टीम एबीएन, दिल्ली/रांची। भारतीय किसान संघ झारखण्ड प्रदेश से किसान गर्जना रैली में भाग लेकर झारखण्ड के किसान और साथ में किसान संघ के सभी पदाधिकारी गण, प्रदेश अध्यक्ष जय सिंह, महामंत्री प्रकाश नारायण, धीरेन्द्र अग्रवाल, प्रदेश मंत्री दीपक, प्रदेश कार्यकारणी शिव जी, रांची से कामेश्वर मुंडा, देवघर से उदय महराज, डीओ साहेब, हजीराबाग से इन्द्रनारायण कुशवाहा, लातेहार से बबन जी के सामूहिक नेतृत्व में झारखंड राज्य से हजारों किसान गर्जना रैली में शामिल हुए। साथ ही बुढ़मू प्रखण्ड अध्यक्ष चन्दन और रातू प्रखंड अध्यक्ष बेनी साहू के नेतृत्व में हजारों महिला और युवा किसानों ने भाग लिया। साथ ही दिल्ली के रामलीला मैदान में झारखंड राज्य के तरफ से प्रकाश नारायण ने झारखंड के किसानों के तरफ से मंच पर अपनी विचार प्रगट किया। साथ ही 70 वर्षों से पुरानी मांग लागत के आधार पर लाभकारी मूल्य की मांग को जल्द से जल्द पूरा करने एवं युवा किसानों की समस्या से अवगत कराया। बताया कि किस तरह से किसान की स्थिति दयनीय हो रही है और गांवों से युवाओं का पलायन हो रहा है। इसके समाधान के लेकर भारत के प्रधानमंत्री मोदी से इस बजट में मोदी जी से एसटी हटाने, किसान सम्मान निधि को 18,000 करने की मांग को जल्द से इसी वर्ष के बजट में प्रावधान किये जाने की मांग की। जय जवान। जय बलराम। जय किसान...।
एबीएन एडिटोरियल डेस्क (संतोष)। चीन क्या चाहता है? वह 3,488 किलोमीटर लंबी वास्तविक नियंत्रण रेखा पर गतिविधियां बढ़ाने के बावजूद उन्हें गोलीबारी तक पहुंचने से रोके हुए है। ऐसा करके वह भारतीय सैनिकों और आम जनमानस को भड़का क्यों रहा है? उसका लक्ष्य और संदेश क्या है? हम इन सब को लेकर किस प्रकार की प्रतिक्रिया दे रहे हैं?फिलहाल, सैन्य जवाब नहीं दिया जा रहा है। भारत के सशस्त्र बल जमीन पर पर्याप्त और प्रभावी ढंग से निपट रहे हैं। इसे वीरान और अलग-थलग मोर्चे पर हाथापाई और धक्कामुक्की के एक निरंतर चल रहे सिलसिले के रूप में नहीं देखा जा सकता है। हमें यह समझना होगा कि चीन चाहता क्या है। अगर केवल भूभाग का मामला होता तो वह गोलाबारी से परहेज न करता। तब उसने दूर से मार करने वाले हथियार आजमाये होते ताकि न्यूनतम मानव क्षति हो।क्या वह इसलिए कर रहा है कि वास्तविक नियंत्रण रेखा के साथ लगे इलाके और लद्दाख की तरह बफर जोन में बदले गए इलाके को तर्कसंगत ठहराया जा सके? केवल इतना करने के लिए वह 15,000 फुट की ऊंचाई पर और इतने विपरीत हालात में करीब तीन डिवीजन और भारी हथियार नहीं तैनात करेगा। इससे न तो उसकी सुरक्षा मजबूत होगी, न ही संसाधनों तक उसकी पहुंच बेहतर होगी, न ही अपने इलाके की रक्षा करने की भारत की इच्छाशक्ति कमजोर होगी।इसके बावजूद भारत में चीन की हरकतों को लेकर सारी बहस भूभाग पर केंद्रित है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जो सतर्कता बरतते हुए कभी चीन का नाम नहीं लेते उन्होंने 2020 में एक दफा इस मुद्दे पर कुछ कहा था और वह यह कि कोई नहीं आया।विपक्ष की आलोचना और सामरिक टिप्पणियां भी भूभाग पर केंद्रित रहती हैं। हाल के दिनों में राहुल गांधी भी मोदी पर हमला करते हुए दिखे कि चीन के हाथों जमीन गंवाने के बावजूद मोदी चुप हैं। तृणमूल कांग्रेस से लेकर असदुद्दीन ओवैसी की एआईएमआईएम तक तमाम विपक्षी दलों का यही रुख है।चीन के कदमों या उसकी हरकतों से नहीं लगता कि वह जमीन पर कब्जा करना चाहता है। बहुत संभव है कि वह हमारे दिमागों पर काबिज होना चाहता है। वह सैन्य तैनाती के मामले में भारत को पीछे छोड़ना चाहता है और शीत युद्ध के बाद के तीन दशकों के सामरिक पुनर्संतुलन के बीच भारत को असंतुलित करना चाहता है। भारत-अमेरिका नाभिकीय समझौते के बाद इस प्रक्रिया ने जोर पकड़ा और मोदी के आगमन के बाद इसे नए सिरे से गति मिली।चीन भारत को कई जटिल सामरिक और राजनीतिक संदेश दे रहा है। हम भी जमीन या सैन्य रणनीतिक मसलों पर ध्यान देकर अपना कुछ खास भला नहीं कर रहे हैं। इससे हमारी राजनीतिक और सामरिक संस्कृति के बारे में भी कुछ अच्छी बात सामने नहीं आती। हमें इस विषय को आगे और खंगालने की आवश्यकता है। कोई पक्ष जब जंग हार जाता है तो वह आने वाली कई पीढ़ियों तक उसी जंग को बार-बार लड़ता रहता है। हम भी अपनी कल्पनाओं में 1962 की जंग को बार-बार लड़ते रहते हैं। मानो हम खुद को यकीन दिलाना चाहते हों कि हमारा प्रदर्शन पहले से बेहतर रहेगा।एक कठोर सत्य यह है कि वह युद्ध 60 वर्ष पहले हुआ था। तब से अब तक दुनिया बहुत बदल चुकी है। भू राजनीति बदली है, शीतयुद्ध समाप्त हो चुका है, चीन भी बदला है और भारत भी। सैन्य मामलों में भी क्रांतिकारी बदलाव आए हैं। अब यांत्रिक शक्ति की जगह साइबर लड़ाई, ड्रोन, रोबोट और मानव संपर्क की कमी ने ले ली है। यदि हमारी कल्पना अभी भी सन 1962 की चौकियों में उलझी हुई है तो मुझे साहस करके यह कह लेने दीजिए कि हमारी सामरिक और राजनीतिक सोच भी उसी मानसिकता में अटकी हुई है।यही वजह है कि विपक्ष ने गश्त के अधिकार या कथित रूप से भूभाग गंवाने को लेकर हमले शुरू कर दिये। शायद मोदी सरकार भी उसी पुराने सोच से ग्रस्त है और इसी के चलते वह संसद में इस विषय पर चर्चा की इजाजत नहीं दे रही है।अगर मामला जमीन का या गश्त के अधिकार का हो तो घरेलू राजनीति में मामले को तब तक निर्णायक रूप से हल करना असंभव है जब तक आप यह खुलासा करने को तैयार न हों कि आप कहां थे और कहां हैं? ये दोनों बातें दिक्कतदेह हो सकती हैं। मैं इनके विस्तार में नहीं जाऊंगा।वास्तव में चर्चा व्यापक राजनीतिक, सामरिक और भूराजनीतिक पहलुओं के बारे में होनी चाहिए और हमारा राजनीतिक माहौल उसके लिए तैयार नहीं है। भाजपा दो कारणों से हिचक रही है। पहली वजह राजनीतिक है और वह यह कि पार्टी नहीं चाहती कि राष्ट्रीय सुरक्षा को लेकर प्रधानमंत्री के रिकॉर्ड पर सवाल उठाया जाए या उस पर सार्वजनिक चर्चा हो। वह पार्टी को वोट दिलाने वाले सबसे बड़े नेता हैं।उनकी सबसे बड़ी योग्यता यही बताई जाती है कि आजाद भारत के इतिहास में राष्ट्रीय सुरक्षा के मोर्चे पर वह सबसे मजबूत रुख रखते हैं। शी चिनफिंग समय-समय पर इसे चोट पहुंचाते रहते हैं। दूसरी वजह भी राजनीतिक है लेकिन वह उतनी दलगत नहीं है। मौजूदा दौर में वैश्विक शक्ति के पुनसंर्तुलन की जो जरूरत है, भारत जिस तरह के कदम उठा रहा है, इसमें जो संवेदनशीलता शामिल है, वह जिस गुणवत्ता वाली बहस की मांग करता है वह मौजूद ही नहीं है।ऐसा नहीं है कि हमारे राजनीतिक वर्ग के परिपक्वता की कमी है। अधिकांश प्रमुख विपक्षी दलों के नेताओं में यह क्षमता है और वे ऐसा कर चुके हैं। वे राष्ट्रीय सुरक्षा और तेजी से बदलते वैश्विक समीकरण को समझते हैं। बात बस यह है कि उनके और सत्ताधारी दल के बीच समुचित विश्वास की कमी है।नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में पूर्ण बहुमत वाली सरकार के आगमन के साढ़े आठ वर्ष बाद तक विपक्ष को कभी भरोसे में नहीं लिया गया। यहां तक कि बंद दरवाजों के पीछे होने वाले राष्ट्रीय सुरक्षा के संवेदनशील मसलों पर भी नहीं। यह राजनीतिक बिखराव देश की सबसे बड़ी सामरिक कमजोरी है। चीन इसी को निशाना बना रहा है। वह नहीं चाहता कि उसे कोई जान गंवानी पड़े। गलवान में हुई जानलेवा झड़प बीते दो वर्षों में उसकी नीति की सबसे बड़ी नाकामी थी। चीन के आचरण का तरीका देखिए।हर कुछ महीने में चीन भारत को शमिंर्दा करने की कोई हरकत करता है, ताकि प्रधानमंत्री मोदी परेशान हों और साथ ही भारतीय रणनीतिकार भ्रमित हों। इसके दो ताजा उदाहरण हैं तवांग में झड़प और देश के सबसे प्रमुख चिकित्सा शिक्षा संस्थान अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान पर साइबर हमला। ये दोनों तब हुए हैं जब हमने अमेरिका के साथ युद्ध अभ्यास समाप्त ही किया है। अगर भारत क्वाड के साझेदार देश के साथ हिमालय में तिब्बत के करीब अभ्यास करके संकेत दे रहा था तो चीन ने भी अपनी तरह से इसका प्रत्युत्तर दिया। इस प्रतीकात्मक कार्रवाई का उत्तर अधिक क्षति पहुंचाने वाली कार्रवाई से दिया गया।यह सिलसिला आने वाले समय में जारी रहेगा। चीन की नजर जमीन पर नहीं है। उसका लक्ष्य हमारी राष्ट्रीय इच्छा, नैतिकता और स्वायत्तता की भावना है जिससे हमारा सामरिक चयन तय होता है। वे भारत और मोदी सरकार के सबसे कमजोर पहलू को निशाना बना रहे हैं, यानी हमारी विभाजित राजनीति को। यह बात सरकार को विवश करती है कि वह संसद में लोगों को साफ जानकारी न दे और खामोश रहने पर मजबूर रहे और चीन अधिकाधिक इलाके पर काबिज होता रहे। यह कब्जा लद्दाख या अरुणाचल प्रदेश पर नहीं बल्कि हमारी राजनीतिक जमीन पर होगा।नरेंद्र मोदी और उनकी सरकार भारत की रक्षा को तभी मजबूत कर सकते हैं जब शीर्ष पर राजनीतिक समीकरणों को बेहतर किया जाए और विपक्ष के साथ सम्मान से पेश आया जाए तथा उनके साथ भरोसा साझा किया जाए ताकि भारत एकजुट होकर अपनी बात कह सके। अगर आप 1962 पर केंद्रित प्रतिष्ठित पुस्तकें पढ़ेंगे तो आप पाएंगे कि संसद में हुई उग्र बहसों और आलोचना से शमिंर्दा होकर नेहरू एक ऐसे युद्ध में जा फंसे जिसके बारे में उन्हें पता था कि हार निश्चित है।उन्हें शर्मिंदा करने वाले सभी आलोचक विपक्ष के नहीं थे। उनमें से कई तो उनकी पार्टी और यहां तक कि उनके मंत्रिमंडल के साथी थे। सन 1962 के प्रमुख सबकों में से एक यह था कि हमें कहीं अधिक बेहतर, परिपक्व और आपसी विश्वास वाली राजनीति की आवश्यकता है। इस समय जबकि सैन्य बल अपना काम प्रभावी ढंग से कर रहे हैं, हमें एक बार फिर उसी राजनीति की जरूरत है।
2030 तक और 10% कटौती का लक्ष्यएबीएन सेंट्रल डेस्क। सरकार ने सोमवार को राज्यसभा को बताया कि इस्पात मंत्रालय ने 2005 से 2022 के बीच कार्बन उत्सर्जन में 15 प्रतिशत तक की कटौती की है एवं 2030 तक इसमें 10 प्रतिशत और कटौती करने का लक्ष्य रखा है।इस्पात मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया ने राज्यसभा में प्रश्नकाल के दौरान पूरक सवालों के जवाब में यह जानकारी दी। इसके साथ ही उन्होंने बताया कि भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा इस्पात उत्पादक देश बन गया है और पिछले आठ साल में देश की उत्पादन क्षमता दोगुनी हो गई है।सिंधिया ने कहा कि इस्पात मंत्रालय 2070 तक कार्बन उत्सर्जन को शून्य बनाने के लिए प्रतिबद्ध है और इसके लिए अल्पावधि, मध्यावधि और दीर्घावधि के उपाय किए गए हैं। उन्होंने कहा कि अल्पावधि के तहत 2030 तक ऊर्जा एवं संसाधन दक्षता, नवीकरणीय ऊर्जा आदि के उपयोग को बढ़ावा देकर कार्बन उत्सर्जन में कमी पर ध्यान दिया गया है।इसी प्रकार मध्यावधि में 2030 से 2047 के बीच हरित हाइड्रोजन और कार्बन कैप्चर, उपयोग एवं भंडारण पर जोर दिया गया है तथा दीर्घावधि के तहत 2047 से 2070 तक के लिए उपाय किए जाने हैं। उन्होंने कहा कि इस्पात उद्योग में अकार्बनीकरण को बढ़ावा देने के लिए विभिन्न उपाय किये गये हैं।
एबीएन सेंट्रल डेस्क। भारत ने कनाडा के मॉन्ट्रियल में जैव विविधता पर संयुक्त राष्ट्र के शिखर सम्मेलन में कहा है कि विकासशील देशों को जैवविविधता को हुए नुकसान को रोकने और उसकी भरपाई करने के वास्ते 2020 के बाद की वैश्विक रूपरेखा को सफलतापूर्वक लागू करने में मदद देने के लिए एक नया एवं समर्पित कोष बनाने की तत्काल आवश्यकता है। भारत ने यह भी कहा कि जैवविविधता का संरक्षण साझा लेकिन विभेदित जिम्मेदारियों और संबंधित क्षमताओं (सीबीडीआर) पर आधारित होना चाहिए, क्योंकि जलवायु परिवर्तन प्रकृति पर भी असर डालता है।जैविक विविधता पर संधि (सीबीडी) में शामिल 196 देशों के 2020 के बाद की वैश्विक जैव विविधता रूपरेखा (जीबीएफ) पर बातचीत को अंतिम रूप देने के लिए एकत्रित होने के बीच वित्त संबंधित लक्ष्यों में सीबीडीआर सिद्धांत को शामिल करने की मांग की जा रही है। जीबीएफ में जैवविविधता को हुए नुकसान को रोकने और उसकी भरपाई करने के लिए निर्धारित नए लक्ष्य शामिल हैं। भारत सहित 196 देशों के प्रतिनिधि सात दिसंबर से शुरू हुए संयुक्त राष्ट्र के जैवविविधता शिखर सम्मेलन (सीओपी15) में नयी वैश्विक जैव विविधता रूपरेखा (जीबीएफ) पर वार्ता को अंतिम रूप देने की उम्मीद से एकत्रित हुए हैं।विकासशील देशों को मिले फंड और प्रौद्योगिकी की सहायताइस सम्मेलन में केंद्रीय पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव ने कहा, विकासशील देशों को वित्तीय संसाधन उपलब्ध कराने के लिए एक नया और समर्पित तंत्र बनाने की आवश्यकता है। ऐसी निधि जल्द से जल्द बनाई जानी चाहिए, ताकि सभी देश 2020 के बाद जीबीएफ का प्रभावी रूप से क्रियान्वयन कर सकें। भारत ने कहा कि जैव विविधता के संरक्षण के लिए लक्ष्यों को लागू करने का सबसे ज्यादा बोझ विकासशील देशों पर पड़ता है और इसलिए इस उद्देश्य के लिए उन्हें पर्याप्त निधि तथा प्रौद्योगिकी के हस्तांतरण की आवश्यकता है।सीबीडी सीओपी15 में हिस्सा ले रहे देश पर्यावरण के लिए हानिकारक सब्सिडी को खत्म करने पर आम सहमति बनाने की कोशिश भी कर रहे हैं। उनका कहना है कि जीवाश्म ईंधन के उत्पादन, कृषि, वानिकी और मत्स्य पालन के लिए दी जाने वाली सब्सिडी को हर साल कम से कम 500 अरब डॉलर तक कम करना और इस पैसे का इस्तेमाल जैवविविधता संरक्षण के लिए किया जाना बेहद फायदेमंद होगा।बहरहाल, यादव ने कहा कि भारत कृषि संबंधित सब्सिडी को कम करने और इससे बचने वाले पैसे का इस्तेमाल जैवविविधता के संरक्षण के लिए करने पर राजी नहीं है, क्योंकि देश की कई अन्य प्राथमिकताएं भी हैं। यादव ने कहा कि विकासशील देशों में कृषि ग्रामीण समुदायों के लिए आर्थिक विकास सुनिश्चित करने का सर्वोपरि साधन है। उन्होंने कहा कि भारत में ज्यादातर ग्रामीण आबादी कृषि और उससे जुड़े क्षेत्रों पर आश्रित है तथा सरकार इन क्षेत्रों में कई तरह की सब्सिडी उपलब्ध कराती है।
एबीएन सेंट्रल डेस्क। गूगल के सीईओ सुंदर पिचाई ने सोमवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाकात की। पिचाई ने मुलाकात के बाद पीएम मोदी के साथ की तस्वीर को ट्वीट करते हुए लिखा कि आपके नेतृत्व के अंदर तकनीकी बदलाव की तेज रफ्तार को देखना प्रेरणा देता है। सुंदर पिचाई गूगल भारत में गूगल का सबसे बड़ा इवेंट गूगल फॉर इंडिया के 8वें एडिशन में शामिल होने के लिए भारत आए हुए हैं। यह इवेंट दिल्ली के प्रगति मैदान में आयोजित किया गया है। इस कार्यक्रम में सूचना एवं तकनीकी मंत्री अश्विनी वैष्णव भी शामिल हुए थे। सुंदर पिचाई ने ट्वीट करते हुए लिखा कि हमारी मजबूत साझेदारी को जारी रखने और सभी के लिए काम करने वाले एक खुले, कनेक्टेड इंटरनेट को आगे बढ़ाने के लिए भारत की जी20 अध्यक्षता का समर्थन करने के लिए हम तत्पर हैं। गूगल के सीईओ सुंदर पिचाई ने केंद्रीय मंत्री अश्विनी वैष्णव के साथ भारत में एआई और एआई आधारित सॉल्यूशन को लेकर चर्चा की। पिचाई ने इस दौरान कहा कि कुछ ऐसा बनाना आसान है, जो पूरे देश में फैला हो और यही वह अवसर है, जो भारत के पास है। इसके अलावा उन्होंने कहा कि स्टार्टअप करने के लिए कोई बेहतर क्षण नहीं है, भले ही हम अभी मैक्रो-इकोनॉमिक स्थिति के माध्यम से काम कर रहे हैं। वहीं सूचना एवं तकनीकी मंत्री अश्विनी वैष्णव के साथ हुई चर्चा को लेकर सुंदर पिचाई ने ट्वीट किया कि आज हुए जीवंत बातचीत करने के लिए अश्विनी वैष्णव का धन्यवाद। वहीं बातचीत को मॉडरेट करने के लिए श्रद्धा शर्मा का भी शुक्रिया। एआई, स्टार्टअप्स और प्रोद्योगिकीविदों की अगली पीढ़ी के साथ अभी भारत में हो रही रोमांचक चीजों से उत्साहित हूं।
एबीएन सेंट्रल डेस्क। उत्तर प्रदेश सरकार के अल्पसंख्यक कल्याण राज्य मंत्री दानिश आजाद अंसारी ने नई दिल्ली में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से भेंट की। भेंट के दौरान दानिश आजाद अंसारी ने प्रधानमंत्री को विभाग द्वारा किए जा रहे कार्यों से अवगत कराया। उन्होंने अल्पसंख्यक अधिकार दिवस के अवसर पर प्रदेश भर के मदरसों में आयोजित हुई विज्ञान प्रदर्शनी और आगामी दिनों में होने वाले मदरसा स्तर के खेलकूद प्रतियोगिता व अल्पसंख्यक रोजगार मेले के बारे में अवगत कराते हुए राज्यमंत्री ने प्रधानमंत्री से उनका मार्गदर्शन प्राप्त किया। पीएम ने विभिन्न अल्पसंख्यक मसलों पर चर्चा करते हुए राज्यमंत्री दानिश आजाद अंसारी को अल्पसंख्यक समाज और नौजवानों के लिए बेहतर से बेहतर काम करने को कहा। पीएम ने कहा कि जिस तरीके से सरकार ईमानदारी से सभी योजनाओं का सीधा लाभ अल्पसंख्यक समाज को दे रही है और उनका विकास हो रहा है इसको आगे भी ऐसे ही जारी रखते हुए सबका साथ सबका विकास के नारे पर ईमानदारी से काम करना है। खासतौर पर पसमांदा समाज के बारे में चर्चा करते हुए पीएम ने कहा कि पिछड़ा पसमांदा समाज के बेहतर शिक्षा और रोजगार पर गंभीरता से कार्य करना है।
एबीएन सेंट्रल डेस्क। वर्ष के अंतिम छोर पर पहुंचने के साथ ही पीआर 24७7 ने अपने वार्षिक कार्यक्रम, उड़ान के 11वें संस्करण का आयोजन किया। पुराने तमाम संस्करणों की यादों के साथ यह इवेंट तुलनात्मक रूप से सबसे खास रहा, क्योंकि इसका आयोजन कंपनी के नवीनतम आफिस में किया गया, जो टीम को लंबे समय तक अपने करीब रखने वाली मीठी यादें दे गया, जो वास्तव में देखने लायक था। इवेंट की शुरुआत रेनोवेटेड आॅफिस के भव्य उद्घाटन के साथ हुई। इस इवेंट को करने का उद्देश्य विशेष रूप से एम्प्लॉयीज की वर्ष भर की कड़ी मेहनत और प्रयासों को पहचानने के साथ ही उन्हें सम्मानित करना रहा। एम्प्लॉयीज ने कई गतिविधियों, जैसे- डांस, सॉन्ग, ट्रेजर हंट, ग्रुप एक्ट्स आदि में भाग लेकर इवेंट की शोभा बढ़ाई। इसमें कोई दो राय नहीं है कि पीआर 24७7 हमेशा से ही एक परिवार की तरह रहा है और टीम के सदस्यों को व्यक्तिगत और व्यावसायिक विकास दोनों के लिए प्रोत्साहित करने में कोई कमी नहीं रखता है। इवेंट में अपने निरंतर प्रयासों से कंपनी की सफलता में योगदान देने वाले कई एम्प्लॉयीज के प्रमोशन्स भी हुए। इसके साथ ही पाँच एम्प्लॉयीज विनीत भट्ट, भगवान सिंह, परिणीता नागरकर, मीना बिसेन, आसिफ पटेल और सपना ढोले को स्टार आफ द ईयर पुरस्कारों से सम्मानित किया गया। अंत में, विकास राजौरा ने वोट आॅफ थैंक्स देकर कार्यक्रम का समापन किया। स्टार आफ द ईयर पुरस्कार जीतने पर अपना उत्साह व्यक्त करते हुए, विनीत भट्ट, सीनियर मैनेजर, मीडिया मॉनिटरिंग पीआर 24 गुणा 7, ने कहा, यह अनुभव मेरे लिए बेहद खास रहा। कड़ी मेहनत कभी विफल नहीं होती है और यह पुरस्कार इसका जीता-जागता उदाहरण है। मैं आभारी हूँ कि पीआर 24 गुणा 7 ने न सिर्फ मेरे परिश्रम को पहचाना, बल्कि इसके लिए मुझे सम्मानित भी किया। यह मेरे लिए बेहद गर्व का विषय है। मैं इस सम्मान के लिए कंपनी का धन्यवाद् देना चाहता हूं। पुरस्कार प्राप्त करने के क्षण को याद करते हुए, आसिफ पटेल, डीएमएम, पीआर 24 गुणा 7, ने कहा कि यह पुरस्कार मेरे लिए कितना मायने रखता है, इसे लेकर मैं शब्दों में अपनी खुशी बयां नहीं कर सकता। यह ऐसा था, जैसे मैं सातवें आसमान पर हूं। बहुत अच्छा लगता है जब आपके काम और प्रयासों को पहचाना जाता है, वह भी इतने भव्य तरीके से। बीते वर्ष ने मुझे बहुत कुछ सिखाया है और मैं अपने काम में अपना सर्वश्रेष्ठ देना जारी रखूंगा। इस इवेंट के बारे में बात करते हुए सुरभि पाटीदार, सीनियर एग्जीक्यूटिव, पीआर 24 गुणा 7, ने कहा कि यह पल हम सभी के लिए प्रेरणा से भरपूर था। इसने हमें कड़ी मेहनत करने और काम में अपना सर्वश्रेष्ठ देने के लिए प्रेरित किया, क्योंकि हम जानते हैं कि मेहनत का फल मीठा होता है। रोहित ढोलिया, सीनियर एग्जीक्यूटिव, पीआर 24 गुणा 7 ने कहा कि यह एक शानदार अनुभव था। हर एम्प्लॉयी चाहता है कि वर्कप्लेस में उसकी एक अलग पहचान हो। और जब इसे इतने बड़े पैमाने पर मनाया जाता है, तो आनंद दस गुना हो जाता है। हम पर भरोसा करने के लिए पीआर 24 गुणा 7 को धन्यवाद्। अपनी क्षमताओं के साथ मैं अपना सर्वश्रेष्ठ देने के लिए तत्पर हूं। चाहे वह विभिन्न त्योहारों को मनाने के बारे में हो या फैमिली डे के रूप में काम और जीवन के बीच संतुलन बनाने पर जोर देना हो, पीआर 24 गुणा 7 कॉर्पोरेट इंडस्ट्री में क्रांतिकारी बदलाव लाने में हमेशा ही सबसे आगे रहा है। इस प्रकार, उड़ान, कंपनी को सफलता की राह पर ले जाने के लिए एम्प्लॉयीज के निरंतर प्रयासों को पहचानने और उनकी सराहना करने का उत्सव है। जानें पीआर 24 गुणा 7 के बारे में : भारत के मध्य प्रदेश के इंदौर में स्थित पीआर 24़7, अग्रणी पीआर एजेंसियों में से एक है, जिसका सफल पीआर ब्रीफ देने का ट्रैक रिकॉर्ड है। अत्यधिक अनुभवी पीआर प्रोफेशनल की अपनी टीम के साथ, पीआर 24़7, ब्रांड्स कम्युनिकेशन इंडस्ट्री, मीडिया रिलेशन्स और क्रिएटिव स्ट्रेटेजिक प्लानिंग के क्षेत्र में अपने अनुभव के साथ, उनकी प्रतिष्ठा को बेहतर बनाने में मदद करता है। वर्तमान में, संगठन में एक विशाल ग्राहक शृंखला और लगभग 75+ प्रोफेशनल की एक जोशीली और अनुभवी टीम।
एबीएन सेंट्रल डेस्क। 21वीं सदी में यह शर्मनाक स्थिति है कि तमाम वैज्ञानिक-तकनीकी उन्नति के बावजूद बीते पांच सालों में सीवर व सैप्टिक टैंकों की सफाई के दौरान चार सौ अनमोल जिंदगियां हमने गंवा दीं। इस साल भी 48 लोगों के मरने की बात कही जा रही है। निस्संदेह, इसके मूल में जहां तंत्र की विफलता निहित है, वहीं समाज की संवेदनहीनता भी है। विडंबना है कि स्थानीय निकाय और सफाई करवाने वाले लोग इस दौरान मरने वाले सफाई कर्मियों के आश्रितों के पुनर्वास की जवाबदेही से मुक्त रहते हैं। निस्संदेह, ऐसी मौतें बेहद कष्टकारी हैं और विसंगति के समाज के मुंह पर तमाचा है। हाल ही में केंद्रीय सामाजिक न्याय एवं आधिकारिता राज्यमंत्री रामदास आठवले ने जब यह जानकारी लोकसभा में दी तो सूचना कई सवालों को जन्म दे गई। ये आंकड़े हमारे विकास के थोथे दावों की हकीकत बताते हैं। आखिर क्यों कुछ लोग अपने परिवार के भरण-पोषण के लिये अपना जीवन दांव पर लगाते हैं। आखिर खतरे की आशंका के बावजूद क्यों वे अपना जीवन जोखिम में डालने को बाध्य हैं। क्यों हम ऐसी तकनीकों का प्रयोग नहीं कर पाये जो सफाईकर्मियों को चेता सकें कि सीवर या सैप्टिक टैंक में जहरीली गैस विद्यमान है। क्यों सफाई कर्मी पर्याप्त सुरक्षा व जीवन रक्षा उपकरणों के न होने के बावजूद मौत के कुओं में उतरते हैं। कई बार खतरे में फंसे व्यक्ति को बचाने के प्रयास में कई लोग जान गवां बैठते हैं। यदि समय रहते बचाव व राहत के उपाय अमल में लाये जाएं तो कई जानें बचायी जा सकती हैं। निस्संदेह, यह राहत की बात है कि लंबे सामाजिक आंदोलनों व कतिपय राजनेताओं की सार्थक पहल के बाद देश हाथ से मैला ढोने के कलंक से मुक्त हो पाया है। दरअसल, हाथ से मैला ढोने के रोजगार निषेध और पुनर्वास अधिनियम 2013 के अमल में आने से इसे रोका जा सका है। इसके बावजूद यह प्रश्न परेशान करता है कि क्यों आज भी लाखों लोग सैप्टिक टैंकों व सीवर की सफाई के जोखिम भरे कार्य को करने के लिए बाध्य हैं।दूसरी ओर केंद्र सरकार दावा कर रही है कि मैला ढोने की प्रथा को समाप्त करने के बाद, श्रमिकों के पुनर्वास के लिए स्वरोजगार योजना के तहत वर्ष 2021-22 में 39 करोड़ रुपये का भुगतान किया गया है। साथ ही यह भी कि इन हादसों में मरने वाले श्रमिकों के अधिकांश परिवारों को मुआवजा भी दिया गया है। इसके बावजूद जरूरी है कि सफाई कर्मियों की सुरक्षा पर विशेष ध्यान दिया जाये ताकि भविष्य में ऐसे हादसों की पुनरावृत्ति न हो। उल्लेखनीय है कि वर्ष 2019 में सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को फटकार लगाते हुए सीवर लाइन व सैप्टिक टैंकों में उतरने वाले सफाई कर्मचारियों को सुरक्षा मास्क और ऑक्सीजन सिलेंडर जैसे सुरक्षा उपकरण उपलब्ध कराने को कहा था। ताकि जहरीली गैस होने पर उनके प्राणों की रक्षा की जा सके। साथ ही जरूरी है कि समाज से असमानता को दूर करते हुए सफाई कर्मियों के मानवाधिकारों की रक्षा भी की जाये। यह व्यवस्था कर्म प्रधान होनी चाहिए। इस चुनौतीपूर्ण काम करने वालों को पर्याप्त वेतन और सुविधाएं भी दी जानी चाहिए। ताकि वे गरिमापूर्ण ढंग से अपने कार्य को अंजाम दे सकें। ऐसा नहीं होना चाहिए कि समाज में सफाई जैसे महत्वपूर्ण कार्य करने वालों को हेय दृष्टि से देखा जाये। सही मायनों में यह वर्ग संरक्षण का हकदार है। जिससे इनके बच्चों की बेहतर परवरिश व पढ़ाई हो सके। इसके साथ ही पूरे देश में प्रयास होने चाहिए कि मशीनीकृत सफाई को प्राथमिकता मिले। इसका उद्देश्य रोजगार कम करके मशीनों पर निर्भरता बढ़ाने के बजाय सफाई कर्मियों की जीवन सुरक्षा होना चाहिए। साथ ही सफाई के दौरान जान गंवाने वाले कर्मियों के परिवार की पहचान करने तथा भरण-पोषण के लिये दस लाख रुपये का मुआवजा देने का जो आदेश सुप्रीम कोर्ट ने दिया था, उसका संवेदनशीलता के साथ अनुपालन सुनिश्चित होना चाहिए। ऐसा न हो कि पीड़ित सफाईकर्मी के आश्रित मुआवजा पाने की जद्दोजहद में लालफीताशाही का शिकार बनें। सवाल यह भी है कि अमृतकाल का उत्सव मनाते देश में कुछ लोगों के हिस्से में विष क्यों आया है?
एबीएन सेंट्रल डेस्क। सुरक्षा परिषद की अध्यक्षता करने के अवसर का सदुपयोग करते हुए भारत ने प्रत्यक्ष-परोक्ष रूप से आतंकवाद को प्रश्रय देने वाले पाकिस्तान व चीन को कड़ा संदेश दिया है। गाहे-बगाहे कश्मीर के मुद्दे पर भारत को घेरने की कोशिश करने वाले पाक को एक अंतर्राष्ट्रीय मंच से सख्त संदेश देना वक्त की जरूरत थी। वहीं दूसरी ओर यह तथ्य किसी से नहीं छिपा है कि पाकिस्तान जम्मू-कश्मीर व पंजाब की सीमाओं के जरिये लगातार आतंकवादी गतिविधियों को बढ़ावा देता रहा है। हाल के दिनों में भारतीय सेना और सुरक्षा बलों की मुस्तैदी से घुसपैठ रोकने में मिली कामयाबी के बाद पाक लगातार ड्रोन के जरिये अपने घातक मंसूबों को अंजाम दे रहा है। इतना ही नहीं, वह लगातार नशे व नकली नोटों की खेप भारत भेज रहा है। वहीं चीन अपने मोहरे पाक के अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं के निशाने पर आये कुख्यात आतंकवादियों को वीटो की ताकत से संरक्षण देता रहा है। हाल के वर्षों में पाक पोषित कुख्यात आतंकवादी संगठन जैश-ए-मोहम्मद व लश्कर-ए- तैयबा के कुख्यात आतंकवादियों पर प्रतिबंध लगाने के भारतीय व अमेरिकी प्रयासों में चीन बाधा डालता रहा है। ये अतिवादी भारत में बड़ी आतंकवादी घटनाओं में प्रत्यक्ष व परोक्ष रूप से शामिल रहे हैं। यही वजह है कि अंतर्राष्ट्रीय कूटनीतिक जगत में प्रतिष्ठा पाने वाले विदेश मंत्री जयशंकर ने चीन को दो टूक शब्दों में स्पष्ट संदेश भी दिया कि कोई भी देश संयुक्त राष्ट्र जैसे प्रतिष्ठित व बहुपक्षीय मंच का उपयोग कूटनीतिक व सामरिक हितों को साधने के लिये नहीं कर सकता। फिलहाल, एक वर्ष तक जब तक सुरक्षा परिषद की अध्यक्षता का अवसर भारत के पास है, हमारे लिए चीन-पाक के अपवित्र गठबंधन को तार्किक ढंग से बेनकाब करना समय की जरूरत है।भारत संयुक्त राष्ट्र पर सात दशक बाद भी मुट्ठीभर देशों के वर्चस्व को लगातार चुनौती देता रहा है। भारत का मानना रहा है कि संयुक्त राष्ट्र और इसके आनुषंगिक संगठनों का स्वरूप लोकतांत्रिक होना चाहिए। दरअसल, आज भी इस बहुपक्षीय मंच पर चुनींदा स्थायी सदस्यता वाले देशों ने कब्जा बना रखा है। बदलते वक्त की मांग है कि दुनिया के बड़ी आबादी व विशाल अर्थव्यवस्था वाले देशों को भी स्थायी सदस्य बनने का मौका मिलना चाहिए। यही वजह है कि भारत दुनिया के तमाम देशों में अपनी दावेदारी के समर्थन में लंबे समय से लगातार मुहिम चलाता रहा है। निस्संदेह, भारत को मिली सुरक्षा परिषद की अस्थायी अध्यक्षता का पूरा लाभ संयुक्त राष्ट्र में सुधारों के लिए विश्व जनमत तैयार करने के लिए किया जाना चाहिए। हालांकि, यह महत्वपूर्ण है कि वैश्विक पटल पर विदेश मंत्री एस जयशंकर जोरदार ढंग से अपनी बात को रखते हैं। वे बिना किसी लाग-लपेट के खरी-खरी कहने के लिए जाने जाते हैं। उन्होंने स्पष्ट किया है कि गहराई से देखें तो वैश्विक परिदृश्य में नाटकीय बदलाव सामने आये हैं। लेकिन संयुक्त राष्ट्र में सुधारों पर होने वाली बहस लक्ष्यहीन हो चली है। यही वजह है कि सुधारों के लिये वर्किंग ग्रुप के गठन के तीन दशक बाद भी अपेक्षित लक्ष्यों को हासिल नहीं किया जा सका है। जिसकी मूल वजह यह है कि स्थायी सदस्यता वाले देशों ने नई व्यवस्था में ताकतवर बनकर उभरे देशों को आगे आने का मौका देने के प्रति ईमानदारी नहीं दिखाई है। निस्संदेह, बदलाव के लक्ष्यों के प्रति दृढ़ इच्छा शक्ति का अभाव हमें आगे नहीं बढ़ने दे रहा है। इसके बावजूद भारत बदलाव के लक्ष्यों के प्रति पूरी तरह समर्पित है। विदेश मंत्री ने पाक द्वारा कश्मीर का मुद्दा यूएन में उठाये जाने पर चीन के वीटो के दुरुपयोग पर दो टूक टिप्पणी की थी। उन्होंने पाक विदेश मंत्री को भी खरी-खोटी सुनाई कि जो देश ओसामा बिन लादेन की मेजबानी करता है और पड़ोसी लोकतांत्रिक देश की संसद पर हमला करने वालों को प्रश्रय देता हो, उसे ऐसे मुद्दों पर बोलने का नैतिक अधिकार नहीं है। निस्संदेह, समकालीन वास्तविकताओं के मद्देनजर संयुक्त राष्ट्र के ढांचे में परिवर्तन अपरिहार्य हैं। सवाल यह भी है कि कोरोना संकट के बाद उपजे हालातों तथा रूस-यूक्रेन युद्ध के बीच यह संस्था प्रभावी भूमिका क्यों नहीं निभा पा रही है।
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