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मुरुम बारह पाड़हा सोहराई जतरा हर्षोल्लास के साथ संपन्न
Published / 2025-10-25 20:26:55
मुरुम बारह पाड़हा सोहराई जतरा हर्षोल्लास के साथ संपन्न

जतरा हमारी पारंपरिक सांस्कृतिक धरोहर है : सुरेश बैठा प्रकृति ही हमारे आराध्यदेव है जो हमें जीवन देता है : नारायण उरांव  झारखंडी संस्कृति का आत्मा है जतरा : डॉ बिरेन्द्र साहु टीम एबीएन, रांची। कांके के मुरुम बारह पाड़हा सोहराई जतरा आज हर्षोल्लास के साथ संपन्न हुआ। जतरा में मुरुम, रोल, होचर, इचापिरी, रेंडो- पतरातु सहित कई गांवों के खोड़हा अपने पारंपरिक परिधान के साथ ढोल-ढाक-नगाड़ा बजाते एवं नृत्य दान करते हुए मुरूम मुख्य अखाड़ा पहुंचे, जहां घंटों लोग जतरा नृत्य-गान किये। रात्रि में नागपुरी गीत आर्केस्ट्रा का आयोजन किया गया। मुख्य अतिथि के रूप में कांके के विधायक सुरेश कुमार बैठा ने कहा हमारी परंपरा व संस्कृति को बोलचाल व वेशभूषा ही जीवित रखा है। युवा पीढ़ी इस परंपरा रूपी धरोहर को जतरा के रूप में आयोजित कर बचा रहे हैं। जतरा के उद्घाटनकर्ता सरना समिति के नारायण उरांव ने हमारे पुरखों ने पुरातन काल से ही समाज को ठीक रखने के लिए पाड़हा रूपी न्यायिक व्यवस्था बना करके रखा है, जहां हम किसी भी प्रकार के मामला का निपटारा करते रहे हैं। उन्होंने कहा प्रकृति ही हमारा आराध्य देव है जो हमें जीवन देता है। जल जंगल जमीन ही हमारी पहचान है जो पर्यावरण को सुरक्षित रखने का सूत्र प्रदान करता है। डॉ बिरेन्द्र साहु ने कहा कि झारखंड के लोगों का बोलना ही गीत एवं चलना ही नृत्य के समान होता है। झारखंडी संस्कृति का आत्मा गांव गांव में लगने वाला जतरा है। कार्यक्रम को सफल बनाने में जतरा के संरक्षक सधन उरांव, अध्यक्ष साधो उरांव, कार्य अध्यक्ष गुड्डू उरांव, कोषाध्यक्ष संदीप उरांव, एतवा उरांव, अजीत टोप्पो, सुधीर उरांव, राहुल तिर्की आदि मुख्य थे। उक्त जानकारी समिति के साधो उरांव ने दी।

दो नवंबर को लगेगा बड़ागांई बुटी देवोत्थान जतरा मेला
Published / 2025-10-24 20:42:22
दो नवंबर को लगेगा बड़ागांई बुटी देवोत्थान जतरा मेला

टीम एबीएन, रांची। बड़ागाई-बुटी के सीमा पर स्थित देवोत्थान धाम (बूढ़ा महादेव मंदिर) परिसर में विनोद महतो की अध्यक्षता में एक बैठक की गयी। जिसमें ग्राम बड़ागाई, लेम, किशुनपुर, खिजुर टोला, महुरम टोली सहित अन्य कई गांव के लोग उपस्थित थे।बैठक में सर्वसम्मति से देवोत्थान एकादशी (देवों के जगने) के उपलक्ष्य में 02 नवंबर, 25 (द्वादशी) को देवोत्थान जतरा मेला आयोजन करने का निर्णय लिया गया। ज्ञात हो कि यह मेला 1931 से लगातार लगाया जा रहा है। यह ऐतिहासिक जतरा मेला सुबह 10 बजे से संध्या 05:30 तक लगेगी।मेला में कई गांव के खोड़हा (नृत्य टोली) अपने पारंपरिक वाद्ययंत्र एवं वेशभूषा के साथ उपस्थित होकर नृत्य-गान करेंगे। मेला को सफल संचालन के लिए मुख्य पहान के रूप में रवि पहान होंगे। वहीं मुख्य संरक्षक डॉ रूद्र नारायण महतो व बनु पहान, संरक्षक डॉ बिरेन्द्र साहु, बलशाय महतो, रमेश लोहरा, महेन्द्र मुंडा, विनोद महतो, अध्यक्ष नेपाल महतो, सचिव  प्रेम लोहरा, कोषाध्यक्ष अजय कुमार महतो, उपाध्यक्ष संदीप पहान, बबलु पहान, अमित पहान होंगे। उक्त जानकारी देवोत्थान जतरा मेला समिति, बड़ागांई- बुटी, रांची के सचिव प्रेम लोहरा (98354 25981) ने दी।

छठ महापर्व : बिहार-झारखंड के व्यंजनों में गजब का अंतर
Published / 2025-10-24 20:39:16
छठ महापर्व : बिहार-झारखंड के व्यंजनों में गजब का अंतर

टीम एबीएन, रांची। छठ पूजा एक प्रमुख भारतीय त्योहार है जिसे खासतौर पर बिहार, झारखंड, उत्तर प्रदेश, नेपाल, मध्य प्रदेश और पश्चिम बंगाल में मनाया जाता है। छठ पूजा की शुरुआत नहाय-खाय के साथ होती है और इसका समापन सूर्यदेव को सुबह अर्घ्य देने के साथ होता है। इस बार छठ पूजा की शुरुआत शनिवार, 25 अक्टूबर 2025 को होगी और समापन मंगलवार, 28 अक्टूबर 2025 को प्रात: कालीन अर्घ्य के साथ होगा। छठ पूजा का प्रसाद काफी खास माना जाता है। इसे व्रत रखने वाले लोग बड़े नियम और शुद्धता से बनाते हैं। वहीं, बिहार और झारखंड के छठ प्रसाद के टेस्ट में काफी फर्क होता है। बिहार की बात करें तो यहां ठेकुआ को छठ पूजा का सबसे जरूरी प्रसाद माना जाता है। इसे गेहूं के आटे, गुड़ और देसी घी से तैयार किया जाता है और खास लकड़ी के सांचे से आकार दिया जाता है। इसे धीमी आंच पर तला जाता है जिससे इसकी खुशबू पूरे घर में फैल जाती है। वहीं झारखंड में भी ठेकुआ बनता है, लेकिन कई बार इसमें नारियल पाउडर या तिल भी मिलाया जाता है, जो इसे थोड़ा अलग टेस्ट देता है। कई लोग इसमें इलायची या सौंफ का भी यूज करते हैं। बिहार में कसर के लड्डू यानी चावल के आटे से बने लड्डू छठ का एक खास हिस्सा होते हैं। इन्हें देसी घी में भूनकर गुड़ के साथ मिलाया जाता है, लेकिन झारखंड में नारियल के लड्डू का चलन ज्यादा है। बिहार में रसीया नाम की खीर बनती है जो गुड़ और चावल से तैयार की जाती है। इसका टेस्ट बिल्कुल देसी और पारंपरिक होता है। वहीं झारखंड में भी गुड़ की खीर बनती है, लेकिन कई जगह इसमें नारियल का दूध या पिसा नारियल भी मिलाया जाता है, जो इसे अलग टेस्ट देता है। बिहार में धान की पिट्ठी छठ प्रसाद में कुछ खास नहीं मानी जाती है। वहीं, झारखंड में पिट्ठी, यानी धान की भूसी निकालकर बनाये गये चावल से बनी मिठाई, झारखंड के छठ में विशेष मानी जाती है। इसे गुड़ या तिल भरकर बनाया जाता है। बिहार में तिल और गुड़ की मिठाइयां मकर संक्रांति में ज्यादा दिखती हैं। छठ में इनका प्रयोग सीमित है। वहीं, झारखंड में तिल-गुड़ की मिठाइयां छठ में खास रूप से बनायी जाती हैं। तिलकुट और तिल लड्डू पूजा में चढ़ाये जाते हैं। झारखंड में बहुत से लोग मानते हैं कि छठ के प्रसाद को मिट्टी के बर्तन और चूल्हे में बनाना शुभ होता है। उनका कहना है कि इससे पकवानों में एक खास खुशबू और टेस्ट आता है। इससे न सिर्फ स्वाद बढ़ता है बल्कि उसमें मिट्टी की खुशबू भी शामिल हो जाती है।

आस्था का महापर्व छठ पूजा 25 से प्रारंभ
Published / 2025-10-23 21:21:48
आस्था का महापर्व छठ पूजा 25 से प्रारंभ

यह पर्व श्रद्धा, शुद्धता और समर्पण का प्रतीक है छठ पर्व प्रकृति, सूर्य, जल और मानव के पारस्परिक संबंध का है प्रतीक : संजय सर्राफ टीम एबीएन, रांची। विश्व हिंदू परिषद सेवा विभाग एवं श्री कृष्ण प्रणामी सेवा धाम ट्रस्ट के प्रांतीय प्रवक्ता संजय सर्राफ ने कहा है कि भारत में पर्व-त्योहारों की परंपरा जितनी प्राचीन है, उतनी ही विविधतापूर्ण भी। इन्हीं में से एक है छठ पूजा, जिसे लोक आस्था का महापर्व कहा जाता है। यह पर्व विशेष रूप से बिहार, झारखंड, पूर्वी उत्तर प्रदेश और नेपाल के तराई क्षेत्रों में अत्यधिक श्रद्धा और भक्ति के साथ मनाया जाता है। आधुनिक समय में यह पर्व देश-विदेश में बसे भारतीयों द्वारा भी बड़े उत्साह से मनाया जाने लगा है। इस वर्ष छठ पूजा 25 अक्टूबर से 28 अक्टूबर तक मनाई जायेगी। छठ का महापर्व कार्तिक माह के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि से शुरू होकर सप्तमी तिथि तक चलता है। इस दौरान सूर्य देव और छठी मैया की पूजा की जाती है। छठ पूजा की तिथि 25 अक्टूबर दिन शनिवार को नहाय-खाय,26 अक्टूबर दिन रविवार को खरना पूजन, 27 अक्टूबर दिन सोमवार को  संध्या अर्घ्य (पहला अर्घ्य), 28 अक्टूबर दिन मंगलवार को प्रात: कालीन उषा अर्घ्य (दूसरा अर्घ्य) के बाद शनिवार से शुरू चार दिवसीय पूजा अनुष्ठान मंगलवार को संपन्न हो जाएगा उसके बाद सभी छठ व्रती पारण कर उपवास तोड़ेंगे। छठ पर्व सूर्य देव और उनकी बहन छठी मैया की उपासना का पर्व है। सूर्य देव को जीवन का आधार माना गया है, क्योंकि उनसे ही पृथ्वी पर ऊर्जा, प्रकाश और जीवन की उत्पत्ति होती है। छठी मैया, जिन्हें उषा देवी के नाम से भी जाना जाता है, संतान सुख, स्वास्थ्य, और समृद्धि की अधिष्ठात्री मानी जाती हैं। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, जब पांडव अपने राज्य और सम्मान से वंचित हुए, तब द्रौपदी ने छठी मैया की आराधना की थी, जिसके फलस्वरूप उन्हें पुन: अपना राज्य प्राप्त हुआ। एक अन्य कथा के अनुसार, राजा प्रियव्रत ने संतान प्राप्ति के लिए इस व्रत को किया था, जिसके आशीर्वाद से उन्हें पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई। छठ पूजा की शुरुआत नहाय-खाय से होती है, जब व्रती स्नान कर शुद्ध भोजन ग्रहण करते हैं। दूसरे दिन खरना पर निर्जला उपवास रखकर शाम को गंगा या किसी पवित्र जल स्रोत के तट पर गुड़ की खीर और रोटी का प्रसाद बनाकर पूजा की जाती है। तीसरे दिन संध्या अर्घ्य के समय व्रती डूबते सूर्य को अर्घ्य अर्पित करते हैं। चौथे दिन प्रात: काल उगते सूर्य को अर्घ्य देने के बाद व्रत का समापन होता है। छठ पूजा की सबसे बड़ी विशेषता है इसकी पवित्रता और कठोर नियम। व्रती चार दिनों तक सात्विकता, शुचिता और संयम का पालन करते हैं। पूजा में बांस की सुप, ठेकुआ, फल, नारियल, और गन्ने जैसे प्राकृतिक वस्तुओं का प्रयोग किया जाता है। यह पर्व प्रकृति, सूर्य, जल और मानव के पारस्परिक संबंध का प्रतीक है। छठ पूजा सामाजिक समरसता और एकता का संदेश देती है। इस दिन जाति, वर्ग, धर्म का भेद मिटाकर सभी लोग एक साथ घाटों पर एकत्र होते हैं। महिलाएं पारंपरिक गीत गाती हैं और वातावरण भक्तिमय हो जाता है। यह पर्व न केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक है, बल्कि पर्यावरण संरक्षण और सूर्य ऊर्जा के प्रति कृतज्ञता का भी प्रतीक है।छठ पूजा भारतीय संस्कृति की उस अनमोल परंपरा का उत्सव है, जो मनुष्य और प्रकृति के अटूट बंधन को दशार्ता है। यह पर्व श्रद्धा, शुद्धता और समर्पण का प्रतीक है, जो हमें सिखाता है कि प्रकृति की पूजा ही जीवन की सच्ची साधना है।

श्री राधा-कृष्ण मंदिर में अन्नपूर्णा महाप्रसाद हजारों श्रद्धालुओं ने किया प्रसाद ग्रहण
Published / 2025-10-19 20:06:24
श्री राधा-कृष्ण मंदिर में अन्नपूर्णा महाप्रसाद हजारों श्रद्धालुओं ने किया प्रसाद ग्रहण

मंदिर को रंग-बिरंगी रोशनी एवं दीपों से सजाया गया टीम एबीएन, रांची। श्री कृष्ण प्रणामी सेवा धाम ट्रस्ट द्वारा संचालित पुंदाग मे श्री कृष्ण प्रणामी मंगल राधिका सदानंद सेवा धाम श्री राधा कृष्ण प्रणामी मंदिर में 234 वां श्री कृष्ण प्रणामी अन्नपूर्णा सेवा महाप्रसाद  का आयोजन किया गया। आज का श्री कृष्ण प्रणामी अन्नपूर्णा सेवा प्रणामी ट्रस्ट के सदस्यों ने आयोजित किया। अन्नपूर्णा महाप्रसाद का विधिवत भोग दोपहर 12 बजे मंदिर के पुजारी अरविंद कुमार पांडे द्वारा लगायी गयी, तत्पश्चात मंदिर परिसर में उपस्थित हजारों श्रद्धालुओं के बीच महाप्रसाद का वितरण किया गया। आज के महाप्रसाद में केसरिया खीर एवं आलू का चिप्स का वितरण किया गया। तत्पश्चात भजन- संध्या के कार्यक्रम में ट्रस्ट के भजन गायकों ने मनमोहक सुमधुर भजनों मे अमृत गंगा का रसपान कराते हुए श्रोताओं को खूब झुमाया तथा श्री राधा कृष्ण के जयकारे से पूरा वातावरण कृष्णमय एवं भक्तिमय बन गया। तत्पश्चात सामूहिक रूप से महाआरती की गयी। ट्रस्ट के प्रवक्ता सह मीडिया प्रभारी संजय सर्राफ ने बताया कि दीपावली के पावन अवसर पर श्री राधा कृष्ण प्रणामी मंदिर को आकर्षक रंग बिरंगी रोशनी एवं दीपों से सजाया गया है। तथा श्री राधा कृष्ण जी का दिव्य आलौकिक श्रृंगार किया गया है। दीपावली के दिन विशेष पूजा-अर्चना, भजन कीर्तन किया जायेगा। मौके पर ट्रस्ट के अध्यक्ष डूंगरमल अग्रवाल उपाध्यक्ष राजेंद्र प्रसाद अग्रवाल, सुरेश अग्रवाल, शिव भगवान अग्रवाल, मधुसूदन जाजोदिया मनीष जालान पूरणमल सर्राफ, संजय सर्राफ, सुरेश भगत, भगत, विष्णु सोनी, पवन पोद्दार, मुरली प्रसाद, हरीश कुमार, परमेश्वर साहू, बसंत वर्मा, सहित बड़ी संख्या में महिलाएं, पुरुष उपस्थित थे।

गोवर्धन पूजा (अन्नकूट) 22 अक्टूबर को, एक आध्यात्मिक परंपरा का उत्सव
Published / 2025-10-19 14:48:38
गोवर्धन पूजा (अन्नकूट) 22 अक्टूबर को, एक आध्यात्मिक परंपरा का उत्सव

गोवर्धन पूजा पर्यावरण, प्रकृति और समाज के प्रति श्रद्धा, समर्पण और संतुलन का देता है संदेश : संजय सर्राफएबीएन सोशल डेस्क। विश्व हिंदू परिषद सेवा विभाग एवं श्री कृष्ण प्रणामी सेवा धाम ट्रस्ट के प्रांतीय प्रवक्ता संजय सर्राफ ने कहा है कि गोवर्धन पूजा दीपावली के बाद कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा को मनाई जाती है। इस वर्ष गोवर्धन पूजा एवं अन्नकूट पूजा 22 अक्टूबर दिन बुधवार को मनाया जाएगा। यह पावन पर्व भगवान कृष्ण द्वारा अपने भक्तों पर किए गए आशीर्वाद के प्रति सम्मान प्रकट करता है। यह हिंदुओं के हृदय में एक विशेष स्थान रखता है क्योंकि यह उस अवसर का स्मरण कराता है जब भगवान कृष्ण ने अपने भक्तों को प्रकृति के प्रकोप से बचाने के लिए इंद्र के अहंकार का नाश किया था। इस पर्व का संबंध श्रीकृष्ण की बाल लीलाओं से है।मान्यता है कि द्वापर युग में जब ब्रजवासियों ने हर वर्ष इंद्र देव की पूजा करनी चाही, तब बाल स्वरूप श्रीकृष्ण ने उन्हें गोवर्धन पर्वत की पूजा करने का परामर्श दिया। श्रीकृष्ण का तात्पर्य था कि प्रकृति पर्वत, वन, पशु और जल स्रोत ही हमारे जीवन के वास्तविक आधार हैं। इंद्र के क्रोधित होने पर मूसलधार वर्षा हुई, तब श्रीकृष्ण ने अपनी छोटी अंगुली पर गोवर्धन पर्वत उठाकर ब्रजवासियों की रक्षा की। तब से यह पर्व गोवर्धन पूजा के रूप में मनाया जाता है। गोवर्धन पूजा के दिन भगवान श्रीकृष्ण को विविध प्रकार के व्यंजन- सब्जियां, मिठाइयाँ, अनाज, फल, पकवान आदि का अन्नकूट अर्पित किया जाता है। यह अर्पण कृतज्ञता और प्रकृति के प्रति सम्मान का प्रतीक है। यह पर्व कृषि और समृद्धि का उत्सव भी है।प्रातःकाल गोवर्धन (गोबर या मिट्टी से निर्मित प्रतीक पर्वत) की आकृति बनाई जाती है, जिसे फूलों से सजाया जाता है। इसके चारों ओर परिक्रमा की जाती है। फिर भगवान को अन्नकूट अर्पित कर भजन-कीर्तन किए जाते हैं।इस त्यौहार को अन्नकूट भी कहा जाता है जिसका अर्थ है भोजन का पर्वत भक्त कई  व्यंजनों को तैयार करते हैं जिन्हें प्रसाद के रूप में भगवान कृष्ण को अर्पित किया जाता है।मूर्तियों को स्नान मथुरा के नाथद्वारा जैसे स्थानों पर भगवान कृष्ण की मूर्तियों को दूध से स्नान कराया जाता है नये वस्त्र पहनाए जाते हैं और आभूषणों से सुसज्जित किया जाता है  इस दिन भोजन और मिठाइयां थालियों पर सजाकर भगवान कृष्ण को भोग लगाने के लिए भोजन के पहाड़ बना दिए जाते हैं। यह पर्व सामूहिकता, सहभोज और सामुदायिक एकता का प्रतीक है। गाँवों और मंदिरों में विशेष आयोजन होते हैं। अनेक स्थानों पर गोवर्धन परिक्रमा का आयोजन होता है, जिसमें श्रद्धालु हजारों की संख्या में भाग लेते हैं।गोवर्धन पूजा केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि पर्यावरण, प्रकृति और समाज के प्रति श्रद्धा, समर्पण और संतुलन का संदेश है। यह पर्व हमें यह सिखाता है कि प्रकृति के प्रति आभार व्यक्त करना और उसे संरक्षित रखना ही सच्ची पूजा है।

शुद्ध घी के 1100 दीयों से रोशन हुआ श्री श्याम मंदिर
Published / 2025-10-17 18:29:29
शुद्ध घी के 1100 दीयों से रोशन हुआ श्री श्याम मंदिर

टीम एबीएन, रांची। अग्रसेन पथ स्थित श्री श्याम मंदिर में दिनांक 17 अक्टूबर 2025 को कार्तिक कृष्ण रंभा सह दीपोत्सव एकादशी महापर्व का अत्यंत भक्तिमय वातावरण में श्रद्धा के साथ मनाया गया। दीपावली पर्व को इस एकादशी पर पूरे मंदिर परिसर को विभिन्न रंगों के विद्युत की लड़ियों एवं 1100 शुद्ध घी के दीयों से रोशन किया गया।  प्रात: श्री श्याम प्रभु को नवीन वस्त्र (बागा) पहनाकर स्वर्ण आभूषणों से अलंकृत कर विभिन्न प्रजातियों के रंग बिरंगे ताजा फूलों से श्रृंगार किया गया। जैसे- गुलाब, बेला, रजनीगंधा, गेंदा, जरबेरा, गुलदाउदी। साथ ही इस अवसर पर मंदिर में विराजमान वीर हनुमान एवं शिव परिवार का भी विशेष श्रृंगार किया गया।  रात्रि 9 बजे श्री श्याम प्रभु के जयकारों के बीच अखंड ज्योत प्रज्ज्वलित कर श्री श्याम मंडल के सदस्यों ने गणेश वन्दना के संगीतमय संकीर्तन प्रारंभ किया। मौके पर बैठ्यों रांची मं लगाकर दरबार श्याम धनी राज करे, अनोखा जो भी हुआ श्याम तेरे द्वार हुआ, श्याम तेरे भरोसे मेरा ये परिवार है, दरबार है निराला खाटू के श्याम का, तुम हमारे थे प्रभु जी हम तुम्हारे हैं... इत्यादि भजनों की लय पर भक्तगण भाव विभोर हो रहे थे। साथ ही इस अवसर पर श्री श्याम प्रभु को गुलाब जामुन, चंद्रकला, मलाई चाप, लड्डू, गोंद पाक, केसरिया पेड़ा एवम केसरिया दूध का भोग अर्पित किया गया।  आज के कार्यक्रम को सफल बनाने में रमेश चंद्र सारस्वत, ओम जोशी, गोपी किशन ढांढनीयां, चंद्र प्रकाश बागला, धीरज बंका, नितेश केजरीवाल, प्रियांश पोद्दार, विकास पाड़िया, जीतेश अग्रवाल, अजय साबू का सहयोग रहा। उक्त जानकारी श्री श्याम मंडल श्री श्याम मंदिर, अग्रसेन पथ रांची के मीडिया प्रभारी सुमित पोद्दार (9835331112) ने दी।

दीपावली केवल एक धार्मिक पर्व नहीं, बल्कि जीवन का गहन संदेश देने वाला आध्यात्मिक उत्सव : योगाचार्य महेश पाल
Published / 2025-10-17 13:13:15
दीपावली केवल एक धार्मिक पर्व नहीं, बल्कि जीवन का गहन संदेश देने वाला आध्यात्मिक उत्सव : योगाचार्य महेश पाल

एबीएन सोशल डेस्क। भारत की सांस्कृतिक परंपराएँ केवल आडंबर या अनुष्ठान नहीं हैं, बल्कि जीवन दर्शन और आत्मिक उत्थान के सूत्र हैं। योगाचार्य महेश पाल बताते हैं कि इन्हीं में दीपावली सबसे प्रमुख पर्व है, जो केवल दीपों और मिठाइयों का त्योहार नहीं, बल्कि अंधकार से प्रकाश, अज्ञान से ज्ञान और नकारात्मकता से सकारात्मकता की ओर यात्रा का प्रतीक है।दीपावली केवल एक धार्मिक या सांस्कृतिक पर्व नहीं है, बल्कि यह स्वास्थ्य, स्वच्छता और संतुलित जीवनशैली का संदेश देने वाला उत्सव है। जिस प्रकार हम इस दिन अपने घरों और आँगन को स्वच्छ कर उजाला फैलाते हैं, उसी प्रकार यह पर्व हमें अपने शरीर, मन और वातावरण को भी शुद्ध व स्वस्थ रखने की प्रेरणा देता है।दीपावली से पहले घरों की सफाई, वस्त्र धोना, पुराने सामान को हटाना यह सब केवल परंपरा नहीं, बल्कि स्वास्थ्यवर्धक अभ्यास हैं। स्वच्छ वातावरण में  संक्रमण और रोगों की संभावना कम होती है। मानसिक स्पष्टता और स्फूर्ति बढ़ती है। ऊर्जा का प्रवाह सकारात्मक रहता है दीपावली का सबसे बड़ा संदेश है अंधकार पर प्रकाश की विजय। यह अंधकार केवल बाहर का नहीं, बल्कि मन का अंधकार भी है। जब व्यक्ति अपने भीतर के नकारात्मक विचारों, भय और ईर्ष्या को त्याग देता है, तो मानसिक स्वास्थ्य में गहरा सुधार होता है। योग और ध्यान के अभ्यास से मन का दीप प्रज्वलित किया जा सकता है ध्यान से तनाव और चिंता कम होती है।प्राणायाम से मस्तिष्क में ऑक्सीजन प्रवाह बढ़ता है सकारात्मक विचार रोग प्रतिरोधक शक्ति को मजबूत करते हैं।दीपावली के अवसर पर मिठाइयाँ, तली हुई वस्तुएँ और भारी भोजन प्रचलित हैं, परंतु इसका अर्थ यह नहीं कि हम संयम भूल जाएँ। स्वास्थ्य की दृष्टि से यह पर्व हमें सिखाता है कि भोजन आनंद का माध्यम हो, अत्यधिकता का नहीं। घर में बनी शुद्ध मिठाइयाँ और प्राकृतिक आहार को प्राथमिकता दें, अधिक तेल, चीनी और कृत्रिम रंगों से बनी वस्तुएँ शरीर को हानि पहुँचाती हैं। दीपावली अनेक धार्मिक घटनाओं से जुड़ी हुई है भगवान श्रीराम के वनवास पूर्ण कर अयोध्या लौटने पर दीप जलाकर स्वागत किया गया। भगवान वामन ने असुरराज बलि को पाताल भेजकर धर्म की स्थापना की। भगवान महावीर स्वामी ने इसी दिन निर्वाण प्राप्त किया। माता लक्ष्मी का पृथ्वी पर अवतरण भी इसी दिन हुआ माना जाता है। इन सभी घटनाओं में एक ही भाव निहित है सत्य और धर्म की विजय, अधर्म और अंधकार का अंत दीपावली का वास्तविक अर्थ केवल बाहर दीप जलाना नहीं है, बल्कि अंतरात्मा के अंधकार को मिटाकर भीतर ज्योति प्रज्वलित करना है। जैसे दीपक में घी डालने पर वह प्रकाश देता है, वैसे ही मनुष्य जब अपने भीतर श्रद्धा, सत्य और करुणा का घी डालता है, तो उसका जीवन प्रकाशमय बन जाता है। वास्तव में, यह पर्व हमें सिखाता है कि सच्ची ज्योति बाहर नहीं, अपने भीतर ही जलानी होती है। दीपावली हमें जीवन जीने का एक गहरा संदेश देती है—थोड़ा सा प्रकाश भी अंधकार मिटा सकता है।असत्य और अन्याय कभी स्थायी नहीं होते।दान, करुणा और सहअस्तित्व ही सच्चे उत्सव का रूप हैं। स्वच्छता केवल घर की नहीं, मन की भी आवश्यक है।जब हम अपने घर की सफाई करते हैं, तो यह हमें स्मरण कराता है कि हमें अपने मन और विचारों की भी सफाई करनी चाहिए। दीपावली सामाजिक एकता, सहयोग और सद्भाव का संदेश देती है। इस दिन दान-पुण्य, गरीबों की सहायता, और समाज में समानता का भाव हमें यह सिखाता है कि  जब प्रत्येक व्यक्ति अपने भीतर का दीप जलाएगा, तब समूचा समाज आलोकित हो उठेगा।दीपावली केवल व्यक्तिगत आनंद का नहीं, बल्कि साझा सुख और करुणा के प्रकाश का पर्व है। आज का समय भौतिकता और प्रतिस्पर्धा से भरा हुआ है। दीपावली का संदेश हमें याद दिलाता है कि, प्रकाश केवल घरों में नहीं, विचारों में भी होना चाहिए। खुशी केवल प्रदर्शन में नहीं, आत्मिक शांति में छिपी है।फिजूलखर्ची से नहीं, संयम और सेवा से सच्चा उत्सव मनता है। दीपावली का वास्तविक अर्थ पटाखों का शोर नहीं, बल्कि अंतरात्मा की मौन शांति है। दीपावली हमें यह प्रेरणा देती है कि यदि जीवन में प्रकाश चाहिए, तो हमें स्वयं दीप बनना होगा। जब हर मनुष्य के भीतर करुणा, प्रेम, सत्य और विवेक की ज्योति प्रज्वलित होगी, तब ही संसार में सच्चा उजाला फैलेगा।

देशभर में दीपोत्सव का त्योहार दीपावली 20 को
Published / 2025-10-16 17:26:07
देशभर में दीपोत्सव का त्योहार दीपावली 20 को

दीपावली महापर्व 20 अक्टूबर को,प्रकाश का पर्व एक सांस्कृतिक,धार्मिक और सामाजिक उत्सव दीपावली हमारे जीवन में उजाला, प्रेम, अच्छाई, सौहार्द और आशा का लाता है संदेश : संजय सर्राफ  एबीएन सोशल डेस्क। झारखंड प्रांतीय मारवाड़ी सम्मेलन के संयुक्त महामंत्री सह विश्व हिंदू परिषद सेवा विभाग के प्रांतीय प्रवक्ता संजय सर्राफ ने कहा है कि भारत विविधताओं का देश है, जहां प्रत्येक पर्व अपने आप में विशेष महत्व रखता है। इन्हीं पर्वों में से एक है दीपावली, जिसे दीवाली के नाम से भी जाना जाता है। इस वर्ष दीपावली का महापर्व 20 अक्टूबर दिन सोमवार को मनाया जायेगा। यह पर्व न केवल हिंदू धर्म का एक महत्वपूर्ण त्योहार है, बल्कि जैन, सिख एवं बौद्ध धर्मों में भी इसका विशेष स्थान है। दीपावली सिर्फ रोशनी और पटाखों का त्यौहार नहीं है बल्कि अंधकार से प्रकाश की ओर, अज्ञानता से ज्ञान की ओर और बुराई से अच्छाई की ओर जाने का प्रतीक है। यह पर्व हर वर्ष कार्तिक मास की अमावस्या को मनाया जाता है और पूरे भारतवर्ष में हर्षोल्लास के साथ इसका आयोजन होता है। इस दौरान लोग अपने घरों की सफाई करते हैं रंगोली सजाते हैं दिये जलाते हैं और नए सामान की खरीदारी करते हैं दिवाली केवल एक दिन का त्यौहार नहीं है बल्कि यह 5 दिनों तक चलने वाला महापर्व है हर दिन का अपना धार्मिक महत्व और अलग पूजन विधान होता है पर्व की शुरुआत धनतेरस से होती है और समापन भैया दूज पर। इन पांच दिनों में मुख्य आकर्षण माता महालक्ष्मी की पूजा होती है जो कार्तिक अमावस्या की रात में की जाती है।इस दिन लोग घर-आंगन में दीप जलाकर अंधकार को दूर करते हैं और धन- समृद्धि की देवी लक्ष्मी और भगवान गणेश की विधिपूर्वक पूजा करते हैं। हिंदू धर्म के अनुसार, दीपावली के दिन भगवान श्रीराम चंद्रजी 14 वर्षों के वनवास के पश्चात अयोध्या लौटे थे। अयोध्यावासियों ने दीप जलाकर उनका स्वागत किया और तभी से दीप जलाने की परंपरा चली आ रही है। इसी दिन भगवान विष्णु ने नरकासुर का वध कर 16 हजार कन्याओं को मुक्त कराया था, जिसे नरक चतुर्दशी या छोटी दीपावली के रूप में मनाया जाता है दीपावली का त्योहार पांच दिनों तक चलने वाला उत्सवों में प्रमुख हैं :  धनतेरस- इस दिन भगवान धन्वंतरि की पूजा की जाती है और स्वास्थ्य एवं समृद्धि की कामना की जाती है। नरक चतुर्दशी (छोटी दीपावली)- यह बुराई के नाशऔर आत्मशुद्धि का प्रतीक दिन है। दीपावली- इस दिन लक्ष्मी पूजा की जाती है, जो धन, ऐश्वर्य और समृद्धि की देवी हैं। घरों मंदिरों और दुकानों को दीपों, मोमबत्तियों और रंग-बिरंगे विद्युत बल्बों से सजाया जाता है।  गोवर्धन पूजा- यह दिन भगवान श्रीकृष्ण द्वारा गोवर्धन पर्वत उठाकर गांववासियों की रक्षा करने की कथा से जुड़ा है।  भाई दूज- यह भाई-बहन के प्रेम और स्नेह का पर्व है, जिसमें बहनें अपने भाइयों की लंबी उम्र की कामना करती हैं। दीपावली केवल धार्मिक नहीं, बल्कि सामाजिक दृष्टिकोण से भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। यह परिवार और समाज को एक सूत्र में बांधने का अवसर प्रदान करता है। इस दिन लोग एक-दूसरे के घर मिठाइयां बांटते हैं, उपहार देते हैं पटाखे जलाते हैं और साथ मिलकर त्योहार की खुशियां मनाते हैं। यह उत्सव आर्थिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है क्योंकि व्यापारिक वर्ष का आरंभ इसी दिन से माना जाता है।दीपावली खुशियों का पर्व है,आज आवश्यकता है कि हम पर्यावरण को ध्यान में रखते हुए दीपावली को हरित इको फ्रेंडली तरीके से मनायें जैसे मिट्टी के दीप जलाना, कम ध्वनि वाले पटाखों का चयन करना और स्वदेशी उत्पादों को प्राथमिकता देना। दीपावली केवल दीपों का पर्व नहीं है, यह हमारे जीवन में उजाला, प्रेम, सौहार्द और आशा का संदेश लाता है। यह पर्व हमें यह सिखाता है कि चाहे अंधकार कितना भी गहरा क्यों न हो, एक छोटा सा दीप भी उजाला फैला सकता है। आइये इस दीपावली हम संकल्प लें कि हम अपने भीतर और समाज में अच्छाई, सत्य और सकारात्मकता का प्रकाश फैलायें। दीप जलायें, आशा जगायें- यही है दीपावली का सच्चा संदेश।

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