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रातों रात चमत्कार की आस न रखें युवा
Published / 2024-09-17 19:10:53
रातों रात चमत्कार की आस न रखें युवा

बीपीएमएस ने देश के नौ नामी बिजनेस आइकंस को दिया नवरत्न अवार्डएबीएन सेंट्रल डेस्क (नई दिल्ली)। देश दुनिया में भिवानी का परचम फहराने वाले विख्यात सामाजिक संगठन भिवानी परिवार मैत्री संघ के मुकुट में एक साथ नौ और बेशकीमती रत्न चस्पां हो गये हैं। विभिन्न क्षेत्रों में कामयाबी की कीर्ति पताका बुलंद करने वाले नौ दिग्गजों को भिवानी परिवार मैत्री संघ ने रोहिणी में आयोजित भव्य समारोह में नवरत्न अवार्ड-2024 से सम्मानित किया।युवा पीढ़ी को इन सभी का संयुक्त रूप से संदेश था कि वे रातों रात किसी चमत्कार की उम्मीद न रखें। सफलता तो प्रयासों की निरंतरता, एकाग्रता और लगातार कड़ी मेहनत से ही मिलती है।भिवानी परिवार मैत्री संघ के अध्यक्ष राजेश चेतन ने बताया कि लगातार आठ घंटे चले कार्यक्रम में भारी संख्या में मौजूद अतिथिगण इन दिग्गजों के संघर्ष और शिखर तक पहुंचने की गौरवगाथा को सुनते रहे। उन्होंने बताया कि इन नवरत्नों की संघर्ष गाथा के इतने पड़ाव रहे कि किसी एक सत्र में शब्दों में बांधना मुमकिन नहीं है। राजेश चेतन ने बताया कि अपनी प्रतिभा, अनवरत संघर्ष, जीत की जिद और न थकने वाले डीएनए की बदौलत ये सभी नवरत्न आज देश दुनिया में भिवानी का परचम लहरा रहे हैं।सम्मानित होने वाले आइकंस में राजेश गुप्ता (सीएमडी, भारत रसायन फाइनेंस लिमिटेड), सत्य एस गुप्ता (डायरेक्टर गैलेक्सी इंडिया), बृज लाल सराफ (डायरेक्टर प्यारेलाल जगन्नाथ सराफ), नरेश मित्तल (सीएमडी, सिग्नेचर ग्लोबल कोमट्रेड प्राइवेट लिमिटेड), सुरेश गुप्ता  (सीएमडी, गोल्डन ग्रुप आफ कंपनीज), राजकुमार गर्ग (डायरेक्टर, मोविश रियल्टेक प्राइवेट लिमिटेड), बजरंग लाल अग्रवाल (एमडी, स्टोनेक्स इंडिया प्राइवेट लिमिटेड), डा प्रेम गर्ग, (चेयरमैन, श्रीलालमहल ग्रुप नेशनल प्रेसीडेंट, इंडियन राइस एक्सपोर्टर्स फेडरेशन (आईआरईएफ) और डा आशीष गुप्ता (डायरेक्टर, यूनीक हास्पिटल कैंसर सेंटर) शामिल रहे।इससे पूर्व कार्यक्रम का शुभारंभ मां सरस्वती की प्रतिमा के समक्ष दीप प्रज्वलित करके किया गया। कार्यक्रम में मंच संचालन अंतरराष्ट्रीय कवि व भिवानी परिवार मैत्री संघ के अध्यक्ष राजेश चेतन, सुनीता जैन, प्रमोद शर्मा ने किया। कार्यक्रम दो सत्रों में आयोजित किया गया। पूजा बंसल को साथियों के साथ देवताओं की पुरानी मूर्तियों को एकत्र करके सम्मान पूर्वक सहजने के लिए सम्मानित किया गया। इस अवसर पर अपने संबोधन में अंतरराष्ट्रीय कवि राजेश चेतन व डॉक्टर रमेश गुप्ता ने कहा कि आज हम अपनी जड़ों से कट रहे हैं जबकि घर में बड़ों से मिलने वाला ज्ञान हमें किसी भी विश्वविद्यालय में नहीं मिल सकता। इसलिए जिस घर में दादा और पोते की जोड़ी साथ में काम करती है उसे घर में किसी चीज की कमी नहीं रह सकती।इस अवसर पर भिवानी परिवार मैत्री संघ के प्रधान राजेश चेत के अलावा महासचिव दिनेश गुप्ता, कोषाध्यक्ष पवन मोडा, हंसराज रल्हन, विनय सिंघल, मनीष गोयल, प्रमोद कुमार शर्मा, मीनाक्षी गर्ग, संजय गुप्ता, दीपक गुप्ता, संजय जैन, राजकुमार अग्रवाल, सुशील गनोत्रा आदि भी मौजूद रहे।गरीब कन्याओं के विवाह के लिए नरसी का भात योजनाकार्यक्रम में एक महत्वपूर्ण फैसला यह लिया गया कि भिवानी जिले की गरीब, असहाय कन्या की शादी के लिए चुपचाप उसके घ जाकर 51 हजार रुपये नकद बीपीएमएस की ओर से दिये जायेंगे। इस योजना का नाम नरसी का भात रखा गया है। इसके लिए भिवानी में एक स्क्रीनिंग कमेटी बनाई जाएगी ताकि वास्तविक पात्र को ही आर्थिक मदद मिले। इस मेगा अभियान के लिए बीपीएमएस के कार्यक्रम में दानवीर समाजसेवियों ने 70 से अधिक कन्याओं की शादी के लिए धन देने की सहमति दी। अभी योजना भिवानी में चलेगी, फिर इसका विस्तार अन्य शहरों व जिलों में किया जायेगा।

पितृपक्ष 18 से, अपने पितरों को प्रसन्न करने के लिए करें ये काम
Published / 2024-09-16 18:19:44
पितृपक्ष 18 से, अपने पितरों को प्रसन्न करने के लिए करें ये काम

पितृपक्ष श्राद्ध पितरों को प्रसन्न और संतुष्ट करने वाला पर्व : संजय सर्राफएबीएन सोशल डेस्क। विश्व हिंदू परिषद सेवा विभाग एवं राष्ट्रीय सनातन एकता मंच के प्रांतीय प्रवक्ता संजय सर्राफ ने कहा है कि 18 सितंबर से स्नान दान भाद्रपद पूर्णिमा तिथि लगते ही पितृ पक्ष शुरू हो जायेगा। पितृपक्ष 18 सितंबर से शुरू होकर 2 अक्टूबर तक रहेगा। 15 दिनों तक दादा दादी, नाना नानी पक्ष के पूर्वजों का ध्यान स्मरण किया जायेगा। उन्हें जल देकर तर्पण की कामना होगी पितृपक्ष शुरू होते हैं शुभ कार्यों की बेला थम जाएगी। हिंदू धर्म में पितृ पक्ष को पितरों को प्रसन्न और संतुष्ट करने वाला पर्व माना जाता है इस दिन उन पूर्वजों के सम्मान में श्राद्ध किया जाता है जिनकी मृत्यु हर महीने की पूर्णिमा के दिन हुई थी।पितृपक्ष जिसे श्राद्ध के नाम से भी जाना जाता है। माना जाता है कि मृतक पूर्वजों को समर्पित एक महत्वपूर्ण अवधि है यह वह समय होता है जब पूर्वजों की आत्माएं प्रसाद और प्रार्थनाओं के प्रति सबसे अधिक ग्रहणशील होती है। श्राद्ध पक्ष वास्तव में पितरों को याद करके उनके प्रति श्रद्धा भाव प्रदर्शित करने का अवसर है।पितरों का श्राद्ध करने से जन्म कुंडली में व्याप्त पितृ दोष से भी हमेशा के लिए छुटकारा मिलता है। पितृपक्ष में पितरों संबंधित कार्य करने से व्यक्ति का जीवन खुशियों से भर जाता है। श्राद्ध तर्पण करने से पितर प्रसन्न होते है और आशीर्वाद देते हैं। पितर दोष से मुक्ति के लिए इस पक्ष में श्राद्ध तर्पण करना होता है। किसी योग्य ब्राह्मण से श्राद्ध कर्म, पिंडदान तर्पण करवाना चाहिए। जिस दिन श्राद्ध हो उस दिन ब्राह्मणों को भोजन करवाना चाहिए, श्राद्ध कार्य में पूरी श्रद्धा से ब्राह्मणों को तो दान दक्षिणा देना चाहिए,साथ ही यदि किसी गरीब जरूरतमंद की सहायता भी आप कर सके तो बहुत पुण्य मिलता है। इसके साथ-साथ ही गाय, कुत्ते, कौवे आदि पशु पक्षियों के लिए भोग का एक अंश जरुर डालना चाहिए। पितृपक्ष मे मृत्यु की तिथि के अनुसार श्राद्ध किया जाता है। अगर किसी मृत व्यक्ति की तिथि ज्ञात न हो तो ऐसी स्थिति मे अमावस्या तिथि पर श्राद्ध किया जाता है इस दिन सर्वपितृ श्राद्ध योग माना जाता है।

दुनिया के पहले इंजीनियर वास्तुकार और ब्रह्मांड के निर्माता हैं भगवान विश्वकर्मा : संजय सर्राफ
Published / 2024-09-15 15:35:20
दुनिया के पहले इंजीनियर वास्तुकार और ब्रह्मांड के निर्माता हैं भगवान विश्वकर्मा : संजय सर्राफ

विश्वकर्मा पूजा 17 सितंबर कोएबीएन सोशल डेस्क। विश्व हिंदू परिषद सेवा विभाग एवं राष्ट्रीय सनातन एकता मंच के प्रांतीय प्रवक्ता संजय सर्राफ ने कहा है कि भगवान विश्वकर्मा पूजा हर वर्ष की तरह इस वर्ष भी 17 सितंबर दिन मंगलवार को मनाया जाएगा, विश्वकर्मा पूजा को विश्वकर्मा जयंती के नाम से भी जाना जाता है।हिंदू सनातन धर्म का यह एक महत्वपूर्ण पर्व है। धर्म ग्रंथो में विश्वकर्मा को सृष्टि के रचयिता ब्रह्मा जी का वंशज माना गया है। ब्रह्मा जी के पुत्र धर्म तथा धर्म के पुत्र वास्तुदेव थे। जिन्हें शिल्प शास्त्र का आदि पुरुष माना जाता है। इन्हीं वास्तु देव की अंगिरसी नामक पत्नी से विश्वकर्मा का जन्म हुआ। अपने पिता के पदचिन्हों पर चलते हुए विश्वकर्मा भी वास्तु कला के महान आचार्य बने। मनु, मय, त्वष्टा, शिल्पी और देवज्ञ उनके पुत्र है। इन पांचो पुत्र को वास्तु शिल्प की अलग-अलग विधाओं में विशेषज्ञ माना जाता है। विश्वकर्मा शिल्प शास्त्र के आविष्कारक और सर्वश्रेष्ठ ज्ञाता माने जाते हैं। विश्वकर्मा पूजा एक ऐसा त्यौहार है जिसे शिल्पकार कारीगर,श्रमिक एवं सभी लोग मानते हैं। यह पर्व ब्रह्मांड के दिव्य वास्तुकार और निर्माता भगवान विश्वकर्मा को समर्पित होता है। विश्वकर्मा एक ऐसे देवता है।जिन्होंने स्वर्ग और यहां तक की देवताओं के कुछ सबसे बड़े महलों का निर्माण किया, उन्हें कारीगरों शिल्पकारों और इंजीनियरों का देवता के रूप में भी पूजा जाता है। उन्हें सृष्टि का पहला इंजीनियर भी कहा जाता है। भगवान विश्वकर्मा की पूजा जो भी कोई व्यक्ति करता है उसका घर, दुकान, कारोबार, सभी उन्नति करते हैं। विश्वकर्मा पूजा के दिन सच्चे मन से दान करने से अच्छे कर्म बढ़ते हैं और समृद्धि, सफलता और खुशी मिलती है विश्वकर्मा पूजा पर विशिष्ट वस्तुओं का दान करके भक्त विश्वकर्मा के साथ एक सानिध्य स्थापित करते हैं और विकास के साथ प्रचुरता के लिए दिव्य आशीर्वाद प्राप्त करते हैं।विश्वकर्मा दो शब्दों से विश्व (संसार या ब्रह्मांड) और कर्म (निर्माता) से मिलकर बना है इसलिए विश्वकर्मा शब्द का अर्थ है दुनिया का निर्माता यानी दुनिया का निर्माण करने वाले, इसलिए भगवान विश्वकर्मा को दुनिया का सबसे पहले इंजीनियर और वास्तु कार माना जाता है।

समाधि अनुभूति का विषय है : आचार्य कौशल
Published / 2024-09-14 20:30:20
समाधि अनुभूति का विषय है : आचार्य कौशल

अपने आप में स्थित हो जाना ही समाधि है : आचार्य कौशल टीम एबीएन, रांची। शिवानंद जयंती के शुभ अवसर पर योग मित्र मंडल, रांची द्वारा समाधि के विषय पर आनलाइन माध्यम से विचार गोष्ठी का आयोजन किया गया, जिसमे नई दिल्ली के आचार्य कौशल ने समाधि विषय पर अपने विचार रखें। योग मित्र मंडल की सचिव डॉक्टर परिणीता सिंह ने योग मित्र मंडल की गतिविधियों के बारे में बताते हुए कहा कि योग मित्र मंडल का उद्देश्य योग की  सही और सटीक जानकारी देना है।साथ ही उन्होंने बताया कि योग मित्र मंडल गांव - गांव जाकर योग का प्रचार प्रसार करता है।  आत्म कृति ने शांति पाठ से कार्यक्रम की शुरुआत की। डॉ परिणीता सिंह ने स्वामी शिवानंद सरस्वती का संक्षिप्त जीवन परिचय दिया। योग मित्र मंडल रांची के कोषाध्यक्ष शंकर सिंह ने शिवानंद भजन का गायन किया। बिहार स्कूल आफ योग मुंगेर के शिष्य राजेश ने कार्यक्रम के वक्ता का परिचय दिया और विषय प्रवेश कराया। इससे पहले योग मित्र मंडल रांची के अध्यक्ष आर. के. कटारिया ने स्वागत भाषण दिया और बताया योग मित्र मंडल, राची की शुरुआत सन 2009 में हुई थी और यह बिहार स्कूल, मुंगेर के झारखंड की शाखा है। आचार्य कौशल ने समाधि विषय पर कहां समाधि अनुभूति का विषय है। सभी दर्शन दु:ख से शुरू करते है और सभी दर्शनों ने योग की प्रशंसा की है। अधिकांश लोग के संसार में दुख से तो मुक्त होना चाहते हैं लेकिन मार्ग गलत अपना लेते हैं इंद्रियों की मौज की मार्ग अपना लेते हैं और इसलिए दुख और बढ़ता ही जाता है।हमारा योग कहता है कि नहीं आत्म साक्षात्कार का मार्ग अपना कर इंद्रियों के नियंत्रण का मार्ग बतायें। योग आत्म साक्षात्कार की विधि बताता है। उन्होंने बताया अपने आप में स्थित हो जाना ही समाधि है। समाधि दो प्रकार की होती है। संप्रज्ञात समाधि और असंप्रज्ञात समाधि और इसे सबीज और निर्बीज समाधि भी कहते हैं संप्रज्ञात समाधि के चार स्तर हैं वितर्क, विचार, आनंद और अस्मिता। अंत में प्रश्न उत्तर का सत्र चला जिसमें कई लोगों ने अपने सवाल रखें जिसका आचार्य जी ने सरल और सौम्य तरीके से उत्तर दिया। विचार गोष्ठी में योग मित्र मंडल राची के सदस्यों के अलावा योग से संबंधित विश्वविद्यालय के छात्रों ने भाग लिया इसके अलावा कई और राज्यो से भी लोगों ने बढ़ चढ़कर हिस्सा लिया। कार्यक्रम का संचालन योग मित्र मंडल की सचिव डॉक्टर परिणीता सिंह ने किया और धन्यवाद ज्ञापन शंकर सिंह ने किया।

श्री जैन श्वेतांबर संघ रांची का क्षमापना कार्यक्रम 15 को
Published / 2024-09-13 20:16:07
श्री जैन श्वेतांबर संघ रांची का क्षमापना कार्यक्रम 15 को

टीम एबीएन, रांची। श्री जैन श्वेतांबर संघ रांची का पर्युषण उपरांत क्षमापना कार्यक्रम 15 सितम्बर को जैन मंदिर डोरंडा में मनाया जायेगा। सुबह 8 बजे से भगवान शान्तिनाथ जी की शोभायात्रा गाजे,-बाजे के साथ धूमधाम से जैन मंदिर से निकलेगी जो कि तुलसी चौक, मेकॉन चौक, हाई कोर्ट होते हुए वापस मंदिर जी में प्रवेश करेगी। शोभायात्रा के बाद मंदिर में सांस्कृतिक कार्यक्रम का आयोजन किया गया है। इस दौरान 30 उपवास करने वाले तपस्वी मयंक बेगानी, 13 उपवास करने वाले विशाल दस्सानी एवं समाज के सभी तपस्या करने वालों का बहुमान भी किया जायेगा। तत्पश्चात दोपहर 1 बजे से स्वामी वात्सल्य का आयोजन है। श्री संघ के अध्यक्ष संपतलाल रामपुरिया एवं सुभाष चंद बोथरा ने सकल श्वेतांबर समाज रांची को अधिक से अधिक संख्या में कार्यक्रम में भाग लेकर सफल बनाने का अनुरोध किया है। उक्त जानकारी मीडिया प्रभारी सुरेश जैन ने दी।

अनंत चतुर्दशी पर्व 17 सितंबर को
Published / 2024-09-13 20:03:27
अनंत चतुर्दशी पर्व 17 सितंबर को

हिंदू सनातन धर्म में अनंत चतुर्दशी का बेहद खास महत्व : संजय सर्राफएबीएन सोशल डेस्क। विश्व हिंदू परिषद सेवा विभाग एवं राष्ट्रीय सनातन एकता मंच के प्रांतीय प्रवक्ता संजय सर्राफ ने कहा है कि अनंत चतुर्दशी पर्व 17 सितंबर को मनाया जायेगा। इस वर्ष भादो मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी तिथि 16 सितंबर दिन सोमवार की दोपहर 3 बजकर 10 मिनट से शुरू होगा तथा इसका समापन अगले दिन यानी 17 सितंबर दिन मंगलवार को सुबह 11 बजकर 44 मिनट पर होगा। ऐसे मे उदया तिथि के अनुसार अनंत चतुर्दशी का पर्व 17 सितंबर को मनाया जायेगा। हिंदू सनातन धर्म में अनंत चतुर्दशी का विशेष महत्व है। इस तिथि पर भगवान विष्णु के अनंत रूपों की आराधना करने का विधान है, अनंत चतुर्दशी को अनंत चौदस भी कहा जाता है। इस दिन जहां बप्पा श्री गणेश की बड़ी धूमधाम से विदाई की जाती है। दरअसल गणेश चतुर्थी के दिन बप्पा को घर लाया जाता है और पूरे 10 दिनों तक विधिवत उनकी पूजा अर्चना की जाती है।अनंत चतुर्दशी के दिन श्री गणेश जी का विसर्जन किया जाता है। इस दिन  भगवान विष्णु की पूजा पूरे विधि विधान के साथ की जाती है। इस दिन अनंत सूत्र का भी विशेष महत्व माना गया है इस दिन भगवान विष्णु की पूजा के बाद एक कच्ची रेशम की डोरी को हल्दी या केसर से रंग कर उसके बाद उस डोर में 14 गांठ लगाए और इसे प्रभु श्री हरि के चरणों में अर्पित करने तथा ओम अनंताय नम: मंत्र की जाप करने के बाद इस दिव्य को पुरुष अपने दाएं हाथ में बांधे तथा महिलाएं इस सूत्र को अपने बाएं हाथ में बांधना चाहिए।विधि विधान से पूजा अर्चना, दीपक जलाकर आरती तथा कथा का पाठ, प्रभु को फल और मिठाई समेत चीजों का भोग लगाना चाहिए। रात के समय इस रक्षा सूत्र को उतारकर रख दे और अगले दिन किसी पवित्र नदी या तालाब में प्रवाहित कर दें, माना जाता है कि इस कार्य को करने से साधक के सभी प्रकार के पाप एवं दुख नष्ट होते हैं और उसे आरोग्य जीवन का आशीर्वाद तथा भगवान विष्णु की असीम कृपा प्राप्त होती है।

आज रे करम गोसाईं घरे-दुआरे...
Published / 2024-09-12 20:25:40
आज रे करम गोसाईं घरे-दुआरे...

प्रकृति पर्व करमा की यहां से भेजें बधाईएबीएन सोशल डेस्क। प्रकृति पर्व करमा को झारखंड राज्य में धूम धाम से मनाया जाता है। यह पर्व भाइयों और बहनों के पवित्र प्रेम को दर्शाता है। इस दिन बहनें अपने भाईयों के सुख-समृद्धि और दीर्घायु होने की कामना करती हैं। इसके अलावा झारखंड के लोगों की परंपरा के अनुसार धान के खेत रोपने के बाद यह त्योहार बड़े धूमधाम से मनाया जाता है। जिस प्रकार सरहुल में सखुआ फूल की पूजा की जाती है, उसी प्रकार करम में करम शाखा की भी पूजा की जाती है। करम पूजा के शुभ अवसर पर, अपने दोस्तों, रिश्तेदारों, भाइयों और बहनों को करम त्योहार की शुभकामनाएं दें। प्रकृति पर्व करमा पूजा की सभी को हार्दिक बधाई और शुभकामनाएं। झारखंड की पहचान और संस्कृति के मूल में प्रकृति की पूजा है। हमारे आदिवासी भाई-बहन प्रकृति के संरक्षक रहे हैं। हमें मिलकर झारखंड को और हरा भरा बनाना है।

14 को धूमधाम से मनाया जायेगा प्रकृति पर्व करमा पूजा
Published / 2024-09-11 19:25:53
14 को धूमधाम से मनाया जायेगा प्रकृति पर्व करमा पूजा

करमा पर्व हमें प्रकृति के संरक्षण करने की देती है प्रेरणा : संजय सर्राफ एबीएन सोशल डेस्क। विश्व हिंदू परिषद सेवा विभाग एवं राष्ट्रीय सनातन एकता मंच के प्रांतीय प्रवक्ता संजय सर्राफ ने कहा है कि झारखंड के प्रमुख त्योहारों में से एक करमा पूजा पर्व 14 सितंबर दिन शनिवार को मनाया जायेगा। आदिवासी समाज का प्रमुख पर्व करमा पूजा झारखंड बिहार के अलावे उड़ीसा बंगाल छत्तीसगढ़ एवं असम मे धूमधाम के साथ मनाया जाता है। करमा पर्व हमें प्रकृति के संरक्षण करने की प्रेरणा देता है। इस पर्व में बहनें अपने भाइयों की सुख-समृद्धि की कामना करती है एवं उनके दीर्घायु के लिए पूजन करती है। महिलाएं 24 घंटे उपवास करती है इस दौरान महिलाएं कर्म डाल की पूरे विधि विधान से पूजा करती है। करमा पर्व सृष्टि का पर्व है ये समस्त मानव, जीव जंतुओं का पर्व है क्योंकि इस संसार में कर्म ही धर्म है धर्म ही कर्म है आदिवासी समाज प्रकृति को ही आराध्य देव और भगवान मानते हैं। तथा उनका मानना है कि कर्म का वृक्ष 24 घंटा आॅक्सीजन देता है यही कारण है कि आदिवासी समुदाय करम वृक्ष को आराध्य देव के रूप में मानते हैं कर्म पूजा के दिन बांस की बनी डाली को सजाकर घर के आंगन के बीच में रखा जाता है। उसके साथ ही कर्म वृक्ष के पेड़ को भी घर के आंगन में गाड़ा जाता है। उसके चारों तरफ घर की महिलाएं बैठकर पूजा आराधना एवं अपने भाई के सुख समृद्धि की कामना करती है। प्रकृति के साथ इनका गहरा संबंध है। प्रकृति के बिना हमारा कोई अस्तित्व नहीं है। करमा पर्व हमें प्रकृति के संरक्षण करने की प्रेरणा देने के साथ ही मानव समाज में सद्भाव और अच्छे चरित्र का निर्माण पीढ़ी दर पीढ़ी होते रहने की सीख देती है। जिस तरह सूर्य का काम निरंतर प्रकाश देना है पेड़ का काम हमें फल और छाया देना है उसी तरह हम मानते हैं कि कर्म और धर्म एक सिक्के के दो पहलू है आदिवासी समाज करम पर्व मे पाप और पुण्य, सत्य, असत्य को अपने आराध्य देव कर्म वृक्ष के रूप में स्वीकारते हैं और उससे जो अलौकिक शक्तियां निकलती है जिसे हम सरना मां या धर्मेश कहते हैं उसमें हम उनके स्वरूप को देखते हैं क्योंकि वो संसार के किसी भी जीव जंतुओं से बैर नहीं करता है।

गायत्री महाविद्या के तत्वदर्शन पर महिला मंडल का आनलाइन स्वाध्याय पाठ-संवाद
Published / 2024-09-10 17:54:38
गायत्री महाविद्या के तत्वदर्शन पर महिला मंडल का आनलाइन स्वाध्याय पाठ-संवाद

एबीएन सोशल डेस्क। अखिल विश्व गायत्री परिवार शांतिकुञ्ज के तत्वावधान में राष्ट्र स्तरीय संचालित आनलाइन स्वाध्याय महिला मंडल, प्रज्ञामंडल के सानिध्य में पूज्यवर श्रीगुरुदेव वेदमूर्ति- तपोनिष्ठ पण्डित श्रीरामशर्मा आचार्य जी की लिखित वांग्मय गायत्री महाविद्या के तत्वदर्शन पर आनलाइन स्वाध्याय पाठ व संवाद चल रहा है।इसमें आज इसके तत्वदर्शन पर प्रकाश डालकर बताया गया कि ब्रह्मवेत्ता, योगी, अध्यात्मवादी, तत्वदर्शी भक्त वर्ग गायत्री की आद्यशक्ति के एक-एक चरण के उपासक होते हैं। गायत्री को त्रिपदा कहा गया है। उसके तीन चरण हैं। इस त्रिवेणी शक्ति की अधिष्ठात्री को त्रिपदा गायत्री कही गई है। संसार के समस्त दु:खों के प्रधान कारण हैं- अज्ञान, अभाव, अशक्ति और इससे सत, रज, तम की विविधि प्रकृति से मनुष्य का निर्माण हुआ है। वस्तुत: सत्ता दो की है। सत और तम की। रज की उत्पत्ति तो दोनों के सम्मिश्रण से होती है। चर्चा हुई कि दु:खों के कारणों में भी प्रधान दो ही हैं- अज्ञान और अशक्ति। अभाव तो उनकी परिणति है। गायत्री की तीन शक्ति धाराएं हैं- हीं, श्रीं और क्लीं। ह्रीं सद्ज्ञान की, श्रीं वैभव की और क्लीं शक्ति की, बल की प्रतीक हैं। सत्-रज-तम से बनी काया को आवश्यकता तीनों ही शक्ति धाराओं की है। इनमें किसी का भी महत्व कम नहीं है। तीनों का संतुलन आवश्यक है। जीवन निर्वाह के लिए जितना महत्व ज्ञान का है, उतना ही साधनों एवं शक्ति का। एक भी पक्ष छोड़ा नहीं जा सकता।बताया गया कि गायत्री महामन्त्र में तीनों शक्ति धाराओं का समान रूप में समावेश है। साधनों के संग्रह की आपाधापी में विश्व मानस ने चेतना की महत्ता को लगभग भुला दिया है।बताया गया कि आज जरूरत है, उसके लिए आत्मा के अन्दर प्रकाश उत्पन होना चाहिए, जिससे सत्य और असत्य का विवेक जागे। सारांश में दीदी ने बताया कि कुमार्ग को छोड़कर श्रेष्ठ मार्ग पर चलने की प्रेरणा मिले, गायत्री मन्त्र में यही भावना विद्यमान है। उक्त जानकारी गायत्री परिवार के वरिष्ठ साधक सह प्रचार-प्रसार प्रमुख जय नारायण प्रसाद ने दी।

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Tranding

धनतेरस...
Published / 2026-11-06 12:43:31
धनतेरस...