एबीएन नॉलेज डेस्क। इलेक्ट्रॉनिक कचरे के निवारणपर काम करने वाली संस्था वेस्ट इलेक्ट्रिकल एंड इलेक्ट्रॉनिक इक्विपमेंट ने कहा है कि इस साल दुनियाभर में 5.3 अरब फोन फेंक दिये जायेंगे। संस्था का यह अनुमान वैश्विक व्यापार के आंकड़ों पर आधारित है।दुनिया में ई-कचरे के बढ़ते संकट को दिखाते इस शोध में कहा गया है कि ऐसे लोगों की तादाद काफी बड़ी है जो अपने पुराने फोन को रीसाइकल करने के बजाय रखे रहते हैं। ई-कचरा का दोहरा नुकसान है क्योंकि इसे फेंकने के कारण जलवायु को नुकसान होता है और इसमें इस्तेमाल कीमती धातुओं को यदि रिसाइक्लिंग के दौरान निकाला नहीं जाता है तो खनन के जरिए उन्हें पृथ्वी से निकालना पड़ता है, जिसके अपने कई नुकसान हैं।एक स्मार्टफोन के अंदर 62 धातुएं हो सकती हैं। आईफोन के पुर्जों में सोना, चांदी और पैलेडियम जैसी बेशकीमती धातु भी होती हैं जिन्हें एशिया, अफ्रीका और आॅस्ट्रेलिया में खनन से निकाला जाता है।संस्था के महानिदेशक पास्कल लीरॉय ने कहा कि लोगों को अंदाजा नहीं है कि ई-कचरे में मौजूद कीमती धातुओं की मात्रा कितनी बड़ी है। वह कहते हैं, लोगों को अहसास नहीं है कि देखने में सामान्य लगने वालीं इन चीजों को अगर वैश्विक स्तर पर एक साथ रखा जाए तो कितनी बड़ी मात्रा बन सकती है।16 अरब फोनएक अनुमान के मुताबिक दुनियाभर में इस वक्त 16 अरब से ज्यादा मोबाइल फोन हैं। यूरोप में जितने फोन हैं, उनमें से लगभग एक तिहाई इस्तेमाल नहीं होते। डब्ल्यू ट्रिपल ई का शोध दिखाता है कि इलेक्ट्रिक और इलेक्ट्रॉनिक कचरा 2030 तक सालाना 7.4 करोड़ टन की दर से बढ़ने लगेगा। फोन के साथ टैबलेट-कंप्यूटर भी शामिलइस कचरे में सिर्फ फोन शामिल नहीं हैं। टैबलेट और कंप्यूटर से लेकर वॉशिंग मशीन, टोस्टर और फ्रिज व जीपीएस मशीन तक ई-कचरे का बड़ा हिस्सा बन रहे हैं।एक अनुमान के मुताबिक 2018 में पूरी दुनिया में 5 करोड़ टन ई-कचरा जमा हुआ। इस कचरे में कंप्यूटर प्रोडक्ट्स, स्क्रीन्स, स्मार्टफोन, टैबलेट, टीवी, फ्रिज, वॉशिंग मशीन और हीटिंग या कूलिंग वाले उपकरण सबसे ज्यादा थे। इसमें से सिर्फ 20 फीसदी कचरे की रिसाइक्लिंग हुई, बाकी खुली जमीन या नदियों और समंदर तक पहुंच गये।भारत की स्थितिइलेक्ट्रॉनिक कचरा पैदा करने के मामले में भारत दुनिया का पांचवां बड़ा देश है। भारत में हर साल करीब 10 लाख टन ई-कचरा निकलता है। भारतीय शहरों में पैदा होने वाले इलेक्ट्रॉनिक कचरे में सबसे ज्यादा कंप्यूटर होते हैं। ऐसे ई कचरे में 40 फीसदी सीसा और 70 फीसदी भारी धातुएं मिलीं हैं।एक हालिया रिपोर्ट में बताया गया है कि पूरे देश में लाखों टन ई-कचरे का महज तीन से दस फीसदी ही इकट्ठा किया जाता है। नेशनल ग्रीन ट्राइब्यूनल के पिछले दिसंबर 2020 में पेश इस रिपोर्ट के मुताबिक 2017-18 में ई-कचरा कलेक्शन का लक्ष्य था 35,422 टन लेकिन कलेक्शन हुआ 25,325 टन। इसी तरह 2018-19 में लक्ष्य था 1,54,242 टन लेकिन जमा हुआ 78,281 टन। और अगले ही साल यानी 2019-20 में भारत में 10,14,961 टन ई-कचरा पैदा कर दिया गया।
एबीएन सेंट्रल डेस्क। भारत के अंतरिक्ष नियामक ने निजी क्षेत्र के पहले रॉकेट विक्रम-एस के प्रक्षेपण को मंजूरी दे दी है। विक्रम-एस स्काईरूट एरोस्पेस द्वारा विकसित सब-ऑर्बिटल यान है।अंतरिक्ष नियामक भारतीय राष्ट्रीय अंतरिक्ष संवर्धन और प्राधिकरण केंद्र (इन-स्पेस) ने कहा, इन-स्पेस ने एक निजी भारतीय अंतरिक्ष स्टार्ट-अप स्काईरूट एरोस्पेस के प्रक्षेपण की अनुमति दे दी है। यह इसरो के सतीश धवन केन्द्र से 18 नवंबर, 2022 को दिन में 11 से 12 बजे के बीच सब-आर्बिटल यान विक्रम-एस को लांच करेगा। प्रधानमंत्री कार्यालय में राज्यमंत्री जितेन्द्र सिंह निजी क्षेत्र द्वारा विकसित पहले रॉकेट का प्रक्षेपण देखने के लिए श्रीहरीकोटा में मौजूद रहेंगे।
एबीएन नॉलेज डेस्क। कैनेडी स्पेस सेंटर में अगली पीढ़ी के रॉकेट आर्टिमिस को चंद्रमा की यात्रा पर भेजने के तीसरे प्रयास की तैयारी चल रही है। अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा के लिए अगली पीढ़ी के रॉकेट आर्टिमिस की यह चंद्रमा के लिए पहली उड़ान होगी।
एबीएन सेंट्रल डेस्क। रिलायंस जियो ने इस साल दिसंबर तक कोलकाता के प्रमुख हिस्सों को 5जी सेवा से जोड़ने और जून 2023 तक पूरे शहर में सेवाओं को शुरू करने का लक्ष्य रखा है। कंपनी ने सोमवार को कहा कि पश्चिम बंगाल के सिलीगुड़ी में तेज गति वाली इंटरनेट सेवाएं जल्द ही शुरू की जाएंगी। कोलकाता के बाद यह राज्य का दूसरा शहर होगा जहां जियो की 5जी सेवाएं शुरू होंगी। रिलायंस जियो के एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा कि सिलीगुड़ी में 5जी सेवाएं शुरू करना कंपनी द्वारा दिसंबर 2023 तक पूरी तरह से सेवाओं को शुरू करने की योजना का हिस्सा है। इससे पहले, एयरटेल ने सिलीगुड़ी में अपनी 5जी सेवाएं शुरू करने की घोषणा करते हुए निकट भविष्य में कोलकाता में भी सेवाओं को शुरू करने की उम्मीद जताई थी। दूरसंचार कंपनी जियो ने चुनिंदा शहरों में अपनी सेवाएं शुरू की हैं और धीरे-धीरे अपना दायरा बढ़ा रही है। अधिकारी ने कहा, बंगाल क्षेत्र के सिलीगुड़ी में हम जल्द ही 5जी सेवाएं शुरू करेंगे। कोलकाता में वर्तमान में सेवाओं को दैनिक आधार पर बढ़ाया जा रहा है। शहर के प्रमुख हिस्सों को दिसंबर के भीतर दायरे में लाया जाएगा और यह अगले साल जून 23 तक पूरा हो जायेगा।
एबीएन सेंट्रल डेस्क। अमेरिका का एक मानवरहित सैन्य अंतरिक्ष विमान अपना छठा मिशन पूरा करके शनिवार तड़के धरती पर वापस लौट आया। इस विमान ने वैज्ञानिक प्रयोगों के लिए रिकॉर्ड 908 दिन अंतरिक्ष में अपनी कक्षा में बिताये। यह जानकारी न्यूज एजेंसी एसोसिएटेड प्रेस ने दी है। छोटे अंतरिक्ष यान की तरह दिखने वाला सौर ऊर्जा से चलने वाला यह वाहन नासा के कैनेडी स्पेस सेंटर पर उतरा। इसका पिछला मिशन 780 दिनों तक चला था। बोइंग के वरिष्ठ उपाध्यक्ष और इस विमान को विकसित करने वाले जिम चिल्टन ने कहा कि 2010 में एक्स-37बी के पहले लॉन्च के बाद से इसने कई रिकॉर्ड तोड़े हैं। इसने हमारे देश को नई अंतरिक्ष प्रौद्योगिकियों का तेजी से परीक्षण और एकीकृत करने के लिए एक बेजोड़ क्षमता प्रदान की है। यह पहली बार है जब अंतरिक्ष विमान ने एक सेवा मॉड्यूल की तरह काम किया। इस अंतरिक्ष विमान ने नौसेना अनुसंधान प्रयोगशाला, अमेरिकी वायु सेना अकादमी और अन्य के लिए प्रयोग किए।सुरक्षित लैंडिंग सुनिश्चित करने के लिए मॉड्यूल को कक्षा से बाहर आने से पहले ही वाहन से अलग कर दिया गया था। प्रयोगों के बीच फाल्कनसैट-8 नामक एक उपग्रह था, जिसे वायु सेना अनुसंधान प्रयोगशाला के साथ साझेदारी में अकादमी के कैडेटों द्वारा डिजाइन और निर्मित किया गया था। इसे अक्तूबर 2021 में तैनात किया गया था और अभी भी कक्षा में बना हुआ है। एक्स-37बी ऑर्बिटल टेस्ट व्हीकल-6 (ओटीवी-6) ने 908 दिनों तक चले अपना छठा मिशन को पूरा किया। इस दौरान कृषि समेत कई तरह के प्रयोग किए गए। एक अन्य प्रयोग ने बीजों पर लंबी अवधि के अंतरिक्ष जोखिम के प्रभावों का मूल्यांकन किया। अंतरिक्ष संचालन के प्रमुख जनरल चांस साल्ट्जमैन ने कहा कि यह मिशन अंतरिक्ष अन्वेषण में सहयोग पर अंतरिक्ष बल के फोकस पर प्रकाश डालता है और वायु सेना विभाग के भीतर और बाहर हमारे साझेदारों के लिए अंतरिक्ष में कम लागत वाली पहुंच का विस्तार करता है। एक्स-37बी अब तक 1.3 अरब मील से अधिक की उड़ान भर चुका है और अंतरिक्ष में कुल 3,774 दिन बिता चुका है।
एबीएन सेंट्रल डेस्क। भारत के निजी क्षेत्र द्वारा विकसित पहले रॉकेट विक्रम-एस का प्रक्षेपण 15 नवंबर को किया जायेगा। हैदराबाद के अंतरिक्ष स्टार्टअप स्काईरूट एयरोस्पेस ने शुक्रवार को यह घोषणा की। स्काईरूट एयरोस्पेस के इस पहले मिशन को प्रारंभ नाम दिया गया है जिसमें तीन उपभोक्ता पेलोड होंगे और इसे श्रीहरिकोटा में भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन के लॉन्च पैड से प्रक्षेपित किया जायेगा। कंपनी ने शुक्रवार को कहा, दिल की धड़कनें तेज हो गई हैं। सभी की निगाहें आसमान की ओर हैं। पृथ्वी सुन रही है। यह 15 नवंबर 2022 को प्रक्षेपण का संकेत है। स्काईरूट एयरोस्पेस के मुख्य कार्यकारी अधिकारी (सीईओ) और सह संस्थापक पवन कुमार चांदना ने से कहा कि प्रक्षेपण पूर्वाह्न 11:30 मिनट पर किया जायेगा।
एबीएन सेंट्रल डेस्क। भारत के निजी स्पेस कंपनी द्वारा विकसित पहले रॉकेट विक्रम-एस का प्रक्षेपण 15 नवंबर को किया जायेगा। हैदराबाद के अंतरिक्ष स्टार्टअप मस्काईरूट एयरोस्पेस ने शुक्रवार को यह घोषणा की। स्काईरूट एयरोस्पेस के इस पहले मिशन को प्रारंभ नाम दिया गया है, जिसमें तीन उपभोक्ता पेलोड होंगे और इसे श्रीहरिकोटा में भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन के लॉन्च पैड से प्रक्षेपित किया जायेगा। कंपनी ने शुक्रवार को कहा, दिल की धड़कनें तेज हो गई हैं। सभी की निगाहें आसमान की ओर हैं। पृथ्वी सुन रही है। यह 15 नवंबर 2022 को प्रक्षेपण का संकेत है। स्काईरूट एयरोस्पेस के मुख्य कार्यकारी अधिकारी (सीईओ) और सह-संस्थापक पवन कुमार चांदना ने समाचार एजेंसी पीटीआई से कहा कि प्रक्षेपण सुबह 11:30 मिनट पर किया जायेगा। स्काईरूट के रॉकेट का यह नाम भारतीय अंतरिक्ष कार्यक्रम के जनक और प्रसिद्ध वैज्ञानिक विक्रम साराभाई के नाम पर रखा गया है। स्काईरूट एयरोस्पेस के मुख्य परिचालन अधिकारी एन भरत डाका ने एक बयान में कहा कि विक्रम-एस रॉकेट एकल चरण वाला उपकक्षीय प्रक्षेपण यान है, जो तीन उपभोक्ता पेलोड लेकर जायेगा और अंतरिक्ष यानों की विक्रम श्रृंखला में अनेक प्रौद्योगिकियों के परीक्षण तथा उन्हें मान्यता देने में मदद करेगा। वहीं, इससे पहले इसरो के विक्रम साराभाई अंतरिक्ष केंद्र ने भारतीय अंतरिक्ष स्टार्टअप अग्निकुल कॉसमॉस द्वारा विकसित एक रॉकेट इंजन के विकास का मार्ग प्रशस्त किया। वीएसएससी ने तिरूवनंतपुरम में अपने वर्टिकल टेस्ट फैसिलिटी, थुंबा इक्वेटोरियल रॉकेट लॉन्चिंग स्टेशन में अग्निलेट इंजन का 15 सेकंड का परीक्षण किया। इसरो और अग्निकुल कॉसमॉस के बीच हस्ताक्षरित किये गये एक सहमति पत्र के तहत यह परीक्षण किया गया। इसका उद्देश्य भारतीय अंतरिक्ष स्टार्टअप को इन-स्पेस (इंडियन नेशनल स्पेस प्रोमोशन एंड ऑथोराइजेशन) के जरिए सुविधाओं का उपयोग करने का अवसर प्रदान करना है।
टीम एबीएन, रांची। गुरुवार को ज्योतिर्विज्ञान विभाग में खगोल शास्त्र का ज्योतिषीय अध्ययन विषय पर एकदिवसीय व्याख्यान का आयोजन किया गया। मुख्य वक्ता संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय के व्याख्याता डॉ गोपाल पाठक कर खेडकर थे। उन्होंने बताया कि खगोल शास्त्र एवं ज्योतिष शास्त्र दोनों एक दूसरे के पर्याय हैं। भारतवर्ष के प्राचीन ज्योतिर्विद् विद्वानों ने खगोल शास्त्र पर अनेक कार्य किए हैं। इनमें भास्कराचार्य, आर्यभट्ट, बापू देव शास्त्री, कमलाकर भट्ट, महर्षि लगध आदि प्रमुख हैं। हजारों वर्ष पहले आकाश मंडल में होने वाली घटनाओं से पड़ने वाले प्रभावों का खोज किये हैं। वैदिक गणित से काल को जान सकते हैं। विभाग के को-आॅर्डिनेटर डॉ प्रकाश सिंह ने कहा कि आने वाले समय में वैदिक गणित को जानना आवश्यक होगा। इसके अलावा विभाग के शिक्षक डॉ धीरेंद्र दुबे, निदेशक प्रोफेसर अर्चना कुमारी दुबे, डॉ मधुलिका वर्मा आदि उपस्थित थे। कार्यक्रम का संचालन डॉ एस के घोषाल व धन्यवाद ज्ञापन डॉ चंद्रशेखर मिश्र ने किया।
एबीएन सेंट्रल डेस्क। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) परिचालन संबंधी गतिविधियां अपनी मार्केटिंग शाखा न्यू स्पेस इंडिया लिमिटेड (एनएसआईएल) से करवाएगा। वहीं, खुद अंतरिक्ष तकनीकों के शोध और विकास पर जोर देगा। इसरो अध्यक्ष एस सोमनाथ ने सोमवार को रमन रिसर्च इंस्टीट्यूट (आरआरआई) के 75वें स्थापना दिवस कार्यक्रम में यह खुलासा किया। उन्होंने बताया कि बीते वर्षों में इसरो का जोर सरकार व जनता के लिए उपकरण जारी करने पर रहा है। उसने उपग्रह प्रणालियां बनायी, विभिन्न उपग्रहों निर्माण, प्रक्षेपण और संचालन करवाये, संचार व्यवस्था मुहैया करवाई, पृथ्वी के पर्यवेक्षण और नेविगेशन की सुविधाएं दीं। अब केंद्र सरकार के निर्देश के अनुसार यह सभी काम एनएसआईएल के सुपुर्द किए जा रहे हैं। इसके बदले आने वाले वर्षों में इसरो का ध्यान ज्यादा से ज्यादा शोध और विकास पर रहेगा। इनमें अंतरिक्ष क्षेत्र से संबंधित आधुनिक तकनीकें प्राथमिकता पर होंगी। डॉ सोमनाथ ने दावा किया, इसरो को लेकर सरकार द्वारा करवाए जा रहे यह बदलाव कई वैज्ञानिकों संस्थानों के साथ इसरो शोध और समन्वय गतिविधियों को पूरी तरह बदल देंगे। कार्यक्रम में आरआरआई के निदेशक प्रो तरुण सौरदीप ने बताया कि यह इंस्टीट्यूट 1948 में नोबेल पुरस्कार विजेता वैज्ञानिक सर सीवी रमन ने स्थापित किया था। यह 75 वर्षों से भौतिकी के प्रमुख क्षेत्रों में शोध को बढ़ावा दे रहा है।
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