्षित रहे और कुम्हार भाइयों का भी रोजगार चल सके।लोगों ने बताया कि बचपन में खुद हम हाथों से मिट्टी के दीपावली घर बनाते थे। वहीं आज के जमाने में लोग इसे भूलते जा रहे हैं हम अपने बच्चों को अपनी संस्कृति भूलने नहीं देते हैं। इस वजह से गंगा मिट्टी के बने दीपावली घर और मिट्टी के दीये का उपयोग कर अपने बच्चों को अपनी संस्कृति सीख देते हैं।दिवाली का सज गया बाजार, बढ़ने लगी रौनकझारखंड में दीपावली का बाजार सज गया है। बाजार में मिट्टी से बने दीये और अन्य सामान लोगों की पसंद बन रहे हैं। झारखंड में धनबाद, रांची और बोकारो में मिट्टी के सामान की मांग ज्यादा रहती है। दीपावली के अवसर पर बाजार सजने लगे है। बाजार में लोग खरीदारी के लिए पहुंच रहे हैं, जिसे बाजार में दिनभर भीड़ नजर आ रही है।लोग घरों को सजाने के लिए कई तरह के सामान की खरीदारी कर रहे हैं। वहीं इसबार दीपावली पर झारखंड में लोग लोकल फॉर वोकल पर ज्यादा जोर दे रहे हैं। वहीं, दुकानदार भी मेड इन इंडिया की बढ़ते क्रेज को देख मेड इन इंडिया की सामान को बाजार में उतार दिया है।
राजकुमारी पाण्डेयएबीएन एडिटोरियल डेस्क। दीपावली स्वच्छता अभियान का त्योहार है। इस दिन घरों की पुताई करवायी जाती है। उबटन से स्नान कर नये-नये कपड़े पहने जाते हैं और सभी साफ-सफाई का विशेष ध्यान रखते हैं। इस दौरान दीप जलाना, रंगोली बनाना, माता लक्ष्मी की पूजा करना, मिठाई बांटना, अच्छे-अच्छे पकवान बनाना और नई-नई वस्तुएं खरीदने का महत्व है। हिन्दुओं के प्रमुख त्योहार दीपावली का उत्सव 5 दिनों तक चलता है। दक्षिण भारत और उत्तर भारत में इस त्योहार को अलग-अलग दिन और तरीके से मनाया जाता है। दक्षिण भारत में दिवाली के 1 दिन पहले यानी नरक चतुर्दशी का विशेष महत्व है। इस दिन मनाया जाने वाला उत्सव दक्षिण भारत के दिवाली उत्सव का सबसे प्रमुख दिन होता है। जबकि उत्तर भारत में यह त्योहार 5 दिन का होता है, जो धनतेरस से शुरू होकर नरक चतुर्दशी, मुख्य पर्व दीपावली, गोवर्धन पूजा से होते हुए भाई दूज पर समाप्त होता है। आइये इन पांचों दिनों के बारे में संक्षिप्त में जानें :-पहला दिन : पहले दिन को धनतेरस कहते हैं। दीपावली महोत्सव की शुरुआत धनतेरस से होती है। इसे धन त्रयोदशी भी कहते हैं। धनतेरस के दिन मृत्यु के देवता यमराज, धन के देवता कुबेर और आयुवेर्दाचार्य धन्वंतरि की पूजा का महत्व है। इसी दिन समुद्र मंथन में भगवान धन्वंतरि अमृत कलश के साथ प्रकट हुए थे और उनके साथ आभूषण व बहुमूल्य रत्न भी समुद्र मंथन से प्राप्त हुए थे। तभी से इस दिन का नाम धनतेरस पड़ा और इस दिन बर्तन, धातु व आभूषण खरीदने की परंपरा शुरू हुई। दूसरा दिन : दूसरे दिन को नरक चतुर्दशी, रूप चौदस और काली चौदस कहते हैं। इसी दिन नरकासुर का वध कर भगवान श्रीकृष्ण ने 16,100 कन्याओं को नरकासुर के बंदीगृह से मुक्त कर उन्हें सम्मान प्रदान किया था। इस उपलक्ष्य में दीयों की बारात सजायी जाती है। इस दिन को लेकर मान्यता है कि इस दिन सूर्योदय से पूर्व उबटन एवं स्नान करने से समस्त पाप समाप्त हो जाते हैं और पुण्य की प्राप्ति होती है। वहीं इस दिन से एक ओर मान्यता जुड़ी हुई है जिसके अनुसार इस दिन उबटन करने से रूप व सौंदर्य में वृद्धि होती है। तीसरा दिन : तीसरे दिन को दीपावली कहते हैं। यही मुख्य पर्व होता है। दीपावली का पर्व विशेष रूप से मां लक्ष्मी के पूजन का पर्व होता है। कार्तिक माह की अमावस्या को ही समुद्र मंथन से मां लक्ष्मी प्रकट हुई थीं जिन्हें धन, वैभव, ऐश्वर्य और सुख-समृद्धि की देवी माना जाता है। अत: इस दिन मां लक्ष्मी के स्वागत के लिए दीप जलाये जाते हैं ताकि अमावस्या की रात के अंधकार में दीपों से वातावरण रोशन हो जाये। इस दिन रात्रि को धन की देवी लक्ष्मी माता का पूजन विधिपूर्वक करना चाहिए एवं घर के प्रत्येक स्थान को स्वच्छ करके वहां दीपक लगाना चाहिए जिससे घर में लक्ष्मी का वास एवं दरिद्रता का नाश होता है। इस दिन देवी लक्ष्मी, भगवान गणेश तथा द्रव्य, आभूषण आदि का पूजन करके 13 अथवा 26 दीपकों के मध्य 1 तेल का दीपक रखकर उसकी चारों बातियों को प्रज्ज्वलित करना चाहिए एवं दीपमालिका का पूजन करके उन दीपों को घर में प्रत्येक स्थान पर रखें एवं 4 बातियों वाला दीपक रातभर जलता रहे, ऐसा प्रयास करें। चौथा दिन : चौथे दिन अन्नकूट या गोवर्धन पूजा होती है। कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा को गोवर्धन पूजा एवं अन्नकूट उत्सव मनाना जाता है। इसे पड़वा या प्रतिपदा भी कहते हैं। खासकर इस दिन घर के पालतू बैल, गाय, बकरी आदि को अच्छे से स्नान कराकर उन्हें सजाया जाता है। फिर इस दिन घर के आंगन में गोबर से गोवर्धन बनाये जाते हैं और उनका पूजन कर पकवानों का भोग अर्पित किया जाता है। इस दिन को लेकर मान्यता है कि त्रेतायुग में जब इन्द्रदेव ने गोकुलवासियों से नाराज होकर मूसलधार बारिश शुरू कर दी थी, तब भगवान श्रीकृष्ण ने अपनी छोटी अंगुली पर गोवर्धन पर्वत उठाकर गांववासियों को गोवर्धन की छांव में सुरक्षित किया। तभी से इस दिन गोवर्धन पूजन की परंपरा भी चली आ रही है। पांचवां दिन : इस दिन को भाई दूज और यम द्वितीया कहते हैं। भाई दूज, पांच दिवसीय दीपावली महापर्व का अंतिम दिन होता है। भाई दूज का पर्व भाई-बहन के रिश्ते को प्रगाढ़ बनाने और भाई की लंबी उम्र के लिए मनाया जाता है। रक्षाबंधन के दिन भाई अपनी बहन को अपने घर बुलाता है जबकि भाई दूज पर बहन अपने भाई को अपने घर बुलाकर उसे तिलक कर भोजन कराती है और उसकी लंबी उम्र की कामना करती है। इस दिन को लेकर मान्यता है कि यमराज अपनी बहन यमुनाजी से मिलने के लिए उनके घर आए थे और यमुनाजी ने उन्हें प्रेमपूर्वक भोजन कराया एवं यह वचन लिया कि इस दिन हर साल वे अपनी बहन के घर भोजन के लिए पधारेंगे। साथ ही जो बहन इस दिन अपने भाई को आमंत्रित कर तिलक करके भोजन कराएगी, उसके भाई की उम्र लंबी होगी। तभी से भाई दूज पर यह परंपरा बन गई। दूसरी मान्यता के अनुसार इस दिन भगवान रामचंद्रजी माता सीता और भाई लक्ष्मण के साथ 14 वर्षों का वनवास समाप्त कर घर लौटे थे। श्रीराम के स्वागत हेतु अयोध्यावासियों ने घर-घर दीप जलाए थे और नगरभर को आभायुक्त कर दिया था। तभी से दीपावली के दिन दीप जलाने की परंपरा है। 5 दिवसीय इस पर्व का प्रमुख दिन लक्ष्मी पूजन अथवा दीपावली होता है।
श्रीराम के वनवास लौटने की खुशी में मनायी जाती है दिवाली, फिर क्यों होती है लक्ष्मी और गणेश की पूजाएबीएन एडिटोरियल डेस्क। कहा जाता है कि कार्तिक मास अमावस्या के दिन प्रभु श्रीराम 14 वर्ष का वनवास पूरा करके और रावण का वध करने के बाद अयोध्या वापस लौट कर आये थे। उस समय लोगों ने श्री राम के लौटने की खुशी में घरों को दियों से रोशन किया था। तब से ये त्यौहार रोशनी का पर्व बन गया। हर साल दीपावली के मौके पर लोग घरों को दीयों, मोमबत्ती और लाइट्स से रौशन करते हैं, लेकिन कभी आपने यह सोचा है कि जब श्री राम के लौटने की खुशी के तौर पर यह पर्व मनाया जाता है तो इस दिन माता लक्ष्मी और गणेश जी का पूजन क्यों किया जाता है।माता लक्ष्मी की पूजाकार्तिक मास की अमावस्या तिथि को ही माता लक्ष्मी के अमृत मंथन से प्रकट हुई थी इसलिए माता लक्ष्मी की पूजा दीपावली के दिन की जाती है। माता लक्ष्मी के साथ गणेश जी के पूजा का मुख्य कारण हिंदू धर्म में भगवान श्री गणेश को प्रथम देवता के रूप में पूजा जाता है।इसलिए किसी भी मांगलिक कार्य को शुरू करने से पहले भगवान गणेश की पूजा अनिवार्य होती है। मान्यता है कि ऐसा करने से सभी कार्य सफल होते हैं और उनका सकारात्मक फल व्यक्ति को प्राप्त होता है। शास्त्रों में यह भी बताया गया है की दीपावली के दिन लक्ष्मी पूजन के समय विष्णु जी की नहीं बल्कि गणेश जी की पूजा जरूर होनी चाहिए। किंवदंतियों के अनुसार माता लक्ष्मी ने भगवान विष्णु से एक चर्चा करते समय यह कहा था कि मैं धन-धान्य, ऐश्वर्य सभी चीजों का वरदान देती हूं। मेरी कृपा से ही सभी भक्तों सुख की प्राप्ति होती है। ऐसे में मेरी पूजा सबसे सर्वश्रेष्ठ होनी चाहिए। भगवान विष्णु ने माता लक्ष्मी के इस अहंकार को जान लिया और इसे तोड़ने का फैसला किया। भगवान विष्णु ने माता लक्ष्मी से कहा कि आप भले ही सुख, समृद्धि प्रदान करती हैं, लेकिन किसी भी स्त्री को मातृत्व का सुख न मिलने से उसका नारीत्व अपूर्ण रह जाता है। इसलिए आपकी पूजा सर्वश्रेष्ठ नहीं मानी जा सकती है।यह बात सुनकर मां लक्ष्मी बहुत निराश हुईं और माता पार्वती के पास अपनी व्यथा सुनाने पहुंची। मां लक्ष्मी की पीड़ा को देखते हुए माता पार्वती ने अपने पुत्र गणेश को उन्हें दत्तक पुत्र के रूप में सौंप दिया। इस बात से प्रसन्न होकर माता ने यह घोषणा की कि व्यक्ति को लक्ष्मी के साथ गणेश जी की उपासना करने से ही धन, ऐश्वर्य की प्राप्ति होगी। तभी से दिवाली पर पर माता लक्ष्मी के साथ गणेश जी की पूजा की जाती है।
फटाफट निपटा लें जरूरी काम दिवाली के पांच दिन के त्योहार (धनतेरस, छोटी दीवाली, दीवाली, गोवर्धन पूजा भाई दूज आदि) के दौरान बैंक में अवकाश रहेगा एबीएन सोशल डेस्क। दीवाली के अवसर पर बैंक की लंबी छुट्टियां शुरू होने वाली है। धनतेरस से लेकर भाई दूज तक देश के अलग-अलग राज्यों में कई दिन बैंक बंद रहेंगे। अगर आप बैंक से जुड़े काम करने के बारे में सोच रहे हैं तो बैंक जाने से पहले हॉलिडे लिस्ट जरूर चेक कर लें।आइये, जानते हैं किस-किस बैंक की रहेगी छुट्टीदिवाली के पांच दिन के त्योहार (धनतेरस, छोटी दीवाली, दीवाली, गोवर्धन पूजा भाई दूज आदि) के दौरान बैंक में अवकाश रहेगा। देखें छुट्टी की लिस्ट 10 नवंबर (शुक्रवार): बांगला महोत्सव, मेघालय। 11 नवंबर (दूसरा शनिवार) : छोटी दीवाली। 12 नवंबर (रविवार) : दिवाली। 13 नवंबर (सोमवार) : त्रिपुरा, उत्तराखंड, सिक्किम, मणिपुर, राजस्थान, यूपी और महाराष्ट्र में गोवर्धन पूजा के पर्व पर बैंक रहेंगे बंद।14 नवंबर (मंगलवार) : दिवाली झ्र गुजरात, महाराष्ट्र, कर्नाटक और सिक्किम के बैंकों की रहेगी छुट्टी। 15 नवंबर, 2023 (बुधवार) : भाईदूज : सिक्किम, मणिपुर, उत्तर प्रदेश, बंगाल और हिमाचल प्रदेश में बैंक रहेंगे बंद। इसके अलावा, जानें नवंबर और कितने दिन बैंक की होगी छुट्टी 19 नवंबर, 2023- रविवार। 20 नवंबर, 2023- छठ महापर्व के दिन पटना और रांची के बैंकों की रहेगी छुट्टी। 23 नवंबर, 2023- सेंग कुट स्नेम/इगास बग्वाल के अवसर पर देहरादून और शिलांग में बैंकों की होगी छुट्टी। 25 नवंबर, 2023- चौथा शनिवार। 26 नवंबर, 2023- रविवार। 27 नवंबर, 2023- गुरु नानक जयंती/ कार्तिक पूर्णिमा के कारण अहमदाबाद, बेंगलुरु, चेन्नई, गंगटोक, गुवाहाटी, हैदराबाद, इंफाल, कोच्चि, पणजी, पटना, त्रिवेंद्रम और शिलांग अलावा पूरे देश में बैंक रहेंगे बंद। 30 नवंबर, 2023- कनकदास जयंती के अवसर बेंगलुरु में बैंक बंद।
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