टीम एबीएन, रांची। एचईसी ने अंतरिक्ष के क्षेत्र में एक बड़ी छलांग लगायी है। रॉकेट के प्रक्षेपण के लिए सबसे संवदेशनील और जटिलतम उकरण व्हील बोगी सिस्टम का निर्माण किया है। गुरुवार को एचएमबीपी में इसरो के विशेषज्ञों की मौजदूगी में इसका ट्रायल किया गया जो शत प्रतिशत सफल रहा है। एचईसी ने इसरो के लिए इसका निर्माण किया है। अधिकारियों के अनुसार व्हील बोगी सिस्टम पीएसएलवी (रॉकेट) एकीकरण प्रणाली में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। यह रॉकेट को असेंबली बिल्डिंग से लांच पैड तक ले जाता है। रॉकेट के सफल प्रक्षेपण के लिए आवश्यक प्रक्षेपण तक निर्देशित भी करता है। डेडिकेटेड होलर वाहन द्वारा संचालित 1.5 किमी के रेल ट्रैक पर चलता है। इसका वजन 85 टन है और यह लगभग 900 टन परिवहन करने में सक्षम है। इस उपकरण का निर्माण काफी चुनौतीपूर्ण था। इसके निर्माण के लिए लॉ एलॉय स्टील विकसित किया गया। इसकी डिजाइन तैयार की है। जटिलतम वेल्डिंग, मशीनिंग के बाद इसकी असेंबलिंग की गयी है। गुरुवार को एचएमबीपी के 043-044 शॉप में व्हील बॉगी सिस्टम का ट्रायल किया गया जो सफल रहा। ट्रायल के दौरान प्लांट के कामगार, अधिकारी, इसरो के विशेषज्ञ मौजूद थे। इसरो के अधिकारी ने बताया कि यह पहली बार है कि इतनी उच्च क्षमता वाली व्हील बोगी प्रणाली भारत में बनी है। यह इसरो के साथ एचईसी के सहयोग के लिए एक नया रास्ता खोलती है। भविष्य में इस तरह के राष्ट्रीय महत्व के कार्यादेश से एचईसी के लिए नया मार्ग प्रशस्त होगा।
एबीएन डेस्क। अखबार तो रोज पढ़ते होंगे, पर कभी ध्यान दिया है कि जब सुबह आपको न्यूजपेपर मिलता है तो सफेद दिखता है। जैसे-जैसे दिन बीतता है इसके कागज का रंग पीला पड़ने लगता है. सिर्फ अखबार ही नहीं, किताबों के साथ भी ऐसा होता है। जैसे-जैसे महीने और साल बीतते हैं, इनका भी रंग पीला पड़ने लगता है। जानिए ऐसा क्यों होता है… अर्थस्काय की रिपोर्ट के मुताबिक, कागज को लकड़ी से तैयार किया जाता है। लकड़ी में दो तरह के तत्व होते हैं : सेल्यूलोज और लिगनिन। इसलिए लकड़ी से तैयार होने वाले कागज में भी यह दोनों चीजें पाई जाती हैं। इसके असर के कारण कागज का रंग बदलता है। ऐसा होता कैसे है, अब इसे समझते हैं। कागज में मौजूद लिगनिन के कण जब हवा और सूरज की रोशनी के सम्पर्क में आते हैं तो रिएक्शन करते हैं, इसे ऑक्सीडेशन कहते हैं। इस दौरान लिगनिन के कण अधिक मात्रा में सूरज की किरणों को एब्जॉर्ब करते हैं। जितना ज्यादा ये किरणों को एब्जॉर्ब करते हैं कागज का रंग गहरा होने लगता है। रिपोर्ट के मुताबिक, यही वजह है कि घर पर मौजूद अखबार के मुकाबले खुले रखा न्यूजपेपर शाम तक पीला या भूरा नजर आता है। एक बड़ा सवाल यह भी है कि हर तरह के कागज में लकड़ी का प्रयोग होता है तो सभी कागज पीले क्यों नहीं होते? विशेषज्ञों का कहना है, कुछ दूसरी तरह के पेपर्स में इतनी तेजी से रंग नहीं बदलता। इसकी भी एक वजह है। महंगे पेपर्स के साथ ऐसा बहुत धीमी गति से होता है क्योंकि पेपर को तैयार करने के बाद इसमें से लिगनिन को बाहर निकाल दिया जाता है। इसलिए पेपर में लिगनिन न मौजूद होने पर सूरज की रोशनी के साथ रिएक्शन नहीं होती। नतीजा, वो पेपर पीला नहीं पड़ता।
एबीएन डेस्क। आपने देखा होगा कि बाजार में कई तरह के सिक्के चलन में हैं। कई सिक्के ऐसे भी आपने देखे होंगे, जिसमें एक और दो रुपये के सिक्के में हाथ के निशान बने होते हैं। ये सिक्के सिर्फ डिजाइन के लिए नहीं है, बल्कि इसका एक खास मतलब होता है। साथ ही इन सिंबल के पीछे भी एक कहानी है, जो बताती है कि इन हाथों को क्या मतलब हैतो जानते हैं इन सिंबल से जुड़ी खास बातें... ये सिंबल भारतनाट्यम डांस से लिए गए हैं। यानी ये जो सिंबल आप सिक्के पर देखते हैं, वो भारतनाट्यम डांस की मुद्राएं हैं। ये मुद्राएं ही एक और दो रुपये के बारे में बताते हैं। इस पर डिजाइन का काम नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ डिजाइन के प्रोफेसर अनिल सिन्हा ने किया था। साथ ही ये हस्त मुद्राएं होती हैं। इसमें आयरन 83 फीसदी होता है और 17 फीसदी क्रोमियम होता है। बता दें कि ये सिक्के साल 2007 में आए थे।
एबीएन सेंट्रल डेस्क। अक्सर देखा होगा जिन ट्रांसपेरेंट शीशियों में दवा की टेबलेट्स रखकर मरीजों को दी जाती हैं उसमें ढक्कन लगाने से पहले रूई रखी जाती है। कभी सोचा है कि ऐसा क्यों होता है। ऐसा खासकर होम्योपैथिक दवाओं के मामले में अधिक देखा जाता है। डॉक्टर शीशी में दवा डालने के बाद उसमें कुछ रूई डालते हैं। इसके बाद ही ढक्कन बंद करते हैं। जानिए ऐसा क्यों होता है। रीडर डाइजेस्ट की रिपोर्ट के मुताबिक, ऐसा करने की शुरुआत 1900 में हुई। कहा जाता है, सबसे पहले फार्मा कंपनी बायर ने ऐसा किया। कंपनी दवा की जिन शीशियों की डिलीवरी करती थी उसमें रूई को गेंद जैसा आकार बनाकर शीशी में रखते थे। दवा की बड़ी कंपनी होने के कारण इस ट्रेंड को दूसरी कंपनियों ने भी फॉलो किया। कंपनी ने ऐसा क्यों किया, इसकी भी एक खास वजह थी। कंपनी का मानना है कि अगर दवाओं से भरी शीशी में रूई लगाई जाती है तो इनके टूटने की आशंका कम हो जाएगी। इसके अलावा डोज की मात्रा घटेगी नहीं। यह समान मात्रा में बनी रहेगी। अगर कोई कस्टमर शीशी को खोलता है तो उसे परेशान नहीं होना पड़ेगा, इसलिए ऐसा किया गया। यह चलन शुरू होने के बाद 1980 में बड़ा बदलाव आया जब टेबलेट के बाहरी हिस्से में ऐसी लेयर बनाई जाने लगी जिससे इन्हें शीशी में रखने पर ये टूटे नहीं। दुनिया की कई बड़ी कंपनियों ने 1999 में ऐसा करना बंद कर दिया। हालांकि स्थानीय स्तर पर फार्मेसी ने ऐसी होम्योपैथिक दवाएं जिनमें अल्कोहल का प्रयोग नहीं किया जाता, उनके लिए रूई का प्रयोग करना जारी रखा। लम्बे समय से मरीजों को ऐसा देखते हुए दवा की खास देखभाल करने की आदत सी हो गई थी। इसलिए मरीज खुद से भी यही काम करने लगे थे। यही कारण था कि कई कंपनियों ने शीशी में रूई रखने का चलन फिर से शुरू किया, जो खासतौर पर होम्योपैथिक दवाओं के मामले में आज भी जारी है।
एबीएन नॉलेज डेस्क। यह है ऐतिहासिक स्टोनहेंज। इंग्लैंड में इसे 5 हजार साल पहले बनाया गया था, लेकिन इसे किसने बनाया और इसे बनाने के पीछे क्या मकसद था, आज भी यह एक रहस्य ही है। इसका पता लगाने के लिए कई वैज्ञानिक सालों से रिसर्च कर रहे हैं। हालिया रिसर्च में एक नई बात सामने आई है। रिसर्च करने वाली बनेर्माउंट यूनिवर्सिटी के आॅर्कियोलॉजिस्ट प्रो टिमोथी ड्रेविल का कहना है, पत्थरों से बना यह स्टोनहेंज एक तरह का सौर कैलेंडर है। शोधकर्ताओं का कहना है, स्टोनहेंज में 15 पत्थर ऐसे हैं जो घोड़े की नाल के आकार के हैं। इन पत्थरों की बनावट अलग किस्म की है। ये एक सौर कैलेंडर की तरह काम करते हैं। यह पूरी कृति एक महीने को प्रदर्शित करती है। इसके अलावा 24 स्टोन का एक सर्किल घंटों की तरह की एक दिन को प्रदर्शित करता है। शोधकर्ताओं का कहना है, इस स्टोनहेंज का प्रयोग ऐतिहासिक कैलेंडर के तौर पर किया जाता रहा है। हालांकि, इंग्लैंड के लोगों में इसको लेकर अलग-अलग मत हैं। कुछ स्थानीय लोगों का मानना है कि पत्थरों का यह समूह कोई मंदिर या कब्रगाह हो सकता है। वहीं, कुछ का मानना है कि यह पूजा करने का स्थान भी हो सकता है। स्टोनहेंज का ऊपरी और बाहरी हिस्सा हील स्टोन, स्लाटर स्टोन और स्टेशन स्टोन की तरह बना हुआ है। स्टोनहेंज पर इतिहासकारों का कहना है कि गर्मियों में सूर्य हील स्टोन के पीछे से पूर्व-उत्तर की तरफ उगता है। इसकी सबसे पहली किरण ही स्टोनहेंज पर पड़ती है। जबकि सर्दी मौसम में इसके बीचों-बीच सूर्यास्त होता है, जो दक्षिण-पश्चिम की ओर होता है। शोधकतार्ओं का कहना है कि स्टोनहेंज के मुताबिक, हफ्ते में 10 दिन होते हैं। यह एक खास तरह का कैलेंडर होता है। एक ऐसा सौर कैलेंडर 3,000 ईसा पूर्व के बाद पूर्वी भूमध्यसागरीय क्षेत्र में विकसित किया गया था। मिस्र में भी 2,700 ईसा पूर्व में इसे अपनाया।
एबीएन सेंट्रल डेस्क। रूस और यूक्रेन के बीच चले रही जंग के बीच अब तक के सबसे बड़े साइबर अटैक की खबर है। इस अटैक के बाद यूरोप के कई शहरों के हजारों यूजर्स का इंटरनेट बंद हो गया है। ऑरेंज के मुताबिक पिछले महीने 24 फरवरी को वायसैट पर हुए एक बड़े साइबर अटैक के बाद फ्रांस में इसकी सहायक कंपनी नॉर्डनेट की सैटेलाइट इंटरनेट सेवा के करीब 9,000 यूजर्स का इंटरनेट कनेक्शन बंद हो गया है। आपको याद दिला दें कि 24 फरवरी को ही रूस ने यूक्रेन के साथ युद्ध की शुरुआत की थई। सैटेलाइट इंटरनेट सर्विस देने वाली एक अन्य कंपनी bigblu ने भी कंफर्म किया है कि उसके यूरोप, जर्मनी, फ्रांस, ग्रीक, इटली और पोलैंड के करीब 40 हजार यूजर्स में एक तिहाई का इंटरनेट बंद हो गया है। बता दें कि Eutelsat, bigblu की पैरेंट कंपनी है। संदेह है कि ये यूजर्स भी वायसैट पर हुए अटैक से ही प्रभावित हैं। वायसैट ने कहा कि एक साइबर अटैक के बाद से यूरोप में यूक्रेन और अन्य जगहों पर आंशिक नेटवर्क आउटेज बना हुआ है। Viasat ने इस अटैक के बारे में विस्तार से जानकारी नहीं दी है। कंपनी का कहना है कि पुलिस और राज्य के साझेदारों का इस संबंध में सूचित किया गया है और वे मामले की जांच कर रहे हैं। फ्रांस के स्पेस कमांड के प्रमुख जनरल मिशेल फ्रिडलिंग ने कहा कि साइबर अटैक हुआ है। Viasat ने अपने एक बयान में कहा कि खासतौर पर यूरोप और यूक्रेन को कवर करने वाले सैटेलाइट नेटवर्क पर अटैक हुआ जिसके बाद सैटेलाइट के हजारों टर्मिनल निष्क्रिय हो गए थे। इस अटैक के कारण जर्मनी और मध्य यूरोप में 11 गीगावाट के करीब 5,800 पवन टर्बाइन भी बंद हो गए हैं। बता दें इससे पहले यूक्रेन की संसद और अन्य सरकारी और बैंकिंग वेबसाइटों पर भी साइबर अटैक हुए हैं। अटैक के बाद हैकर्स ने सरकारी साइट और बैंक के कंप्यूटर में मैलवेयर भी डाले हैं। ईएसईटी रिसर्च लैब्स ने ही इस अटैक की पुष्टि की थी। लैब ने कहा कि उसने यूक्रेन के कंप्यूटर पर डाटा-वाइपिंग मैलवेयर (डाटा को डिलीट करने वाले) का पता लगाया है। लैब का दावा था कि इस अटैक में यूक्रेन की कई बड़ी संस्थाओं को भी निशाना बनाया गया है।
एबीएन नॉलेज डेस्क। देश को आजादी दिलाने में महात्मा गांधी का महत्वपूर्ण योगदान रहा है। उनके इसी योगदान की वजह से उन्हें राष्ट्र पिता का दर्जा मिला हुआ है। लेकिन भारतीय नोट पर गांधी जी की फोटो कहां से आई, क्या आप इसके बारे में जानते हैं। नहीं तो हम आपको बताते हैं। आपको बता दें कि पिछले दो दशकों में भारतीय नोटों की शक्ल तो बदलती गई, लेकिन सभी में गांधी जी की फोटो हमेशा कॉमन रही है। आइए जानते हैं इसके बारे में... कहां से आई गांधी की फोटो : यह तस्वीर उस समय खींची गई, जब गांधी जी ने तत्कालीन बर्मा (म्यांमार) और भारत में ब्रिटिश सेक्रेटरी के रूप में कार्यरत फ्रेडरिक पेथिक लॉरेंस के साथ कोलकाता स्थित वायसराय हाउस में मुलाकात की थी। इसी तस्वीर से गांधीजी का चेहरा पोट्रेट के रूप में भारतीय नोटों पर अंकित किया गया। क्या कहते हैं नियम : अब एक और दो रुपये के नोट चलन में नहीं हैं। हालांकि, एक रुपये के नोट की छपाई दोबारा शुरू हो चुकी है। इसे 1994 से बंद कर दिया गया था। इनकी जगह सिक्कों ने ले ली थी। वहीं, जब एक रुपये का नोट चलन में था, तब उस पर रिजर्व बैंक के गवर्नर की जगह फाइनेंस सेक्रेटरी (वित्त सचिव) के हस्ताक्षर अंकित हुआ करते थे। करेंसी आॅफ आॅर्डिनेंस के नियमानुसार एक रुपये का नोट भारत सरकार द्वारा, जबकि दो रुपये से अधिक की करेंसी रिजर्व बैंक आॅफ इंडिया द्वारा जारी की जाती थी। मौजूदा समय में दो रुपये का उत्पादन बंद है, लेकिन पुराने नोट अभी भी चलन में हैं। नोटों पर कभी छपती थी किंग जॉर्ज की तस्वीर : भारतीय रुपया 1957 तक 16 आनों में रहा। इसके बाद मुद्रा की दशमलव प्रणाली अपनाई गई और एक रुपये का निर्माण 100 पैसों में किया गया। किंग जॉर्ज की फोटो वाला नोट 1949 तक चलन में था। इसके बाद अशोक स्तंभ वाला नोट आया था। महात्मा गांधी वाले कागजी नोटों की शुरूआत 1996 से शुरू हुई, जो अब तक चलन में है। 1996 में हुआ नोटों में परिवर्तन : आज हम भारतीय नोटों पर गांधी जी का चित्र देख रहे हैं, जबकि इससे पहले नोटों पर अशोक स्तंभ अंकित हुआ करता था। रिजर्व बैंक आॅफ इंडिया द्वारा 1996 में नोटों में परिवर्तन करने का फैसला लिया गया। इसके अनुसार अशोक स्तंभ की जगह राष्ट्रपिता महात्मा गांधी का फोटो और अशोक स्तंभ की फोटो नोट के बायीं तरफ निचले हिस्से पर अंकित कर दी गई। 5 रुपये से लेकर 2 हजार तक के नोट में गांधी जी की फोटो दिखाई देती है। इससे पहले 1987 में जब पहली बार 500 का नोट चलन में आया तो उसमें गांधी जी का वॉटरमार्क यूज किया गया था। 1996 के बाद हरेक नोट में गांधीजी का चित्र अंकित हो गया। आरबीआई ने बताई ये खास बात : रिजर्व बैंक आॅफ इंडिया ने बताया कि सभी नोटों पर वाटर मार्क एरिया में महात्मा गांधी की फोटो मुद्रित करने की सिफारिश 15 जुलाई 1993 और नोट में दाहिनी तरफ महात्मा गांधी का चित्र मुद्रित करने की सिफारिश 13 जुलाई 1995 को आरबीआई ने केंद्र सरकार से की थी। आरबीआई ने जवाब में कहा कि यह निर्णय केंद्र सरकार ने कब लिया, कब लागू हुआ और किस तारीख से महात्मा गांधी की फोटो भारतीय नोटों पर छापने का कार्य शुरू हुआ। इसकी जानकारी उनके पास उपलब्ध नहीं है।
एबीएन नॉलेज डेस्क। एक टूटे चीनी रॉकेट का 3 टन वजनी कचरा 9,300 किमी प्रति घंटे की रफ्तार के साथ चांद की सतह से टकराने वाला है। इस दौरान चांद पर इतना बड़ा गड्ढा हो सकता है, जिसमें ट्रैक्टर जितने बड़े कई वाहन समा सकते हैं। चांद की यह सतह ऐसी जगह पर मौजूद है जहां धरती की दूरबीनों की नजर तक नहीं पड़ सकती है। यहां तक कि उपग्रह से लिए गए चित्रों की पुष्टि में भी कई हफ्ते या माह लग सकते हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि चीन का यह रॉकेट करीब एक दशक पहले अंतरिक्ष में छोड़ा गया था और तभी से यह अंतरिक्ष में इधर-उधर भटक रहा है। हालांकि चीनी अधिकारियों ने इस रॉकेट के चीन का होने पर संदेह जताया है। लेकिन वैज्ञानिकों का मानना है कि इस टक्कर से चांद की सतह पर 10 से 20 मीटर का गड्ढा हो जाएगा और चांद की धूल उड़कर सतह पर सैकड़ों किलोमीटर दूर तक फैल जाएगी। पृथ्वी के पास ही अंतरिक्ष में तैर रहे कचरे पर नजर रखना तुलनात्मक रूप से आसान होता है। गहरे अंतरिक्ष में भेजी जाने वाली चीजों के किसी दूसरी चीज से टकराने की संभावना भी कम होती है और उन्हें अक्सर जल्दी ही भुला भी दिया जाता है। लेकिन यह रॉकेट चांद की उस दिशा में है जो पृथ्वी से दिखाई नहीं देता है। चीन ने इस सतह पर तीन वर्ष पहले एक सैटेलाइट लांच करने में सफलता पाई है। बिल ग्रे ने लगाया इस कचरे का पता : सिर्फ शौकिया तौर पर खगोलीय जासूस की भूमिका निभा रहे मुट्ठी भर अंतरिक्ष पर्यवेक्षक ऐसे कचरे पर नजर रखते हैं। इसी तरह के एक पर्यवेक्षक बिल ग्रे ने जनवरी में इस रॉकेट के चांद से टकराने के मार्ग का पता लगाया। ग्रे एक गणितज्ञ और एक भौतिकशास्त्री हैं। शुरू में उन्होंने स्पेसएक्स को इसका जिम्मेदार माना था, लेकिन बाद में ग्रे ने एक माह बाद बताया कि अब वे जान चुके हैं कि वह रहस्यमयी चीज कुछ और है। चीन बोला- वह रॉकेट जल चुका है : बिल ग्रे ने बताया, संभव है कि वो एक चीनी रॉकेट का तीसरा चरण है जिसने 2014 में चांद पर एक परीक्षण कैप्सूल भेजा था। कैप्सूल वापस आ गया लेकिन रॉकेट उसके बाद भटकता ही रहा। हालांकि चीनी अफसरों ने कहा, वह रॉकेट पृथ्वी के वायुमंडल में लौटने के बाद जल गया था। लेकिन एक जैसे नाम वाले दो चीनी मिशन थे जिनमें एक यह परीक्षण उड़ान थी और दूसरी 2020 का चांद की सतह से पत्थरों के सैंपल लाने वाला मिशन। इस संबंध में धरती के पास अंतरिक्षीय कचरे पर नजर रखने वाले अमेरिकी कमांड ने बुधवार को बताया कि 2014 के मिशन वाला चीनी रॉकेट कभी धरती के वायुमंडल में लौटा ही नहीं।
एबीएन डेस्क। गूगल एक शार्ट नाम है, गूगल का पूरा नाम “GLOBAL ORGANIZATION OF ORIENTED GROUP LANGUAGE OF EARTH" है। सर्च इंजन के साथ साथ गूगल एक बहुत बड़ी मल्टीनेशनल कम्पनी है, एडवरटाईजमेंट, Analytics, Cloud Computing, Play Store, अपना खुद का ब्राउज़र यहा तक कि अपना खुद का ऑपरेटिंग सिस्टम (एंड्राइड) भी है और गूगल इन सभी से पैसा कमाती है। गूगल की शुरुआत : लैरी पेज और सर्गेई ब्रिन ने शुरुआत में अपने सर्च इंजन का नाम बैकरब रखा था। इस नाम के रखने की वजह ये थी, कि यह सर्च इंजन पिछली कड़ियों के आधार पर किसी साइट की प्रायोरिटी तय करता था, Google.com डोमेन को 15 सितंबर, 1997 को पंजीकृत किया गया था और इसे 4 सितंबर 1988 को शुरू किया गया, Edword kasner और James Newman के द्वारा लिखी गई एक किताब जिसका नाम Mathemetics and Immagination मे लिखे गये एक शब्द गूगल से प्रेरित हो कर रखा था इसका मतलब वह नंबर जिसमें एक के बाद सौ शून्य हों। जिस समय बनाया गया था, उस समय सर्च इंजन का रिजल्ट, पेज की प्रॉयोरिटी पर निर्भर करता था, जो वेब पेज पर की वर्ड की गणना से तय करते थ, लेकिन लैरी और सर्गेई के अनुसार एक बेहतर सर्च सिस्टम वह है, जो वेब पेज के संबंध में पूरी जानकारी दे, इस नए तकनीक को उन्होनें पेजरैंक का नाम दिया।
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