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251 कुंडीय विराट गायत्री महायज्ञ द्वारका दिल्ली में 5 दिवसीय अनुष्ठान का भूमिपूजन
Published / 2024-11-10 20:58:35
251 कुंडीय विराट गायत्री महायज्ञ द्वारका दिल्ली में 5 दिवसीय अनुष्ठान का भूमिपूजन

टीम एबीएन, रांची। अखिल विश्व गायत्री परिवार शांतिकुंज हरिद्वार के तत्वावधान में आयोजित होने वाले  251 कुंडीय विराट गायत्री महायज्ञ द्वारका दिल्ली में 5 दिवसीय अनुष्ठान की भूमिपूजन आज रविवार को हुआ। अखिल विश्व गायत्री परिवार शांतिकुंज हरिद्वार के तत्वावधान में नई दिल्ली द्वारिका एरिया में पांच दिवसीय 251 कुंडीय विराट गायत्री महायज्ञ द्वारका सेक्टर 7 दादादेव मंदिर पास मेला ग्राउंड में होगा। इस अनुष्ठान कार्यक्रम का भूमिपूजन रविवार को हुआ। यह विराट अनुष्ठान कार्यक्रम 20 नवम्बर से 24 नवम्बर 2024 तक होना है। बताया गया कि इस महायज्ञ में भाग लेने हेतु सभी यज्ञकर्ता परिजन, सभी कार्यकर्ता, सदस्य, अपना परिवार सहित सभी आगंतुकों में प्रत्येक परिजन के लिए आॅनलाइन रजिस्ट्रेशन अनिवार्य किया गया है। इसके लिए क्यूआरकोड की भी व्यवस्था की गयी है। इस भूमिपूजन कार्यक्रम में झारखंड प्रान्त रांची व कुछ अन्य जिला के भी सदस्य गण शामिल पाए गये। परम वंदनीया गुरुमाता जी की जन्म शताब्दी वर्ष सह अखंड दीप शताब्दी वर्ष की विश्व स्तरीय और झारखंड के लिए दिव्य कलश रथ भ्रमण यात्रा संबंधित विशेष शांतिकुञ्ज प्रशिक्षण सत्र में भागीदार करने वाले दिल्ली पधारे रांची के परिजन इस महायज्ञ में अपनी भागीदारी में समयदान करके पुण्यलाभ की अभिलाषा व्यक्त किए। भूमिपूजन कार्यक्रम 5 कुंडीय संक्षिप्त यज्ञ सहित हुआ। मंच से शांतिकुंज के  महाप्रबंधक महोदय ने जनसमूह को संबोधित कर पूज्य गुरुदेव युग-ऋषि वेदमूर्ति-तपोनिष्ठ पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य के जीवन वृतांत, व्यक्तिव की खूबियों, युग निर्माण संबंधित विराट योजना तथा इसके 18 विशिष्ट सूत्रों के सत्संकल्प पाठ पर ध्यान आकर्षित कर इसकी विशिष्ट महत्ता और आवश्यकता पर तथा भारतीय संस्कृति और अध्यात्म दर्शन पर संक्षिप्त प्रकाश डाला। इसमें करीब पांच से छ: सौ कार्यकर्ताओं ने भागीदारी करके सफल बनाया। उक्त जानकारी गायत्री परिवार रांची के वरिष्ठ साधक सह प्रचार-प्रसार प्रमुख जय नारायण प्रसाद ने दी।

हर्षोल्लास के साथ मनाया गया आंवला नवमी
Published / 2024-11-10 20:56:49
हर्षोल्लास के साथ मनाया गया आंवला नवमी

एबीएन सोशल डेस्क। आज कार्तिक माह के शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि को आंवला नवमी पर्व हर्षोल्लास के साथ मनाया गया। आंवला नवमी में महिलाएं उपवास रखते हुए अपने-अपने घरों में तथा आंवला के पेड़ की पूजा पूरे विधि विधान के साथ की। यह पर्व आंवले के पेड़ की पूजा के लिए मनाया जाता है, जो स्वास्थ्य और समृद्धि का प्रतीक है। आंवले के पेड़ की पूजा से भगवान विष्णु की कृपा प्राप्त होती है, इस दिन आंवले के पेड़ के नीचे भोजन करने से स्वास्थ्य और समृद्धि मिलती है। आंवला नवमी पर्व हमें स्वास्थ्य और समृद्धि की दिशा में आगे बढ़ने का अवसर प्रदान करता है। इस पर्व को मनाने से हमें भगवान विष्णु की कृपा प्राप्त होती है और हमारे जीवन में सुख और समृद्धि आती है। बताते चलें कि तिरुपति अपार्टमेंट कांके रोड में एक सनातनी अनुराधा सर्राफ ने पारंपरिक तरीके से आंवला नवमी की पूजा की।

आंवला नवमी स्वास्थ्य और समृद्धि का पर्व : संजय सर्राफ
Published / 2024-11-09 19:12:04
आंवला नवमी स्वास्थ्य और समृद्धि का पर्व : संजय सर्राफ

टीम एबीएन, रांची। विश्व हिंदू परिषद सेवा विभाग एवं राष्ट्रीय सनातन एकता मंच के प्रांतीय प्रवक्ता संजय सर्राफ ने कहा है कि कार्तिक माह के शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि के दिन मनाया जाने वाला आंवला नवमी पर्व हिंदू धर्म में बहुत महत्व रखता है। यह पर्व आंवले के पेड़ की पूजा के लिए मनाया जाता है, जो स्वास्थ्य और समृद्धि का प्रतीक है। हिंदू पंचांग के अनुसार अक्षय नवमी का आरंभ 9 नवंबर की रात को 10 बजकर 45 मिनट पर होगा और अगले दिन 10 नवंबर को रात 9 बजकर 1 मिनट पर इसका समापन होगा। इसलिए उदया तिथि की मान्यता के अनुसार अक्षय नवमी 10 नवंबर की रात को मनायी जायेगी। पौराणिक कथा के अनुसार, आंवले के पेड़ की उत्पत्ति भगवान विष्णु के शरीर से हुई थी। जब भगवान विष्णु ने वामन अवतार लिया, तो उन्होंने राजा बलि से तीन पग भूमि मांगी। राजा बलि ने भगवान विष्णु को तीन पग भूमि देने का वचन दिया, लेकिन भगवान विष्णु ने तीन पग में ही समस्त भूमि को माप लिया और राजा बलि को पाताल लोक में भेज दिया। राजा बलि की पत्नी विंध्यावली ने भगवान विष्णु से अपने पति की मुक्ति के लिए प्रार्थना की। भगवान विष्णु ने उन्हें वरदान दिया कि आंवले के पेड़ की पूजा से राजा बलि की मुक्ति होगी। आंवला नवमी में महिलाएं आंवला पेड़ की पूजा पूरे विधि विधान के साथ करती है। आंवले के पेड़ की पूजा से भगवान विष्णु की कृपा प्राप्त होती है, इस दिन आंवले के पेड़ के नीचे भोजन करने से स्वास्थ्य और समृद्धि मिलती है। आंवला नवमी पर्व हमें स्वास्थ्य और समृद्धि की दिशा में आगे बढ़ने का अवसर प्रदान करता है। इस पर्व को मनाने से हमें भगवान विष्णु की कृपा प्राप्त होती है और हमारे जीवन में सुख और समृद्धि आती है।

चार दिवसीय लोक आस्था का महापर्व छठ 5 नवंबर से
Published / 2024-11-03 21:38:47
चार दिवसीय लोक आस्था का महापर्व छठ 5 नवंबर से

छठ पर्व मे सूर्य, जल और वायु तीनों तत्वों की होती है पूजा : संजय सर्राफटीम एबीएन, रांची। विश्व हिंदू परिषद सेवा विभाग एवं राष्ट्रीय सनातन एकता मंच के प्रांतीय प्रवक्ता संजय सर्राफ ने कहा है कि लोक आस्था का महापर्व छठ का चार दिवसीय अनुष्ठान 5 नवंबर दिन मंगलवार को कार्तिक शुक्ल चतुर्थी से नहाए खाय के साथ शुरू हो रहा है। 6 नवंबर को खरना मे छठ व्रती पूरे दिन का उपवास कर शाम में भगवान भास्कर की पूजा कर प्रसाद ग्रहण करेगी तथा 7 नवंबर गुरुवार की शाम डूबते सूर्य को अर्घ्य दिया जायेगा। छठ महापर्व के चतुर्थ दिवसीय अनुष्ठान के अंतिम दिन शुक्रवार 8 नवंबर को उगते सूर्य को अर्घ्य देकर आयु आरोग्यता, यश, संपदा का आशीर्वाद लिया जायेगा। छठ पूजा एक ऐसा महापर्व है जो अपने आप में विश्वास, श्रद्धा और प्रकृति के प्रति आभार का प्रतीक है। यह पर्व मुख्य रूप से बिहार झारखंड एवं पूर्वी उत्तर प्रदेश मे धूमधाम से मनाया जाता है। छठ पूजा सूर्य देव और छठी मैया को समर्पित है सूर्य देव को जीवन दाता माना जाता है और छठी मैया को संतान की देवी, इस पर्व मे सूर्य, जल और वायु तीनों तत्वों की पूजा की जाती है। छठ पूजा करने से स्वास्थ्य और समृद्धि की प्राप्ति होती है। छठ पूजा के दौरान सभी लोग मिलजुल कर पूजा करते हैं जिससे सामाजिक एकता बढ़ती है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार पहली बार त्रेता युग में माता सीता ने छठ का व्रत किया था तो वही भगवान श्री राम ने सूर्य देव की आराधना की थी इसके अलावा द्वापर युग में दानवीर कर्ण और द्रौपदी ने भगवान सूर्य की पूजा और उपासना की थी। तब से ही छठ का त्यौहार बड़े ही श्रद्धा के साथ मनाया जाता है। एक और मान्यता है कि प्रियंवद ने सबसे पहले छठ माता की पूजा की थी। 36 घंटे निर्जला व्रत रखने वाले जातकों के जीवन से सभी प्रकार से दुख कष्ट दूर हो जाते हैं। हिंदू धर्म में छठ पूजा में छठ मैया और सूर्य देवता की पूरे विधि विधान से पूजा की जाती है। दीपावली के 6 दिन बाद छठ पर्व मनाया जाता है। छठ पूजा 4 दिनों तक चलता है जिसमें शुरूआत होती है नहाए खाय और खरना से, फिर डूबते और उगते सूर्य देव को अर्घ्य दिया जाता है। इसमें व्रती महिलाएं 36 घंटे तक निर्जला व्रत रखते हुए पूरी निष्ठा एवं पवित्रता के साथ फल, मिष्ठान, नारियल, पान, सुपारी, माला, फूल अरिपन से डाला सजाकर छठ घाट नदी, तालाबों में कमर तक जल में डूब कर सूर्य देवता को अर्घ्य देकर उनकी पूजा करती है। सूर्य को अर्घ्य देने से मानसिक शांति, उन्नति व प्रगति होती है तथा छठ मैया की पूजा करने से व्रती को आरोग्यता, सुख- समृद्धि, संतान सुख का आशीर्वाद प्राप्त होता है।

ईश्वर के वचन से ही साकारात्मक परिवर्तन संभव : महाधर्माध्यक्ष विंसेंट आइंद
Published / 2024-11-03 21:11:03
ईश्वर के वचन से ही साकारात्मक परिवर्तन संभव : महाधर्माध्यक्ष विंसेंट आइंद

टीम एबीएन, डोरंडा/ रांची। रांची महाधर्मप्रांत के सभी संतों के गिरिजा, डोरंडा में आज एक साथ तीन पर्व मनाया गया। पल्ली दिवस, नवाखानी का पर्व मनाने के साथ ही डोरंडा पल्ली के 61 कैथोलिक बच्चों को महाधर्माध्यक्ष विंसेंट आइंद द्वारा दृढ़करण संस्कार प्रदान किया गया।  डोरंडा पल्ली के विश्वासियों के लिए आज का दिन विशेष रहा क्योंकि आज पल्ली दिवस, नवाखानी पर्व और दृढ़करण संस्कार का दिन रखा गया। इस अवसर पर रांची के महाधर्माध्यक्ष विंसेंट आइंद ने पल्ली के कैथोलिक विश्वासियों के लिए पर्व का मिस्सा बलिदान अर्पित करने के साथ ही 61 व्यस्कों को दृढ़करण संस्कार प्रदान किया।इस विशेष उपलक्ष्य में उन्होंने अपने धर्मोपदेश में कहा कि: हमें ईश्वर का वचन सुनने की आवश्यकता है और न सिर्फ सुनने की बल्कि सुन कर उसे अपने जीवन में लागु करने की जरूरत है क्योंकि इसी से ही हमारे जीवन में सकारात्मक परिवर्तन होता है। मिस्सा के अंत में महाधर्माध्यक्ष और सभी पुरोहितों का पल्लीवासियों ने जोरदार स्वागत किया और उनका आभार प्रकट किया। पल्ली दिवस, नवाखानी एवं दृढ़करण संस्कार के दिन सांस्कृतिक समारोह का भी आयोजन किया। महाधर्माध्यक्ष विंसेंट आइंद ने सांस्कृतिक कार्यक्रम के दौरान अपने संबोधन में संत मदर तेरेसा के जीवन पर प्रकाश डालते हुए कहा कि हम भी अपने जीवन को संतों के समान बनाएं। इसमें पल्लीवासियों ने रंगारंग प्रस्तुति से लोगों का हृदय जीत लिया। महाधर्माध्यक्ष ने पल्ली के विश्वासियों को और मजबूत बनने और बच्चों को उनके विश्वास तथा कलीसिया के विस्तार में अपनी सहभागिता दशार्ने जैसे गुणों के विकास करने में उनकी अगुवाई करने की सलाह दी।  डोरंडा के पल्ली दिवस नवाखानी, एवं दृढ़करण संस्कार के दिन के अवसर पर आयोजित सांस्कृतिक कार्यक्रम समारोह में रांची के महाधर्माध्यक्ष विंसेंट आइंद के आलावा, डोरंडा के पल्ली पुरोहित फा पीटर सांगा, सहायक पल्ली पुरोहित फा माईकल नाग, सहायक पल्ली पुरोहित फा अमित डुंगडुंग, फा जॉर्ज, आर्चबिशप के सेक्रेटरी फा असीम मिंज, धर्मबहनें एवं हजारों की संख्या में ख्रीस्त विश्वासी शामिल हुए।

तूं जुग जुग एको सदा सदा तूं एको जी...
Published / 2024-11-03 21:10:18
तूं जुग जुग एको सदा सदा तूं एको जी...

रविवार को कृष्णा नगर कॉलोनी गुरुद्वारा में हुई सत्संग सभा सह प्रभात फेरीटीम एबीएन, रांची। गुरुद्वारा श्री गुरुनानक सत्संग सभा की प्रभात फेरी तीसरे दिन आज 3 नवंबर, रविवार को कृष्णा नगर कॉलोनी गुरुद्वारा साहिब से आरंभ होकर रिम्स बरियातू के सामने डॉक्टर अजय छाबड़ा के फ्लैट सुबह 6 बजे पहुंची। वहां से निकलकर फेरी बरियातू रामेश्वरम स्थित हरीश अरोड़ा, पप्पू काठपाल के अपार्टमेंट गई और फिर वहां से निकलकर रामेश्वरम स्थित स्वर्गीय जगत सिंह सुखीजा, लेखराज अरोड़ा, प्रकाश अरोड़ा, हंसराज अरोड़ा और प्रेम मिढ़ा के संयुक्त आवासीय परिसर पहुंची और मनीष मिढ़ा द्वारा अरदास के साथ यही प्रभात फेरी का समापन सुबह नौ बजे हो गया। फेरी के स्वागत में तीनों जगह श्रद्धालुओं द्वारा चाय नाश्ते के लंगर की व्यवस्था की गई। फेरी में गीता कटारिया, शीतल मुंजाल, मंजीत कौर, रेशमा गिरधर, नीता मिढ़ा, इंदु पपनेजा, बबिता पपनेजा, जसपाल मुंजाल, इंदर मिढ़ा, रमेश पपनेजा ने हरि के जन सतगुर सतपुरखा बिनउ करउ गुर पास हम कीरे किरम सतगुर शरणाई कर दइआ नाम परगास... और सभि जीअ तुमारे जी तूं जीआ का दातारा हरि धिआवहु संतहु जी सभि दूख विसारणहारा... एवं तूं जुग जुग एको सदा सदा तूं एको जी तूं निहचल करता सोई... जैसे कई शबद गायन के साथ साथ संगत को वाहेगुरु का जाप भी कराया। सरदार भूपिदंर सिंह ने निशान साहिब उठाकर फेरी की अगुवाई की। मनीष मिढ़ा ने श्रद्धालुओं के घरों के सामने अरदास की। श्रद्धालुओं ने अपने परिसर की साफ सफाई तथा पुष्प वर्षा कर फेरी का श्रद्धा भाव से स्वागत किया। सत्संग सभा के सचिव अर्जुन देव मिढ़ा ने सभी श्रद्धालुओं का फेरी के स्वागत और लंगर सेवा के लिए धन्यवाद किया। मीडिया प्रभारी नरेश पपनेजा ने बताया कि सत्संग सभा द्वारा श्रद्धालुओं को ले आने जाने के लिए दो बसों की व्यवस्था भी की गयी थी। आज की फेरी में लेखराज अरोड़ा, डॉ अजय छाबड़ा, प्रेम मिढ़ा, प्रकाश अरोड़ा, हरीश अरोड़ा, पप्पू काठपाल, हंसराज अरोड़ा, गुंजन अरोड़ा, कौशिक अरोड़ा, तुषार मिढ़ा, गीत अरोड़ा, हर्षित अरोड़ा, ऋतिक सुखीजा, गर्व सुखीजा, जीत अरोड़ा, बेला सुखीजा, तरुणा छाबड़ा, गीता मिढ़ा, आशा अरोड़ा, ज्योति अरोड़ा, ऋतु अरोड़ा, ललिता काठपाल, ऋचा अरोड़ा, कोमल अरोड़ा, प्रिया काठपाल समेत अन्य शामिल थे।

ख्रीस्तीयों ने अपने मृतजनों को याद कर उनके लिए की प्रार्थना
Published / 2024-11-02 21:15:41
ख्रीस्तीयों ने अपने मृतजनों को याद कर उनके लिए की प्रार्थना

टीम एबीएन, रांची। ख्रीस्तीयों ने आज अपने मृतजनों को याद किया और उनके लिए प्रार्थनाएं की। कैथोलिक विश्वासी प्रत्येक वर्ष 02 नवंबर को कब्र पर्व मनाते हैं और मृतजनों की आत्मा शांति के प्रार्थना करते हैं। इसी अवसर पर आज रांची टमटमटोली में स्थित कब्र स्थान पर कैथोलिक विश्वासी इकट्ठे हो कर रांची महाधर्मप्रांत के महाधर्माध्यक्ष विंसेंट आइंद की अगुवाई में हो रहे मिस्सा बलिदान में शामिल हुए।सभी कैथोलिक विश्वासियों के लिए कब्र पर्व एक विशेष अवसर है। इस दिन वे अपने परिवार के मृत माता पिता, भाई, बहन और रिश्तेदारों को याद करते, उनके जीवन दान के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते और उनके आत्मा शांति के लिए प्राथनाएं करते हैं। कैथोलिकों का विश्वास है कि शरीर के मर जाने पर जीवन समाप्त नहीं होता बल्कि वे एक नये जीवन में प्रवेश करते हैं। जैसे प्रभु येसु क्रूस में मरने के बाद पुन: जी उठे वैसे ही वे भी जी उठेंगे और ईश्वर के राज्य में अर्थात स्वर्ग में दूतों एवं संतों की संगति में वे सदा सर्वदा शांति में निवास करेंगे। इसी विश्वास के साथ कैथोलिक उन मृत विश्वासियों के लिए विशेष प्रार्थना करते हैं जो अभी तक स्वर्ग राज्य में प्रवेश नहीं कर पाये हैं। कब्र पर्व के उपलक्ष्य में महाधर्माध्यक्ष विंसेंट आइंद ने मिस्सा बलिदान के दौरान अपने धर्मोपदेश में कहा कि हमारा वास्तविक निवास स्वर्ग है जिसकी ओर हम तीर्थयात्री के रूप में अपना कदम बढ़ा रहें हैं। इस शरीर के नष्ट होने पर हम भी प्रभु येसु के समान पुन: जी उठेंगे। उन्होंने कब्र पर्व के अवसर उन सभी मृत विश्वासियों के लिए प्रार्थना की और कब्रों आशीष प्रदान की। विश्वासियों ने अपने मृतजनों की कब्रों में मोमबत्ती और अगरबत्ती जलाई तथा फूलों से कब्रों को सजाया।  कब्र पर्व के अवसर पर रांची के महाधर्माध्यक्ष विंसेंट आइंद, फा आनंद डेविड खलखो रांची के पल्ली पुरोहित, फा दीपक बाड़ा, रांची पल्ली के सहायक पल्ली पुरोहित, फा रॉबिन प्रफुल टोप्पो, फा नीलम तिडू, फा इजेकिएल टोप्पो फा जॉर्ज मिंज, अन्य पुरोहितगण, धर्मबंधुगण, धर्मबहनें एवं हजारों की संख्या कैथोलिक विश्वासी उपस्थित रहे।

तीन नवंबर को मनाया जायेगा भैया दूज
Published / 2024-10-30 18:22:47
तीन नवंबर को मनाया जायेगा भैया दूज

भैया दूज भाई-बहन के अटूट और अनन्य प्रेम का प्रतीक का पर्व : संजय सर्राफएबीएन सोशल डेस्क। विश्व हिंदू परिषद सेवा विभाग एवं राष्ट्रीय सनातन एकता मंच के प्रांतीय प्रवक्ता संजय सर्राफ ने कहा है कि हिंदू धर्म का पवित्र त्यौहार भैया दूज इस वर्ष  3 नवंबर को मनाया जायेगा। कार्तिक मास द्वितीया तिथि का आरंभ 2 नवंबर को रात में 8 बजकर 22 मिनट पर हो जायेगा। एवं कार्तिक द्वितीया तिथि 3 नवंबर को रात में 10 बजकर 6 मिनट तक रहेगा। उदया तिथि होने के कारण भैया दूज का पर्व 3 नवंबर को मनाया जायेगा। पांच दिवसीय दीपोत्सव का ये अंतिम दिन है। भैया दूज गोवर्धन पूजा के अगले दिन मनाया जाता है यह त्यौहार भाई-बहन का त्योहार है इसमें बहन अपने भाई को तिलक लगाती है उसकी आरती उतारती है और मुंह मीठा करती है। इस दिन बहनें अपने भाई को श्रीफल यानी नारियल का गोल देती है कहा जाता है कि बहन भाई को नारियल का गोला देकर उसकी सुख  शांति और समृद्धि की कामना करती है। नारियल के गोले को भाई की रक्षा का प्रतीक माना जाता है। श्रीफल के साथ बहन अपने भाई को आशीर्वाद भी देती है इसके लिए पूजा की थाली में रोली, मोली, चंदन, फूल, मिठाई, आरती और सुपारी के साथ तिलक लगाकर आरती करती है। पूजा पूरी होने के बाद भाई अपनी बहन को उपहार देते हैं। भाई दूज का त्यौहार लगभग पूरे देश में मनाया जाता है। इसे अलग-अलग जगह में अलग नाम से जाना जाता है। बंगाल में भाई दूज के पर्व को भाई फूटा, महाराष्ट्र और गोवा में भाऊ व्रत, और नेपाल में इसको भाई तिहाड़ के नाम से जाना जाता है।भारत में भाई-बहन के प्रेम एवं पवित्र रिश्ते का प्रतीक रक्षाबंधन और भैया दूज दो महत्वपूर्ण त्यौहार है दोनों ही त्योहारों में भाई और बहन एक दूसरे के प्रति परंपरागत तरीके से स्नेह प्रकट करते हैं भैया दूज भाई बहन के अटूट और अनन्य प्रेम का प्रतीक पर्व है। भाई दूज को यम द्वितीया के नाम से भी जानते हैं।शास्त्रों के अनुसार कार्तिक शुक्ल द्वितीया तिथि पर यम अपनी बहन के घर आये थे। वहां उनकी बहन ने उनका खूब आदर सत्कार किया था जिससे प्रसन्न होकर यमराज ने वरदान दिया था कि जो भाई-बहन इस दिन यमुना में स्नान करके यम पूजा करेंगे वह मृत्यु के बाद यमलोक नहीं जायेगा। बहने अपने भाई को अकाल मृत्यु से बचाने के लिए यह देवता की पूजा करती है। भैया दूज को लेकर एक पौराणिक कथा यह भी है कि भगवान श्री कृष्ण नरकासुर राक्षस का वध करके द्वारका लौटे थे तो भगवान कृष्ण की बहन सुभद्रा ने फूल, मिठाई और अनेकों दीपक जलाकर उनका स्वागत किया था। इस दिन सुभद्रा ने भगवान कृष्ण के मस्तक पर टीका लगाकर उनकी लंबी आयु की कामना की थी तभी से भैया दूज पर्व मनाने की परंपरा शुरू हो गया।

दो को मनाया जायेगा गोवर्धन पूजा और अन्नकूट पर्व
Published / 2024-10-28 18:27:03
दो को मनाया जायेगा गोवर्धन पूजा और अन्नकूट पर्व

गोवर्धन पूजा त्योहार मे प्रकृति के साथ मानव का सीधा संबंध : संजय सर्राफटीम एबीएन, रांची। विश्व हिंदू परिषद सेवा विभाग एवं राष्ट्रीय सनातन एकता मंच के प्रांतीय प्रवक्ता संजय सर्राफ ने कहा है कि गोवर्धन पूजा पर्व 2 नवंबर को मनाया जाएगा। सनातन धर्म में गोवर्धन पूजा को बहुत ही महत्वपूर्ण माना जाता है। इसे अन्नकूट पर्व के नाम से भी जाना जाता है यह पर्व दीपावली के दूसरे दिन मनाया जाता है। इस वर्ष गोवर्धन पूजा का पर्व कार्तिक माह के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि 1 नवंबर को सांय 6 बजकर 16 मिनट से प्रारंभ हो रहा है तथा इसका समापन अगले दिन 2 नवंबर को रात 8 बजकर 21 मिनट पर होगा। इसलिए गोवर्धन पूजा 2 नवंबर को होगा। इस पर्व में प्रकृति के साथ मानव का सीधा संबंध है। इस पर्व की अपनी मान्यता और लोक कथा है गोवर्धन पूजा में गोधन अर्थात गायों की पूजा की जाती है। गाय को देवी लक्ष्मी का स्वरूप भी कहा गया है। देवी लक्ष्मी जिस प्रकार सुख समृद्धि प्रदान करती है उसी प्रकार गौ माता भी अपने दूध से स्वास्थ्य रूपी धन प्रदान करती है। गाय संपूर्ण मानव जाति के लिए पूजनीय और आदरणीय है गाय के प्रति श्रद्धा प्रकट करने के लिए इस दिन गोवर्धन पूजा की जाती है। मान्यता के अनुसार एक बार भगवान इंद्र बृजवासियों से क्रोधित हो गए और भारी बारिश कर दी भगवान इंद्र के प्रकोप से बृजवासियों को बचाने के लिए भगवान श्री कृष्ण गोवर्धन पर्वत को अपनी छोटी उंगली से उठा लिया था तभी से हर वर्ष गोवर्धन पूजा का पर्व मनाया जाता है। यह पर्व इंद्रदेव पर भगवान श्री कृष्ण की जीत का प्रतीक है। यह त्यौहार प्रकृति को समर्पित है। इस पर्व पर लोग गाय के गोबर से भगवान श्रीकृष्ण एवं गोवर्धन पर्वत का चित्र को बनाकर उनकी उपासना करते हैं तथा पूरे विधि विधान से पूजा अर्चना की जाती है। साथ ही प्रभु के प्रिय भोग अर्पित किया जाता है। तथा कढ़ी और अन्नकूट चावल का भोग लगाया जाता है ? इस कार्य को करने से साधक को सुख समृद्धि में वृद्धि होती है।

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