एबीएन नॉलेज डेस्क। अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा का ओरियन अंतरिक्ष यान मून मिशन पूरा करने के बाद पृथ्वी की ओर रवाना हो गया है। ओरियन अंतरिक्ष यान सोमवार को चंद्रमा के करीब से गुजरा और उसने पृथ्वी की ओर लौटने के लिए गुरुत्वाकर्षण सहायता का उपयोग किया। इसी के साथ आर्टेमिस-1 मिशन के लिए वापसी की यात्रा शुरू हो गयी है।बिना चालक दल वाले नासा के ओरियन अंतरिक्ष यान ने अपने निकटतम बिंदु से 80 मील (130 किलोमीटर) से कम की उड़ान भरी। इस दौरान चंद्रमा के पास पहुंचने पर कैप्सूल के साथ संचार 30 मिनट के लिए बाधित भी हुआ। ओरियन कार्यक्रम के डिप्टी मैनेजर डेबी कोर्थ ने कहा अंतरिक्ष यान कैसा प्रदर्शन कर रहा है, इसके बारे में हम इससे ज्यादा खुश नहीं हो सकते। मगर संचार बहाल होने पर शानदार फुटेज स्क्रीन पर चमकने लगी। कमरे में मौजूद हर शख्स इस फुटेज को देखता ही रह गया। सोमवार को मिशन का आखिरी दिन था। नासा के मेगा मून रॉकेट एसएलएस ने 16 नवंबर को फ्लोरिडा से उड़ान भरी थी। शुरू से अंत तक ये यात्रा करीब साढ़े 25 दिनों तक चली। ओरियन अंतरिक्ष यान 11 दिसंबर को स्थानीय समयानुसार सुबह 9:40 बजे सैन डिएगो से दूर प्रशांत महासागर में लैंड कर सकता है। यहां इसे अमेरिकी नौसेना के जहाज पर चढ़ाया जायेगा।इससे पहले मिशन के दौरान ओरियन ने चंद्रमा के चारों ओर दूरस्थ रेट्रोग्रेड कक्षा में लगभग छह दिन बिताये। इसका आशय है कि उच्च ऊंचाई और चंद्रमा की दिशा के विपरीत यात्रा करना। एक सप्ताह पहले ओरियन ने हमारे ग्रह से 280,000 मील (450,000 किलोमीटर) की दूरी का रिकॉर्ड तोड़ दिया है। आर्टेमिस मिशन मैनेजर माइक सराफिन ने कहा कि एक बार जब यह पृथ्वी पर वापस आ जाएगा, तो ओरियन 1.4 मिलियन मील से अधिक की यात्रा कर चुका होगा। उल्लेखनीय है कि नासा 2025 में चंद्रमा पर अंतरिक्ष यात्रियों को उतारने की योजना पर काम कर रहा है।
एबीएन सेंट्रल डेस्क। भारतीय सेना की पश्चिमी कमान ने मंगलवार को ब्रह्मोस सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल का सफल परीक्षण किया। अंडमान और निकोबार कमान ने बयान जारी कहा कि सेना ने आज अंडमान और निकोबार द्वीप समूह से सतह से सतह पर मार करने वाली ब्रह्मोस सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल का सफल परीक्षण किया।
एबीएन सेंट्रल डेस्क। देश की प्रमुख टेलीकॉम कंपनी रिलायंस जियो की सेवाएं मंगलवार को ठप हो गयी। रिपोर्ट के अनुसार यूजर्स को कॉल करने से लेकर मैसेज करने तक में समस्या आ रही है। कुछ यूजर्स का कहना है कि सोमवार रात से ही जियो की सेवाएं ठप हैं। यूजर्स सोशल मीडिया पर भी इसकी शिकायत कर रहे हैं। हालांकि, यूजर्स मोबाइल इंटरनेट का इस्तेमाल कर पा रहे हैं।बता दें कि कई जियो यूजर्स कॉल करने या प्राप्त करने में असमर्थ होने के साथ-साथ एसएमएस का उपयोग करने में असमर्थ हैं, लेकिन कई यूजर्स कॉल कर पा रहे हैं। इससे पहले भी जियो की सेवाएं ठप हुई थीं, जिसमें तीन घंटे तक यूजर्स की कॉलिंग और एसएमएस सेवाएं प्रभावित हुई थीं। हालांकि, तब भी यूजर्स मोबाइल डाटा सेवा का इस्तेमाल कर पा रहे थे। दरअसल, आज सुबह से ही यूजर्स को दिक्कत का सामना करना पड़ रहा है। यूजर्स इसकी शिकायत ट्विटर पर कर रहे हैं। कई यूजर्स जियो की सर्विस को लेकर मीम्स भी शेयर कर रहे हैं। एक यूजर ने मीम्स के साथ लिखा, जिओ डाउन स्थिति, जब आपके पास जियो फाइबर, जियो सिम और जियो मोबाइल है और नेटवर्क डाउन है। वहीं एक अन्य यूजर्स ने लिखा सुबह से ही उनके मोबाइल पर वाल्ट का साइन नहीं दिख रहा है और वह कॉल नहीं लगा पा रहे हैं। ऐसे में आप 5जी की अच्छी सर्विस कैसे देंगे जब नॉर्मल कॉल्स में ही दिक्कतें आ रही हैं।
पीएसएलवी की यह 24वीं उड़ानएबीएन नॉलेज डेस्क। महासागरों के वैज्ञानिक अध्ययन और चक्रवातों पर नजर रखने के लिए भारत तीसरी पीढ़ी के ओशियन-सैट का प्रक्षेपण शनिवार को करेगा। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) का लोकप्रिय रॉकेट पीएसएलवी-सी54 इसे आठ अन्य नैनो उपग्रहों के साथ पृथ्वी की कक्षा में स्थापित करेगा। इस मिशन के लिए उल्टी गिनती शुरू कर दी गई है। यह प्रक्षेपण सुबह 10.26 बजे श्रीहरिकोटा के सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र से प्रस्तावित है। 44.4 मीटर ऊंचे रॉकेट का यह पीएसएलवी-एक्सएल प्रारूप है, जिसमें 321 टन लिफ्ट ऑफ मास यानी खुद रॉकेट, बूस्टर, प्रोपेलेंट, उपग्रह व उपकरणों को अंतरिक्ष में ले जाने की क्षमता है। रॉकेट की यह 24वीं उड़ान होगी।इसरो के वैज्ञानिक इसे अब तक के सबसे लंबे मिशन में से एक मान रहे हैं। इसमें रॉकेट दो कक्षाओं में उपग्रह ले जायेगा। प्रक्षेपण के 20 मिनट बाद ओशियन-सैट धरती से 742 किमी की ऊंचाई पर छोड़ा जायेगा। इसके बाद रॉकेट पृथ्वी की ओर लाया जायेगा और 516 से 528 किमी ऊंचाई पर बाकी उपग्रह छोड़े जायेंगे।ये पीएसएलवी-सी54 प्रक्षेपण यान में इस्तेमाल होने वाले टू-ऑर्बिट चेंज थ्रस्टर्स (ओसीटी) का उपयोग करके कक्षाओं को बदलने के लिए रॉकेट को शामिल करेगा। अर्थ ऑब्जर्वेशन सैटेलाइट को ऑर्बिट-1 में अलग किया जायेगा जबकि यात्री पेलोड को ऑर्बिट-2 में अलग किया जायेगा।
एबीएन नॉलेज डेस्क। अमेरिकी स्पेस एजेंसी नासा के आर्टेमिस-1 प्रोजेक्ट के तहत लॉन्च किया गया ओरियन नाम का अंतरिक्षयान आज चांद के सबसे पास से गुजरा। इस दौरान चांद से इसकी दूरी 128 किलोमीटर थी। भारतीय समय के मुताबिक शाम करीब 6.27 पर ये स्पेसक्राफ्ट चांद के सबसे पास से गुजरा। दरअसल, नासा ने हाल ही में अपना प्रोजेक्ट आर्टेमिस-1 लॉन्च किया था। इसके तहत नासा ने फ्लोरिडा के केप केनवरल से अब तक का सबसे बड़ा रॉकेट लॉन्च किया था। प्रोजेक्ट के तहत लॉन्च किए गए अंतरिक्षयान में कोई इंसान नहीं था। अगर नासा का यह प्रयोग सफल रहता है तो इंसान को ऐसे ही यान के जरिए चांद की धरती पर उतारा जायेगा। इस प्रोजेक्ट को तीसरे प्रयास में सफलतापूर्वक लॉन्च किया गया था। अगस्त और सितंबर में भी कोशिश की गई थी, लेकिन तकनीकी दिक्कतों के कारण उसे रद्द करना पड़ा था। नासा ने अपने मून मिशन का नाम आर्टेमिस खास वजह से रखा है। दरअसल ग्रीक लोककथाओं में आर्टेमिस को अपोलो की जुड़वा बहन कहा जाता था। दिसंबर में अपोलो 17 मिशन के 50 साल पूरे होने वाले हैं। यह आखिरी बार था जब मनुष्य ने चांद पर कदम रखा था। 1972 में अपोलो मिशन के तहत जब अंतरिक्ष यात्री जिन सरनेन ने चांद पर कदम रखा था कि तो लगा था कि अब चांद पर दोबारा लौटने में ज्यादा वक्त नहीं लगेगा, लेकिन इसमें 50 साल का इंतजार करना पड़ा। इन सालों में कई चुनौतियों सामने आई और चुनौतियों से निपटा भी गया। कई चुनौतियों का हल निकाला गया और कुछ के जवाब अभी भी मिलने बाकी हैं। अब नासा इस दिशा में तेजी से काम कर रहा है। यही वजह है कि स्पेस एजेंसी नासा अगले 10 सालों में कई मुश्किल मिशन लॉन्च करने की तैयारी में है।
एबीएन नॉलेज डेस्क। ग्लोबल मार्केट से आज मिले-जुले संकेत नजर आ रहे हैं। एशियाई बाजारों में लगातार दबाव बना हुआ है। इसी तरह यूएस फ्यूचर्स भी दबाव में काम करता नजर आ रहा है। हालांकि पिछले कारोबारी सत्र में अमेरिकी बाजार ओवरऑल बढ़त के साथ बंद हुए थे।पिछले कारोबारी सत्र में डाओ जोंस 199 अंक की बढ़त के साथ बंद होने में सफल रहा था। इसी तरह एसएंडपी 500 इंडेक्स 0.52 प्रतिशत की उछाल के साथ 3,965.75 अंक के स्तर पर बंद हुआ था। जबकि नैस्डेक ने फ्लैट लेवल पर कारोबार करके पिछले सत्र में कामकाज का अंत किया था।दूसरी ओर एशियाई बाजारों में आज ओवरऑल बिकवाली का दबाव बना हुआ है। निक्केई इंडेक्स को छोड़कर एशियाई बाजार के सभी प्रमुख इंडेक्स गिरावट के साथ कारोबार कर रहे हैं। एसजीएक्स निफ्टी 142 अंक यानी 0.77 प्रतिशत की गिरावट के साथ 18,205.50 अंक के स्तर पर कारोबार कर रहा है। जबकि स्ट्रेट्स टाइम्स इंडेक्स 0.79 प्रतिशत टूटकर 3,246.23 अंक के स्तर पर नजर आ रहा है। हैंग सेंग इंडेक्स भी अभी तक के कारोबार में 417.93 अंक यानी 2.32 प्रतिशत की गिरावट के साथ 17,574.61 अंक तक लुढ़क चुका है।इसके अलावा कोस्पी इंडेक्स 1.01 प्रतिशत की कमजोरी के साथ 2,419.80 अंक के स्तर पर कारोबार करता नजर आ रहा है। इसी तरह शंघाई कंपोजिट इंडेक्स भी 0.81 प्रतिशत की गिरावट के साथ 3,072.09 अंक के स्तर पर कारोबार कर रहा है। वहीं सेट कंपोजिट इंडेक्स 0.17 प्रतिशत की गिरावट के साथ 1,614.55 अंक और जकार्ता कंपोजिट इंडेक्स 0.08 प्रतिशत टूटकर 7,076.46 अंक के स्तर पर कारोबार कर रहा है। एशियाई बाजारों में सिर्फ निक्केई इंडेक्स में 0.02 प्रतिशत की सांकेतिक बढ़त है। फिलहाल ये सूचकांक 27,906.47 अंक के स्तर पर कारोबार कर रहा है।
एबीएन सेंट्रल डेस्क। 2019 में ड्राफ्ट पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन बिल में 15 करोड़ रुपये या किसी इकाई के वैश्विक कारोबार का 4 प्रतिशत जुमार्ना लगाने का प्रस्ताव था। मसौदे में भारतीय डेटा संरक्षण बोर्ड स्थापित करने का प्रस्ताव है, जो बिल के प्रावधानों के अनुसार कार्य करेगा।500 करोड़ रुपये से अधिक नहीं होगा जुर्मानामसौदे में कहा गया है, यदि बोर्ड जांच के निष्कर्ष पर यह निर्धारित करता है कि किसी व्यक्ति द्वारा गैर-अनुपालन महत्वपूर्ण है, तो वह व्यक्ति को सुनवाई का उचित अवसर देने के बाद, अनुसूची 1 में निर्दिष्ट ऐसा वित्तीय दंड लगा सकता है, जो प्रत्येक मामले में पांच सौ करोड़ रुपये से अधिक नहीं होगा।ग्रेडेड पेनल्टी सिस्टम का प्रस्तावमसौदे में डेटा फिड्यूशरी के लिए एक ग्रेडेड पेनल्टी सिस्टम का प्रस्ताव किया गया है जो केवल अधिनियम के प्रावधानों के अनुसार डेटा मालिकों के व्यक्तिगत डेटा को प्रोसेस करेगा। दंड का एक ही सेट डेटा प्रोसेसर पर लागू होगा, जो एक ऐसी इकाई होगी जो डेटा फिड्यूशरी की ओर से डेटा संसाधित करेगी।17 दिसंबर तक मसौदा पर कर सकते हैं टिप्पणीमसौदे में 250 करोड़ रुपये तक के जुमार्ने का प्रस्ताव है, अगर डेटा फिड्यूशरी या डेटा प्रोसेसर अपने कब्जे में या उसके नियंत्रण में व्यक्तिगत डेटा उल्लंघनों के खिलाफ सुरक्षा करने में विफल रहता है। मसौदा 17 दिसंबर तक सार्वजनिक टिप्पणी के लिए खुला है।संसद में पेश होगा विधेयकइस मसौदा विधेयक पर व्यापक परामर्श होगा। सरकार अगले बजट सत्र तक इसे संसद में पेश करने का लक्ष्य लेकर चल रही है। ड्राफ्ट बिल यह भी अनिवार्य करता है कि उपयोगकर्ता को अपनी जानकारी साझा करने से सहमति देने, प्रबंधित करने, सहमति वापस लेने का अधिकार दिया जाना चाहिए।हटाना पड़ेगा डेटाउदाहरण के लिए, अगर कोई व्यक्ति अपना बचत बैंक खाता बंद करता है, तो बैंक को खाते से संबंधित उसके डेटा को हटाना पड़ता है। इसी तरह, यदि कोई उपयोगकर्ता किसी विशेष प्लेटफार्म पर अपने सोशल मीडिया अकाउंट को हटाता है, तो उसका डेटा हटाना होगा। व्यक्तिगत डेटा को केवल तब तक बनाए रखना चाहिए, जब तक कि यह उस उद्देश्य के लिए आवश्यक हो, जिसके लिए इसे एकत्र किया गया था।
एबीएन नॉलेज डेस्क। देश के पहले प्राइवेट रॉकेट विक्रम-एस की आज लॉन्चिंग हो गयी। इस रॉकेट का निर्माण हैदराबाद की एक स्टार्ट-अप कंपनी स्काईरूट एयरोस्पेस ने किया है। इंडियन स्पेस रिसर्च ऑर्गेनाइजेशन यानी इसरो ने श्रीहरिकोटा के अपने केंद्र से भारत के इस पहले प्राइवेट रॉकेट विक्रम-एस की लॉन्चिंग की। इसकी लॉन्चिंग के बाद भारत के स्पेस मिशन में प्राइवेट रॉकेट कंपनियों की एंट्री हो गयी है। विक्रम-एस रॉकेट ने देश की स्पेस इंडस्ट्री में प्राइवेट सेक्टर की एंट्री को एक नयी दिशा प्रदान की है, जिस पर दशकों से सरकारी स्वामित्व वाले इसरो का प्रभुत्व था।स्काईरूट एयरोस्पेस भारत की पहली प्राइवेट सेक्टर की कंपनी बन गई है, जिसने 2020 में केंद्र सरकार द्वारा स्पेस इंडस्ट्री को प्राइवेट सेक्टर के लिए खोले जाने के बाद भारतीय स्पेस प्रोग्राम में कदम रखा है। विक्रम-एस रॉकेट को आज सुबह करीब 11:30 पर लॉन्च किया गया। इससे पहले इसे 15 नवंबर को लॉन्च करने की प्लानिंग थी। सतीश धवन स्पेस सेंटर से लॉन्च होने के बाद अब विक्रम-एस 81 किलोमीटर की ऊंचाई पर पहुंचेगा। रॉकेट का नाम इंडियन स्पेस प्रोग्राम के जनक और दिवंगत साइंटिस्ट विक्रम साराभाई के नाम पर रखा गया है।
एबीएन नॉलेज डेस्क। इलेक्ट्रॉनिक कचरे के निवारणपर काम करने वाली संस्था वेस्ट इलेक्ट्रिकल एंड इलेक्ट्रॉनिक इक्विपमेंट ने कहा है कि इस साल दुनियाभर में 5.3 अरब फोन फेंक दिये जायेंगे। संस्था का यह अनुमान वैश्विक व्यापार के आंकड़ों पर आधारित है।दुनिया में ई-कचरे के बढ़ते संकट को दिखाते इस शोध में कहा गया है कि ऐसे लोगों की तादाद काफी बड़ी है जो अपने पुराने फोन को रीसाइकल करने के बजाय रखे रहते हैं। ई-कचरा का दोहरा नुकसान है क्योंकि इसे फेंकने के कारण जलवायु को नुकसान होता है और इसमें इस्तेमाल कीमती धातुओं को यदि रिसाइक्लिंग के दौरान निकाला नहीं जाता है तो खनन के जरिए उन्हें पृथ्वी से निकालना पड़ता है, जिसके अपने कई नुकसान हैं।एक स्मार्टफोन के अंदर 62 धातुएं हो सकती हैं। आईफोन के पुर्जों में सोना, चांदी और पैलेडियम जैसी बेशकीमती धातु भी होती हैं जिन्हें एशिया, अफ्रीका और आॅस्ट्रेलिया में खनन से निकाला जाता है।संस्था के महानिदेशक पास्कल लीरॉय ने कहा कि लोगों को अंदाजा नहीं है कि ई-कचरे में मौजूद कीमती धातुओं की मात्रा कितनी बड़ी है। वह कहते हैं, लोगों को अहसास नहीं है कि देखने में सामान्य लगने वालीं इन चीजों को अगर वैश्विक स्तर पर एक साथ रखा जाए तो कितनी बड़ी मात्रा बन सकती है।16 अरब फोनएक अनुमान के मुताबिक दुनियाभर में इस वक्त 16 अरब से ज्यादा मोबाइल फोन हैं। यूरोप में जितने फोन हैं, उनमें से लगभग एक तिहाई इस्तेमाल नहीं होते। डब्ल्यू ट्रिपल ई का शोध दिखाता है कि इलेक्ट्रिक और इलेक्ट्रॉनिक कचरा 2030 तक सालाना 7.4 करोड़ टन की दर से बढ़ने लगेगा। फोन के साथ टैबलेट-कंप्यूटर भी शामिलइस कचरे में सिर्फ फोन शामिल नहीं हैं। टैबलेट और कंप्यूटर से लेकर वॉशिंग मशीन, टोस्टर और फ्रिज व जीपीएस मशीन तक ई-कचरे का बड़ा हिस्सा बन रहे हैं।एक अनुमान के मुताबिक 2018 में पूरी दुनिया में 5 करोड़ टन ई-कचरा जमा हुआ। इस कचरे में कंप्यूटर प्रोडक्ट्स, स्क्रीन्स, स्मार्टफोन, टैबलेट, टीवी, फ्रिज, वॉशिंग मशीन और हीटिंग या कूलिंग वाले उपकरण सबसे ज्यादा थे। इसमें से सिर्फ 20 फीसदी कचरे की रिसाइक्लिंग हुई, बाकी खुली जमीन या नदियों और समंदर तक पहुंच गये।भारत की स्थितिइलेक्ट्रॉनिक कचरा पैदा करने के मामले में भारत दुनिया का पांचवां बड़ा देश है। भारत में हर साल करीब 10 लाख टन ई-कचरा निकलता है। भारतीय शहरों में पैदा होने वाले इलेक्ट्रॉनिक कचरे में सबसे ज्यादा कंप्यूटर होते हैं। ऐसे ई कचरे में 40 फीसदी सीसा और 70 फीसदी भारी धातुएं मिलीं हैं।एक हालिया रिपोर्ट में बताया गया है कि पूरे देश में लाखों टन ई-कचरे का महज तीन से दस फीसदी ही इकट्ठा किया जाता है। नेशनल ग्रीन ट्राइब्यूनल के पिछले दिसंबर 2020 में पेश इस रिपोर्ट के मुताबिक 2017-18 में ई-कचरा कलेक्शन का लक्ष्य था 35,422 टन लेकिन कलेक्शन हुआ 25,325 टन। इसी तरह 2018-19 में लक्ष्य था 1,54,242 टन लेकिन जमा हुआ 78,281 टन। और अगले ही साल यानी 2019-20 में भारत में 10,14,961 टन ई-कचरा पैदा कर दिया गया।
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