एबीएन नॉलेज डेस्क। सूरजमुखी के बारे में सबसे ज्यादा चर्चा यही रही है कि यह हमेशा सूरज की दिशा के मुताबिक घूमता है। एक दिलचस्प बात यह भी है कि वैज्ञानिक इसे फूल नहीं मानते। जानिये सूरजमुखी को सिंगल फूल क्यों नहीं माना जाता... विज्ञान के नजरिये से देखें तो सूरजमुखी का फूल हमेशा से ही काफी दिलचस्प रहा है। सबसे ज्यादा चर्चा यही रही है कि यह फूल हमेशा सूरज की दिशा के मुताबिक घूमता है। यानी सूरज के मुताबिक इसकी दिशा बदलती रहती है, लेकिन एक दिलचस्प बात यह भी है कि वैज्ञानिक इसे फूल नहीं मानते। विज्ञान में जो फूल की परिभाषा तय की गई है, उन मानकों पर यह खरा नहीं उतरता। जानिये सूरजमुखी को सिंगल फूल क्यों नहीं माना जाता वैज्ञानिकों का कहना है, सूरजमुखी एक फूल नहीं है, यह फूलों का गुच्छा है। इसलिए इसकी गिनती फूल में नहीं की जाती। इसके पीछे कई कारण गिनाये गये हैं। उनका कहना है, सूरजमुखी की एक पंखुड़ी और जिस भूरे हिस्से से वो जुड़ी होती है, उसे मिलाकर एक फूल माना जाता है। लेकिन इस फूल में दर्जनों पंखुड़ियां होती हैं और बीच वाले जिसे भूरे हिस्से से जुड़ी होती हैं वो सैकड़ों भागों में बंटा होता है। इसलिए सूरजमुखी को फूलों का गुच्छा कहा जाता है। इसकी और भी कई वजह गिनाई गई हैं। अब उन्हें भी समझ लेते हैं. आमतौर पर एक फूल से एक बीज या एक फल तैयार होता है, लेकिन सूरजमुखी के मामले में ऐसा नहीं है। इसके बीच वाले हिस्से को डिस्क कहते हैं, जिसमें बीज विकसित होते हैं। सूरजमुखी के एक फूल में 1 से 2 हजार तक बीज विकसित होते हैं। इससे नए पौधे तैयार होते हैं। इसके अलावा इसे चिड़ियों और इंसानों को खिलाने के काम में भी लिया जाता है। इसमें कई पोषक तत्व पाए जाते हैं। आमतौर पर लोग मानते हैं कि सूरजमुखी का रंग पीला ही होता है, जबकि ऐसा नहीं है। दुनियाभर में इसकी 70 प्रजातियां हैं, जो अलग-अलग आकार की होती हैं। कुछ प्रजातियों की लम्बाई कम होती हैं तो कुछ की ज्यादा। ये अलग-अलग रंग के होते हैं। पीले रंग के अलावा लाल, नारंगी और बैंगनी रंग के भी सूरजमुखी होते हैं।
देशभर में डाउन हुआ WhatsApp का सर्वर, यूजर्स को मैसेज भेजने में आ रही दिक्कत एबीएन नॉलेज डेस्क। पॉपुलर मैसेजिंग प्लेटफॉर्म व्हाट्सएप्प देशभर में डाउन हो गया था। भारत में कई लोग इसको उपयोग नहीं कर पा रहेथे। लोगों को मैसेज भेजने और पाने में परेशानी हो रही थी। करीब 30 मिनट तक इसका सर्वर डाउन रहा। व्हाट्सएप डाउन होने की शिकायत लोग ट्विटर पर भी करते दिखे। शुरुआती जानकारी के अनुसार सर्वर डाउन हो जाने से यूजर्स इनका इस्तेमाल नहीं कर पाये। यूजर्स के मैसेज ठीक तरह से डिलीवर नहीं हो पाये, तो वे दूसरों से पूछने लगे। इसके बाद पता चला कि कोई भी इनका उपयोग नहीं कर पा रहा है। व्हाट्सएप के उपभोक्ता होने को लेकर डाउन डिटेक्टर ने भी रिपोर्ट किया है ट्विटर पर डाउन डिटेक्टर ने लिखा है कि व्हाट्सएप को लेकर यूजर्स 3:17 AM EDT से कह रहे हैं कि ये बंद हो गया है। भारत में करीब आधे घंटे से लोग वॉट्सऐप पर मैसेज नहीं सेंड कर पा रहे हैं। इसको लेकर अभी ऑफिशियल जानकारी सामने नहीं आई है। यूजर्स के मुताबिक सर्वर क्रैश हो जाने की वजह से ऐसा हुआ है। लेकिन, व्हाट्सएप की ओर से जब तक ऑफिशियल बयान नहीं आ जाता है तब तक कुछ कहा नहीं जा सकता है।
एबीएन नॉलेज डेस्क। भारत ने आज अग्नि प्राइम न्यू जेनरेशन बैलिस्टिक मिसाइल का सफल परीक्षण किया है। इस बात की जानकारी रक्षा अधिकारी ने दी है। अधिकारी ने बताया कि नई पीढ़ी की परमाणु सक्षम बैलिस्टिक मिसाइल अग्नि प्राइम का शुक्रवार को ओडिशा के तट से सफलतापूर्वक परीक्षण किया गया। मिसाइल परीक्षण सुबह करीब 9.45 पर किया गया। रक्षा अधिकारी ने बताया कि फ्लाइट के ट्रायल उड़ान के दौरान मिसाइल ने अधिकतम सीमा की यात्रा की और सभी परीक्षण उद्देश्यों को अच्छे से पूरा किया। अग्नि प्राइम बैलिस्टिक मिसाइल के लगातार तीसरे सफल उड़ान परीक्षण के बाद मिसाइल सिस्टम की सटीकता और विश्वसनीयता स्थापित की गई है। अधिकारी ने बताया कि पूरे ट्राजेक्टोरी को कवर करने के लिए टर्मिनल प्वाइंट पर दो डाउन रेंज शिप सहित अलग-अलग स्थानों पर तैनात रडार, टेलीमेट्री और इलेक्ट्रो आॅप्टिकल ट्रैकिंग सिस्टम जैसे कई रेंज इंस्ट्रूमेंटेशन द्वारा हासिल डेटा का इस्तेमाल करके सिस्टम की परफॉर्मेंस को वैलिडेट किया गया है। इससे पहले रक्षा अनुसंधान और विकास संगठन (डीआरडीओ) ने 18 दिसंबर 2021 को ओडिशा के तट पर डॉ एपीजे अब्दुल कलाम द्वीप से नई पीढ़ी की परमाणु सक्षम बैलिस्टिक मिसाइल अग्नि पी का सफलतापूर्वक परीक्षण किया था। अलग-अलग टेलीमेट्री, रडार, इलेक्ट्रो-आॅप्टिकल स्टेशन और पूर्वी तट के साथ स्थित डाउन रेंज जहाजों ने मिसाइल ट्रेजेक्टरी और मानकों को ट्रैक किया था और उनकी निगरानी की थी। इस मिसाइल ने उच्च स्तर की सटीकता के साथ सभी मिशन उद्देश्यों को पूरा करते हुए अपने लक्ष्य को हासिल किया था। इस दूसरे उड़ान परीक्षण ने सिस्टम में इंटीग्रेट सभी एडवांस टेक्नोलॉजी के भरोसेमंद प्रदर्शन को साबित किया था। अग्नि पी डुअल रिडनडेंट नेविगेशन और मार्गदर्शन सिस्टम के साथ एक दो चरणों वाली केनिस्ट्राइज्ड सॉलिड प्रोपेलेंट बैलिस्टिक मिसाइल है। इसी साल 14 अक्टूबर को भारत की परमाणु क्षमता से लैस पनडुब्बी आईएनएस अरिहंत ने बंगाल की खाड़ी में बैलिस्टिक मिसाइल का सफल प्रक्षेपण किया था। रक्षा मंत्रालय ने बताया था कि हथियार प्रणाली ने सभी परिचालन और तकनीकी मानक को पूरा किया था। यह प्रक्षेपण भारत की सामरिक क्षमताओं को और बढ़ावा देने की दिशा में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि थी।
एबीएन सेंट्रल डेस्क। मिशन चंद्रयान-3 को लेकर बड़ा अपडेट आ रहा है। बताया जा रहा है कि इसरो की योजना अगले साल जून में चंद्रमा पर अपने तीसरे मिशन चंद्रयान-3 को और अधिक मजबूत चंद्र रोवर के साथ लॉन्च करने की है। यह भविष्य के मिशनों के लिए भी मददगार होगा। अंतरिक्ष एजेंसी ने अगले साल की शुरुआत में देश के पहले मानव अंतरिक्ष यान गगनयान के लिए एबॉर्ट मिशन की पहली परीक्षण उड़ान भी तैयार की है। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) के अध्यक्ष एस सोमनाथ ने एक कार्यक्रम से इतर कहा कि चंद्रयान-3 का प्रक्षेपण अगले साल जून में लॉन्च व्हीकल मार्क-3 (एलवीएम3) से होगा। इसरो की योजना 2024 के अंत तक भारतीय अंतरिक्ष यात्रियों को कक्षा में ले जाने की है। दरअसल, सितंबर 2019 में चंद्रयान-2 मिशन पर विक्रम लैंडर के चंद्रमा की सतह पर दुर्घटनाग्रस्त होने के बाद चंद्रमा पर रोवर उतारने का भारत का पहला प्रयास विफल हो गया था। सोमनाथ ने कहा कि चंद्रयान-3 अब तैयार है। यह चंद्रयान-2 की प्रतिकृति नहीं है। रोवर वहां है। इंजीनियरिंग काफी अलग है। हमने इसे और अधिक मजबूत बनाया है ताकि पिछली बार की तरह समस्या न हो। इसरो के अध्यक्ष ने कहा कि कई बदलाव हैं। इंपैक्ट लेग्स पहले से कहीं ज्यादा मजबूत हैं। इसमें बेहतर उपकरण होंगे। इस बार वह समस्या नहीं आयेगी, जो पिछली बार आई थीं। मानव अंतरिक्ष यान गगनयान पर सोमनाथ ने कहा कि इसरो वास्तव में मनुष्यों को अंतरिक्ष में ले जाने से पहले छह परीक्षण उड़ानें करेगा। गगनयान मिशन की तैयारी धीमी और स्थिर गति से चल रही है। उन्होंने कहा कि इसे आगे बढ़ाने का यह सही तरीका है। यह एक बहुत ही जटिल मिशन है। हम इसके बारे में दावा नहीं कर सकते हैं।
एबीएन सेंट्रल डेस्क। इस साल भारत की आबादी के करीब तीन गुना स्मार्ट फोन फेंक दिए जाएंगे। इलेक्ट्रॉनिक कचरे के निवारण पर काम करने वाली संस्था वेस्ट इलेक्ट्रिकल एंड इलेक्ट्रॉनिक इक्विपमेंट ने कहा है कि इस साल दुनियाभर में 5.3 अरब फोन फेंक दिए जाएंगे। संस्था का यह अनुमान वैश्विक व्यापार के आंकड़ों पर आधारित है। दुनिया में ई-कचरे के बढ़ते संकट को दिखाते हुए इस शोध में कहा गया है कि ऐसे लोगों की तादाद काफी बड़ी है जो अपने पुराने फोन को रीसाइकल करने के बजाय रखे रहते हैं। ई-कचरा का दोहरा नुकसान है क्योंकि इसे फेंकने के कारण जलवायु को नुकसान होता है और इसमें इस्तेमाल कीमती धातुओं को यदि रिसाइक्लिंग के दौरान निकाला नहीं जाता है तो खनन के जरिए उन्हें पृथ्वी से निकालना पड़ता है, जिसके अपने कई नुकसान हैं। इलेक्ट्रॉनिक कचरा पैदा करने के मामले में भारत दुनिया का पांचवां बड़ा देश है। भारत में हर साल करीब 10 लाख टन ई-कचरा निकलता है। भारतीय शहरों में पैदा होने वाले इलेक्ट्रॉनिक कचरे में सबसे ज्यादा कंप्यूटर होते हैं। ऐसे ई कचरे में 40 फीसदी सीसा और 70 फीसदी भारी धातुएं मिलीं हैं। एक हालिया रिपोर्ट में बताया गया है कि पूरे देश में लाखों टन ई-कचरे का महज तीन से दस फीसदी ही इकट्ठा किया जाता है। स्मार्टफोन के अंदर होती हैं कई धातुएं : सूत्रों के मुताबिक एक स्मार्टफोन के अंदर 62 धातुएं हो सकती हैं। आईफोन के पुर्जों में सोना, चांदी और पैलेडियम जैसी बेशकीमती धातुएं भी होती हैं, जिन्हें एशिया, अफ्रीका और आॅस्ट्रेलिया में खनन से निकाला जाता है। संस्था के महानिदेशक पास्कल लीरॉय ने कहा कि लोगों को अंदाजा नहीं है कि ई-कचरे में मौजूद कीमती धातुओं की मात्रा कितनी बड़ी है। वह कहते हैं कि लोगों को अहसास नहीं है कि देखने में सामान्य लगने वालीं इन चीजों को अगर वैश्विक स्तर पर एक साथ रखा जाए तो कितनी बड़ी मात्रा बन सकती है। एक अनुमान के मुताबिक दुनियाभर में इस वक्त 16 अरब से ज्यादा मोबाइल फोन इस्तेमाल किए जा रहे हैं। यूरोप में जितने फोन हैं, उनमें से लगभग एक तिहाई इस्तेमाल नहीं होते। डब्ल्यू ट्रिपल ई का शोध दिखाता है कि इलेक्ट्रिक और इलेक्ट्रॉनिक कचरा 2030 तक सालाना 7.4 करोड़ टन की दर से बढ़ने लगेगा। इस कचरे में सिर्फ फोन शामिल नहीं हैं। टैबलेट और कंप्यूटर से लेकर वॉशिंग मशीन, टोस्टर और फ्रिज व जीपीएस मशीन तक ई-कचरे का बड़ा हिस्सा बन रहे हैं। एक अनुमान के मुताबिक 2018 में पूरी दुनिया में 5 करोड़ टन ई-कचरा जमा हुआ। इस कचरे में कंप्यूटर प्रोडक्ट्स, स्क्रीन्स, स्मार्टफोन, टैबलेट, टीवी, फ्रिज, वॉशिंग मशीन और हीटिंग या कूलिंग वाले उपकरण सबसे ज्यादा थे। इसमें से सिर्फ 20 फीसदी कचरे की रिसाइक्लिंग हुई, बाकी खुली जमीन या नदियों और समंदर तक पहुंच गए। बता दें कि नेशनल ग्रीन ट्राइब्यूनल के पिछले दिसंबर 2020 में पेश इस रिपोर्ट के मुताबिक 2017-18 में ई-कचरा कलेक्शन का लक्ष्य 35,422 टन था, लेकिन कलेक्शन 25,325 टन ही हुआ। इसी तरह 2018-19 में लक्ष्य था 1,54,242 टन लेकिन जमा हुआ 78,281 टन। और अगले ही साल यानी 2019-20 में भारत में 10,14,961 टन ई-कचरा पैदा कर दिया गया।
एबीएन नॉलेज डेस्क। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) का सबसे भारी रॉकेट एलवीएम-3 23 अक्टूबर को आंध्र प्रदेश के श्रीहरिकोटा से ब्रिटिश स्टार्टअप वनवेब के 36 उपग्रहों का प्रक्षेपण करेगा। इस प्रक्षेपण के साथ ही एलवीएम-3 वैश्विक वाणिज्यिक उपग्रह प्रक्षेपण बाजार में कदम रखेगा। एलवीएम-3 को पहले जीएसएलवी एमके-3 रॉकेट के नाम से जाना जाता था। बेंगलुरु स्थित इसरो मुख्यालय ने शुक्रवार को कहा कि एलवीएम-3-एम2/वनवेब इंडिया-1 मिशन का प्रक्षेपण 23 अक्टूबर (22 अक्टूबर की मध्यरात्रि) को भारतीय समयानुसार 12 बजकर सात मिनट पर निर्धारित है। इसरो ने कहा कि क्रायो स्टेज, इक्विपमेंट बे को जोड़ने का काम पूरा। उपग्रहों को एक कैप्सूल में भरकर रॉकेट में रख दिया गया है। प्रक्षेपक की अंतिम जांच की प्रक्रिया जारी है। इस महीने की शुरुआत में इसरो ने कहा था कि अंतरिक्ष विभाग और अंतरिक्ष एजेंसी की वाणिज्यिक शाखा के तहत काम करने वाले सार्वजनिक क्षेत्र के केंद्रीय उद्यम न्यूस्पेस इंडिया लिमिटेड (एनएसआईएल) ने ब्रिटेन स्थित नेटवर्क एक्सेस एसोसिएट्स के साथ दो प्रक्षेपण सेवा अनुबंधों पर हस्ताक्षर किये थे। इन अनुबंधों के तहत एलवीएम-3 रॉकेट के जरिये वनवेब के निचली कक्षा के ब्रॉडबैंड संचार उपग्रहों का प्रक्षेपण किया जाना था। इसरो ने कहा, यह मांग के आधार पर एनएसआईएल के जरिये पहला एलवीएम-3 समर्पित वाणिज्यिक प्रक्षेपण है। अंतरिक्ष एजेंसी ने कहा कि वनवेब के साथ हुआ यह करार एनएसआईएल और इसरो के लिए मील का पत्थर है, क्योंकि इसके जरिये एलवीएम-3 रॉकेट वैश्विक वाणिज्यिक उपग्रह प्रक्षेपण बाजार में कदम रखने जा रहा है। एलवीएम-3 तीन चरणों वाला प्रक्षेपण वाहन है, जिसमें 2 ठोस मोटर स्ट्रैप-ऑन, एक तरल प्रणोदक चरण और एक क्रायोजेनिक चरण शामिल है। यह रॉकेट चार टन भार वर्ग के उपग्रहों को जियोसिंक्रोनस ट्रांसफर ऑर्बिट में प्रक्षेपित करने में सक्षम है। भारत की भारती एंटरप्राइजेज वनवेब में एक प्रमुख निवेशक और शेयरधारक है।
एबीएन नॉलेज डेस्क। खबरें आई थीं और काफी चर्चा भी हुई थी कि मंगल पर जीवन की संभावना है, लेकिन अब बताया जा रहा है कि मंगल पर जीवन नहीं रहा है। पहले जब भी पृथ्वी के बाहर जीवन की कल्पना की जाती थी तो मंगल की बात होती थी। वैज्ञानिकों को मंगल पर जीवन को लेकर कई ठोस प्रमाण भी मिले थे। हालांकि, अब ये उम्मीद खत्म होती जा रही है या फिर लगभग खत्म हो गई है। अब कई रिसर्च रिपोर्ट सामने आ चुकी हैं, जिनमें मंगल पर जीवन ना होने का दावा किया जाता है। मंगल पर जीवन ना होने की रिपोर्ट्स के बाद अब लोग जानना चाहते हैं कि आखिर वो रहस्य क्या है कि मंगल पर जीवन खत्म हो गया। अब इसे लेकर कई रिसर्च की जा रही है, जिसमें मंगल पर जीवन शुरू होने से खत्म होने का कारण पता किया जा रहा है, तो आज हम आपको बताते हैं कि आखिर ऐसे क्या हुआ कि मंगल पर जीवन की शुरुआत अच्छे से नहीं हो पाई। तो जानते हैं मंगल पर जीवन से जुड़ी कुछ खास बातें… क्यों मंगल पर नहीं पनपा जीवन : आपको ये जानकार हैरानी होगी कि जिस जलवायु परिवर्तन की बात पृथ्वी पर की जा रही है, उसी जलवायु परिवर्तन के चलते मंगल पर जीवन संभव नहीं हो पाया है। माना जा रहा है कि क्लाइमेट चेंज की वजह से ही मंगल का वातावरण प्रभावित हुआ है और इस वजह से आज मंगल की जमीन लंबे समय तक बंजर ही रह गई है। रिसर्च में सामने आया है कि ग्रीन हाउस गैस इफेक्ट की वजह से यह असर हुआ है। एक अमेरिकन वेबसाइट की रिपोर्ट के अनुसार, करीब 3.7 से 4.1 अरब साल पहले मंगल के शुरुआती दिनों का वातावरण, जीवन को पनपने देने के लिए अनुकूल था। हाइड्रोजन पर जीवित रहने वाले और मीथेन का उत्सर्जन करने वाले सामान्य रोगाणु मंगल पर करीब 370 करोड़ साल पहले पनपे होंगे। इस तरह के रोगाणु आज पृथ्वी पर आम हैं, लेकिन ये मंगल के साथ उल्टे साबित हुए। लेकिन माना जा रहा है कि मंगल की स्थिति में हो सकता है कि ज्यादा मीथेन का उत्सर्जन हुआ हो। नेचर एस्ट्रोनॉमी जर्नल में प्रकाशित एक रिसर्च में वैज्ञानिकों ने कहा कि इस तरह की घटना ने संभावित गर्म परिस्थितियों को समाप्त कर दिया होगा और मंगल की सतह पर जीवित रहने की क्षमता कम हो गई होगी। बता दें कि इसका पता लगाने के लिए एरिजोना यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं ने मंगल ग्रह से कुछ साक्ष्य जुटाकर उन्हें वातावरण और जलवायु के मॉडल के साथ-साथ मीथेन उत्पादक रोगाणुओं के पारिस्थितिक मॉडल का उपयोग करके काल्पनिक मॉडल बनाया। इसमें यह भी पाया गया कि शुरुआत में मगल आज की ठंड वाली परिस्थितियों की तुलना में काफी गर्म था और उस वक्त वहां हाइड्रोजन काफी मात्रा में थी। इस स्थिति में रोगाणुओं को पर्याप्त भोजन आपूर्ति मिली होगी लेकिन, वातावरण के बदलने के साथ ही यहां की स्थिति भी बदल गयी।
एबीएन नॉलेज डेस्क। Apple को अब यूरोपियन यूनियन के नए नियमों के अनुसार iPhone के लिए चार्जर को लाइटनिंग से USB-C में बदलना होगा। कंपनी के पास नए नियम का पालन करने के लिए 2024 तक का समय है। इसके बाद कंपनी फोन, टैबलेट और हेडफोन जैसे अधिकांश इलेक्ट्रॉनिक डिवाइस के लिए एक ही चार्जिंग पोर्ट देना होगा। जानकारी के मुताबिक iPhone 15 को अगले साल USB-C चार्जिंग पोर्ट मिल सकता है। हालांकि, शुरू में केवल हाई एंड मॉडल iPhone 15 Ultra में यह फीचर दिया जायेगा। ब्लूमबर्ग के मार्क गुरमन ने अपने साप्ताहिक न्यूज लेटर में दावा किया है कि ऐपल शायद अगले कुछ सालों में ऐपल वॉच से मेल खाते हुए आईफोन और आईपैड पर पूरी तरह से अपरिवर्तनीय चार्जिंग शुरू कर देगा। गुरमन का यह भी दावा है कि Apple जल्द ही एक ऐसी तकनीक खोज सकता है जो उसके डिवाइसों को वायरलेस तरीके से चार्ज कर सके। मार्क गर्मन की मानें तो ऐपल की अन्य मोबाइल एक्सेसरीज और मैक एक्सेसरीज में भी USB-C चार्जिंग पोर्ट का सपोर्ट मिल सकता है, जिनमें मैजिक माउस और मैजिक कीबोर्ड वगैरह शामिल हैं। हालांकि, एयरपॉड्स, एयरपॉड्स प्रो और एयरपॉड्स मैक्स को USB-C पोर्ट मिलने में साल 2024 तक का वक्त जरूर लग सकता है। EU ने सभी इलेक्ट्रॉनिक डिवासों के लिए USB-C चार्जर अनिवार्य कर दिया है। पिछले हफ्ते, यूरोपीय संघ ने 2024 के अंत तक यूएसबी-सी पर स्विच करने के लिए फोन, टैबलेट, कैमरा, हेडफोन और हेडसेट, ई-रीडर, कीबोर्ड, चूहों, मोबाइल नेविगेशन सिस्टम, पोर्टेबल गेम कंसोल और स्पीकर बनाने वाली कंपनियों के लिए अनिवार्य बना दिया था।
एबीएन सेंट्रल डेस्क। भारत की प्रीमियर कम्युनिकेशन सलूशन प्रोवाइडर, भारती एयरटेल (एयरटेल) ने 5जी द्वारा संचालित देश का पहला इमर्सिव वर्चुअल रियलिटी (वीआर) विज्ञापन पेश किया। एयरटेल थैंक्स ऐप पर नया विज्ञापन फॉरमेट ब्रांड्स के लिए कस्टमर्स के साथ एक ऐसे इमर्सिव वातावरण में जुड़ने के नए तरीके उपलब्ध कराता है, जो पहले पारंपरिक विज्ञापन के तरीकों में उपलब्ध नहीं था। अल्ट्रा-फास्ट लो-लेटेंसी 5जी नेटवर्क सुनिश्चित करता है कि 3डी विजुअल और वीडियो जीवंत हों। ब्रांड्स इस प्रकार के विज्ञापन का उपयोग करके अपने ग्राहकों को एक इमर्सिव, लैग-फ्री और अत्यधिक आकर्षक विज्ञापन दिखा सकते हैं। एयरटेल डिजिटल के सीईओ आदर्श नायर ने इस पर टिप्पणी करते हुए कहा, अब हम 5जी की बदौलत लो-लेटेंसी के साथ और अधिक लाभ हासिल कर सकते हैं, जो इसका सबसे बड़ा फायदा है। हम इस तकनीक का उपयोग भारत में अब तक का पहला इमर्सिव वीआर विज्ञापन विकसित करने के लिए कर रहे हैं, जो व्यवसायों को मोबाइल-फर्स्ट मार्केट में ग्राहकों के साथ सीधे संवाद की सुविधा प्रदान करता है। इसका उपयोग ब्रांड अपने ग्राहकों को आकर्षक, इमर्सिव और कस्टमाइज्ड एक्सपीरियंस देने के लिए कर सकते हैं।
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