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राणी सती दादी जी की मंगसीर बदी नवमी 24 नवंबर को
Published / 2024-11-20 21:52:14
राणी सती दादी जी की मंगसीर बदी नवमी 24 नवंबर को

मंगसीर नवमी दादी जी के त्याग और शक्ति का स्मरण करने का दिनदादी जी को साहस, निष्ठा और आशीर्वाद की देवी माना जाता है : संजय सर्राफटीम एबीएन, रांची। राणी सती दादी जी का मंगसीर बदी नवमी 24 नवंबर को मनाया जायेगा। रांची जिला मारवाड़ी सम्मेलन के संयुक्त महामंत्री सह प्रवक्ता संजय सर्राफ ने कहा है कि दादी जी की सभी मंदिरों में मंगसीर नवमी का महोत्सव बड़े ही उत्साह पूर्वक मनाया जाता है। राणी सती दादी जी जिन्हें नारायणी देवी के नाम से भी जाना जाता है, संस्कृति और धर्म में साहस, त्याग और निष्ठा का प्रतीक मानी जाती हैं। उनकी कथा प्रेरणादायक और मार्मिक है, जो उनकी अमर गाथा को सजीव करती है। मंगसीर बदी नवमी का दिन उनके बलिदान और उनकी दिव्य शक्ति को स्मरण करने के लिए विशेष महत्व रखता है।यह कथा महाभारत काल से जुड़ी है।मंगसीर मास के कृष्ण पक्ष की नवमी तिथि को श्री राणी सती दादी जी की जयंती मनायी जाती है, जिसे मंगसीर बदी नवमी के रूप में जाना जाता है। यह दिन श्री राणी सती दादी जी की मार्मिक कथा को याद करने का अवसर है, जिन्होंने अपने पति की मृत्यु के बाद अपने धर्म और संस्कृति की रक्षा के लिए अपना जीवन समर्पित किया। उन्होंने अपने पति की मृत्यु के बाद सती होने का फैसला लिया। लेकिन भगवान श्रीकृष्ण ने उनकी भक्ति और समर्पण को देखकर उन्हें बचा लिया और उन्हें अपने चरणों में स्थान दिया। श्री राणी सती दादी जी की कथा हमें धर्म, संस्कृति और पति के प्रति समर्पण की महत्ता को समझने का अवसर प्रदान करती है। कि जीवन में कठिनाइयों का सामना करने के लिए अपने धर्म और संस्कृति की रक्षा करनी चाहिए। मंगसीर बदी नवमी का महत्व बहुत अधिक है। इस दिन की पूजा और आराधना से भगवान श्रीकृष्ण की कृपा प्राप्त होती है और जीवन में सुख और समृद्धि आती है। नारायणी देवी के सती होने के बाद उन्हें राणी सती दादी जी के रूप में पूजा जाने लगा। राणी सती दादी मारवाड़ी समाज की कुलदेवी भी है मंगसीर बदी नवमी के दिन झुंझुनू स्थित राणी सती मंदिर सहित पूरे देश के दादी के मंदिरों में विशाल महोत्सव का आयोजन होता है।जिसमें राजस्थानी महिलाएं, पुरुष द्वारा मंदिरों में राणी सती दादी जी की पूरे विधि विधान से विशेष पूजा की जाती है। मंदिरों मे दादी जी की प्रतिमा का विशेष श्रृंगार एवं भव्य झांकी सजाई जाती है। दिनभर भजन कीर्तन मंगल पाठ और धार्मिक अनुष्ठान होते हैं। भक्तों के लिए विशाल भंडारे का आयोजन किया जाता है। राणी सती दादी जी को साहस, निष्ठा और आशीर्वाद की देवी माना जाता है। उनके भक्त जीवन के कठिन समय में उनका आह्वान करते हैं। ऐसा विश्वास है कि उनकी पूजा से परिवार में सुख, शांति और समृद्धि आती है। राणी  मंगसीर बदी नवमी का दिन उनके त्याग और शक्ति को स्मरण करने के लिए मनाया जाता है। यह दिन सभी भक्तों के लिए दादी जी से आशीर्वाद प्राप्त करने का सुनहरा अवसर होता है।

राणी सती दादी जी की मंगसीर बदी नवमी 24 नवंबर को
Published / 2024-11-19 18:06:45
राणी सती दादी जी की मंगसीर बदी नवमी 24 नवंबर को

मंगसीर नवमी दादी जी के त्याग और शक्ति का स्मरण करने का दिनदादी जी को साहस, निष्ठा और आशीर्वाद की देवी माना जाता है : संजय सर्राफटीम एबीएन, रांची। रांची जिला मारवाड़ी सम्मेलन के संयुक्त महामंत्री सह प्रवक्ता संजय सर्राफ ने कहा है कि राणी सती दादी जी का मंगसीर बदी नवमी 24 नवंबर को मनाया जायेगा। दादी जी की सभी मंदिरों में मंगसीर नवमी का महोत्सव चार दिनों तक बड़े ही उत्साह पूर्वक मनाया जाता है। राणी सती दादी जी जिन्हें नारायणी देवी के नाम से भी जाना जाता है, संस्कृति और धर्म में साहस, त्याग और निष्ठा का प्रतीक मानी जाती हैं। उनकी कथा प्रेरणादायक और मार्मिक है, जो उनकी अमर गाथा को सजीव करती है। मंगसीर बदी नवमी का दिन उनके बलिदान और उनकी दिव्य शक्ति को स्मरण करने के लिए विशेष महत्व रखता है।यह कथा महाभारत काल से जुड़ी है। ऐसा माना जाता है कि नारायणी देवी का पूर्वजन्म वीर अभिमन्यु की पत्नी उत्तरा के रूप में हुआ था। महाभारत के युद्ध में जब अभिमन्यु वीरगति को प्राप्त हुए, तब उत्तरा ने उनके साथ सती होने की इच्छा व्यक्त की। भगवान श्रीकृष्ण ने उन्हें सती होने से रोका और कहा कि भविष्य में उन्हें यह पुण्य कर्म करने का अवसर मिलेगा। उत्तरा ने पुनर्जन्म लिया और नारायणी के रूप में जन्म लिया। उनका विवाह झुंझुनू (राजस्थान) के निवासी ठाकुर तांवर जी से हुआ। नारायणी देवी और तांवर जी का दांपत्य जीवन प्रेम और निष्ठा से परिपूर्ण था। एक बार ठाकुर तांवर जी का लड़ाई उस समय के अन्य शक्तिशाली शासक के साथ हुआ। उस लड़ाई में तांवर जी वीरगति को प्राप्त हो गये। जब नारायणी देवी को यह समाचार मिला, तो उन्होंने अपने पति के साथ सती होने का निश्चय किया। उनकी सती होने की इच्छा कोई सामान्य घटना नहीं थी। यह प्रेम, निष्ठा और धर्म के प्रति उनके समर्पण का प्रतीक था। जब नारायणी सती होने जा रही थीं, तो उन्होंने भगवान से यह वरदान मांगा कि भविष्य में वे सभी श्रद्धालु भक्तों की मनोकामनाएं पूरी करेंगी। उन्होंने अपने पति के पार्थिव शरीर के साथ चिता में प्रवेश किया और सती हो गयीं। नारायणी देवी के सती होने के बाद उन्हें राणी सती दादी जी के रूप में पूजा जाने लगा। मंगसीर बदी नवमी का दिन उनके बलिदान और त्याग को समर्पित है। इस दिन झुंझुनू स्थित राणी सती मंदिर सहित पूरे देश के दादी के मंदिरों में विशाल महोत्सव का आयोजन होता है। जिसमें राजस्थानी महिलाएं, पुरुष द्वारा मंदिरों में राणी सती दादी जी की विशेष पूजा की जाती है। मंदिरों में झांकियां और श्रृंगार दादी जी की प्रतिमा का विशेष श्रृंगार कर भव्य झांकी सजायी जाती है। दिनभर  भजन-कीर्तन, मंगल पाठ और धार्मिक अनुष्ठान होते हैं। भक्तों के लिए विशाल भंडारे का आयोजन किया जाता है। राणी सती दादी जी को साहस, निष्ठा और आशीर्वाद की देवी माना जाता है। उनके भक्त जीवन के कठिन समय में उनका आह्वान करते हैं।ऐसा विश्वास है कि उनकी पूजा से परिवार में सुख, शांति और समृद्धि आती है। राणी सती दादी जी की कथा हमें यह सिखाती है कि प्रेम और निष्ठा जीवन के मूलभूत मूल्य हैं। मंगसीर बदी नवमी का दिन उनके त्याग और शक्ति को स्मरण करने के लिए मनाया जाता है। यह दिन सभी भक्तों के लिए दादी जी से आशीर्वाद प्राप्त करने का सुनहरा अवसर होता है।

युग धर्म निभाने का संकल्प लेकर दिव्य कलश शिरोधार्य कर रांची के साधक-शिष्य शांतिकुञ्ज से विदा
Published / 2024-11-18 20:31:48
युग धर्म निभाने का संकल्प लेकर दिव्य कलश शिरोधार्य कर रांची के साधक-शिष्य शांतिकुञ्ज से विदा

आज का युग धर्म समयदान है : शांतिकुञ्जयुग धर्म निभाने को जो भी अकुलाता है, उस जागृत आत्मा को महाकाल बुलाता है : प्रज्ञागीत गायन कर विदा किये गयेएबीएन सोशल डेस्क। शांतिकुञ्ज मुख्यालय हरिद्वार में पधारे 5 प्रांतीय जोन से पधारे साधक-शिष्य एवं अपने अंग अवयवों  को संबोधित कर बताया गया। साथ ही हमारी वसीयत और विरासत, दिव्य अवतारी चेतनाएं, सुनसान के सहचर, महाशक्ति की लोक यात्रा, गायत्री महामंत्र, अश्वमेधीय महायज्ञ, संस्कार प्रकरण, अनुष्ठान कार्यक्रम आयोजन, मनुष्य में देवत्व का उदय, परिवार समाज में सुख शांति संवर्धन, धरती पर स्वर्ग का अवतरण, विचार क्रांति अभियान, युग साहित्य स्वाध्याय, नित्य सत्संकल्प पाठ आदि अनेक गुह्य विषयों पर अनेक वक्ता महानुभावों के संबोधन में साधक-शिष्य भाई-बहनों को विस्तार से बताया गया।इस हेतु प्रशिक्षण में झारखंड एवं बिहार जोन के करीब 700 परिजन शामिल हुए। इस हेतु प्रशिक्षण में क्षेत्र में कार्य हेतु समयदान निर्धारित कर संकल्प पत्र भरा गया।कार्यक्रम समापन के दूसरे दिन शांतिकुञ्ज गुरुधाम गायत्री मंदिर से देव संस्कृति विश्वविद्यालय में महाकाल प्रज्ञेश्वर भगवान की सामूहिक परिक्रमा जुलूस यात्रा की गयी और आशीर्वाद स्वस्तिवाचन पाठ कर विदा किये गये। दिव्य ज्योति कलश का स्वागत सत्कार स्वस्तिवाचन कल रांची में होगा। उक्त जानकारी गायत्री परिवार के वरिष्ठ साधक सह प्रचार-प्रसार प्रमुख जय नारायण प्रसाद ने एक प्रेस विज्ञप्ति जारी कर दी।

कौशल किशोर जायसवाल ने वर वधू के साथ बारातियों को उपहार स्वरूप दिया पौधा
Published / 2024-11-18 20:17:35
कौशल किशोर जायसवाल ने वर वधू के साथ बारातियों को उपहार स्वरूप दिया पौधा

पर्यावरणविद् कौशल ने की नयी पहल की शुरुआतएबीएन न्यूज नेटवर्क, मेदिनीनगर/ पलामू। पर्यावरण संरक्षण अभियान के राष्ट्रीय अध्यक्ष सह वनराखी मूवमेंट के प्रणेता कौशल किशोर जायसवाल ने नयी पहल की शुरूआत की है। कौशल ने शादी विवाह में उपहार के रूप में वर वधु को पौधा देने का काम कर रहे हैं। इसके साथ ही वर वधु को पौधा लगाकर उसे बचाने का आग्रह कर रहे हैं। कौशल का कहना है कि वर वधु द्वारा लगाया गया पौधा जितना हरा भरा रहेगा वर वधु का दांपत्य जीवन उतना ही खुशहाली से भरा होगा। पर्यावरणविद् कौशल रविवार को गढ़वा जिले के मेराल में आनंद प्रसाद जायसवाल एवं उमा देवी की पुत्री सिंपल जायसवाल की शादी डंडई के कपिल प्रसाद जायसवाल एवं उषा देवी के पुत्र राजू प्रसाद जायसवाल की शादी में शामिल विश्वव्यापी पर्यावरण संरक्षण अभियान के राष्ट्रीय अध्यक्ष  व राखी मूवमेंट के प्रणेता पर्यावरणविद ट्री मैन डॉ कौशल किशोर जायसवाल ने वर -वधु व बरातियों  को आशीर्वाद स्वरूप हिमाचल के कपूर व आम के पौधे देकर उनके सफल वैवाहिक जीवन की शुभकामनाएं दी। उन्होंने कहा कि यदि परिवार में सदस्यों की संख्या बढ़े तो उन्हें स्वस्थ रहने के लिए शिव के समान वृक्ष का होना जरूरी है। उन्होंने दंपति को सुखद जीवन की कामना करते हुए कहा कि बारातियों को दहेज में कुछ मिले या न मिले  लेकिन उन्हें पौधा मिलना अति जरूरी है। उन्होंने बर -बधू के नाम पर पर्यावरण धर्म के प्रार्थना के साथ पौधारोपण कर उपस्थित लोगों को  पर्यावरण धर्म के आठ मूल ज्ञान मंत्रों की शपथ भी दिलाया। उन्होंने कोरोना काल का  जिक्र करते हुए कहा है कि धरती और ब्रह्मांड के 84 लाख योनि जीवन की जीने के लिए सबसे जरूरी आक्सीजन होता है। आक्सीजन किसी फैक्ट्री का उत्पाद नहीं है। इसके लिए पौधा लगाना होता है। पर्यावरण धर्म गुरु कौशल ने कहा कि आप हर संपत्ति को अर्जित कर सकते हैं परंतु शुद्ध हवा नहीं। बीमारी से बचने के लिए हर व्यक्ति को चाहिए कि अपना धर्म के साथ-साथ पर्यावरण धर्म के  आठ मूल ज्ञान मंत्रों को अपने जीवन में उतारने का अथक प्रयास करना चाहिए। इस मौके पर सत्येंद्र  जायसवाल, सुचित जायसवाल, नीरज जायसवाल, दीपशिखा देवी, निखिल जायसवाल, आभा देवी, विभा देवी, पूजा देवी, मंजू देवी, रंजू देवी, अंजू देवी, संजय प्रसाद, रिंकी देवी, मनोज प्रसाद, रामसागर प्रसाद, राजेंद्र प्रसाद, महेंद्र प्रसाद, अनुज प्रसाद विनोद प्रसाद सहित कई लोग मौजूद थे।

गायत्री परिवार का ज्योति कलश रथ यात्रा प्रशिक्षण सफलतापूर्वक संपन्न
Published / 2024-11-17 20:06:09
गायत्री परिवार का ज्योति कलश रथ यात्रा प्रशिक्षण सफलतापूर्वक संपन्न

एबीएन सोशल डेस्क। अखिल विश्व गायत्री परिवार शांतिकुञ्ज मुख्यालय में आज अनेक गुह्य विषयों पर प्रकाश डालकर बताया गया। यहां इस क्षेत्र में हरिद्वार, यहां की स्थापित सप्त सरोवर क्षेत्र, सप्तऋषि आश्रम, गायत्री परिवार, शांतिकुञ्ज युगतीर्थ की स्थापना, देव संस्कृति विश्वविद्यालय स्थापन, साधनात्मक अनुष्ठान, युग निर्माण अभियान, सत्संकल्प पाठ, दैनिक हवन-यज्ञ विधान, तीर्थ की परिभाषा, उसकी परंपरा एवं उसका उच्चस्थ महत्व, ऋषियों का, पूर्वजों का योगदान, जप तप व्रत, भजन-कीर्तन, सद्ज्ञान, सत्कर्म, गायत्री युगतीर्थ की महत्ता, संस्कार परंपरा, अनुकरणीय प्रकरण, ज्योति अवतरण साधना, हरिदार कुंभ, गंगा अवतरण एवं स्नान पर चर्चा हुई। फिर पांच जोन समन्वयकों की जोन-वार समूह चर्चा, प्रश्नोत्तरी एवं समयदानियों का संकल्प पत्र संकलन, ज्योति कलश रथ दर्शन भ्रमण यात्रा की आवश्यकता व महत्ता, उसकी उपयोगिता, अखंड दीप ज्योति का शुभारंभ स्थापन, मासिक पत्रिका संपादन आदि अनेक विषयों के संबंध में प्रकाश डालकर चर्चा हुई। इसके बाद बिहार, झारखंड, सिलीगुड़ी जोन पर घनश्याम देवांगन, रत्न केजी, तपन केजी, त्रिलोचन साहू, संतोष पांडे, संतोष महतो तथा संगीत वादन, प्रज्ञागीत गायन, उद्बोधन एवं वंदनीया माताजी की जन्म शताब्दी वर्ष सह अखंड दीप शताब्दी विषय पर वक्ता प्रो विश्वप्रकाश त्रिपाठी, संचालन ओइन्द्र सिंह संगीत एवं उद्बोधन विषय- ज्योति कलश यात्रा में बहनों की भूमिका, नारी जागरण सह सशक्तिकरण पर वक्ता शैफाली दीदी थी और संचालन में श्यामा दीदी आदि का सहयोग रहा। साथ ही वीडियो संदेश में वंदनीया माताजी स्वरूप में महाशक्ति की लोक यात्रा एवं अखंड ज्योति यात्रा पर प्रकाश डाला गया। अंत में 21वीं सदी का अभूतपूर्व अवसर, न भूतो न भविष्यति पर वक्ता डॉ चिन्मय पांड्या का प्रमुख प्रवचन  हुआ। उक्त जानकारी गायत्री परिवार वरिष्ठ साधक सह प्रचार-प्रसार प्रमुख जय नारायण प्रसाद ने दी।

गायत्री परिवार के कार्यक्रम में शामिल हुए पांच प्रांत के साधक-शिष्य
Published / 2024-11-16 21:03:15
गायत्री परिवार के कार्यक्रम में शामिल हुए पांच प्रांत के साधक-शिष्य

युगतीर्थ शांतिकुञ्ज प्रशिक्षण में वैश्विक ज्योति कलश रथ यात्रा कार्यशाला में पांच प्रांत से साधक-शिष्य गण शामिल हुएटीम एबीएन, रांची। अखिल विश्व गायत्री परिवार शान्तिकुञ्ज मुख्यालय में 5 प्रांत बिहार, झारखंड, महाराष्ट्र, गोवा सिलीगुड़ी जोन के साधक-शिष्य गणों और नैष्ठिक, कर्मठ कार्यकर्ताओं की त्रिदिवस प्रशिक्षण सत्र की  कार्यशाला में भागीदारी शानदार सैकड़ों की संख्या में हुई है। कार्यक्रम का स्वरुप दिनांक 15.11.2024 से  आगमन एवं पंजीयन से शुभारंभ हुआ।  आज श्रद्धेया जीजी एवं श्रद्धेय डॉ साहब से भेंट परामर्श (कलश पूजन एवं निर्देशन) में दिन भर में  सुबह से सायंकालीन कई कार्यक्रम आयोजन चल रहे हैं। आज के कार्यक्रम में संगीत एवं उद्बोधन, विषय रहा अखंड ज्योति गुरुसत्ता का जन्म दिवस, जीवन्त वृतांत, साक्षात् स्वरुप एवं अखंड ज्योति की दिव्य ज्योति और  उनकी भावनाओं की परिणति पर वक्ता थे योगेन्द्र गिरि, संचालन- ओइन्द्र सिंह का रहा। यह कार्यक्रम तीन दिवसीय है, आज द्वितीय दिवस है। आज दिव्य ज्योति कलश की बहुत ही विशिष्ट रूप से विधिवत पूजा-पाठ हुए।कल सुबह  भी प्रशिक्षण कार्यशाला में कई  विषयों पर कार्यक्रम और संबोधन व प्रवचन एवं मार्गदर्शन होंगे। झारखंड से  सभी जिला से  साधक-शिष्यों व कार्यकर्ताओं की अच्छी भागीदारी रही। उक्त जानकारी गायत्री परिवार रांची के वरिष्ठ साधक सह प्रचार-प्रसार प्रमुख जय नारायण प्रसाद ने दी।

हजारीबाग : जिले का प्रमुख धार्मिक पर्यटन केंद्र नृसिंह स्थान मंदिर सज-धज कर तैयार
Published / 2024-11-14 19:00:19
हजारीबाग : जिले का प्रमुख धार्मिक पर्यटन केंद्र नृसिंह स्थान मंदिर सज-धज कर तैयार

विधि विधान के साथ भगवान श्री हरि को जगाने के बादभगवान के दर्शन को लेकर श्रद्धालुओं की उमड़ेगी भीड़15 नवंबर को कल लगेगा कार्तिक पूर्णिमा का महामेलाटीम एबीएन, हजारीबाग। स्थानीय लोगों में एक कहावत है हजारीबाग की तीन पहचान झील, पंचमंदिर और नृसिंह स्थान। उत्तरी छोटानागपुर प्रमंडलीय मुख्यालय हजारीबाग से छह किलोमीटर दूर बड़कागांव रोड में कटकमदाग प्रखंड अंर्तगत श्री नृसिंह स्थान मंदिर जिले का प्रमुख धार्मिक पर्यटन केंद्र है। यह प्राचीन धरोहर को लगभग चार सौ वर्ष के इतिहास को संजोये हुए है। यह यह मुगलकाल अकबर के राज्य से लेकर ब्रिटिश शासन और वर्तमान लोकतंत्र का साक्षी भी रहा है। यहां भगवान विष्णु के अवतार नृसिंह की  पांच फीट की प्राचीन प्रतिमा है। जो काले रंग के ग्रेफाइट पत्थर की बनी है। वर्तमान में इसका मूल्य करोड़ों में बताया जाता है।मान्यता है कि यहां गर्भ गृह में भगवान विष्णु के साथ शिव साक्षात विराजमान है। यहां स्थापित शिवलिंग जमीन से तीन फीट नीचे है। गर्भ गृह में शिव के साथ विष्णु भगवान के विराजमान रहने का का अद्भुत संयोग है। जो वैष्णव और शिव भक्तों को अपनी ओर आकर्षित करता है। इसके अलावा भगवान सूर्य देव, नारद, शिव पार्वती और नवग्रह के प्रतिमा दर्शनीय  है। गर्भ ग्रह के बाहर हनुमान जी की प्रतिमा है। यहां सालों पर दर्शन पूजन करने श्रद्धालु आते हैं। गुरुवार और पूर्णिमा के दिन पूजा का अपना एक अलग महत्व है। कार्तिक और माघ महीने में भक्तों की भीड़ यहां बढ़ जाती है। यहां मुंडन, जनेउ, शादी विवाह व अन्य धार्मिक का आयोजन किए जाते हैं। शहर एवं आसपास लोक नया वाहन खरीदने पर यहां पूजा करने पहुंचते हैं। यह कार्तिक पूर्णिमा के दिन नृसिंह मेला लगता है। जो झारखंड में प्रसिद्ध है। मंदिर से कुछ दूरी पर मां सिद्धेश्वरी का मंदिर है जिसे नकटी महामाया मंदिर भी कहते हैं। यह सिद्ध पीठ है। मंदिर परिसर में भगवान विष्णु के दशा अवतार के मंदिर हैं। जिसमे मत्स्य, कुर्म, वाराह, नृसिंह, वामन, परशुराम, राम, कृष्ण बुद्ध और कल्कि अवतार के मंदिर शामिल है। इसके अलावा यहां काली मंदिर और लक्ष्मी नारायण का भी मंदिर है।जानें क्या है इतिहासश्री नृसिंह मंदिर का इतिहास काफी पुराना है। इसकी स्थापना 1632 ईस्वी में पंडित दामोदर मिश्र ने की थी। जो रामायण के रचनाकार संत तुलसीदास के समकालीन थे। वह संस्कृत और ज्योतिष के विद्वान के होने के साथ-साथ तांत्रिक भी थे। संस्कृत में उन्होंने कई रचनाए लिखी है। वह दुर्लभ पांडुलिपि आज देखरेख के अभाव में खत्म होने के कगार पर हैं। उनके वंशजों का कहना है कि वह औरंगाबाद सीरीश कुटुंबा के रहने वाले थे। उन्होंने बनारस मे शिक्षा दीक्षा लेने के बाद गंगा नदी के किनारे सिद्धेश्वरी घाट पर भगवान विष्णु के उग्र रूप नृसिंह की आराधना कर सिद्धि प्राप्त की थी। उसके बाद वह अपनी माता लवंगा के साथ हजारीबाग खपरियांवा पहुंचे। यहां उन्हें स्वप्न देखा कि भगवान विष्णु उनसे कह रहे हैं कि वह नेपाल के भूसुंडी पहाड़ी में है। यहां उनकी प्रतिमा स्थापित है। जिसे स्वप्न में लाने का उन्हें आदेश प्राप्त हुआ। इसके बाद वह अपने सहयोगियों के साथ पद यात्रा कर नेपाल पहुंचे। फिर वहां के भूसुंडी पहाड़ी में खुदाई शुरू की। जैसे ही खुदाई शुरू की। पहले खून की धारा बहने लगी। जिससें वह डर गए और भयभीत होकर उन्होंने खुदाई को रोक दिया। फिर रोते हूए भगवान से प्रार्थना करने लगे। उसी रात स्वप्न में भगवान विष्णु ने खुदाई करने का पुन: आदेश दिया। दूसरे दिन जब उन्होंने खुदाई शुरू किया तो भगवान नृसिंह के साथ-साथ मंदिर परिसर में स्थापित अन्य प्रतिमाएं निकली।उसके बाद सभी प्रतिमा को लेकर खपरियावां पहुंचे। यहां पहले इमली पेड़ के पास स्थापित किया। उसके बाद वर्तमान में जहां मंदिर है। वहां अभी प्रतिमाओं को ले जाकर स्थापित किया। मंदिर के चारों ओर आम व जामुन  के वृक्ष लगायें। जिसे आज भी लोग जमुनिया बागी कहते है। उन्होंने तालाब का भी निर्माण कराया। कहा जाता है कि उस समय यह क्षेत्र राजा रामगढ़ का राज्य था। उनके राज दरबार में एक ब्राह्मण था। वह काफी विद्वान और जानकार था। राज दरबार के कई मंत्री उनसे जलते थे। उन्होंने राजा को कुछ गलत बातें बता दी। कहा जाता है कि जिसके बाद राजा ने उन्हें मौत की सजा सुना दी। मौत के बाद वह ब्राह्मण प्रेत बन गया। और राजमहल में उपद्रव करने लगा। राज परिवार प्रेत बाधा से परेशान हो उठा। तब उन्हें किसी ने सलाह दी कि वह पंडित दामोदर मिश्र से संपर्क करें। दामोदर मिश्र जब प्रेत बाधा दूर करने पहुंचे और मंत्रोच्चार करने लगे तो वह प्रेत प्रकट हो गया। उसने बताया कि वह निर्दोष है। उसे राजा ने उसे गलत सजा दी है। वह राजा को मार डालेगा। लेकिन दामोदर मिश्र के तंत्र विद्या के सामने वह प्रेत नहीं ठहरा। लेकिन जाते-जाते उसने यह श्राप दे दिया कि  वह राजा को छोड़ देगा। लेकिन उनके तंत्र विद्या के कारण उसे न्याय नहीं मिल पा रहा है इसलिए उसने श्राप दे दिया कि उन्होंने जो रचनाएं की है। जो धरोहर स्थापित किया है। आने वाले समय में वह नष्ट हो जायेगा। उसके बाद राजा की प्रेत बाधा दूर हो गयी। राजा ने पंडित दामोदर मिश्र को 22 गांव की जमींदारी सौंप दी। उस समय से यहां पूजा अर्चना की जा रही है। खपरियांवा पंचायत के बन्हा टोला निवासी लंबोदर पाठक मुखिया बनने के बाद जिला परिषद के सदस्य बने। फिर बरकट्ठा क्षेत्र से विधायक बने। वह बहुत बड़े ठेकेदार थे। भारद्वाज कंस्ट्रक्शन कंपनी की स्थापना की। धर्म कर्म में उन्हें बहुत रुचि थी। वह अपनी तरक्की के पीछे भगवान नृसिंह का आशीर्वाद मानते थे। देवघर में उन्होंने पाठक धर्मशाला का निर्माण कराया था। उसके बाद उन्होंने प्राचीन मंदिर का पुर्ननिर्माण करने की योजना बनायी। इसके लिए संकल्प लिया। ऐसी मान्यता है भगवान नृसिंह से मन्नत मांगने के बाद जब फूल गिर जाता है तो उसे भगवान का आशीर्वाद मांगा जाता है। लंबोदर पाठक ने धार्मिक अनुष्ठान के साथ भगवान नृसिंह से आशीर्वाद भी प्राप्त किया। उसके बाद मंदिर के चारों ओर खुदाई शुरू कर दी। इसी दौरान साल 1988 में एकीकृत बिहार के समय जब भूकंप आया। पूरा मंदिर प्राचीन मंदिर धर्मशाला वह अन्य ऐतिहासिक धरोहर जमीजोद हो गया। लेकिन भगवान नृसिंह की प्रतिमा व अन्य विग्रह सुरक्षित रहे। इसके बाद मंदिर का पुनर्निर्माण शुरू हुआ। वर्ष 1995 में वर्तमान मंदिर तैयार हुआ आने के  ऐसी मान्यता है कि यहां जलाया गया अखंड दीप और मंदिर की परिक्रमा कभी व्यर्थ नहीं जाती है। दर्शन पूजन के साथ मनवांछित फलों की कामना के लिए श्रद्धालुओं का आना-जाना बना रहता है। जिले के अलावा दूसरे राज्य के लोग शादी विवाह और मन्नत को लेकर बाबा के दरबार में पहुंचते हैं। नृसिंह स्थान को पर्यटन केंद्र बनाने के लिए सरकार प्रयासरत है। लेकिन सरकारी जमीन नहीं रहने के कारण पर्यटन केंद्र नहीं बन पा रहा है। पर्यटन केंद्र बनाने की दिशा में सिर्फ विवाह मंडप का निर्माण कार्य किया गया है। स्थानीय लोग बताते हैं कि यहां धर्मशाला और विवाह घर बनाने की जरूरत है।

खाटू श्री श्याम प्रभु का जन्म उत्सव एक पवित्र परंपरा : संजय सर्राफ
Published / 2024-11-12 21:11:06
खाटू श्री श्याम प्रभु का जन्म उत्सव एक पवित्र परंपरा : संजय सर्राफ

टीम एबीएन, रांची। रांची जिला मारवाड़ी सम्मेलन के संयुक्त महामंत्री सह प्रवक्ता संजय सर्राफ ने कहा है कि खाटू श्याम प्रभु का जन्म उत्सव हर कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि के दिन मनाया जाता है। इस दिन देवउठनी एकादशी का भी व्रत रखा जाता है। खाटू श्याम जी का जन्म दिवस 12 नवंबर को बड़े ही उत्साह एवं हर्षोल्लास के साथ मनाया गया। यह दिन भगवान श्रीकृष्ण के अवतार श्री श्याम प्रभु के जन्म की याद में मनाया जाता है, जो अपने भक्तों को मोक्ष प्राप्त करने का मार्ग दिखाते हैं। पौराणिक कथा के अनुसार, श्री श्याम प्रभु का जन्म भगवान श्रीकृष्ण के अवतार के रूप में हुआ था। भगवान श्रीकृष्ण ने श्री श्याम प्रभु के रूप में अवतार लिया था और उन्होंने अपने भक्तों को मोक्ष प्राप्त करने का मार्ग दिखाया।खाटू श्री श्याम जी को कलयुग का देव माना जाता है इनका हारे का सहारा कहा जाता है ऐसा माना जाता है कि जो भी व्यक्ति हार कर इनके दर पर जाता है बाबा उसको जीत दिलाते हैं खाटू श्याम जी का जन्मदिन हर साल कार्तिक महीने की शुक्ल पक्ष की ग्यारस यानी एकादशी तिथि को दिन मनाया जाता है। हालांकि कुछ लोग बाबा का जन्मदिन फाल्गुन मास ग्यारस तिथि मनाते हैं। खाटू वाले बाबा का जन्म दिन खाटू श्याम मंदिर राजस्थान के अलावे पूरे देश में बहुत ही उत्साह और धूमधाम के साथ मनाया जाता है बाबा के भक्तों को बाबा के जन्मदिन का पूरा साल इंतजार रहता है। श्री श्याम प्रभु की कथा के अनुसार, श्री श्याम प्रभु का जन्म एक गरीब ब्राह्मण के घर में हुआ था। उनके माता-पिता ने उन्हें भगवान श्रीकृष्ण के अवतार के रूप में पहचाना और उन्हें भगवान के रूप में पूजा की। श्री श्याम प्रभु ने अपने जीवन में कई चमत्कार किए और अपने भक्तों को मोक्ष प्राप्त करने का मार्ग दिखाया। उन्होंने अपने भक्तों को सिखाया कि भगवान की भक्ति करना और उनकी आराधना करना ही जीवन का सच्चा उद्देश्य है। खाटू श्याम प्रभु का जन्म उत्सव बहुत ही धूमधाम से मनाया जाता है। इस दिन भगवान श्री श्याम प्रभु की पूजा की जाती है और उन्हें फूल, फल और मिष्ठान्न अर्पित किए जाते हैं। भगवान श्री श्याम प्रभु की आरती की जाती है और उनकी कथा सुनी जाती है। खाटू श्याम प्रभु के जन्म उत्सव का महत्व बहुत अधिक है। यह दिन भगवान श्रीकृष्ण के अवतार श्री श्याम प्रभु के जन्म की याद में मनाया जाता है और इस दिन की पूजा और आराधना से भगवान श्रीकृष्ण की कृपा प्राप्त होती है और जीवन में सुख और समृद्धि आती है। खाटू श्याम प्रभु का जन्म उत्सव एक पवित्र परंपरा है।

देवउठनी एकादशी से सभी प्रकार के मांगलिक कार्य होंगे प्रारंभ
Published / 2024-11-11 20:55:20
देवउठनी एकादशी से सभी प्रकार के मांगलिक कार्य होंगे प्रारंभ

तुलसी विवाह कराने पर सभी प्रकार के कष्टों से मिलती है मुक्ति : संजय सर्राफटीम एबीएन, रांची। विश्व हिंदू परिषद सेवा विभाग व राष्ट्रीय सनातन एकता मंच के प्रांतीय प्रवक्ता संजय सर्राफ ने कहा है कि हर वर्ष कार्तिक माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी, जिसे देवउठनी, देवोत्थान और देवप्रबोधिनी के नाम से जाना जाता है। उदयव्यापनी एकादशी 12 नवंबर को होने से देवउठनी एकादशी इसी दिन मनायी जाती है। इस दिन तुलसी विवाह का आयोजन किया जाता है। 12 नवंबर को तुलसी विवाह का शुभ मुहूर्त प्रदोष काल में शाम 5 बजकर 29 मिनट से लेकर शाम 7 बजकर 53 मिनट तक रहेगा। हिंदू धर्म के अनुसार सृष्टि के पालनहार श्रीहरि भगवान विष्णु देवउठनी एकादशी पर चार महीने की अपनी योगनिद्रा से जागते हैं। भगवान विष्णु के जागने पर इस दिन तुलसी विवाह किया जाता है। भगवान विष्णु के शालिग्राम स्वरूप संग तुलसी विवाह विधि-विधान के साथ किया जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार देवउठनी एकादशी पर तुलसी विवाह करना बहुत ही शुभ और मंगलकारी माना जाता है। देवउठनी एकादशी पर सृष्टि के पालनहार भगवान विष्णु के शालिग्राम स्वरूप के साथ तुलसी जी का विवाह कराने पर सभी तरह के कष्टों से मुक्ति मिलती और भगवान विष्णु का आशीर्वाद प्राप्त होता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार देवउठनी एकादशी पर भगवान शालिग्राम संग तुलसी विवाह का बहुत ही विशेष महत्व होता है। चार महीने की योगनिद्रा के बाद जब प्रभु जागते हैं तो उस दिन सभी देवी-देवता मिलकर भगवान विष्णु की पूजा करते हैं। भगवान विष्णु के जागने पर चार महीने से रुके हुए सभी तरह के मांगलिक कार्य फिर से शुरू हो जाते हैं। इस दिन भगवान शालिग्राम संग तुलसी विवाह किया जाता है। ऐसा करने पर वैवाहिक जीवन में आ रही बाधाएं खत्म होती है और जिन लोगों के विवाह में रुकावटें आती हैं वह भी दूरी हो जाती है। शास्त्रों के अनुसार तुलसी-शालिग्राम का विवाह करने पर कन्यादान के बराबर का पुण्य लाभ मिलता है। अगर किसी के विवाह में तरह-तरह की अड़चनें आती हैं या फिर विवाह बार-बार टूटता है तो इस दिन तुलसी विवाह का आयोजन शुभ माना गया है। कार्तिक माह की देवउठनी एकादशी पर भगवान विष्णु के रूप शालिग्राम और विष्णुप्रिया तुलसी का विवाह संपन्न किया जाता है। इस दिन महिलाएं रीति-रिवाज से तुलसी वृक्ष से शालिग्राम के फेरे एक सुंदर मंडप के नीचे किए जाते हैं। विवाह में कई गीत, भजन व तुलसी नामाष्टक सहित विष्णुसहस्त्रनाम् के पाठ किये जाने का विधान है। धार्मिक मान्यता है कि निद्रा से जागने के बाद भगवान विष्णु सबसे पहले तुलसी की पुकार सुनते हैं इस कारण लोग इस दिन तुलसी का भी पूजन करते हैं और मनोकामना मांगते हैं। इसीलिए तुलसी विवाह को देव जागरण के पवित्र मुहूर्त के स्वागत का आयोजन माना जाता है। महिलाएं व्रत रखती है तथा पूरे विधि विधान के साथ पूजा अर्चना करती है। तुलसी-शालिग्राम विवाह कराने से पुण्य की प्राप्ति होती है,दांपत्य जीवन में प्रेम बना रहता है।

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