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मध्य प्रदेश  समृद्ध विरासत और सांस्कृतिक सतत विकास की भूमि : योगाचार्य महेश पाल
Published / 2025-11-01 11:13:49
मध्य प्रदेश समृद्ध विरासत और सांस्कृतिक सतत विकास की भूमि : योगाचार्य महेश पाल

एबीएन सोशल डेस्क। भारत के हृदय स्थल के रूप में प्रसिद्ध मध्य प्रदेश का स्थापना दिवस हर वर्ष 1 नवंबर को बड़े हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है। योगाचार्य महेश पाल ने बताया कि 2025 हम 70वां स्थापना दिवस मना रहे हैं, यह दिवस केवल एक प्रदेश की स्थापना का प्रतीक नहीं, बल्कि एक ऐसी धरती के गौरव, संस्कृति, सामाजिक एकता और निरंतर प्रगति की कहानी है जिसने स्वतंत्र भारत के राष्ट्र निर्माण में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। भारत का हृदय मध्य प्रदेश देश के भौगोलिक केंद्र में स्थित है। इसका क्षेत्रफल लगभग 3,08,000 वर्ग किलोमीटर है, जो इसे भारत का दूसरा सबसे बड़ा राज्य बनाता है। यह प्रदेश उत्तर में उत्तर प्रदेश, दक्षिण में महाराष्ट्र, पूर्व में छत्तीसगढ़, और पश्चिम में गुजरात व राजस्थान से घिरा है। नर्मदा, ताप्ती, बेतवा, चंबल और सोन जैसी नदियाँ यहाँ की जीवन रेखा हैं, जो प्रदेश की उपजाऊ धरती को सिंचित करती हैं।वन क्षेत्र की दृष्टि से भी यह प्रदेश समृद्ध है — कान्हा, बांधवगढ़, पेंच, सतपुड़ा और पन्ना जैसे राष्ट्रीय उद्यान इसकी जैव विविधता को दर्शाते हैं मध्य प्रदेश की पहचान उसकी सांस्कृतिक एकता में निहित विविधता से है। यहाँ गोंड, भील, बैगा, कोरकू, सहरिया जैसी जनजातियाँ अपनी पारंपरिक संस्कृति, नृत्य, गीत और जीवन शैली के माध्यम से प्रदेश की लोकधारा को समृद्ध करती हैं। खजुराहो के मंदिर, सांची का स्तूप, भीमबेटका की गुफाएँ और उज्जैन का महाकालेश्वर मंदिर न केवल धार्मिक आस्था के केंद्र हैं, बल्कि भारत की प्राचीन कला और स्थापत्य के उत्कृष्ट प्रतीक हैं। भोजपुर, मांडू, ग्वालियर, चंदेरी और बुरहानपुर जैसे नगर अपने ऐतिहासिक गौरव की झलक आज भी प्रस्तुत करते हैं। मध्य प्रदेश का गठन 1 नवंबर 1956 को हुआ था, जब मध्य भारत, विंध्य प्रदेश और भोपाल राज्य को मिलाकर एक नया राज्य बना।भोपाल को राजधानी घोषित किया गया और प्रदेश का नाम पड़ा मध्य प्रदेश अर्थात भारत का हृदय प्रदेश। राजनीतिक रूप से यह राज्य देश की लोकतांत्रिक प्रक्रिया का सशक्त उदाहरण है। यहाँ की राजनीति में स्थायित्व, जनभागीदारी और विकासोन्मुख नीति-निर्माण देखने को मिलता है। प्रदेश ने कई राष्ट्रीय स्तर के नेता और नीतिनिर्माता दिए हैं जिन्होंने देश के सामाजिक-राजनीतिक विमर्श को दिशा दी है। आर्थिक और सर्वांगीण विकास की दिशा में मध्य प्रदेश कृषि प्रधान राज्य है।यहाँ गेहूं, सोयाबीन, दालें और चना मुख्य फसलें हैं। प्रदेश को सोया स्टेट और पल्स कैपिटल ऑफ इंडिया भी कहा जाता है। सिंचाई, ग्रामीण उद्योग, सड़क निर्माण, और ऊर्जा क्षेत्र में तीव्र प्रगति ने राज्य को आत्मनिर्भरता की दिशा में अग्रसर किया है। इंदौर, जो देश का सबसे स्वच्छ शहर है, प्रदेश के शहरी प्रबंधन और नागरिक भागीदारी का उत्कृष्ट उदाहरण बन चुका है।उद्योग और निवेश के क्षेत्र में पीथमपुर, मंधीदीप, सिंगरौली, जबलपुर जैसे क्षेत्र औद्योगिक शक्ति केंद्र के रूप में विकसित हो रहे हैं।शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में AIIMS भोपाल, IIT इंदौर जैसी संस्थाएँ प्रदेश को ज्ञान और तकनीकी उन्नति की दिशा में अग्रसर कर रही हैं। मध्य प्रदेश केवल एक राज्य नहीं, बल्कि भारत की आत्मा का जीवंत प्रतीक है। यहाँ की जनजातीय संस्कृति ने भारतीय सभ्यता की जड़ों को सहेजा है, जबकि आधुनिक उद्योग और शिक्षा ने राष्ट्र को नई दिशा दी है। प्रदेश ने कृषि, रक्षा, खेल, कला, संस्कृति, साहित्य और विज्ञान — हर क्षेत्र में देश को उत्कृष्ट प्रतिभाएँ दी हैं।हर खेत में पानी, हर हाथ में काम की नीति के साथ यह प्रदेश आत्मनिर्भर भारत की अवधारणा को साकार करने में लगा है।मध्य प्रदेश स्थापना दिवस हमें यह संदेश देता है कि एकता, परिश्रम और विकास के माध्यम से कोई भी प्रदेश न केवल अपने लोगों का बल्कि पूरे राष्ट्र का गौरव बन सकता है। भारत का यह दिल आज भी अपनी जीवंत संस्कृति, प्राकृतिक सौंदर्य और विकासशील दृष्टिकोण के साथ राष्ट्र की धड़कन बना हुआ है।

सरदार पटेल की अदम्य भावना और एक भारत का संकल्प : योगाचार्य महेश पाल
Published / 2025-10-30 21:15:16
सरदार पटेल की अदम्य भावना और एक भारत का संकल्प : योगाचार्य महेश पाल

राष्ट्रीय एकता दिवस एबीएन सेंट्रल डेस्क। 31 अक्टूबर को राष्ट्रीय एकता दिवस सरदार वल्लभभाई पटेल की जयंती के अवसर पर 2014 से मनाया जाता है, 31 अक्टूबर 2025 को हम 150 वी जयंती मना रहे हैं, बही इस बार 14 वा राष्ट्रीय एकता दिवस मनाया जायेगा, योगाचार्य महेश पाल ने बताया कि भारत विविधताओं का देश है, यहां हर क्षेत्र, भाषा, धर्म और संस्कृति में भिन्नता होने के बावजूद एक भाव समान है, राष्ट्र की एकता का भाव। यही एकता हमारे देश की आत्मा है। इसी भावना को सशक्त बनाने और उसके रक्षक रहे सरदार वल्लभभाई पटेल की स्मृति में हर वर्ष 31 अक्टूबर को राष्ट्रीय एकता दिवस मनाया जाता है। वर्ष 2014 में भारत सरकार ने इस दिन को राष्ट्रीय एकता दिवस के रूप में मनाने की घोषणा की थी। इसका उद्देश्य देश की अखंडता, सुरक्षा और एकजुटता के महत्व को दोहराना है।सरदार पटेल ने स्वतंत्र भारत के राजनीतिक एकीकरण में जो योगदान दिया, वह अभूतपूर्व था। उन्होंने रियासतों के विलय के माध्यम से भारत को एक सूत्र में पिरोया और आधुनिक भारत की नींव रखी।1875 में गुजरात के नाडियाड में जन्मे वल्लभ भाई पटेल वकालत के पेशे से जुड़े, लेकिन महात्मा गांधी के आह्वान पर स्वतंत्रता संग्राम में कूद पड़े स्वतंत्रता के पश्चात देश के सामने सबसे बड़ी चुनौती थी 562 रियासतों को एक राष्ट्र में समाहित करना।सरदार पटेल की दृढ़ इच्छाशक्ति, संवाद कौशल और दूरदर्शिता के कारण यह संभव हो सका। उन्होंने हैदराबाद, जूनागढ़ और अन्य रियासतों को शांतिपूर्ण तरीके से भारत का हिस्सा बनाया। इसी महान कार्य के लिए उन्हें भारत का लौह पुरुष और राष्ट्रीय एकता का शिल्पकार कहा गया। 31 अक्टूबर 2018 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा गुजरात के केवड़िया में 182 मीटर ऊंची स्टैच्यू आफ यूनिटी का उद्घाटन किया गया। यह विश्व की सबसे ऊंची प्रतिमा है, जो सरदार पटेल के साहस, नेतृत्व और देशभक्ति का जीवंत प्रतीक है।यह स्मारक न केवल सरदार पटेल को श्रद्धांजलि है, बल्कि आने वाली पीढ़ियों को यह संदेश देता है कि एकता से ही राष्ट्र की शक्ति जन्म लेती है। इस अवसर पर पूरे देश में रन फॉर यूनिटी जैसे कार्यक्रमों का आयोजन होता है। विद्यालयों, महाविद्यालयों, सरकारी व गैर-सरकारी संस्थानों में एकता प्रतिज्ञा दिलायी जाती है। निबंध, भाषण, सांस्कृतिक कार्यक्रम, और चित्रकला प्रतियोगिताओं के माध्यम से युवाओं में राष्ट्रप्रेम और एकता की भावना जगायी जाती है। पुलिस, रक्षा बल और नागरिक संगठन इस दिन को देशभक्ति परेड और जनभागीदारी कार्यक्रमों से मनाते हैं।आज के डिजिटल और विचारधारात्मक विभाजन के दौर में राष्ट्रीय एकता का अर्थ केवल सीमाओं की सुरक्षा नहीं, बल्कि विचारों और भावनाओं की एकता भी है। हमारे समाज में विविधता हमारी कमजोरी नहीं, बल्कि सबसे बड़ी ताकत है। हमारी विविधता ही हमारी पहचान है; जब तक हम एक साथ हैं, कोई भी शक्ति हमें विभाजित नहीं कर सकती। सरदार पटेल ने दिखाया कि सच्चा नेतृत्व नारेबाजी से नहीं, बल्कि कर्तव्य, अनुशासन और समर्पण से बनता है। युवाओं को उनके जीवन से यह सीख लेनी चाहिए कि राष्ट्रीय हित व्यक्तिगत स्वार्थ से ऊपर होता है। एकता, सेवा और राष्ट्रभक्ति के भाव से ही एक भारत, श्रेष्ठ भारत का निर्माण संभव है। राष्ट्रीय एकता दिवस हमें याद दिलाता है कि भारत की शक्ति उसकी एकता में निहित है। यह दिन केवल एक औपचारिक उत्सव नहीं, बल्कि राष्ट्र के प्रति हमारी सामूहिक निष्ठा का प्रतीक है। जब हर नागरिक मैं भारत हूं और भारत मुझमें है का भाव अपनाएगा, तभी सच्चे अर्थों में सरदार पटेल के सपनों का भारत साकार होगा। एकता ही भारत की पहचान है, और इस पहचान की रक्षा ही हमारा राष्ट्रधर्म।

देव उठानी एकादशी 1 नवंबर को
Published / 2025-10-30 18:15:33
देव उठानी एकादशी 1 नवंबर को

तुलसी विवाह जागृता,भक्ति, शुभारंभ और पारिवारिक- सामुदायिक एकता का देता है संदेश : संजय सर्राफटीम एबीएन, रांची। विश्व हिंदू परिषद सेवा विभाग एवं श्री कृष्ण प्रणामी सेवा धाम ट्रस्ट के प्रांतीय प्रवक्ता संजय सर्राफ ने कहा है कि हिन्दू धर्म में कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को देवउठनी एकादशी मनाया जाता है। जिसे प्रबोधिनी एकादशी या देवोत्तान एकादशी भी कहते हैं इस वर्ष यह तिथि 1 नवंबर से प्रारम्भ होकर 2 नवंबर तक चलने वाली है। अगले दिन अर्थात द्वादशी तिथि में आमतौर पर तुलसी-विवाह का आयोजन किया जाता है। एक नवंबर को भद्रा दोपहर 3:30 से रात 2:56 बजे तक रहेगी। भद्रा काल में मांगलिक कार्य नहीं किया जाता है, इसलिए तुलसी विवाह अगले दिन 2 नवंबर को होगा। एकादशी के दिन संपूर्ण विश्व के पालन करता श्री हरि विष्णु जी काव्य दिवस पूजन अर्चन करके योग्य निद्रा से जगाया जायेगा। कार्तिक शुक्ल पक्ष एकादशी तिथि की शुरूआत 31 अक्तूबर की शाम 4:02 बजे से एक नवंबर की रात 2:56 बजे तक रहेगी। इस कारण से उदय कालिक स्थिति में प्रबोधिनी एकादशी व्रत एक नवंबर दिन शनिवार को रखा जायेगा। मान्यता है कि विष्णु चार माह के चातुर्मास (आषाढ़ एकादशी से कार्तिक एकादशी तक) योगनिद्रा में होते हैं और इस एकादशी के दिन जाग्रत होते हैं।  इसलिए इस दिन से शुभ कार्य, विवाह, गृह प्रवेश आदि मांगलिक कार्य आरंभ करने का समय माना जाता है। तुलसी-विवाह में पवित्र तुलसी जी का विवाह शालिग्राम (विष्णु का प्रतीक) से कराने की परंपरा है। यह विवाह शुद्धता, भक्ति और आत्मसमर्पण का प्रतीक माना जाता है।  इस दिन व्रत रखना, पूजा करना, कथा सुनना और परिवार-समाज में समृद्धि-शांति की कामना करना बहुत शुभ माना जाता है। पुराणों में प्रसंग मिलता है कि तुलसी जी (स्वयं एक देवी रूप में) ने विष्णु भगवान की अर्चना-भक्ति की थी। उन्हें शाप-प्रायश्चित्त के रूप में तुलसी रूप में बनाया गया। अंतत: उन्हीं से भगवान विष्णु का विवाह शालिग्राम, अर्थात् स्वयं भगवान के प्रतीक से हुआ। इस विवाह को धार्मिक दृष्टि से शुभ कार्यों की शुरूआत माना गया। इस एकादशी पर व्रत करने से पापों से मुक्ति और मोक्ष की प्राप्ति की कामना की जाती है। विवाह-गृहप्रवेश जैसे मांगलिक कार्यों को पुन: आरंभ करने का समय माना जाता है। तुलसी-विवाह से गृह में लक्ष्मी-विष्णु की कृपा बनी रहने की आशा की जाती है और कन्यादान, व सामाजिक सम्मान का लाभ माना जाता है। देवउठनी एकादशी तथा तत्क्रम में आने वाला तुलसी-विवाह आज भी हमारी हिंदू संस्कृति में गहरी धार्मिक व सामाजिक भूमिका निभाता है। इस दिन जागृता, भक्ति, शुभ आरंभ और पारिवारिक-सामुदायिक एकता का संदेश समाहित है। इस प्रकार, यदि हम इस पर्व को श्रद्धा-भक्ति एवं परंपरा के साथ मनाएं, तो न केवल व्यक्तिगत बल्कि सामाजिक रूप से भी समृद्धि-शांति का अनुभव कर सकते हैं।

गोपाष्टमी पर्व पर श्री कृष्ण प्रणामी गौशाला में श्रद्धा और उल्लास का संगम
Published / 2025-10-30 13:27:39
गोपाष्टमी पर्व पर श्री कृष्ण प्रणामी गौशाला में श्रद्धा और उल्लास का संगम

गौसेवा और गौसंवर्धन से जीवन में समृद्धि, शांति और सुख की होती है प्राप्ति : संजय सर्राफटीम एबीएन, रांची। श्री कृष्ण प्रणामी सेवा धाम ट्रस्ट द्वारा संचालित पुंदाग स्थित श्री कृष्ण प्रणामी मंगल राधिका सदानंद सेवा धाम में स्थित श्री कृष्ण प्रणामी गौशाला मे गोपाष्टमी पर्व श्रद्धा, भक्ति और उल्लास के साथ मनाया गया। प्रातः 8 बजे मंदिर के पुजारी पं. अरविंद पांडे द्वारा गौमाता की विधिवत पूजा-अर्चना वैदिक मंत्रोच्चार के बीच संपन्न की गई। पूजा के उपरांत गौमाता को विशेष भोग लगाया गया तथा उपस्थित श्रद्धालुओं ने पारंपरिक रूप से गोसेवा करते हुए गायों एवं बछड़ों को गुड़, हरा चारा, दाना और अन्य सामग्री खिलाई। इस दौरान श्रद्धालुओं ने गौमाता को फूल-मालाएं पहनाकर उनका आशीर्वाद प्राप्त किया। पूजा-अर्चना के पश्चात श्री राधा कृष्ण मंदिर परिसर में भक्तिमय वातावरण में भजन-कीर्तन का आयोजन किया गया, जिसमें श्रद्धालुओं ने बड़ी संख्या में भाग लिया। मधुर भजनों से संपूर्ण परिसर भक्तिरस में सराबोर हो उठा। इसके उपरांत प्रसाद वितरण का आयोजन हुआ, जिसमें सभी भक्तों ने प्रसाद ग्रहण किया। इस पावन अवसर पर सद्गुरु कृपा अपना घर आश्रम में रह रहे दिव्यांग, निराश्रित और असहायजनों एवं सेवादारों को विविध प्रकार के व्यंजनों का स्नेहपूर्वक भोजन कराया गया। ट्रस्ट के उपाध्यक्ष राजेंद्र प्रसाद अग्रवाल एवं प्रवक्ता संजय सर्राफ ने कहा कि गोपाष्टमी का पर्व हमें गौमाता की महिमा और संरक्षण के प्रति जागरूक करता है। उन्होंने कहा कि भारतीय संस्कृति में गाय न केवल अन्नदाता है, बल्कि धार्मिक, सामाजिक और पर्यावरणीय दृष्टि से भी अमूल्य है। गौसेवा और गौसंवर्धन से जीवन में समृद्धि, शांति और सुख की प्राप्ति होती है। उन्होंने समाज से आह्वान किया कि हर व्यक्ति अपने सामर्थ्य अनुसार गौसेवा में योगदान दे। गोपाष्टमी उत्सव में ट्रस्ट के सदस्यगण, क्षेत्र के अनेक श्रद्धालु, सेवादार और गणमान्य नागरिक उपस्थित थे। सभी ने इस दिव्य आयोजन की सराहना की और कहा कि ऐसे धार्मिक पर्व समाज में सेवा, प्रेम और एकता की भावना को सशक्त करते हैं। अंत में सामूहिक आरती और गौमाता की जयघोष के साथ कार्यक्रम का समापन हुआ। उक्त जानकारी श्री कृष्ण प्रणामी सेवा धाम ट्रस्ट के प्रवक्ता सह मीडिया प्रभारी संजय सर्राफ ने दी।

इयं तत्वमसि...
Published / 2025-10-30 10:32:22
इयं तत्वमसि...

त्रिवेणी दासएबीएन सोशल डेस्क। उपनिषद में एक शब्द तत्वमसि का उल्लेख आता है। इस शब्द का अर्थ बहुत व्यापक है। प्रकृति के प्रत्येक अवयव में वही एक तत्व विराजमान है जो तत्व मनुष्य भीतर विराजमान होता है। पृथ्वी, पानी, अग्नि, वायु और आकाश/अंतरिक्ष के प्रकृति (गुण) में वही एक तत्व है। उपनिषद कहता है मनुष्य वही तत्व है। एक फल के पौधे के जीवन चक्र के ऊपर विचार करने से पाया जाता है कि जड़, तना और पत्ता उसकी जीवन शक्ति है। समय पर फूल और फल उत्पन्न करता है। फूलों में सुगंध एवं फल के अंदर आवश्यक जीवन-शक्ति के तत्व होते हैं। किसी कारणवश वृक्ष से मूल तत्व बाहर निकला तो वृक्ष मृत होकर सूख जाता है। मनुष्य के अंदर का मूल तत्व जैसे ही शरीर का परित्याग करता है तत्क्षण शरीर मृत्यु को प्राप्त हो जाता है। वह तत्व और कुछ नहीं परमात्मा का अंश आत्मा के रूप में संपूर्ण ब्रह्मांड के प्रकृति में रचा-बसा हुआ है और वह सत्य अनंत शक्तिशाली है जो सृजन तथा जीवन चक्र का कारण है। जिसने भी उस तत्व को पहचाना तथा उसे संपर्क स्थापित किया उसने अपने कार्यों में अतिरिक्त असाधारण परिणाम उत्पन्न करने में सफलता अर्जित की तथा परम शांति में स्वयं को स्थापित किया।

देशभर में 30 अक्टूबर को मनायी जायेगी गोपाष्टमी
Published / 2025-10-28 20:17:20
देशभर में 30 अक्टूबर को मनायी जायेगी गोपाष्टमी

गोपाष्टमी गौ-सेवा, श्रद्धा और संस्कृति का पावन पर्व : संजय सर्राफएबीएन सोशल डेस्क। विश्व हिंदू परिषद सेवा विभाग एवं श्री कृष्ण प्रणामी सेवा धाम ट्रस्ट के प्रांतीय प्रवक्ता संजय सर्राफ ने कहा है कि भारत की सनातन संस्कृति में गाय को माता का स्थान प्राप्त है। गोपाष्टमी वही पावन पर्व है जो गाय और गोवंश की महिमा को समर्पित है। यह पर्व कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि को मनाया जाता है। इस वर्ष गोपाष्टमी 30 अक्टूबर दिन गुरुवार को मनाया जायेगा। गोपाष्टमी उत्सव अत्यंत श्रद्धा और उत्साह के साथ देशभर में मनाया जाता है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, भगवान श्रीकृष्ण ने इसी दिन पहली बार गोपालक (गाय चराने वाले) के रूप में गौवंश की सेवा की थी। नंद बाबा ने उन्हें बछड़ों के बजाय गायों को चराने की अनुमति दी थी। इसी कारण यह दिन गोपालक रूप में श्रीकृष्ण की आराधना का प्रतीक माना जाता है। इस दिन से ही व्रज में गौ-सेवा का शुभारंभ होता है। इसके अतिरिक्त, यह पर्व गौमाता की पवित्रता, पालन और संरक्षण के प्रति आस्था का प्रतीक है। स्कंद पुराण, पद्म पुराण और अन्य धर्मग्रंथों में भी गोपाष्टमी का उल्लेख मिलता है। कहा गया है कि जो व्यक्ति इस दिन श्रद्धापूर्वक गौ-सेवा करता है, उसे अक्षय पुण्य की प्राप्ति होती है। गोपाष्टमी के दिन सुबह स्नान कर लोग गायों को स्नान कराते हैं, उनके सींगों और गले में फूल-मालाएं, रोली, गुलाल और कपड़ों से सजावट की जाती है। इसके बाद गाय की आरती उतारी जाती है और घास, गुड़, रोटी, चना, और फल अर्पित किए जाते हैं। गौ-सेवा करने वाले गोपालक, गौशालाओं के गौ सेवक और किसान इस दिन विशेष रूप से सम्मानित किए जाते हैं। कई स्थानों पर गौ-पथ यात्रा या गौ-पूजन कार्यक्रम भी आयोजित किए जाते हैं। महिलाएं इस दिन व्रत रखती हैं और परिवार की सुख-समृद्धि तथा गोवंश की रक्षा की कामना करती हैं। मंदिरों में भगवान श्रीकृष्ण और गोपालक रूप की मूर्तियों का विशेष श्रृंगार किया जाता है। गोपाष्टमी केवल धार्मिक पर्व नहीं, बल्कि भारतीय ग्राम्य संस्कृति का जीवंत प्रतीक है। गाय भारतीय कृषि, अर्थव्यवस्था और पर्यावरण से गहराई से जुड़ी हुई है। गौमाता से प्राप्त दूध, दही, घी, गोबर और गोमूत्र पंचगव्य के रूप में जीवनोपयोगी माने गए हैं। इनसे न केवल पोषण मिलता है बल्कि खेती और औषधि के क्षेत्र में भी इनका महत्व अपार है। गोपाष्टमी हमें यह संदेश देती है कि गाय केवल एक पशु नहीं, बल्कि जीवनदायिनी शक्ति है, जिसका संरक्षण हर व्यक्ति का धर्म है। आज जब पर्यावरण असंतुलन और रासायनिक खेती की समस्या बढ़ रही है, तब गोसंवर्धन और गोपालन हमारे लिए समाधान का मार्ग प्रस्तुत करते हैं। गोपाष्टमी का पर्व गौमाता के प्रति कृतज्ञता और सम्मान का प्रतीक है। यह हमें भारतीय संस्कृति के उस मूल सिद्धांत की याद दिलाता है जिसमें सर्वभूत हित को सर्वोपरि माना गया है। इस पावन दिन पर हम सभी को संकल्प लेना चाहिए कि हम गौवंश की रक्षा, गौशालाओं के विकास और स्वदेशी संस्कृति के संरक्षण में अपना योगदान देंगे। गोपाष्टमी केवल पूजा नहीं, बल्कि गौ-सेवा और धरती मां की रक्षा का दिव्य संदेश है, जो युगों-युगों तक भारतीय आस्था का आधार बना रहेगा।

आस्था का चमत्कार...
Published / 2025-10-28 09:25:11
आस्था का चमत्कार...

न कोई थकान, न किसी प्रकार का आलस्य और ना ही किसी प्रकार का शारीरिक मानसिक तथा भावनात्मक अपवित्रता.. स्वत: स्फूर्त कठोर अनुशासनत्रिवेणी दासएबीएन सोशल डेस्क। ना शांति समिति की बैठक, न कोई दंगा-फसाद, न इंटरनेट कनेक्शन को बाधित करना, ना कोई शंका ना ही कोई डर, श्रद्धा एवं स्वेच्छा से घाटों की सफाई, पूजा सामग्री को नि:शुल्क उपलब्ध कराना, शराब की दुकानों को बंद करने की आवश्यकता नहीं है ।ठेकुआ का प्रसाद प्रत्येक घर में स्वयं ही निर्माण करना, छठ व्रतियों के आने जाने वाले मार्ग का सफाई पानी से पवित्र करना, छठ घाट में ऊंच नीच जाति पाति का भेद मिट जाना, कोई फिल्मी गीत नहीं केवल और केवल छठ के लोकगीत ; यह सब कुछ आस्था का चमत्कार है। सूर्य भगवान को अर्घ्य का समर्पण और संपूर्ण अनुष्ठान में कोई पंडित नहीं कोई पुजारी नहीं मंत्र के रूप में श्रद्धा, भक्ति एवं विश्वास का निरंतर जाप; आस्था की शक्ति चमत्कृत करती है।चार दिनों तक चलने वाला छठ के अनुष्ठान में न कोई तामझाम, ना कोई दिखावा और न ही निमंत्रण का इंतजार बस केवल जिसे जितना बन पड़े सहयोग ही सहयोग। प्रमाणित होता है कि हमारे अंदर आस्था के अनुपात से कई गुना अधिक परिणाम हमारे प्रत्येक कार्यों में उत्पन्न किया जा सकता है; यदि हमने आस्था के महत्व को व्यक्तिगत जीवन में अंगीकार कर लिया हो।

छठ महापर्व के तीसरे दिन अस्तगामी सूर्य को दिया जायेगा अर्घ्य
Published / 2025-10-27 12:15:16
छठ महापर्व के तीसरे दिन अस्तगामी सूर्य को दिया जायेगा अर्घ्य

आज छठ पूजा का तीसरा दिन, अस्तगामी सूर्य को दिया जाएगा अर्घ्य — जानें शुभ मुहूर्त और विधिएबीएन सोशल डेस्क। छठ पर्व का आज तीसरा दिन है, जिसे संध्या अर्घ्य  के रूप में जाना जाता है। आज श्रद्धालु अस्तगामी सूर्य  को अर्घ्य देकर छठी मैया और सूर्यदेव का आशीर्वाद प्राप्त करेंगे। यह पर्व सूर्य उपासना, प्रकृति और मातृत्व की शक्ति को समर्पित है। मान्यता है कि छठी मैया देवी कात्यायनी का अवतार हैं और सूर्यदेव की बहन मानी जाती हैं। इसलिए यह व्रत सूर्य-षष्ठी  के नाम से भी प्रसिद्ध है।छठ पूजा के तीसरे दिन का महत्व छठ पूजा के तीसरे दिन भक्तजन डूबते हुए सूर्य को जल अर्पित करते हैं। यह एकमात्र पर्व है जिसमें Setting Sun को अर्घ्य दिया जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, शाम के समय सूर्यदेव अपनी पत्नी प्रत्युषा के साथ होते हैं, इसलिए इस समय अर्घ्य देना अत्यंत शुभ माना जाता है। भक्त सूर्यदेव को धन्यवाद देते हैं दिनभर की ऊर्जा, रोशनी और जीवन प्रदान करने के लिए। इस दौरान माताएं अपने बच्चों की लंबी उम्र, परिवार की समृद्धि और सुख-शांति की कामना करती हैं।अर्घ्य देने से पहले करें सूर्य कवच का पाठ संध्या अर्घ्य से पहले करना अत्यंत लाभकारी माना गया है। मान्यता है कि सूर्य कवच का पाठ करने से हेल्थ, कैरियर, वेल्थ और विल पॉवर में सुधार होता है। यह आंख, त्वचा, हृदय और हड्डियों से जुड़ी बीमारियों से भी रक्षा करता है। छठ पूजा के दौरान हर दिन इसका पाठ शुभ फल देता है।तीन शुभ योगों में दिया जाएगा संध्या अर्घ्य इस साल छठ पूजा का संध्या अर्घ्य बेहद खास है क्योंकि यह रवि योग, हंसा राजयोग और रुचक राजयोग जैसे तीन शुभ योगों में संपन्न होगा।

श्री राधा-कृष्ण मंदिर में छठ के खरना पर 101 किलो खीर का लगा भोग
Published / 2025-10-26 17:18:43
श्री राधा-कृष्ण मंदिर में छठ के खरना पर 101 किलो खीर का लगा भोग

हजारों श्रद्धालुओं ने प्रसाद ग्रहण किया टीम एबीएन, रांची। श्री कृष्ण प्रणामी सेवा धाम ट्रस्ट द्वारा संचालित पुंदाग में श्री कृष्ण प्रणामी मंगल राधिका सदानंद सेवा धाम श्री राधा कृष्ण प्रणामी मंदिर में 235 वां श्री कृष्ण प्रणामी अन्नपूर्णा सेवा महाप्रसाद  का आयोजन किया गया। आज का श्री कृष्ण प्रणामी अन्नपूर्णा सेवा प्रणामी ट्रस्ट के सदस्यों ने आयोजित किया। आज छठ महापर्व खरना पूजा के अवसर पर 101 किलो दूध का खीर का भोग लगाया गया।श्री राधा कृष्ण जी का दिव्य अलौकिक श्रृंगार किया गया। खीर महाप्रसाद का विधिवत भोग दोपहर 12 बजे मंदिर के पुजारी अरविंद कुमार पांडे ने लगायी। तत्पश्चात मंदिर परिसर में उपस्थित हजारों श्रद्धालुओं के बीच महाप्रसाद का वितरण किया गया। तत्पश्चात भजन- संध्या के कार्यक्रम में ट्रस्ट के भजन गायकों के मनमोहक सुमधुर भजनों में अमृत गंगा का रसपान कराते हुए श्रोताओं को खूब झुमाया तथा श्री राधा कृष्ण के जयकारा से पूरा वातावरण कृष्णमय एवं भक्तिमय बन गया। तत्पश्चात सामूहिक रूप से महाआरती की गयी। ट्रस्ट के प्रवक्ता सह मीडिया प्रभारी संजय सर्राफ ने बताया कि आज श्री राधा कृष्ण मंदिर में 4 हजार से अधिक श्रद्धालुओं में दर्शन किये। उन्होंने कहा कि छठ महापर्व न केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक है बल्कि पर्यावरण संरक्षण और सूर्य ऊर्जा के प्रति कृतज्ञता का भी प्रतीक है। छठ पूजा भारतीय संस्कृति की उस अनमोल परंपरा का उत्सव है जो मनुष्य और प्रकृति के अटूट बंधन को दशार्ता है। यह पर्व श्रद्धा शुद्धता और समर्पण का प्रतीक है। मौके पर ट्रस्ट के अध्यक्ष डूंगरमल अग्रवाल, उपाध्यक्ष राजेंद्र प्रसाद अग्रवाल, सुरेश अग्रवाल, निर्मल जालान, शिव भगवान अग्रवाल, मधुसूदन जाजोदिया, ज्ञान शर्मा, निर्मल छावनिका, पूरणमल सर्राफ, संजय सर्राफ, विष्णु सोनी, बिजय अग्रवाल, मनीष सोनी, मुरली प्रसाद, हरीश कुमार, परमेश्वर साहू, बसंत वर्मा सहित बड़ी संख्या में महिलाएं, पुरुष उपस्थित थे।

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