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धर्मांतरण, घुसपैठ, हिंदू समाज कने का षड्यंत्र को समाप्त करना एक बड़ी चुनौती : अंबरीश सिंह
Published / 2024-09-28 23:08:43
धर्मांतरण, घुसपैठ, हिंदू समाज कने का षड्यंत्र को समाप्त करना एक बड़ी चुनौती : अंबरीश सिंह

टीम एबीएन, रांची। विश्व हिंदू परिषद रांची महानगर द्वारा रांची एयरपोर्ट रोड स्थित ग्रीन एकर्स होटल में वर्तमान चुनौतियां और हमारी भूमिका विषय को लेकर प्रबुद्धजनों की एक गोष्ठी का आयोजन किया गया, जिसमें शहर के कई वकील प्रतिष्ठित व्यवसायी विहिप के अधिकारीगण एवं अन्य गणमान्य नागरिक सम्मिलित हुए। गोष्ठी कार्यक्रम के मुख्य वक्ता विश्व हिंदू परिषद के केंद्रीय मंत्री एवं विशेष संपर्क प्रमुख अंबरीश सिंह ने अपने संबोधन में कहां की अवैध धर्मांतरण, घुसपैठ, हिंदू समाज को बांटने का षड्यंत्र सहित अनेक समस्याओं को एक चुनौती के रूप में लेकर इनके निराकरण का मार्गदर्शन किया।उन्होंने कहा इस राष्ट्र की विशेषता है कि सदियों की परतंत्रता के बाद भी हमारा राष्ट्र आज भी पूरी मजबूती के साथ खड़ा है और विश्व का मार्गदर्शन कर रहा है। भारत माता की जय केवल एक नारा नहीं है बल्कि हमारे बीच  एक ही भारत माता के पुत्र हैं इस नाते सहोदर होने की भावना जगाने वाला ध्येय वाक्य है। हमारे पूर्वजों ने मुगलो ,अंग्रेजों से युद्ध किया जिनके बलिदान के फलस्वरुप आज हम यहां खड़े हैं। देश और धर्म पर आज भी अनेक आक्रमण हो रहे हैं जिन्हें चुनौती के रूप में लेकर हमें सामना करने की आवश्यकता है। कार्यक्रम की अध्यक्षता विश्व हिंदू परिषद के प्रांत अध्यक्ष चंद्रकांत रायपत ने की। संचालन महानगर मंत्री विश्वरंजन ने एवं धन्यवाद ज्ञापन महानगर अध्यक्ष कैलाश केसरी ने किया।मौके पर विश्व हिंदू परिषद के क्षेत्र मंत्री श्री वीरेंद्र विमल, प्रांत उपाध्यक्ष श्री राजेंद्र सिंह मुंडा, प्रांत संगठन मंत्री श्रीमान देवी सिंह, प्रांत मंत्री  मिथिलेश्वर मिश्र, स्वामी दिव्यानंद ,युगल किशोर प्रसाद, अमरनाथ ठाकुर, किशुन झा, मनोज पांडेय, अजय अग्रवाल, मदन बगड़िया, दुर्गा वाहिनी विभाग संयोजिका कीर्ति गौरव ,झारखंड स्टेट बार काउंसिल के अध्यक्ष श्रीमान राजेंद्र कृष्ण, झारखंड उच्च न्यायालय के अधिवक्ता अजय पांडेय, अवनीश रंजन मिश्रा, डॉ भारती सिंह, डॉ सीमा सिंह,  आरती सिंह, शंभू गवारे, पारस नाथ मिश्रा, रवि शंकर राय, राजेश अग्रवाल, योगेश खेड़वाल सहित विश्व हिंदू परिषद के महानगर एवं नगर के पदाधिकारी उपस्थित थे। उक्त जानकारी प्रान्त प्रचार प्रसार सहप्रमुख प्रकाश रंजन (93344 33338) ने दी।

सार्वजनिक संपति पर कब्जा जमाने वाले का समूल नाश हो जाता है : जीयर स्वामी
Published / 2024-09-27 17:47:42
सार्वजनिक संपति पर कब्जा जमाने वाले का समूल नाश हो जाता है : जीयर स्वामी

एबीएन न्यूज नेटवर्क, मेदिनीनगर। निगम क्षेत्र के सिंगरा स्थित श्रीमद्भागवत कथा के दौरान जीयर स्वामी ने कहा कि कभी भी सार्वजनिक संपत्ति, पंचायत की संपत्ति, जनहित की संपत्ति, स्कूल, अस्पताल, अनाथालय, मंदिर, मठ, गोशाला, गुरु, पुरोहित को दान दी हुई भूमि संपति को पुन: स्वीकार, भोग या हड़पना नहीं चाहिए। ऐसा करने से कुल खानदान समाप्त हो जाता है। आज का परिवेश ऐसा है कि दादाजी ने स्कूल, मंदिर, मठ, गुरु, पुरोहित सहित सार्वजनिक उपयोग में दान दिया था। अब उनके नाती, पोता कहते हैं कि लिखा पढ़ी नहीं हुआ था हम नहीं मानते हैं। लिखा पढ़ी तो एक कागजी बात है लेकिन जब दिया हुआ था तो दिया हुआ था। ऐसे दान की संपत्ति को अपने पास रख लेते हैं या हड़प लेते है तो जैसे किसी के शरीर पर तेजाब गिर जाने से  शरीर धीरे-धीरे गलकर समाप्त हो जाता है वैसे ही पूरा कुल खानदान समाप्त हो जाता है। इसलिए सार्वजनिक उपयोग में की जाने वाली दान की संपत्ति को हड़पने की कोशिश नहीं करनी चाहिए चाहे कारण हो या ना हो कोई देखा हो या ना देखा हो।यही बातों को भगवान श्रीकृष्णा अपने कुल खानदान के बालकों को समझाया लेकिन कुछ मान गये और कुछ नही माने इसका परिणाम अच्छा नहीं हुआ।अकारण किसी से ईर्ष्या, द्वेष नहीं करना चाहिएभगवान श्रीकृष्ण धर्म की रक्षा एवम मानव कल्याण के धरती पर आए। कभी जंगलों में रहे कभी मथुरा, ब्रज, गोकुल, बृंदावन में रहते हुए द्वारिका में रहे,लेकिन राजा पौंड्रक अकारण ही भगवान श्रीकृष्ण से ईर्ष्या, द्वेष करने लगा। पौंड्रक पुंड्र देश का राजा था जो, खुद को असली कृष्ण घोषित कर रखा था। राजा पौंड्रक के पास नकली सुदर्शन चक्र, शंख, मोर मुकुट, कौस्तुभ मणि जैसी चीजें थीं। राजा पौंड्रक ने खुद को भगवान विष्णु का अवतार कहता था और द्वारिकधीश श्रीकृष्ण को नकली बताता था।भगवान श्रीकृष्ण बहुत समय तक पौंड्रक की इन गलतियों को क्षमा करते रहे। एक दिन राजा पौंड्रक ने द्वारिका में श्रीकृष्ण को संदेश भेजा था कि अब धरती पर भगवान विष्णु का असली अवतार हो चुका है। तुम द्वारिका छोड़कर भाग जाओ अन्यथा युद्ध के लिए तैयार रहो। इस संदेश के बाद श्रीकृष्ण और बलराम पौंड्रक से युद्ध किये। युद्ध में पौंड्रक ने श्रीकृष्ण जैसा स्वरूप बना रखा। पौंड्रक भी युद्ध विद्या जनता था। श्रीकृष्ण और पौंड्रक बीच घमासान युद्ध हुआ जिसमें कृष्ण ने पौंड्रक का अंत कर दिया।

गायत्री परिवार महिला मंडल सत्संग में हुआ अखंड ज्योति मासिक पत्रिका का स्वाध्याय
Published / 2024-09-26 22:59:01
गायत्री परिवार महिला मंडल सत्संग में हुआ अखंड ज्योति मासिक पत्रिका का स्वाध्याय

भारतीय संस्कृति-विश्व संस्कृति में हम से आशाएँ व अपेक्षाएँ विषय पर  पाठ व संवाद हुआएबीएन सोशल डेस्क। गायत्री परिवार शाखा रांची युगतीर्थ शक्तिपीठ सेक्टर टू परिसर में आज गुरुवार महिला मंडल सत्संग में गायत्री महामंत्र जप, लेखन का अनुष्ठान, भजन और अखंड ज्योति मासिक पत्रिका का स्वाध्याय हुआ। विषयगत स्वाध्याय पाठ में दीदी ने बताया कि हम विकास के चरम पर हैं, फिर भी वैश्विक संकट के एक नये दौर से गुजर रहे हैं। तकनीकी विकास में पूरा विश्व एक गाँव के रूप में तब्दील हो गया है। फिर भी लोगो के दिलों के बीच की दूरिया बढ़ रही हैं।भयंकर घृणा, विद्वेष, संघर्ष, हिंसात्मक, युद्धात्मक रूप बन रहा है। ऐसे में आपसी सद्भाव, विश्वास और मानवीय मूल्यों की आवश्यकता व अपेक्षा है, जो पहले से कहीं अधिक आन पड़ी है। इस विषय पर चर्चा हुई कि यहाँ भारतीय संस्कृति की महत्ता अधिक प्रासंगिक हो जाती है, जो सार्वभौम स्वरूप एवं शाश्वत मूल्यों के आधार पर विश्व संस्कृति की भूमिका में अपना योगदान दे सकती है। इस पर महर्षि अरविंद के शब्दों में बताया गया कि आध्यात्मिकता भारतीय संस्कृति को समझने की कुंजी है, जो इसे अन्य संस्कृतियों से अलग करती है। आत्मा-परमात्मा पर जितना चिंतन यहाँ पर हुआ है, उतना शायद ही अन्यत्र कहीं हुआ हो।आगे श्रीअरविंद लिखते हैं कि भारतीय सभ्यता में धर्म द्वारा क्रियाशील हुआ दर्शन और दर्शन द्वारा आलोकित हुआ धर्म ही नेतृत्व करते आये हैं। भारतीय संस्कृति आरंभ से ही एक आध्यात्मिक एवं अंतर्मुखी धार्मिक व दार्शनिक संस्कृति रही है। इसकी व्यापकता व समग्रता भारतीय संस्कृति की विशेषता है। जीवन के समग्र परिष्कार, समाज के बहुमुखी विकास, चेतना के उत्तम उत्कर्ष का जो चिन्तन यहाँ मिलता है, वह अन्यत्र दुर्लभ है। इसकी सर्वोच्चता, श्रेष्ठता में निहित शाश्वत व चिरस्थायी मूल्य में आतमवत् सर्वभूतेषु और वसुधैव कुटुंबकम् जैसे उदात्त जीवन दर्शन को संभव बनाते हैं। उक्त जानकारी गायत्री परिवार के वरिष्ठ साधक जय नारायण प्रसाद ने दी।

जानें कलश स्थापन का शुभ मुहूर्त
Published / 2024-09-26 15:23:13
जानें कलश स्थापन का शुभ मुहूर्त

इस दिन से शुरू हो रहे हैं शारदीय नवरात्रिजानें सही तिथि और कलश स्थापना मुहूर्तएबीएन सोशल डेस्क। भारत में नवरात्रि का पर्व बहुत ही उत्साह और धूमधाम के साथ मनाया जाता है। 2024 शारदीय नवरात्रि की शुरुआत हर साल आश्विन मास की शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि से होती है। साल में 2 प्रमुख नवरात्रि आती हैं। एक चैत्र नवरात्रि और दूसरी शारदीय नवरात्रि। इसके अलावा साल में 2 गुप्त नवरात्रि भी आती हैं। मान्यता है कि नवरात्रि के दौरान माता रानी 9 दिनों के लिए धरती पर आती हैं। नवरात्रि के पवित्र अवधि में माता के 9 स्वरूपों की पूजा करने से मां दुर्गा की विशेष कृपा मिलती है। साथ ही धन, ऐश्वर्य और समृद्धि की प्राप्ति होती है। तो आइए जानते हैं, शारदीय नवरात्रि कब से शुरू होगी और नवरात्रि कलश स्थापना के शुभ मुहूर्त के बारे में-पंचांग के अनुसार, आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि की शुरुआत 3 अक्टूबर की सुबह 12 बजकर 19 मिनट से होगा और इसका समापन 4 अक्टूबर की सुबह 2 बजकर 58 मिनट पर होगा। उदया तिथि के अनुसार, शारदीय नवरात्रि की शुरुआत 3 अक्टूबर से होगी और इसका समापन 12 अक्टूबर 2024 को होगा।इस साल नवरात्रि 3 अक्टूबर से शुरू हो रही है तो कलश स्थापना भी इस दिन होगी। इस दिन घटस्थापना का शुभ मुहूर्त सुबह 6 बजकर 15 मिनट से लेकर 7 बजकर 22 मिनट तक रहेगा। वहीं अभिजीत मुहूर्त सुबह 11 बजकर 46 मिनट से दोपहर 12 बजकर 33 मिनट तक रहने वाला है।हिंदू धर्म में घट स्थापना का विशेष महत्व माना जाता है। नवरात्रि के पहले दिन घट स्थापना की जाती है और मां दुर्गा के अलग-अलग रूपों की पूजा की जाती है। मान्यता है कि घर में कलश स्थापना करने और मां दुर्गा के नौ स्वरूपों की पूजा करने से मन की हर मनोकामना पूरी होती है और माता रानी के आशीर्वाद से शुभ फलों की प्राप्ति होती है।

जिउतिया व्रत पर्व 25 सितंबर को
Published / 2024-09-24 21:03:59
जिउतिया व्रत पर्व 25 सितंबर को

माताएं संतान की दीर्घायु और सुख-समृद्धि के लिए रखती है निर्जला व्रत : संजय सर्राफटीम एबीएन, रांची। विश्व हिंदू परिषद सेवा विभाग एवं राष्ट्रीय सनातन एकता मंच के प्रांतीय प्रवक्ता संजय सर्राफ ने कहा है कि जितिया पर्व 25 सितंबर दिन बुधवार को है। जितिया व्रत हर वर्ष आश्विन माह के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को रखा जाता है। हिंदू धर्म मे जितिया पर्व को जीवित्पुत्रिका व्रत और जिउतिया व्रत के नाम से भी जाना जाता है। हिंदू सनातन धर्म का यह एक  महत्वपूर्ण पर्व है जितिया पर्व  मुख्य रूप से झारखंड, बिहार, उत्तर प्रदेश मे बड़े ही उत्साह पूर्वक मनाया जाता है। यह व्रत माताएं अपने पुत्रों की लंबी उम्र और सुख समृद्धि के लिए करती है। इस दिन महिलाएं 24 घंटे तक निर्जला व्रत उपवास रखती है। जितिया व्रत की पूजा का शुभ मुहूर्त 25 सितंबर को दोपहर 12 बजकर 12 मिनट तक है।दूसरे दिन 26 सितंबर को व्रत का पारण किया जायेगा। माताएं संतान की दीर्घायु, सुखी और निरोगी जीवन के लिए जितिया व्रत रखती है, व्रत वाले दिन महिलाएं नये वस्त्र धारण करती है। तथा उपवास के दिन जीमूत वाहन देव की पूजा पूरे विधि विधान से करती है। पूजन पर नारियल, खीरा, चना, खाजा समेत अन्य पूजा सामग्री चढ़ाते हैं। इस दिन व्रत करने के साथ जो माताएं पूजा के दौरान व्रत कथा पढ़ती और सुनती है उन्हें कभी भी संतान वियोग नहीं सहना पड़ता है, हिंदू धर्म मे व्रत से पूर्व संतुलित आहार का बहुत महत्व दिया गया है, जितिया व्रत से पूर्व महिलाओं के खान-पान का पूरा ध्यान रखा जाता है इस संतुलित आहार के कारण लंबी अवधि तक शरीर को ऊर्जा मिलती है। माना जाता है कि इस व्रत को करने से सभी साधक को सभी प्रकार के कष्टों  से मुक्ति मिलती है। जो माताएं इस व्रत का पालन करती है इस व्रत का फल उनके बच्चों को बुरे स्थिति से बचाता है साथ ही साथ इस व्रत के प्रभाव से संतान की सुखों की प्राप्ति होती है।

दीपयज्ञ और महामंत्र की दिव्य आहुतियों से गुंजायमान रही गायत्री परिवार की हटिया शाखा
Published / 2024-09-22 21:06:40
दीपयज्ञ और महामंत्र की दिव्य आहुतियों से गुंजायमान रही गायत्री परिवार की हटिया शाखा

जन्मदिवस दीपयज्ञ व महामंत्र की दिव्य आहुतियां यज्ञ भगवान को प्रदान कर मनाया गया मंगलमय वंदना करते हुए स्वर में गाये गायत्री माता व गुरुसत्ता का मिले भरपुर आशीर्वाद व प्यार, जिन्दगी में मिले सफलता, साथ ही खुशियां हों अपार एबीएन सोशल डेस्क। गायत्री परिवार महिला मंडल हटिया, ओबरिया रोड शाखा की सदस्य बहनों की प्रतिनिधित्व मंडल की सदस्य बहन मंजू पाण्डे ने अपने पुत्र अभिनव कुमार के पावन जन्मदिवस गायत्री युग तीर्थ शक्तिपीठ सेक्टर टू के साधना कक्ष में दीप श्रृंखला प्रज्ज्वलित कर गायत्री दीपयज्ञ के विधान से विधिवत सोल्लास व उत्साहपूर्वक मनाया। इस अवसर पर सभी ने हार्दिक अभिनन्दन व  मंगलमय बधाई में पुत्र को दीघार्युष्य, स्वस्थ-सुखद जीवन, प्रगतिशील वातावरण, ओजस, तेजस पूर्ण, उज्जवल भविष्य भव की मंगलमय आशीर्वचन सहित स्वस्तिवाचन पाठ किए अंत में शुभ कामनाएं एवं प्रज्ञावतारी गुरुसत्ताश्री से उनके उज्जवल भविष्य की मंगलमय वंदना करते हुए गीत के स्वर में गाये। उक्त जानकारी गायत्री परिवार के वरिष्ठ साधक सह प्रचार-प्रसार प्रमुख जय नारायण प्रसाद ने एक प्रेस विज्ञप्ति जारी कर दी।

महानता से नाता जोड़ने की सूझबूझ अपनाया जाये : दीदी
Published / 2024-09-19 22:08:31
महानता से नाता जोड़ने की सूझबूझ अपनाया जाये : दीदी

गायत्री महिला मंडल का सत्संग, भजन कीर्तन, स्वाध्याय पाठ व संवाद हुआएबीएन सोशल डेस्क। गायत्री युगतीर्थ शक्तिपीठ धूर्वा सेक्टर टू रांची  में गुरुवार को महिला मंडल प्रतिनिधित्व में महामंत्र जप-अनुष्ठान, भजन-कीर्तन और सत्संग स्वाध्याय पाठ हुआ।इस दौरान पूज्यवर श्रीगुरुदेव वेदमूर्ति-तपोनिष्ठ पंडित श्रीरामशर्मा आचार्यजी की अखंड ज्योति पत्रिका का स्वाध्याय पाठ हुआ। दीदी ने पठन-पाठन कर बताया कि पूज्यवर श्रीगुरुदेव की युग निर्माण योजना सत्संकल्प अभियान अनुसार यह आज आवश्यक है कि महानता से नाता जोड़ने की सूझबूझ अपनाया जाये और इस विषय पर स्वाध्याय पाठ किया। बताया कि महानता के साथ सम्पर्क, नाता जोड़ने, जुड़ने का अवसर सदा न आता, न मिलता है। कहा कि दैवी प्रयोजनों में यदि क्षुद्र से जीव भी तनिक सा सहयोग करे, तो दैवी सहायता अपरिमित परिमाण में मिलते हैं।यह सुनिश्चित है कि जिस किसी पर भगवत् कृपा बरसती है, वह महानता से अपना नाता जोड़ने की सूझबूझ सत्प्रेरणा के रूप में ही बरसती है। आज की विषम परिस्थितियों में यदि यह तथ्य हम सब भी सीख समझ कर महानता को अपना सकें तो निश्चित ही उस श्रेय को प्राप्त करेंगे जो प्रज्ञावतार की सत्ता इस संधिकाल की विषम बेला में अनायास ही हमें देना चाहती है। इस बाबत युगानुकुल अनेकानेक उदाहरण दृष्टांत स्मरण कराये और प्रस्तुत किये गये।जैसे पारस पत्थर से काला- कुरूप, सस्ता लोहा का स्पर्श हो बहुमूल्य धातु में, स्वाति की बूंद सीप में पड़ने पर,पेड़ से लिपटकर बेल को ऊंचाई पाना।इससे महान पक्ष को कोई हानि भी नहीं और दुर्बल पक्ष को अनायास वरदान-स्वरूप लाभ प्राप्त होना भी श्रीहनुमान एवं वानरी सेना को प्रभुश्रीराम सेना में जुड़ समुद्र पुल बनाना, लांघना, लंका जलाना,पर्वत उठाना, पंचायतन का अंग बनना और गिलहरी को पूंछ में बालू लपेटकर समुद्र को पाटने की निष्ठा, पांडवों का श्रीकृष्ण रूपी महान सत्ता से जुड़ने वाली बुद्धिमत्ता ने महाभारत से विराट भारत का नवनिर्माण का श्रेयाधिकारी बना देना है।बताया कि समर्पण का भाव, सामीप्य, सानिध्य महानता के साथ जुड़ने का जो उदाहरण हैं, बताते हैं व्यक्ति के व्यक्तित्व के लिए क्या वरेण्य है। अंत में शांतिपाठ व सबके लिए स्वस्थ-सुखद जीवन और उज्जवल भविष्य की मंगल स्वस्तिवाचन हुआ। उक्त जानकारी गायत्री परिवार के वरिष्ठ साधक जय नारायण प्रसाद ने दी।

गायत्री परिवार ने मनाया गुरु माताजी का महाप्रयाण दिवस
Published / 2024-09-18 22:10:11
गायत्री परिवार ने मनाया गुरु माताजी का महाप्रयाण दिवस

शक्तिस्वरूपा परम वं गुरुमाताजी के महाप्रयाण दिवस पर गायत्री परिवार ने उनके संदेशों को स्मरणीय, अनुकरणीय बतायाएबीएन सोशल डेस्क। अखिल विश्व गायत्री परिवार की परम पूज्य वंदनीया गुरुमाताजी का आज महाप्रयाण दिवस है। इस अवसर पर शान्तिकुञ्ज तत्वावधान व मार्गदर्शन में विश्व के समस्त इकाई शाखाओं में शिष्य सदस्यों ने कई कार्यक्रम करके उन्हें स्मरण कर श्रद्धापूर्वक श्रद्धांजलि अर्पित की।अखिल विश्व स्तरीय आनलाइन आध्यात्मिक स्वाध्याय पाठ-संवाद मंडल, जप-अनुष्ठान समूह प्रतिनिधित्व में रेखा बहिन ने बताया  कि परम पूज्य गुरुदेव प्रज्ञावतार के प्रतीक हैं एवं वंदनीया माताजी उनकी दिव्य शक्ति स्वरूपा हैं। उनके जीवन के विभिन्न आयामों को वर्णन करना सामान्य नहीं है। उनका जीवन दिव्यता से ओत-प्रोत था।मातृशक्ति समय समय पर भगवान के अवतार के साथ पृथ्वी पर उनकी सहयोगिनी के रूप में सदा आती रही हैं। गुरुमाता भगवती देवी ने गुरुदेव श्रीप्रज्ञावतार के ज्ञान समुच्चय को अपने हृदय की भक्ति भावना से दिव्य रूप देकर अमृतमय बनाकर अपने शिष्यों को वरदान आशीर्वाद प्रदान कर नवयुग सृजन में युग संजीवनी के दिव्य चिन्तन की बूंदों से शिष्यों को अभिचिंसन किया। आज भाद्रपद पूर्णिमा के पावन अवसर सह महाप्रयाण दिवस पर अखिल विश्व स्तरीय गायत्री परिवार सदस्यों शिष्यों ने सुबह से 24 घंटे का अखंड जप-अनुष्ठान, हवन-यज्ञ विधान और सायंकालीन दीपयज्ञ विधान करके सोल्लास संपन्न किया। परम वंदनीय माता जी के व्यक्तित्व से हमें यह गुण सीखने को मिलता है कि एक नारी के अंदर अपार शक्ति का भंडार होता है, उसे बस पहचाने की आवश्यकता होती है। माताजी ने हम सभी को अपने संगठन शक्ति के द्वारा,मातृ शक्ति के द्वारा संपूर्ण अखिल विश्व गायत्री परिवार को एक धागे में पिरोया है।जब - जब कोई भी कठिनाइयां आती, तो उन्हें वह अपने मातृत्व के आंचल से समेट लेती। उनका यह आंचल किसी भी प्रकार की परेशानियों के लिए छोटा नहीं पड़ा। अतः हम सभी को उनके व्यक्तित्व से नेतृत्व क्षमता की सीख लेनी चाहिए, जिसके माध्यम से उन्होंने विपरीत से विपरीत परिस्थितियों को धैर्य एवं सरलता से हल किया।इस अवसर पर सभी ने उनके अन्नपूर्णा ममतामयी स्वरूप को शत-शत नमन किया गया। उक्त जानकारी गायत्री परिवार के वरिष्ठ साधक सह प्रचार-प्रसार प्रमुख जय नारायण प्रसाद ने दी।

क्या है पितृ पक्ष, पढ़ें एबीएन की विशेष प्रस्तुति...
Published / 2024-09-18 09:58:25
क्या है पितृ पक्ष, पढ़ें एबीएन की विशेष प्रस्तुति...

एबीएन सोशल डेस्क। बहुत जिज्ञासा होती है आखिर ये पितृपक्ष क्या होता हैं? पितृदोष है क्या? पितृदोष शांति के उपाय क्या हैं, पितृ या पितृगण कौन हैं? आपकी जिज्ञासा को शांत करती abnnews24.com की विस्तृत प्रस्तुति...पितृपक्ष या पितरपख16 दिन की वह अवधि (पक्ष/पख) है जिसमें सनातनी लोग अपने पितरों को श्रद्धापूर्वक स्मरण करते हैं और उनके लिये पिण्डदान करते हैं। इसे सोलह श्राद्ध, महालय पक्ष, अपर पक्ष आदि नामों से भी जाना जाता है।जानें कौन हैं पितृगणपितृगण हमारे पूर्वज हैं जिनका ऋण हमारे ऊपर है, क्योंकि उन्होंने कोई ना कोई उपकार हमारे जीवन के लिए किया है मनुष्य लोक से ऊपर पितृ लोक है, पितृ लोक के ऊपर सूर्य लोक है एवं इस से भी ऊपर स्वर्ग लोक है।कहां-कहां से होकर गुजरती है आत्माआत्मा जब अपने शरीर को त्याग कर सबसे पहले ऊपर उठती है तो वह पितृ लोक में जाती है, वहां हमारे पूर्वज मिलते हैं अगर उस आत्मा के अच्छे पुण्य हैं तो ये हमारे पूर्वज भी उसको प्रणाम कर अपने को धन्य मानते हैं की इस अमुक आत्मा ने हमारे कुल में जन्म लेकर हमें धन्य किया इसके आगे आत्मा अपने पुण्य के आधार पर सूर्य लोक की तरफ बढ़ती है।फिर कहां जाती है आत्मावहाँ से आगे, यदि और अधिक पुण्य हैं, तो आत्मा सूर्य लोक को भेद कर स्वर्ग लोक की तरफ चली जाती है, लेकिन करोड़ों में एकआध आत्मा ही ऐसी होती है, जो परमात्मा में समाहित होती है जिसे दोबारा जन्म नहीं लेना पड़ता मनुष्य लोक एवं पितृ लोक में बहुत सारी आत्माएं पुनः अपनी इच्छा वश, मोह वश अपने कुल में जन्म लेती हैं।पितृ दोष क्या होता हैहमारे ये ही पूर्वज सूक्ष्म व्यापक शरीर से अपने परिवार को जब देखते हैं ,और महसूस करते हैं कि हमारे परिवार के लोग ना तो हमारे प्रति श्रद्धा रखते हैं और न ही इन्हें कोई प्यार या स्नेह है और ना ही किसी भी अवसर पर ये हमको याद करते हैं, ना ही अपने ऋण चुकाने का प्रयास ही करते हैं तो ये आत्माएं दुखी होकर अपने वंशजों को श्राप दे देती हैं, जिसे पितृ- दोष कहा जाता है।क्या-क्या आती हैं बाधाएंपितृ दोष एक अदृश्य बाधा है। ये बाधा पितरों द्वारा रुष्ट होने के कारण होती है पितरों के रुष्ट होने के बहुत से कारण हो सकते हैं, आपके आचरण से, किसी परिजन द्वारा की गयी गलती से, श्राद्ध आदि कर्म ना करने से, अंत्येष्टि कर्म आदि में हुई किसी त्रुटि के कारण भी हो सकता है।ये हैं संकेतइसके अलावा जिनके घर में प्रेत बाधा हो, घर में सदैव अशांति का रहना, परिवार के लोगों में आपसी मतभेद का होना, बार- बार दुर्घटना का घटित होना, किसी भी सदस्य का हमेशा बीमार रहना, बनते कार्यों में रुकावटें आना, संतान न होना अथवा विकलांग होना, अकाल मृत्यु का होना, मतिभ्रम होना, परिवार में दुख हो, कष्ट हो, आर्थिक परेशानी हो, ऋण का भार हो, विवाह-बाधा व असफलता जैसी अनेक नकारात्मक स्थितियां बन रही हो जीवन भर तो समझ लो 95 पितृदोष का कारण हैं। यदि आपके घर-परिवार में भी इस तरह की परेशानियां है तो समझ लो ये पितृदोष के वजह से हैं।ये कर सकते हैंपितृपक्ष चलने वाले पंचबलि कार्यक्रम आप भी आयोजित करवा सकते हैं। ये पंचबलि कार्यक्रम पितरों की आत्मा के शांति, पितृदोष निवारण के लिए ही किया जाता है।पितृ दोष दो प्रकार से प्रभावित करता हैअधोगति वाले पितरों के कारणउर्ध्वगति वाले पितरों के कारणअधो गति के प्रभावअधोगति वाले पितरों के दोषों का मुख्य कारण परिजनों द्वारा किया गया गलत आचरण, अतृप्त इच्छाएं, जायदाद के प्रति मोह और उसका गलत लोगों द्वारा उपभोग होने पर, विवाहादि में परिजनों द्वारा गलत निर्णय। परिवार के किसी प्रियजन को अकारण कष्ट देने पर पितर क्रुद्ध हो जाते हैं, परिवार जनों को श्राप दे देते हैं और अपनी शक्ति से नकारात्मक फल प्रदान करते हैं।ऊर्ध्व गति के प्रभावउर्ध्व गति वाले पितर सामान्यतः पितृदोष उत्पन्न नहीं करते, परन्तु उनका किसी भी रूप में अपमान होने पर अथवा परिवार के पारंपरिक रीति-रिवाजों का निर्वहन नहीं करने पर वह भी पितृदोष उत्पन्न करते हैं।ये भी बाधा संभवइनके द्वारा उत्पन्न पितृदोष से व्यक्ति की भौतिक एवं आध्यात्मिक उन्नति बिलकुल बाधित हो जाती है, फिर चाहे कितने भी प्रयास क्यों ना किये जाएँ, कितने भी पूजा पाठ क्यों ना किये जाएँ, उनका कोई भी कार्य ये पितृदोष सफल नहीं होने देता। पितृ दोष निवारण के लिए सबसे पहले ये जानना ज़रूरी होता है कि किस गृह के कारण और किस प्रकार का पितृ दोष उत्पन्न हो रहा है?इससे पता चलता है पितृ दोषजन्म पत्रिका और पितृ दोष जन्म पत्रिका में लग्न, पंचम, अष्टम और द्वादश भाव से पितृदोष का विचार किया जाता है। पितृ दोष में ग्रहों में मुख्य रूप से सूर्य, चन्द्रमा, गुरु, शनि और राहू -केतु की स्थितियों से पितृ दोष का विचार किया जाता है।इनमें से भी गुरु, शनि और राहु की भूमिका प्रत्येक पितृ दोष में महत्वपूर्ण होती है इनमें सूर्य से पिता या पितामह, चन्द्रमा से माता या मातामह, मंगल से भ्राता या भगिनी और शुक्र से पत्नी का विचार किया जाता है। इसी कारण देखने में आया है कि ऐसे लोगों का पूरा परिवार जीवन भर नहीं बस पाता है, वंश हीनता, संतानों का गलत संगति में पड़ जाना, परिवार के सदस्यों का आपस में सामंजस्य न बन पाना, परिवार कि सदस्यों का किसी असाध्य रोग से ग्रस्त रहना इत्यादि दोष उस परिवार में उत्पन्न हो जाते हैं।इन समस्त दोषों के निवारण हेतु शास्त्रों ने त्रिपिण्डीश्राद्ध का अचूक विधान निर्देशित किया है, जिससे सरलता से पितृदोष से निवृत्ति प्राप्त हो, पितरों की अक्षय कृपा प्राप्त होती है...त्रिपिण्डी श्राद्ध का परिचय एवं माहात्म्यअपनी वंशपरम्परा में होने वाले अनेक प्रकार के दैहिक- दैविक भौतिक तापों के उपशमन के लिये त्रिपिण्डी श्राद्ध करने की शास्त्र समर्थित लोकमान्य परम्परा है। वंश में मृत और असद्गतिप्राप्त प्राणियों के द्वारा अनेक प्रकार की शारीरिक मानसिक पीड़ा के साथ ही सन्तान-परम्परा की वृद्धि का न होना इत्यादि अनेक ऐसे उपद्रव हैं, जिन उपद्रयों का कारण कुछ विदित नहीं होता और आश्चर्यजनकरूप से घटित होने वाले उन उपद्रवों की व्यथा और कष्ट को विवश होकर सहना पड़ता है। ये उपर्युक्त प्रेत या पितृ बाधाएँ अपने कुल में अथवा अन्य कुल में उत्पन्न असद्गतिप्राप्त प्रेतों द्वारा की गयी होती हैं। यहाँ यह समझना चाहिये कि न केवल अपने कुल के असद्गतिप्राप्त प्राणी भूत-प्रेत-पिशाचादि योनियों में प्रविष्ट होकर ऐसी बाधा करते हैं, प्रत्युत अन्य जातीय वंशपरम्परा में उत्पन्न हुए जीव भी, जिनसे द्वेष-प्रीति तथा धन-धान्यादि का सम्बन्ध होता है, भूत-प्रेत-पिशाचादि योनियों को प्राप्त करके उपर्युक्त उपद्रवों को करते हैं तथा पीड़ाकारी होते हैं। उपर्युक्त पीड़ा पहुंचाने वाले भूत-प्रेतादि वायु रूप में होकर सात्त्विक, राजस तथा तामस-भेद से प्रेत के रूप में होकर द्युलोक, अन्तरिक्ष तथा पृथ्वीलोक में अतृप्त होकर भ्रमण करते रहते हैं। उनमें सत्वगुणप्रधान प्रेतादि विष्णुमय, रजोगुण प्रधान प्रेतादि ब्रह्ममय और तमोगुण प्रधान प्रेतादि रुद्रमय संज्ञा वाले कहलाते हैं।त्रिपिण्डीश्राद्ध इन्हें उत्तम लोक प्राप्त कराने की विधि है। इस श्राद्ध में सात्विक, राजस तथा तामस प्रेतों के निमित्त विभिन्न द्रव्यों से तीन पिण्ड बनाकर विशेष विधि से श्राद्ध किया जाता है, इसलिये यह श्राद्ध त्रिपिण्डीश्राद्ध कहलाता है। श्राद्ध के माध्यम से उत्तम लोक को प्राप्त हो जाने के पश्चात्पू र्वोक्त भूत-प्रेतादि इष्टप्रतिबन्धक, अर्थात मनोनुकूल इच्छा प्राप्ति में बाधक न होकर कर्ता को सर्वाभीष्ट प्राप्त कराने में सहायक होते हैं। ऐसे प्राणी भी, जो आत्महत्या आदि दुर्मरण से शरीर का त्याग करते हैं अथवा जिनका शास्त्रोक्त विधि से और्ध्वदैहिक संस्कार नहीं किया जाता, वे सब भूत-प्रेतादि योनियों को प्राप्त होते हैं।नारायणबलि तथा त्रिपिण्डी श्राद्ध का उद्देश्य भेदजिन जीवों का दुर्मरण हो जाता है या जो पितर किसी भी कारणवश असंतुष्ट होते हैं, उनके और्ध्वदैहिकश्राद्ध की सफलता के लिये प्रायश्चित्तरूप से शास्त्रों में नारायणबलि करने का विधान है। अपने कुल में अथवा अपने से सम्बद्ध किसी अन्य कुल में उत्पन्न किसी जीव के प्रेत योनि प्राप्त होने पर उसके द्वारा अपने वंश में सन्तान प्राप्ति में बाधा अथवा अन्य प्रकार के होने वाले अनिष्टों की निवृत्ति के उद्देश्य से किया जाने वाला श्राद्ध त्रिपिण्डी श्राद्ध कहलाता है। नारायण बलि में अपने कुल गोत्र के दुर्मरणग्रस्त जीव का उद्धार हो जाये-यह उद्देश्य होता है, जबकि त्रिपिण्डी श्राद्ध में अपनी वंश-परम्परा में होने वाले अनिष्टों की निवृत्ति के उद्देश्य से श्राद्ध किया जाता है। नारायण बलि मुख्यरूप से देवताओं की प्रसन्नता के उद्देश्य से किया जाने वाला श्राद्ध होता है, जिसमें केवल एक प्रेत का ही श्राद्ध किया जाता है, जबकि त्रिपिण्डीश्राद्ध में सात्विक -राजस-तामस प्रेतों के उदेश्य से भी श्राद्ध होता है।

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Published / 2026-11-06 12:43:31
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