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सनातन हिंदू धर्म-संस्कृति के रक्षक अमर शहीद धर्म योद्धा
Published / 2022-12-21 23:15:02
सनातन हिंदू धर्म-संस्कृति के रक्षक अमर शहीद धर्म योद्धा

धर्म रक्षा दिवस पर विशेष (21 से 31 दिसंबर)डॉ बीरेंद्र साहूएबीएन सोशल डेस्क। शुद्धि आंदोलन : शुद्धि आंदोलन में स्वामी श्रद्धानंद (1856- 1926) का स्थान अमर है। आगरा में 13 फरवरी 1923 की क्षत्रिय उपकारिणी सभा की बैठक में उन्हें बुलाया गया था। इसमें सनातनी, आर्यसमाजी, सिख, जैन भी आए थे। यहीं भारतीय हिन्दू शुद्धि सभा का गठन हुआ। इसी के दस दिन बाद स्वामी जी की महत्वपूर्ण पुस्तिका सेव द डाइंग रेस प्रकाशित हुई थी, जिसमें उन्होंने नव-मुस्लिमों को शीघ्र अपने पुराने कुटुम्ब में लाने की आवश्यकता पर बल दिया। अगले दो महीनों में वे लगभग सौ गांवों में गये। पहले महीने में ही लगभग पांच हजार मलकानों को वापस लाया गया। उस वर्ष के अंत तक यह संख्या तीस हजार हो गई थी। इस कार्य पर जमीयत उलेमा और कांग्रेस के नेताओं ने आपत्ति भी की, लेकिन स्वामी जी अडिग रहे। 31 मार्च 1923 को भारत धर्म महामंडल और दरभंगा महाराज की ओर से काशी के पंडितों, पंजाब और महाराष्ट्र की विविध धर्म-सभाओं एवं जाति संगठनों ने भी स्वामी जी का समर्थन दिया। 4-5 अप्रैल 1923 को बनारस के सभाओं में भी इस विषय को रखा गया। फलत: काशी के कुछ रुढ़िवादी पंडितों ने भी मलकानों में काम करने का संकल्प लिया। मलकाना मुस्लिम राजपूतों की शुद्धि का काम पूरे हिन्दू समाज ने अपना लिया। स्वयं डॉ अंबेदकर  ने शुद्धि आंदोलन से अपनी सहानुभूति लिखित रूप से जताई थी। स्वामी श्रद्धानन्द ने 1924 ई में दनकौर, बुलंदशहर में कई मुस्लिमों को शुद्ध किया।मेरठ, मुजफ्फरनगर और बुलंदशहर में वे लगभग डेढ़ सौ ईसाइयों को भी पुन: हिन्दू समाज में ले आये। उन के सहयोगी रामभज दत्त और मंगल सेन इसी कार्य के लिए अन्य स्थानों पर गए। दिल्ली में मार्च 1926 में कराची से आई हुई महिला असगरी बेगन अपने बच्चों के साथ शुद्ध हुईं और उन्हें शान्ति देवी नाम दिया गया। इस पर असगरी के परिवारवालों ने स्वामी श्रद्धानन्द पर मुकदमा भी किया, किन्तु अदालत ने स्वामी जी को निर्दोष करार दिया। इसके बाद कुछ कट्टरपंथी मुसलमानों ने स्वामी जी को इस्लाम का शत्रु घोषित किया। इसी प्रचार के वशीभूत एक मतांध मुस्लिम ने 23 दिसंबर, 1926 को स्वामी जी को उन के घर में बीमार अवस्था में धोखे से मार डाला। यह निस्संदेह, शुद्धि के लिए ही स्वामी जी का बलिदान था। 30 दिसंबर, 1922 को गया (बिहार) में कांग्रेस के पंडाल में आयोजित हिन्दू महासभा के वार्षिक अधिवेशन में मोपला के पीड़ित हिन्दुओं के प्रति संवेदना प्रकट की गई। मालाबार के लोगों से धर्मांतरित लोगों को पुन: हिंदू धर्म में स्वीकार करने के लिए भी आह्वान किया गया। इस अधिवेशन के अध्यक्ष पंडित मदन मोहन मालवीय तथा स्वागताध्यक्ष डॉ राजेन्द्र प्रसाद थे। बहरहाल, भारतीय हिन्दू शुद्धि सभा के प्रयासों से सन 1923 से 1931 के बीच लगभग 18,33,422 नव-मुस्लिमों को शुद्ध किया गया। इसी दौरान लगभग साठ हजार अछूत कहलाने वाले लोगों को हिन्दू धर्म छोड़ने से भी बचाया गया। 127 शुद्धि सम्मेलन हुए, 156 पंचायतें हुईं और 81 छोटे-बड़े सहभोज किए गए। सभा की ओर से शुद्धि समाचार नामक एक मासिक पत्र भी निकलता था, जिसके चौदह हजार ग्राहक थे। अखिल भारतीय हिन्दू महासभा का सातवां अधिवेशन मालवीय जी की अध्यक्षता में 19-20 अगस्त 1923 को बनारस में हुआ था। उन्होंने अध्यक्षीय भाषण में शुद्धि कार्य का जोरदार समर्थन किया। वहां बाबू भगवान दास (काशी विद्यापीठ के संस्थापक, थियोसोफिस्ट, 1955 ई में भारत-रत्न से सम्मानित) ने भी शुद्धि के समर्थन में अतिविद्वतापूर्ण भाषण दिया था। सर्वसम्मति से अहिंदुओं के हिंदू धर्म में प्रवेश संबंधी प्रस्ताव पास हुए।अखिल भारतीय हिन्दू महासभा का आठवां अधिवेशन 11 अप्रैल, 1925 को कोलकाता में लाला लाजपत राय की अध्यक्षता में हुआ था। लालाजी ने इस्लाम में बलात धर्मांतरित हिन्दुओं की शुद्धि का समावेश किया। महासभा के नौ उद्देश्यों में इसे भी शामिल किया गया। बाद में भी हिन्दू महासभा के अध्यक्ष पद से कई महापुरुषों ने शुद्धि का समर्थन किया। वीर सावरकर ने भी इस तथा अन्य मंचों से शुद्धि का समर्थन और प्रत्यक्ष शुद्धि का कार्य भी किया। वीर सावरकर ने अंडमान के भयावह सेल्यूलर जेल में अपने भाइयों गणेश तथा बाबाराव के साथ मिलकर शुद्धि कार्य किया था। वहां कुछ मुस्लिम कारापाल अल्पवयस्क हिन्दू बंदियों को फुसलाकर या यातना देकर मुसलमान बनाते थे। उनमें से अनेक को सावरकर बंधुओं ने विधिपूर्वक शुद्ध कराया था। इसका पता चलने पर बाबाराव सावरकर पर जानलेवा हमला भी हुआ, किन्तु वे अडिग रहे। डॉ हेगडेवार के संपादकत्व में स्वातंत्य दैनिक में शुद्धि संबंधी लेख व एक नाटक संगीत उ: शाप भी लिखा तथा सार्वजनिक व्याख्यान भी दिये।वेद धर्म छोडूं नहीं, कोसिस करो हजार, तिल-तिल काटो चाहि, गला काटो कटारलगभग सवा छह सौ वर्ष पूर्व 1398 की माघ पूर्णिमा को काशी के मड़ुआडीह ग्राम में संतोख दास और कर्मा देवी के परिवार में जन्में संत रविदास यानि संत रैदास को निस्संदेह हम भारत में धर्मांतरण के विरोध में स्वर मुखर करनें वाली और स्वधर्म में घर वापसी करानें वाली प्रथम पीढ़ी के प्रतिनिधि संत कह सकतें है। संत रैदास संत कबीर के गुरुभाई और स्वामी रामानंद जी के शिष्य थे। उनके कालजयी लेखन को इस तथ्य से समझा जा सकता है कि उनकें रचित 40 दोहे गुरु ग्रन्थ साहब जैसे महान ग्रन्थ में सम्मिलित किये गये हैं।भारतीय समाज में आजकल धर्मांतरण और हिन्दू धर्म में घर वापसी एक बड़ा विषय चर्चित और उल्लेखनीय हो चला है। यह विषय राजनैतिक कारणों से चर्चित भले ही अब हो रहा हो कि किन्तु सामाजिक स्तर पर धर्मांतरण हिन्दुस्थान में सदियों से एक चिंतनीय विषय रहा है। इस देश में धर्मांतरण की चर्चा और चिंता पिछले 2 हजार एवं 14 सौ  वर्षों पूर्व प्रारम्भ हो गई थी, समय-काल-परिस्थिति के अनुसार यह चिंता कभी मुखर होती रही तो अधिकांशत: आक्रान्ताओं और आतताइयों के अत्याचार से दबे-कुचले स्वरुप में अन्दर ही अन्दर और पीढ़ी दर पीढ़ी प्रवाहित होती रही। बारहवीं सदी में जब मुस्लिम आक्रान्ता भारत की ओर बढ़े तब वे धन लूटनें और धर्म के प्रचार के स्पष्ट और घोषित एजेंडे के साथ ही आये थे। इन बाहरी आक्रान्ताओं और शासकों को भारत की जनता का बहला फुसलाकर या जबरदस्ती बलात धर्मांतरण करानें में किसी प्रकार का कोई सामाजिक या सांस्कृतिक अपराध बोध नहीं लगता था, बल्कि ऐसा करके वे अपनें को गौरवान्वित ही महसूस करते थे। भारतीय दर्शन से धुर विपरीत ढर्रा चलाने वाले ये मुस्लिम आक्रान्ता कभी भी भारतीय समाज में समरस और एकरस अपनें इन दो गुणों के कारण ही नहीं हो पाये। उस दौर में स्वाभावत: ही हिंदुस्थानी परिवेश में धर्मांतरण को लेकर भय, चिंता और इससे छुटकारे की प्रवृत्ति उपजने लगी थी। पुनश्च यह कि समय के साथ साथ धर्मान्तरण कारी शक्तियों से छुटकारा पानें की यह प्रवृत्ति समय-काल-परिस्थिति के अनुसार कभी उभरती और कभी दबती रही किन्तु सदैव जीवित अवश्य रही! संत रैदास ने जब समाज में तत्कालीन आततायी विदेशी मुस्लिम शासक सिकंदर लोदी का आतंक देखा तब वे दुखी हो बैठे। उस समय लोदी ने हिंदुस्थानी जनता को सताना-कुचलना और डराकर धर्म परिवर्तन कराना प्रारम्भ कर दिया था। हिन्दुओं पर विभिन्न प्रकार के नाजायज कर जैसे तीर्थ यात्रा पर जजिया कर, शव दाह करनें पर जजिया कर, हिन्दू रीति से विवाह करनें पर जजिया कर जैसे आततायी आदेशों से देश का हिन्दू समाज त्राहि-त्राहि कर उठा था। भारतीय-हिन्दू परंपराओं और आस्थाओं के पालन करनें वालों से कर वसूल करनें और मुस्लिम धर्म माननें वालों को छूट, प्राथमिकता वरीयता देनें के पीछे एक मात्र भाव यही था कि हिन्दू धर्मावलम्बी तंग आकर इस्लाम स्वीकार कर लें। उस समय में स्वामी रामानंद ने अपनें भक्ति भाव के माध्यम से देश में देश भक्ति का भाव जागृत किया और आततायी मुसलमान शासकों के विरुद्ध एक आन्दोलन को जन्म दिया था। स्वामी रामानन्द ने तत्कालीन परिस्थितियों को समझकर कर विभिन्न जातियों के प्रतिनिधि संतों को जोड़कर द्वादश भगवत शिष्य मण्डली स्थापित की। विभिन्न समाजों का प्रतिनिधित्व करनें वाली इस द्वादश मंडली के सूत्रधार और प्रमुख, संत रविदास जी थे। संत रैदास ने हिन्दू संस्कारों के पालन पर मुस्लिम शासकों द्वारा लिए जानें वाले जजिया कर का अपनी मंडली से विरोध किया और इस हेतु जागरण अभियान चला दिया। इस मंडली ने सम्पूर्ण भारत में भ्रमण कर देशज भाव और स्वधर्म भाव के रक्षण और उसके जागरण का दूभर कार्य करना प्रारम्भ किया। संत रैदास के नेतृत्व में उस समय समाज में ऐसा जागरण हुआ कि उन्होंने धर्मांतरण को न केवल रोक दिया बल्कि उस कठिनतम और चरम संघर्ष के दौर में मुस्लिम शासकों को खुली चुनौती देते हुए देश के अनेकों क्षेत्रों में धर्मान्तरित हिन्दुओं की घरवापसी का कार्यक्रम भी जोर-शोर से चलाया। संत रविदास न केवल देश भर की पिछड़ी जातियों के प्रतिनिधि के रूप में स्वीकार्य संत हो गए अपितु अगड़ी जातियों के शासकों और राजाओं ने भी उन्हें राजनैतिक कारणों से अपने-अपने दरबार में सम्मानपूर्ण स्थान देना प्रारम्भ कर दिया। इस प्रकार संत रविदास को मिलनें वाले सम्मान के कारण देश की पिछड़ी और अगड़ी जातियों एतिहासिक समरसता का वातावरण निर्मित हो चला था। संत रविदास भारतीय सामाजिक एकता के प्रतिनिधि संत के रूप में स्थापित हो गए थे क्योंकि मुस्लिम शासकों को चुनौती देनें का जो दुष्कर कार्य ये शासक नहीं कर पाए थे वह समाज शक्ति को जागृत करनें के बल पर एक संत ने कर दिया था।पिछड़ी जातियों में आर्थिक व सामाजिक पिछड़ेपन के बाद भी स्वधर्म सम्मान का भाव जागृत करनें में रैदास सफल रहे और इसी का परिणाम है कि आज भी इन जातियों में मुस्लिम मतांतरण का बहुत कम प्रतिशत देखनें को मिलता है। निर्धन और अशिक्षित समाज में धर्मांतरण रोकने और घर वापसी का जो अद्भुत, दूभर और दुष्कर कार्य उस काल में हुआ वह इस दिशा में प्रतिनिधि रूप में संत रविदासजी का ही सूत्रपात था। इससे मुस्लिम शासकों में उनके प्रति भय का भाव हो गया। मुस्लिम आततायी शासक सिकंदर लोदी ने सदन नाम के एक कसाई को संत रैदास के पास मुस्लिम धर्म अपनाने का सन्देश लेकर भेजा। यह ठीक वैसी ही घड़ी थी जैसी कि वर्तमान काल में बोधिसत्व बाबा साहेब आंबेडकर के समय आन खड़ी हुई थी। यदि उस समय कहीं संत रैदास आततायी लोदी के दिए लालच में फंस जाते या उससे भयभीत हो जाते तो इस देश के हिंदुस्थानी समाज की बड़ी ही एतिहासिक हानि होती। यदि उस दिन संत रैदास झुक जाते तो निस्संदेह आज इतिहास कुछ और होता किन्तु धन्य रहे पूज्य संत रविदास कि वे टस से मस भी न हुए, अपितु दृढ़ता पूर्वक पुरे देश को धर्मांतरण के विरुद्ध अलख जलाये रखने का आह्वान भी करते रहे।उन्होंने अपनी रैदास रामायण में लिखा : वेद धर्म सबसे बड़ा अनुपम सच्चा ज्ञान फिर क्यों छोड़ इसे पढ लूं झूठ कुरआन वेद धर्म छोडूं नहीं कोसिस करो हजार तिल-तिल काटो चाहि,गला काटो कटारदेश ने अचंभित होकर यह दृश्य भी देखा कि संत रैदास को मुस्लिम हो जानें का सन्देश लेकर उनकें पास आने वाला सदन कसाई स्वयं वैष्णव पंथ स्वीकार कर विष्णु भक्ति में रामदास के नाम से लीन हो गया। यह वह समय था जब शक्तिशाली किन्तु निर्मम और बर्बर शास्सक सिकंदर लोदी क्रुद्ध हो बैठा और उसने संत रैदास की टोली को चमार या चांडाल घोषित कर दिया। इनकें अनुयाइयों से जबरन ही चर्मकारी का और मरे पशुओं के निपटान का कार्य अत्याचारपूर्वक कराया जानें लगा। भारत में चमार जाति का नाम इस घटनाक्रम और सिकंदर लोदी की ही उपज है। संत रविदास उस काल में हिन्दू शासकों में इतनें लोकप्रिय और सम्मानीय हुए कि प्रसिद्द मारवाड़ चित्तोड़ घराने की महारानी मीरा ने उन्हें अपना गुरु धारण किया। महारानी मीरा से रैदास की भक्ति में वे मीरा बाई कहलानें लगी। भक्त मीरा नें स्वरचित पदों में अनेकों बार संत रैदास का स्मरण गुरु स्वरूप किया है: - गुरु रैदास मिले मोहि पूरे, धुरसे कलम भिड़ी। सत गुरु सैन दई जब आके जोत रली।कह रैदास तेरी भगति दूरि है, भाग बड़े सो पावै तजि अभिमान मेटि आपा पर, पिपिलक हवै चुनि खावै।इसका अर्थ है कि ईश्वर भक्ति अहोभाग्य होती है। अभिमान शून्य रहकर काम करने वाला व्यक्ति जीवन में सफल रहता है जैसे कि विशाल हाथी शक्कर के कणों को चुनने में असमर्थ रहता है, जबकि लघु शरीर की पिपीलिका यानि चींटी इन कणों का सहजता से भक्षण कर लेती है। इस प्रकार अभिमान तथा बड़प्पन का भाव त्याग कर विनम्रतापूर्वक आचरण करने वाला मनुष्य ही ईश्वर भक्त हो सकता है।अपने सहज-सुलभ उदाहरणों वाले और साधारण भाषा में दिए जानें वाले प्रवचनों और प्रबोधनों के कारण संत रैदास भारतीय समाज में अत्यंत आदरणीय और पूज्यनीय हो गए थे। वे भारतीय वर्ण व्यवस्था को भी समाज और समय अनुरूप ढालनें में सफल हो चले थे। वे अपने जीवन के अन्तकाल तक धर्मांतरण के विरोध में समाज को जागृत किये रहे और वैदिक धर्म में घर वापसी का कार्य भी संपन्न कराते रहे। उन्होंने अपना सम्पूर्ण जीवन धर्म और राष्ट्र रक्षार्थ जिया और अत्यंत सम्मान पूर्वक चैत्र शुक्ल चतुर्दशी संवत 1584 को वे गौलोक वासी हो गये। संत रैदास ने भारतीय समाज को मन चंगा तो कठौती में गंगा जैसी कालजयी लोकोक्ति दी जिसके बड़े ही सकारात्मक अर्थ वर्तमान परिवेश में भी निकलते हैं। आज  उन्हें सच्ची श्रद्धांजलि केवल यह होगी कि इस भारत भूमि पर सभी वर्णों, जातियों, समाजों और वर्गों के मतावलंबी राष्ट्रहित में एक होकर वैदिक मार्ग अपनाये रहें। स्वामी विवेकानंद ने एक धर्मांतरण से एक राष्ट्र शत्रु के जन्म का जो विचार वर्तमान काल में प्रकट किया उसे संत रैदास नें छह सौ वर्ष पूर्व समझ लिया था और राष्ट्र को समझाने बताने हेतु देश के हर हिस्से में जाकर जागरण भी किया था। नमन इस अद्भुत संत को, राष्ट्रभक्त को और अनुपम भविष्यदृष्टा को।हिंद दी चादर कहलाने वाले गुरु तेगबहादुर जी : नौवें गुरु तेगबहादुर जी का जन्म पंजाब के अमृतसर में हुआ था। उनके बचपन का नाम त्यागमल था। उनके पिता का नाम गुरु हरगोबिंद सिंह जी था। वे बाल्यावस्था से ही संत स्वरूप गहन विचारवान, उदार चित्त, बहादुर व निर्भीक स्वभाव के थे।  जिन्होंने धर्म व मानवता की रक्षा करते हुए हंसते-हंसते अपने प्राणों की कुर्बानी दी। गुरु तेगबहादुर जी की शिक्षा-दीक्षा मीरी-पीरी के मालिक गुरु-पिता गुरु हरिगोबिंद साहिब की छत्र छाया में हुई। इसी समय इन्होंने गुरुबाणी, धर्मग्रंथों के साथ-साथ शस्त्रों तथा घुड़सवारी आदि की शिक्षा प्राप्त की।  8वें गुरु हरिकृष्ण राय जी की अकाल मृत्यु हो जाने की वजह से गुरु तेगबहादुर जी को गुरु बनाया गया था। मात्र 14 वर्ष की आयु में अपने पिता के साथ मुगलों के हमले के खिलाफ हुए युद्ध में उन्होंने अपनी वीरता का परिचय दिया। इस वीरता से प्रभावित होकर उनके पिता ने उनका नाम तेगबहादुर यानी तलवार के धनी रख दिया। एक समय की बात है। औरंगजेब के दरबार में एक विद्वान पंडित आकर गीता के श्लोक पढ़ता और उसका अर्थ सुनाता था, पर वह पंडित गीता में से कुछ श्लोक छोड़ दिया करता था। एक दिन पंडित बीमार हो गया और औरंगजेब को गीता सुनाने के लिए उसने अपने बेटे को भेज दिया किंतु उसे उन श्लोकों के बारे में बताना भूल गया जिनका अर्थ वहां नहीं करना था।उसके बेटे ने जाकर औरंगजेब को पूरी गीता का अर्थ सुना दिया जिससे औरंगजेब को यह स्पष्ट हो गया कि हर धर्म अपने आपमें एक महान धर्म है। पर औरंगजेब खुद के धर्म के अलावा किसी और धर्म की प्रशंसा नहीं सुन सकता था। उसके सलाहकारों ने उसे सलाह दी कि वह सबको इस्लाम धारण करवा दे। औरंगजेब को यह बात समझ में आ गई और उसने सबको इस्लाम धर्म अपनाने का आदेश दिया और कुछ लोगों को यह कार्य सौंप दिया। उसने कहा कि सबसे कह दिया जाए कि इस्लाम धर्म कबूल करो या मौत को गले लगाओ। जब इस तरह की जबरदस्ती शुरू हो गई तो अन्य धर्म के लोगों का जीना मुश्किल हो गया। इस जुल्म के शिकार कश्मीर के पंडित गुरु तेगबहादुर के पास आये और उन्हें बताया कि किस तरह ?इस्लाम धर्म स्वीकार ने के लिए दबाव बनाया जा रहा है और न करने वालों को तरह-तरह की यातनाएं दी जा रही हैं। हमारी बहू-बेटियों की इज्जत को खतरा है। जहां से हम पानी भरते हैं वहां हड्डियां फेंकी जाती है। हमें बुरी तरह मारा जा रहा है। कृपया आप हमारे धर्म को बचाइए। जिस समय यह लोग समस्या सुना रहे थे उसी समय गुरु तेगबहादुर के नौ वर्षीय सुपुत्र बाला प्रीतम (गुरु गोविंदसिंह) वहां आए और पिताजी से पूछा- पिताजी यह लोग इतने उदास क्यों हैं? आप इतनी गंभीरता से क्या सोच रहे हैं? गुरु तेग बहादुर ने कश्मीरी पंडितों की सारी समस्या बताई तो बाला प्रीतम ने कहा- इसका निदान कैसे होगा? गुरु साहिब ने कहा- इसके लिए  किसी महान व्यक्ति को बलिदान देना होगा। बाला प्रीतम ने कहा कि आपसे महान पुरुष मेरी नजर में कोई नहीं है, भले ही बलिदान देना पड़े पर आप हिन्दू धर्म को बचाइए। उसकी यह बात सुनकर वहां उपस्थित लोगों ने पूछा- अगर आपके पिता जी बलिदान दे देंगे तो आप अनाथ हो जाएंगे और आपकी मां विधवा हो जाएगी। बालक ने कहा कि अगर मेरे अकेले के अनाश होने से लाखों लोग अनाथ होने से बच सकते हैं और अकेले मेरी मां के विधवा होने से लाखों मां विधवा होने से बच सकती है तो मुझे यह स्वीकार है। फिर गुरु तेगबहादुर ने उन पंडितों से कहा कि जाकर औरंगजेब से कह ?दो ?अगर गुरु तेगबहादुर ने इस्लाम धारण कर लिया तो हम भी कर लेंगे और अगर तुम उनसे इस्लाम धारण नहीं करा पाए तो हम भी इस्लाम धारण नहीं करेंगे और तुम हम पर जबरदस्ती नहीं कर पाओगे।औरंगजेब ने इस बात को स्वीकार कर लिया। गुरु तेगबहादुर दिल्ली में औरंगजेब के दरबार में स्वयं चलकर गए। वहां औरंगजेब ने उन्हें तरह-तरह के लालच दिए। किंतु बात नहीं बनी तो उन पर बहुत सारे जुल्म किए। उन्हें कैद कर लिया गया, उनके दो शिष्यों को मारकर उन्हें डराने की कोशिश की, पर गुरु तेगबहादुर टस से मस नहीं हुए। उन्होंने औरंगजेब को समझा दी कि अगर तुम जबरदस्ती करके लोगों को इस्लाम धारण करने के लिए मजबूर कर रहे हो तो यह जान लो कि तुम खुद भी सच्चे मुसलमान नहीं हो क्योंकि तुम्हारा धर्म भी यह शिक्षा नहीं देता कि किसी पर जुल्म किया जाये। औरंगजेब को यह सुनकर बहुत गुस्सा आया। उसने दिल्ली के चांदनी चौक पर गुरु साहिब के शीश को काटने का हुक्म दे दिया और गुरु साहिब ने हंसते-हंसते अपना शीश कटाकर बलिदान दे दिया। इसलिए गुरु तेगबहादुरजी की याद में उनके शहीदी स्थल पर एक गुरुद्वारा बना है, जिसका नाम गुरुद्वारा शीश गंज साहिब है। हिन्दुस्तान और हिन्दू धर्म की रक्षा करते हुए शहीद हुए गुरु तेगबहादुरजी को प्रेम से कहा जाता है- हिन्द की चादर, गुरु तेगबहादुर।प्राण त्याग दिये परंतु धर्म नहीं बदला : गुरु गोबिंद सिंह के चारों साहिबजादों की शहादत का इतिहास, जिनके बलिदान पर वीर बाल दिवस मनाया जायेगा। मुगलों ने श्री गुरु गोबिंद सिंह जी से बदला लेने के लिए जब सरसा नदी पर हमला किया तो गुरु जी का परिवार उनसे बिछड़ गया था। छोटे साहिबजादे बाबा जोरावर सिंह और बाबा फतेह सिंह और माता गुजरी अपने रसोईए गंगू के साथ उसके घर मोरिंडा चले गये। वजीर खां ने छोटे साहिबजादे बाबा जोरावर सिंह बाबा फतेह सिंह तथा माता गुजरी जी को पूस महीने की तेज सर्द रातों में तकलीफ देने के लिए ठंडे बुर्ज में कैद कर दिया। यह चारों ओर से खुला और ऊंचा था। इस ठंडे बुर्ज से ही माता गुजरी जी ने छोटे साहिबजादों को लगातार तीन दिन धर्म की रक्षा के लिए शीश न झुकाने और धर्म न बदलने का पाठ पढ़ाया था। यही शिक्षा देकर माता गुजरी जी साहिबजादों को नवाब वजीर खान की कचहरी में भेजती रहीं। 7 व 9 वर्ष से भी कम आयु के साहिबजादों ने न तो नवाब वजीर खां के आगे शीश झुकाया और न ही धर्म बदला। इससे गुस्साए वजीर खान ने 26 दिसंबर, 1705 को दोनों साहिबजादों को जिंदा दीवार में चिनवा दिया था। जब छोटे साहिबजादों की कुर्बानी की सूचना माता गुजरी जी को ठंडे बुर्ज में मिली तो उन्होंने भी शरीर त्याग दिया।इसी स्थान पर आज गुरुद्वारा श्री फतेहगढ़ साहिब बना है। इसमें बना ठंडा बुर्ज सिख इतिहास की पाठशाला का वह सुनहरी पन्ना है, जहां साहिबजादों ने धर्म की रक्षा के लिए शहादत दी थी। मासूम साहिबजादों की इस शहादत ने सभी को हिला कर रख दिया था। कहा जाता है छोटे साहिबजादों की शहादत ही आगे चलकर मुगल हकूमत के पतन का कारण बनी थी। श्री गुरु गोबिंद सिंह के चार साहिबजादों में दो अन्य चमकौर की जंग में शहीद हुए थे। गुरु गोबिद ने अपने दो पुत्रों को स्वयं आशीर्वाद देकर जंग में भेजा था। चमकौर की जंग में 40 सिखों ने हजारों की मुगल फौज से लड़ते हुए शहादत प्राप्त की थी। 6 दिसंबर, 1705 को हुई इस जंग में बाबा अजीत सिंह (17) व बाबा जुझार सिंह (14) ने धर्म के लिए बलिदान दिया था। (लेखक झारखंड विहिप के प्रांत मंत्री हैं।)

दारू : जरगा में चार बिरहोर परिवार के सोलह सदस्यों ने इसाई धर्म छोड़ की धर्म वापसी
Published / 2022-12-21 19:05:19
दारू : जरगा में चार बिरहोर परिवार के सोलह सदस्यों ने इसाई धर्म छोड़ की धर्म वापसी

वैदिक मंत्रोच्चारण के साथ विधिवत रूप से हुई घर वापसी मुखिया अनिल देव और सांसद प्रतिनिधि मिठू रविदास के नेतृत्व व पहल से हुआ कार्यक्रमटीम एबीएन, दारू (हजारीबाग)। दारू प्रखंड में धर्मांतरण के बढ़ते मामलों के बीच गुरुवार को पुनाई पंचायत के जरगा विरहोर टोला के चार परिवार के सोलह सदस्यों ने इसाई धर्म छोड़कर वापस अपने धर्म मे शामिल हुए। पुनाई पंचायत के मुखिया अनिल कुमार देव और कोडरमा सांसद प्रतिनिधि मिठू कुमार रविदास की पहल और नेतृत्व में यह कार्यक्रम सफल रहा। गुरुकुल विद्यालय के शिक्षक और स्कूली बच्चियों ने वेदिक मंत्रोचारण कर उनकी शुद्धि और घर वापसी का विधिवत कार्यक्रम सम्पन्न कराया।  मुखिया अनिल ने धर्म मे वापसी कर रहे सभी लोगों को भगवा गमछा पहनाकर अपने धर्म में वापसी करवाई। गुरुकुल के शिक्षक ने हवन करवाकर पूरे क्षेत्र की सुधि कराई। अपने धर्म मे वापस लौट रहे सभी युवा, महिला व बच्चों के मुखिया अनिल, हर्ष अजमेरा, लखन जायसवाल, हरीश श्रीवास्तव, जिला पार्षद गीता देवी, प्रमुख कुमारी स्वेता ने  सभी के पैर धोकर वापसी कराई।मंत्रोचारण के दौरान पूरा क्षेत्र जय श्री राम के नारों से गुंजायमान हो गया। धर्म परिवर्तन किए विरहोर जाती के लोगों ने कहा कि उन्हें लोभ लालच देकर धर्म परिवर्तन कराया गया था  और अब वो कभी भी किसी अन्य से धर्म से नहीं जुड़ेंगे। आरोग्यम अस्पताल के मालिक हर्ष अजमेरा ने बिरहोर परिवार के बीच कंबल का वितरण किया साथ ही भविष्य में भी हर संभव मदद का भरोसा दिया।  इस कार्यक्रम में जयंत सिन्हा के सांसद प्रतिनिधि सुरेश प्रसाद, रंजीत कुमार सिन्हा, अजीत कुमार, सुबोध कुमार शिवगीत, सावन कुमार, राजेश कुमार, प्रदीप यादव, जगतपाल राणा आदि मौजूद थे।

नया साल 2023 को लेकर देवघर में तैयारियां शुरू
Published / 2022-12-21 13:59:34
नया साल 2023 को लेकर देवघर में तैयारियां शुरू

नववर्ष से लेकर शिवरात्रि तक लगा रहेगा भक्तों का तांताटीम एबीएन, देवघर/ रांची। देवघर में नये साल बसंत पंचमी और शिवरात्रि को लेकर बाबा मंदिर देवघर में अप्रत्याशित भीड़ श्रद्धालुओं की उमड़ती है, जिसको लेकर देवघर डीसी मंजूनाथ भजंत्री देवघर एसपी सुभाष चंद्र जाट और नगर आयुक्त शैलेंद्र कुमार लाल के अलावा विद्युत विभाग और अन्य विभागों के अधिकारियों के साथ बाबा मंदिर क्षेत्र के रूट लाइन का निरीक्षण किया गया।शिवरात्रि तक के लिए हो रही तैयारी : देवघर डीसी मंजूनाथ भजंत्री ने कहा कि आगामी बसंत पंचमी एक जनवरी और शिवरात्रि को लेकर पहले से ही तैयारियां शुरू कर दी गई है। इन दिनों श्रद्धालुओं की संख्या काफी बढ़ जाती है और अफरा-तफरी की स्थिति बन जाती है। श्रावणी मेले के सफल संचालन के बाद अब देवघर जिला प्रशासन की कोशिश है कि इन 3 दिनों के लिए बेहतर व्यवस्था हो जिसके लिए बाबा मंदिर से लेकर बीएड कॉलेज तक रूट लाइन का निरीक्षण किया गया जिनमें मुख्य रूप से रूट लाइन में पड़ने वाले अतिक्रमण को हटाने का निर्देश दिया गया है।श्रद्धालु करते हैं बाबानगरी का रूख : नये साल पर बहुत सारे श्रद्धालु बाबा धाम देवघर का रुख करते हैं। ऐसे में साल के पहले दिन यहां काफी भीड़ जुट जाती है। इसी तरह बसंत पंचमी का भी मौका खास होता है, इस दिन महादेव शिव को अबीर-गुलाल लगाने का प्रचलन है। इसलिए लोगों की भीड़ बढ़ती है।निगम को साफ-सफाई का निर्देश जारी : इसके अलावा निगम को जगह-जगह पेयजल की व्यवस्था और साफ सफाई करने का निर्देश जारी किया गया है। रूट लाइन में विद्युत व्यवस्था को दुरुस्त करने के लिए विद्युत विभाग को भी आवश्यक दिशा निर्देश दिये गये हैं। वहीं देवघर एसपी सुभाष चंद्र जाट ने कहा कि रूट लाइन मैं निरीक्षण करने के उपरांत यह तय किया जा रहा है कि कितने फोर्स को यहां ड्यूटी पर तैनात करना है और कितने एडिशनल फोर्स की प्रतिनियुक्ति की जा सकती है। सुरक्षा के मद्देनजर हर व्यवस्था दुरुस्त की जायेगी।

भारतीय योग मनुष्य को स्वस्थ के साथ उनके नैतिक गुणों को भी पुष्ट करता है : स्वामी मुक्तरथ
Published / 2022-12-20 20:42:05
भारतीय योग मनुष्य को स्वस्थ के साथ उनके नैतिक गुणों को भी पुष्ट करता है : स्वामी मुक्तरथ

टीम एबीएन, रांची। उषा-मार्टिन फाउंडेशन अपने राज्य के प्रतिष्ठित संस्थान सत्यानन्द योग मिशन के सौजन्य से सुदूरवर्ती ग्रामीण क्षेत्रों में लोगों के स्वास्थ्य को संवारने में जुटे हुए हैं। न केवल स्वाथ्य बल्कि ग्रामीण स्तर को ऊंचा उठाने में उनके मन:स्थिति को मजबूत करने, उनमें नैतिक गुणों को विकसित करने हेतू जगह-जगह शिविर का आयोजन कर रहे हैं। आज टाटीसिलवे मध्य विद्यालय प्रांंगण में योग शिविर में शिक्षकों और सैकड़ों बच्चों को संबोधित करते हुए स्वामी मुक्तरथ ने कहा कि बचपन में मिले संस्कार जीवन भर मनुष्य के काम आता है। योग से शरीर,मन और हृदय तीनों स्वस्थ होते हैं। वर्तमान में बढ़ते मनोरोग, उच्च रक्तचाप, हृदय रोग, मधुमेह, थायराइड, बच्चों में बढ़ता डिप्रेशन, हेडेक, माइग्रेन, अनिद्रा को प्राणयाम और ध्यान के जरिये पूर्णत: रोका जा सकता है और ऐसे गंभीर रोगों को ठीक भी किया जा सकता है। व्यक्ति को सबसे पहले वैचारिक और व्यावहारिक रूप से स्वस्थ होने की जरूरत है। आज टाटीसिलवे मध्य विद्यालय और अनगड़ा प्रखंड के अंतर्गत सानू मध्य विद्यालय में सैकड़ों बच्चों ने सूर्यनमस्कार, ताड़ासन, शशांकासन, उष्ट्रासन, योगमुद्रा आसन, नाड़ीशोधन, भ्रामरी और कपालभाति के अभ्यासों को कराया गया। स्वामी मुक्तरथ के टीम में पियुष कुमार, सुमित कुमार, अवनीश कुमार, और माधव योग सिखाने का कार्य कर रहे हैं।उषा मार्टिन फाउंडेशन के सचिव डॉ मयंक मुरारी और शालिनी हॉस्पिटल के राणा बिकाश इस कार्यक्रम को कराने में पूरी तन्मयता से जुटे हुए हैं।

ग्रामीणों के स्वास्थ्य लाभ के लिए उषा मार्टिन लगवा रही योग शिविर
Published / 2022-12-20 17:54:23
ग्रामीणों के स्वास्थ्य लाभ के लिए उषा मार्टिन लगवा रही योग शिविर

टीम एबीएन, रांची। उषा-मार्टिन कंपनी ग्रामीण क्षेत्र के लोगों के स्वास्थ्य को लेकर बेहद चिंतित है। इसे लेकर सत्यानंद योग मिशन के सौजन्य से वह ग्रामीण लोगों को स्वास्थ्य और नैतिकता के स्तर को ऊंचा उठाने हेतू सुदूर गांव में स्वास्थ्य रक्षा के लिए योग शिविर आयोजित करवा रही है। इसमें लोगों की भी बेहद सक्रियता देखी जा रही है।

जनवरी में कितने दिन बंद रहेंगे बैंक, देखें लिस्ट...
Published / 2022-12-19 22:53:12
जनवरी में कितने दिन बंद रहेंगे बैंक, देखें लिस्ट...

एबीएन सोशल डेस्क। भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआइ) के हॉलिडे कैलेंडर के अनुसार, देश में बैंक अगले साल जनवरी में 11 दिनों के लिए बंद रहेंगे। इन छुट्टियों (हॉलिडे) में कुछ त्योहार, रविवार और दूसरा और चौथा शनिवार शामिल हैं।बताते चलें कि महीने के दूसरे और चौथे शनिवार को भारत में बैंक बंद रहते हैं। इसके अलावा, पब्लिक हॉलिडे, नेशनल हॉलिडे और रीजनल हॉलिडे (जो अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग होते हैं) पर बैंक बंद रहते हैं। ऐसे में अगर आप पहले से ही बैंक हॉलिडे के बारे में जानते हैं तो आपके लिए बैंक के कामों को सही समय पर निपटना आसान हो जायेगा।जनवरी में पड़ने वाली छुट्टियों पर एक नजर :1 जनवरी 2023: नया साल5 जनवरी 2023: गुरु गोबिंद सिंह जयंती (हरियाणा, राजस्थान)11 जनवरी 2023: मिशनरी दिवस (मिजोरम)12 जनवरी 2023: स्वामी विवेकानंद जयंती (पश्चिम बंगाल)14 जनवरी 2023: मकर संक्रांति (कई राज्य)15 जनवरी 2023: पोंगल/माघ बिहू (आंध्र प्रदेश, पुडुचेरी, तमिलनाडु, असम)22 जनवरी 2023: सोनम लोसर (सिक्किम)23 जनवरी 2023: नेताजी सुभाष चंद्र बोस जयंती (त्रिपुरा, पश्चिम बंगाल)25 जनवरी 2023: राज्य दिवस (हिमाचल प्रदेश)26 जनवरी 2023: गणतंत्र दिवस (पूरे भारत में)31 जनवरी 2023: मी-डैम-मी-फी (असम)

बरकट्ठा : न तिलक-दहेज, न जात-पात, जानें क्या है रमेणी विवाह...
Published / 2022-12-19 18:26:06
बरकट्ठा : न तिलक-दहेज, न जात-पात, जानें क्या है रमेणी विवाह...

टीम एबीएन, बरकट्ठा/ हजारीबाग। एक तरफ कहीं न कहीं दहेज के लिए लड़कियों को हत्या जैसी खबर सुनने को मिलती है। वहीं दूसरे ओर समाज में ऐसे कई लोग है जो लड़कियों के लिए वरदान साबित होते हैं। आज हम बात कर रहे हैं बरकट्ठा प्रखंड के ग्राम पंचायत कपका निवासी देवशंकर पंडित पिता वेदों दास व लड़की काजल कुमारी पिता स्व भोला दास अटका बिहारो निवासी की। जो सात सात फेरे लिये। समाज में इनकी चर्चा खूब हो रही है।  स्थानीय सेवादारों ने बताया कि शादी महज 17 मिनट में हुई। इसे रमेणी विवाह कहते हैं। जात पात, ऊंच नीच नहीं देखा जाता है। कोई लेन-देन नहीं हुई है। सादगी से शादी संपन्न हुई है। शादी के बाद दूल्हा दुल्हन को धार्मिक पुस्तक भेंट की गई। कपका में शादी की रस्में पूरी की गई। मौके पर पंचायत समिति सदस्य डालेश्वर पंडित, महावीर पंडित, मनोज पंडित, नागेश्वर पंडित, बसंत पंडित, टेको पंडित, संतोष पंडित, हीरालाल पंडित, रामलाल पंडित, रूपलाल पंडित, सुरेंद्र पंडित, अशोक सिंह के अलावे कुम्हार जाति के लोग उपस्थित थे। 

गुड न्यूज : जल्द निकलेगा कैंसर, अल्जाइमर और झांप क जहर का तोड़
Published / 2022-12-19 10:25:18
गुड न्यूज : जल्द निकलेगा कैंसर, अल्जाइमर और झांप क जहर का तोड़

इनका काट निकालने में जुटा राष्ट्रीय जैव आयुर्विज्ञान संस्थान एबीएन सेंट्रल डेस्क। हैदराबाद में शुरू हुए राष्ट्रीय जैव आयुर्विज्ञान संस्थान में अल्जाइमर, कैंसर और सांप के जहर जैसी जानलेवा परेशानियों का समाधान तलाशा जाएगा। केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री डॉ मनसुख मांडविया ने शनिवार को इसका उद्धाटन किया था।नई दिल्ली स्थित भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (आईसीएमआर) के अधीन राष्ट्रीय जैव अनुसंधान संस्थान जंतु संसाधन सुविधा (एनएआरएफबीआर) भारत सहित पूरे दक्षिण एशिया में सबसे बड़ा संस्थान है, जहां दवाओं से लेकर प्री क्लिनिकल ट्रायल तक होंगे जिन्हें एनिमल ट्रायल भी कहा जाता है। आईसीएमआर से मिली जानकारी के अनुसार इस संस्थान में घोड़े, बंदर, कुत्ते, चूहे, खरगोश सभी के लिए अलग अलग स्थान है।घोड़ों पर रिसर्च करके यहां सांप के जहर सहित कई तरह के एंटी सीरम तैयार हो सकेंगे। वहीं, बंदरों पर रिसर्च से अल्जाइमर जैसी बीमारियों का इलाज तलाशा जायेगा। बीते कई वर्ष से चीन अपने यहां इसी तरह की लैब में बंदरों पर रिसर्च कर रहा है। इसके अलावा, कैंसर या अन्य संक्रामक रोगों के लिए यहां खरगोश, चूहों पर रिसर्च किया जाएगा। आईसीएमआर के एक वरिष्ठ वैज्ञानिक ने बताया कि इस तरह की लैब से अभी तक चीन, यूके या फिर अमेरिका के विज्ञान को बढ़ावा मिल रहा था लेकिन अब भारत में भी जैव रिसर्च के लिए हमारे पास अत्याधुनिक केंद्र है जिसका इस्तेमाल उन बीमारियों के लिए किया जायेगा जिनका इलाज मेडिकल साइंस में अब तक नहीं पता है। हरियाणा के मानेसर स्थित राष्ट्रीय अनुसंधान केंद्र में अल्जाइमर जैसी बीमारियों पर रिसर्च चल रहा है, लेकिन इस लैब से ये अनुसंधान काफी आसान होंगे।उन्होंने बताया कि कोरोना में जिस तरह भारत ने जांच, इलाज और वैक्सीन की खोज में अपनी ताकत का परिचय दिया, उसी तरह अन्य बीमारियों के लिए भी भारतीय वैज्ञानिकों की खोज इस संस्थान के बनने से आयान होंगी। आईसीएमआर के अनुसार, बायोमेडिकल रिसर्च में पशुओं का अध्ययन जरूरी है। क्यूंकि इससे पशुजन्य व अन्य बीमारियों के कारण जानने और उनकी जांच व उपचार में मदद मिलती है।वैज्ञानिकों के अनुसार, हैदराबाद में 100 एकड़ से भी ज्यादा क्षेत्र में फैले इस संस्थान में 20 से भी ज्यादा इमारत हैं जिनमें अलक अलग पशुओं को क्वारंटीन किया जा रहा है। देश के बाकी अनुसंधान केंद्रों को भी अपने रिसर्च के लिए यह संस्थान एक सहायक की भूमिका में रहेगा और देश के अध्ययनों को लीड करेगा।

जय श्री हरि, जय श्री राम, जय श्री कृष्ण के जयकारों से गूंज उठा शहर
Published / 2022-12-18 21:13:16
जय श्री हरि, जय श्री राम, जय श्री कृष्ण के जयकारों से गूंज उठा शहर

कलश यात्र में 501 पीताम्बरधारी महिलाएं कलश धारण कर चलीएबीएन सोशल डेस्क। देव भूमि भारत में शाश्वत, मृत्युजयी व सार्वभौम संस्कृति का अखण्ड प्रवाह विद्यमान है। इस का स्वलप आचरण ही मानव प्रबुद्ध को विवेकवान बना सकता है। मानवीय स्वभाव में पुनः धर्म का आरोहण करने हेतू दिव्य ज्योति जाग्रति संस्थान सदैव कार्यरत रहा है। इसी श्रृंखला के अंतर्गत संस्थान द्वारा माता वैष्णो देवी नगर पुनदाग नजदीक पुनदाग थाना रांची में दिनांक 19 दिसंबर से 23 दिसंबर दोपहर 2 से शाम 5 बजे तक श्री हरि कथा का भव्य आयोजन किया जा रहा हैै।इस आयोजन में दिव्य गुरू श्री आशुतोष महाराज जी की शिष्य एवं शिष्याएं कथा का वाचन करेंगी। जिसमें जनमानस को भारतीय संस्कृति की गरिमा एवं प्रतिष्ठा से जागरूक करवानें हेतू आज दिव्य ज्योति जाग्रति संस्थान के पुनदाग टीओ पी के पास माता वैष्णो देवी नगर आश्रम से विशाल मंगल कलश यात्र निकाली गयी। कलश यात्रा का शुभारंभ श्री रामाशीष यादव सदस्य मानव कल्याण आयोग भारत सरकार ने ध्वज दिखा कर किया। जिसमें 501 पीताम्बर धारी महिलाएं कलश धारण करके चली और सैंकड़ो की संख्या में बढ़ चढ़ भक्तों नें शिरकत की। उनके कंठ से मुखरित हो रहे जय श्री राम के जयघोष पूरे शहर को अहलादित कर रहे थे। कलश यात्रा गंगा की मानिंद प्रवाहित होती हुई वातावरण के कलुषित हृदय को पवित्र व निर्मल बनाती जा रही थी। कथा का संदेश सर्वत्र वितरित करते हुए व विश्व शांति की कामना का प्रचार, प्रसार करते हुए कथा स्थल पहुंचीं। तत्पश्चात् श्री हरी नारायणजी का पूजन अशोक सिंह (डीएसपी), प्रमोद साहू, प्रोफेसर विजय प्रकाश, राजीव रंजन मिश्रा एवं सतीश गुप्ता अपने अर्धांगिनी संग बैठ पूजन किये। हमारे शास्त्रों में आता है कि कलश के अग्रभाग में देवताओं का निवास होता है एवं यह कलश हमारे मस्तिष्क में स्थित अमृृृत का प्रतीक है और यह यात्र हमें इंगित करती है उस दिव्य अमृत को प्राप्त करने की ओर। शहर में विभिन्न स्थानों पर कलश यात्रा का भव्य स्वागत् किया गया। यह जानकारी संस्थान के प्रचारक स्वामी यादवेंद्रानंद जी ने दिया।

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