एबीएन कैरियर डेस्क। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) ने आज एक बड़ा फैसला सुनाया है। यूजीसी के अध्यक्ष जगदीश कुमार ने मंगलवार को घोषणा की कि छात्र अब एक ही विश्वविद्यालय से या अलग-अलग संस्थानों से एक साथ दो पूर्णकालिक डिग्री कार्यक्रमों में एक साथ प्रत्यक्ष तरीके से पढ़ाई कर सकेंगे।आयोग इस संबंध में जल्द ही विस्तृत दिशानिर्देश जारी करेगा। कुमार ने कहा कि नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति (एनईपी) में की गयी घोषणा के अनुसार और छात्रों को विविध कौशल प्रदान करने के लिए यूजीसी नये दिशानिर्देश ला रहा है जिसमें किसी अभ्यर्थी को एक साथ प्रत्यक्ष तरीके (फिजिकल मोड) से दो डिग्री कार्यक्रम करने की अनुमति दी जाएगी। डिग्री कार्यक्रम या तो एक ही विश्वविद्यालय से या अलग-अलग विश्वविद्यालय से किया जा सकता है। उन्होंने कहा कि छात्रों को प्रत्यक्ष तरीके से और आॅनलाइन तरीके से भी एक साथ दो डिग्री कार्यक्रमों में पढ़ाई करने की अनुमति दी जाएगी।
टीम एबीएन, रांची। झारखंड कर्मचारी चयन आयोग की ओर से आईटीआई प्रशिक्षण अधिकारी के 701 पदों पर नियुक्ति के लिए आवेदन मांगा गया है। इसे लेकर जेएसएससी ने विज्ञापन निकाला है। यह नियुक्ति 24 विषयों के लिए हो रही है, जिसमें उम्मीदवार ऑनलाइन आवेदन कर सकते हैं। आवेदन जेएसएससी की ऑफिशियल वेबसाइट www.jssc.nic.in पर किया जा सकता है। आईटीआई प्रशिक्षण अधिकारी के लिए आवेदन 12 अप्रैल से आवेदन ऑनलाइन लिया जाएगा। 12 मई को आवेदन की अंतिम तिथि होगी। वहीं, 17 मई से 19 मई तक आवेदनों की त्रुटि सुधारने के लिए मौका दिया जाएगा। अभ्यर्थियों के लिए ऑनलाइन आवेदन शुल्क 100 रुपए निर्धारित किए गए हैं। वहीं, अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति को छूट देते हुए 50 रुपये परीक्षा शुल्क निर्धारित किया गया है। नियुक्ति के लिए परीक्षा का आयोजन जून के प्रथम सप्ताह में किया जाएगा। यह परीक्षा ओएमआर शीट पर लिया जाएगा।
टीम एबीएन, कोडरमा। रामलखन सिंह यादव इंटर कॉलेज के कक्षा 11वी में कला, विज्ञान व वाणिज्य संकाय सत्र 2021-23 के विद्यार्थियों के रजिस्ट्रेशन फॉर्म भरने की तिथि 11 अप्रैल तक अंतिम बार जैक ने विस्तारित किया है। जैक द्वारा निर्धारित समय सीमा के अंतर्गत रजिस्ट्रेशन फॉर्म भर लें। आरएलएसवाई कॉलेज में फॉर्म भरने का क्रम जारी है। यह जानकारी प्राचार्य डॉ जितेंद्र बहादुर ने दिया।
एबीएन सेंट्रल डेस्क। केंद्रीय मंत्री पीयूष गोयल ने देश में बेरोजगार युवाओं को गुड न्यूज़ दी। उन्होंने कहा कि हम अगले 4-5 वर्षों में भारत में 1 मिलियन यानी 10 लाख रोजगार देगें। भारत-ऑस्ट्रेलिया आर्थिक सहयोग और व्यापार समझौते पर गोयल ने कहा कि हमने भारत और ऑस्ट्रेलिया के बीच शिक्षा संस्थानों के सहयोग पर भी चर्चा की है। इस दौरान उन्होंने कहा कि हमारे लाखों युवा-युवती वहां पढ़ रहे हैं, उन सबके लिए एक तरह से वर्क वीजा को कानूनी तौर पर इस एग्रीमेंट के द्वारा कंफर्म किया गया है। ये एग्रीमेंट भारत और ऑस्ट्रेलिया के बीच मित्रता और एकता का प्रतीक बनेगा। केंद्रीय मंत्री ने कहा कि हम पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए वर्क और हॉलिडे वीजा व्यवस्था पर विचार कर रहे हैं। भारतीय छात्रों के लिए, विशेष रूप से एसटीईएम स्नातकों के लिए 2 से 4 वर्षों के बीच अध्ययन के बाद का कार्य वीजा उपलब्ध होगा। केंद्रीय मंत्री ने कहा कि हम व्यापार बाधाओं को दूर कर रहे हैं, जिससे भविष्य में व्यापार दोगुना हो जाएगा। इसमें श्रम-उन्मुख क्षेत्रों के लिए काफी संभावनाएं होंगी। भारत और ऑस्ट्रेलिया के बीच आर्थिक सहयोग और व्यापार समझौते से अगले 5 वर्षों में द्विपक्षीय व्यापार को मौजूदा 27 बिलियन डॉलर से लगभग 45-50 बिलियन डॉलर तक ले जाने की उम्मीद है। गोयल ने बताया कि भारत-ऑस्ट्रेलिया नेचुरल पार्टनर हैं, जो लोकतंत्र, कानून के शासन और पारदर्शिता के साझा मूल्यों से जुड़े हैं। 2 भाइयों की तरह 2 राष्ट्रों ने महामारी में एक-दूसरे का सहयोग किया। उन्होंने कहा कि वहां से जो कच्चा माल आता है वो भारत में उत्पादन को बढ़ाने के लिए अच्छा है। शुरुआती संकेत बताते हैं कि 10 लाख से अधिक लोगों को इससे काम के अवसर अगले 4-5 सालों में मिलेंगे और आगे चलकर और बढ़ेंगे। लोगों को उम्मीद नहीं थी कि विकसित देशों के साथ भारत फ्री ट्रेड एग्रीमेंट कर पाएगा। ये एक ऐसा देश है जहां के लोगों के साथ भारत के बहुत अच्छे संबंध हैं, हम दोनों एक-दूसरे की मदद करते हैं।
एबीएन डेस्क। शहद में पोटैशियम, कैल्शियम, मैग्निशियम और आयरन जैसे 11 तरह के मिनरल भी पाए जाते हैं। यहीं वजह है कि 80 फीसदी शहद दवा के रूप में इस्तेमाल हो रहा है। कॉस्मेटिक और कन्फेक्शनरी में भी इसका उपयोग तेजी से बढ़ा है। मधुमक्खी पालन एक ऐसा व्यवसाय है, जिसे आसानी से कोई भी कर सकता है। इस काम में खर्च काफी कम आता है, लेकिन इसे शुरू करने के लिए प्रशिक्षण बहुत जरूरी है। शहद को धरती का अमृत कहा जाता है। दुनिया भर 9 लाख 92 हजार टन के आसापस शहद का उत्पादन हो रहा है। भारत में करीब 33 हजार 425 टन शहद हर साल निकाला जाता है। शहद अपने आप में एक संपूर्ण भोजन है। इसमें कार्बोहाइड्रेट की मात्रा 70 से 80 फीसदी होती है। इसके अलावा शहद में ग्लुकोज, सुक्रोज और फ्रक्टोज भी पाया जाता है। कुछ मात्रा प्रोटीन की भी होती है। शहद में 18 तरह के अमीनो एसिड भी मौजूद हैं। ये शरीर में उत्तकों का निर्माण करते हैं, जो हमें स्वस्थ बनाते हैं। शहद में पोटैशियम, कैल्शियम, मैग्निशियम और आयरन जैसे 11 तरह के मिनरल भी पाए जाते हैं। यहीं वजह है कि 80 फीसदी शहद दवा के रूप में इस्तेमाल हो रहा है। कॉस्मेटिक और कन्फेक्शनरी में भी इसका उपयोग तेजी से बढ़ा है। मधुमक्खियां फूलों पर मंडरा कर शहद चुनती हैं और एक फूल से दूसरे फूल पर जाने की वहज से फसल में परागण की क्रिया तेज हो जाती है, जिससे किसान को ज्यादा फसल मिलती है। कमाई बढ़ाने के लिए मधुमक्खी पालन अच्छा विकल्प : गुजरात के नवसारी जिले के रहने वाले अशोक भाई पटेल के पास 10 एकड़ जमीन है, जिस पर वे आम, गन्ना, चीकू और सब्जी की खेती करते हैं। साथ ही में घरेलू इस्तेमाल के लिए मधुमक्खी पालन भी करने लगे। एक बक्से से शुरुआत करने वाले अशोक भाई आज शहद पालन के व्यवसाय में उतर चुके हैं। आज वे 600 बक्से से 12 हजार किलो तक शहद का उत्पादन करते हैं। एक ही जगह पर सालभर फूल मिलना मुकमिन नहीं है। इस वजह से किसानों को एक जगह से दूसरे जगह बक्से लेकर जाना पड़ता है। अशोक 5 साल से शहद उत्पादन कर रहे हैं। वे इस काम में महारत हासिल कर चुके हैं और अब दूसरे किसानों को प्रशिक्षण भी देते हैं। अगर आप कम मेहनत में कमाई बढ़ाना चाहते हैं तो मधुमक्खी पालन अच्छा विकल्प साबित हो सकता है। छोटे किसानों के लिए बेहतर विकल्प : देश में मधुमक्खी पालन का व्यवसाय तेजी से बढ़ रहा है। शहद उत्पादन में बढ़ोतरी के कारण ही भारत से निर्यात में भी तेजी आई है। एपीडा के आंकड़ों के मुताबिक, 2019-20 में भारत ने 59 हजार मीट्रिक टन से अधिक शहद का एक्सपोर्ट किया था। कृषि विशेषज्ञ बताते हैं कि छोटे, सीमांत और भूमिहीन किसानों के लिए मधुमक्खी पालन एक जबरदस्त विकल्प है। कम लागत में उन्हें अधिक मुनाफा हासिल करने में मदद मिलेगी। देश भर में स्थित कृषि विज्ञान केंद्रों से किसान मधुमक्खी पालन के लिए प्रशिक्षण ले सकते हैं। यहां के वैज्ञानिक किसानों को न सिर्फ मदद करते हैं बल्कि समय-समय पर आकर मधुमक्खी पालन के कार्य का निरीक्षण भी करते हैं और इस काम में आ रही परेशानियों को दूर करने के लिए किसानों को सलाह देते हैं।
एबीएन सेंट्रल डेस्क। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग यानी की यूजीसी ने बड़ा कदम उठाया है। आयोग ने इस साल से एमफिल की डिग्री को समाप्त करने का फैसला लिया है। इसके साथ ही यूजीसी रेगुलेशन 2022 के तहत कई अन्य बड़े फैसले भी किए गए हैं। अब शिक्षकों/प्रोफेसर को रिटायरमेंट के बाद भी पेरेंट यूनिवर्सिटी में दोबारा काम करने का मौका दिया जाएगा। इसके साथ ही अनुसंधान के क्षेत्र में 70 साल की आयु तक पीएचडी की जा सकेगी। बता दें कि इससे पहले यूजीसी ने एलान किया था कि अब विश्वविद्यालयों में शिक्षण के लिए पीएचडी अनिवार्य नहीं है। यूजीसी के चेयरपर्सन प्रोफेसर एम जगदीश कुमार ने कहा था कि ऐसे कई विशेषज्ञ हैं जो पढ़ाने के इच्छुक हैं। ऐसे कई लोग हैं जिनके पास जमीनी स्तर पर कार्य का काफी अनुभव है। वर्तमान नियमों के अनुसार उन्हे पढ़ाने की इजाजत नहीं हैं। इसके लिए विशेष पदों का सृजन किया जा रहा है। समिति के गठन का फैसला : बीते गुरुवार को केंद्रीय विश्वविद्यालयों के वीसी ने यूजीसी चेयरपर्सन जगदीश कुमार के साथ हुई बैठक में शिक्षक के पदों पर नियुक्ति के जरूरी नियमों में संशोधन के लिए एक समिति के गठन का फैसला किया था। इस बैठक का आयोजन राष्ट्रीय शिक्षा नीति के क्रियान्वयन और कई अन्य जरूरी मुद्दों पर चर्चा के लिए बुलाई गई थी। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग की ओर से देश में उच्च शिक्षा के मौजूदा ढांचे में बड़े बदलाव के लिए नई गाइडलाइन का मसौदा तैयार कर लिया है। इस मसौदे को जल्द अंतिम रूप दे दिया जाएगा। इसके लागू होने के बाद देश में उच्च शिक्षा का ढांचा पूरी तरह से बदल जायेगा। ये बदलाव, नई शिक्षा नीति 2020 की घोषणाओं के अनुरूप हैं।
टीम एबीएन, रांची। फिल्म मेकिंग के क्षेत्र में अपना करियर बनाने वाले विद्यार्थियों के लिए एक अच्छी खबर है। रांची विश्वविद्यालय में पहली बार फिल्म मेकिंग कोर्स की पढ़ाई इसी सेशन से शुरू की जाएगी। जिसमें पहला पीजी इन फिल्म मेकिंग एंड प्रोडक्शन और दूसरा पीजी डिप्लोमा इन फिल्म मेंकिंग कोर्स शामिल है। ऐसे में उन विद्यार्थियों के लिए एक सुनहरा मौका है जो फिल्म मेकिंग में अपना भविष्य देखते हैं। रांची विश्वविद्यालय मास कम्युनिकेशन डिपार्टमेंट की ओर से मिली जानकारी के मुताबिक इसे लेकर बोर्ड का भी गठन किया गया है। कोर्स का संचालन किस तरीके से किया जाएगा, क्या आवश्यकताएं होंगी। इसकी पूरी निगरानी कमेटी रखेगी। बोर्ड की ओर से कोर्सों के सिलेबस के ड्राफ्ट पर चर्चा हो चुकी है। सदस्यों ने सिलेबस में कई पहलुओं को जोड़ने को लेकर अपने-अपने सुझाव भी दिए हैं। इन दोनों कोर्स के लिए फॉर्म वितरित किए जा रहे हैं। विभाग से इच्छुक विद्यार्थी फॉर्म प्राप्त कर सकते हैं। जानकारी यह भी मिल रही है कि दोनों कोर्स के संचालन और क्लासेज के लिए बॉलीवुड से भी एक्सपर्ट आएंगे। जिसे विश्वविद्यालय की ओर से हायर किया जाएगा, ताकि विद्यार्थियों को फिल्म मेकिंग से जुड़े तमाम गुर सिखाए जा सके। रांची विश्वविद्यालय पीजी फिल्मेकिंग कोर्स का शुल्क निर्धारण भी हुआ है। इसके लिए प्रत्येक सेमेस्टर 30,000 शुल्क होगा। वहीं, डिप्लोमा कोर्स का शुल्क अभी तय नहीं किया गया है। पीजी इन फिल्मेकिंग एंड प्रोडक्शन में 25 सीटों पर एडमिशन लिया जा रहा है। यह 2 साल का कोर्स होगा। पीजी डिप्लोमा इन फिल्म मेकिंग कोर्स में सीट और एडमिशन जल्द ही तय कर लिया जाएगा। दोनों कोर्स सेल्फ फाइनेंस स्कीम के तहत संचालित होगी। फिल्ममेकिंग से जुड़े दोनों कोर्स की पढ़ाई मोरहाबादी कैंपस में होगी, लेकिन पढ़ाई के अनुसार विश्वविद्यालय को इंफ्रास्ट्रक्चर भी डेवलप करना होगा करना होगा। विश्वविद्यालय की ओर से इसे लेकर भी तैयारियां की जा रही है।
टीम एबीएन, रांची। बिरला प्रौद्योगिकी संस्थान (बीआईटी) मेसरा लालपुर सेंटर के तत्वावधान में आयोजित दो दिवसीय कार्यशाला का आज दूसरे दिन समापन हो गया। ऑनलाइन माध्यम से शुरू हुई इस कार्यशाला में नए एवं पुराने उद्यमियों को सुसज्जित करने और उनके कौशल को और गतिशील व ऊर्जावान बनाने के लिए प्रेरित किया गया। इस कार्यशाला को सफल बनाने में बहुत से तकनीकी जानकारों ने भी भाग लिया। आज सत्र के प्रथम चरण में अपने-अपने उदबोधन में बोलते हुए डीन एल्यूमिनी और अंतरराष्ट्रीय संबंधों के मामलों के व्याख्याता बीआईटी के प्रोफेसर डॉ उत्पल बाउल ने प्रतिभागियों को बताया कि किसी भी उद्योग को प्रगतिशील बनाने में हम मेहनत के साथ अपने कौशल क्षमता को जितना विकसित कर सकते हैं, उसे करने पर खुद को हमेशा पहल करनी चाहिए। कार्यशाला में अपने विचार रखने में क्रेजी क्वेश्चन की संचालक प्रगति कनोडिया और डॉ सुरेंद्र शर्मा ने भी अपने विचार रखे। सभी को कार्यशाला में आने और अपने विचारों को प्रतिभागियों को प्रेरित करने पर निदेशक बीआईटी लालपुर डॉ श्रीमती वंदना भट्टाचार्य ने इस कार्यशाला को सफल बनाने में उनके विशेष योगदान को सराहा और भविष्य में इस प्रकार की कार्यशाला आयोजित करने पर बल दिया। अपने विचार रखते हुए डीन अनुसंधान नवाचार और उद्यमिता विभाग के श्री जगरनाथ ने कहा कि कौशल विकास में हमारा फोकस जितना रहेगा, हम अपने उद्योग को उतना ही गति प्रदान कर सकेंगे। हमें अपने कौशल को जितना हो सके बढ़ाने और अपनी क्षमता के अनुसार कभी कमी नहीं रखना चाहिए। उन्होंने नए और पुराने उद्यमियों साथ ही नए विद्यार्थियों को अपने नए उद्योग को विकसित और विकासशील बनाने में सहायक होने वाले अनेक गुर बताए और उस पर अमल करने की प्रेरणा दी। इस कार्यशाला में आने वाले अपने सभी प्रतिभागियों, मुख्य वक्ताओं और संबंधित सभी शिक्षकों का विशेष आभार प्रकट करते हुए इस कार्यक्रम की संयोजिका डॉक्टर मिली दत्ता और सुश्री अनुपमा सहाय ने आभार व्यक्त करते हुए इस कार्यशाला को सफल बनाते हेतु सभी प्रिंट मीडिया इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के पत्रकार बंधुओं को निदेशक वंदना भट्टाचार्य और बीआईटी परिवार की तरफ से आभार व्यक्त कर कार्यशाला को समाप्त करने की घोषणा की।
एबीएन कैरियर डेस्क।विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) ने एक बड़ा फैसला लिया है। UGC केंद्रीय विश्वविद्यालयों में पढ़ाने के लिए अनिवार्य PhD की अनिवार्यता को खत्म कर रहा है। इसके पीछे मुख्य वजह उद्योग जगत के विशेषज्ञों और पेशेवरों को सेंट्रल यूनिवर्सिटी में पढ़ाने का मौका देना है, जिनमें से ज्यादातर अपने क्षेत्र में ज्ञान तो भरपूर रखते हैं, लेकिन पीएचडी की डिग्री न होने की वजह से वह प्रोफेसर नहीं बन सकते, इसके लिए UGC की ओर से प्रोफेसर ऑफ प्रैक्टिस और एसोसिएट प्रोफेसर ऑफ प्रैक्टिस जैसे विशेष पद सृजित किए जा रहे हैं। एक डिप्लोमैट के अनुसार, UGC के इस फैसले के बाद केंद्रीय विश्वविद्यालयों में अंतरराष्ट्रीय संबंध पढ़ाने का मौका मिल सकेगा। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के अध्यक्ष एम जगदेश कुमार ने कहा कि कई विशेषज्ञ हैं जो पढ़ाना चाहते हैं, कोई ऐसा व्यक्ति हो सकता है जिसने बड़ी परियोजनाओं को लागू किया हो और जिसके पास जमीनी स्तर का अनुभव हो, या कोई महान नर्तक या संगीतकार हो सकता है, लेकिन हम उन्हें मौजूदा नियमों के अनुसार केंद्रीय विश्वविद्यालयों में पढ़ाने के लिए नियुक्त नहीं कर सकते। उन्होंने आगे कहा कि इसलिए, यह फैसला लिया गया कि विशेष पद सृजित किए जाएंगे। PhD की कोई आवश्यकता नहीं होगी, विशेषज्ञों को किसी दिए गए डोमेन में अपने अनुभव का प्रदर्शन करने की आवश्यकता होगी। विशेषज्ञों और संस्थानों की आवश्यकताओं के आधार पर ये पद स्थायी या अस्थायी हो सकते हैं। 60 वर्ष की आयु में सेवानिवृत्त होने वाले विशेषज्ञ भी पूर्ण या अंशकालिक फैकल्टी के रूप में शामिल हो सकते हैं और 65 वर्ष की आयु तक पढ़ा सकते हैं। बता दें कि केंद्रीय विश्वविद्यालयों के कुलपतियों की यूजीसी चेयरपर्सन एम जगदेश कुमार के साथ बीते गुरुवार को बैठक हुई। इस बैठक में केंद्रीय विश्वविद्यालयों में शिक्षकों की नियुक्ति के लिए नियमों में संशोधन पर काम करने के लिए एक समिति गठित करने का फैसला किया गया। शिक्षा मंत्रालय के अनुसार, दिसंबर 2021 तक, केंद्र द्वारा वित्त पोषित संस्थानों में 10,000 से अधिक शिक्षकों के पद खाली थे।
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