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रूस की सरकारी मीडिया पर शिकंजा कस रहीं गूगल समेत प्रमुख कंपनियां
Published / 2022-03-02 08:18:53
रूस की सरकारी मीडिया पर शिकंजा कस रहीं गूगल समेत प्रमुख कंपनियां

एबीएन सेंट्रल डेस्क। यूक्रेन पर रूसी हमले को लेकर सोशल मीडिया पर प्रसारित सामग्री पर शिकंजा कसते हुए गूगल समेत प्रमुख तकनीकी कंपनियां रूस की सरकारी मीडिया को अपने मंचों का उपयोग करने से रोकने की तरफ कदम बढ़ा रही हैं ताकि वे दुष्प्रचार एवं गलत सूचनाओं को प्रसार नहीं कर सकें। गूगल ने मंगलवार को घोषणा की कि वह यूरोप में ऐसे यूट्यूब चैनल को तत्काल प्रभाव से ब्लॉक कर रहा है। हालांकि, साफ किया कि इसे पूरी तरह प्रभावी होने में थोड़ा समय लगेगा। इसके अलावा, सोशल मीडिया मंचों का संचालन करने वाली अमेरिका की अन्य प्रमुख कंपनियों ने भी क्रेमलिन (रूसी राष्ट्रपति कार्यालय) की पहुंच को सीमित करने को लेकर जबरदस्त बदलाव किए हैं। इसके तहत ट्विटर ने इनके द्वारा साझा की गई सामग्री पर एक लेबल लगाया है ताकि लोगों को पता चल सके कि ये सामग्री रूसी सरकार द्वारा प्रसारित है। इससे इतर आर्थिक झटका देते हुए रूसी मीडिया के चैनल की विज्ञापन से होने वाली आय में भी कटौती की जा रही है। फेसबुक की पूर्व जननीति निदेशक केटी हारबथ का कहना है कि अमेरिकी कंपनियों द्वारा उठाए गए ये कदम क्रेमलिन द्वारा कथित तौर पर सोशल मीडिया मंचों का सहारा लेकर दुष्प्रचार करने से रोकना है। फेसबुक और इंस्टाग्राम का संचालन करने वाली कंपनी मेटा ने सोमवार को घोषणा की कि वह यूरोप में रूस की रशिया टुडे (आरटी) और स्पुतनिक सेवाओं की पहुंच को सीमित करेगी। इसके बाद गूगल ने भी मंगलवार को यूरोप में इन दोनों सेवाओं के यूट्यूब चैनल प्रतिबंधित करने का ऐलान किया। हालांकि, आरटी और अन्य रूसी सरकारी मीडिया के फेसबुक पेज अमेरिका में प्रभावित नहीं हुए हैं।

विश्व में सबसे पहले सूरज कहां निकलता है, यहां जानें...
Published / 2022-03-01 17:58:51
विश्व में सबसे पहले सूरज कहां निकलता है, यहां जानें...

एबीएन डेस्क। विश्व में सबसे पहले सूरज कहां निकलता है, इसका जवाब आसान नहीं है; क्योंकि धरती घूम रही है। ऐसे में धरती का कौन सा इलाका सूर्य के सबसे पहले आता है यह बताना काफी मुश्किल है। हालांकि अब मनुष्य ने अपने हिसाब से धरती को अक्षांश, देशांतर के रूप में विभाजित किया है। साथ ही पूर्व, पश्चिम, उत्तर और दक्षिण चार दिशाएं भी तय की हैं। दुनिया में जापान का मिनामी तोरीशीमा धुर पूर्व में है। इसलिए वहां सबसे पहले सूर्योदय मान सकते हैं। अभी तक जापान को सबसे पहले सूर्योदय की धरती माना जाता था लेकिन सभी देशों ने GMT (Greenwich Mean Time) के टाइम को मान्यता दे दी है। ऐसे में न्यूज़ीलैंड अपने आप सूर्योदय की धरती बन गयी है। एक तरफ जहां न्यूज़ीलैंड का समय GMT+13 है। वहीं दूसरी तरफ जापान का समय GMT+9 है। जिस वक्त न्यूज़ीलैंड में सुबह के 6 बज रहे होते हैं, उस वक्त जापान में रात के 2 बज रहे होते हैं। इसके अलावा जब भी न्यू इयर यानी नए साल की बात आती है, तो सबसे पहले न्यूज़ीलैंड में न्यू इयर मनाया जाता है। इसके बाद ऑस्ट्रेलिया और अन्य देशों में मनाया जाता है। ऐसे में नए टाइम जोन के अनुसार दुनिया में सबसे पहले सूरज न्यूज़ीलैंड में निकलता है। तो अब आप जान गए होंगे कि विश्व में सबसे पहले सूरज कहां निकलता है। पुराने जमाने में जापान को सूर्योदय की धरती मानी जाती थी। लेकिन अब नए टाइम जोन GMT के अनुसार न्यूज़ीलैंड वह देश है जहां सबसे पहले सूर्योदय होता है। भारत की बात करें, तो अरुणाचल प्रदेश वह राज्य है जहां सबसे पहले सूरज निकलता है। इस राज्य में डोंग वैली की देवांग घाटी में सबसे पहले सूर्य उगता है। इसे देखने देश विदेश से पर्यटक आते रहते हैं।

आखिर टायर का रंग काला ही क्यों होता है...
Published / 2022-02-27 15:19:15
आखिर टायर का रंग काला ही क्यों होता है...

एबीएन डेस्क। टायर का रंग काला क्यों होता है लाल, पीला या सफ़ेद क्यों नहीं होता? तो आज हम आपको इसी बारे में बताने जा रहे हैं और इसके पीछे का कारण भी बतायेंगे। टायर की बात करें तो हर आदमी इस चीज से वाकिफ होगा क्योंकि टायर किसी भी वाहन का प्रमुख अंग है। टायर की वजह से ही एक वाहन लम्बा सफ़र तय कर पाते हैं। लेकिन टायर को देखकर भी यही सवाल उठता है कि ये टायर काले क्यों होते हैं और अब तो टेक्नोलॉजी में काफी बदलाव आ गया। अब भी टायरों को किसी दूसरे कलर में क्यों नहीं बनाया जाता है? भारत में लगभग सभी चीजें काफी बाद में आती है। लेकिन जो देश टेक्नोलॉजी में सबसे आगे है वहां के वाहन के टायर अभी भी काले क्यों बनाये जा रहे हैं? तो जानेंगे इसके पीछे की वजह। टायर का इतिहास काफी पुराना है क्योंकि आदिमानव के ज़माने भी टायर बनाये जाते थे। लेकिन उस समय रबर जैसी किसी चीज की खोज नहीं हुई थी। जब रबर की खोज हुई तो इसके टायर भी बनाये गए, जो काफी काम में आने लगे। लेकिन अभी भी इन टायर में कमी थी क्योंकि साधारण रबर के टायर जल्दी घिस जाते थे। इसके बाद थोड़ी और रिसर्च की गयी और पाया गया कि रबर में कार्बन और सल्फर मिलाकर इसे मजबूत किया जा सकता है। वैसे आपको पता होगा कि रबर का प्राकतिक रंग स्लेटी होता है लेकिन जब इसमें कार्बन और सल्फर मिलाया जाता है तो इसका रंग काला हो जाता है। रबर में कार्बन मिलाने से बहुत बड़ा फायदा हुआ है क्योंकि जहां साधारण रबर से बना टायर 10 किलोमीटर चल सकता है वहीं कार्बन और सल्फर युक्त रबर का टायर 1 लाख किलोमीटर से ज्यादा चल सकता है इससे आप अंदाजा लगा सकते हैं कि टायर बनाने के लिए रबर में कार्बन और सल्फर मिलाना कितना जरुरी है। चुकीं रबर में कार्बन और सल्फर मिलाते है इसलिए टायर का रंग काला हो जाता है। क्या होगा अगर टायर को किसी दूसरे कलर में बनाया जाए : आपने छोटे बच्चों की साईकिल में लगे रंगीन टायर को देखा होगा इनके रंगीन होने की वजह से ही ये टायर ज्यादा समय तक नहीं चल पाते है। हालांकि ये रंगीन टायर ठोस होते हैं। इनमें किसी भी तरह से हवा नहीं भरी जाती है इसलिए ये टायर थोड़ी टक्कर दे जाते हैं। अब आप भी जानना चाहते होंगे कि क्या होगा अगर टायर को किसी कलर में बनाया जाए। वैसे आपको इस सवाल का जबाव मिल गया होगा। रंगीन टायर ज्यादा देर तक नहीं टिकेंगे क्योंकि जब टायर को रंगीन करने के लिए उसमें रंगीन पदार्थ मिलाया जायेगा, तो टायर में कार्बन और सल्फर की मात्रा पर असर पड़ेगा और हमें पता है कि टायर कार्बन और सल्फर की वजह से ही मजबूत रहते है। हालांकि अभी तक कई कंपनियां रंगीन टायर बना चुकीं है, लेकिन इनका बहुत कम प्रयोग हो रहा है। अब आप जान गए होंगे कि टायर का रंग काला क्यों होता है। आपने कभी टायर को जलते हुए देखा होगा तो उसमें काला धुआं निकलता है वो कार्बन का काला धुआं होता है। अभी कार्बन युक्त टायर काफी अच्छी सर्विस दे रहे हैं। इसलिए इनके कलर में कोई छेड़छाड़ नहीं कर रहा है। लेकिन जिस तरह से टेक्नोलॉजी में बदलाव देखने मिल रहा है। टायर के कलर बदलने का समाधान भी ढूढ़ लिया जायेगा और भविष्य में आपको सड़क पर चल रहे बड़े वाहनों में भी रंगीन टायर देखने को मिल सकते हैं।

पानी की टंकी गोल ही क्यों होती है... चौकोर या तिकोनी क्यों नहीं?
Published / 2022-02-26 18:02:57
पानी की टंकी गोल ही क्यों होती है... चौकोर या तिकोनी क्यों नहीं?

एबीएन डेस्क। आपने अपने जीवन काल में अभी तक पानी के कई टंकियां देखी होंगी, लेकिन मुझे पूर्ण विश्वास है कि आपने टंकी गोल ही देखी होगी। चौकोर या तिकोनी नहीं। नगर निगम की बड़ी पानी की टंकी हो, जो करीब 100 फुट ऊंचाई पर स्थापित की जाती है या फिर घर के बाथरूम में सप्लाई के लिए रखी जाने वाली 500 लीटर की टंकी, एक बात समान होती है कि सब के सब गोल ही होती है। जबकि जिस स्थान पर वह रखी होती है यदि चौकोर होती तो स्थापित करने के लिए शायद ज्यादा अच्छा होता है। सवाल यह है कि पानी की टंकी गोल क्यों बनाई जाती है? "टंकी गोल क्यों होती है" विषय विशेषज्ञ ने बताया : भारतीय नौसेना से रिटायर परिमल कुमार घोष बताते हैं कि यह केवल पानी की टंकियों के आकार की बात नहीं है। परन्तु अधिक से अधिक वस्तुओं के आकार गोल होने के पीछे भौतिकी विज्ञान के सूत्र व पदार्थ के मौलिक आकार पर बाहरी प्रभाव, दबाव एवं पारिपार्शिक परिस्थिति की प्रतिक्रिय आदि के सिद्धान्त पर ही आधारित हैं। गोलाकार वस्तु के कोई कोण नहीं होता है, बल्कि हरेक बिन्दु सम दूरत्य व समानुपातिक तरीके से विन्यास होने के कारण उन पर घर्षण व दबाव बराबर एवं समपरिमान क्षेत्र में समानुपातिक विस्तारित व वितरित हो जाते हैं। इसके परिणाम स्वरूप गोलाकार वस्तु के किसी भी एक स्थान पर दबाव या प्रतिक्रिया सीमित नहीं रहती हैं। सरल शब्दों में समझिए : यदि पानी की टंकी को चौकोर बना दिया जाएगा तो उसके चार कोण स्थापित हो जाएंगे। ऐसी स्थिति में जब टंकी के अंदर पानी भरा जाएगा और जब टंकी से पानी निकाला जाएगा तब पानी में हलचल होगी और कोण होने के कारण हलचल थोड़ा तेज हो जाएगी। इसके चलते टंकी की उम्र कम होती चली जाएगी। कुछ कंपनियां ग्राहकों की मांग पर चौकोर पानी की टंकी बनाती है परंतु ऐसी टंकियों के निर्माण और विक्रय की प्रक्रिया बहुत धीमी होती है।

जापान : जानवर जन्म दे सकेंगे इंसानी बच्चे!
Published / 2022-02-24 15:17:59
जापान : जानवर जन्म दे सकेंगे इंसानी बच्चे!

एबीएन डेस्क। वैज्ञानिक उस तरीके पर काम कर रहा है, जिससे पशुओं के गर्भ में मानव-कोशिकाओं का विकास हो सकेगा। वैज्ञानिक उस तरीके पर काम कर रहा है, जिससे पशुओं के गर्भ में मानव-कोशिकाओं का विकास हो सकेगा। जानवरों के गर्भाशय में इंसानी कोशिकाओं को प्रत्यारोपित करने पर जो जीव जन्म लेगा, वो आधा इंसान-आधा पशु हो, ऐसे खतरे भी हैं। इसी के चलते अमेरिका तक ने इस प्रयोग पर रोक लगा दी थी। जापान के एक स्टेम-सेल वैज्ञानिक को वहां की सरकार ने एक खास शोध के लिए सरकारी सहायता देने की शुरुआत की है। वैज्ञानिक उस तरीके पर काम कर रहा है, जिससे पशुओं के गर्भ में मानव-कोशिकाओं का विकास हो सकेगा। यानी जानवर एक तरह से सरोगेट मां की तरह काम करेंगे, जिनकी कोख से वैसी कोई चीज जन्म लेगी, जिसके शरीर में इंसानी अंग हों। जापानी स्टेम सेल वैज्ञानिक को मिली इजाजत : विज्ञान की दुनिया में इंसान एक से बढ़कर एक प्रयोग कर रहा है। कृत्रिम अंग प्रत्यारोपण जैसी मुश्किल और एक समय पर असंभव समझी जाने वाली प्रक्रिया अब आम है। इसी कड़ी में वैज्ञानिक और आगे बढ़ने की सोच रहे हैं। जापान में हिरोमित्सू नकॉची नाम के वैज्ञानिक, जो यूनिवर्सिटी आॅफ टोक्यो में स्टेम सेल के अगुआ हैं, उन्हें जापान सरकार ने जानवरों की कोख में इंसानी भ्रूण के विकास पर प्रयोग करने की इजाजत दे दी। वैज्ञानिक अपनी टीम समेत इसपर काम भी शुरू कर चुके हैं। टीम की योजना ये है कि पहले चूहों के एंब्रियो में मानव कोशिकाएं विकसित की जाएं और फिर उस एंब्रियो को सरोगेट जानवरों के गर्भ में प्रत्यारोपित कर दिया जाए। इस प्रयोग का असल मकसद इंसानी शिशु बनाना नहीं, बल्कि ऐसे पशु तैयार करना है, जिनके शरीर के अंग मानव कोशिकाओं से बने हों ताकि जरूरतमंद इंसानों में ये प्रत्यारोपित किए जा सकें। देशों ने कहा गलत : जापान से पहले कई देश इसे कुदरत से खिलवाड़ बताते हुए ऐसे प्रोजेक्ट को नामंजूर कर चुके हैं। इनमें अमेरिका भी एक देश है। वहां साल 2015 से पहले लैब्स में इस तरह की कोशिशें चल रही थीं लेकिन फिर नेशनल इंस्टीट्यूट आॅफ हेल्थ इसे गलत बताते हुए इस तरह के किसी भी प्रोजेक्ट पर रोक लगा दी। वहीं जापान के साइंटिस्ट कुदरती प्रक्रिया को चुनौती देते हुए जानवर की कोख से इंसान के जन्म लेने के प्रोजेक्ट पर जुट गए हैं। अगर ये हो सका तो ये साइंस का सबसे बड़ा कारनामों में से एक हो सकता है। इस तरह होगा प्रयोग : जापान के साइंटिस्ट ने इसका खाका भी तैयार कर लिया है, कि कैसे इस प्रोजेक्ट को अंजाम देना है। शुरूआती तौर पर इसमें चूहे के गर्भाशय में ह्यूमन सेल्स डेवलप किए जाएंगे। इसके बाद के चरण में जानवर की कोख में सेरोगेसी की संभावना देखी जाएगी। यानी इंसान के भ्रूण को जानवर के गर्भाशय में डेवलप करने की प्रक्रिया पर काम किया जाएगा। क्या है सरोगेसी की प्रक्रिया : इसमें अगर किसी महिला को गर्भाशय से जुड़ी बड़ी समस्या होती है तो वो गर्भ में शिशु को धारण नहीं कर पाती। या फिर बार-बार गर्भपात होता है। ऐसे मामलों में किसी दूसरी महिला के गर्भाशय में मानव भ्रूण को विकसित किया जाता है। इसकी प्रक्रिया बड़ी नॉर्मल होती है और ऐसे कई मशहूर सेलिब्रेटी हुए हैं, जिन्होंने इस विधि से संतान हासिल की है। इस विधि में माता-पिता के शुक्राणु का मेल परखनली विधि से करवा कर भ्रूण को सरोगेट मदर (किराए की कोख वाली महिला) के गर्भाशय में प्रत्यारोपित कर दिया जाता है। इस प्रक्रिया में बच्चे का जेनेटिक संबंध माता-पिता से ही होता है, बस भ्रूण का विकास और उसका जन्म सरोगेसी के जरिए होता है। इससे एक कदम आगे बढ़ते हुए अब मानव भ्रूण का विकास किसी जानवर के गर्भाशय में करने की तैयारी चल रही है। यूनिवर्सिटी आॅफ टोक्यो में इस प्रोजेक्ट पर काम भी शुरू हो गया है। खतरनाक शक्ल ले सकता है जापान का ये प्रोजेक्ट : जापान के मशहूर जेनेटिसिस्ट हिरोमित्सू नकॉची ने इस प्रोजेक्ट पर काम करना शुरू कर दिया है। पहले पहल जानवर के गर्भाशय में मानव अंगों को उगाने की प्रक्रिया पर काम होगा, जिसे किसी जरूरतमंद इंसान को प्रत्यारोपित किया जा सके। आगे हो सकता है ये खतरा : इस प्रोजेक्ट में सबसे खतरनाक बात ये है कि ये इसका अगला चरण अपने मकसद से भटक सकता है। अगर ये प्रोजेक्ट कामयाब हो गया तो फिर संभव है कि आने वाले वक्त में एक ऐसा जीव अस्तित्व में आ जाए जो आधा इंसान और आधा जानवर हो। या फिर ये भी हो सकता है कि गर्भ में भ्रूण के पलने से इंसानी कोशिकाएं किसी तरह बढ़ते हुए पशु के दिमाग तक भी पहुंच जाएं। ऐसे में उसका मस्तिष्क बुरी तरह से प्रभावित हो सकता है। इसी बात को देखते हुए दुनिया के कई देशों ने इस तरह के प्रोजेक्ट रोक दिए। ऐसे प्रोजेक्ट को आर्थिक सहायता देनी बंद कर दी। हालांकि जापान की एजुकेशन और साइंस मिनिस्ट्री ने सालभर पहले इसे अप्रूव कर दिया। इधर काम में लगे वैज्ञानिकों का कहना है कि हम जानवर के गर्भाशय में अचानक से मानव अंग नहीं उगा लेंगे। हम धीरे-धीरे उस चरण तक पहुंचेंगे। हमारा एडवांस रिसर्च हमें उस जगह तक ले जाएगा। उनका प्लान है कि इस प्रोसेस को धीरे-धीरे अंजाम दिया जाए। पहले जानवरों के हाइब्रिड गर्भाशय उगाने पर काम होगा।

अब बिना इंटरनेट ऑपरेट कर सकेंगे जीमेल...
Published / 2022-02-23 09:22:18
अब बिना इंटरनेट ऑपरेट कर सकेंगे जीमेल...

एबीएन डेस्क। आज के समय में हर कोई स्मार्टफोन का इस्तेमाल करता है। वहीं इसमें गूगल की तमाम सुविधाएं लेने के लिए जीमेल आईडी की जरूरत होती है। ऐसे में जाहिर है आप भी जीमेल का इस्तेमाल जरूर करते होंगे, लेकिन क्या आप जानते हैं कि जीमेल को आप ऑफलाइन भी इस्तेमाल कर सकते हैं। इसको आप जरूरी डॉक्युमेंट्स भेजने, कोई मैसेज भेजने या फिर फाइल भेजने के लिए यूज करते है। मोबाइल में मौजूद अन्य एप की ही तरह इसे चलाने के लिए भी इंटरनेट का इस्तेमाल किया जाता है। इसे मोबाइल और डेस्कटॉप दोनों पर चलाया जाता है, जिसके लिए आपको इंटरनेट की जरूरत होती है। ऐसे में आज हम आपको एक ऐसी ट्रिक के बारे में बताने जा रहे हैं, जिससे आप बिना इंटरनेट के भी जीमेल का इस्तेमाल कर सकते हैं। इस ट्रिक की मदद से आपके कई काम आसान हो सकता है। तो आइए जानते इसके लिए आपको क्या करना होगा। अगर आप अपना जीमेल बिना इंटरनेट के भी चलाना चाहते हैं, तो इसके लिए आपको इन स्टेप्स को फॉलो करना होगा। इस ट्रिक की मदद से आप कोई ईमेल रिसीव कर सकते हैं, किसी भी मेल को पढ़ सकते हैं। इसके अलावा आप मेल सेंड भी कर सकते हैं। • इसके लिए आपको सबसे पहले अपने डिवाइस में क्रोम 61 को डाउनलोड करना होगा। • इसके बाद जीमेल पर जाना है, यहां ऊपर दाईं तरफ बने सेटिंग्स के आइकन पर क्लिक करना है। • अब इसके ठीक नीचे आपको See All Settings पर क्लिक करना है। ऐसा करते ही आपके सामने एक टैब खुल जाएगा। इसमें आपको कई ऑप्शन दिखेंगे, जिसमें सबसे लास्ट से दूसरा ऑप्शन Offline होगा। • यहां पर आपको Enable Offline के ऑप्शन पर टिक करना होगा। साथ ही इसको सेव करना न भूलें। ऐसा करने पर आपके जीमेल में ऑफलाइन फीचर्स एक्टिवेट हो जाएगा। इसके बाद आप आसानी से ऑफलाइन मोड में भी मेल पढ़ सकेंगे, रिसीव कर सकेंगे। साथ ही मेल भेज भी सकेंगे।

अब खेतों-बगीचों में भी उगेगी वैक्सीन
Published / 2022-02-21 17:58:30
अब खेतों-बगीचों में भी उगेगी वैक्सीन

एबीएन डेस्क (मुकुल व्यास)।चौंकिए मत... अब कुछ ऐसा ही होनेवाला है। क्योंकि वैज्ञानिक ऐसी वैक्सीन बना रहे हैं जिन्हें खेतों में उगाया जा सकेगा और खाद्य वस्तुओं की तरह खाया जा सकेगा। अमेरिका में रिवरसाइड स्थित कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय (यूसीआर) के वैज्ञानिक यह पता लगाने की कोशिश कर रहे हैं कि क्या लेटस (सलाद) पत्तों को एमआरएनए वैक्सीन की फैक्टरियों में बदला जा सकता है। कोविड वैक्सीनों में प्रयुक्त मैसेंजर आरएनए या एमआरएनए टेक्नोलॉजी में मुख्य रूप से कोशिकाओं को रोगाणुओं को पहचानने और संक्रामक रोगों से बचाव करने के बारे में शिक्षित किया जाता है। इस टेक्नोलॉजी के प्रयोग में सबसे बड़ी चुनौती इसे परिवहन और स्टोरेज के दौरान ठंडा रखने की है। वैक्सीन के स्थायित्व के लिए निम्न तापमान जरूरी है। यदि विज्ञानियों का नया प्रोजेक्ट सफल हो जाता है तो पौधों पर आधारित खाने योग्य एमआरएनए वैक्सीन इस समस्या को दूर कर सकती है। इस तरह की वैक्सीनों को कमरे के तापमान पर स्टोर किया जा सकता है। अमेरिका की नेशनल साइंस फाउंडेशन से पांच लाख डॉलर के अनुदान से शुरू किए गए प्रोजेक्ट के तीन मुख्य उद्देश्य हैं। पहला, क्या एमआरएनए से युक्त डीएनए को पौधे की कोशिकाओं के उस हिस्से में पहुंचाया जा सकता है जहां वह रिप्लीकेट कर सके। दूसरा, यह सिद्ध करना कि पौधे एक पारंपरिक वैक्सीन की बराबरी करने के लिए समुचित एमआरएनए उत्पन्न कर सकते हैं और तीसरा, पौधा आधारित वैक्सीन की सही खुराक का निर्धारण। यूसीआर में वनस्पति विज्ञान के असिस्टेंट प्रोफेसर जुआन पाब्लो गिराल्डो ने कहा कि एक पौधे द्वारा उत्पादित एमआरएनए से एक व्यक्ति को वैक्सीन की खुराक दी जा सकेगी। गिराल्डो इस शोध का नेतृत्व कर रहे हैं। इस शोध में सेन डियागो स्थित कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय और कार्नेगी मेलन विश्वविद्यालय के विज्ञानी शामिल हैं। उन्होंने बताया कि हम पालक और लेटस के साथ नयी टेक्नोलॉजी का परीक्षण कर रहे हैं। हमारी कोशिश यह रहेगी कि लोग आगे चल कर अपने बगीचों में ही वैक्सीन के पौधे उगाएं। भविष्य में किसान भी अपने सारे खेत में वैक्सीन वाले पौधे उगा सकते हैं। इस टेक्नोलॉजी में सबसे अहम भूमिका पौधे की कोशिकाओं में पाए जाने वाले क्लोरोप्लास्ट की है। क्लोरोप्लास्ट सूरज की रोशनी को ऊर्जा में बदल देते हैं, जिसका प्रयोग पौधा करता है। ये दरअसल सौर ऊर्जा से चलने वाली सूक्ष्म फैक्टरियां हैं जो शुगर और दूसरे मॉलिक्यूल उत्पन्न करती हैं, जिनसे पौधे का विकास होता है। इन फैक्टरियों का प्रयोग वांछित मॉलिक्यूल उत्पन्न करने के लिए भी किया जा सकता है। पिछले अध्ययनों में गिराल्डो यह दर्शा चुके हैं कि क्लोरोप्लास्ट ऐसे जीनों को अभिव्यक्त कर सकता है जो स्वाभाविक रूप से पौधे का हिस्सा नहीं हैं। उन्होंने और उनके सहयोगियों ने पौधों की कोशिकाओं में बाहरी आनुवंशिक सामग्री भेज कर ऐसा कर दिखाया। अपने प्रोजेक्ट के लिए उन्होंने नैनो इंजीनियरिंग की प्रोफेसर निकोल स्टीनमर्ट्ज से सहयोग लिया। स्टीनमर्ट्ज और उनके सहयोगियों ने आनुवंशिक सामग्री को क्लोरोप्लास्ट में पहुंचाने के लिए नैनो टेक्नोलॉजी विकसित की है। स्टीनमर्ट्ज ने बताया कि हम पौधों में जीन पहुंचाने के लिए पौधों के वायरसों का प्रयोग करना चाहते हैं जो कुदरती रूप से पाए जाने सूक्ष्म कण अथवा नैनो पार्टिकल हैं। इन वायरसों को क्लोरोप्लास्ट में पहुंचाने और उन्हें पौधों के प्रति असंक्रामक बनाने के लिए कुछ तकनीकी फेरबदल की जरूरत पड़ती है। कुछ वैज्ञानिकों का ख्याल है कि हमें पौधों पर आधारित वैक्सीन विकसित करने के लिए अधिक प्रयास करने चाहिए। कनाडा में क्यूबेक स्थित लवाल विश्वविद्यालय के दो शोधार्थियों, फास्टर-बोवेंडो और गेरी कोबिंगर का कहना है कि इस तरह की वैक्सीन "मॉलिक्यूलर फार्मिंग" के जरिए बनाई जा सकती है। इस विधि में पौधे की कोशिका में डीएनए रखा जाता है जो प्रोटीन बनाता है। इस कोशिका का उपयोग वैक्सीन बनाने के लिए किया जाता है। वैज्ञानिक मान्यता प्राप्त वैक्सीनों के अलावा और अधिक प्रभावी वैक्सीन की तलाश में जुटे हुए हैं। उनकी कोशिश एक ऐसी समग्र वैक्सीन विकसित करने की है जो सभी तरह के कोरोना वायरसों के खिलाफ प्रभावी सिद्ध हो। वैक्सीनें आम तौर पर बैक्टीरियाई सिस्टम में उत्पन्न की जाती हैं और वे बहुत असरदार साबित हुई हैं। ऐसे सिस्टम को बायोरिएक्टर भी कहा जाता है। ऐसी वैक्सीनों की उत्पादन लागत बहुत ज्यादा होती है। वैक्सीन की बायोमैन्युफैक्चरिंग के विकल्प के तौर पर वैज्ञानिकों ने 1986 में मॉलिक्यूलर फार्मिंग का प्रस्ताव रखा था। इसके लिए वैज्ञानिकों को सिर्फ ग्रीनहाउस सेटअप की आवश्यकता पड़ती है जो बायोरिएक्टरों की तुलना में बहुत सस्ते पड़ते हैं। रिसर्चरों का कहना है कि पौधों पर आधारित वैक्सीन बनाना सस्ता पड़ेगा और इसके दूसरे लाभ भी होंगे। एक बहुत बड़ा फायदा यह है कि इस तरह की वैक्सीन बनाने के लिए संसाधनों की तलाश पर अधिक ध्यान नहीं देना पड़ेगा। वैक्सीनों को बायोरिएक्टरों में तैयार करने के बजाय खेतों की फसलों में उत्पन्न किया जा सकता है। दूसरा बड़ा फायदा यह है कि पौधे मानव रोगाणुओं द्वारा संक्रमित नहीं हो सकते। इसके अलावा पिछली रिसर्च से पता चलता है कि पौधों पर आधारित वैक्सीन दूसरी विधियों से तैयार वैक्सीनों की तुलना में ज्यादा मजबूत इम्यून रेस्पांस उत्पन्न करती हैं। सामान्य विधियों की तुलना में पौधों पर आधारित वैक्सीन का उत्पादन ज्यादा होता है। इस समय गौशे रोग के इलाज के लिए इस तरह की वैक्सीन का उत्पादन किया जा रहा है। लीवर और स्प्लीन जैसे शरीर के कुछ अंगों में वसायुक्त पदार्थों के जमाव से गौशे रोग उत्पन्न होता है। इन पदार्थों के जमा होने से इन अंगों का आकार बढ़ जाता है, जिसकी वजह से उनके कार्यों पर असर पड़ता है। वसायुक्त पदार्थ हड्डियों के ऊतकों में भी जमा होने लगते हैं, जिनसे हड्डियां कमजोर हो जाती हैं और फ्रैक्चर का खतरा बढ़ जाता है। गौशे रोग के इलाज में प्रयुक्त होने वाला ग्लूकोसेरिब्रोसिडेस नामक एंजाइम गाजर की सेल कल्चर में उत्पन्न होता है। अमेरिका के सेंटर्स फॉर डिजीज कंट्रोल एंड प्रिवेंशन (सीडीसी) के अनुसार फ्लू वैक्सीनों के निर्माण के लिए सबसे ज्यादा प्रचलित विधि में अंडा-आधारित विधि का प्रयोग किया जाता है। यह विधि 70 साल पुरानी है। दुनिया में कोरोना महामारी फैलने से पहले इन्फ्लुएंजा की वनस्पति-आधारित वैक्सीन का तीसरे चरण का ट्रायल शुरू हो चुका था और उसके उत्साहवर्धक नतीजे सामने आए थे। इस समय एक रिसर्च टीम कोविड-19 के लिए वनस्पति आधारित वैक्सीन पर काम कर रही है। वैज्ञानिकों का कहना है कि औषधियों के नियमन के लिए जिम्मेदार सरकारी संस्थाओं को वनस्पति-आधारित वैक्सीन के लाभों को समझना चाहिए ताकि इन्हें अपनाने के लिए उचित दिशा-निर्देश तैयार किए जा सकें। (लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।)

बहुत ही आकर्षक दिखती है नासा के नए एक्सरे स्पेस टेलिस्कोप से खींची तस्वीर
Published / 2022-02-21 17:21:03
बहुत ही आकर्षक दिखती है नासा के नए एक्सरे स्पेस टेलिस्कोप से खींची तस्वीर

एबीएन डेस्क। अमेरिका के नए एक्सरे स्पेस टेलिस्कोप ने पहली तस्वीर खींचकर भेजी है जो काफी आकर्षक है। इस तस्वीर में सितारे में महाविस्फोट का नजारा दिखाई दे रहा है। यह नया एक्सरे स्पेस टेलिस्कोप अमेरिका की अंतरिक्ष एजेंसी नासा का है। इस टेलिस्कोप ने अपनी पहली तस्वीर केसेपिया ए सुपरनोवा की खींची है। नासा के वैज्ञानिक इस तस्वीर को ऐतिहासिक बता रहे हैं। उन्हें उम्मीद है कि टेलिस्कोप की मदद से सुपरनोवा के बारे में कई जानकारियां मिलेंगी। इस बेहद आकर्षक तस्वीर में सुपरनोवा के विस्फोट के बाद शानदार इलेक्ट्रोमैग्नेटिक चमक दिखाई दे रही है। इस टेलिस्कोप को 9 दिसंबर को एलन मस्क के रॉकेट फॉल्कन 9 की मदद से अंतरिक्ष में भेजा गया था। करीब 1 महीने तक अपने उपकरणों की जांच और अंतरिक्ष के माहौल में ढलने के बाद टेलिस्कोप ने यह पहली तस्वीर खींची है। नासा के मुताबिक यह तस्वीर सुपरनोवा केसेपीया ए की है जो 17 वीं सदी में फटे एक सितारे के गैस के बादलों से बना है। इस शानदार तस्वीर को सोमवार को जारी किया गया। गैस का यह बादल 10 प्रकाशवर्ष चौड़ा है। दिखाई देने योग्य प्रकाश में यह सुपरनोवा इस तरह से बैंगनी रंग में नहीं चमकता है। नासा के शोधकर्ताओं ने यह दिखाने के लिए इस रंग को चुना है कि एक्सरे लाइट बादलों के विभिन्न हिस्से में कितना शक्तिशाली है। जब इस सितारे में विस्फोट हुआ था तब उससे बहुत ज्यादा गर्म गैस आसपास जमा हो गई थी। उसने आसपास के पार्टिकल्स को भी तेज कर दिया था, इससे एक्सरे लाइट में यह तेज प्रकाश दिखाई दे रहा है। जब सितारे का कोर टूटा तब गैस के इन बादलों के बीच में एक बहुत घना ऑब्जेक्ट बना। यह ब्लैक होल या न्यूट्रान स्टार हो सकता है। यह टेलिस्कोप अगले दो साल तक अंतरिक्ष में चुनौतीपूर्ण और रहस्यमय ऑब्जेक्ट का अध्ययन करेगा। इसमें नेबुला, सुपरनोवा, न्यूट्रॉन स्टार और ब्लैक होल शामिल हैं। चंद्रा एक्स रे ऑब्जरवेटरी को साल 1999 में लॉन्च किए जाने के बाद यह पहला बड़ा एक्सरे स्पेस टेलिस्कोप है।

शोध में हुआ खुलासा : अंतरिक्ष यात्रा बदल देती है यात्रियों का दिमाग
Published / 2022-02-21 17:09:16
शोध में हुआ खुलासा : अंतरिक्ष यात्रा बदल देती है यात्रियों का दिमाग

एबीएन डेस्क। एक नए शोध से यह खुलासा हुआ है कि अंतरिक्ष यात्रा से अंतरिक्ष यात्रियों के दिमाग का ढांचा या आकार बदल जाता है और वहां से लौटने के कई माह बाद तक ये बदलाव दिखता रहता है। एक इंसान का दिमाग उम्र के साथ-साथ बदलता रहता है, लेकिन जब बात अंतरिक्ष यात्रा की होती है, तो यह इंसान के दिमाग में पाये जाने वाले फ्लूयड को भी शिफ्ट कर देता है और साथ ही अंतरिक्ष यात्री के दिमाग के आकार में भी तब्दीली लाता है। यह बदलाव अंतरिक्ष यात्रा से वापस आने के कुछ माह तक बना रह सकता है। यूरोप और रूस की अंतरिक्ष एजेंसी ने इस संबंध में मिलकर शोध किया है। यह शोध रिपोर्ट फंट्रियर्स इन न्यूरल सर्किट्स में प्रकाशित हुई है। शोध रिपोर्ट के अनुसार, अंतरिक्ष यात्रियों के कई व्हाइट मैटर ट्रैक्ट जैसे सेंसरीमोटर ट्रैक्ट में हल्के ढांचागत बदलाव देखे गए हैं। व्हाइट मैटर दिमाग का संपर्क चैनल होता है और ग्रे मैटर में प्राप्त सूचना को प्रोसेस किया जाता है। शोधकर्ताओं ने "लर्नेड ब्रेन" की अवधारणा की पुष्टि की है, यानी उनके मुताबिक अंतरिक्ष यात्रा के लिए खुद को अनुकूल बनाने के लिए न्यूरोप्लास्टिसिटी स्तर में बदलाव आता है। न्यूरोप्लास्टिसिटी दिमाग की ऐसी क्षमता है, जो नर्व सेल यानी न्यूरॉन को पर्यावरण या परिस्थिति में आए परिवर्तन के अनुकूल बदलाव लाने की अनुमति देता है। अमेरिका की ड्रेक्सल यूनिवर्सिटी के आंद्रेई डोरोशिन ने कहा कि शोध के दौरान हमें दिमाग के कई मोटर एरिया में न्यूरल कनेक्शन बदलाव दिखे। मोटर एरिया एक ऐसा ब्रेन सेंटर है, जहां मूवमेंट यानी चलने-फिरने आदि के लिए कमांड दिया जाता है। गुरुत्वाकर्षण के बिना अंतरिक्ष में रहने के कारण अंतरिक्ष यात्री को अपनी चाल-ढाल में काफी भारी बदलाव लाना पड़ता है। इसी कारण उनका पूरा दिमाग ही एक तरह से अलग हो जाता है। शोधकर्ताओं ने अंतरिक्ष यात्रा के प्रभाव को जानने के लिए ब्रेन इमेंजिंग तकनीक फाइबर ट्रैक्टोग्राफी का इस्तेमाल किया। उन्होंने रूस के 12 अंतरिक्षयात्रियों के अंतरिक्ष यात्रा से पहले और वहां से तत्काल लौटने के बाद के डिफ्यूजन एमआरई स्कैन का अध्ययन किया। उन्होंने अंतरिक्ष यात्रा से लौटने के सात माह बाद आठ फॉलोअप स्कैन का भी अध्ययन किया। ये सभी अंतरिक्ष यात्री औसतन 172 दिन के अंतरिक्ष अभियान पर गए थे। फॉलो अपस्कैन के अध्ययन से यह खुलासा हुआ कि सात माह बाद भी दिमाग में आया बदलाव दिख रहा है।

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