Breaking
ताज़ा समाचार लोड हो रहा है...
होम देश झारखंड खेल समाचार राज काज कानून व्यवस्था करियर बिजनेस वर्ल्ड हेल्थ विचार ज्ञान विज्ञान समाज वन और पर्यावरण मनोरंजन बिहार विज्ञापन

समाज

View All
माता मोर्वी क आंगणियो मं लियो अवतार बैठयो रांची मं लगाकर दरबार श्याम धणी राज करे
Published / 2023-11-23 21:21:00
माता मोर्वी क आंगणियो मं लियो अवतार बैठयो रांची मं लगाकर दरबार श्याम धणी राज करे

एबीएन सोशल डेस्क। अग्रसेन पथ स्थित श्री श्याम मन्दिर में दिनांक 23 नवंबर 2023 को कार्तिक शुक्ला देवोत्थान एकादशी के पावन दिन कलयुग अवतारी श्री श्याम प्रभु का जन्मोत्सव अत्यंत धूमधाम के साथ भक्तिभाव के वातावरण में आयोजित किया गया।ज्ञात्त्व है की द्वापर में माता मोर्वी के आंगन में कार्तिक शुक्ला एकादशी को श्री श्याम प्रभु ने अवतार लिया और शिशदान के पश्चात श्री कृष्ण से वर पाकर कलयुग में खाटू धाम में प्रगट हुए।  मौके पर सर्व प्रथम प्रात: 10:30 श्री लक्ष्मी वेंकटश्वर अन्नपूर्णा सेवा तिरुपति मंदिर द्वारा संचालित अन्नपूर्णा सेवा में श्री श्याम मंडल द्वारा अन्नपूर्णा सेवा का कार्यक्रम का किया गया साथ ही आज के एकादशी के उपलक्ष में पूरे मंदिर परिसर को विद्युत की रंगीन लड़ियों, रंगीन बैलून व फूलों से अत्यन्त कलात्मक ढंग से सजाया गया।  अहले प्रात: काल में श्री श्याम प्रभु को नवीन वस्त्र (बागा) पहनाकर स्वर्ण आभूषणों से अलंकृत कर 21 प्रजातियों विशेष कर गुलाब, जूही, बेला, मोगरा, जरबेरा, आर्किड, गैंदा के ताजे फूलों से अद्भुत मनभावन श्रृंगार किया गया साथ ही मंदिर में विराजमान बजरंगबली एवम शिव परिवार का भी इस अवसर पर विशेष श्रृंगार किया गया।  मुख्य कार्यक्रम रात्रि 9 बजे श्री श्याम प्रभु के जय जयकारों के बीच अखण्ड ज्योत प्रज्वलित की गई और उपस्थित भक्तगण श्री श्याम प्रभु के जयकारों से मन मयूर नाच उठा। श्री श्याम मंडल के सदस्यों ने सर्व प्रथम गणेश वंदना के साथ संगीतमय संकीर्तन प्रारंभ किया।  माता मोर्वी क आंगणियों मं श्याम लियो अवतार बैठ्यो रांची मं लगाकर दरबार श्याम धनी राज करे हारा हू बाबा बस तुझपे भरोसा है जीतूँगा एक दिन, मेरा दिल ये कहता है जिस के घर में खाटू वाले की तस्वीर लगाई जाती है जिस घर में नीले वाले की नित जोत जगाई जाती है खाटू वाले श्याम जी कमाल हो गया, बंदा तेरा बाबा, मालामाल हो गया ग्यारस चांदण की आई भगता मिल ज्योत जगाई झांझ मजीरा बाजे आंगणे इत्यादि भजनों की लय पर श्याम भक्तगण श्याम मस्ती में झूम रहे थे।  मौके पर श्री श्याम प्रभु को श्री श्याम प्रभु का प्रिय खीर चूरमा का भोग अर्पित कर विभिन्न प्रकार के मिष्ठान - फल - मेवा - केसरिया दूध - मगही पान का भोग अर्पित किया गया ।  रात्रि 1 बजे महाआरती व प्रसाद वितरण के साथ कार्यक्रम का समापन किया गया साथ आज के इस कार्यक्रम का श्याम मंडल, रांची के अपने यूट्यूब चैनल पर सीधा प्रसारण किया गया।  आज के कार्यक्रम को सफल बनाने में रमेश सारस्वत, ओम जोशी, गोपी किशन ढांढनीयां, चन्द्र प्रकाश बागला, धीरज बंका, बालकिशन परसरामपुरिया, प्रदीप अग्रवाल, प्रमोद बगड़िया, अमित जलान, विकास पाड़िया, नितेश केजरीवाल का विशेष सहयोग रहा। उक्त जानकारी श्री श्याम मंडल श्री श्याम मंदिर, अग्रसेन पथ रांची के मीडिया प्रभारी सुमित पोद्दार (9835331112) ने एक प्रेस विज्ञप्ति जारी कर दी।

माहेश्वरी महिला चौपाल ने मनाया दिवाली मिलन समारोह
Published / 2023-11-23 21:10:31
माहेश्वरी महिला चौपाल ने मनाया दिवाली मिलन समारोह

टीम एबीएन, रांची। माहेश्वरी महिला चौपाल  के सौजन्य से माहेश्वरी भवन में दिवाली मिलन समारोह मनाया गया। इस चौपाल ग्रुप में माहेश्वरी समाज की वरिष्ठ 55 महिलाएं शामिल हैं। दीपावली एवं तुलसी विवाह के उद्देश्य से भवन में महिलाओं के लिए कार्यक्रम की की तैयारी की गयी। सभी महिलाएं दिवाली मिलन समारोह के लिए भारतीय परिधान में अच्छे से तैयार होकर एक दूसरे को दिवाली की शुभकामनाएं दी। सभी ने पहले तुलसी बिरले को दुल्हन की तरह सजाया, चारों ओर दीये की रोशनी से सजा कर तुलसी एवं शालिग्राम जी के भजन गाये, महा आरती की, तरह तरह के गेम्स खेले, लजीज व्यंजन का आनंद उठाया। इस कार्यक्रम में सुमन चितलांगिया, संगीत चितलांगिया, रेनू फलोर, इंदु, कविता, किरण  बियानी, ममता बांगर ,विजयश्री साबू, कुमुद लखोटिया, शशि डागा, विजयश्री साबू, उषा डागा, सरला सारदा, उषा सोमानी, शिखा बिरला, राधा चितलांगिया, प्रेमलता, नीलू साबू, उमा साबू, मंजू काबरा, प्रीति, रेखा बिहानी,  उमा साबू, संगीता बांगर, उषा काबरा, सरिता खटोर, रेनू काबरा,प्रमिला सोमानी उर्मिला सोमानी, आदि का साथ रहा। उक्त जानकारी रश्मि मालपानी ने एक प्रेस विज्ञप्ति जारी कर दी।

क्या है तुलसी विवाह व्रत कथा
Published / 2023-11-23 09:04:38
क्या है तुलसी विवाह व्रत कथा

राजकुमारी पाण्डेयएबीएन सोशल डेस्क। एक बार शिव जी ने अपने तेज को समुद्र में फेंक दिया था। उससे एक महातेजस्वी बालक ने जन्म लिया। यह बालक आगे चलकर जालंधर के नाम से पराक्रमी दैत्य राजा बना। इसकी राजधानी का नाम जालंधर नगरी था।दैत्यराज कालनेमी की कन्या वृंदा का विवाह जालंधर से हुआ। जालंधर महाराक्षस था। अपनी सत्ता के मद में चूर उसने माता लक्ष्मी को पाने की कामना से युद्ध किया, परंतु समुद्र से ही उत्पन्न होने के कारण माता लक्ष्मी ने उसे अपने भाई के रूप में स्वीकार किया।वहां से पराजित होकर वह देवी पार्वती को पाने की लालसा से कैलाश पर्वत पर गया।भगवान देवाधिदेव शिव का ही रूप धर कर माता पार्वती के समीप गया, परंतु मां ने अपने योगबल से उसे तुरंत पहचान लिया तथा वहां से अंतर्ध्यान हो गयीं। देवी पार्वती ने क्रुद्ध होकर सारा वृतांत भगवान विष्णु को सुनाया। जालंधर की पत्नी वृंदा अत्यन्त पतिव्रता स्त्री थी। उसी के पतिव्रत धर्म की शक्ति से जालंधर न तो मारा जाता था और न ही पराजित होता था। इसीलिए जालंधर का नाश करने के लिए वृंदा के पतिव्रत धर्म को भंग करना बहुत आवश्यक था।इसी कारण भगवान विष्णु ऋषि का वेश धारण कर वन में जा पहुंचे, जहां वृंदा अकेली भ्रमण कर रही थीं। भगवान के साथ दो मायावी राक्षस भी थे, जिन्हें देखकर वृंदा भयभीत हो गयीं। ऋषि ने वृंदा के सामने पल में दोनों को भस्म कर दिया। उनकी शक्ति देखकर वृंदा ने कैलाश पर्वत पर महादेव के साथ युद्ध कर रहे अपने पति जालंधर के बारे में पूछा। ऋषि ने अपने माया जाल से दो वानर प्रकट किये। एक वानर के हाथ में जालंधर का सिर था तथा दूसरे के हाथ में धड़। अपने पति की यह दशा देखकर वृंदा मूर्छित हो कर गिर पड़ीं। होश में आने पर उन्होंने ऋषि रूपी भगवान से विनती की कि वह उसके पति को जीवित करें।भगवान ने अपनी माया से पुन: जालंधर का सिर धड़ से जोड़ दिया, परंतु स्वयं भी वह उसी शरीर में प्रवेश कर गये। वृंदा को इस छल का तनिक भी आभास न हुआ। जालंधर बने भगवान के साथ वृंदा पतिव्रता का व्यवहार करने लगी, जिससे उसका सतीत्व भंग हो गया। ऐसा होते ही वृंदा का पति जालंधर युद्ध में हार गया।इस सारी लीला का जब वृंदा को पता चला, तो उसने क्रुद्ध होकर भगवान विष्णु को हृदयहीन शिला होने का श्राप दे दिया। अपने भक्त के श्राप को भगवान विष्णु ने स्वीकार किया और शालिग्राम पत्थर बन गये। सृष्टि के पालनकर्ता के पत्थर बन जाने से ब्रह्मांड में असंतुलन की स्थिति हो गयी। यह देखकर सभी देवी देवताओं ने वृंदा से प्रार्थना की कि वह भगवान् विष्णु को श्राप मुक्त कर दे। वृंदा ने भगवान विष्णु को श्राप मुक्त कर स्वयं आत्मदाह कर लिया। जहां वृंदा भस्म हुईं, वहां तुलसी का पौधा उगा।भगवान विष्णु ने वृंदा से कहा - हे वृंदा। तुम अपने सतीत्व के कारण मुझे लक्ष्मी से भी अधिक प्रिय हो गयी हो। अब तुम तुलसी के रूप में सदा मेरे साथ रहोगी। तब से हर साल कार्तिक महीने के देव-उठावनी एकादशी का दिन तुलसी विवाह के रूप में मनाया जाता है। जो मनुष्य भी मेरे शालिग्राम रूप के साथ तुलसी का विवाह करेगा उसे इस लोक और परलोक में विपुल यश प्राप्त होगा।उसी दैत्य जालंधर की यह भूमि जलंधर नाम से विख्यात है। सती वृंदा का मंदिर मोहल्ला कोट किशनचंद में स्थित है। कहते हैं कि इस स्थान पर एक प्राचीन गुफा भी थी, जो सीधी हरिद्वार तक जाती थी। सच्चे मन से 40 दिन तक सती वृंदा देवी के मंदिर में पूजा करने से सभी मनोरथ पूर्ण होते हैं।जिस घर में तुलसी होती हैं, वहां यम के दूत भी असमय नहीं जा सकते। मृत्यु के समय जिसके प्राण मंजरी रहित तुलसी और गंगा जल मुख में रखकर निकल जाते हैं, वह पापों से मुक्त होकर वैकुंठ धाम को प्राप्त होता है। जो मनुष्य तुलसी व आंवलों की छाया में अपने पितरों का श्राद्ध करता है, उसके पितर मोक्ष को प्राप्त हो जाते हैं।तुलसी विवाह के समय रखें इन बातों का ध्यानतुलसी विवाह करते समय तुलसी गठबंधन के लिए लाल चुनरी और पीला कपड़ा ही लें। इसके अलावा किसी अन्य रंग के वस्त्र का इस्तेमाल न करें। भगवान विष्णु की और पीला भाग और तुलसी जी की तरफ लाल रंग रखें। पूजा के समय अपने हाथों से अक्षत लेकर दक्षिण की ओर खड़ा होकर अक्षत भगवान विष्णु को अर्पित करें।तुलसी विवाह के दिन तुलसी पर जल न चढ़ायेंगे।धार्मिक मान्यता है कि इस दिन देवी भगवान विष्णु के लिए निर्जला व्रत रखती हैं। महिलाएं तुलसी जी के विवाह में तिल का उपयोग करें। तुलसी जी का पौधा जिस गमले में लगा हो, उसमें शालिग्राम भगवान को रखकर तिल चढ़ाना चाहिए।  तुलसी विवाह के दौरान तुलसी के पौधे की 11 बार परिक्रमा करनी चाहिए। इससे वैवाहिक जीवन में खुशहाली बनी रह सकती है।

जानें देवउठनी एकादशी की पौराणिक कथा
Published / 2023-11-23 08:50:44
जानें देवउठनी एकादशी की पौराणिक कथा

राजकुमारी पाण्डेयएबीएन सोशल डेस्क। एक राजा के राज्य में सभी लोग एकादशी का व्रत रखते थे। प्रजा तथा नौकर-चाकरों से लेकर पशुओं तक को एकादशी के दिन अन्न नहीं दिया जाता था। एक दिन किसी दूसरे राज्य का एक व्यक्ति राजा के पास आकर बोला- महाराज! कृपा करके मुझे नौकरी पर रख लें। तब राजा ने उसके सामने एक शर्त रखी कि ठीक है, रख लेते हैं। किन्तु रोज तो तुम्हें खाने को सब कुछ मिलेगा, पर एकादशी को अन्न नहीं मिलेगा। उस व्यक्ति ने उस समय हां कर ली, पर एकादशी के दिन जब उसे फलाहार का सामान दिया गया तो वह राजा के सामने जाकर गिड़गिड़ाने लगा- महाराज! इससे मेरा पेट नहीं भरेगा। मैं भूखा ही मर जाऊंगा। मुझे अन्न दे दो।राजा ने उसे शर्त की बात याद दिलायी, पर वह अन्न छोड़ने को राजी नहीं हुआ, तब राजा ने उसे आटा-दाल-चावल आदि दियें। वह नित्य की तरह नदी पर पहुंचा और स्नान कर भोजन पकाने लगा। जब भोजन बन गया तो वह भगवान को बुलाने लगा- आओ भगवान! भोजन तैयार है। उसके बुलाने पर पीताम्बर धारण कियें भगवान चतुर्भुज रूप में आ पहुंचे तथा प्रेम से उसके साथ भोजन करने लगे। भोजनादि करके भगवान अंतर्धान हो गये तथा वह अपने काम पर चला गया।पंद्रह दिन बाद अगली एकादशी को वह राजा से कहने लगा कि महाराज, मुझे दुगुना सामान दीजिये। उस दिन तो मैं भूखा ही रह गया। राजा ने कारण पूछा तो उसने बताया कि हमारे साथ भगवान भी खाते हैं। इसीलिए हम दोनों के लिए ये सामान पूरा नहीं होता। यह सुनकर राजा को बड़ा आश्चर्य हुआ। वह बोला- मैं नहीं मान सकता कि भगवान तुम्हारे साथ खाते हैं। मैं तो इतना व्रत रखता हूं, पूजा करता हूं, पर भगवान ने मुझे कभी दर्शन नहीं दिये।राजा की बात सुनकर वह बोला- महाराज! यदि विश्वास न हो तो साथ चलकर देख लें। राजा एक पेड़ के पीछे छिपकर बैठ गया। उस व्यक्ति ने भोजन बनाया तथा भगवान को शाम तक पुकारता रहा, परंतु भगवान न आयें। अंत में उसने कहा- हे भगवान! यदि आप नहीं आयें तो मैं नदी में कूदकर प्राण त्याग दूंगा।लेकिन भगवान नहीं आयें , तब वह प्राण त्यागने के उद्देश्य से नदी की तरफ बढ़ा। प्राण त्यागने का उसका दृढ़ इरादा जान शीघ्र ही भगवान ने प्रकट होकर उसे रोक लिया और साथ बैठकर भोजन करने लगे। खा-पीकर वे उसे अपने विमान में बिठाकर अपने धाम ले गये। यह देख राजा ने सोचा कि व्रत-उपवास से तब तक कोई फायदा नहीं होता, जब तक मन शुद्ध न हो। इससे राजा को ज्ञान मिला। वह भी मन से व्रत-उपवास करने लगा और अंत में स्वर्ग को प्राप्त हुआ।देवउठनी एकादशी कथा-2एक राजा था। उसके राज्य में प्रजा सुखी थी। एकादशी को कोई भी अन्न नहीं बेचता था। सभी फलाहार करते थे। एक बार भगवान ने राजा की परीक्षा लेनी चाही। भगवान ने एक सुंदरी का रूप धारण किया तथा सड़क पर बैठ गये। तभी राजा उधर से निकला और सुंदरी को देख चकित रह गया। उसने पूछा- हे सुंदरी! तुम कौन हो और इस तरह यहां क्यों बैठी हो?तब सुंदर स्त्री बने भगवान बोले- मैं निराश्रिता हूं। नगर में मेरा कोई जाना-पहचाना नहीं है, किससे सहायता मांगू? राजा उसके रूप पर मोहित हो गया था। वह बोला- तुम मेरे महल में चलकर मेरी रानी बनकर रहो। सुंदरी बोली- मैं तुम्हारी बात मानूंगी, पर तुम्हें राज्य का अधिकार मुझे सौंपना होगा। राज्य पर मेरा पूर्ण अधिकार होगा। मैं जो भी बनाऊंगी, तुम्हें खाना होगा।राजा उसके रूप पर मोहित था, अतः उसकी सभी शर्तें स्वीकार कर लीं। अगले दिन एकादशी थी। रानी ने हुक्म दिया कि बाजारों में अन्य दिनों की तरह अन्न बेचा जाये। उसने घर में मांस-मछली आदि पकवाये तथा परोस कर राजा से खाने के लिए कहा। यह देखकर राजा बोला- रानी! आज एकादशी है। मैं तो केवल फलाहार ही करूंगा। तब रानी ने शर्त की याद दिलायी और बोली- या तो खाना खाओ, नहीं तो मैं बड़े राजकुमार का सिर काट दूंगी। राजा ने अपनी स्थिति बड़ी रानी से कही तो बड़ी रानी बोली- महाराज! धर्म न छोड़ें, बड़े राजकुमार का सिर दे दें। पुत्र तो फिर मिल जायेगा, पर धर्म नहीं मिलेगा।इसी दौरान बड़ा राजकुमार खेलकर आ गया। मां की आंखों में आंसू देखकर वह रोने का कारण पूछने लगा तो मां ने उसे सारी वस्तुस्थिति बता दी। तब वह बोला- मैं सिर देने के लिए तैयार हूं। पिताजी के धर्म की रक्षा होगी, जरूर होगी।राजा दुःखी मन से राजकुमार का सिर देने को तैयार हुआ तो रानी के रूप से भगवान विष्णु ने प्रकट होकर असली बात बतायी- राजन! तुम इस कठिन परीक्षा में पास हुए। भगवान ने प्रसन्न मन से राजा से वर मांगने को कहा तो राजा बोला- आपका दिया सब कुछ है। हमारा उद्धार करें। उसी समय वहां एक विमान उतरा। राजा ने अपना राज्य पुत्र को सौंप दिया और विमान में बैठकर परम धाम को चला गया।

कल से शुरू हो जायेंगे सभी मांगलिक और शुभ कार्य
Published / 2023-11-22 20:21:32
कल से शुरू हो जायेंगे सभी मांगलिक और शुभ कार्य

देवउठनी एकादशी 23 नवंबर को, सभी मांगलिक एवं शुभ कार्य प्रारंभ हो जायेंगेएबीएन सोशल डेस्क। विश्व हिंदू परिषद झारखंड सेवा विभाग के प्रांतीय प्रवक्ता संजय सर्राफ ने कहा है कि देवउठनी एकादशी हर वर्ष कार्तिक माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को मनाई जाती है। इस बार 23 नवंबर को देव उठनी एकादशी है। इस दिन जगत के पालनहार श्री हरि भगवान विष्णु चार माह के बाद योग निद्रा से जागृत होते हैं। धार्मिक मान्यता है कि भगवान विष्णु देवशयनी एकादशी तिथि पर क्षीरसागर में शयन करने चले जाते हैं और देवउठनी एकादशी तिथि पर जागृत होते हैं। देवउठनी के बाद सभी मांगलिक कार्य शुरू हो जाते हैं। देवउठनी एकादशी के दिन भगवान विष्णु घोर निद्रा से जागते हैं इस दिन तुलसी विवाह भी किया जाता है।देव उठानी एकादशी के दिन भगवान विष्णु एवं तुलसी माता की पूजा अर्चना की जाती है। भगवान विष्णु की पूजा करने से जीवन में सुख समृद्धि और मंगल का आगमन होता है। साधक की सभी मनोकामनाएं पूरी होती है। एवं मनवांछित फल की प्राप्ति होती है, देवउठनी एकादशी सबसे महत्वपूर्ण और पवित्र एकादशियों में से एक मानी जाती है। इसे देव प्रबोधिनी एकादशी और देवुत्थान  एकादशी भी कहा जाता है। इस शुभ दिन पर भक्त व्रत रखते हैं और बड़ी भक्ति के साथ भगवान विष्णु की पूजा करते हैं। कार्तिक महीना का अपना धार्मिक महत्व है क्योंकि यह पूरा महीना भगवान विष्णु पर समर्पित है इस दिन भगवान विष्णु 4 महीने के बाद जागेंगे जिसे चातुर्मास के नाम से भी जाना जाता है। इस दिन से सभी मांगलिक एवं शुभ कार्य शुरू हो जाते हैं। इस दिन शाम के समय तुलसी के सामने शुद्ध घी का दीपक अवश्य जलाना चाहिए और तुलसी के पौधे की पूजा करनी चाहिए। इस दिन गौ सेवा करने से भी पुण्य मिलता है। देवउठनी एकादशी की तिथि का आरंभ 22 नवंबर को रात में 11 बजकर 3 मिनट पर होगा और समापन 23 नवंबर को रात में 9 बजकर 1 मिनट पर होगा। पारण का समय 24 नवंबर को सुबह 6 बजे से सुबह 8 बजकर 13 मिनट तक के बीच है इसलिए देवउठनी एकादशी का व्रत 23 नवंबर को है।

श्री श्याम मंदिर में कल धूमधाम से मनेगा श्री श्याम प्रभु का जन्मोत्सव
Published / 2023-11-22 20:18:22
श्री श्याम मंदिर में कल धूमधाम से मनेगा श्री श्याम प्रभु का जन्मोत्सव

टीम एबीएन, रांची। अग्रसेन पथ स्थित श्री श्याम मंदिर में दिनांक 23 नवंबर 2023 को श्री श्याम प्रभु का जन्मोत्सव अत्यंत धूमधाम के साथ आयोजित किया जायेगा। मौके पर पूरे मंदिर परिसर को अत्यंत सुचारूपूर्ण ढंग से सजाया जा रहा है तथा श्री श्याम प्रभु सहित शिव परिवार और बजरंगबली का विशेष श्रृंगार किया जायेगा।ज्ञात हो कि कार्तिक शुक्ला एकादशी को श्री श्याम प्रभु का जन्म हुआ था। मुख्य कार्यक्रम रात्रि 9 बजे से प्रारंभ होगा। श्री श्याम प्रभु के दिव्य शीश के सन्मुख अखंड ज्योत प्रज्ज्वलित कर श्री श्याम मंडल के सदस्य श्री श्याम प्रभु की सेवा में संगीतमय संकीर्तन करेंगे। साथ ही श्री श्याम प्रभु को खीर चूरमा और विभिन्न प्रकार के मिष्ठान का भोग अर्पित किया जायेगा। उक्त जानकारी श्री श्याम मंडल श्री श्याम मंदिर, अग्रसेन पथ, रांची के मीडिया प्रभारी सुमित पोद्दार (9835331112) ने एक प्रेस विज्ञप्ति जारी कर दी।

समरसता एवं आस्था का केंद्र है बड़ागाँई देवोत्थान धाम
Published / 2023-11-21 19:37:48
समरसता एवं आस्था का केंद्र है बड़ागाँई देवोत्थान धाम

टीम एबीएन, रांची। भारतीय सनातन संस्कृति ही विश्व संस्कृति की जननी है। भारतवर्ष में देवी-देवताओं के प्रति असीम श्रद्धा एवं विश्वास के कारण ही चारों धाम हमारी विविधताओं को एकता के सूत्र में सदैव जोड़ता रहा है। इस संस्कृति में लोकमान्यता एवं लोककथाएं की अपनी विरासत है। वनों, पहाड़ों, कंदराओं, झीलों, झरनों से अच्छादित झारखंड भी अपनी ऐतिहासिक व अलौकिक गाथाओं, सनातनी परंपराओं और धार्मिक अस्थाओं का पावन स्थल रहा है। 24 नवंबर को लगेगा देवोत्थान जतरा मेला रांची महानगर के उत्तर पूर्व की ओर लगभग 7 किलोमीटर की दूरी पर ग्राम बड़ागाँई में दो पहाड़ियों के मध्य भगवान शिव का धाम है, जो देवोत्थान धाम के नाम से प्रसिद्ध है। इस देवस्थल पर देवताओं के जगने की खुशी में कार्तिक शुक्ल पक्ष प्रबोधिनी एकादशी की रात्रि जागरण करते हुए पूजा पाठ कर नृत्य दान करते हैं, जो देवोत्थान मेला के रूप में प्रसिद्ध है। इस मेल में आसपास के गांव सहित अन्य सैकड़ों गांव के बड़ी संख्या में श्रद्धालुगण पहुंचते हैं। वे भगवान शिव की पूजा अर्चना कर अपनी मनोकामना पूर्ण होने की प्रार्थना कर मेला का आनंद उठाते हैं। आसपास के गांव के अखाड़े /खोड़ाहा के नृत्य दल एवं नचनी नृत्य दल भी अपने पारंपरिक वेशभूषा एवं वाद्य यंत्रों से सुसज्जित होकर भगवान शिव का पूजन - अर्चना करके नृत्य गान कर अपनी प्राचीन संस्कृति को प्रदर्शित करते हुए लोगों का मनोरंजन करते हैं। गांव का पहान प्रथम पूजन कर कार्यक्रम का शुभारंभ करते हैं। एकादशी के दिन से ही क्षेत्र में लोग शादी विवाह की बातें करना शुभ मानते हैं। इस स्थल पर मेला के अलावा विवाह, कर्णवेदी, मुंडन संस्कार आदि कार्यक्रम सदैव चलते रहती है। लोगों के मान्यता के अनुसार यहां मन्नते पूर्ण होती हैं। इस वर्ष 24 नवंबर, 2023 को देवोत्थान जतरा मेला का आयोजन किया जायेगा। 1931 में जूठन कविराज के नेतृत्व में बना था मंदिरभगवान शिव का यह देवस्थल बड़ागाँई -बूटी की सीमा के बीच है। कहा जाता है एक बार जूठन कविराज बहुत जोरों से बीमार पड़ गये थे। उन्हें स्वप्न में दो पहाड़ियों के बीच में शिवलिंग होने का विषय आया। उसने जब सुबह उठकर पहाड़ी के बीच गये तो उन्हें एक गाय के थन से अपनेआप दूध निकलकर जमीन में गिरते हुए देखा। नजदीक जाकर देखा तो उस जगह पर शिवलिंग दिखाई पड़ा। जूठन कविराज ने वहां पर पूरे विधि-विधान एवं गाजे - बाजे के साथ पूजा अर्चना की, जिससे वह स्वस्थ हो गये। बाद में उन्होंने मंदिर बनाने का संकल्प लिया। जूठन कविराज के नेतृत्व में 1931ई में ग्राम बड़ागाँई एवं बूटी गांव के लोगों के सहयोग से मंदिर निर्माण का कार्य पूर्ण हुआ।जिसमें मुकुल पहान, जयराम महतो, गेंदो महतो, बंधन महतो, जोधन महतो, चुनिंदर महतो, सहदेव महतो, लहरनाथ महतो, पूनीनाथ महतो, रामनाथ महतो, सोहराई महतो आदि प्रमुख थे, जो अब इस दुनिया को छोड़ चुके हैं। मंदिर का वही पुराना स्वरूप आज भी विद्यमान है, जो लोगों की समरसता एवं आस्था के केंद्र के रूप में सदैव बनी रहती है। सभी अपने घरों को जगाते हैं कार्तिक शुक्ल पक्ष एकादशी का अनुपम महात्म्य है। इस दिन ही छीरसागर में भगवान विष्णु लंबी चयन के बाद जागते हैं, इस कारण इसे देवोत्थान / देवठान / प्रबोधिनी एकादशी भी कहते हैं। छोटानागपुर के लोग एकादशी की रात्रि में अरवा चावल के पीसे लेप से घर के आंगन में चौका - चंदन (अल्पना) बनाते हैं। घर की दीवारों एवं कृषि यंत्रों को अरवा चावल लिप एवं सिंदूर से सजाते हैं, जिसे घर जगाना कहा जाता है। आंगन की अल्पना के मध्य दो आम लकड़ी के पीढ़ो में पांच नए फल के दाने क्रमश: मड़ूवा, उरद, अरवा चावल, मकई के दाना एवं शकरकंद रखते हैं। प्रात: अरवा चावल से दो बच्चों को बैठाकर चुमाने की परंपरा है, जो तुलसी विवाह का घोतक माना जाता है। उक्त जानकारी डॉ बिरेन्द्र साहु, संयोजक, देवोत्थान जतरा मेला समिति, बड़ागाँई बूटी, रांची सह प्रांत मंत्री, विहिप, झारखण्ड ने एक प्रेस विज्ञप्ति जारी कर दी।

माहेश्वरी समाज ने मनाया अन्नकूट महोत्सव
Published / 2023-11-20 19:58:15
माहेश्वरी समाज ने मनाया अन्नकूट महोत्सव

टीम एबीएन, रांची। श्री माहेश्वरी सभा रांची, माहेश्वरी महिला समिति, माहेश्वरी युवा संगठन एवं श्री लक्ष्मीनारायण मंदिर समिति द्वारा आयोजित 19/11/23 को दीपावली मिलन सह अन्नकूट महोत्सव का सफल आयोजन किया गया।माहेश्वरी भवन में स्थापित संस्थापक स्वर्गीय गणेश नारायण साबु की मूर्ति पर माल्यार्पण कर श्रुति चांडक की माहेश्वरी भवन परिसर में बनायी श्रीनाथ जी की रंगोली के आगे समाज के जनों ने 11 बजे दीप प्रज्ज्वलित कर एक दूसरे को दिवाली की बधाई एवं शुभकामनाएं दीं।11.30 बजे से 1 बजे तक श्री लक्ष्मीनारायण मंदिर में भजन गायक विभोर डागा, मनोज काबरा, मुकेश काबरा एवं हनुमान मंडल के सदस्यों ने भजन गायन किया। अपराह्न 1 बजे कार्यक्रम में उपस्थित रांची विधायक सीपी सिंह, अन्य सामाजिक एवं धार्मिक संगठनों के अध्यक्ष/ सचिव एवं समाज के वरिष्ठ जनों ने भगवान लक्ष्मीनारायण के आगे विश्व कल्याणार्थ 51 लोगों ने दीप प्रज्वलित किया। तत्पश्चात भगवान की आरती के बाद मंदिर परिसर स्थित हॉल में सभी समुदाय के लोगों ने अन्नकूट प्रसाद अपराह्न 3 बजे तक लिया। कार्यक्रम में रांची सांसद संजय सेठ, राज्य सभा सांसद महुआ मांझी, पूर्व सांसद सह पूर्व केंद्रीय मंत्री सुबोध कांत सहाय, अग्रवाल सभा, मारवाड़ी ब्राह्मण सभा, मारवाड़ी सहायक समिति, मारवाड़ी युवा मंच, हनुमान मंडल, श्री श्याम मंडल, श्री श्याम मित्र मंडल, मारवाड़ी सम्मेलन, विश्व हिंदू परिषद,फेडरेशन झारखंड चेम्बर आफ कॉमर्स एवं अन्य सामाजिक एवं धार्मिक संगठनों के अध्यक्ष/सचिव माहेश्वरी सभा के प्रदेश अध्यक्ष राज कुमार मारु, प्रदेश सभा के कोषाध्यक्ष शिव शंकर साबू, पूर्व सचिव अशोक साबू, सभा के पूर्व अध्यक्ष जुगल किशोर मारु, महाबीर प्रसाद सोमानी, पूर्व सचिव उमाशंकर बियानी, मुकेश काबरा, विजय शंकर साबू, सभा अध्यक्ष किसन साबू, सचिव नरेन्द्र लाखोटिया, महिला समिति की सचिव बिमला फलोड़, युवा संगठन अध्यक्ष विनय मंत्री, सचिव हेमंत माहेश्वरी, गौरीशंकर काबरा, भरत माहेश्वरी, गिरिजा शंकर पेड़ीवाल, किसनचंद सोढानी, दाउलाल मोहता, नरेंद्र सारडा, बीना साबू, संगीता चितलांगिया, सुमन चितलांगिया, सरिता लाखोटिया,निर्मला बियानी, कार्यक्रम को सफल बनाने में प्रकाश काबरा, मनोज कल्याणी, राजेंद्र बिड़ला, बंसत लाखोटिया, शारदा लढ्ढा, लक्ष्मी चितलांगिया, विकास काबरा, तरुण बजाज, युवा संगठन, महिला समिति एवं सभा के सदस्यों का सहयोग रहा।

मंदिर को क्षतिग्रस्त करने वालों को शीघ्र गिरफ्तार कर प्रशासन : विहिप
Published / 2023-11-18 10:21:01
मंदिर को क्षतिग्रस्त करने वालों को शीघ्र गिरफ्तार कर प्रशासन : विहिप

टीम एबीएन, रांची। मांडर थाना क्षेत्र के के मुड़मा में असामाजिक तत्वों ने गुरुवार की देर रात चार मंदिरों की प्रतिमा को खंडित किया। जिसमें महाबीर मंदिर, छोटा बजरंग बली मंदिर, बुढ़ा महादेव, मड़ई देवी मंडप में अज्ञात लोगों ने घटना को अंजाम दिया। मंदिर की मूर्ति खंडित देवी-देवताओं की प्रतिमाओं तथा एक मंदिर के महावीर पताकाओं को उखाड़ फेंकने की घटना का अवलोकन करने के बाद विश्व हिंदू परिषद के प्रांत मंत्री डॉ बिरेन्द्र साहु ने कड़ी प्रतिक्रिया व्यक्त की है। उन्होंने कहा है हिंदू आस्थाओं के प्रति भ्रम एवं घृणा फैलाने वाले असामाजिक तत्वों का सुनियोजित कुकृत्य है। घटना में सम्मिलित अपराधियों का अभी तक न पकड़ना प्रशासन की विफलता है। उन्होंने कहा अपराधियों को शीघ्र प्रशासन गिरफ्तार करे एवं मंदिर में क्षति पहुंचायी गयी सभी देवी देवताओं की प्रतिमाओं का विधि-विधान के साथ पुनर्स्थापना की व्यवस्था करायें। डॉ साहू ने कहा कि इस तरह की घटना बढ़ती जा रही है और प्रशासन इसको समझौता से खत्म कर रहा है। परंतु इस पर उचित कार्रवाई नहीं की जाती है। जिसके कारण और असामाजिक लोगों का मन बढ़ता जा रहा है। उक्त जानकारी विहिप के प्रांत प्रचार प्रसार सहप्रमुख प्रकाश रंजन (93344 33338) ने एक प्रेस विज्ञप्ति जारी कर दी।

Newsletter

Subscribe to our website and get the latest updates straight to your inbox.

We do not share your information.