एबीएन नॉलेज डेस्क। अंतरिक्ष की अपनी अलग दुनिया है। यहां पर पल-पल घटनाएं घटती रहती हैं। वैज्ञानिक इसका पता लगाने के लिए दिन-रात स्टडी में लगे रहते हैं। दो दिन पहले की बात जब आसमान अलग-अलग रंग बदल रहा था। फिनलैंड, अमेरिका और कनाडा में ये देखा गया। जब कैमरे में ये सब रिकॉर्ड हो गया तो लोग इसको देखकर चौंकने लगे थे। मगर ये सही था। ब्लैक होल के बारे में सबने सुना होगा।
धन्य हो साइंटिस्ट स्टीफन हॉकिंग का जिन्होंने इसके तमाम रहस्यों को उजागर किया था। आसमान में गुलाबी, हरा, लाल… कई रंगों में दिख रहा था। वैज्ञानिकों ने एक और बड़ी घटना की जिक्र किया है जो कि पृथ्वीवासियों के लिए अच्छा नहीं है। स्पेस में जब पहली बार ब्लैक होल दिखा तो साइंटिस्ट्स हैरान हो गये। इसकी ग्रेवटी इतनी तगड़ी थी कि ये प्रकाश को भी सोख जाता है। अब एक बड़े ब्लैकहोल की दिशा बदल गयी है। चौंकाने वाली बात ये है कि इससे निकलने वाला रेडिएशन पृथ्वी तक पहुंच रहा है।
सुनने और पढ़ने में आपको जितना आसान ये लग रहा है दरअसल ये बहुत बड़ी घटना है। ब्लैकहोल का डायरेक्शन बदलना साधारण नहीं है। वैज्ञानिक पता लगाने में जुटे हुए हैं कि आखिर अंतरिक्ष में ये घटना कैसे घटी। ऐसा पहले कभी नहीं हुआ। लेकिन इसका कोई पुख्ता कारण अभी तक नहीं मिला है।
कयास ये लगाये गये हैं कि इसके पीछे का कारण हो सकता है एक गैलेक्सी यानी आकाशगंगा का दूसरे गैलेक्सी से टकराना। अब इसके टकराने के बाद ब्लैकहोल का डायरेक्शन चेंज हुआ और अब जो इसकी दिशा है वो पृथ्वी की तरफ हो गयी। ये गैलेक्सी हमसे 657 मिलियन प्रकाश वर्ष दूर स्थित हैं। इसका नाम है पीबीसी जे2333.9-2343।
उन्होंने पाया कि अंतिरक्ष में हुई इस घटना से 90 डिग्री तक घुमाव हुआ है। अब इसका केंद्र पृथ्वी की ओर है। ब्लैकहोल एक अनसुलझा रहस्य है। आप इसको विवादास्पद भी कह सकते हैं। इसकी खोज में वैज्ञानिकों ने सालों साल निकाल दिये। मगर आज भी इसके कई सवाल रहस्यमय ही हैं।
एबीएन नॉलेज डेस्क। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) ने रविवार सुबह व्हीकल मार्क-3 (एलवीएम3- एम3) वनवेब इंडिया-2 मिशन को लांच कर दिया। आंध्र प्रदेश के श्रीहरिकोटा में सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र से 36 सैटेलाइट्स के साथ देश के सबसे बड़े एलवीएम3 रॉकेट को प्रक्षेपित किया गया।
ब्रिटेन की नेटवर्क एक्सेस एसोसिएट्स लिमिटेड (वनवेब ग्रुप कंपनी) ने पृथ्वी की निचली कक्षा में 72 सैटेलाइट्स प्रक्षेपित करने के लिए इसरो की कमर्शियल यूनिट न्यूस्पेस इंडिया लिमिटेड के साथ करार किया था। इस क्रम में 23 अक्टूबर 2022 को इसरो वनवेब के 36 सैटेलाइट पहले ही लांच कर चुका है। इस सौदे के तहत वनवेब के सैटेलाइट्स लांच करने के लिए इसरो को एक हजार करोड़ रुपये मिले हैं।
चेन्नई से करीब 135 किलोमीटर दूर सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र में दूसरे लांच पैड से रविवार सुबह नौ बजे 43.5 मीटर लंबे और 643 टन भार के रॉकेट से 36 सैटेलाइट्स को प्रक्षेपित किया गया। इस लांच की उलटी गिनती शनिवार को ही शुरू कर दी गयी थी। रविवार का प्रक्षेपण 18वां और इस साल का तीसरा प्रक्षेपण था। इसरो के लिए साल 2023 का यह दूसरा प्रक्षेपण रहा।
इससे पृथ्वी की निचली कक्षा में वनवेब उपग्रह समूह की पहली पीढ़ी पूरी हो जायेगी। इस प्रक्षेपण के साथ पृथ्वी की कक्षा में वनवेब के सैटेलाइट्स की संख्या 616 हो जाएगी, जो इस साल वैश्विक सेवाएं शुरू करने के लिए पर्याप्त बताये जा रहे हैं।
प्राप्त जानकारी के मुताबिक इसरो का एलवीएम3 तीन चरणों वाला रॉकेट है। तकनीकी तौर पर इसके पहले चरण में तरल ईंधन, ठोस ईंधन से संचालित दो स्ट्रैप-ऑन मोटर, तरल ईंधन, ठोस ईंधन द्वारा संचालित दो स्ट्रैप-ऑन मोटर, तरल ईंधन द्वारा संचालित दूसरा और क्रायोजेनिक इंजन है।
इसरो के भारी भरकम रॉकेट की क्षमता एएलईओ तक 10 टन और जियो ट्रांसफर ऑर्बिट तक चार टन वजन ले जाने की है। लांच होने के 19 मिनट के बाद साथ गये सैटेलाइट्स अलग होना शुरू हो गये। इसरो ने इस रॉकेट के जरिये दूसरी बार निजी कंपनी के सैटेलाइट्स प्रक्षेपित किये, जो चरणबद्ध तरीके से रॉकेट से अलग हुए।
एबीएन नॉलेज डेस्क। उत्तर कोरिया ने इस सप्ताह के शुरू में पानी के भीतर परमाणु हथियार का परीक्षण किया, जो रेडियोधर्मी सूनामी पैदा करने में सक्षम था। प्योंगयांग की सरकारी मीडिया ने शुक्रवार को यह जानकारी दी।
अलग से, उत्तर ने एक परमाणु वारहेड का अनुकरण करने वाले परीक्षण वारहेड के साथ मिसाइलों का उपयोग करके एक क्रूज मिसाइल ड्रिल भी आयोजित की। प्योंगयांग की आधिकारिक कोरियन सेंट्रल न्यूज एजेंसी (केसीएनए) ने एक रिपोर्ट में यह बात कही।
उत्तर की सत्तारूढ़ वक र्स पार्टी (डब्ल्यूपीके) के केंद्रीय सैन्य आयोग ने 21 मार्च से 23 मार्च तक दुश्मन को वास्तविक परमाणु संकट के प्रति सचेत करने और आत्मरक्षा के लिए परमाणु बल की विश्वसनीयता को सत्यापित करने के लिए अभ्यास का आदेश दिया।
उन्होंने कहा कि अंडरवाटर न्यूक्लियर अटैक ड्रोन को मंगलवार को रिवॉन काउंटी, साउथ हैमयोंग प्रांत के तट पर तैनात किया गया था और गुरुवार दोपहर पानी के भीतर विस्फोट करने वाले परीक्षण वारहेड के साथ एक मॉक एनिमी पोर्ट के रूप में स्थापित होंगवोन बे के पानी में टारगेट प्वाइंट पर पहुंच गया।
ड्रोन 59 घंटे 12 मिनट तक कोरिया के पूर्वी सागर में 80 से 150 मीटर की गहराई में पैटर्न-8 कोर्स के साथ चलता रहा। उत्तर ने दावा किया कि नौसैनिक स्ट्राइकर समूहों और उसके दुश्मनों के प्रमुख बंदरगाहों को नष्ट करने के लिए चुपके से परिचालन जल में घुसपैठ करने और एक सुपर-स्केल रेडियोधर्मी सूनामी बनाने के लिए डिजाइन किये गये ड्रोन को किसी भी तट और बंदरगाह पर तैनात किया जा सकता है या ऑपरेशन के लिए एक सतही जहाज से खींचा जा सकता है।
केसीएनए ने कहा कि उत्तर कोरिया ने 2012 में साम्राज्यवादी हमलावर ताकतों की सैन्य और तकनीकी श्रेष्ठता को पछाड़ने के लिए ऐसे भूमिगत परमाणु हथियार विकसित करना शुरू किया। 2021 में डब्ल्यूपीके की आठवीं कांग्रेस में गुप्त हथियार को मानवरहित पानी के नीचे परमाणु हमला करने वाले शिल्प हैइल का नाम दिया गया था और पिछले दो वर्षों में 50 से अधिक शेकडाउन किये गये हैं।
केसीएनए के मुताबिक, बुधवार को उत्तर कोरिया ने रणनीतिक क्रूज मिसाइलों का भी परीक्षण किया, परमाणु वारहेड का अनुकरण करने वाले टेस्ट वारहेड के साथ इत्तला दे दी। इसमें कहा कि दक्षिण हैमयोंग प्रांत में लॉन्च की गई हवासल -1 रणनीतिक क्रूज मिसाइल और दो हवासल -2 रणनीतिक क्रूज मिसाइलों ने पूर्वी सागर में निर्धारित लक्ष्य को सटीक रूप से भेदा।
मिसाइलों ने क्रमश: 7,557 से 7,567 सेकंड और 9,118 से 9,129 सेकंड के लिए अपने प्रोग्राम किये गये 1,500 किमी- और 1,800 किमी-लंबी अंडाकार और पैटर्न-8 कक्षाओं में उड़ान भरी। दक्षिण कोरिया की सेना ने पहले कहा था कि उसने बुधवार सुबह उत्तर के पूर्वी शहर हमहंग से कई क्रूज मिसाइल लॉन्च किये जाने का पता लगाया।
एबीएन नॉलेज डेस्क। अंतरिक्ष के क्षेत्र में भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन लगातार कामयाबी हासिल करता जा रहा है। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन इस महीने के अंत में यानी 26 मार्च रविवार को 36 वनवेब सेटेलाइट्स के दूसरे बैच को लॉन्च करने जा रहा है। इसे श्रीहरिकोटा से एलवीएम-3 रॉकेट से लॉन्च किया जायेगा। इसरो ने वनवेब के साथ सेटेलाइट्स को लॉन्च करने के लिए हजार करोड़ का करार किया है।
इसरो की यह लॉन्चिंग अगर कामयाब होती है, तो भारती एंटरप्राइज समर्थित ब्रिटेन स्थित कंपनी स्पेस में 600 से अधिक लोअर अर्थ ऑर्बिट सेटेलाइट्स के कान्स्टलैशन को पूरा कर लेगी, जिससे दुनिया के हर कोने में, हर जगह स्पेस आधारित ब्रॉडबैंड इंटरनेट सर्विस मुहैया कराने की पेशकश करने की उसकी योजना में काफी मदद मिलेगी।
फरवरी में ही आ गये थे सेटेलाइट्स : इसरो ने कल सोमवार को अपने ट्वीट में कहा- एलवीएम3-एम3/वनवेब इंडिया-2 मिशन लॉन्च होने जा रहा है।।श्रीहरिकोटा के दूसरे लॉन्चिंग पैड एसडीएससी-एसएचएआर से रविवार 26 मार्च को इसकी लॉन्चिंग का समय तय किया गया है। वनवेब के 36 सेटेलाइट्स फ्लोरिडा से 16 फरवरी को ही भारत पहुंच आ गये थे।
श्रीहरिकोटा से रविवार को की जा रही लॉन्चिंग में वनवेब की 18वीं लॉन्चिंग में 36 सेटेलाइट्स को छोड़ा जायेगा। और ये सेटेलाइट्स ब्रिटेन स्थित कंपनी के 582 सेटेलाइट्स के मौजूदा ग्रुप में शामिल हो जायेगा।
एबीएन नॉलेज डेस्क। अंतरिक्ष की दुनिया भी बड़ी रहस्यमयी है और ब्लैक होल यहां की सबसे अधिक ध्यान खींचने वाली चीज। वैज्ञानिकों ने इस ब्लैक होल के बारे में जो सिद्धांत बताये हैं, वे किसी के भी होश उड़ा देने वाले हैं। यहां की हर गतिविधि हैरत में डाल देने वाली है। मानो यह कोई जादुई दुनिया है। वास्तव में ब्लैक होल की रहस्यमयता लोगों की कल्पना से भी परे है। आइये ब्लैक होल के बारे में कुछ बड़ी बातें जानते हैं।
ब्लैक होल ब्रह्मांड में सबसे आकर्षक और वैज्ञानिकों के बीच सबसे पुरानी बहस में शामिल मुद्दों में से एक रहा है। दशकों तक लोग इसे एक काल्पनिक दुनिया समझते रहे। लेकिन शुक्रिया कहना चाहिए दिवंगत वैज्ञानिक स्टीफन हॉकिंग का, जिन्होंने इस मुश्किल और अबूझ चीज को एक वैज्ञानिक आधार प्रदान किया।
ब्लैक होल के बारे में पांच सबसे विचित्र और चौंकाने वाले सिद्धांत क्या हैं- जिसके बारे में वैज्ञानिकों ने बताया है :-
रिंग ऑफ फायर : साल 2019 में खगोलविदों ने दूर आकाशगंगा में ब्लैक होल की एक तस्वीर ली। तब वैज्ञानिकों ने इसे एक राक्षस के रूप में वर्णित किया क्योंकि यह पृथ्वी के आकार का तीन मिलियन गुना था। जैसा कि शोधकर्ताओं ने बताया था कि यहां एक ऐसी छवि है जो अंधकारनुमा है और गोलाकार है और वहां एक रिंग ऑफ फायर जैसी आकृति नजर आती है।
नीदरलैंड के रेडबौड विश्वविद्यालय के वैज्ञानिक हीनो फाल्के के शब्दों में कहें तो ऐसा लगता है जैसे वह नरक का द्वार हो। ब्लैक होल अपने चारों ओर प्रकाश को एक प्राकृतिक घुमाव देता है, जो कि गोलाकार छाया बनाता है।
ब्लैक होल के बाल : 2015 में दिवंगत भौतिक विज्ञानी प्रोफेसर स्टीफन हॉकिंग ने कहा था कि ब्लैक होल स्थायी जेल जैसा नहीं था। एक साल बाद उन्होंने यह कहते हुए अपने सिद्धांत का विस्तार किया कि उत्तर शून्य-ऊर्जा कण ब्लैक होल के क्षितिज पर बैठते हैं।
उन्होंने कहा कि ब्लैक होल के किनारे पर जमा क्वांटम कण, ब्लैक होल में गिरने वाले कणों की जानकारी को कैप्चर और स्टोर कर सकते हैं। उन्होंने इसकी तुलना नष्ट हुए एक ऐसे विश्वकोश से की, जहां जानकारी तकनीकी रूप से नष्ट नहीं होगी। इस सिद्धांत से कोई खास फायदा तो नहीं हुआ लेकिन ब्लैक होल की गैस और धूल का क्या होता है, इस बारे में लंबे समय से चल रहे विरोधाभास को हल करने में मदद मिल सकती है।
निकलते हैं गैस के फव्वारे : एक ब्लैक होल का शक्तिशाली गुरुत्वाकर्षण का मतलब है कि अगर यह छेद के किनारे के बेहद करीब हो जाता है तो कुछ भी नहीं बच सकता। लेकिन इनमें से कई रहस्यमय वस्तुएं वास्तव में गैस और धूल जैसी चीज से घिरी हुई हैं जिसने ब्लैक होल को घेर रखा हैं और यहां के अंदर की दुनिया साफ-साफ नजर नहीं आती।
डार्क एनर्जी का स्रोत : पिछले महीने ही लंदन के इंपीरियल कॉलेज के वैज्ञानिकों ने ब्लैक होल के बारे में एक रोमांचक घोषणा की है। उन्होंने खुलासा किया है कि यहां की वस्तुएं वास्तव में अज्ञात ऊर्जा का स्रोत हो सकती हैं जिसे डार्क एनर्जी के रूप में जाना जाता है।
1998 में हमारे खगोलविदों ने बताया था कि न केवल ब्रह्मांड का विस्तार हो रहा है, बल्कि इसका विस्तार बहुत ही तेजी से हो रहा था। इस खोज को ध्यान में रखते हुए यह प्रस्तावित किया गया था कि एक डार्क एनर्जी गुरुत्वाकर्षण की तुलना में अधिक मजबूती से विकसित हो रही है।
नौ देशों के 17 शोधकर्ताओं की एक टीम ने नौ अरब वर्षों के ब्लैक होल के विकास का अध्ययन किया था। उन्होंने प्राचीन और सुप्त आकाशगंगाओं का भी अवलोकन किया और पाया कि ब्लैक होल में वैक्यूम ऊर्जा या डार्क एनर्जी होती है।
ब्रह्मांड का पिछला दरवाजा : ब्लैक होल के भीतर गहरा गुरुत्वाकर्षण यहां की सबसे बड़ी विलक्षणता है। इस सिद्धांत के अनुसार ब्लैक होल के माध्यम से यात्रा करने वाली कोई भी चीज चरम सीमा तक फैली होगी। शोधकर्ताओं का कहना है कि ब्लैक होल के अंदर का मामला हमेशा के लिए खो नहीं जायेगा जैसा कि पहले सोचा गया था। हो सकता है यह ब्रह्मांड का पिछला दरवाजा हो सकता है। उस पार की दुनिया न कितनी रहस्यमयी होगी।
एबीएन नॉलेज डेस्क। द वेब स्पेस टेलीस्कोप ने दम तोड़ने कगार पर पहुंचे एक तारे के दुर्लभ और क्षणिक चरण को कैद किया है। नासा ने मंगलवार को इसकी तस्वीरें साझा कीं। इन तस्वीरों में तारों के बीच धूल और गैस जैसी चीजें उड़ती दिख रही हैं।
मृत्यु के कगार पर पहुंचे तारे का आधिकारिक नाम डब्ल्यूआर-124 है। यह सूर्य से लगभग 30 गुणा विशाल था। परियोजना में शामिल यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी की वैज्ञानिक मैकारेना गार्सिया मारिन ने कहा कि हमने इससे पहले कभी ऐसा नहीं देखा।
यह वास्तव में रोमांचक है। द वेब स्पेस टेलीस्कोप 2021 के अंत में स्थापित की गई थी, जिसके बाद से यह उसका पहला प्रेक्षण है।
एबीएन सेंट्रल डेस्क। धरती के कई हिस्सों में भीषण सूखा, अत्यधिक वर्षा और बाढ़ की घटनाओं में लगातार तेजी आ रही है। अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा के नेचर वॉटर जर्नल में प्रकाशित नवीन अध्ययन में यह जानकारी सामने आयी है।
अध्ययन में कहा गया है कि वैज्ञानिक धरती के गर्म होने और जलवायु परिवर्तन के चलते सूखे और बाढ़ की घटनाओं की निरंतरता और गंभीरता की भविष्यवाणी करते रहते हैं, लेकिन क्षेत्रीय और महाद्वीपीय पैमाने पर इसे साबित करना मुश्किल होता है।
नासा के दो वैज्ञानिकों के शोध ने पूर्व में किये गये अनुमानों और भविष्यवाणियों को पुख्ता कर दिया है। नासा के दो वैज्ञानिकों रोडेल व बेलिंग ली के नासा/जर्मन ग्रेस और ग्रेस-एफओ उपग्रहों के माध्यम से 2002 से 2021 तक 1,056 अत्यधिक बारिश व शुष्क घटनाओं के अध्ययन में यह जानकारी सामने आयी है।
इन उपग्रहों से जल भंडारण विसंगतियों का पता लगाने के लिए पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण क्षेत्र का मापांकन किया गया है।
एबीएन सेंट्रल डेस्क। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) ने गगनयान की सुरक्षा के लिए रेलवे ट्रैक पर पैराशूट का परीक्षण किया है। ये परीक्षण 1 और 3 मार्च को चंडीगढ़ में टर्मिनल बैलिस्टिक्स रिसर्च लेबोरेटरी में किया गया। एक आधिकारिक बयान में कहा गया है कि क्लस्टर कॉन्फ़िगरेशन में गगनयान पायलट और एपेक्स कवर सेपरेशन (एसीएस) पैराशूट का रॉकेट स्लेज परिनियोजन परीक्षण किया गया। इसरो ने बताया कि इन पायलट पैराशूटों का इस्तेमाल गगनयान मिशन में किया जाता है।
पहला परीक्षण दो पायलट पैराशूटों की क्लस्टर तैनाती का अनुकरण करता है। परीक्षण के दौरान पैराशूट प्रवाह की स्थिति में न्यूनतम कोण के बारे में जानकारी हासिल की गयी। दूसरा पैराशूट प्रवाह के संबंध में अधिकतम कोण के अधीन था। एक रॉकेट स्लेज यानी बगैर पहियों की गाड़ी जैसा टेस्ट प्लेटफॉर्म है जो रॉकेट के जरिये पटरियों के एक सेट के साथ फिसलता है।
परीक्षण के दौरान चालक दल मॉड्यूल के लिए हमले की स्थिति के 90 डिग्री कोण पर क्लस्टर परिनियोजन का भी अनुकरण किया गया। क्रू मॉड्यूल पर लगे एपेक्स कवर को अलग करने के लिए एसीएस पैराशूट का इस्तेमाल गगनयान मिशन में किया जाता है। गगनयान पैराशूट सिस्टाम का विकास विक्रम साराभाई अंतरिक्ष केंद्र तिरुवनंतपुरम और एरियल डिलीवरी रिसर्च एंड डेवलपमेंट एस्टैब्लिशमेंट आगरा की संयुक्त कोशिशों के जरिए किया गया
दरअसल, गगनयान कार्यक्रम का मकसद पृथ्वी की निचली कक्षा में मानव अंतरिक्ष उड़ान मिशन शुरू करने की कोशिश है। इसके लिए पैराशूट सिस्टम का फुल प्रूफ होना बेहद जरूरी है। इस परीक्षण का मकसद पैराशूट की ताकत और उसकी क्षमता को आंकना था, ताकि भविष्य में गगनयान के क्रू मॉड्यूल की लैंडिंग कराते वक्त किसी तरह की परेशानी न हो। इस परीक्षण के जरिए एक पैराशूट के खराब होने के हालातों में दूसरे पैराशूट के क्रू मॉड्यूल की सही और सुरक्षित लैंडिंग कराने की काबिलियत के बारे में जाना गया।
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