Breaking
ताज़ा समाचार लोड हो रहा है...
लाइव: 43
होम ई-पेपर देश झारखंड खेल समाचार राज काज कानून व्यवस्था करियर बिजनेस वर्ल्ड हेल्थ विचार ज्ञान विज्ञान समाज वन और पर्यावरण मनोरंजन बिहार विज्ञापन

ज्ञान विज्ञान

View All
ऑस्कर ट्रॉफी : किसकी होती है मूर्ति, क्या है सही कीमत...
Published / 2022-03-28 18:01:22
ऑस्कर ट्रॉफी : किसकी होती है मूर्ति, क्या है सही कीमत...

एबीएन डेस्क। फिल्म जगत के लोगों के लिए एकेडमी अवॉर्ड यानी ऑस्कर सबसे अहम पुरस्कारों में से एक है। आज 94वें ऑस्कर अवॉर्ड्स की घोषणा की जा रही है, जिसपर सभी सिनेमा प्रेमियों की निगाहें टिकी हैं। अगर भारत की बात करें तो एंटरटेनमेंट वर्ल्ड के सबसे बड़े अवॉर्ड के लिए भारत की तरफ से तमिल फिल्म कूजांगल को नॉमिनेट किया गया है। आप ऑस्कर अवॉर्ड्स के विजेताओं की लिस्ट तो देख ही रहे होंगे, लेकिन ऑस्कर अवॉर्ड्स से जुड़ी ऐसी बातें हैं, जो आपको जानना जरूरी है और काफी दिलचस्प भी हैं। ऐसे में आज हम आपको ऑस्कर की ट्रॉफी के बारे में बता रहे हैं, जिसे पाने का हर फिल्ममेकर या कलाकार का सपना होता है। तो जानते हैं कि आखिर ऑस्कर अवॉर्ड्स की जो ट्रॉफी मिलती है, उसमें किसकी मूर्ति होती है और इस खास ट्रॉफी की क्या कहानी है… मूर्ति के पीछे कौन है? बता दें कि पहला ऑस्कर अवॉर्ड इवेंट 16 मई 1929 को आयोजित किया गया था। सन 1927 में एकेडमी ऑफ मोशन पिक्चर्स आर्ट्स एंड साइंसेज की मीटिंग में पहली बार ट्रॉफी के डिजाइन पर चर्चा की गई। इस दौरान लॉस एंजिल्स के कई कलाकारों से अपने-अपने डिजाइन सामने रखने को कहा गया। इस दौरान मूर्तिकार जॉर्ज स्टैनली की बनाई हुई मूर्ति को पसंद किया गया। रिपोर्ट्स के अनुसार, ऑस्कर अवॉर्ड में जो ट्रॉफी दी जाती है कहते हैं कि उसकी प्रेरणा मैक्सिकन फिल्ममेकर और एक्टर एमिलियो फर्नांडीज थे। ऐसे में माना जाता है कि इस मूर्ति के पीछे फर्नांडीज है और ये उनकी ही तस्वीर है। क्या है मूर्ति बनने की कहानी : बता दें कि साल 1904 को मैक्सिको के कोआहुइलिया में जन्में एमिलियो मैक्सिको की क्रांति के दौर में बड़े हुए। हाई स्कूल ड्रॉप आउट फर्नांडीज, ह्यूरितिस्ता विद्रोहियों के ऑफिसर बन गए। उन्हें सजा भी सुनाई गई, लेकिन वो वहां से भाग गए। इसके बाद फर्नांडीज, हॉलीवुड में एक्स्ट्रा वर्क करने लगे। यहां पर उन्हें साइलेंट फिल्म स्टार डोलोरेस डेल रियो ने एल इंडियो नाम दिया था। वह एक्ट्रेस रियो के अच्छे दोस्त बन गए थे। रियो मेट्रो गोल्डविन मेयर स्टूडियो के आर्ट डायरेक्टर और एकेडमी ऑफ मोशन पिक्चर्स आर्ट्स एंड साइंसेज के सदस्य कैड्रिक गिबॉन्स की पत्नी थीं। डेल रियो ने फर्नांडीज को गिबॉन्स से मिलवाया जो उस समय स्टैच्यू की डिजाइन पर काम कर रहे थे। गिबॉन्स ने फर्नांडीज से एक स्केच के लिए पोज देने के लिए कहा जो 8.5 पौंड के वजन वाली ट्रॉफी का आधार था। फर्नांडीज ने बेमन ने पोज दिया और वो आइकॉनिक पोज हो गया। जॉर्ज स्टैनली इसे तैयार किया और लॉस एंजिल्स में सन् 1929 में हुए पहले ऑस्कर समारोह में यही ट्रॉफी सौंपी गई। इसलिए इस ऑस्कर की ट्रॉफी के पीछे फर्नांडीस को माना जाता है। क्या एक डॉलर है इसकी कीमत? ऑस्कर के नियम के अनुसार ऑस्कर विजेता उसकी ट्रॉफी का पूरा मालिकाना हक नहीं होता है। विजेता ट्रॉफी को चाहकर भी कहीं और नहीं बेच सकता। अगर कोई विजेता इस ट्रॉफी को बेचना चाहता है तो तो सबसे पहले यह इस ट्रॉफी को देने वाली अकेडमी को ही बेचना होगा। वहीं एकेडमी इस ट्रॉफी को सिर्फ 1 डॉलर में ही खरीदेगी। इसलिए इस ट्रॉफी की कीमत एक डॉलर मानी जाती है। हालांकि, इसके बनाए जाने की खर्चे की बात करें तो इसमें काफी खर्चा होता है। ऑस्कर में भारत का प्रदर्शन : 94 सालों से चले आ रहे इस अवॉर्ड में अब तक भारत की चार फिल्मों को जगह मिल चुकी है- मदर इंडिया, सलाम बॉम्बे, श्वास (मराठी) और लगान। पहला ऑस्कर अवॉर्ड 1929 में आयोजित किया गया था, वहीं साल 1957 से भारत की फिल्में ऑस्कर के लिए भेजी जा रही हैं।

2023 से "फ्लीट मोड" में एक साथ 10 परमाणु ऊर्जा संयंत्रों का निर्माण शुरू करेगा भारत
Published / 2022-03-27 14:15:52
2023 से "फ्लीट मोड" में एक साथ 10 परमाणु ऊर्जा संयंत्रों का निर्माण शुरू करेगा भारत

एबीएन सेंट्रल डेस्क। कर्नाटक के कैगा में 2023 में 700 मेगावाट के परमाणु ऊर्जा संयंत्र के लिए नींव डालने के साथ भारत अगले तीन वर्षों में फ्लीट मोड में एक साथ 10 परमाणु रिएक्टरों के निर्माण कार्यों को गति देने के लिए तैयार है। नींव के लिए कंक्रीट डालने (एफपीसी) के साथ परमाणु ऊर्जा रिएक्टरों का निर्माण अब पूर्व-परियोजना चरण से आगे बढ़कर निर्माण को गति देने का संकेत है, जिसमें परियोजना स्थल पर उत्खनन गतिविधियां शामिल हैं। परमाणु ऊर्जा विभाग (डीएई) के अधिकारियों ने विज्ञान और प्रौद्योगिकी पर संसदीय समिति को बताया, कैगा इकाइयों 5 और 6 का एफपीसी 2023 में अपेक्षित है, गोरखपुर हरियाणा अणु विद्युत परियोजन इकाइयों 3 और 4 और माही बांसवाड़ा राजस्थान परमाणु ऊर्जा परियोजना इकाई 1 से 4 का एफपीसी 2024 में अपेक्षित है और 2025 में चुटका मध्य प्रदेश परमाणु ऊर्जा परियोजना इकाइयों 1 और 2 का एफपीसी होने की संभावना है। केंद्र ने जून 2017 में 700 मेगावाट के 10 स्वदेशी विकसित दबावयुक्त भारी जल संयंत्र (पीएचडब्ल्यूआर) के निर्माण को मंजूरी दी थी। ये 10 पीएचडब्ल्यूआर 1.05 लाख करोड़ रुपये की लागत से बनाए जाएंगे। यह पहली बार है जब सरकार ने लागत कम करने और निर्माण के समय में तेजी लाने के उद्देश्य से एक बार में 10 परमाणु ऊर्जा रिएक्टरों के निर्माण को मंजूरी दी थी। डीएई अधिकारी कहा कि फ्लीट मोड परियोजनाओं के लिए थोक स्तर पर खरीद की जा रही थी जिसमें स्टीम जेनरेटर, एसएस 304 एल जाली ट्यूब और एंड शील्ड के लिए प्लेट, प्रेशराइजर फोर्जिंग, ब्लीड कंडेनसर फोर्जिंग, 40 स्टीम जनरेटर के लिए इंकोलॉय-800 ट्यूब, रिएक्टर हेडर के निर्माण के लिए ऑर्डर दिए गए थे। उन्होंने कहा कि गोरखपुर इकाई 3 और 4 तथा कैगा इकाई 5 और 6 के टरबाइन आइलैंड के लिए इंजीनियरिंग, खरीद और निर्माण पैकेज प्रदान किए गए हैं। फ्लीट मोड के तहत पांच साल की अवधि में एक परमाणु ऊर्जा संयंत्र के निर्माण की उम्मीद है।

बालासोर : सतह से हवा में मारने वाली मिसाइल का परीक्षण सफल
Published / 2022-03-27 12:35:31
बालासोर : सतह से हवा में मारने वाली मिसाइल का परीक्षण सफल

एबीएन सेंट्रल डेस्क। भारत ने आज ओडिशा के बालासोर तट पर मध्यम दूरी की सतह से हवा में मार करने वाली मिसाइल वायु रक्षा प्रणाली (का सफल परीक्षण किया है। यह परीक्षण बालासोर तट पर किया गया है। इसकी जानकारी DRDO के एक अधिकारी ने दी है। उन्होंने बताया कि यह एयर डिफेंस सिस्टम भारतीय सेना का हिस्सा है। अधिकारी ने कहा कि इस परीक्षण में मिसाइल ने काफी दूर से ही अपने टारगेट पर सीधा हमला कर दिया। इससे पहले, भारत ने 23 मार्च को सतह से सतह पर मार करने वाली ब्रह्मोस सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल का सफल परीक्षण किया था। यह परीक्षण अंडमान और निकोबार द्वीपसमूह में किया गया था। रक्षा अधिकारी ने इस बात की जानकारी दी थी। उन्होंने बताया था कि इस मिसाइल ने सीधे अपने टारगेट को अचीव किया। एयर चीफ मार्शल वीआर चौधरी ने इस सतह से सतह पर मार करने वाली सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल के सफल परीक्षण पर बधाई भी दी थी। डिफेंस सेक्टर पर लगातार जोर दे रहा भारत : गौरतलब है कि भारत लगातार अपने डिफेंस बजट को बढ़ा रहा है। देश का फोकस डिफेंस सेक्टर में आत्मनिर्भर बनने का है। इसलिए केंद्र सरकार भारत के डिफेंस इंपोर्ट (आयात) को घटाने और एक्सपोर्ट (निर्यात) को बढ़ाने के लिए लगातार काम कर रही है। पिछले आठ सालों में भारत के हथियार निर्यात में 6 गुना उछाल आया है। चालू वित्त वर्ष में भारत ने अब तक 11607 करोड़ रुपए के हथियार का निर्यात किया है। रक्षा राज्य मंत्री अजय भट्ट ने लोकसभा में इसकी जानकारी दी थी। उन्होंने बताया था कि वित्त वर्ष 2014-15 में भारत ने 1941 करोड़ के हथियार का निर्यात किया था जो वित्त वर्ष 2021-22 में अब 11,607 करोड़ रुपए पर पहुंच गया है।

पहली बार... इंसान के खून में मिले प्लास्टिक के टुकड़े से टेंशन में शोधकर्ता
Published / 2022-03-27 12:03:39
पहली बार... इंसान के खून में मिले प्लास्टिक के टुकड़े से टेंशन में शोधकर्ता

एबीएन सेंट्रल डेस्क। शोधकर्ताओं के सामने इंसानी खून को लेकर चौंकाने वाला मामला सामने आया है। शोधकर्ताओं को पहली बार इंसानी खून में प्लास्टिक के टुकड़े मिले हैं जो अति सूक्ष्म यानि माइक्रोप्लास्टिक हैं। इस शोध के लिए नीदरलैंड के वैज्ञानिकों ने 22 गुमनाम स्वस्थ वयस्क डोनर्स से रक्त के नमूने लिए और पाया कि इनमें से 17 (77.2%) के रक्त में माइक्रोप्लास्टिक था। इस खोज को "बेहद चिंताजनक" बताया जा रहा है। इससे पहले माइक्रोप्लास्टिक्स मस्तिष्क, आंत, अजन्मे बच्चों के प्लेसेंटा और वयस्कों और शिशुओं के मल में पाए गए हैं, लेकिन रक्त के नमूनों से पहले कभी नहीं पाया गया। अध्ययन में पांच प्रकार के प्लास्टिक का हुआ परीक्षण नीदरलैंड में व्रीजे यूनिवर्सिटिट एम्स्टर्डम में अध्ययन लेखक प्रोफेसर डिक वेथाक ने बताया कि हमें अनुसंधान का विस्तार करना होगा और नमूना आकार, मूल्यांकन किए गए पॉलिमर की संख्या आदि में वृद्धि करनी होगी। जर्नल एनवायरनमेंट इंटरनेशनल में प्रकाशित इस अध्ययन में पांच प्रकार के प्लास्टिक - पॉलीमेथाइल मेथैक्रिलेट (पीएमएमए), पॉलीप्रोपाइलीन (पीपी), पॉलीस्टाइनिन (पीएस), पॉलीइथाइलीन (पीई), और पॉलीइथाइलीन टेरेफ्थेलेट (पीईटी) के लिए परीक्षण किया गया। शोधकर्ताओं ने पाया कि रक्त के 50 प्रतिशत नमूनों में पॉलीइथाइलीन टेरेफ्थेलेट (पीईटी) था। नमूनों में यह सबसे प्रचलित प्लास्टिक प्रकार था। PET एक स्पष्ट, मजबूत और हल्का प्लास्टिक है जो व्यापक रूप से खाद्य पदार्थों और पेय पदार्थों की पैकेजिंग के लिए उपयोग किया जाता है, विशेष रूप से सुविधाजनक आकार के शीतल पेय, जूस और पानी। केवल एक तिहाई (36%) में पॉलीस्टाइनिन होता है, जिसका उपयोग पैकेजिंग और भंडारण में किया जाता है, जबकि लगभग एक चौथाई (23%) में पॉलीइथाइलीन होता है, जिससे प्लास्टिक वाहक बैग बनाए जाते हैं। केवल एक व्यक्ति (5%) में पॉलीमेथाइल मेथैक्रिलेट था और किसी भी रक्त के नमूने में पॉलीप्रोपाइलीन नहीं था। एक नमूने में तीन तरह के प्लास्टिक : चौंकाने वाली बात यह है कि शोधकर्ताओं ने एक ही रक्त के नमूने में तीन अलग-अलग प्रकार के प्लास्टिक पाए। रक्त के नमूने लिए जाने से ठीक पहले प्लास्टिक के संपर्क में आने के कारण उनके रक्त में माइक्रोप्लास्टिक्स वाले और नहीं होने के बीच अंतर हो सकता है। उदाहरण के लिए एक स्वयंसेवक जिसने अपने रक्त में माइक्रोप्लास्टिक्स के लिए सकारात्मक परीक्षण किया, हो सकता है कि उसने हाल ही में प्लास्टिक-लाइन वाले कॉफी कप से पिया हो।

अंतरिक्ष घूमने जा रहे लोगों का खर्च आखिर कितना होता होगा...
Published / 2022-03-23 16:29:40
अंतरिक्ष घूमने जा रहे लोगों का खर्च आखिर कितना होता होगा...

एबीएन नॉलेज डेस्क। ऐसे बहुत कम लोग होंगे, जिन्हें घूमना पसंद नहीं होगा। हर कोई घूमना पसंद करता है। कोई एक शहर से एक शहर तो कोई दूसरे राज्य घूमने जाते हैं। वहीं, जिनका बजट ज्यादा होता है वो दूसरे देशों में घूमने जाते हैं। लेकिन, अब तो लोगों ने स्पेस में जाना शुरू कर दिया है और अंतरिक्ष में घूमने जा रहे हैं। आपने खबरों में पढ़ा होगा कि अब आम लोग भी अंतरिक्ष में घूमने जा रहे हैं। इस खबर के बाद लोगों के मन में सवाल आता है कि आखिर अंतरिक्ष जाने में कितने रुपये खर्च होते हैं। अंतरिक्ष घूमने जा रहे हैं लोग : अब अंतरिक्ष में सैलानियों को ले जाने की बात की जा रही है। कुछ लोग तो हाल ही में अंतरिक्ष में जाकर आ चुके हैं। कुछ दिनों से अंतरिक्ष घूमने का आइडिया काफी जोर पकड़ रहा है। वैसे ये बात दूसरी है कि आपके इस शौक के लिए पर्यावरण को काफी नुकसान होता है। यानी जब एक बार अंतरिक्ष जाते हैं तो इस ट्रिप में पर्यावरण काफी प्रदूषित होता है। पर्यावरण पर होने वाले नुकसान के बारे में चर्चा करने से पहले आपको बताते हैं कि इसमें कितना खर्चा होना वाला है। कितना होगा खर्चा : बता दें कि रिचर्ड ब्रैंसन, जेफ बेजोस, एलॉन मस्क जैसे अरबपति लोगों को अंतरिक्ष की सैर करवाने में जुटे हैं। रिचर्ड ब्रैंसन की कंपनी ने अब लोगों से बुकिंग भी शुरू कर दी है और इसमें बुकिंग करके अंतरिक्ष में जाया जा सकता है। लेकिन, अगर इसकी कीमत की बात करें तो अंतरिक्ष में जाने की बुकिंग के लिए 4.5 लाख डॉलर की जरूरत है यानी करीब 3 करोड़ 43 लाख रुपये। ये टिकट वो ही बुक करवा सकते हैं, जिन्होंने पहले से करीब डेढ़ लाख डॉलर देकर बुक किया हुआ है। मगर इसकी शुरुआत अभी नहीं की जाएगी और 1000 लोगों की बुकिंग होने के बाद ये ट्रिप शुरु होगी। अभी तक कई फ्लाइट स्पेस में भेजी है। जब स्पेसएक्स ने अपनी फ्लाइट आकाश में भेजी थी तो उन्होंने 4 लोगों को 3 दिन के लिए भेजा था। हालांकि, अभी तक इन कंपनियों ने घोषणा नहीं की है कि अंतरिक्ष घूमाने के लिए उन्होंने कितने रुपये लिए थे। वैसे आपको बता दें कि स्पेस में जाने से पहले से कई टेस्ट और लंबी ट्रेनिंग से गुजरना पड़ता है। उसके बाद ही इच्छुक लोगों को अंतरिक्ष में भेजा जाता है। पहले कई रिपोर्ट्स में एपी के हवाले से कहा गया है कि स्पेस में जाने वाले लोगों का करीब 55 मिलियन का खर्चा होने वाला है। भारतीय करेंसी में इस कंवर्ट करें तो यह 401,65,48,250 यानी 4 अरब 1 करोड़ 65 लाख 48 हजार 250 रुपये होता है। ऐसे में अगर आपको भी कभी स्पेस में जाने का अवसर मिलता है तो आपके पास कम से कम इतने रुपये होने चाहिए। वहीं, जोफ बेजोस की यात्रा के लिए कहा गया कि बेजोस महज चार मिनट तक अंतरिक्ष में रहे, इसके लिए उन्होंने करीब 5.4 अरब डॉलर (लगभग 4,01,94,76,50,000 रुपये) खर्च किए।

ब्रह्मोस सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल का भारत ने किया सफल परीक्षण
Published / 2022-03-23 15:03:03
ब्रह्मोस सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल का भारत ने किया सफल परीक्षण

एबीएन सेंट्रल डेस्क। भारत ने बुधवार को सतह से सतह पर मार करने वाली ब्रह्मोस सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल का सफल परीक्षण किया। यह परीक्षण अंडमान और निकोबार में किया गया। रक्षा अधिकारी ने इस बात की जानकारी दी। उन्होंने बताया कि विस्तारित दूरी की मिसाइल ने सटीकता के साथ अपने लक्ष्य को हासिल किया। उन्होंने कहा कि एयर चीफ मार्शल वीआर चौधरी ने सतह से सतह पर मार करने वाली सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल के सफल परीक्षण पर बधाई दी। वह परिचालन तैयारियों की समीक्षा करने के लिए अंडमान और निकोबार के द्वीप क्षेत्र में हैं। इससे पहले इसी महीने 13 मार्च को भारत ने ब्रह्मोस सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल का सफल परीक्षण किया था। दरअसल, भारत ब्रह्मोस सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल का एक नया एयर लॉन्च संस्करण विकसित करने की फिराक में है, जो दुश्मन के ठिकानों पर अधिक से अधिक हमला करने में सक्षम होगा। इस मिसाइल से 800 किलोमीटर की दूरी तक हमला किया जा सकता है। इससे पहले Su-30MKI लड़ाकू विमान को लगभग 300 किलोमीटर की दूरी पर लक्ष्य को भेदने की क्षमता थी, जिसे बढ़ाकर 350-400 किया गया था। अब इसके 800 किमी वाले वेरिएंट पर काम किया जा रहा है।

...ऐसा कपड़ा, जिसे पहनने वाला सुन सकेगा अपने दिल की धड़कन
Published / 2022-03-20 12:51:48
...ऐसा कपड़ा, जिसे पहनने वाला सुन सकेगा अपने दिल की धड़कन

एबीएन सेंट्रल डेस्क। अभी तक आप अपने दिल की धड़कनों, पल्स व अन्य तरह की चीजों की निगरानी के लिए स्मार्टवॉच का ही उपयोग करते थे, लेकिन अब वैज्ञानिकों ने ऐसा कपड़ा बनाने में सफलता हासिल की है, जिसकी मदद से आप आसानी से दिल और सांसों की निगरानी कर सकेंगे। दरअसल, मैसाचुसेट्स इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी (एमआईटी) और रोड आइलैंड स्कूल ऑफ डिज़ाइन (आरआईएसडी) के वैज्ञानिकों ने एक ऐसा फैब्रिक (कपड़ा) बनाया है, जिसकी मदद से हम अपनी दिल की धड़कनों और सांसों को आसानी से सुन सकते हैं। इसके अलावा आस-पास की धीमी आवाजों को भी सुना जा सकता है। यह फैब्रिक माइक्रोफ़ोन व स्पीकर दोनों की तरह काम करता है। त्वचा के साथ करता है इंटरफेस : यह शोध एक नेचर जर्नल में प्रकाशित हुई है। प्रमुख वैज्ञानिक एमआईटी के वेई यान कहते हैं कि यह कपड़ा मानव त्वचा के साथ स्पष्ट रूप से इंटरफेस कर सकता है, जिससे पहनने वाला अपने दिल और श्वसन की स्थिति पर निगरानी कर सकता है। वह कहते हैं कि हम इसे और भी ज्यादा अपग्रेड करने की कोशिश कर रहे हैं, जिससे यह स्पेसफ्लाइट और यहां तक कि बिल्डिंग-क्रैक तक को मॉनीटर कर सके। कैसे सुनाई देती है आवाज : वैज्ञानिकों के मुताबिक, जिस तरह से एक माइक्रोफोन काम करता है ठीक वैसे ही यह कपड़ा ध्वनि को यांत्रिक कंपन में परिवर्तित करता है। इसके बाद इन कंपन को विद्युत संकेतों में बदल लेता है, जिस तरह से हमारे कान काम करते हैं। एमआईटी के वैज्ञानिक योएल फिंक कहते हैं कि हम मानव शरीर के कान के पर्दे ने इस तरह का कपड़ा बनाने के लिए प्रेरित हुए बाद में यह सामने आया कि कान का पर्दा भी एक तरह के फैब्रिक से ही बना होता है।

बादलों में तो पानी भरा होता है… फिर रंग काला क्यों?
Published / 2022-03-19 06:01:14
बादलों में तो पानी भरा होता है… फिर रंग काला क्यों?

एबीएन नॉलेज डेस्क। जब भी बारिश आने वाली होती है तो आसमान में बादल छा जाते हैं और काले बादल आने के साथ ही कुछ देर में बारिश शुरू हो जाती है। आपने भी यह अनुभव किया होगा कि बादल कभी काले तो कभी सफेद रंग के दिखाई देते हैं। तो आज हम आपको इसका कारण बताते हैं कि आखिर बादलों का रंग काला क्यों हो जाता है। बादलों में मौजूद पानी की बूंदें या महीन कणें सूर्य से निकलने वाली किरणों को रिफ्लेक्ट कर देती हैं। आसान शब्दों में कहें तो किरणों को वापस भेज देती हैं और सिर्फ सफेद रंग ही बचता है। बादल सूर्य से निकलने वाली सफेद किरणों को अवशोषित कर लेते हैं। इसलिए हमें बादल का रंग सफेद दिखता है। इसको आप इस तरह से भी समझ सकते हैं। बादलों में बर्फ या पानी की बूंदे होती हैं, वो सूर्य से निकलने वाली किरणों के वेवलेंथ से बड़ी होती हैं और जैसे ही सूर्य की किरणें इन पर पड़ती हैं, वह इन्हें रिफ्लेक्ट कर देती हैं और बादल हमें सफेद दिखने लगता है। ठीक इसके उलट प्रक्रिया होती है तो बादल हमें काले दिखते हैं। मतलब जब बादल में पानी की बूंदें सभी रंगों को अवशोषित कर लेती हैं तो बादलों का रंग काला नजर आता है। जो वस्तु जिस रंग को अवशोषित कर लेती हैं, वह उसी रंग की दिखाई देती है। अगर कोई वस्तु सारे रंग को रिफ्लेक्ट कर देगी तो वह सिर्फ सफेद दिखाई देगी और जो सभी रंगों को अवशोषित कर लेगी, वह काले रंग की दिखने लगेगी। बादलों के काले रंग का दिखने का एक और कारण है। अगर बादल काफी घने और ऊंचाई पर हैं तो वे काले दिखाई देंगे। वहीं, बादलों के काले रंग के होने के पीछे मोटाई भी एक वजह है। अगर बादलों की मोटाई ज्यादा होगी तो तो सूर्य की बहुत ही कम किरणें उससे पास होंगी। इसका असर यह होगा कि बादल गहरे रंगा का या काला दिखाई देगा।

इसरो के लिए एचईसी में बने देश के पहले व्हील बोगी सिस्टम का ट्रायल सफल
Published / 2022-03-18 14:11:37
इसरो के लिए एचईसी में बने देश के पहले व्हील बोगी सिस्टम का ट्रायल सफल

टीम एबीएन, रांची। एचईसी ने अंतरिक्ष के क्षेत्र में एक बड़ी छलांग लगायी है। रॉकेट के प्रक्षेपण के लिए सबसे संवदेशनील और जटिलतम उकरण व्हील बोगी सिस्टम का निर्माण किया है। गुरुवार को एचएमबीपी में इसरो के विशेषज्ञों की मौजदूगी में इसका ट्रायल किया गया जो शत प्रतिशत सफल रहा है। एचईसी ने इसरो के लिए इसका निर्माण किया है। अधिकारियों के अनुसार व्हील बोगी सिस्टम पीएसएलवी (रॉकेट) एकीकरण प्रणाली में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। यह रॉकेट को असेंबली बिल्डिंग से लांच पैड तक ले जाता है। रॉकेट के सफल प्रक्षेपण के लिए आवश्यक प्रक्षेपण तक निर्देशित भी करता है। डेडिकेटेड होलर वाहन द्वारा संचालित 1.5 किमी के रेल ट्रैक पर चलता है। इसका वजन 85 टन है और यह लगभग 900 टन परिवहन करने में सक्षम है। इस उपकरण का निर्माण काफी चुनौतीपूर्ण था। इसके निर्माण के लिए लॉ एलॉय स्टील विकसित किया गया। इसकी डिजाइन तैयार की है। जटिलतम वेल्डिंग, मशीनिंग के बाद इसकी असेंबलिंग की गयी है। गुरुवार को एचएमबीपी के 043-044 शॉप में व्हील बॉगी सिस्टम का ट्रायल किया गया जो सफल रहा। ट्रायल के दौरान प्लांट के कामगार, अधिकारी, इसरो के विशेषज्ञ मौजूद थे। इसरो के अधिकारी ने बताया कि यह पहली बार है कि इतनी उच्च क्षमता वाली व्हील बोगी प्रणाली भारत में बनी है। यह इसरो के साथ एचईसी के सहयोग के लिए एक नया रास्ता खोलती है। भविष्य में इस तरह के राष्ट्रीय महत्व के कार्यादेश से एचईसी के लिए नया मार्ग प्रशस्त होगा।

Newsletter

Subscribe to our website and get the latest updates straight to your inbox.

We do not share your information.