ज्ञान विज्ञान

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Published / 2022-02-24 15:17:59
जापान : जानवर जन्म दे सकेंगे इंसानी बच्चे!

एबीएन डेस्क। वैज्ञानिक उस तरीके पर काम कर रहा है, जिससे पशुओं के गर्भ में मानव-कोशिकाओं का विकास हो सकेगा। वैज्ञानिक उस तरीके पर काम कर रहा है, जिससे पशुओं के गर्भ में मानव-कोशिकाओं का विकास हो सकेगा। जानवरों के गर्भाशय में इंसानी कोशिकाओं को प्रत्यारोपित करने पर जो जीव जन्म लेगा, वो आधा इंसान-आधा पशु हो, ऐसे खतरे भी हैं। इसी के चलते अमेरिका तक ने इस प्रयोग पर रोक लगा दी थी। जापान के एक स्टेम-सेल वैज्ञानिक को वहां की सरकार ने एक खास शोध के लिए सरकारी सहायता देने की शुरुआत की है। वैज्ञानिक उस तरीके पर काम कर रहा है, जिससे पशुओं के गर्भ में मानव-कोशिकाओं का विकास हो सकेगा। यानी जानवर एक तरह से सरोगेट मां की तरह काम करेंगे, जिनकी कोख से वैसी कोई चीज जन्म लेगी, जिसके शरीर में इंसानी अंग हों। जापानी स्टेम सेल वैज्ञानिक को मिली इजाजत : विज्ञान की दुनिया में इंसान एक से बढ़कर एक प्रयोग कर रहा है। कृत्रिम अंग प्रत्यारोपण जैसी मुश्किल और एक समय पर असंभव समझी जाने वाली प्रक्रिया अब आम है। इसी कड़ी में वैज्ञानिक और आगे बढ़ने की सोच रहे हैं। जापान में हिरोमित्सू नकॉची नाम के वैज्ञानिक, जो यूनिवर्सिटी आॅफ टोक्यो में स्टेम सेल के अगुआ हैं, उन्हें जापान सरकार ने जानवरों की कोख में इंसानी भ्रूण के विकास पर प्रयोग करने की इजाजत दे दी। वैज्ञानिक अपनी टीम समेत इसपर काम भी शुरू कर चुके हैं। टीम की योजना ये है कि पहले चूहों के एंब्रियो में मानव कोशिकाएं विकसित की जाएं और फिर उस एंब्रियो को सरोगेट जानवरों के गर्भ में प्रत्यारोपित कर दिया जाए। इस प्रयोग का असल मकसद इंसानी शिशु बनाना नहीं, बल्कि ऐसे पशु तैयार करना है, जिनके शरीर के अंग मानव कोशिकाओं से बने हों ताकि जरूरतमंद इंसानों में ये प्रत्यारोपित किए जा सकें। देशों ने कहा गलत : जापान से पहले कई देश इसे कुदरत से खिलवाड़ बताते हुए ऐसे प्रोजेक्ट को नामंजूर कर चुके हैं। इनमें अमेरिका भी एक देश है। वहां साल 2015 से पहले लैब्स में इस तरह की कोशिशें चल रही थीं लेकिन फिर नेशनल इंस्टीट्यूट आॅफ हेल्थ इसे गलत बताते हुए इस तरह के किसी भी प्रोजेक्ट पर रोक लगा दी। वहीं जापान के साइंटिस्ट कुदरती प्रक्रिया को चुनौती देते हुए जानवर की कोख से इंसान के जन्म लेने के प्रोजेक्ट पर जुट गए हैं। अगर ये हो सका तो ये साइंस का सबसे बड़ा कारनामों में से एक हो सकता है। इस तरह होगा प्रयोग : जापान के साइंटिस्ट ने इसका खाका भी तैयार कर लिया है, कि कैसे इस प्रोजेक्ट को अंजाम देना है। शुरूआती तौर पर इसमें चूहे के गर्भाशय में ह्यूमन सेल्स डेवलप किए जाएंगे। इसके बाद के चरण में जानवर की कोख में सेरोगेसी की संभावना देखी जाएगी। यानी इंसान के भ्रूण को जानवर के गर्भाशय में डेवलप करने की प्रक्रिया पर काम किया जाएगा। क्या है सरोगेसी की प्रक्रिया : इसमें अगर किसी महिला को गर्भाशय से जुड़ी बड़ी समस्या होती है तो वो गर्भ में शिशु को धारण नहीं कर पाती। या फिर बार-बार गर्भपात होता है। ऐसे मामलों में किसी दूसरी महिला के गर्भाशय में मानव भ्रूण को विकसित किया जाता है। इसकी प्रक्रिया बड़ी नॉर्मल होती है और ऐसे कई मशहूर सेलिब्रेटी हुए हैं, जिन्होंने इस विधि से संतान हासिल की है। इस विधि में माता-पिता के शुक्राणु का मेल परखनली विधि से करवा कर भ्रूण को सरोगेट मदर (किराए की कोख वाली महिला) के गर्भाशय में प्रत्यारोपित कर दिया जाता है। इस प्रक्रिया में बच्चे का जेनेटिक संबंध माता-पिता से ही होता है, बस भ्रूण का विकास और उसका जन्म सरोगेसी के जरिए होता है। इससे एक कदम आगे बढ़ते हुए अब मानव भ्रूण का विकास किसी जानवर के गर्भाशय में करने की तैयारी चल रही है। यूनिवर्सिटी आॅफ टोक्यो में इस प्रोजेक्ट पर काम भी शुरू हो गया है। खतरनाक शक्ल ले सकता है जापान का ये प्रोजेक्ट : जापान के मशहूर जेनेटिसिस्ट हिरोमित्सू नकॉची ने इस प्रोजेक्ट पर काम करना शुरू कर दिया है। पहले पहल जानवर के गर्भाशय में मानव अंगों को उगाने की प्रक्रिया पर काम होगा, जिसे किसी जरूरतमंद इंसान को प्रत्यारोपित किया जा सके। आगे हो सकता है ये खतरा : इस प्रोजेक्ट में सबसे खतरनाक बात ये है कि ये इसका अगला चरण अपने मकसद से भटक सकता है। अगर ये प्रोजेक्ट कामयाब हो गया तो फिर संभव है कि आने वाले वक्त में एक ऐसा जीव अस्तित्व में आ जाए जो आधा इंसान और आधा जानवर हो। या फिर ये भी हो सकता है कि गर्भ में भ्रूण के पलने से इंसानी कोशिकाएं किसी तरह बढ़ते हुए पशु के दिमाग तक भी पहुंच जाएं। ऐसे में उसका मस्तिष्क बुरी तरह से प्रभावित हो सकता है। इसी बात को देखते हुए दुनिया के कई देशों ने इस तरह के प्रोजेक्ट रोक दिए। ऐसे प्रोजेक्ट को आर्थिक सहायता देनी बंद कर दी। हालांकि जापान की एजुकेशन और साइंस मिनिस्ट्री ने सालभर पहले इसे अप्रूव कर दिया। इधर काम में लगे वैज्ञानिकों का कहना है कि हम जानवर के गर्भाशय में अचानक से मानव अंग नहीं उगा लेंगे। हम धीरे-धीरे उस चरण तक पहुंचेंगे। हमारा एडवांस रिसर्च हमें उस जगह तक ले जाएगा। उनका प्लान है कि इस प्रोसेस को धीरे-धीरे अंजाम दिया जाए। पहले जानवरों के हाइब्रिड गर्भाशय उगाने पर काम होगा।

Published / 2022-02-23 09:22:18
अब बिना इंटरनेट ऑपरेट कर सकेंगे जीमेल...

एबीएन डेस्क। आज के समय में हर कोई स्मार्टफोन का इस्तेमाल करता है। वहीं इसमें गूगल की तमाम सुविधाएं लेने के लिए जीमेल आईडी की जरूरत होती है। ऐसे में जाहिर है आप भी जीमेल का इस्तेमाल जरूर करते होंगे, लेकिन क्या आप जानते हैं कि जीमेल को आप ऑफलाइन भी इस्तेमाल कर सकते हैं। इसको आप जरूरी डॉक्युमेंट्स भेजने, कोई मैसेज भेजने या फिर फाइल भेजने के लिए यूज करते है। मोबाइल में मौजूद अन्य एप की ही तरह इसे चलाने के लिए भी इंटरनेट का इस्तेमाल किया जाता है। इसे मोबाइल और डेस्कटॉप दोनों पर चलाया जाता है, जिसके लिए आपको इंटरनेट की जरूरत होती है। ऐसे में आज हम आपको एक ऐसी ट्रिक के बारे में बताने जा रहे हैं, जिससे आप बिना इंटरनेट के भी जीमेल का इस्तेमाल कर सकते हैं। इस ट्रिक की मदद से आपके कई काम आसान हो सकता है। तो आइए जानते इसके लिए आपको क्या करना होगा। अगर आप अपना जीमेल बिना इंटरनेट के भी चलाना चाहते हैं, तो इसके लिए आपको इन स्टेप्स को फॉलो करना होगा। इस ट्रिक की मदद से आप कोई ईमेल रिसीव कर सकते हैं, किसी भी मेल को पढ़ सकते हैं। इसके अलावा आप मेल सेंड भी कर सकते हैं। • इसके लिए आपको सबसे पहले अपने डिवाइस में क्रोम 61 को डाउनलोड करना होगा। • इसके बाद जीमेल पर जाना है, यहां ऊपर दाईं तरफ बने सेटिंग्स के आइकन पर क्लिक करना है। • अब इसके ठीक नीचे आपको See All Settings पर क्लिक करना है। ऐसा करते ही आपके सामने एक टैब खुल जाएगा। इसमें आपको कई ऑप्शन दिखेंगे, जिसमें सबसे लास्ट से दूसरा ऑप्शन Offline होगा। • यहां पर आपको Enable Offline के ऑप्शन पर टिक करना होगा। साथ ही इसको सेव करना न भूलें। ऐसा करने पर आपके जीमेल में ऑफलाइन फीचर्स एक्टिवेट हो जाएगा। इसके बाद आप आसानी से ऑफलाइन मोड में भी मेल पढ़ सकेंगे, रिसीव कर सकेंगे। साथ ही मेल भेज भी सकेंगे।

Published / 2022-02-21 17:58:30
अब खेतों-बगीचों में भी उगेगी वैक्सीन

एबीएन डेस्क (मुकुल व्यास)।चौंकिए मत... अब कुछ ऐसा ही होनेवाला है। क्योंकि वैज्ञानिक ऐसी वैक्सीन बना रहे हैं जिन्हें खेतों में उगाया जा सकेगा और खाद्य वस्तुओं की तरह खाया जा सकेगा। अमेरिका में रिवरसाइड स्थित कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय (यूसीआर) के वैज्ञानिक यह पता लगाने की कोशिश कर रहे हैं कि क्या लेटस (सलाद) पत्तों को एमआरएनए वैक्सीन की फैक्टरियों में बदला जा सकता है। कोविड वैक्सीनों में प्रयुक्त मैसेंजर आरएनए या एमआरएनए टेक्नोलॉजी में मुख्य रूप से कोशिकाओं को रोगाणुओं को पहचानने और संक्रामक रोगों से बचाव करने के बारे में शिक्षित किया जाता है। इस टेक्नोलॉजी के प्रयोग में सबसे बड़ी चुनौती इसे परिवहन और स्टोरेज के दौरान ठंडा रखने की है। वैक्सीन के स्थायित्व के लिए निम्न तापमान जरूरी है। यदि विज्ञानियों का नया प्रोजेक्ट सफल हो जाता है तो पौधों पर आधारित खाने योग्य एमआरएनए वैक्सीन इस समस्या को दूर कर सकती है। इस तरह की वैक्सीनों को कमरे के तापमान पर स्टोर किया जा सकता है। अमेरिका की नेशनल साइंस फाउंडेशन से पांच लाख डॉलर के अनुदान से शुरू किए गए प्रोजेक्ट के तीन मुख्य उद्देश्य हैं। पहला, क्या एमआरएनए से युक्त डीएनए को पौधे की कोशिकाओं के उस हिस्से में पहुंचाया जा सकता है जहां वह रिप्लीकेट कर सके। दूसरा, यह सिद्ध करना कि पौधे एक पारंपरिक वैक्सीन की बराबरी करने के लिए समुचित एमआरएनए उत्पन्न कर सकते हैं और तीसरा, पौधा आधारित वैक्सीन की सही खुराक का निर्धारण। यूसीआर में वनस्पति विज्ञान के असिस्टेंट प्रोफेसर जुआन पाब्लो गिराल्डो ने कहा कि एक पौधे द्वारा उत्पादित एमआरएनए से एक व्यक्ति को वैक्सीन की खुराक दी जा सकेगी। गिराल्डो इस शोध का नेतृत्व कर रहे हैं। इस शोध में सेन डियागो स्थित कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय और कार्नेगी मेलन विश्वविद्यालय के विज्ञानी शामिल हैं। उन्होंने बताया कि हम पालक और लेटस के साथ नयी टेक्नोलॉजी का परीक्षण कर रहे हैं। हमारी कोशिश यह रहेगी कि लोग आगे चल कर अपने बगीचों में ही वैक्सीन के पौधे उगाएं। भविष्य में किसान भी अपने सारे खेत में वैक्सीन वाले पौधे उगा सकते हैं। इस टेक्नोलॉजी में सबसे अहम भूमिका पौधे की कोशिकाओं में पाए जाने वाले क्लोरोप्लास्ट की है। क्लोरोप्लास्ट सूरज की रोशनी को ऊर्जा में बदल देते हैं, जिसका प्रयोग पौधा करता है। ये दरअसल सौर ऊर्जा से चलने वाली सूक्ष्म फैक्टरियां हैं जो शुगर और दूसरे मॉलिक्यूल उत्पन्न करती हैं, जिनसे पौधे का विकास होता है। इन फैक्टरियों का प्रयोग वांछित मॉलिक्यूल उत्पन्न करने के लिए भी किया जा सकता है। पिछले अध्ययनों में गिराल्डो यह दर्शा चुके हैं कि क्लोरोप्लास्ट ऐसे जीनों को अभिव्यक्त कर सकता है जो स्वाभाविक रूप से पौधे का हिस्सा नहीं हैं। उन्होंने और उनके सहयोगियों ने पौधों की कोशिकाओं में बाहरी आनुवंशिक सामग्री भेज कर ऐसा कर दिखाया। अपने प्रोजेक्ट के लिए उन्होंने नैनो इंजीनियरिंग की प्रोफेसर निकोल स्टीनमर्ट्ज से सहयोग लिया। स्टीनमर्ट्ज और उनके सहयोगियों ने आनुवंशिक सामग्री को क्लोरोप्लास्ट में पहुंचाने के लिए नैनो टेक्नोलॉजी विकसित की है। स्टीनमर्ट्ज ने बताया कि हम पौधों में जीन पहुंचाने के लिए पौधों के वायरसों का प्रयोग करना चाहते हैं जो कुदरती रूप से पाए जाने सूक्ष्म कण अथवा नैनो पार्टिकल हैं। इन वायरसों को क्लोरोप्लास्ट में पहुंचाने और उन्हें पौधों के प्रति असंक्रामक बनाने के लिए कुछ तकनीकी फेरबदल की जरूरत पड़ती है। कुछ वैज्ञानिकों का ख्याल है कि हमें पौधों पर आधारित वैक्सीन विकसित करने के लिए अधिक प्रयास करने चाहिए। कनाडा में क्यूबेक स्थित लवाल विश्वविद्यालय के दो शोधार्थियों, फास्टर-बोवेंडो और गेरी कोबिंगर का कहना है कि इस तरह की वैक्सीन "मॉलिक्यूलर फार्मिंग" के जरिए बनाई जा सकती है। इस विधि में पौधे की कोशिका में डीएनए रखा जाता है जो प्रोटीन बनाता है। इस कोशिका का उपयोग वैक्सीन बनाने के लिए किया जाता है। वैज्ञानिक मान्यता प्राप्त वैक्सीनों के अलावा और अधिक प्रभावी वैक्सीन की तलाश में जुटे हुए हैं। उनकी कोशिश एक ऐसी समग्र वैक्सीन विकसित करने की है जो सभी तरह के कोरोना वायरसों के खिलाफ प्रभावी सिद्ध हो। वैक्सीनें आम तौर पर बैक्टीरियाई सिस्टम में उत्पन्न की जाती हैं और वे बहुत असरदार साबित हुई हैं। ऐसे सिस्टम को बायोरिएक्टर भी कहा जाता है। ऐसी वैक्सीनों की उत्पादन लागत बहुत ज्यादा होती है। वैक्सीन की बायोमैन्युफैक्चरिंग के विकल्प के तौर पर वैज्ञानिकों ने 1986 में मॉलिक्यूलर फार्मिंग का प्रस्ताव रखा था। इसके लिए वैज्ञानिकों को सिर्फ ग्रीनहाउस सेटअप की आवश्यकता पड़ती है जो बायोरिएक्टरों की तुलना में बहुत सस्ते पड़ते हैं। रिसर्चरों का कहना है कि पौधों पर आधारित वैक्सीन बनाना सस्ता पड़ेगा और इसके दूसरे लाभ भी होंगे। एक बहुत बड़ा फायदा यह है कि इस तरह की वैक्सीन बनाने के लिए संसाधनों की तलाश पर अधिक ध्यान नहीं देना पड़ेगा। वैक्सीनों को बायोरिएक्टरों में तैयार करने के बजाय खेतों की फसलों में उत्पन्न किया जा सकता है। दूसरा बड़ा फायदा यह है कि पौधे मानव रोगाणुओं द्वारा संक्रमित नहीं हो सकते। इसके अलावा पिछली रिसर्च से पता चलता है कि पौधों पर आधारित वैक्सीन दूसरी विधियों से तैयार वैक्सीनों की तुलना में ज्यादा मजबूत इम्यून रेस्पांस उत्पन्न करती हैं। सामान्य विधियों की तुलना में पौधों पर आधारित वैक्सीन का उत्पादन ज्यादा होता है। इस समय गौशे रोग के इलाज के लिए इस तरह की वैक्सीन का उत्पादन किया जा रहा है। लीवर और स्प्लीन जैसे शरीर के कुछ अंगों में वसायुक्त पदार्थों के जमाव से गौशे रोग उत्पन्न होता है। इन पदार्थों के जमा होने से इन अंगों का आकार बढ़ जाता है, जिसकी वजह से उनके कार्यों पर असर पड़ता है। वसायुक्त पदार्थ हड्डियों के ऊतकों में भी जमा होने लगते हैं, जिनसे हड्डियां कमजोर हो जाती हैं और फ्रैक्चर का खतरा बढ़ जाता है। गौशे रोग के इलाज में प्रयुक्त होने वाला ग्लूकोसेरिब्रोसिडेस नामक एंजाइम गाजर की सेल कल्चर में उत्पन्न होता है। अमेरिका के सेंटर्स फॉर डिजीज कंट्रोल एंड प्रिवेंशन (सीडीसी) के अनुसार फ्लू वैक्सीनों के निर्माण के लिए सबसे ज्यादा प्रचलित विधि में अंडा-आधारित विधि का प्रयोग किया जाता है। यह विधि 70 साल पुरानी है। दुनिया में कोरोना महामारी फैलने से पहले इन्फ्लुएंजा की वनस्पति-आधारित वैक्सीन का तीसरे चरण का ट्रायल शुरू हो चुका था और उसके उत्साहवर्धक नतीजे सामने आए थे। इस समय एक रिसर्च टीम कोविड-19 के लिए वनस्पति आधारित वैक्सीन पर काम कर रही है। वैज्ञानिकों का कहना है कि औषधियों के नियमन के लिए जिम्मेदार सरकारी संस्थाओं को वनस्पति-आधारित वैक्सीन के लाभों को समझना चाहिए ताकि इन्हें अपनाने के लिए उचित दिशा-निर्देश तैयार किए जा सकें। (लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।)

Published / 2022-02-21 17:21:03
बहुत ही आकर्षक दिखती है नासा के नए एक्सरे स्पेस टेलिस्कोप से खींची तस्वीर

एबीएन डेस्क। अमेरिका के नए एक्सरे स्पेस टेलिस्कोप ने पहली तस्वीर खींचकर भेजी है जो काफी आकर्षक है। इस तस्वीर में सितारे में महाविस्फोट का नजारा दिखाई दे रहा है। यह नया एक्सरे स्पेस टेलिस्कोप अमेरिका की अंतरिक्ष एजेंसी नासा का है। इस टेलिस्कोप ने अपनी पहली तस्वीर केसेपिया ए सुपरनोवा की खींची है। नासा के वैज्ञानिक इस तस्वीर को ऐतिहासिक बता रहे हैं। उन्हें उम्मीद है कि टेलिस्कोप की मदद से सुपरनोवा के बारे में कई जानकारियां मिलेंगी। इस बेहद आकर्षक तस्वीर में सुपरनोवा के विस्फोट के बाद शानदार इलेक्ट्रोमैग्नेटिक चमक दिखाई दे रही है। इस टेलिस्कोप को 9 दिसंबर को एलन मस्क के रॉकेट फॉल्कन 9 की मदद से अंतरिक्ष में भेजा गया था। करीब 1 महीने तक अपने उपकरणों की जांच और अंतरिक्ष के माहौल में ढलने के बाद टेलिस्कोप ने यह पहली तस्वीर खींची है। नासा के मुताबिक यह तस्वीर सुपरनोवा केसेपीया ए की है जो 17 वीं सदी में फटे एक सितारे के गैस के बादलों से बना है। इस शानदार तस्वीर को सोमवार को जारी किया गया। गैस का यह बादल 10 प्रकाशवर्ष चौड़ा है। दिखाई देने योग्य प्रकाश में यह सुपरनोवा इस तरह से बैंगनी रंग में नहीं चमकता है। नासा के शोधकर्ताओं ने यह दिखाने के लिए इस रंग को चुना है कि एक्सरे लाइट बादलों के विभिन्न हिस्से में कितना शक्तिशाली है। जब इस सितारे में विस्फोट हुआ था तब उससे बहुत ज्यादा गर्म गैस आसपास जमा हो गई थी। उसने आसपास के पार्टिकल्स को भी तेज कर दिया था, इससे एक्सरे लाइट में यह तेज प्रकाश दिखाई दे रहा है। जब सितारे का कोर टूटा तब गैस के इन बादलों के बीच में एक बहुत घना ऑब्जेक्ट बना। यह ब्लैक होल या न्यूट्रान स्टार हो सकता है। यह टेलिस्कोप अगले दो साल तक अंतरिक्ष में चुनौतीपूर्ण और रहस्यमय ऑब्जेक्ट का अध्ययन करेगा। इसमें नेबुला, सुपरनोवा, न्यूट्रॉन स्टार और ब्लैक होल शामिल हैं। चंद्रा एक्स रे ऑब्जरवेटरी को साल 1999 में लॉन्च किए जाने के बाद यह पहला बड़ा एक्सरे स्पेस टेलिस्कोप है।

Published / 2022-02-21 17:09:16
शोध में हुआ खुलासा : अंतरिक्ष यात्रा बदल देती है यात्रियों का दिमाग

एबीएन डेस्क। एक नए शोध से यह खुलासा हुआ है कि अंतरिक्ष यात्रा से अंतरिक्ष यात्रियों के दिमाग का ढांचा या आकार बदल जाता है और वहां से लौटने के कई माह बाद तक ये बदलाव दिखता रहता है। एक इंसान का दिमाग उम्र के साथ-साथ बदलता रहता है, लेकिन जब बात अंतरिक्ष यात्रा की होती है, तो यह इंसान के दिमाग में पाये जाने वाले फ्लूयड को भी शिफ्ट कर देता है और साथ ही अंतरिक्ष यात्री के दिमाग के आकार में भी तब्दीली लाता है। यह बदलाव अंतरिक्ष यात्रा से वापस आने के कुछ माह तक बना रह सकता है। यूरोप और रूस की अंतरिक्ष एजेंसी ने इस संबंध में मिलकर शोध किया है। यह शोध रिपोर्ट फंट्रियर्स इन न्यूरल सर्किट्स में प्रकाशित हुई है। शोध रिपोर्ट के अनुसार, अंतरिक्ष यात्रियों के कई व्हाइट मैटर ट्रैक्ट जैसे सेंसरीमोटर ट्रैक्ट में हल्के ढांचागत बदलाव देखे गए हैं। व्हाइट मैटर दिमाग का संपर्क चैनल होता है और ग्रे मैटर में प्राप्त सूचना को प्रोसेस किया जाता है। शोधकर्ताओं ने "लर्नेड ब्रेन" की अवधारणा की पुष्टि की है, यानी उनके मुताबिक अंतरिक्ष यात्रा के लिए खुद को अनुकूल बनाने के लिए न्यूरोप्लास्टिसिटी स्तर में बदलाव आता है। न्यूरोप्लास्टिसिटी दिमाग की ऐसी क्षमता है, जो नर्व सेल यानी न्यूरॉन को पर्यावरण या परिस्थिति में आए परिवर्तन के अनुकूल बदलाव लाने की अनुमति देता है। अमेरिका की ड्रेक्सल यूनिवर्सिटी के आंद्रेई डोरोशिन ने कहा कि शोध के दौरान हमें दिमाग के कई मोटर एरिया में न्यूरल कनेक्शन बदलाव दिखे। मोटर एरिया एक ऐसा ब्रेन सेंटर है, जहां मूवमेंट यानी चलने-फिरने आदि के लिए कमांड दिया जाता है। गुरुत्वाकर्षण के बिना अंतरिक्ष में रहने के कारण अंतरिक्ष यात्री को अपनी चाल-ढाल में काफी भारी बदलाव लाना पड़ता है। इसी कारण उनका पूरा दिमाग ही एक तरह से अलग हो जाता है। शोधकर्ताओं ने अंतरिक्ष यात्रा के प्रभाव को जानने के लिए ब्रेन इमेंजिंग तकनीक फाइबर ट्रैक्टोग्राफी का इस्तेमाल किया। उन्होंने रूस के 12 अंतरिक्षयात्रियों के अंतरिक्ष यात्रा से पहले और वहां से तत्काल लौटने के बाद के डिफ्यूजन एमआरई स्कैन का अध्ययन किया। उन्होंने अंतरिक्ष यात्रा से लौटने के सात माह बाद आठ फॉलोअप स्कैन का भी अध्ययन किया। ये सभी अंतरिक्ष यात्री औसतन 172 दिन के अंतरिक्ष अभियान पर गए थे। फॉलो अपस्कैन के अध्ययन से यह खुलासा हुआ कि सात माह बाद भी दिमाग में आया बदलाव दिख रहा है।

Published / 2022-02-20 17:43:13
ब्रह्मांड में मिला ऐसा एस्टेरॉयड, अद्भुत खोज से हैरत में वैज्ञानिक

एबीएन डेस्क। ब्रह्मांड में कई ऐसे रहस्य हैं जिनके बारे में दुनिया को कोई जानकारी नहीं है। वैज्ञानिक लगातार ब्रह्मांड के रहस्यों को जानने की कोशिश में लगे हैं। अब इस बीच वैज्ञानिकों ने अनोखे एस्टेरॉयड की खोज की है। सबसे हैरान करने वाली बात यह है कि इस एस्टेरॉयड के तीन चंद्रमा हैं। वैज्ञानिकों ने इस अनोखे एस्टेरॉयड की खोज सबसे पहले 19वीं सदी में की थी जिसकी पहचान अंतरिक्ष के पहले क्वाड्रूपल सिस्टम के तौर पर हुई है। यह अनोखा एस्टेरॉयड 257 किमी चौड़ा है। वैज्ञानिकों ने इस एस्टेरॉयड को 130 इलेक्ट्रा नाम दिया है। यह नाम यूनानी देवता के ऊपर रखा गया है। इस एस्टेरॉयड के साथ वैज्ञानिकों ने एक हैरान करने वाली खोज की है। उन्होंने बताया है कि इसके 3 छोटे-छोटे चंद्रमा हैं। वैज्ञानिकों ने अभी तक 11 लाख एस्टेरॉयड खोजे हैं, लेकिन किसी के उपग्रह नहीं मिले थे। वैज्ञानिकों ने बताया है कि 11 लाख एस्टेरॉयड में से 150 के कम से कम एक चंद्रमा हैं, लेकिन हमेशा इनकी तलाश नहीं की जा सकती है। वैज्ञानिकों ने सबसे पहले इलेक्ट्रा को साल 1873 में खोजा था। यह मंगल और बृहस्पति के बीच स्थित एस्टेरॉयड बेल्ट में पाया गया था। इसके बाद वैज्ञानिकों ने 130 साल बाद इसके पहले चंद्रमा को खोजा। फिर साल 2014 में वैज्ञानिकों को इसके दूसरे चंद्रमा के सबूत मिले। इन एस्टेरॉयड को खोजना कठिन होता है, क्योंकि इनकी रोशनी बहुत कम होती है। छोटे उपग्रह के चक्कर लगाने से इनकी रोशनी और भी कम हो जाती है जिसकी वजह से इनके दिखने की संभावना कम होती है। इस अनोखे एस्टेरॉयड की खोज थाइलैंड के नेशनल एस्ट्रोनॉमिकल रिसर्च इंस्टीट्यूट ने की है। शोधकर्ताओं का कहना है कि यह इलेक्ट्रा पहला quadruple सिस्टम है जिसे खोजा गया है। उन्होंने बताया है कि इस एस्टेरॉयड का पहला चांद 6 किमी, दूसरा 2 किमी और तीसरा चांद 1.6 किमी चौड़ा है। नया मिला चांद 340 किमी की दूरी से एस्टेरॉयड की परिक्रमा कर रहा है।

Published / 2022-02-17 03:50:54
5जी : वोडाफोन आइडिया ने किया "वीओएनआर" का सफल परीक्षण

एबीएन डेस्क। दूरसंचार कंपनी वोडाफोन आइडिया लिमिटेड ने अपनी प्रौद्योगकी भागीदार नोकिया के साथ 5जी परीक्षण के दौरान "5जी वॉयस ओवर न्यू रेडियो" (वीओएनआर) क्षमता का सफलतापूर्वक प्रदर्शन किया है। कंपनी का 5जी परीक्षण गुजरात के गांधीनगर में जारी है। वोडाफोन आइडिया ने बुधवार को एक बयान में यह जानकारी दी। कंपनी ने नई क्षमता के बारे में कहा कि वीओएनआर समाधान की तैनाती से ग्राहक 5जी पर बातचीत के "हाई-डेफिनिशन" अनुभव के साथ-साथ कई उन्नत "वॉयस एप्लिकेशन" का उपयोग कर सकेंगे। कंपनी गांधीनगर, गुजरात और महाराष्ट्र के पुणे में सरकार से प्राप्त 5जी स्पेक्ट्रम का परीक्षण कर रही है।

Published / 2022-02-16 12:27:18
कार्बनिक पोलिमर के सहारे सूक्ष्म प्रदूषक हटाकर बनाया जायेगा पेयजल

एबीएन डेस्क। भोपाल स्थित भारतीय विज्ञान शिक्षा व अनुसंधान संस्थान (आईआईएसईआर) के वैज्ञानिकों ने एक कार्बनिक पोलिमर विकसित किया है। यह पानी में से उच्च ध्रुवीय कार्बनिक सूक्ष्म प्रदूषकों (पीओएम) को हटाकर जल को पीने के लिए सुरक्षित बनाएगा। दावा है कि प्रयोगशाला के स्तर पर कार्बनिक प्रदूषकों को हटाने के लिए इन पोलिमर का परीक्षण किया जा चुका है। इन सामग्री का औद्योगिक साझेदारों के साथ बड़े पैमाने पर निर्माण करके पानी में से जहरीले ध्रुवीय कार्बनिक सूक्ष्म प्रदूषकों को हटाकर साफ किया जा सकता है। अनुसंधान अमेरिकन केमिकल सोसाइटी के एसीएस अप्लाइड मैटीरियल्स एंड इंटरफेसेस में प्रकाशित भी हुआ है। भोपाल के आईआईएसईआर के रसायन विज्ञान विभाग में एसोसिएट प्रोफेसर अभिजीत पात्रा ने बताया कि भारत में घरेलू, कृषि और औद्योगिक क्षेत्रों द्वारा सतह पर और भूजल में छोड़े गए मानव जनित अपशिष्ट के कारण जल प्रदूषण होना चिंता का मुख्य विषय है। उन्होंने कहा कि इन अपशिष्टों में कार्बनिक और अकार्बनिक सूक्ष्म प्रदूषक होते हैं और कार्बनिक सूक्ष्म प्रदूषकों की पानी में जरा सी मौजूदगी भी मानव की सेहत के लिए और जलीय जंतुओं के लिए खतरा होती है। पानी को शुद्ध करने के लिए सोखना प्रक्रिया अच्छी तकनीक : एसोसिएट प्रोफेसर अभिजीत पात्रा के मुताबिक, कार्बनिक सूक्ष्म प्रदूषकों से पानी को शुद्ध करने के लिए "सोखना" नामक एक प्रक्रिया सबसे अधिक ऊर्जा कुशल तकनीकों में से एक है। उन्होंने बताया कि इस प्रक्रिया में कई अड़चनें हैं, इसलिए सोखने वाले प्रभावी सामग्री की जरूरत है जो न केवल तेजी से पानी में उच्च कार्बनिक सूक्ष्म प्रदूषकों को साफ करे, बल्कि निर्माण की साधारण तकनीकों के माध्यम से बड़े पैमाने पर उसका कृत्रिम उत्पादन भी किया जा सके। इस परियोजना का वित्तपोषण भारत सरकार के विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग ने "सस्टेनेबल ट्रीटमेंट, रीयूज एंड मैनेजमेंट फॉर एफिशिएंट, अफोर्डेबल एंड सिनर्जिस्टिक सॉल्यूशंस फॉर वाटर" के तहत किया है।

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