एक और भारतवंशी का डंका बजाएबीएन सेंट्रल डेस्क। भारतीय मूल के अमेरिकी सॉफ्टवेयर और रोबोटिक इंजीनियर अमित क्षत्रिय को नासा के नये चंद्र से मंगल कार्यक्रम का पहला अध्यक्ष नामित किया गया है। यह कार्यक्रम अमेरिका की अंतरिक्ष एजेंसी नासा की चंद्रमा पर दीर्घकालिक उपस्थिति की तैयारियों को सुनिश्चित करेगा ताकि मानव को अंतरिक्ष विज्ञान की नई उपलब्धि के तहत लाल ग्रह (मंगल) तक भेजा जा सके। एजेंसी ने गुरुवार को घोषणा की कि क्षत्रिय नासा द्वारा गठित कार्यालय के पहले प्रमुख के तौर पर तत्काल प्रभाव से अपना काम शुरू करेंगे। नासा द्वारा जारी प्रेस विज्ञप्ति में कहा गया कि नए कार्यालय का उद्देश्य एजेंसी की चंद्रमा और मंगल पर मानव अन्वेषण गतिविधियों को अंजाम देना है ताकि पूरी मानवता को उसका लाभ मिल सके। नासा के प्रशासक बिल नेल्सन ने कहा कि अन्वेषण का स्वर्ण काल अब हो रहा है और नया कार्यालय यह सुनिश्चित करने में नासा की मदद करेगा कि वह चंद्रमा पर सफलतापूर्वक दीर्घकालिक उपस्थिति दर्ज करे और मानवता को मंगल ग्रह की ओर छलांग लगाने हेतु तैयारियों को पूरा किया जा सके...। नेल्सन ने कहा कि चंद्रमा से मंगल कार्यक्रम कार्यालय नासा को चंद्रमा तक मिशन को पूरा करने और मंगल ग्रह पर पहली बार मानव को भेजने की तैयारियों में मदद करेगा। विज्ञप्ति के मुताबिक क्षत्रिय चंद्रमा और मंगल ग्रह पर मानव मिशन की योजना बनाने और उन्हें लागू करने के लिए जिम्मेदार होंगे। अमित क्षत्रिय ने एकीकृत अंतरिक्ष प्रक्षेपण प्रणाली ओरियन और एक्प्लोरेशन ग्राउंड सिस्टम प्रोग्राम का निर्देशन और नेतृत्व किया है। पूर्व में क्षत्रिय ने सामान्य अन्वेषण प्रणाली विकास संभाग के कार्यवाहक एसोसिएट निदेशक पद पर कार्य किया है। क्षत्रिय ने वर्ष 2003 में अंतरिक्ष कार्यक्रम में अपने करियर की शुरुआत की थी। वर्ष 2014 से 2017 तक वह अंतरिक्ष केंद्र उड़ान निदेशक के पद पर रहे। क्षत्रिय भारत से अमेरिका आये पहली पीढ़ी के प्रवासी की संतान हैं और उन्होंने कैलिफोर्निया इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी से गणित विज्ञान में स्नातक किया है और टेक्सास विश्वविद्यालय से गणित में एमए की उपाधि हासिल की है।
एबीएन सेंट्रल डेस्क। भारत में 2023 में ऑनलाइन गलत सूचना के लिए सर्च ट्रेंड अब तक के सबसे उच्च स्तर पर पहुंच गया है, ऐसे में गूगल ने शुक्रवार को कहा कि इसका अबाउट दिस रिजल्ट (इस परिणाम के बारे में) फीचर 9 भारतीय भाषाओं सहित वैश्विक स्तर पर उपलब्ध होगा, ताकि दुनिया भर के लोगों को जानकारी का मूल्यांकन करने और यह समझने में मदद मिल सके कि यह कहां से आ रहा है। गूगल ने एक ब्लॉगपोस्ट में कहा- अब, चाहे आप हिंदी, बंगाली, मराठी, तमिल, गुजराती, कन्नड़, मलयालम, तेलुगु या पंजाबी में खोज रहे हों, आपको गूगल खोज पर अधिकांश परिणामों के आगे तीन बिंदु दिखाई देंगे। उन तीन बिंदुओं पर टैप करने से आपको इस बारे में और जानने का एक तरीका मिल जाता है कि जो जानकारी आप देख रहे हैं वह कहां से आ रही है और हमारे सिस्टम ने कैसे निर्धारित किया कि यह आपकी क्वेरी के लिए उपयोगी हो सकती है। इसके साथ, उपयोगकर्ता उन साइटों के बारे में अधिक सूचित निर्णय लेने में सक्षम होंगे जिन पर वह जाना चाहते हैं और कौन से परिणाम उनके लिए सबसे अधिक सहायक होंगे। गलत सूचनाओं का मुकाबला करने के लिए, गूगल ने मीडिया साक्षरता विशेषज्ञों के साथ भागीदारी की है ताकि प्रतिभागियों को गलत जानकारी का पता लगाने के बारे में बेहतर समझ प्राप्त करने में मदद करने के लिए प्रशिक्षण विकसित किया जा सके।भारत में, कंपनी ने फैक्टशाला के साथ भागीदारी की, जो एक सहयोगी और बहु-हितधारक मीडिया साक्षरता नेटवर्क है, जिसका नेतृत्व 250 से अधिक पत्रकार और अन्य विशेषज्ञ करते हैं, जो 15 से अधिक भारतीय भाषाओं में स्थानीय रूप से तैयार कार्यशालाएं और कार्यक्रम चलाते हैं। इस साल, कंपनी ने कहा कि फैक्टशाला मीडिया और सामुदायिक संगठनों को मीडिया साक्षरता में सहायता के लिए नये और अभिनव प्रारूपों के साथ प्रयोग करने में मदद करने के लिए एक इनक्यूबेटर कार्यक्रम शुरू कर रही है और 500 कॉलेजों के सहयोग से युवाओं और पहली बार मतदाताओं के लिए एक अभियान चलायेगी। 2016 से, जीएनआई इंडिया ट्रेनिंग नेटवर्क और गूगल के टीचिंग फेलो के माध्यम से, उन्होंने 60,000 से अधिक पत्रकारों और मीडिया छात्रों को भारत में ऑनलाइन गलत सूचना का पता लगाने और उसे खारिज करने के लिए आवश्यक कौशल पर प्रशिक्षित किया है। 15 से अधिक भाषाओं में 1,200 से अधिक कार्यशालाओं की पेशकश से 1,450 से अधिक न्यूजरूम और 1,200 विश्वविद्यालयों को लाभ हुआ है। इसके अलावा, टेक दिग्गज ने उल्लेख किया कि उसने 2022 में जीएनआई फैक्ट चेक अकादमी भी लॉन्च किया, ताकि न्यूजरूम को डेटा के साथ भ्रामक दावों को सत्यापित करने और जलवायु संबंधी गलत सूचना से निपटने के लिए क्षमता निर्माण में मदद मिल सके। 2022 के अंत में, यू-ट्यूब ने हिट पॉज भी लॉन्च किया, जो दर्शकों को भारत में गलत सूचना का पता लगाने और उसका मूल्यांकन करने में मदद करने के लिए एक कार्यक्रम है।
एबीएन सेंट्रल डेस्क। भारतीय रेलवे का नेटवर्क काफी बड़ा है। रोजाना लाखों की संख्या में लोग एक जगह से दूसरी जगह की यात्रा करते हैं। रेलवे यात्रियों की सुविधाएं के लिए नई-नई तरह की ट्रेनों की भी शुरुआत करता रहता है। कुछ साल पहले शुरू की गयी वंदे भारत एक्सप्रेस के जरिये रेलवे ने लोगों को बड़ी सौगात दी है। अब तक दस रूट्स पर चलायी जा चुकी वंदे भारत ट्रेनों को आगे भी कई अन्य रूट्स पर शुरू करने का ऐलान किया जा चुका है। ट्रेनों से जुड़ी चीजों के बारे में जानने के लिए यात्री काफी उत्सुक रहते हैं। रेलवे भी ट्रेनों को लेकर तरह-तरह जानकारियां लोगों को देता रहता है, ताकि उन्हें भारतीय रेलवे के बारे में और अधिक इंफोर्मेशन मिल सके। इसी तरह रेलवे ने हाल ही में बताया है कि ट्रेनों के कोच के पीछे जो क्रॉस का सिंबल बनाया जाता है, उसका क्या मतलब होता है? आमतौर पर यह साइन आखिरी कोच के पीछे पीले रंग से बनाया जाता है, ताकि दूर से दिख सके। रेलवे ने बताया है कि यह सिंबल बताता है कि यह ट्रेन का आखिरी कोच है। इसके जरिए रेलवे अधिकारी कन्फर्म करते हैं कि ट्रेन के सभी कोच रवाना हो गये हैं और कोई भी कोच बचा नहीं है। इसके अलावा ट्रेन के आखिरी डिब्बे पर क्रॉस चिह्न के होने का एक और महत्व है। ट्रेन के आखिरी डिब्बे पर क्रॉस का निशान किसी दुर्घटना को बचाने के मिशन के साथ हाइलाइट किया जाता है, क्योंकि यह इस बात की पुष्टि करने में मदद करता है कि साइन वाला उस ट्रेन का आखिरी डिब्बा है। साथ ही, दूर से यह दिखाई भी आसानी से दे जाता है। इसके अलावा, इससे यह भी पता चलता है कि यह ट्रेन किसी भी हादसे का शिकार नहीं हुई है। आखिरी में सिंबल देखकर रेलवे कर्मचारी आसानी से पता लगा सकते हैं कि ट्रेन का सफर पूरी तरह से सुरक्षित रहा और कोई भी दुर्घटना नहीं हुई। वहीं, अगर ट्रेन से सिंबल वाला कोच गायब होता है तो फिर स्टेशन मास्टर अलर्ट हो जाता है और यह जानकारी आगे देता है।
वैज्ञानिकों ने दी तूफान की चेतावनीएबीएन नॉलेज डेस्क। सूर्य की सतह पर ब्लैक कलर के होल को कोरोनल होल कहा जाता है। इसकी लंबाई तीन लाख और चौड़ाई चार लाख किलोमीटर है। इसमें बैक टू बैक 20-30 पृथ्वी समा सकती है।नासा के वैज्ञानिकों को सूर्य की सतह पर एक विशालकाय होल दिखा है। इस होल का आकार पृथ्वी से 20 गुना बड़ा है। इस होल को कोरोनल होल कहा जाता है। इस होल के दिखने के बाद सूर्य की सतह पर अंधेरा छा गया है। सूर्य में इस विशालकाय होल को देखते हुए एनओएए ने भू चुंबकीय तूफानों की चेतावनी दी है। बता दें कि एनओएए एक अमेरिकी फेडरल एजेंसी है।मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक, सूर्य की सतह पर गड्ढे के बाद 29 लाख किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से हवाएं पृथ्वी की तरफ बढ़ रही है। शुक्रवार को इसे पृथ्वी से टकराने की आशंका है। इसके पृथ्वी से टकराने के बाद इसका क्या प्रभाव होगा, इस पर कड़ी नजर रखी जा रही है। सूर्य से निकलने वाले कण उपग्रहों, मोबाइल फोन और जीपीएस को प्रभावित कर सकता है। बता दें कि नासा के एसडीओ ने 23 मार्च को सूर्य के साउथ पोल के नजदीक कोरोनल होल की खोज की थी। ये छेद सौर हवा को अंतरिक्ष में अधिक आसानी से फैला पाते हैं। इसकी रेटिंग जी1 से जी5 तक होती है। नासा के वैज्ञानिक एलेक्स यंग के मुताबिक, मौजूदा कोरोनल होल बहुत बड़ा है। इसकी लंबाई तीन लाख और चौड़ाई चार लाख किलोमीटर है। इसमें बैक टू बैक 20-30 पृथ्वी समा सकती है। नासा के मुताबिक, सूर्य की सतह पर ब्लैक कलर के होल को कोरोनल होल कहा जाता है। ये ब्लैक इसलिए दिखते हैं क्योंकि वे आसपास के प्लाज्मा की तुलना में ठंडे, कम घने क्षेत्र हैं और खुले एकध्रुवीय चुंबकीय क्षेत्र के क्षेत्र हैं। ये छेद सूर्य पर किसी भी समय और स्थान पर विकसित हो सकते हैं।
विशालकाय ब्लैकहोल ने बदली दिशा, भेज रहा खतरनाक रेडिएशनएबीएन नॉलेज डेस्क। अंतरिक्ष की अपनी अलग दुनिया है। यहां पर पल-पल घटनाएं घटती रहती हैं। वैज्ञानिक इसका पता लगाने के लिए दिन-रात स्टडी में लगे रहते हैं। दो दिन पहले की बात जब आसमान अलग-अलग रंग बदल रहा था। फिनलैंड, अमेरिका और कनाडा में ये देखा गया। जब कैमरे में ये सब रिकॉर्ड हो गया तो लोग इसको देखकर चौंकने लगे थे। मगर ये सही था। ब्लैक होल के बारे में सबने सुना होगा।धन्य हो साइंटिस्ट स्टीफन हॉकिंग का जिन्होंने इसके तमाम रहस्यों को उजागर किया था। आसमान में गुलाबी, हरा, लाल… कई रंगों में दिख रहा था। वैज्ञानिकों ने एक और बड़ी घटना की जिक्र किया है जो कि पृथ्वीवासियों के लिए अच्छा नहीं है। स्पेस में जब पहली बार ब्लैक होल दिखा तो साइंटिस्ट्स हैरान हो गये। इसकी ग्रेवटी इतनी तगड़ी थी कि ये प्रकाश को भी सोख जाता है। अब एक बड़े ब्लैकहोल की दिशा बदल गयी है। चौंकाने वाली बात ये है कि इससे निकलने वाला रेडिएशन पृथ्वी तक पहुंच रहा है।सुनने और पढ़ने में आपको जितना आसान ये लग रहा है दरअसल ये बहुत बड़ी घटना है। ब्लैकहोल का डायरेक्शन बदलना साधारण नहीं है। वैज्ञानिक पता लगाने में जुटे हुए हैं कि आखिर अंतरिक्ष में ये घटना कैसे घटी। ऐसा पहले कभी नहीं हुआ। लेकिन इसका कोई पुख्ता कारण अभी तक नहीं मिला है।कयास ये लगाये गये हैं कि इसके पीछे का कारण हो सकता है एक गैलेक्सी यानी आकाशगंगा का दूसरे गैलेक्सी से टकराना। अब इसके टकराने के बाद ब्लैकहोल का डायरेक्शन चेंज हुआ और अब जो इसकी दिशा है वो पृथ्वी की तरफ हो गयी। ये गैलेक्सी हमसे 657 मिलियन प्रकाश वर्ष दूर स्थित हैं। इसका नाम है पीबीसी जे2333.9-2343।उन्होंने पाया कि अंतिरक्ष में हुई इस घटना से 90 डिग्री तक घुमाव हुआ है। अब इसका केंद्र पृथ्वी की ओर है। ब्लैकहोल एक अनसुलझा रहस्य है। आप इसको विवादास्पद भी कह सकते हैं। इसकी खोज में वैज्ञानिकों ने सालों साल निकाल दिये। मगर आज भी इसके कई सवाल रहस्यमय ही हैं।
एबीएन नॉलेज डेस्क। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) ने रविवार सुबह व्हीकल मार्क-3 (एलवीएम3- एम3) वनवेब इंडिया-2 मिशन को लांच कर दिया। आंध्र प्रदेश के श्रीहरिकोटा में सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र से 36 सैटेलाइट्स के साथ देश के सबसे बड़े एलवीएम3 रॉकेट को प्रक्षेपित किया गया। ब्रिटेन की नेटवर्क एक्सेस एसोसिएट्स लिमिटेड (वनवेब ग्रुप कंपनी) ने पृथ्वी की निचली कक्षा में 72 सैटेलाइट्स प्रक्षेपित करने के लिए इसरो की कमर्शियल यूनिट न्यूस्पेस इंडिया लिमिटेड के साथ करार किया था। इस क्रम में 23 अक्टूबर 2022 को इसरो वनवेब के 36 सैटेलाइट पहले ही लांच कर चुका है। इस सौदे के तहत वनवेब के सैटेलाइट्स लांच करने के लिए इसरो को एक हजार करोड़ रुपये मिले हैं।चेन्नई से करीब 135 किलोमीटर दूर सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र में दूसरे लांच पैड से रविवार सुबह नौ बजे 43.5 मीटर लंबे और 643 टन भार के रॉकेट से 36 सैटेलाइट्स को प्रक्षेपित किया गया। इस लांच की उलटी गिनती शनिवार को ही शुरू कर दी गयी थी। रविवार का प्रक्षेपण 18वां और इस साल का तीसरा प्रक्षेपण था। इसरो के लिए साल 2023 का यह दूसरा प्रक्षेपण रहा। इससे पृथ्वी की निचली कक्षा में वनवेब उपग्रह समूह की पहली पीढ़ी पूरी हो जायेगी। इस प्रक्षेपण के साथ पृथ्वी की कक्षा में वनवेब के सैटेलाइट्स की संख्या 616 हो जाएगी, जो इस साल वैश्विक सेवाएं शुरू करने के लिए पर्याप्त बताये जा रहे हैं।प्राप्त जानकारी के मुताबिक इसरो का एलवीएम3 तीन चरणों वाला रॉकेट है। तकनीकी तौर पर इसके पहले चरण में तरल ईंधन, ठोस ईंधन से संचालित दो स्ट्रैप-ऑन मोटर, तरल ईंधन, ठोस ईंधन द्वारा संचालित दो स्ट्रैप-ऑन मोटर, तरल ईंधन द्वारा संचालित दूसरा और क्रायोजेनिक इंजन है। इसरो के भारी भरकम रॉकेट की क्षमता एएलईओ तक 10 टन और जियो ट्रांसफर ऑर्बिट तक चार टन वजन ले जाने की है। लांच होने के 19 मिनट के बाद साथ गये सैटेलाइट्स अलग होना शुरू हो गये। इसरो ने इस रॉकेट के जरिये दूसरी बार निजी कंपनी के सैटेलाइट्स प्रक्षेपित किये, जो चरणबद्ध तरीके से रॉकेट से अलग हुए।
एबीएन नॉलेज डेस्क। उत्तर कोरिया ने इस सप्ताह के शुरू में पानी के भीतर परमाणु हथियार का परीक्षण किया, जो रेडियोधर्मी सूनामी पैदा करने में सक्षम था। प्योंगयांग की सरकारी मीडिया ने शुक्रवार को यह जानकारी दी। अलग से, उत्तर ने एक परमाणु वारहेड का अनुकरण करने वाले परीक्षण वारहेड के साथ मिसाइलों का उपयोग करके एक क्रूज मिसाइल ड्रिल भी आयोजित की। प्योंगयांग की आधिकारिक कोरियन सेंट्रल न्यूज एजेंसी (केसीएनए) ने एक रिपोर्ट में यह बात कही।उत्तर की सत्तारूढ़ वक र्स पार्टी (डब्ल्यूपीके) के केंद्रीय सैन्य आयोग ने 21 मार्च से 23 मार्च तक दुश्मन को वास्तविक परमाणु संकट के प्रति सचेत करने और आत्मरक्षा के लिए परमाणु बल की विश्वसनीयता को सत्यापित करने के लिए अभ्यास का आदेश दिया। उन्होंने कहा कि अंडरवाटर न्यूक्लियर अटैक ड्रोन को मंगलवार को रिवॉन काउंटी, साउथ हैमयोंग प्रांत के तट पर तैनात किया गया था और गुरुवार दोपहर पानी के भीतर विस्फोट करने वाले परीक्षण वारहेड के साथ एक मॉक एनिमी पोर्ट के रूप में स्थापित होंगवोन बे के पानी में टारगेट प्वाइंट पर पहुंच गया।ड्रोन 59 घंटे 12 मिनट तक कोरिया के पूर्वी सागर में 80 से 150 मीटर की गहराई में पैटर्न-8 कोर्स के साथ चलता रहा। उत्तर ने दावा किया कि नौसैनिक स्ट्राइकर समूहों और उसके दुश्मनों के प्रमुख बंदरगाहों को नष्ट करने के लिए चुपके से परिचालन जल में घुसपैठ करने और एक सुपर-स्केल रेडियोधर्मी सूनामी बनाने के लिए डिजाइन किये गये ड्रोन को किसी भी तट और बंदरगाह पर तैनात किया जा सकता है या ऑपरेशन के लिए एक सतही जहाज से खींचा जा सकता है।केसीएनए ने कहा कि उत्तर कोरिया ने 2012 में साम्राज्यवादी हमलावर ताकतों की सैन्य और तकनीकी श्रेष्ठता को पछाड़ने के लिए ऐसे भूमिगत परमाणु हथियार विकसित करना शुरू किया। 2021 में डब्ल्यूपीके की आठवीं कांग्रेस में गुप्त हथियार को मानवरहित पानी के नीचे परमाणु हमला करने वाले शिल्प हैइल का नाम दिया गया था और पिछले दो वर्षों में 50 से अधिक शेकडाउन किये गये हैं। केसीएनए के मुताबिक, बुधवार को उत्तर कोरिया ने रणनीतिक क्रूज मिसाइलों का भी परीक्षण किया, परमाणु वारहेड का अनुकरण करने वाले टेस्ट वारहेड के साथ इत्तला दे दी। इसमें कहा कि दक्षिण हैमयोंग प्रांत में लॉन्च की गई हवासल -1 रणनीतिक क्रूज मिसाइल और दो हवासल -2 रणनीतिक क्रूज मिसाइलों ने पूर्वी सागर में निर्धारित लक्ष्य को सटीक रूप से भेदा। मिसाइलों ने क्रमश: 7,557 से 7,567 सेकंड और 9,118 से 9,129 सेकंड के लिए अपने प्रोग्राम किये गये 1,500 किमी- और 1,800 किमी-लंबी अंडाकार और पैटर्न-8 कक्षाओं में उड़ान भरी। दक्षिण कोरिया की सेना ने पहले कहा था कि उसने बुधवार सुबह उत्तर के पूर्वी शहर हमहंग से कई क्रूज मिसाइल लॉन्च किये जाने का पता लगाया।
एबीएन नॉलेज डेस्क। अंतरिक्ष के क्षेत्र में भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन लगातार कामयाबी हासिल करता जा रहा है। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन इस महीने के अंत में यानी 26 मार्च रविवार को 36 वनवेब सेटेलाइट्स के दूसरे बैच को लॉन्च करने जा रहा है। इसे श्रीहरिकोटा से एलवीएम-3 रॉकेट से लॉन्च किया जायेगा। इसरो ने वनवेब के साथ सेटेलाइट्स को लॉन्च करने के लिए हजार करोड़ का करार किया है।इसरो की यह लॉन्चिंग अगर कामयाब होती है, तो भारती एंटरप्राइज समर्थित ब्रिटेन स्थित कंपनी स्पेस में 600 से अधिक लोअर अर्थ ऑर्बिट सेटेलाइट्स के कान्स्टलैशन को पूरा कर लेगी, जिससे दुनिया के हर कोने में, हर जगह स्पेस आधारित ब्रॉडबैंड इंटरनेट सर्विस मुहैया कराने की पेशकश करने की उसकी योजना में काफी मदद मिलेगी।फरवरी में ही आ गये थे सेटेलाइट्स : इसरो ने कल सोमवार को अपने ट्वीट में कहा- एलवीएम3-एम3/वनवेब इंडिया-2 मिशन लॉन्च होने जा रहा है।।श्रीहरिकोटा के दूसरे लॉन्चिंग पैड एसडीएससी-एसएचएआर से रविवार 26 मार्च को इसकी लॉन्चिंग का समय तय किया गया है। वनवेब के 36 सेटेलाइट्स फ्लोरिडा से 16 फरवरी को ही भारत पहुंच आ गये थे।श्रीहरिकोटा से रविवार को की जा रही लॉन्चिंग में वनवेब की 18वीं लॉन्चिंग में 36 सेटेलाइट्स को छोड़ा जायेगा। और ये सेटेलाइट्स ब्रिटेन स्थित कंपनी के 582 सेटेलाइट्स के मौजूदा ग्रुप में शामिल हो जायेगा।
एबीएन नॉलेज डेस्क। अंतरिक्ष की दुनिया भी बड़ी रहस्यमयी है और ब्लैक होल यहां की सबसे अधिक ध्यान खींचने वाली चीज। वैज्ञानिकों ने इस ब्लैक होल के बारे में जो सिद्धांत बताये हैं, वे किसी के भी होश उड़ा देने वाले हैं। यहां की हर गतिविधि हैरत में डाल देने वाली है। मानो यह कोई जादुई दुनिया है। वास्तव में ब्लैक होल की रहस्यमयता लोगों की कल्पना से भी परे है। आइये ब्लैक होल के बारे में कुछ बड़ी बातें जानते हैं।ब्लैक होल ब्रह्मांड में सबसे आकर्षक और वैज्ञानिकों के बीच सबसे पुरानी बहस में शामिल मुद्दों में से एक रहा है। दशकों तक लोग इसे एक काल्पनिक दुनिया समझते रहे। लेकिन शुक्रिया कहना चाहिए दिवंगत वैज्ञानिक स्टीफन हॉकिंग का, जिन्होंने इस मुश्किल और अबूझ चीज को एक वैज्ञानिक आधार प्रदान किया।ब्लैक होल के बारे में पांच सबसे विचित्र और चौंकाने वाले सिद्धांत क्या हैं- जिसके बारे में वैज्ञानिकों ने बताया है :-रिंग ऑफ फायर : साल 2019 में खगोलविदों ने दूर आकाशगंगा में ब्लैक होल की एक तस्वीर ली। तब वैज्ञानिकों ने इसे एक राक्षस के रूप में वर्णित किया क्योंकि यह पृथ्वी के आकार का तीन मिलियन गुना था। जैसा कि शोधकर्ताओं ने बताया था कि यहां एक ऐसी छवि है जो अंधकारनुमा है और गोलाकार है और वहां एक रिंग ऑफ फायर जैसी आकृति नजर आती है।नीदरलैंड के रेडबौड विश्वविद्यालय के वैज्ञानिक हीनो फाल्के के शब्दों में कहें तो ऐसा लगता है जैसे वह नरक का द्वार हो। ब्लैक होल अपने चारों ओर प्रकाश को एक प्राकृतिक घुमाव देता है, जो कि गोलाकार छाया बनाता है।ब्लैक होल के बाल : 2015 में दिवंगत भौतिक विज्ञानी प्रोफेसर स्टीफन हॉकिंग ने कहा था कि ब्लैक होल स्थायी जेल जैसा नहीं था। एक साल बाद उन्होंने यह कहते हुए अपने सिद्धांत का विस्तार किया कि उत्तर शून्य-ऊर्जा कण ब्लैक होल के क्षितिज पर बैठते हैं।उन्होंने कहा कि ब्लैक होल के किनारे पर जमा क्वांटम कण, ब्लैक होल में गिरने वाले कणों की जानकारी को कैप्चर और स्टोर कर सकते हैं। उन्होंने इसकी तुलना नष्ट हुए एक ऐसे विश्वकोश से की, जहां जानकारी तकनीकी रूप से नष्ट नहीं होगी। इस सिद्धांत से कोई खास फायदा तो नहीं हुआ लेकिन ब्लैक होल की गैस और धूल का क्या होता है, इस बारे में लंबे समय से चल रहे विरोधाभास को हल करने में मदद मिल सकती है।निकलते हैं गैस के फव्वारे : एक ब्लैक होल का शक्तिशाली गुरुत्वाकर्षण का मतलब है कि अगर यह छेद के किनारे के बेहद करीब हो जाता है तो कुछ भी नहीं बच सकता। लेकिन इनमें से कई रहस्यमय वस्तुएं वास्तव में गैस और धूल जैसी चीज से घिरी हुई हैं जिसने ब्लैक होल को घेर रखा हैं और यहां के अंदर की दुनिया साफ-साफ नजर नहीं आती।डार्क एनर्जी का स्रोत : पिछले महीने ही लंदन के इंपीरियल कॉलेज के वैज्ञानिकों ने ब्लैक होल के बारे में एक रोमांचक घोषणा की है। उन्होंने खुलासा किया है कि यहां की वस्तुएं वास्तव में अज्ञात ऊर्जा का स्रोत हो सकती हैं जिसे डार्क एनर्जी के रूप में जाना जाता है।1998 में हमारे खगोलविदों ने बताया था कि न केवल ब्रह्मांड का विस्तार हो रहा है, बल्कि इसका विस्तार बहुत ही तेजी से हो रहा था। इस खोज को ध्यान में रखते हुए यह प्रस्तावित किया गया था कि एक डार्क एनर्जी गुरुत्वाकर्षण की तुलना में अधिक मजबूती से विकसित हो रही है।नौ देशों के 17 शोधकर्ताओं की एक टीम ने नौ अरब वर्षों के ब्लैक होल के विकास का अध्ययन किया था। उन्होंने प्राचीन और सुप्त आकाशगंगाओं का भी अवलोकन किया और पाया कि ब्लैक होल में वैक्यूम ऊर्जा या डार्क एनर्जी होती है।ब्रह्मांड का पिछला दरवाजा : ब्लैक होल के भीतर गहरा गुरुत्वाकर्षण यहां की सबसे बड़ी विलक्षणता है। इस सिद्धांत के अनुसार ब्लैक होल के माध्यम से यात्रा करने वाली कोई भी चीज चरम सीमा तक फैली होगी। शोधकर्ताओं का कहना है कि ब्लैक होल के अंदर का मामला हमेशा के लिए खो नहीं जायेगा जैसा कि पहले सोचा गया था। हो सकता है यह ब्रह्मांड का पिछला दरवाजा हो सकता है। उस पार की दुनिया न कितनी रहस्यमयी होगी।
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