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इयं तत्वमसि...
Published / 2025-10-30 10:32:22
इयं तत्वमसि...

त्रिवेणी दासएबीएन सोशल डेस्क। उपनिषद में एक शब्द तत्वमसि का उल्लेख आता है। इस शब्द का अर्थ बहुत व्यापक है। प्रकृति के प्रत्येक अवयव में वही एक तत्व विराजमान है जो तत्व मनुष्य भीतर विराजमान होता है। पृथ्वी, पानी, अग्नि, वायु और आकाश/अंतरिक्ष के प्रकृति (गुण) में वही एक तत्व है। उपनिषद कहता है मनुष्य वही तत्व है। एक फल के पौधे के जीवन चक्र के ऊपर विचार करने से पाया जाता है कि जड़, तना और पत्ता उसकी जीवन शक्ति है। समय पर फूल और फल उत्पन्न करता है। फूलों में सुगंध एवं फल के अंदर आवश्यक जीवन-शक्ति के तत्व होते हैं। किसी कारणवश वृक्ष से मूल तत्व बाहर निकला तो वृक्ष मृत होकर सूख जाता है। मनुष्य के अंदर का मूल तत्व जैसे ही शरीर का परित्याग करता है तत्क्षण शरीर मृत्यु को प्राप्त हो जाता है। वह तत्व और कुछ नहीं परमात्मा का अंश आत्मा के रूप में संपूर्ण ब्रह्मांड के प्रकृति में रचा-बसा हुआ है और वह सत्य अनंत शक्तिशाली है जो सृजन तथा जीवन चक्र का कारण है। जिसने भी उस तत्व को पहचाना तथा उसे संपर्क स्थापित किया उसने अपने कार्यों में अतिरिक्त असाधारण परिणाम उत्पन्न करने में सफलता अर्जित की तथा परम शांति में स्वयं को स्थापित किया।

देशभर में 30 अक्टूबर को मनायी जायेगी गोपाष्टमी
Published / 2025-10-28 20:17:20
देशभर में 30 अक्टूबर को मनायी जायेगी गोपाष्टमी

गोपाष्टमी गौ-सेवा, श्रद्धा और संस्कृति का पावन पर्व : संजय सर्राफएबीएन सोशल डेस्क। विश्व हिंदू परिषद सेवा विभाग एवं श्री कृष्ण प्रणामी सेवा धाम ट्रस्ट के प्रांतीय प्रवक्ता संजय सर्राफ ने कहा है कि भारत की सनातन संस्कृति में गाय को माता का स्थान प्राप्त है। गोपाष्टमी वही पावन पर्व है जो गाय और गोवंश की महिमा को समर्पित है। यह पर्व कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि को मनाया जाता है। इस वर्ष गोपाष्टमी 30 अक्टूबर दिन गुरुवार को मनाया जायेगा। गोपाष्टमी उत्सव अत्यंत श्रद्धा और उत्साह के साथ देशभर में मनाया जाता है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, भगवान श्रीकृष्ण ने इसी दिन पहली बार गोपालक (गाय चराने वाले) के रूप में गौवंश की सेवा की थी। नंद बाबा ने उन्हें बछड़ों के बजाय गायों को चराने की अनुमति दी थी। इसी कारण यह दिन गोपालक रूप में श्रीकृष्ण की आराधना का प्रतीक माना जाता है। इस दिन से ही व्रज में गौ-सेवा का शुभारंभ होता है। इसके अतिरिक्त, यह पर्व गौमाता की पवित्रता, पालन और संरक्षण के प्रति आस्था का प्रतीक है। स्कंद पुराण, पद्म पुराण और अन्य धर्मग्रंथों में भी गोपाष्टमी का उल्लेख मिलता है। कहा गया है कि जो व्यक्ति इस दिन श्रद्धापूर्वक गौ-सेवा करता है, उसे अक्षय पुण्य की प्राप्ति होती है। गोपाष्टमी के दिन सुबह स्नान कर लोग गायों को स्नान कराते हैं, उनके सींगों और गले में फूल-मालाएं, रोली, गुलाल और कपड़ों से सजावट की जाती है। इसके बाद गाय की आरती उतारी जाती है और घास, गुड़, रोटी, चना, और फल अर्पित किए जाते हैं। गौ-सेवा करने वाले गोपालक, गौशालाओं के गौ सेवक और किसान इस दिन विशेष रूप से सम्मानित किए जाते हैं। कई स्थानों पर गौ-पथ यात्रा या गौ-पूजन कार्यक्रम भी आयोजित किए जाते हैं। महिलाएं इस दिन व्रत रखती हैं और परिवार की सुख-समृद्धि तथा गोवंश की रक्षा की कामना करती हैं। मंदिरों में भगवान श्रीकृष्ण और गोपालक रूप की मूर्तियों का विशेष श्रृंगार किया जाता है। गोपाष्टमी केवल धार्मिक पर्व नहीं, बल्कि भारतीय ग्राम्य संस्कृति का जीवंत प्रतीक है। गाय भारतीय कृषि, अर्थव्यवस्था और पर्यावरण से गहराई से जुड़ी हुई है। गौमाता से प्राप्त दूध, दही, घी, गोबर और गोमूत्र पंचगव्य के रूप में जीवनोपयोगी माने गए हैं। इनसे न केवल पोषण मिलता है बल्कि खेती और औषधि के क्षेत्र में भी इनका महत्व अपार है। गोपाष्टमी हमें यह संदेश देती है कि गाय केवल एक पशु नहीं, बल्कि जीवनदायिनी शक्ति है, जिसका संरक्षण हर व्यक्ति का धर्म है। आज जब पर्यावरण असंतुलन और रासायनिक खेती की समस्या बढ़ रही है, तब गोसंवर्धन और गोपालन हमारे लिए समाधान का मार्ग प्रस्तुत करते हैं। गोपाष्टमी का पर्व गौमाता के प्रति कृतज्ञता और सम्मान का प्रतीक है। यह हमें भारतीय संस्कृति के उस मूल सिद्धांत की याद दिलाता है जिसमें सर्वभूत हित को सर्वोपरि माना गया है। इस पावन दिन पर हम सभी को संकल्प लेना चाहिए कि हम गौवंश की रक्षा, गौशालाओं के विकास और स्वदेशी संस्कृति के संरक्षण में अपना योगदान देंगे। गोपाष्टमी केवल पूजा नहीं, बल्कि गौ-सेवा और धरती मां की रक्षा का दिव्य संदेश है, जो युगों-युगों तक भारतीय आस्था का आधार बना रहेगा।

आस्था का चमत्कार...
Published / 2025-10-28 09:25:11
आस्था का चमत्कार...

न कोई थकान, न किसी प्रकार का आलस्य और ना ही किसी प्रकार का शारीरिक मानसिक तथा भावनात्मक अपवित्रता.. स्वत: स्फूर्त कठोर अनुशासनत्रिवेणी दासएबीएन सोशल डेस्क। ना शांति समिति की बैठक, न कोई दंगा-फसाद, न इंटरनेट कनेक्शन को बाधित करना, ना कोई शंका ना ही कोई डर, श्रद्धा एवं स्वेच्छा से घाटों की सफाई, पूजा सामग्री को नि:शुल्क उपलब्ध कराना, शराब की दुकानों को बंद करने की आवश्यकता नहीं है ।ठेकुआ का प्रसाद प्रत्येक घर में स्वयं ही निर्माण करना, छठ व्रतियों के आने जाने वाले मार्ग का सफाई पानी से पवित्र करना, छठ घाट में ऊंच नीच जाति पाति का भेद मिट जाना, कोई फिल्मी गीत नहीं केवल और केवल छठ के लोकगीत ; यह सब कुछ आस्था का चमत्कार है। सूर्य भगवान को अर्घ्य का समर्पण और संपूर्ण अनुष्ठान में कोई पंडित नहीं कोई पुजारी नहीं मंत्र के रूप में श्रद्धा, भक्ति एवं विश्वास का निरंतर जाप; आस्था की शक्ति चमत्कृत करती है।चार दिनों तक चलने वाला छठ के अनुष्ठान में न कोई तामझाम, ना कोई दिखावा और न ही निमंत्रण का इंतजार बस केवल जिसे जितना बन पड़े सहयोग ही सहयोग। प्रमाणित होता है कि हमारे अंदर आस्था के अनुपात से कई गुना अधिक परिणाम हमारे प्रत्येक कार्यों में उत्पन्न किया जा सकता है; यदि हमने आस्था के महत्व को व्यक्तिगत जीवन में अंगीकार कर लिया हो।

छठ महापर्व के तीसरे दिन अस्तगामी सूर्य को दिया जायेगा अर्घ्य
Published / 2025-10-27 12:15:16
छठ महापर्व के तीसरे दिन अस्तगामी सूर्य को दिया जायेगा अर्घ्य

आज छठ पूजा का तीसरा दिन, अस्तगामी सूर्य को दिया जाएगा अर्घ्य — जानें शुभ मुहूर्त और विधिएबीएन सोशल डेस्क। छठ पर्व का आज तीसरा दिन है, जिसे संध्या अर्घ्य  के रूप में जाना जाता है। आज श्रद्धालु अस्तगामी सूर्य  को अर्घ्य देकर छठी मैया और सूर्यदेव का आशीर्वाद प्राप्त करेंगे। यह पर्व सूर्य उपासना, प्रकृति और मातृत्व की शक्ति को समर्पित है। मान्यता है कि छठी मैया देवी कात्यायनी का अवतार हैं और सूर्यदेव की बहन मानी जाती हैं। इसलिए यह व्रत सूर्य-षष्ठी  के नाम से भी प्रसिद्ध है।छठ पूजा के तीसरे दिन का महत्व छठ पूजा के तीसरे दिन भक्तजन डूबते हुए सूर्य को जल अर्पित करते हैं। यह एकमात्र पर्व है जिसमें Setting Sun को अर्घ्य दिया जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, शाम के समय सूर्यदेव अपनी पत्नी प्रत्युषा के साथ होते हैं, इसलिए इस समय अर्घ्य देना अत्यंत शुभ माना जाता है। भक्त सूर्यदेव को धन्यवाद देते हैं दिनभर की ऊर्जा, रोशनी और जीवन प्रदान करने के लिए। इस दौरान माताएं अपने बच्चों की लंबी उम्र, परिवार की समृद्धि और सुख-शांति की कामना करती हैं।अर्घ्य देने से पहले करें सूर्य कवच का पाठ संध्या अर्घ्य से पहले करना अत्यंत लाभकारी माना गया है। मान्यता है कि सूर्य कवच का पाठ करने से हेल्थ, कैरियर, वेल्थ और विल पॉवर में सुधार होता है। यह आंख, त्वचा, हृदय और हड्डियों से जुड़ी बीमारियों से भी रक्षा करता है। छठ पूजा के दौरान हर दिन इसका पाठ शुभ फल देता है।तीन शुभ योगों में दिया जाएगा संध्या अर्घ्य इस साल छठ पूजा का संध्या अर्घ्य बेहद खास है क्योंकि यह रवि योग, हंसा राजयोग और रुचक राजयोग जैसे तीन शुभ योगों में संपन्न होगा।

श्री राधा-कृष्ण मंदिर में छठ के खरना पर 101 किलो खीर का लगा भोग
Published / 2025-10-26 17:18:43
श्री राधा-कृष्ण मंदिर में छठ के खरना पर 101 किलो खीर का लगा भोग

हजारों श्रद्धालुओं ने प्रसाद ग्रहण किया टीम एबीएन, रांची। श्री कृष्ण प्रणामी सेवा धाम ट्रस्ट द्वारा संचालित पुंदाग में श्री कृष्ण प्रणामी मंगल राधिका सदानंद सेवा धाम श्री राधा कृष्ण प्रणामी मंदिर में 235 वां श्री कृष्ण प्रणामी अन्नपूर्णा सेवा महाप्रसाद  का आयोजन किया गया। आज का श्री कृष्ण प्रणामी अन्नपूर्णा सेवा प्रणामी ट्रस्ट के सदस्यों ने आयोजित किया। आज छठ महापर्व खरना पूजा के अवसर पर 101 किलो दूध का खीर का भोग लगाया गया।श्री राधा कृष्ण जी का दिव्य अलौकिक श्रृंगार किया गया। खीर महाप्रसाद का विधिवत भोग दोपहर 12 बजे मंदिर के पुजारी अरविंद कुमार पांडे ने लगायी। तत्पश्चात मंदिर परिसर में उपस्थित हजारों श्रद्धालुओं के बीच महाप्रसाद का वितरण किया गया। तत्पश्चात भजन- संध्या के कार्यक्रम में ट्रस्ट के भजन गायकों के मनमोहक सुमधुर भजनों में अमृत गंगा का रसपान कराते हुए श्रोताओं को खूब झुमाया तथा श्री राधा कृष्ण के जयकारा से पूरा वातावरण कृष्णमय एवं भक्तिमय बन गया। तत्पश्चात सामूहिक रूप से महाआरती की गयी। ट्रस्ट के प्रवक्ता सह मीडिया प्रभारी संजय सर्राफ ने बताया कि आज श्री राधा कृष्ण मंदिर में 4 हजार से अधिक श्रद्धालुओं में दर्शन किये। उन्होंने कहा कि छठ महापर्व न केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक है बल्कि पर्यावरण संरक्षण और सूर्य ऊर्जा के प्रति कृतज्ञता का भी प्रतीक है। छठ पूजा भारतीय संस्कृति की उस अनमोल परंपरा का उत्सव है जो मनुष्य और प्रकृति के अटूट बंधन को दशार्ता है। यह पर्व श्रद्धा शुद्धता और समर्पण का प्रतीक है। मौके पर ट्रस्ट के अध्यक्ष डूंगरमल अग्रवाल, उपाध्यक्ष राजेंद्र प्रसाद अग्रवाल, सुरेश अग्रवाल, निर्मल जालान, शिव भगवान अग्रवाल, मधुसूदन जाजोदिया, ज्ञान शर्मा, निर्मल छावनिका, पूरणमल सर्राफ, संजय सर्राफ, विष्णु सोनी, बिजय अग्रवाल, मनीष सोनी, मुरली प्रसाद, हरीश कुमार, परमेश्वर साहू, बसंत वर्मा सहित बड़ी संख्या में महिलाएं, पुरुष उपस्थित थे।

मुरुम बारह पाड़हा सोहराई जतरा हर्षोल्लास के साथ संपन्न
Published / 2025-10-25 20:26:55
मुरुम बारह पाड़हा सोहराई जतरा हर्षोल्लास के साथ संपन्न

जतरा हमारी पारंपरिक सांस्कृतिक धरोहर है : सुरेश बैठा प्रकृति ही हमारे आराध्यदेव है जो हमें जीवन देता है : नारायण उरांव  झारखंडी संस्कृति का आत्मा है जतरा : डॉ बिरेन्द्र साहु टीम एबीएन, रांची। कांके के मुरुम बारह पाड़हा सोहराई जतरा आज हर्षोल्लास के साथ संपन्न हुआ। जतरा में मुरुम, रोल, होचर, इचापिरी, रेंडो- पतरातु सहित कई गांवों के खोड़हा अपने पारंपरिक परिधान के साथ ढोल-ढाक-नगाड़ा बजाते एवं नृत्य दान करते हुए मुरूम मुख्य अखाड़ा पहुंचे, जहां घंटों लोग जतरा नृत्य-गान किये। रात्रि में नागपुरी गीत आर्केस्ट्रा का आयोजन किया गया। मुख्य अतिथि के रूप में कांके के विधायक सुरेश कुमार बैठा ने कहा हमारी परंपरा व संस्कृति को बोलचाल व वेशभूषा ही जीवित रखा है। युवा पीढ़ी इस परंपरा रूपी धरोहर को जतरा के रूप में आयोजित कर बचा रहे हैं। जतरा के उद्घाटनकर्ता सरना समिति के नारायण उरांव ने हमारे पुरखों ने पुरातन काल से ही समाज को ठीक रखने के लिए पाड़हा रूपी न्यायिक व्यवस्था बना करके रखा है, जहां हम किसी भी प्रकार के मामला का निपटारा करते रहे हैं। उन्होंने कहा प्रकृति ही हमारा आराध्य देव है जो हमें जीवन देता है। जल जंगल जमीन ही हमारी पहचान है जो पर्यावरण को सुरक्षित रखने का सूत्र प्रदान करता है। डॉ बिरेन्द्र साहु ने कहा कि झारखंड के लोगों का बोलना ही गीत एवं चलना ही नृत्य के समान होता है। झारखंडी संस्कृति का आत्मा गांव गांव में लगने वाला जतरा है। कार्यक्रम को सफल बनाने में जतरा के संरक्षक सधन उरांव, अध्यक्ष साधो उरांव, कार्य अध्यक्ष गुड्डू उरांव, कोषाध्यक्ष संदीप उरांव, एतवा उरांव, अजीत टोप्पो, सुधीर उरांव, राहुल तिर्की आदि मुख्य थे। उक्त जानकारी समिति के साधो उरांव ने दी।

दो नवंबर को लगेगा बड़ागांई बुटी देवोत्थान जतरा मेला
Published / 2025-10-24 20:42:22
दो नवंबर को लगेगा बड़ागांई बुटी देवोत्थान जतरा मेला

टीम एबीएन, रांची। बड़ागाई-बुटी के सीमा पर स्थित देवोत्थान धाम (बूढ़ा महादेव मंदिर) परिसर में विनोद महतो की अध्यक्षता में एक बैठक की गयी। जिसमें ग्राम बड़ागाई, लेम, किशुनपुर, खिजुर टोला, महुरम टोली सहित अन्य कई गांव के लोग उपस्थित थे।बैठक में सर्वसम्मति से देवोत्थान एकादशी (देवों के जगने) के उपलक्ष्य में 02 नवंबर, 25 (द्वादशी) को देवोत्थान जतरा मेला आयोजन करने का निर्णय लिया गया। ज्ञात हो कि यह मेला 1931 से लगातार लगाया जा रहा है। यह ऐतिहासिक जतरा मेला सुबह 10 बजे से संध्या 05:30 तक लगेगी।मेला में कई गांव के खोड़हा (नृत्य टोली) अपने पारंपरिक वाद्ययंत्र एवं वेशभूषा के साथ उपस्थित होकर नृत्य-गान करेंगे। मेला को सफल संचालन के लिए मुख्य पहान के रूप में रवि पहान होंगे। वहीं मुख्य संरक्षक डॉ रूद्र नारायण महतो व बनु पहान, संरक्षक डॉ बिरेन्द्र साहु, बलशाय महतो, रमेश लोहरा, महेन्द्र मुंडा, विनोद महतो, अध्यक्ष नेपाल महतो, सचिव  प्रेम लोहरा, कोषाध्यक्ष अजय कुमार महतो, उपाध्यक्ष संदीप पहान, बबलु पहान, अमित पहान होंगे। उक्त जानकारी देवोत्थान जतरा मेला समिति, बड़ागांई- बुटी, रांची के सचिव प्रेम लोहरा (98354 25981) ने दी।

छठ महापर्व : बिहार-झारखंड के व्यंजनों में गजब का अंतर
Published / 2025-10-24 20:39:16
छठ महापर्व : बिहार-झारखंड के व्यंजनों में गजब का अंतर

टीम एबीएन, रांची। छठ पूजा एक प्रमुख भारतीय त्योहार है जिसे खासतौर पर बिहार, झारखंड, उत्तर प्रदेश, नेपाल, मध्य प्रदेश और पश्चिम बंगाल में मनाया जाता है। छठ पूजा की शुरुआत नहाय-खाय के साथ होती है और इसका समापन सूर्यदेव को सुबह अर्घ्य देने के साथ होता है। इस बार छठ पूजा की शुरुआत शनिवार, 25 अक्टूबर 2025 को होगी और समापन मंगलवार, 28 अक्टूबर 2025 को प्रात: कालीन अर्घ्य के साथ होगा। छठ पूजा का प्रसाद काफी खास माना जाता है। इसे व्रत रखने वाले लोग बड़े नियम और शुद्धता से बनाते हैं। वहीं, बिहार और झारखंड के छठ प्रसाद के टेस्ट में काफी फर्क होता है। बिहार की बात करें तो यहां ठेकुआ को छठ पूजा का सबसे जरूरी प्रसाद माना जाता है। इसे गेहूं के आटे, गुड़ और देसी घी से तैयार किया जाता है और खास लकड़ी के सांचे से आकार दिया जाता है। इसे धीमी आंच पर तला जाता है जिससे इसकी खुशबू पूरे घर में फैल जाती है। वहीं झारखंड में भी ठेकुआ बनता है, लेकिन कई बार इसमें नारियल पाउडर या तिल भी मिलाया जाता है, जो इसे थोड़ा अलग टेस्ट देता है। कई लोग इसमें इलायची या सौंफ का भी यूज करते हैं। बिहार में कसर के लड्डू यानी चावल के आटे से बने लड्डू छठ का एक खास हिस्सा होते हैं। इन्हें देसी घी में भूनकर गुड़ के साथ मिलाया जाता है, लेकिन झारखंड में नारियल के लड्डू का चलन ज्यादा है। बिहार में रसीया नाम की खीर बनती है जो गुड़ और चावल से तैयार की जाती है। इसका टेस्ट बिल्कुल देसी और पारंपरिक होता है। वहीं झारखंड में भी गुड़ की खीर बनती है, लेकिन कई जगह इसमें नारियल का दूध या पिसा नारियल भी मिलाया जाता है, जो इसे अलग टेस्ट देता है। बिहार में धान की पिट्ठी छठ प्रसाद में कुछ खास नहीं मानी जाती है। वहीं, झारखंड में पिट्ठी, यानी धान की भूसी निकालकर बनाये गये चावल से बनी मिठाई, झारखंड के छठ में विशेष मानी जाती है। इसे गुड़ या तिल भरकर बनाया जाता है। बिहार में तिल और गुड़ की मिठाइयां मकर संक्रांति में ज्यादा दिखती हैं। छठ में इनका प्रयोग सीमित है। वहीं, झारखंड में तिल-गुड़ की मिठाइयां छठ में खास रूप से बनायी जाती हैं। तिलकुट और तिल लड्डू पूजा में चढ़ाये जाते हैं। झारखंड में बहुत से लोग मानते हैं कि छठ के प्रसाद को मिट्टी के बर्तन और चूल्हे में बनाना शुभ होता है। उनका कहना है कि इससे पकवानों में एक खास खुशबू और टेस्ट आता है। इससे न सिर्फ स्वाद बढ़ता है बल्कि उसमें मिट्टी की खुशबू भी शामिल हो जाती है।

आस्था का महापर्व छठ पूजा 25 से प्रारंभ
Published / 2025-10-23 21:21:48
आस्था का महापर्व छठ पूजा 25 से प्रारंभ

यह पर्व श्रद्धा, शुद्धता और समर्पण का प्रतीक है छठ पर्व प्रकृति, सूर्य, जल और मानव के पारस्परिक संबंध का है प्रतीक : संजय सर्राफ टीम एबीएन, रांची। विश्व हिंदू परिषद सेवा विभाग एवं श्री कृष्ण प्रणामी सेवा धाम ट्रस्ट के प्रांतीय प्रवक्ता संजय सर्राफ ने कहा है कि भारत में पर्व-त्योहारों की परंपरा जितनी प्राचीन है, उतनी ही विविधतापूर्ण भी। इन्हीं में से एक है छठ पूजा, जिसे लोक आस्था का महापर्व कहा जाता है। यह पर्व विशेष रूप से बिहार, झारखंड, पूर्वी उत्तर प्रदेश और नेपाल के तराई क्षेत्रों में अत्यधिक श्रद्धा और भक्ति के साथ मनाया जाता है। आधुनिक समय में यह पर्व देश-विदेश में बसे भारतीयों द्वारा भी बड़े उत्साह से मनाया जाने लगा है। इस वर्ष छठ पूजा 25 अक्टूबर से 28 अक्टूबर तक मनाई जायेगी। छठ का महापर्व कार्तिक माह के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि से शुरू होकर सप्तमी तिथि तक चलता है। इस दौरान सूर्य देव और छठी मैया की पूजा की जाती है। छठ पूजा की तिथि 25 अक्टूबर दिन शनिवार को नहाय-खाय,26 अक्टूबर दिन रविवार को खरना पूजन, 27 अक्टूबर दिन सोमवार को  संध्या अर्घ्य (पहला अर्घ्य), 28 अक्टूबर दिन मंगलवार को प्रात: कालीन उषा अर्घ्य (दूसरा अर्घ्य) के बाद शनिवार से शुरू चार दिवसीय पूजा अनुष्ठान मंगलवार को संपन्न हो जाएगा उसके बाद सभी छठ व्रती पारण कर उपवास तोड़ेंगे। छठ पर्व सूर्य देव और उनकी बहन छठी मैया की उपासना का पर्व है। सूर्य देव को जीवन का आधार माना गया है, क्योंकि उनसे ही पृथ्वी पर ऊर्जा, प्रकाश और जीवन की उत्पत्ति होती है। छठी मैया, जिन्हें उषा देवी के नाम से भी जाना जाता है, संतान सुख, स्वास्थ्य, और समृद्धि की अधिष्ठात्री मानी जाती हैं। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, जब पांडव अपने राज्य और सम्मान से वंचित हुए, तब द्रौपदी ने छठी मैया की आराधना की थी, जिसके फलस्वरूप उन्हें पुन: अपना राज्य प्राप्त हुआ। एक अन्य कथा के अनुसार, राजा प्रियव्रत ने संतान प्राप्ति के लिए इस व्रत को किया था, जिसके आशीर्वाद से उन्हें पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई। छठ पूजा की शुरुआत नहाय-खाय से होती है, जब व्रती स्नान कर शुद्ध भोजन ग्रहण करते हैं। दूसरे दिन खरना पर निर्जला उपवास रखकर शाम को गंगा या किसी पवित्र जल स्रोत के तट पर गुड़ की खीर और रोटी का प्रसाद बनाकर पूजा की जाती है। तीसरे दिन संध्या अर्घ्य के समय व्रती डूबते सूर्य को अर्घ्य अर्पित करते हैं। चौथे दिन प्रात: काल उगते सूर्य को अर्घ्य देने के बाद व्रत का समापन होता है। छठ पूजा की सबसे बड़ी विशेषता है इसकी पवित्रता और कठोर नियम। व्रती चार दिनों तक सात्विकता, शुचिता और संयम का पालन करते हैं। पूजा में बांस की सुप, ठेकुआ, फल, नारियल, और गन्ने जैसे प्राकृतिक वस्तुओं का प्रयोग किया जाता है। यह पर्व प्रकृति, सूर्य, जल और मानव के पारस्परिक संबंध का प्रतीक है। छठ पूजा सामाजिक समरसता और एकता का संदेश देती है। इस दिन जाति, वर्ग, धर्म का भेद मिटाकर सभी लोग एक साथ घाटों पर एकत्र होते हैं। महिलाएं पारंपरिक गीत गाती हैं और वातावरण भक्तिमय हो जाता है। यह पर्व न केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक है, बल्कि पर्यावरण संरक्षण और सूर्य ऊर्जा के प्रति कृतज्ञता का भी प्रतीक है।छठ पूजा भारतीय संस्कृति की उस अनमोल परंपरा का उत्सव है, जो मनुष्य और प्रकृति के अटूट बंधन को दशार्ता है। यह पर्व श्रद्धा, शुद्धता और समर्पण का प्रतीक है, जो हमें सिखाता है कि प्रकृति की पूजा ही जीवन की सच्ची साधना है।

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