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चांद पर परमाणु विस्फोट की फिराक में था अमेरिका!
Published / 2022-04-26 18:13:21
चांद पर परमाणु विस्फोट की फिराक में था अमेरिका!

एबीएन नॉलेज डेस्क। एक सरकारी रिपोर्ट में अमेरिका की सनक व सीक्रेट मून मिशन को लेकर बड़ा खुलासा हुआ है। वाइस मीडिया के हाथ लगी इस सरकारी रिपोर्ट के मुताबिक अमेरिका चांद पर परमाणु विस्फोट करके सुरंग बनाने की फिराक में था। यह बात बेशक साइंस-फिक्शन मूवी की कहानी लगती है, लेकिन कई सालों से अमेरिका हकीकत में इस पर रिसर्च कर रहा है। रिपोर्ट के मुताबिक अमेरिका ने इस योजना पर भारी-भरकम खर्च भी किया लेकिन उसका यह प्लान सफल नहीं हुआ। वाइस मीडिया के अनुसार, चांद पर विस्फोट करके सुरंग बनाने की बात नेगेटिव मास प्रोपल्जन रिपोर्ट में की गई है। अमेरिकी रिसर्चर्स का मानना है कि चांद के बीचों-बीच बेहद हल्के मेटल्स मिल सकते हैं। रिपोर्ट के मुताबिक, ये स्टील से एक लाख गुना ज्यादा हल्के हो सकते हैं, लेकिन इनकी ताकत स्टील जितनी ही होगी। रिपोर्ट में इस मून मिशन के लिए उस समय करीब 22 मिलियन डॉलर फंड किए जाने की बात की गई है। रिपोर्ट के अनुसार करीब 1600 पन्नों के इन दस्तावेजों में एडवांस्ड एयरोस्पेस थ्रेट आइडेंटिफिकेशन प्रोग्राम (AATIP) और एडवांस्ड एयरोस्पेस वेपन्स सिस्टम ऐप्लिकेशन प्रोग्राम (AAWSAP) का जिक्र किया गया है। इन दोनों ही योजनाओं को अमेरिका की डिफेंस इंटेलिजेंस एजेंसी (DIA) ने फंड किया था। रिपोर्ट में रिसर्च प्रपोजल, कॉन्ट्रैक्ट और मीटिंग नोट्स शामिल हैं। दस्तावेजों में कहा गया है कि अमेरिका में AATIP के तहत UFO से जुड़ी रहस्यमयी टेक्नोलॉजी पर रिसर्च भी की जा रही थी। AATIP साल 2007 से 2012 तक सक्रिय था। यह लोगों की नजर में तब आया, जब 2017 में प्रोग्राम के पूर्व डायरेक्टर ने पेंटागन से इस्तीफा दे दिया था। अब 5 साल बाद ये बात सामने आई है कि AATIP की रिसर्च केवल UFO तक सीमित न होकर दूसरी एडवांस्ड टेक्नोलॉजी पर भी चल रही थी। रिपोर्ट के मुताबिक AAWSAP मिशन के तहत अमेरिका ऐसी टेक्नोलॉजी पर रिसर्च कर रहा था, जो हम सिर्फ फिल्मों में देखते हैं। इसमें चांद पर न्यूक्लियर एक्सप्लोजन करने, इनविजिबल होने के लिए कपड़ा बनाने, एंटी ग्रैविटी टेक्नोलॉजी और टाइम ट्रैवलिंग मशीन बनाने जैसे मिशन्स पर रिसर्च की जा रही थी। हालांकि, अब तक इनमें से कोई भी चीज सच में नहीं हो पाई है।

आज रात आसमान में दिखेगा दिवाली जैसा नजारा, 29 तक दिखेंगे टूटते तारे...
Published / 2022-04-22 16:35:43
आज रात आसमान में दिखेगा दिवाली जैसा नजारा, 29 तक दिखेंगे टूटते तारे...

एबीएन नॉलेज डेस्क। अंतरिक्ष में कई रहस्य छिपे हैं। अंतरिक्ष में रोजाना कई ऐसी गतिविधियां होती हैं, जो हमारे लिए शोध का विषय रही हैं। ऐसी ही एक गतिविधि है उल्का पिंडों की बारिश या टूटते तारों का दिखना। ऐसा ही नजारा शुक्रवार रात से अगले कुछ दिनों तक देखने को मिलेगा। सालाना लिरिड उल्का पिंडों की यह बारिश भारतीय शहरों से भी देखने को मिलेगी। ऐसा नजारा अब 29 अप्रैल तक रोज आसमान में देखा जा सकेगा। हालांकि, विशेषज्ञों को कहना है कि कहीं कहीं पर चांद अपनी रोशनी के जरिये ऐसा नजारा दिखने से रोक सकता है। वहीं, खगोलविदों का मानना है कि चांद की रोशनी की वजह से जब उल्कापिंडों को देखना मुमकिन ना हो तो इसे सुबह तड़के देखा जा सकता है। इस साल इस नजारे को देखने में दिक्कत आएगी क्योंकि चांद इसकी दृश्यता 20 से 25 फीसदी तक कम कर देगा। वहीं विशेषज्ञों ने कहा है कि हर घंटे कम से कम 10-15 उल्कापिंडों को बारिश होगी। इन्हें दिल्ली, कोलकाता के साथ-साथ देश के कुछ अन्य हिस्सों से भी देखा जा सकता है। अगले कुछ दिन रात करीब 8:31 बजे इनकी बारिश चरम पर देखी जा सकती है। नासा के अनुसार लिरिड उल्का पिछले 2,700 वर्षों से देखे जा रहे हैं और रात के आकाश में चमकते धूल के निशान और लकीरों को पीछे छोड़ने के लिए जाने जाते हैं। सितारों के लायरा नक्षत्र के नाम पर इनका नाम रखा गया है। यह उल्का धूमकेतु थैचर द्वारा छोड़े गए मलबे के क्षेत्र का हिस्सा हैं। जो वर्तमान में सूर्य से दूर सौर मंडल के माध्यम से चल रहा है। यह अगले 45 साल में अपनी ट्रैजेक्टरी को उलट देगा। धूमकेतु को लंबी अवधि के धूमकेतु के रूप में वगीर्कृत किया गया है और इसे एक बार सूर्य की परिक्रमा करने में 415 वर्ष लगते हैं। मलबे के क्षेत्र तब बनते हैं जब धूमकेतु छोटे-छोटे टुकड़ों को पीछे छोड़ते हुए गुजरते हैं। पृथ्वी की स्थिति के आधार पर जब यह इन मलबे के क्षेत्रों में पहुंचता है तो उल्का वर्षा बनाने के लिए वातावरण में कई टुकड़े जल जाते हैं। लिरिड उल्का की बारिश करीब 3 बार होगी। 3 महीने तक कोई भी टूटा तारा या उल्का पिंड की बारिश देखने को नहीं मिली है। इसे लेकर विशेषज्ञों में उत्साह है।

अंडा का फंडा... अंडा वेज है या नॉनवेज?
Published / 2022-04-22 16:26:05
अंडा का फंडा... अंडा वेज है या नॉनवेज?

एबीएन नॉलेज डेस्क। आप वेजिटेरियन हैं या नॉनवेजिटेरियन? यानी आप शाकाहारी हैं या मांसाहारी? इस सवाल पर कुछ लोगों का जवाब होता है कि वे शाकाहारी हैं, बस अंडा खा लेते हैं। इसके लिए एक नया वर्ड एजिटेरियन होता है। अब सवाल ये है कि अंडा शाकाहार है मांसाहार? क्या आप बता सकते हैं कि अंडा वेज है या नॉनवेज? नहीं बता सकते तो कोई बात नहीं। हम आपको बता देते हैं कि अंडा शाकाहार है या मांसाहार। दरअसल, अंडा वेज भी है और नॉनवेज भी। अब आप सोचेंगे कि ऐसा कैेस हो सकता है! क्षेत्रीय कुक्कुट प्रक्षेत्र भागलपुर की निदेशक डॉ अंजली ने इस बारे में विस्तार से समझाया है। उनके मुताबिक, अगर मुर्गी बिना मुर्गे के संसर्ग में आए अंडा देती है तो उसे टेबल परपस या शाकाहारी अंडा कहा जा सकता है। यहां अंतर फर्टिलाइज्ड अंडे और अनफर्टिलाइज्ड अंडे का होता है। यानी मुर्गियां बिना मुर्गे से संबंध बनाए भी अंडा दे सकती हैं। मुर्गी के अंडा देने की एक नैचुरल प्रक्रिया होती है। चूजा उत्पादन के लिए इनक्वेटर हेचरीज का यूज करते हैं। इसके लिए 10 मुर्गी पर एक मुर्गा छोड़ा जाता है। इस केज में जो अंडा होगा, वह फर्टिलाइज अंडा होगा और उससे चूजा निकल सकता है। ऐसे अंडे को नॉन वेजिटेरियन अंडा कहा जाता है। यानी मुर्गी, मुर्गे के संपर्क में आने के बाद फर्टिलाइजेशन से अंडा देती है। ज्यादातर लोग सोचते हैं कि अंडे से चूजा निकलता है, इसलिए यह मांसाहार हुआ। लेकिन आपको बता दें कि बाजार में ज्यादातर अंडे अनफर्टिलाइज्ड होते हैं, जिनसे कभी चूजे बाहर नहीं निकल पाएंगे। ऐसे अंडों को टेबल परपस से तैयार किया जाता है। मुर्गी जब 6 महीने की हो जाती है तो हर एक-डेढ़ दिन में अंडे देती है, लेकिन इसके लिए जरूरी नहीं कि उसे मुर्गे से संबंध बनाना पड़े। डॉक्टर अंजली के मुताबिक, शाकाहारी और मांसाहारी अंडे में फर्क करने का एक आसान सा तरीका है। इस तरीके में अंडे को एक टेबल पर बने खांचे में रखा जाता है। इसके बाद बंद कमरे में उस टेबल के नीचे एक बल्ब जलाते हैं। बल्ब की रोशनी एक-एक अंडे के नीचे से गुजारी जाती है। इसमें जिस अंडे से रोशनी पार हो जाए या अंडा पूरी तरह से लाल दिखे तो वह शाकाहारी अंडा होगा। मांसाहार वाले अंडे में ऐसी बात नहीं नजर आएगी।

इसरो के गगनयाण मिशन का गवाह बनेगा एचइसी, 5 में 3 प्रोजेक्ट्स का काम पूरा
Published / 2022-04-22 12:43:49
इसरो के गगनयाण मिशन का गवाह बनेगा एचइसी, 5 में 3 प्रोजेक्ट्स का काम पूरा

टीम एबीएन, रांची। देश का गर्व इसरो का जिक्र जब भी आता है तब एक आम हिंदुस्तानी का सीना गर्व से चौड़ा हो जाता है। अंतरिक्ष की दुनिया में तहलका मचाने वाले देशी इसरो के हर प्रोजेक्ट का हमसफर रहा है रांची का एचईसी। अब 2022 से 24 तक इसरो के गगनयान मिशन को मजबूती के साथ पूरा करने में जोरशोर से जुटी है मदर इंडस्ट्री एचईसी। एचईसी के इसरो प्रोजेक्ट एचएमबीपी के चीफ आॅफ प्लानिंग जेपी प्रसाद बताते हैं कि इसरो के किसी भी मिशन की सफलता पर देशभर में जब तालियों की गूंज सुनाई देती है, तब उस गूंज की आवाज से रांची का एचईसी भी गौरवान्वित महसूस करता है। 2001 से ही एचईसी इसरो के कई प्रोजेक्टस को बिना किसी डिफेक्ट्स को लगातार पूरा करता आ रहा है। अब 2022 से 24 तक के इसरो के गगनयान प्रोजेक्ट्स को एचईसी एक टीम भावना के साथ पूरा करने में जुट गया है। इसरो की ओर से डिमांड किए गये पांच प्रोडक्ट्स को एचईसी अबतक पूरा कर श्रीहरिकोटा भेज चुका है। और अब बचे दो प्रोजेक्ट्स पर तेजी से काम चल रहा है। इन 5 प्रोडक्ट्स को तैयार कर भेजा गया श्रीहरिकोटा : एचएसडी- होरिजेंटल स्लाइडिंग डोर का काम पूरा कर श्रीहरिकोटा भेजा गया, 56 मीटर ऊंचाई, इसका काम रॉकेट को एसेंबल के दौरान डोर को क्लोज करने के लिए फोल्डिंग प्लेटफॉर्म- काम पूरा कर श्रीहरिकोटा भेजा गया, 10 लेयर के प्लेटफार्म का इस्तेमाल सैटेलाइट को एसेंबल करन के लिए ह्वील बोगी- मार्च में काम पूरा कर श्रीहरिकोटा भेजा गया, देश में पहली बार इस तरह का प्रोजेक्ट एचइसी में पूरा किया गया, सैटेलाइट और रॉकेट को ले जाने का भार इसी पर होता है। एमएलपी- मोबाइल लॉन्चिंग पेडस्टल के खुद का भार 1000 टन होता है। यह रॉकेट और सैटेलाइट से जुड़े सामानों को उठाकर लॉन्चिंग तक ले जाता है। इओटी- इलेक्ट्रॉनिक ओवरहेड ट्रेवली क्रेन 200 टन का भार उठाने में सक्षम होता है। रॉकेट और सैटेलाइट के एसेंबल से जुड़े सामानों को उठाने में सक्षम इसरो के तमाम प्रोजेक्टस को पूरा करने के लिए बकायदा एचईसी में अलग-अलग आॅपरेशन हेड के नेतृत्व में काम चल रही है। इसमें सतीश कुमार प्रोजेक्ट आॅफिसर, राम जनम प्रसाद डिजाइनिंग, संजय सिन्हा सर्विसेज एंड मेंटेनेंस और जयंत चटर्जी प्लानिंग प्रोडक्शन की जिम्मेदारी दी गयी है। बात चंद्रयान और मंगलयान की हो या फिर कमिंग सून गगनयान की एचईसी के बनाये प्रोडक्ट इसरो में कल और आज भी अपनी उपयोगिता को साबित कर रहे हैं। मार्च में इसरो के चेयरमैन ने भी अपने दौरे के दौरान एचईसी की जमकर तारीफ की थी। एचईसी के कर्मचारी भी इसरो के प्रोजेक्ट्स से जुड़ने पर खुद को गौरवान्वित महसूस करते हैं। उनकी मानें तो उन्हें इस प्रोजेक्ट्स से जुड़कर एक गौरव और देशभक्ति को जाहिर करने का एहसास होता है।

अब बार-बार चार्जिंग का झंझट होगा खत्म, 2-4 नहीं 28 हजार साल तक चलेगी एक बैटरी!
Published / 2022-04-20 17:14:10
अब बार-बार चार्जिंग का झंझट होगा खत्म, 2-4 नहीं 28 हजार साल तक चलेगी एक बैटरी!

एबीएन नॉलेज डेस्क। आज हमारी जिंदगी की बैटरी पर निर्भरता काफी बढ़ गई है। स्मार्टफोन गाड़ियां, स्मार्टवॉच से लेकर तमाम डिवाइस अब बैटरी पर चलते हैं। इन डिवाइसों के चलते ज्यादा लंबे वक्त तक चलने वाली सस्ती बैटरियों की डिमांड भी बढ़ गई है। लेकिन इसी बीच एक ऐसी टेक्नोलॉजी पर काम हो रहा है, जिससे बैटरी 2-4 साल तक नहीं बल्कि 28 हजार साल तक काम करेगी। जानिए क्या है ये डायमंड बैटरी टेक्नोलॉजी और कैसे काम करेगी? techbriefs.com की रिपोर्ट के मुताबिक आने वाले वक्त में बैटरी अब नैनो डायमंड बैटरी (NDP) पर काम करेगी। ये हाई पॉवर, डायमंड-आधारित अल्फा, बीटा और न्यूट्रॉन वोल्टाइक बैटरी होती है, जो अपने पूरे लाइफ स्पैन में इस्तेमाल होने के दौरान परंपरागत केमिकल बैटरी से अलग ग्रीन एनर्जी देगा। NDB एक न्यूक्लियर जेनरेटर की तरह काम करता है। NDB टेक्नोलॉजी के लिए पॉवर सोर्स इंटरमीडिएट और हाई लेवल रेडियो आइसोटॉप्स होता है जिन्हें सिंथेटिक हीरे के कई लेवल सिक्योरिटी के जरिए शील्डेड किया जाता है। सेल्फ-चार्जिंग प्रोसेस के चलते ये बैटरी 28,000 साल तक चल सकती है, इससे कोई भी डिवाइस या मशीन के पूरी जिंदगी के लिए चार्ज रह सकती है। इस सेल्फ चार्जिंग प्रोसेस के लिए बैटरी को सिर्फ प्राकृतिक हवा की जरूरत होती है। इसका इस्तेमाल कई ऐसे मशीनों और डिवाइसों में हो सकता है, जो अभी तक नहीं हुआ है। इनमें अंतरिक्ष विज्ञान जैसे क्षेत्र प्रमुख हैं। किस टेक्नोलॉजी पर करती है काम : ये डायमंड बैटरियां परमाणु कचरे से बनती हैं। DW की रिपोर्ट के मुताबिक पूरी दुनिया में 3 लाख टन से ज्यादा का परमाणु कचरा मौजूद है। इन बैटरियों को परमाणु रिएक्टर से निकले रेडियोधर्मी ग्रेफाइट घटकों को गर्म करके बनाया जाता है। इसके जरिए रेडियोधर्मी कार्बन को कार्बन14 गैस में बदला जाता है। इस प्रक्रिया के दौरान भारी दवाब डालकर इसे कृत्रिम हीरे में बदला जाता है। ये ऐसे हीरे होते हैं, जो बिजली की सप्लाई करने में सक्षम होते हैं। इन हीरों का उपयोग सभी तरह और आकारों बैटरियों में किया जा सकता है। बाजार में अभी तक इन बैटरियों को बनाया नहीं गया है लेकिन कंपनियां इनके प्रोटोटाइप पर काम कर रही हैं। एक अनुमान के मुताबिक इस साल तक ये बैटरी बाजार में आ जानी चाहिए। पूरी जिंदगी काम करने वाली डिवाइसों में इन बैटरियों का इस्तेमाल किया जा सकता है, जैसे सेंसर, घड़ियां और पेसमेकर्स आदि। ये वो डिवाइस हैं, जहां बैटरी बदलना काफी मुश्किल होता है। इसके अलावा इन बैटरियों का इस्तेमाल भविष्य में अंतरिक्ष विज्ञान के क्षेत्र में भी किया जा सकता है। अंतरिक्ष में भेजे जाने वाले रॉकेट और सैटेलाइट आदि एक से ज्यादा बैटरियों को जोड़कर और अधिक ऊर्जा पैदा की जा सकती है। ये ऊर्जा इतनी हो सकती है कि किसी गांव या कस्बे को रोशन कर सकती है। इन बैटरियों के खतरा क्या : DW की रिपोर्ट के मुताबिक इन बैटरियों में हल्की मात्रा में रेडियोधर्मिता होती है। इसलिए लीक नहीं होने दिया जा सकता है। ये इंसानों के लिए बहुत ज्यादा खतरनाक नहीं होता है, लेकिन ब्लॉकचेन टेक्नोलॉजी इसका के जरिए इसको काबू पाया जा सकता है। इन बैटरियों निगरानी के जरिए इन्हें दोबारा इस्तेमाल में लाया जा सकता है।

Su30 MkI एयरक्राफ्ट से BrahMos का सफल परीक्षण, लक्ष्य को भेदने में कामयाम रही क्रूज मिसाइल
Published / 2022-04-20 01:28:46
Su30 MkI एयरक्राफ्ट से BrahMos का सफल परीक्षण, लक्ष्य को भेदने में कामयाम रही क्रूज मिसाइल

एबीएन नॉलेज डेस्क। भारतीय वायुसेना ने आज Su30 MkI विमान से ब्रह्मोस मिसाइल का सफल परिक्षण किया। ये परीक्षण पूर्वी समुद्री तट पर किया गया था। वायुसेना ने जानकारी दी है कि मिसाइल अपने लक्ष्य को भेदने में सफल रही है। ब्रह्मोस मिसाइल का टारगेट भारतीय नौसेना का खराब एक जहाज था, जिसपर उसने सीधा प्रहार किया। IAF ने बताया कि यह मिशन नौसेना के साथ निकट समन्वय में शुरू किया गया था।

जानें कार में सफर के दौरान नींद आने की वजह
Published / 2022-04-18 17:27:31
जानें कार में सफर के दौरान नींद आने की वजह

एबीएन नॉलेज डेस्क। कार से सफर की शुरूआत होते ही ज्यादातर लोगों को नींद आने लगती है। कभी सोचा है कि ऐसा क्यों होता है? इस पर अलग-अलग रिसर्च हुई हैं। रिसर्च में कई बातें सामने आई हैं। ऐसा होने की कई वजह बताई गई हैं जैसे, स्पीप डेब्ट, बोरियत और हाइवे हिप्नोसिस। सफर करने से पहले ही कई तैयारियां करनी पड़ती हैं। कोई चीज छूट न जाए, इसकी चिंता में नींद नहीं पूरी हो पाती। इसे ही स्लीप डेब्ट कहते हैं। यह नींद की सबसे बड़ी वजह होती है, अब इसका विज्ञान भी समझ लीजिए। द कंवर्सेशन की रिपोर्ट कहती है, चलती गाड़ी में नींद तभी आती है जब हम कुछ कर नहीं हो रहे होते हैं। ठीक वैसे ही जैसे रात में सोने के समय दिमाग और शरीर रिलैक्स होने लगता है। चलती कार में होने वाला मूवमेंट भी नींद लाने का काम करता है। इस स्थिति में शरीर ठीक वैसे ही काम करता है, जैसे बचपन में माता-पिता बच्चे को सुलाने के लिए गोद में लेकर हिलाते-डुलाते हैं। रिपोर्ट के मुताबिक, विज्ञान की भाषा में इस स्थिति को हाइवे हिप्नोसिस कहते हैं। ऐसा ड्राइवर्स के साथ ही होता है और लम्बी दूरी के सफर में कार ड्राइव करते समय उन्हें नींद आने लगती है। चाय और कॉफी से वे इस नींद को दूर करने की कोशिश करते हैं। सफर में इस तरह नींद आने की तीसरी वजह होती है व्हाइट नॉइज। व्हाइट नॉइज उस शोर को कहते हैं जो इंजन की आवाज, हवा की सरसराहट और गाड़ी में बजने वाले संगीत से पैदा होता है। वैज्ञानिक इस बात का पता लगाने में जुटे हैं कि इस तरह के शोर में इंसान को कैसे नींद आ जाती है। वैज्ञानिकों का कहना है, बचपन में बच्चे को सुलाते समय पेरेंट्स भी अलग-अलग तरह की आवाज निकलाते हैं और बच्चा सो जाता है। हालांकि ऐसा क्यों होता है, इसकी सटीक वजह सामने नहीं आ पाई है। वैज्ञानिकों का कहना है, लंबे सफर के दौरान नींद आना लाजिमी है। अगर कोई 10 से 15 मिनट के सफर में भी सो जाता है तो उसके सोपाइट सिंड्रोम से पीड़ित होने का खतरा रहता है। यह न्यूरोलॉजिकल डिसआॅर्डर है। जिसमें अक्सर इंसान थका हुआ महसूस करता है।

मंगल ग्रह पर दिखे एलियंस के पांव के निशान? नासा की तस्वीर देख दुनिया हैरान
Published / 2022-04-17 08:31:46
मंगल ग्रह पर दिखे एलियंस के पांव के निशान? नासा की तस्वीर देख दुनिया हैरान

एबीएन नॉलेज डेस्क। एलियंस को लेकर समय-समय पर हैरान करने देने वाली खबरें सामने आती रहती हैं। दुनिया में एलियंस के बारे में कई तरह दावे किए जाते हैं। धरती पर कई लोग एलियन और यूएफओ को देखने का दावा कर चुके हैं। एलियंस के बारे में कई बार ऐसे दावे किए जाते हैं जिनके बारे में जानकर वैज्ञानिक भी हैरत में पड़ जाते हैं। क्या ब्रह्मांड में एलियन का अस्तित्व है? इसका अभी तक कोई ठोस सबूत नहीं है। एलियन को लेकर दुनियाभर के वैज्ञानिक सालों से रिसर्च कर रहे हैं, लेकिन अभी तक एलियन के अस्तित्व को लेकर उन्हें कोई ठोस सबूत नहीं मिले हैं। लेकिन आए दिन एलियन और यूएफओ को देखने के दावे किए जाते हैं। अब इस बीच अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा (Nasa) ने मंगल ग्रह की एक तस्वीर जारी की है जो बेहद चौंकाने वाली है। नासा द्वारा जारी की गई तस्वीर में मंगल ग्रह पर एक गड्ढा दिखाई दे रहा है जिसको देखकर पूरी दुनिया हैरत में पड़ गई है। अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी की तरफ से इस तस्वीर को इंस्टाग्राम पर शेयर किया गया है। नासा की इस तस्वीर को देखकर सोशल मीडिया यूजर्स कई तरह के दावे कर रहे हैं। कुछ यूजर्स का कहना है कि कहीं ये एलियंस के पैर के निशान तो नहीं हैं। नासा ने मार्स ऑर्बिटर के हाई कैपेसिटी वाले कैमरे से इस तस्वीर को खींचा है।

कन्याकुमारी में एक साथ दिखेंगे चांद-सूरज! जानें कब होगी यह अद्भुत घटना
Published / 2022-04-16 09:43:29
कन्याकुमारी में एक साथ दिखेंगे चांद-सूरज! जानें कब होगी यह अद्भुत घटना

एबीएन सेंट्रल डेस्क। प्रकृति अपने अंदर कई ऐसी चीजें समेटे हुई है जिसे आसानी से तो नहीं देखा जा सकता, लेकिन इन्हें देखना अपने आप में ही एक अलग अनुभव होता है। कुछ ऐसा ही होने वाला है तमिलनाडु के कन्याकुमारी में, जहां सूर्यास्त और चंद्रोदय को एक साथ देखा जा सकेगा। यह अद्भुत घटना तमिल के चिथिराई महीने में देखने को मिलती है जो कि कल यानी 16 अप्रैल को देखने को मिलेगी। कन्याकुमारी की अनूठी भूवैज्ञानिक संरचना जो भारत के किसी भी हिस्से में मौजूद नहीं है। यहां अरब सागर, बंगाल की खाड़ी और हिंद महासागर तीनों ही मिलते हैं। यहां के "सी व्यू प्वाइंट" से चंद्रमा को उगते हुए और सूरज को डूबते हुए एक ही समय पर देख सकते हैं। इस बार यह दुर्लभ आकाशीय घटना शनिवार 16 अप्रैल को देखने को मिलेगी। इसका दीदार करने के लिए कई राज्यों से टूरिस्ट कन्याकुमारी पहुंचने लगे हैं। वहीं जिले की पुलिस भी सुरक्षा के कड़े इंतजाम कर रही है। वहीं, चैत्र पूर्णिमा पर कन्याकुमारी के भगवती अम्मा मंदिर में भी विशेष पूजा होगी। इसके साथ ही कन्याकुमारी से करीब सौ किलोमीटर दूर कुट्रालम फॉल्स में भी पानी आना शुरू हो गया है। सामान्यतः यह जून के महीने में शुरू होता है, लेकिन इस बार यह गर्मियों में ही शुरू हो गया है।

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