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रांची : दुर्गाबाड़ी में हुई मां दुर्गा की पारंपरिक विदाई
Published / 2025-10-02 21:47:39
रांची : दुर्गाबाड़ी में हुई मां दुर्गा की पारंपरिक विदाई

रांची के दुर्गाबाड़ी में मां दुर्गा की पारंपरिक विदाईटीम एबीएन, रांची। रांची की दुर्गाबाड़ी में दुर्गा पूजा की पारंपरिक विधियों और रीति-रिवाजों के लिए खास पहचान रखता है। यहां पूजा-अर्चना से लेकर मां की विदाई तक हर आयोजन पूरी तरह परंपरा के अनुरूप किया जाता है। विजयादशमी के पावन अवसर पर गुरूवार को देवी मां की डोली उठाकर पारंपरिक ढाक और ढोल की थाप पर भक्तों ने माता रानी को नम आंखों से विदाई दी। भावुकता और उत्सव का यह संगम बारिश के बावजूद पूरे उत्साह और भक्ति भाव के साथ देखने को मिला।मां की डोली उठाकर कंधों पर ले जाने की परंपरा यहां लंबे समय से निभाई जा रही है। इस साल भी भक्तों ने पारंपरिक अंदाज में मां की प्रतिमा को डोली पर सजाया और कंधों से उठाकर जलाशय की ओर प्रस्थान किया। चारों ओर जय मां दुर्गा और बोलो दुर्गा माई की जय के जयकारे गूंजते रहे। डोली यात्रा में बड़ी संख्या में महिलाएं, पुरुष और बच्चे शामिल हुए।

जीवन का गहन संदेश देने वाला आध्यात्मिक उत्सव है दशहरा: महेश पाल
Published / 2025-10-01 14:42:06
जीवन का गहन संदेश देने वाला आध्यात्मिक उत्सव है दशहरा: महेश पाल

विजयदशमी केवल एक धार्मिक पर्व नहीं, बल्कि जीवन का गहन संदेश देने वाला आध्यात्मिक उत्सव है। यह युवाओं को समझाता है कि असली विजय बाहरी नहीं, बल्कि आंतरिक है : योगाचार्य महेश पालएबीएन सोशल डेस्क। योगाचार्य महेश पाल ने बताया कि आज के समय में जब युवा वर्ग अनेक चुनौतियों और प्रलोभनों से गुजर रहा है, विजयदशमी का आध्यात्मिक महत्व उनके लिए मार्गदर्शक सिद्ध हो सकता है। भारतीय संस्कृति में विजयदशमी (दशहरा) एक अत्यंत पावन और प्रेरणादायक पर्व है। यह पर्व असत्य पर सत्य की, अहंकार पर विनम्रता की और अधर्म पर धर्म की विजय का प्रतीक है। रामायण में श्रीराम द्वारा रावण का वध और महिषासुर पर माँ दुर्गा की विजय, दोनों ही घटनाएँ हमें यही संदेश देती हैं कि बुराई कितनी भी शक्तिशाली क्यों न हो, सत्य और धर्म की शक्ति के आगे उसे झुकना ही पड़ता है।आज का युवा केवल शिक्षा और करियर की ही नहीं, बल्कि नैतिक और आध्यात्मिक मूल्यों की भी चुनौती से गुजर रहा है।विजयदशमी इस संदर्भ में उन्हें कई महत्वपूर्ण सीख देती है: आत्म-संयम और अनुशासन की प्रेरणा, रावण विद्वान और शक्तिशाली था, लेकिन उसकी कमजोरी उसका अहंकार था। युवाओं के लिए यह शिक्षा है कि प्रतिभा तभी सफल होती है जब उसमें विनम्रता और अनुशासन जुड़ा हो। यह पर्व सिखाता है कि वास्तविक विजय केवल दूसरों को हराने में नहीं, बल्कि स्वयं को निखारने में है। समाज सेवा की प्रेरणा : विजयदशमी हमें अपने स्वार्थ से ऊपर उठकर समाज और राष्ट्रहित के लिए कार्य करने की सीख देती है।युवाओं को  अपने मन को नियंत्रित करने के लिये  योग्य साधनाएँ जिसमें है, ध्यान और योग – मानसिक स्थिरता और आत्मसंयम के लिए। पढ़ाई और कार्य में ईमानदारी : जीवन के हर क्षेत्र में सफलता के लिए। नियमित आत्मचिंतन : अपनी कमियों और अच्छाइयों को पहचानने के लिए।सकारात्मक संगति : अच्छे मित्र और सही वातावरण जीवन को दिशा देते हैं। भगवान राम ने अन्याय और अत्याचार को सहन नहीं किया, बल्कि धर्म की रक्षा के लिए युद्ध किया। यही शिक्षा हर व्यक्ति को अपने जीवन में लागू करनी चाहिए यह पर्व हमें स्मरण कराता है कि असत्य और अन्याय की उम्र सीमित होती है। सत्य की शक्ति चिरस्थायी है।आत्म-विजय का संदेश : रावण केवल बाहरी शत्रु नहीं, बल्कि भीतर के अहंकार, क्रोध, वासना और लोभ का प्रतीक भी है। विजयदशमी का वास्तविक अर्थ है इन आंतरिक शत्रुओं पर विजय प्राप्त करना। शक्ति और भक्ति का संगम : यह दिन माँ दुर्गा की विजय का भी प्रतीक है, जिससे यह संदेश मिलता है कि जब हम सच्चे संकल्प और भक्ति से कर्म करते हैं, तब दैवीय शक्तियाँ हमारा साथ देती हैं। विजयदशमी केवल एक धार्मिक पर्व नहीं, बल्कि जीवन का गहन संदेश देने वाला आध्यात्मिक उत्सव है। यह युवाओं को यह समझाता है कि असली विजय बाहरी नहीं, बल्कि आंतरिक है। जब युवा अपने भीतर के रावण अहंकार, आलस्य, लोभ और क्रोध को पराजित कर देंगे, तभी वे जीवन में वास्तविक सफलता, शांति और संतोष पा सकेंगे। इस प्रकार, विजयदशमी युवाओं के लिए केवल उत्सव मनाने का दिन नहीं, बल्कि आत्मविकास, आध्यात्मिक उत्थान और समाज में सकारात्मक योगदान का एक संकल्प दिवस  है।

वीर सावरकर नगर के कुटे बस्ती में पथ संचलन तथा शस्त्र पूजन उत्सव
Published / 2025-09-30 23:18:03
वीर सावरकर नगर के कुटे बस्ती में पथ संचलन तथा शस्त्र पूजन उत्सव

महानगर कार्यवाह श्री दीपक जी ने समाज से नारी शक्ति के सम्मान हेतु आगे आने का आह्वान कियाएबीएन सोशल डेस्क। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ कुटे बस्ती द्वारा संघ शताब्दी वर्ष के अवसर पर शस्त्र पूजन एवं पथ संचलन कार्यक्रम आयोजित किया गया कार्यक्रम में महानगर कार्यवाह दीपक जी का उद्बोधन प्राप्त हुआ। भाषा, भूषा, भजन, भ्रमण, भोजन शुद्ध स्वदेशी हो। कोई भी भाषा समाज को जोड़ने के लिए हैं, तोड़ने के लिए नहीं। सभी भाषाओं का संवर्धन करते हुए अपनी मातृभाषा, अपने गांव की भाषा का संवर्धन तथा जिस क्षेत्र में रहते हैं वहां की भाषा का सम्मान वहां की भाषा का संवर्धन करके ही राष्ट्र को एक किया जा सकता है । भारतीय परिधान अर्थात भारतीय वेशभूषा। भजन में भी भारतीयता का भाव सदैव बना रहे। भारतीय भोजन - भारतीय व्यंजन जो कि स्वास्थ्य की लिए भी अच्छा है उनका ही उपयोग करें। भ्रमण के लिए भी अपने स्थानीय और अपने राष्ट्र के क्षेत्र में ही जाएं।विजयादशमी शक्ति एवं संगठन की साधना तथा मातृशक्ति के सम्मान के संकल्प का अवसर है। हिंदू समाज की दुर्दशा के कारण स्वयं हिंदू समाज की विसंगतियों में ही निहित हैं। हमने अपने स्व को विस्मृत किया जिसके फलस्वरूप  हमें सैकड़ो वर्षों की राजनीतिक परतंत्रता झेलनी पड़ी।आज भी हिंदू समाज के चरित्र में विरोधाभास दिखाई देता है। नवरात्रि के अवसर पर  छोटी बालिकाओं की मां दुर्गा के रूप में पूजा करने वाले समाज का एक वर्ग आज भी  लिंग परीक्षण कर कन्या भ्रूण हत्या करता है। हम अपने राष्ट्रनायकों का सम्मान तो करते हैं परंतु उनके बताए मार्ग का अनुसरण नहीं करते। भारत माता को परम वैभव के आसन तक ले जाने के लिए हमें अपनी वि संगतियों को दूर करना पड़ेगा। शक्तिहीन होना संसार का सबसे बड़ा पाप है।भारतवर्ष की कर्मप्रधान संस्कृति विशेषता है यहां प्रत्येक व्यक्ति को साधना-तपस्या का फल प्राप्त होता है इसलिए रावण महिषासुर जैसे दुराचारी लोगों को भी उनकी साधना के कारण वरदान प्राप्त हुए। शक्ति की साधना सबके लिए अनिवार्य है। रावण पर विजय प्राप्त करने के लिए ईश्वर के अवतार भगवान राम को भी शक्ति की उपासना करनी पड़ी। कलयुग में संगठन में ही शक्ति है। हिंदू समाज के संगठन के माध्यम से ही पूरे विश्व में शांति आ सकती है क्योंकि सर्वे भवंतु सुखिनः  के ध्येय मंत्र का उद्घोष हिंदू समाज ही करता है।सामाजिक समरसता, पर्यावरण संरक्षण,कुटुंब प्रबोधन, स्वदेशी का भाव और नागरिक कर्तव्य इन पांच प्रणों की पालकी में बैठकर ही भारत माता परम वैभव के आसन तक जाने वाली है। कोई भी भौतिक अथवा पारलौकिक समृद्धि इन पांच परिवर्तनों की परिधि के बाहर  नहीं है।पंच प्रण के विषयों को स्वयं से प्रारंभ कर इन्हें समस्त समाज का आंदोलन बनाना पड़ेगा तभी भारतवर्ष की विजयशालिनी शक्ति जाग्रत होगी

10 दिवसीय योग शिविर में  नवरात्र काल में योग का आध्यात्मिक महत्व के बारे में बताया : योगाचार्य महेश
Published / 2025-09-30 16:01:09
10 दिवसीय योग शिविर में नवरात्र काल में योग का आध्यात्मिक महत्व के बारे में बताया : योगाचार्य महेश

एबीएन सोशल डेस्क। गायत्री मंदिर में चल रहे 10 दिवसीय योग शिविर में योगाचार्य महेश पाल ने योग के आध्यात्मिक महत्व के बारे में बताया  जिसमें उन्होंने कहा कि नवरात्र, भारतीय संस्कृति का एक प्रमुख और पवित्र पर्व है, जिसमें माँ दुर्गा के नौ रूपों की उपासना की जाती है। यह समय केवल धार्मिक आस्था और भक्ति का प्रतीक ही नहीं, बल्कि साधना, आत्मशुद्धि और आध्यात्मिक उन्नति का अवसर भी प्रदान करता है। योग, जो कि शरीर, मन और आत्मा के सामंजस्य का मार्ग है, नवरात्र के दिनों में विशेष महत्व रखता है। नवरात्र के दौरान योग का अभ्यास साधक को न केवल शारीरिक और मानसिक शांति देता है, बल्कि साधना की गहराई को भी बढ़ाता है नवरात्र को साधना, उपवास और आत्मसंयम का पर्व माना जाता है। इस दौरान व्यक्ति बाहरी आकर्षणों और भौतिक इच्छाओं से दूर होकर आत्मचिंतन और आत्मशुद्धि की ओर अग्रसर होता है। योग का अभ्यास इस साधना को सशक्त बनाता है क्योंकि योग व्यक्ति को अंतर्मुखी होने और आत्मा से जुड़ने की दिशा में प्रेरित करता है। नवरात्र में उपवास का विशेष महत्व है। उपवास शरीर से विषैले तत्वों को बाहर निकालकर उसे शुद्ध करता है। योगासन और प्राणायाम इस प्रक्रिया को और अधिक प्रभावी बना देते हैं। प्राणायाम उपवास के दौरान मन और भावनाओं को नियंत्रित करता है। ध्यान साधक को भक्ति और आध्यात्मिक ऊर्जा से जोड़ता है। योगासन शरीर को हल्का, सक्रिय और संतुलित बनाए रखते हैं, योग के अनुसार मानव शरीर में सात चक्र होते हैं, जो ऊर्जा के मुख्य केंद्र हैं। नवरात्र में नौ दिनों की साधना धीरे-धीरे साधक की ऊर्जा को ऊपर की ओर ले जाती है। पहले दिन से लेकर नवें दिन तक माँ दुर्गा के नौ रूपों की आराधना चक्रों की शुद्धि और जागरण का प्रतीक मानी जाती है। ध्यान और मंत्र जप से मूलाधार से सहस्रार तक की ऊर्जा सक्रिय होती है, जो साधक को गहन आध्यात्मिक अनुभव प्रदान करती है। नवरात्र में योग का अभ्यास व्यक्ति को नकारात्मक विचारों, तनाव और असंतुलन से दूर करता है। जब साधक प्राणायाम और ध्यान करता है तो उसकी चेतना शुद्ध होती है। यह शुद्ध चेतना माँ दुर्गा की भक्ति और दिव्य शक्ति को आत्मसात करने में सहायक होती है। नवरात्र काल को शक्ति की उपासना का समय माना गया है। योग साधना इस शक्ति को भीतर से जाग्रत करती है। विशेष रूप से कुंडलिनी योग से साधक अपनी सुप्त ऊर्जा को जागृत कर सकता है।ध्यान और जप से साधक ईश्वर के साथ आत्मिक संबंध को अनुभव करता है। सात्विक आहार और योग से शरीर-मन दोनों में शुद्धता आती है, जिससे आध्यात्मिक उन्नति सरल हो जाती है। नवरात्र भक्ति का पर्व है और योग साधना का मार्ग। जब भक्ति और योग मिल जाते हैं तो साधक को सर्वोच्च आनंद की प्राप्ति होती है।योग साधना भक्ति को स्थिर करती है, और भक्ति योग साधना को भावनात्मक गहराई प्रदान करती है, नवरात्र में साधारण, सहज और शांति देने वाले आसनों का अभ्यास करना श्रेष्ठ माना जाता है, क्योंकि इस समय उपवास और साधना के कारण शरीर हल्का रहता है। पद्मासन (Lotus Pose): ध्यान और मंत्र जप के लिए सर्वोत्तम आसन। वज्रासन-(Thunderbolt Pose): भोजन या फलाहार के बाद बैठने के लिए उत्तम, पाचन में सहायक। सुखासन- (Easy Pose): लंबी साधना और ध्यान हेतु आरामदायक।भुजंगासन- (CobraPose): ऊर्जा और जागरूकता बढ़ाता है।त्रिकोणासन - (Triangle Pose): शरीर में संतुलन और लचीलापन लाता है।शवासन - (Corpse Pose): मानसिक शांति और विश्रांति हेतु अनिवार्य, नवरात्र के दिनों में प्राणायाम से साधक का मन स्थिर और चेतना निर्मल होती है। अनुलोम-विलोम: नाड़ी शुद्धि और मानसिक संतुलन के लिए। भ्रामप्राणायाम: तनाव और चंचलता दूर कर ध्यान में गहराई लाता है। कपालभाति: शरीर से विषैले तत्व निकालकर ऊर्जा प्रदान करता हैनाड़ी शोधन प्राणायाम: शरीर और मन दोनों को शुद्ध करता है। ऊँ जप के साथ श्वास अभ्यास: आध्यात्मिक कंपन को बढ़ाता है और भक्ति भाव को गहन करता है। प्रतिदिन माँ दुर्गा के मंत्र (जैसे ॐ दुं दुर्गायै नमः) का जप ध्यान मुद्रा में बैठकर करना चाहिए। प्रत्येक दिन माता के नौ रूपों का ध्यान चक्र साधना के साथ जोड़कर करने से साधक को गहरी आध्यात्मिक अनुभूति होती है।नवरात्र के पावन अवसर पर योगासन, प्राणायाम और ध्यान साधक की साधना को सशक्त और गहन बना देते हैं। उपवास के साथ योग का संयोजन न केवल शरीर को शुद्ध करता है बल्कि साधक को देवी शक्ति के साथ आत्मिक रूप से जोड़ता है। यही कारण है कि नवरात्र काल में योग का अभ्यास विशेष रूप से आध्यात्मिक महत्व रखता है।

10 दिवसीय योग शिविर में  नवरात्र काल में योग का आध्यात्मिक महत्व के बारे में बताया : योगाचार्य महेश
Published / 2025-09-30 13:51:00
10 दिवसीय योग शिविर में नवरात्र काल में योग का आध्यात्मिक महत्व के बारे में बताया : योगाचार्य महेश

एबीएन सोशल डेस्क। गायत्री मंदिर में चल रहे 10 दिवसीय योग शिविर में योगाचार्य महेश पाल ने योग के आध्यात्मिक महत्व के बारे में बताया  जिसमें उन्होंने कहा कि नवरात्र, भारतीय संस्कृति का एक प्रमुख और पवित्र पर्व है, जिसमें माँ दुर्गा के नौ रूपों की उपासना की जाती है। यह समय केवल धार्मिक आस्था और भक्ति का प्रतीक ही नहीं, बल्कि साधना, आत्मशुद्धि और आध्यात्मिक उन्नति का अवसर भी प्रदान करता है। योग, जो कि शरीर, मन और आत्मा के सामंजस्य का मार्ग है, नवरात्र के दिनों में विशेष महत्व रखता है। नवरात्र के दौरान योग का अभ्यास साधक को न केवल शारीरिक और मानसिक शांति देता है, बल्कि साधना की गहराई को भी बढ़ाता है नवरात्र को साधना, उपवास और आत्मसंयम का पर्व माना जाता है। इस दौरान व्यक्ति बाहरी आकर्षणों और भौतिक इच्छाओं से दूर होकर आत्मचिंतन और आत्मशुद्धि की ओर अग्रसर होता है। योग का अभ्यास इस साधना को सशक्त बनाता है क्योंकि योग व्यक्ति को अंतर्मुखी होने और आत्मा से जुड़ने की दिशा में प्रेरित करता है। नवरात्र में उपवास का विशेष महत्व है। उपवास शरीर से विषैले तत्वों को बाहर निकालकर उसे शुद्ध करता है। योगासन और प्राणायाम इस प्रक्रिया को और अधिक प्रभावी बना देते हैं। प्राणायाम उपवास के दौरान मन और भावनाओं को नियंत्रित करता है। ध्यान साधक को भक्ति और आध्यात्मिक ऊर्जा से जोड़ता है। योगासन शरीर को हल्का, सक्रिय और संतुलित बनाए रखते हैं, योग के अनुसार मानव शरीर में सात चक्र होते हैं, जो ऊर्जा के मुख्य केंद्र हैं। नवरात्र में नौ दिनों की साधना धीरे-धीरे साधक की ऊर्जा को ऊपर की ओर ले जाती है। पहले दिन से लेकर नवें दिन तक माँ दुर्गा के नौ रूपों की आराधना चक्रों की शुद्धि और जागरण का प्रतीक मानी जाती है। ध्यान और मंत्र जप से मूलाधार से सहस्रार तक की ऊर्जा सक्रिय होती है, जो साधक को गहन आध्यात्मिक अनुभव प्रदान करती है। नवरात्र में योग का अभ्यास व्यक्ति को नकारात्मक विचारों, तनाव और असंतुलन से दूर करता है। जब साधक प्राणायाम और ध्यान करता है तो उसकी चेतना शुद्ध होती है। यह शुद्ध चेतना माँ दुर्गा की भक्ति और दिव्य शक्ति को आत्मसात करने में सहायक होती है। नवरात्र काल को शक्ति की उपासना का समय माना गया है। योग साधना इस शक्ति को भीतर से जाग्रत करती है। विशेष रूप से कुंडलिनी योग से साधक अपनी सुप्त ऊर्जा को जागृत कर सकता है।ध्यान और जप से साधक ईश्वर के साथ आत्मिक संबंध को अनुभव करता है। सात्विक आहार और योग से शरीर-मन दोनों में शुद्धता आती है, जिससे आध्यात्मिक उन्नति सरल हो जाती है। नवरात्र भक्ति का पर्व है और योग साधना का मार्ग। जब भक्ति और योग मिल जाते हैं तो साधक को सर्वोच्च आनंद की प्राप्ति होती है।योग साधना भक्ति को स्थिर करती है, और भक्ति योग साधना को भावनात्मक गहराई प्रदान करती है, नवरात्र में साधारण, सहज और शांति देने वाले आसनों का अभ्यास करना श्रेष्ठ माना जाता है, क्योंकि इस समय उपवास और साधना के कारण शरीर हल्का रहता है। पद्मासन (Lotus Pose): ध्यान और मंत्र जप के लिए सर्वोत्तम आसन। वज्रासन-(Thunderbolt Pose): भोजन या फलाहार के बाद बैठने के लिए उत्तम, पाचन में सहायक। सुखासन- (Easy Pose): लंबी साधना और ध्यान हेतु आरामदायक।भुजंगासन- (CobraPose): ऊर्जा और जागरूकता बढ़ाता है।त्रिकोणासन - (Triangle Pose): शरीर में संतुलन और लचीलापन लाता है।शवासन - (Corpse Pose): मानसिक शांति और विश्रांति हेतु अनिवार्य, नवरात्र के दिनों में प्राणायाम से साधक का मन स्थिर और चेतना निर्मल होती है। अनुलोम-विलोम: नाड़ी शुद्धि और मानसिक संतुलन के लिए। भ्रामप्राणायाम: तनाव और चंचलता दूर कर ध्यान में गहराई लाता है। कपालभाति: शरीर से विषैले तत्व निकालकर ऊर्जा प्रदान करता हैनाड़ी शोधन प्राणायाम: शरीर और मन दोनों को शुद्ध करता है। ऊँ जप के साथ श्वास अभ्यास: आध्यात्मिक कंपन को बढ़ाता है और भक्ति भाव को गहन करता है। प्रतिदिन माँ दुर्गा के मंत्र (जैसे ॐ दुं दुर्गायै नमः) का जप ध्यान मुद्रा में बैठकर करना चाहिए। प्रत्येक दिन माता के नौ रूपों का ध्यान चक्र साधना के साथ जोड़कर करने से साधक को गहरी आध्यात्मिक अनुभूति होती है।नवरात्र के पावन अवसर पर योगासन, प्राणायाम और ध्यान साधक की साधना को सशक्त और गहन बना देते हैं। उपवास के साथ योग का संयोजन न केवल शरीर को शुद्ध करता है बल्कि साधक को देवी शक्ति के साथ आत्मिक रूप से जोड़ता है। यही कारण है कि नवरात्र काल में योग का अभ्यास विशेष रूप से आध्यात्मिक महत्व रखता है।

शताब्दी वर्ष को स्थापना दिवस को मनाने वाले सौभाग्यशाली स्वयंसेवक हैं हम : डॉ बीरेंद्र साहू
Published / 2025-09-28 18:58:02
शताब्दी वर्ष को स्थापना दिवस को मनाने वाले सौभाग्यशाली स्वयंसेवक हैं हम : डॉ बीरेंद्र साहू

विश्व की सांस्कृतिक, आध्यात्मिक, आर्थिक व बौद्धिक स्तर को मजबूत करता रहा है सनातन परंपरा टीम एबीएन, रांची। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ वाल्मीकि नगर ने शताब्दी वर्ष के पावन अवसर पर पथ संचलन व शस्त्र पूजन के साथ स्थापना दिवस उत्सव मनाया। कार्यक्रम के मुख्य वक्ता विश्व हिंदू परिषद, झारखंड - बिहार के क्षेत्र मंत्री डॉ बिरेन्द्र साहु व बाल्मीकि नगर सहसंचालक अभिनव शाह ने शस्त्र पूजन किये। मौके पर डॉ बीरेंद्र साहू ने कहा भारतीय संस्कृति अनंत काल से विश्व मानव समुदाय के साथ-साथ समस्त जड़-चेतन जीव का कल्याण के कार्य करते हुए विश्व को सांस्कृतिक, आध्यात्मिक, आर्थिक व बौद्धिक स्तर को मजबूत करने में सहयोग करता रहा है। भारतवर्ष सदैव से विश्व गुरु रहा है और आज भी विश्व कल्याण के अनेक कार्यों में अपना योगदान दे रहा है। डॉ साहु ने कहा संपूर्ण यूरोप व एशिया जो जम्मूद्वीप से विख्यात भू-धारा में एक ओर विगत 2025 वर्ष पूर्व यूरोप से तो दूसरी ओर 1425 वर्ष पूर्व अरब से दो मतों का संक्रमण के कारण सनातन परंपरा को सदैव क्षति पहुंचती रही है, जिसका परिणाम जम्मूद्वीप विखंडित होकर आज अनेक मुस्लिम एवं ईसाई देश बन गये। 1947 के बचे हुए भूभाग भी आज इस संक्रमण से प्रभावित हो रहा है, जो सनातन परंपरा के लिए चिंतनीय विषय है। डॉ साहू ने कहा कि स्वाधीनता के पूर्व देश में अंतिम शासक के रूप में अंग्रेजों ने बचे हुए भू-धरा को 1876 में अफगानिस्तान के रूप में अलग कर प्रारंभ किया, जो निरंतर 1947 तक अलग करने का कार्य चलाता रहा। स्वाधीनता संग्राम सेनानी के बल पर जब भारत स्वाधीन होने की स्थिति में दिखाई पड़ने लगा तब तक संक्रमण काल में समाज के अंदर अनेक कुरीतियां व्याप्त हो चुकी थी। इन कुरीतियों को दूर करने एवं हिंदू राष्ट्र के स्वाभिमान को जगाए रखने के उद्देश्य को लेकर परम पूज्य डॉ केशव बलीराव हेडगेवार ने 27 सितंबर 1925 को विजयादशमी के पावन दिवस में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना की। आज यह संगठन विश्व स्तरीय संगठन बन चुका है। देश में 68000 शाखाएं चल रही हैं। शताब्दी वर्ष में 100000 पूर्ण करने का लक्ष्य रखा गया है। डॉ साहू ने कहा मनुष्य का 100 वर्ष पूर्ण होना जीवन समाप्ति की परिचायक होता है अपितु संगठन का 100 वर्ष पूर्ण होना उसकी परिपक्वता को दिखाता है। हम शताब्दी वर्ष की स्थापना दिवस को मनाने वाले सौभाग्यशाली स्वयंसेवक हैं। आज संघ के विभिन्न आयाम एवं अनुसांगिक घटकों के साथ मिलकर देश के स्वर्णिम इतिहास को दोहराने का कार्य कर रही है। अयोध्या जी में भगवान पुरुषोत्तम श्रीरामलला का भव्य व दिव्य मंदिर निर्माण होना इसका एक उदाहरण है। डॉ साहू ने कहा प्रत्येक स्वयंसेवक को शताब्दी वर्ष के लिए दिये गये पंचपरिवर्तन विषय क्रमश: कुटुंब प्रबोधन, सामाजिक समरसता, पर्यावरण, स्व का जागरण तथा नागरिक कर्तव्य में से किसी एक पर गहनता पूर्वक कार्य करना है। स्थापना दिवस के पश्चात आगामी गृह संपर्क, हिंदू सम्मेलन, सद्भाव बैठक, युवा प्रेरणा कार्यक्रम के साथ-साथ शाखा विस्तार के कार्यक्रम में अग्रणी भूमिका निभाना है। कार्यक्रम में संतोष सोनी, मनीष साहू, प्रेम कुमार सहित दर्जनों कार्यकर्ता उपस्थित थे। उक्त जानकारी बाल्मीकि नगर, रांची निवासी सह पूर्व सह कार्यवाह मनीष साहू (8084123065) ने दी।

महर्षि कात्यायन की पुत्री होने के कारण मातारानी कहलायीं कात्यायनी
Published / 2025-09-28 18:51:38
महर्षि कात्यायन की पुत्री होने के कारण मातारानी कहलायीं कात्यायनी

दुर्गा पूजा की हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएं एबीएन सोशल डेस्क। मां कात्यायनी देवी दुर्गा के नौ रूपों में से छठी हैं और नवरात्रि के छठे दिन इनकी पूजा की जाती है। इन्हें देवी पार्वती का एक उग्र रूप माना जाता है, जिन्होंने महिषासुर राक्षस का वध किया था, जिस कारण इन्हें महिषासुरमर्दिनी भी कहते हैं।  पौराणिक कथा के अनुसार, महर्षि कात्यायन ने पुत्री की इच्छा से देवी भगवती की कठोर तपस्या की। उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर, देवी ने उनके घर पुत्री के रूप में जन्म लेने का वरदान दिया। उसी समय, महिषासुर नामक राक्षस के अत्याचार बढ़ रहे थे। तब ब्रह्मा, विष्णु और महेश के तेज से मां कात्यायनी प्रकट हुईं और महर्षि कात्यायन के यहां पुत्री के रूप में जन्म लिया। महर्षि कात्यायन ने उनका पालन-पोषण किया, जिसके बाद वे कात्यायनी कहलायीं। मां कात्यायनी ने महिषासुर का संहार करके संसार को उसके आतंक से मुक्त कर दिया। उनका रूप भव्य और ऊर्जावान है। मां कात्यायनी को वीरता, न्याय और धर्म की अधिष्ठात्री देवी माना जाता है। इनकी कृपा से भक्तों को साहस, आत्मबल और शत्रुओं पर विजय मिलती है। मान्यता है कि इनकी उपासना से भक्तों को अर्थ, धर्म, काम और मोक्ष—इन चारों फलों की प्राप्ति होती है। यह भी माना जाता है कि जिन लोगों के विवाह में बाधा आ रही हो, उन्हें मां कात्यायनी की पूजा से लाभ होता है।  मंत्र कात्यायनी महामाये, महायोगिन्यधीश्वरी नन्दगोपसुतं देवी, पति मे कुरु ते नम:।। या देवी सर्वभूतेषु मां कात्यायनी रूपेण संस्थिता।।  नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:॥

रांची : पागल कुत्तों के आतंक से तबाह हैं राजधानीवासी
Published / 2025-09-27 21:11:05
रांची : पागल कुत्तों के आतंक से तबाह हैं राजधानीवासी

रांची में खून का प्यासा बना कुत्ता! देखते ही लोगों पर कर देता है हमला, अब तक 17 लोगों को काट चुका टीम एबीएन, रांची। देश भर में कुत्ते के आतंक से हर कोई दहशत में है। आए दिन कुत्ते इंसानों पर हमला बोलते ही रहते हैं। वहीं, झारखंड के रांची में एक पागल कुत्ते ने 17 लोगों को काट लिया। मामला जिले के तमाड़ का है। बताया जा रहा है कि यहां एक पागल कुत्ता घूम रहा है। इस पागल कुत्ते ने अब तक 17 लोगों को काट लिया। घायलों में ज्यादातर स्कूली बच्चे शामिल हैं। यह स्कूली बच्चे इस रास्ते से स्कूल से अपने घर लौटते हैं। इसी क्रम में वह कुत्ते का शिकार हो गए। घायलों का अस्पताल में इलाज चल रहा है। वहीं, घटना के बाद से लोग दहशत में आ गए हैं। डर के मारे लोग सड़क पर नहीं निकल रहे हैं। उन्होंने प्रशासन से कार्रवाई की मांग की है।

नवरात्रि शक्ति की आराधना का पर्व, नारी ही शक्ति का स्वरूप : संजय सर्राफ
Published / 2025-09-26 19:42:12
नवरात्रि शक्ति की आराधना का पर्व, नारी ही शक्ति का स्वरूप : संजय सर्राफ

श्री राधा कृष्ण प्रणामी मंदिर में हुआ नारी शक्ति को समर्पित तलवार वितरण का कार्यक्रमटीम एबीएन, रांची। पुंदाग स्थित श्री कृष्ण प्रणामी मंदिर में नवरात्रि के पावन अवसर पर श्री कृष्ण प्रणामी सेवा धाम ट्रस्ट द्वारा एक विशेष कार्यक्रम का आयोजन किया गया, जिसमें नारी शक्ति को सशक्त बनाने के उद्देश्य से 50 तलवारों का वितरण किया गया।यह आयोजन समाज में महिलाओं की भूमिका को सम्मान देने तथा आत्मरक्षा व शक्ति के प्रतीक स्वरूप एक सकारात्मक संदेश देने के लिए किया गया। कार्यक्रम की शुरुआत वैदिक मंत्रोच्चारण और माँ दुर्गा की पूजा-अर्चना से हुई। सभी महिलाओं को तलवार का वितरण ट्रस्ट के प्रवक्ता सह मीडिया प्रभारी संजय सर्राफ, पुजारी अरविंद पांडे, नंदकिशोर चौधरी, विशाल जालान तथा ट्रस्ट के अन्य सदस्यों द्वारा किया गया। इस अवसर पर ट्रस्ट के प्रवक्ता संजय सर्राफ ने कहा कि नवरात्रि शक्ति की आराधना का पर्व है और नारी ही शक्ति का स्वरूप है। आज की नारी केवल सहनशीलता की प्रतिमूर्ति नहीं, बल्कि आवश्यकता पड़ने पर अपने और समाज की रक्षा के लिए शस्त्र भी उठा सकती है। तलवारें सिर्फ एक प्रतीक हैं, जो आत्मविश्वास, साहस और सम्मान का प्रतिनिधित्व करती हैं इस मौके पर क्षेत्र की कई महिलाओं ने बड़े उत्साह के साथ कार्यक्रम में भाग लिया। तलवार वितरण के दौरान उपस्थित महिलाओं को आत्मरक्षा, इतिहास में नारी शौर्य, तथा सामाजिक जागरूकता पर आधारित संक्षिप्त भाषण भी दिए गए। यह कार्यक्रम केवल एक प्रतीकात्मक पहल नहीं था, बल्कि समाज में नारी जागृति और सुरक्षा की दिशा में एक महत्वपूर्ण संदेश था। ट्रस्ट के सदस्यों ने यह भी घोषणा की कि विजयादशमी के दिन श्री कृष्ण प्रणामी मंदिर परिसर में विशाल अस्त्र-शस्त्र पूजन का आयोजन किया जाएगा। उस दिन विशेष रूप से 200 तलवारों का और वितरण किया जाएगा, जिसमें अधिक से अधिक महिलाओं को शामिल कर उनके आत्मबल और सुरक्षा की भावना को और सशक्त किया जाएगा। यह आयोजन न केवल धार्मिक दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण था, बल्कि सामाजिक परिवर्तन और नारी सशक्तिकरण की दिशा में भी एक सराहनीय पहल रहा।इस अवसर पर- नृत्य श्री डांस स्टूडियो की संयोजिका पिंकी सिंह, श्री राम सोनी,विद्या देवी अग्रवाल, अमिता जालान, सुमन चौधरी, अनुराधा सर्राफ, रेखा पोद्दार, ललिता पोद्दार, रिंकी पांडे, अनीता अग्रवाल, अंशु अग्रवाल, सृष्टि पांडे, रजत अग्रवाल, पवन पोद्दार, श्रेष्ठ पांडे, आशीष कुमार, धीरज गुप्ता, सूरज कुमार, हरीश कुमार, सुधीर कुमार, सत्यम कुमार, मुरली कुमार सहित बड़ी संख्या में श्रद्धालुगण उपस्थित थे। उक्त जानकारी श्री कृष्ण प्रणामी सेवा धाम ट्रस्ट के प्रवक्ता सह मीडिया प्रभारी संजय सर्राफ ने दी।

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