विचार

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Published / 2021-06-08 13:53:18
बरकरार रहेगी रिजर्व बैंक की उदार नीति

एबीएन डेस्क, रांची। भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) की मौद्रिक नीति समिति (एमपीसी) ने शुक्रवार को नीतिगत दरों में कोई बदलाव नहीं किया और अपना उदार रवैया बरकरार रखा है। हालांकि इस बार केंद्रीय बैंक ने यथास्थिति कायम रखने के साथ ही कुछ बदलावों की ओर इशारा किया है। इस संदर्भ में यह जानना जरूरी है कि आरबीआई उदार नीति बरकरार रखने के साथ-साथ किन बदलावों की ओर संकेत दे रहा है। पहली बात तो यह कि आरबीआई की मौद्रिक नीति निर्धारिक समिति ने उदार मौद्रिक नीति आगे भी जारी रहने की बात कही है। एमपीसी ने एकमत होकर कहा है कि आवश्यकता महसूस होने तक बिना किसी रुकावट के उदार मौद्रिक नीति जारी रहेगी। समिति ने मुख्य नीतिगत दरों में कोई बदलाव नहीं करने का निर्णय लिया। समिति अब किसी समय सीमा में नहीं बंधकर आंकड़ों के आधार पर भविष्य के लिए अनुमान व्यक्त करने की बात कर रही है। हालांकि एक शब्द एक बड़े बदलाव का द्योतक बन गया है। इस बार आरबीआई ने कहा है कि आर्थिक वृद्धि दर टिकाऊ बनाए रखने और अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने के लिए उदार नीति दीर्घ अवधि तक जारी रहेगी। केंद्रीय बैंक ने यह भी स्पष्ट कर दिया है कि आने वाले समय में महंगाई दर निर्धारित लक्ष्य के भीतर थामने की पूरी कोशिश की जाएगी। अप्रैल में एमपीसी ने कहा था कि वृद्धि दर में निरंतरता बनाए रखने के लिए उदार नीति जारी रहेगी और महंगाई भी नियंत्रण में रखी जाएगी। जून मौद्रिक नीति समीक्षा में आरबीआई ने न केवल वृद्धि दर को मजबूती देने की बात कही है, बल्कि इसे दोबारा पटरी पर लाने का भी जिक्र किया है। इस तरह, आरबीआई फरवरी में घोषित अपनी नीति पर दोबारा अमल करने में जुट गया है। कुल मिलाकर केंद्रीय बैंक मान चुका है कि अप्रैल तक अर्थव्यवस्था में सुधार के जो संकेत दिखने लगे थे वे अब लुप्त हो गए हैं। कोविड-19 की दूसरी लहर ने अर्थव्यवस्था पर घातक प्रहार किया है। मार्च तक ऐसा लग रहा था कि परिस्थितियां सामान्य हो गई हैं और अर्थव्यवस्था अब बिना किसी रुकावट के साथ रफ्तार से आगे बढ़ पाएगी लेकिन मध्य अप्रैल के बाद सूरत पूरी तरह बदल चुकी है। दूसरा महत्त्वपूर्ण तथ्य यह है कि मौद्रिक नीति समिति में वृद्धि दर का अनुमान भी संशोधित किया गया है। फरवरी में एमपीसी की बैठक के बाद आरबीआई ने वित्त वर्ष 2021-22 के लिए सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) की वृद्धि दर का अनुमान 10.5 प्रतिशत रहने की बात कही थी। कोविड-19 की दूसरी लहर से आर्थिक गतिविधियां एक बार फिर थमने के बावजूद आरबीआई ने पिछले महीने जारी अपनी सालाना रिपोर्ट में भी 10.5 प्रतिशत आर्थिक वृद्धि दर का अनुमान बरकरार रखा था। इसके उलट दूसरी एजेंसियों ने अपने अनुमानों में कमी करना शुरू कर दिया था। हालांकि अब आरबीआई ने भी आर्थिक वृद्धि दर का अनुमान घटाकर 9.5 प्रतिशत कर दिया है। चालू वित्त वर्ष की पहली तिमाही में वृद्धि दर शून्य से 18.5 प्रतिशत निचले स्तर पर रहने का अनुमान जताया गया है। अब सारा दारोमदार टीकाकरण की रफ्तार पर है, लेकिन आरबीआई ने राजकोषीय और मौद्रिक नीति दोनों स्तरों पर अर्थव्यवस्था को राहत देने की जरूरत बताई है। तीसरी अहम बात यह है कि वृद्धि के अनुमान में पूरे एक प्रतिशत अंक की कमी की गई है, लेकिन महंगाई दर का अनुमान मात्र 10 आधार अंक बढ?े का जिक्र किया गया है। अब यह 5 प्रतिशत के बजाय 5.10 प्रतिशत रहने का अनुमान है। अप्रैल में थोक महंगाई दर 11 प्रतिशत के उच्चतम स्तर 10.49 प्रतिशत पर पहुंच गई थी और इससे पहले मार्च में यह 7.39 प्रतिशत के साथ आठ महीने के उच्चतम स्तर पर थी। हालांकि खुदरा महंगाई दर अप्रैल में कम होकर 4.29 प्रतिशत रह गई। खाद्य वस्तुओं की कीमतों में कमी से ऐसा हुआ। मार्च में खुदरा महंगाई दर 5.52 प्रतिशत थी। आरबीआई खुदरा महंगाई पर नजर रखता है और इसका दायरा 2 से 6 प्रतिशत के बीच रखने का प्रयास करता है। महंगाई दर बढ़ने की आशंका जरूर है और कच्चे तेल के दाम बढ़ने से थोड़ा जोखिम है लेकिन मांग कम होने से महंगाई दर ऊपर नहीं भागेगी। मौद्रिक नीति समीक्षा की एक और महत्त्वपूर्ण बात यह रही कि आरबीआई सरकारी प्रतिभूति खरीद कार्यक्रम (जी-सैप) आगे भी जारी रखेगा। अप्रैल में केंद्रीय बैंक ने पहली तिमाही में 1 लाख करोड़ रुपये मूल्य की सरकारी प्रतिभूतियां खरीदने की बात कही थी। दूसरी तिमाही में भी यह प्रक्रिया जारी रहेगी। आरबीआई ने तो दूसरे चरण के जी-सैप में 1.2 लाख करोड़ रुपये मूल्य की प्रतिभूतियां खरीदने का लक्ष्य रखा है। हालांकि इसके बावजूद बॉन्ड बाजार में शुक्रवार को उत्साह नहीं दिखा। आखिर ऐसा क्यों हुआ? इसकी वजह यह है कि 17 जून को जी-सैप के 40,000 करोड़ रुपये मूल्य के बॉन्ड खरीदारी कार्यक्रम में 10,000 करोड़ रुपये मूल्य के राज्य विकास ऋणों के मद में जारी बॉन्ड शामिल होंगे। इससे यह अनुमान लगाया जा सकता है कि दूसरे जी-सैप में राज्य विकास ऋणों की हिस्सेदारी बढ़ेगी। इस तरह, केंद्र सरकार की प्रतिभूतियों की खरीदारी 1.2 लाख करोड़ रुपये से कम रहेगी। बॉन्ड खरीदारी कार्यक्रम में राज्यों के बॉन्ड भी शामिल करने होंगे नहीं तो केंद्र एवं राज्य सरकारों की प्रतिभूतियों के प्रतिफल के बीच अंतर और भी अधिक हो जाएगा। अंत में, प्रोत्साहन एवं लचीली मौद्रिक नीति वापस लेने की फिलहाल कोई योजना नहीं दिख रही है। निकट भविष्य में तो ऐसा होता नहीं दिख रहा है। मौजूदा वर्ष में आरबीआई ऐसा करने का जोखिम नहीं उठा सकता है जब दूसरी एजेंसियां नियमित अंतराल पर देश की वृद्धि दर का अनुमान कम कर रही हैं। (लेखक और जन स्मॉल फाइनैंस बैंक लिमिटेड में वरिष्ठ सलाहकार हैं)।

Published / 2021-06-07 14:12:38
तरीका सुधर जाये, तो अब भी लग सकता है मुफ्त टीका

एबीएन डेस्क, रांची। वर्तमान में भारत के लिए सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण स्वास्थ्य संबंधी बात और सबसे अहम आर्थिक प्रोत्साहन क्या है? निस्संदेह यह है कोविड टीकाकरण। हमें यह याद रखना होगा कि यह पूरा मामला कोविड-19 के मौजूदा स्वरूपों के साथ समाप्त नहीं होने वाला। शायद हमें हर वर्ष इन टीकों की बूस्टर खुराक लेनी होगी। आधुनिक सार्वजनिक अर्थशास्त्र का एक बड़ा लेकिन सामान्य विचार यह है कि आजादी भलीभांति काम करती है और राज्य को केवल तभी हस्तक्षेप करना चाहिए जब बाजार विफल हो जाए। बाजार की विफलता की चार श्रेणियां हैं : बाजार शक्ति की उपस्थिति, बाह्य कारक, सूचनाओं की विसंगति और सार्वजनिक बेहतरी के प्रावधान। सरकार के हस्तक्षेप की स्थिति में दो बातों की जांच बहुत जरूरी होती है: बाजार की विफलता की मौजूदगी और राज्य के प्रस्तावित हस्तक्षेप का विश्वसनीय क्रियान्वयन। ये बातें हमें वे अवधारणाएं और सिद्धांत मुहैया कराती हैं जिनकी मदद से हम टीकाकरण पर विचार कर सकते हैं। देश में केवल दो बड़ी टीका विक्रेता कंपनियां हैं। ऐसे में बाजार की शक्ति को लेकर भी चिंता है। बहरहाल, एक बार बाजार विश्व बाजार के सामने आने के बाद महत्त्वपूर्ण प्रतिस्पर्धा सामने होगी। बाजार की शक्ति के संदर्भ में यह बात बार-बार सामने आती है: देश में किसी एकाधिकार वाले क्षेत्र में जटिल शासकीय हस्तक्षेप में पड़ने के बजाय बेहतर यही होगा कि व्यापार में खुलापन लाया जाए और देश में प्रतिस्पर्धी नीति के क्षेत्र में राज्य की क्षमता की समस्या से निजात पाई जाए। टीकाकरण उन व्यक्तियों को बचाव मुहैया कराएगा जो टीका लगवाएंगे। उनके यहां वहां जाने की संभावना बनने और महामारी फैलाने की आशंका कम होने से बाह्य मोर्चे पर सकारात्मक स्थिति निर्मित होगी। परंतु आमतौर पर इस बारे में कुछ नहीं कहा गया कि लोग टीकाकरण के लिए आखिर कितनी कीमत चुकाने को इच्छुक होंगे? अगर उसकी कीमत अच्छी खासी हुई तो? चाहे जो भी कीमत चुकाई जाए वह व्यक्ति और समाज को होने वाले लाभ की तुलना में कम ही होगी। सामाजिक लाभ और व्यक्तिगत लाभ का यह अंतर टीकों के बाजार में सरकार के हस्तक्षेप की अच्छी वजह है। कोरोना में एक अहम समस्या मूल सामाजिक चर्चा के स्तर पर सूचनाओं की विसंगति की भी है। चूंकि एक्स के पास यह जानने का कोई विश्वसनीय तरीका नहीं है कि वाई कोविड का प्रसार करने वाला हो सकता है, ऐसे में चर्चा केवल उन लोगों के बीच सिमट कर रह जाती है जो एक दूसरे में कोविड की स्थिति के बारे में जानते हों। तीसरे पक्ष से निकलने वाले विश्वसनीय संकेतक मसलन टीकाकरण पासपोर्ट या किसी व्यक्ति में संक्रमण के बारे में जानकारी आदि कोविड के कारण सूचना के स्तर पर उत्पन्न विसंगति को दूर करने वाले संभावित हल हो सकते हैं। अर्थशास्त्र में उपचारात्मक स्वास्थ्य और टीकाकरण को सार्वजनिक बेहतरी में श्रेणीबद्ध नहीं किया जाता। यदि क दंत चिकित्सक की कुर्सी पर बैठा है तो ख उसी समय उसका इस्तेमाल करने से वंचित है। इसी तरह दंत चिकित्सक किसी को भी सेवा देने से इनकार कर सकता है। यानी उपचारात्मक स्वास्थ्य सेवाएं राष्ट्रीय सुरक्षा की तरह सार्वजनिक बेहतरी में नहीं गिनी जा सकतीं। उपचारात्मक स्वास्थ्य की बेहतरी को न गिनने से राज्य का हस्तक्षेप गलत हो सकता है और नुकसानदेह भी। ऐसे ही पोलियो की खुराक या फ्लू के खिलाफ टीकाकरण भी सार्वजनिक बेहतरी में नहीं आता। हालांकि राज्य सरकार लोगों और समाज की बेहतरी को ध्यान में रखकर इसे नि:शुल्क या रियायती दरों पर दे सकती है। कोविड टीकाकरण में बाजार विफलता जैसी कोई कठिनाई नहीं है लेकिन क्या हमारे पास इतने बड़े पैमाने पर टीकाकरण की सरकारी क्षमता है? महामारी के बिना शांतिपूर्ण ढंग से भारत ने अधिकतम पांच करोड़ लोगों (माताओं और शिशुओं) का सालाना टीकाकरण किया है। कोविड के लिए 18 वर्ष से अधिक आयु के 95 करोड़ भारतीयों को टीके की दो खुराक देनी होंगी। इसके लिए 190 करोड़ खुराक चाहिए। सरकारी आपूर्ति इसके तीन फीसदी हिस्से की भरपाई कर सकती है। इसके अलावा वयस्कों का टीकाकरण सरकार के अब तक किए गए टीकाकरण से एकदम अलग है। फिलहाल विश्व बाजार मेंं टीका 10 डॉलर प्रति खुराक कीमत पर उपलब्ध है। कुछ तार्किक अनुमानों के आधार पर कह सकते हैं कि एक व्यक्ति के टीकाकरण पर 25 डॉलर का खर्च है। आयुष्मान भारत में 50 करोड़ लोगों को चिह्नित किया गया है जो सरकारी स्वास्थ्य सुविधाओं का लाभ ले सकते हैं। इनमें से करीब 20 करोड़ 18 वर्ष से कम उम्र के हैं, यानी शेष 30 करोड़ लोगों को नि:शुल्क टीके लगाने होंगे। मौजूदा दर पर देखें तो इसमें 56,250 करोड़ रुपये की राशि व्यय होगी। यदि सरकार वैश्विक निविदा के जरिये 60 करोड़ टीके खरीदती है तो कीमत कुछ कम होगी। विशेषज्ञों का कहना है कि कीमत 20 फीसदी कम हो सकती है और भविष्य में इसमें और कमी आ सकती है। यानी तब 45,250 करोड़ रुपये व्यय करने पड़ सकते हैं। टीकाकरण पर होने वाले व्यय की तुलना उस व्यय से होनी चाहिए जो अन्यथा लोगों के अस्पताल में दाखिल होने पर होता। कोई गरीब आदमी टीकाकरण से वंचित न रह जाए यह सुनिश्चित करने के लिए सरकार विशेष अभियान चला सकती है। आयुष्मान भारत में 24,000 अस्पतालों को पैनल में शामिल किया गया है ताकि वे उपचार मुहैया करा सकें। अगले तीन महीनों में जब व्यापक टीकाकरण शुरू होने तक इन अस्पतालों से आपूर्ति शुरू की जा सकती है। हमारी अन्य स्वास्थ्य सेवाओं की तरह जो गरीब नहीं हैं वे यहां भी टीकाकरण का मूल्य चुका सकते हैं या फिर उन्हें कर्मचारी राज्य बीमा, केंद्र सरकार की स्वास्थ्य सेवाओं या अन्य कर्मचारी बीमा योजनाओं के तहत टीका लगाया जा सकता है। बाजार और राज्य की संभावित विफलता को ध्यान में रखते हुए टीकाकरण को तेज करने का यह तरीका कई विशेषज्ञ अगस्त 2020 में ही सुझा चुके हैं। अभी भी बहुत देर नहीं हुई है।

Published / 2021-06-05 17:50:26
गोतिया और दाल गलने की कहावत ही हमारी फितरत

एबीएन डेस्क, रांची। गोतिया और दाल जितना गले उतना ही स्वादिष्ट होता है। ये घटिया कहावत ही मनुष्यों की फितरत बताने को काफी है। मैं तो आम निर्यात में भारत से पाकिस्तान के आगे रहने और फुटबॉल विश्वकप में पाकिस्तान के बने गेंदों की धमक से भी दुखित हो जाता हूं। नब्बे के दशक में हुए एक एशियाड में भारत ने मात्र एक गोल्ड मेडल जीता था, वह भी कबड्डी में और पाकिस्तान ने दो। इस तरह वह एशियाड के मेडल लिस्ट में हमसे आगे था और यह तब के अखबारों की सुर्खियां थीं। भारतीय अपने घटिया खेल से कम मायूस थे, वो पाकिस्तान के आगे रहने से ज्यादा दुखित थे। सिर्फ बांग्लादेश के विकास दर को भारत से अच्छा जानकर भारतीयों में ईर्ष्या, द्वेष का संचार हो जाता है। बांग्लादेश तेजी से तरक्की कर सकता है। उसके पास समुद्र तट है, बंदरगाह है। पटसन की खेती के अलावा कृषि, कपड़ा उद्योग, मछलीपालन से संवरने की उसके पास भरपूर संभावना है। वहां युवा कामगार हाथ हैं, सिर्फ इस्लाम हैं। बौद्ध, हिंदू, चकमा वगैरह थे, वो ठिकाने लगा दिये गये हैं। वहां कोई सेकुलर नहीं, टंगखिंचवा नहीं। सबसे बड़ी बात कि बांग्लादेशी इस्लाम अरब या पाकिस्तानी इस्लाम से थोड़ा अलग है, वहां खुलापन भी है और आतंकवाद पर सरकार सख्त रूख अपना लेती है। कुछ सालों में बांग्लादेश तरक्की करके एक विकसित देश की राह पर चल निकले, तो कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए। नेपाल, श्रीलंका भी अगर किसी अच्छे नेतृत्व में अपनी छोटी आबादी और उपलब्ध साधनों से तरक्की करने लगें तो वो महज पांच साल में हमें पीछे छोड़ देंगे। क्योंकि यहां भी भारत की तरह संकट पैदा करने वाले कम हैं। कल को पाकिस्तान में कोई नेता उभर आये जो उसे इस्लाम और आतंकवाद से आगे देखने लगे, कश्मीर से परे जाकर भारत से दुश्मनी त्याग देश पर ध्यान देने लगे तो वह भी हमसे आगे निकल जायेगा। (हालांकि इसकी उम्मीद अभी न के बराबर है) हकीकत में तो वह कुछ दशक पहले हमसे बेहतर स्थिति में था भी। अमेरिका, यूरोप भारत विरोधी थे उनके पैसे से वहां के हालात हमसे बेहतर थे, हम रूस के पालतू बने लुंज-पुंज से चल रहे थे। अब अगर बांग्लादेश, श्रीलंका, नेपाल, पाकिस्तान तेजी से विकास कर हमसे आगे निकल जायें तो सबसे ज्यादा तकलीफ, पेट दर्द किसे होगी? बेशक हम भारतीयों को होगी। हम इन मुल्कों को खुद से आगे जाते नहीं देखना चाहेंगे, पर वो किसी सफल नेतृत्व में ऐसा करते हैं तो हम सिर्फ तमाशाई बने देख सकते हैं और खुन्नस में उनकी छोटी कमियों को भी खूब बढ़ा चढ़ा कर यहां छापेंगे। ये फितरत यूरोपियन अमेरिकन में कूट कूट कर भरी हुयी है। भारत की उपलब्धि, किसी वैश्विक आविष्कार या सफल नेतृत्व से मामूली सुधार अंकल सैम, अंग्रेज या खुद को सर्वोपरि मानते आये यूरोपीय देश हमारा चिर शत्रु चीन कैसे जज्ब करेगा? वो अपने अखबारों में हमारे खिलाफ लिखेंगे, हमारी उपलब्धियों को नकार कर यहां की कमियों को बढ़ा चढ़ा कर बतायेंगे, नेतृत्व को अक्षम बतायेंगे, हमारे लोकतंत्र को अर्द्धतानाशाह कहेंगे, हमारी वैक्सीन उनके लिये खतरा बन जाती है। अमेरिका ने तो रूस को धमका कर दशकों पहले ही हमें क्रायोजेनिक इंजन देने से मना कर दिया था, कुछ साल पहले मंगल मिशन से वह हतप्रभ था। तो मत ज्यादा तूल दें, पश्चिमी देशों और अमेरिका के मीडिया को। वो हमारे खिलाफ सदैव नकारात्मक रहे हैं, इष्यार्लु रहे हैं। यहां जो गड़बड़, असफल है सो यहां भी तो छप दिख रहा है। जनता भी तो देख सुन रही है वह भी अब सब कुछ जानती है।

Published / 2021-06-04 13:58:46
बिगड़ता पर्यावरण पृथ्वी के अस्तित्व पर प्रश्नचिह्न

एबीएन डेस्क, रांची। आज पृथ्वी एवं प्रकृति विध्वंस के कगार पर आ गई है। आज मनुष्य की भौतिक शक्तियां एवं सुख भोग की भूख जैसे कुंभकरण के रूप में संसार में विचरण करने लगी है। पृथ्वी एवं प्रकृति इनके आहार बन गये हैं। ऐसा लगता है कि कुंभकरण रूपी इन दानवों से विश्व बेगि सब चौपट होई की घटना चरितार्थ हो रही है। विज्ञान के उत्सर्ग के चलते आज हम अन्य ग्रहों पर जाने लगे हैं। आज अग्रिम पंक्ति के वैज्ञानिक दिक् एवं काल (टाइम एवं स्पेस रहस्य-भेदन में लगे हैं। विज्ञान ने आज असंभव को संभव कर दिखाया है, लेकिन आज भी वह मनुष्य की पीड़ा, रोग एवं गरीबी नहीं दूर कर सका है। मात्र विज्ञान के सहारे किए जाने वाले विकास के चलते आज संसार का जल एवं वायु प्रदूषित होता जा रहा है। पृथ्वी की हरियाली खत्म होती जा रही है। बाढ़, तूफान, एवं भयंकर ताप से पृथ्वी तप्त होती जा रही है। यदि हमने इन भयंकर परिस्थितियों की तरफ ध्यान नहीं दिया तो संसार में मनुष्य जाति का जीवित रहना संभव नहीं हो पायेगा। विनाश हमारा दरवाजा खटखटा रहा है, पृथ्वी के पर्यावरण का संतुलन बिगड़ता जा रहा है। आज पर्यावरण की समस्याओं पर हमारे जीवन की भौतिक आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु संपादित हो रही विकास योजनाओं पर गंभीरता से विचार करने पर लगता है कि हम पर्यावरण संरक्षण एवं विकास का सामंजस्य स्थापित कर सकेत हैं। हम पर्यावरण संरक्षण के साथ देश का ठोस विकास भी कर सकते हैं। हम मजदूर, पर्यावरण, व्यापार एवं विकास का तारतम्य स्थापित करने की दिशा में कार्य करके भविष्य का सृजन कर सकते हैं। आज ज्ञान एक बहुत बड़ी संपदा (रिसोर्स) है। इस संपदा का भरपूर उपयोग कर हम पर्यावरण-संरक्षण एवं विकास का सामंजस्य स्थापित कर सकते हैं। सिंगापुर एक ऐसा देश है, जहां प्राकृतिक संसाधनों के पूर्ण अभाव में भी देश ज्ञान संपदा का भरपूर उपयोग कर समृद्ध है। विश्व-पर्यावरण की समस्या का केंद्र-बिंदु नगर है। पर्यावरण की प्राय: सारी समस्याएं आज नगरीय विकास से जुड़ी हैं। नगरों के बढ़ते कदम पूरी पृथ्वी पर दीख पड़ते हैं। संयुक्त राष्ट्र संघ की एक रिपोर्ट (1999) के अनुसार सन 1960 में संसार की एक-तिहाई आबादी शहरों में रहती थी। 1999 में 47 प्रतिशत लोग शहरों में रहते थे। सन् 2030 में 61 प्रतिशत लोगों के शहरों में रहने की संभावना है। शहर एवं गांव दोनों से संबंध रखने वाले समुदाय की जनसंख्या बढ़ती जा रही है और यही कारण है कि गांवों पर शहर की छाप दिनोंदिन गहराती जा रही है। अत: शहरों पर ध्यान देना और इनकी समस्याओं का समाधान करना पर्यावरण संरक्षण का एक बहुत कारगर कार्यक्रम हो सकता है। नगरों का आकार-प्रकार बढ़ता जा रहा है। इन नगरों की समस्याएं मूलत: पर्यावरण की समस्याएं हैं। नगरों में स्वच्छ जल एवं स्वच्छ वायु सुलभ कराना, खुले स्थान सुलभ कराना औज पर्यावरण की दृष्टि से सुखद एवं सक्षम यातायात सुलभ कराना आज पर्यावरण की बड़ी चुनौतियां हैं। हमें इन चुनौतियों का सामना करने के लिए दीर्घकालीन प्रयास करने होंगे। हमारे देश की पर्यावरणीय समस्याएं मूल रूप से दो कारणों से हैं। प्रथम विकास की प्रक्रिया से ऋणात्मक प्रभाव के कारण और दूसरी जनसंख्या, गरीबी, अशिक्षा, एवं पिछड़ेपन के कारण। वर्तमान में जिन समस्याओं का सामना भारत को करना पड़ रहा है, उनमें निम्न हैं : जनसंख्या वृद्धि के चलते जीवनयापन के साधनों पर पड़ रहे अधिभार के कारण विकास के धनात्मक प्रभाव का निष्प्रभावी हो जाना। बढ़ती हुई पशु संख्या के कारण घास के मैदानों एवं चारागाहों के क्षेत्र का कम होना। 3290 लाख हेक्टेयर भूमि में से 1750 लाख हेक्टेयर भूमि को विशेष उपचार की आवश्यकता है, ताकि उससे होने वाले लाभ एवं आमदनी को बढ़ाया जा सके। बढ़ता बुआ भू-अवकरण : (क) वायु एवं जल द्वारा (1590 लाख हेक्टेयर), (ख) लवणता एवं क्षारता द्वारा (80 लाख हेक्टेयर), (ग) नदियों द्वारा (70 लाख हेक्टेयर), 5. वनक्षेत्र में कमी (47500 हेक्टेयर प्रतिवर्ष)। इसके मुख्य कारण-पशुओं का जंगलों में चरना, लकड़ी के लिए पेड़ों की अंधाधुंध कटाई, वनों का अतिक्रमण एवं अन्य क्रियाकलाप आदि, 6. कृषि क्षेत्र में वृद्धि एवं उनका स्थानांतरण सड़कों, मकानों, नहरों एवं विद्युत संयंत्रों का निर्माण, 7. पशु, पौधों एवं जीवाणुओं की प्रजातियों की संख्या में कमी (15,000 पशुओं एवं पौधों की प्रजातियों के विलुप्त होने का खतरा विद्यामान है), 8. सजल क्षेत्रों का प्रदूषण एवं उनमें मिट्टी जमा होने की गति में वृद्धि। 9. रसायनों एवं समुद्रीय जल द्वारा भूगर्भीय जल का प्रदूषण, 10. समुद्रतटीय क्षेत्रों में निर्माण के चलते बढ़ता प्रदूषण। 11. समुद्रतटीय वनस्पतियों में कमी। 12. वन के परितंत्र का अवकरण। 13. द्वीपों के परितंत्र का विनाश। 14. नगरों में बढ़ता प्रदूषण एवं स्वास्थ्य सुविधाओं में कमी। 15. घातक अवशिष्टों एवं जैवीय प्रक्रिया से विघटित न हो सकने वाले अवशिष्टों का निस्तारण। 16. नदियों के प्रदूषण एवं उनमें मिट्टी जमा होने की गति में वृद्धि। 17. नगर क्षेत्रों में समीप उद्योगों एवं विकास योजनाओं की स्थापना द्वारा प्रदूषण एवं भीड़-भाड़ में वृद्धि। 18. ग्रामीण क्षेत्रों में संसाधनों एवं नगरों की तरफ प्रवजन प्रमुख हैं। इनके निराकरण हेतु सुविचारित दीर्घकालीन नीति अपनाने की आवश्यकता है। आखिर, मिट्टी, हवा,जल तीनों को हम बुरी तरह से गंदा कर रहें हैं। इसके बाद पर्यावरण के बदलाव और उससे होने वाली आपदा का मार भी झेल रहें हैं लेकिन चंद देशों की उग्र प्रवृति को लेकर आज विश्व का अस्तित्व ही खतरे में हो गया है। (लेखक ग्रीन रिवोल्ट पर्यावरण समाचार पत्र के संपादक और पत्रकारिता विभाग रांची विवि के व्याख्याता हैं।)

Published / 2021-06-03 14:28:00
क्या अराजकता का शिकार हो रहा है देश

एबीएन डेस्क, रांची। करीब 60 वर्ष पहले जॉन केनेथ गालब्रेथ (सन 1961-63 तक भारत में अमेरिका के राजदूत) ने भारत को एक क्रियाशील अराजकता के रूप में परिभाषित किया था। कोविड-19 महामारी से जुड़ी तमाम हृदयविदारक खबरें सामने आ रही हैं। सरकार समय पर टीकाकरण करने में अक्षम रही है। सामूहिक अंतिम संस्कार और शवों को नदियों में बहाए जाने संबंधी रिपोर्ट आने के बाद देशवासियों को लगने लगा है कि क्या हम एक निष्क्रिय अराजकता के शिकार हैं। सरकार दावा कर सकती है कि कोविड की दूसरी लहर की संक्रामकता का अनुमान लगा पाना मुश्किल था। परंतु निजी क्षेत्र और चिकित्सा शोध संस्थानों के साथ सहयोग करके घातक कोविड-19 वायरस की रोकथाम करने संबंधी आवश्यकता तो एकदम स्पष्ट थी। सरकार को सन 2020 केमध्य तक ही टीका उत्पादन के लिए पर्याप्त वित्तीय मदद मुहैया करा देनी चाहिए थी। इसके बजाय प्रधानमंत्री मोदी 28 जनवरी 2021 को दावोस में कोविड को लेकर एकदम आश्वस्त और स्वयं की सराहना करते दिखे। मई 2021 के मध्य तक सरकार और नीति आयोग के प्रवक्ता यही सुझा रहे थे कि उन्होंने कोविड-19 की दूसरी लहर का अनुमान लगा लिया था और इस विषय में सार्वजनिक घोषणाएं कर दी थीं। यह दावा एकदम झूठा है। यदि सरकार और उसके विभाग दूसरी लहर के संभावित बड़े खतरे से अवगत थे तो देश में टीका उत्पादन क्यों नहीं बढ़ाया गया। बल्कि छह करोड़ टीके विदेश भेजकर ऐसा जताया गया मानो देश की जरूरतों के लिए पर्याप्त टीके मौजूद हों। इन दिनों विदेशों में विकसित टीकों पर बौद्धिक संपदा अधिकार समाप्त करने की मांग काफी जोरशोर से हो रही है। जो टीके अभी भारत में इस्तेमाल नहीं किए जा रहे हैं अगर उन पर ऐसे बौद्घिक संपदा अधिकार समाप्त भी कर दिया जाए तो भी देश में उन टीकों का भारत में उत्पादन शुरू होने में कम से कम छह महीने लगेंगे। मई 2021 के अंत में भारत के लिए सबसे बेहतर है कि वह सीरम इंस्टीट्यूट आॅफ इंडिया और भारत बायोटेक द्वारा निर्मित टीकों कोविशील्ड और कोवैक्सीन का उत्पादन बढ़ाये। इसके लिए उन्हें अधिक से अधिक पूंजी मुहैया कराई जाए और उत्पादन तेजी से बढ़ाया जाए। बीबीसी की 5 मई, 2021 की रिपोर्ट के अनुसार भारत के कुछ राज्यों में प्रति 10,000 लोगों पर 10 से भी कम चिकित्सक हैं और कुछ अन्य राज्यों में यह अनुपात पांच से भी कम है। बीबीसी ने ब्रिटेन की नैशनल हेल्थ सर्विस का जिक्र नहीं किया जहां 26,000 भारतीय मूल के चिकित्सक हैं और उन्होंने अपनी चिकित्सा की पढ़ाई भी भारत में पूरी की है। 13 मई, 2021 को न्यूयॉर्क पत्रिका में प्रकाशित एक आलेख में कहा गया कि भारत में हर 10,000 आबादी पर नौ चिकित्सक हैं जो वैश्विक औसत का आधा और अमेरिका के तिहाई के बराबर है। आलेख के अनुसार देश की दोतिहाई आबादी ग्रामीण इलाकों में रहती है जहां देश के केवल 20 फीसदी चिकित्सक हैं। नर्सों की कमी से हालात और बिगड़ सकते हैं। अमेरिका में भारतीय मूल के एक लाख चिकित्सक हैं। इनमें से अधिकांश ने अपनी मेडिकल डिग्री भारत से ली लेकिन न्यू यॉर्क की रिपोर्ट में इन आंकड़ों का कोई उल्लेख नहीं है। ब्रिटेन और अमेरिका में भारतीय मूल की नर्स भी बहुत बड़ी तादाद में रहती हैं। सकारात्मक संदर्भ में बात करें तो ऊंचे वेतन और बेहतर माहौल के लिए विदेश में रहने का विकल्प होने के बावजूद बहुत बड़ी तादाद में चिकित्सकों और नर्सों ने भारत में काम करने का निर्णय किया। बीते 14 महीनों में देश में चिकित्सकों, नर्सों और सहायक कर्मचारियों ने घातक संक्रमण की आशंका के बीच दिन रात काम किया है। भारतीय चिकित्सा महासंघ (आईएमए) ने मई के मध्य में कहा कि कोविड-19 की पहली लहर में उसके पास पंजीकृत 728 चिकित्सकों का निधन हुआ। दूसरी लहर के दौरान भी 420 चिकित्सकों का निधन हुआ। देश में कोविड से कितनी नर्सों की जान गई इस बारे में कोई जानकारी सार्वजनिक रूप से उपलब्ध नहीं है। केंद्र और राज्य सरकारों को उन चिकित्सकों और नर्सों के परिवारों के बारे में जानकारी जुटानी चाहिए जिन्होंने कोविड के कारण जान गंवा दी। एक अलग मामले में केयर्न एनर्जी पर अतीत से प्रभावी कर के मामले में हमें एक बार फिर केंद्र सरकार की अदूरदर्शिता का सामना करना पड़ रहा है। मीडिया में आई रिपोर्ट के अनुसार केयर्न ने अब एक अमेरिकी अदालत में एयर इंडिया को निशाने पर लिया है। इसने ऐसा 1.2 अरब डॉलर का वह मध्यस्थता अवार्ड हासिल करने के लिए किया है जो उसने दिसंबर 2020 में हेग में अंतरराष्ट्रीय न्यायालय में जीता था। जानकारी के मुताबिक भारत सरकार इस मध्यस्थता अवार्ड को चुनौती देने की तैयारी कर रही है और वह इस बात से बेपरवाह दिखती है कि भारत की निवेश केंद्र की छवि पर इसका विपरीत असर होगा। किसी ऐसी बड़ी बहुराष्ट्रीय कंपनी की बोर्ड बैठक में होने वाली काल्पनिक चर्चा पर विचार कीजिए जो भारत में किसी परियोजना के निवेश के अंतिम चरण में हो। बोर्ड यह विचार कर सकता है कि केयर्न और वोडाफोन पर अतीत से प्रभावी कर के मामले निपटने तक प्रतीक्षा कर ली जाए। सन 2019 में कोविड महामारी के पहले भारत और चीन (हॉन्ग कॉन्ग समेत) में क्रमश: 50.5 और 209.5 अरब डॉलर का प्रत्यक्ष विदेशी निवेश आया। स्रोत: यूनाइटेड नेशंस कॉन्फ्रेंस आॅन ट्रेड ऐंड डेवलपमेंट। सन 1960 के दशक में जब गालब्रेथ ने हमारे देश को एक क्रियाशील अराजकता वाला देश बताया तब से भारत कई क्षेत्रों में भारी प्रगति कर चुका है। बहरहाल, बड़े भारतीय राजनीति दलों ने अक्सर सार्वजनिक स्वास्थ्य, प्राथमिक शिक्षा और रोजगार निर्माण से ध्यान भटकाया और उसे धर्म, समुदाय, जाति और भाषाई भेद की ओर ले गए। क्रियाशील अराजकता या निष्क्रिय अराजकता जैसे जुमलों का इस्तेमाल आकर्षक हो सकता है।

Published / 2021-06-02 14:09:16
लोन की व्यवस्था ठीक करने से ही आर्थिक स्थिति में सुधार

एबीएन डेस्क, रांची। वर्तमान कोरोना के संकट को पार करने के लिए भारत सरकार ने भारी मात्रा में ऋण लेने की नीति अपनाई है। ऋण के उपयोग दो प्रकार से होते हैं। यदि ऋण लेकर निवेश किया जाए तो उस निवेश से अतिरिक्त आय होती है और उस आय से ऋण का ब्याज एवं मूल का पुनर्भुगतान किया जा सकता है। जिस प्रकार उद्यमी ऋण लेकर उद्योग स्थापित करता है, अधिक लाभ कमाता है, और उस अतिरिक्त लाभ से ऋण का भुगतान करता है। ऐसे में ऋण का सदुपयोग उत्पादक कार्यों के लिए होता है। लेकिन यदि ऋण का उपयोग घाटे की भरपाई के लिए किया जाए तो उसका प्रभाव बिल्कुल अलग होता है। खपत के लिए उपयोग किये गये ऋण से अतिरिक्त आय उत्पन्न नहीं होती बल्कि संकट के दौरान लिए गये ऋण पर अदा किए जाने वाले ब्याज का अतिरिक्त भार आ पड़ता है। जैसे किसी कर्मी की नौकरी छूट जाए और वह ऋण लेकर अपनी खपत को पूर्ववत बनाए रखे तो भी दुबारा नौकरी पर जाने के बाद लिए गये ऋण पर ब्याज का भुगतान करना पड़ेगा। इस प्रकार उसकी शुद्ध आय में गिरावट आएगी। पूर्व में ब्याज नहीं देना पड़ता था जो कि अब देना पड़ेगा। इस परिप्रेक्ष्य में भारत सरकार समेत विश्व के तमाम विकासशील देशों द्वारा संकट पार करने के लिए ऋण लेने पर विचार करना होगा। ये ऋण नौकरी छूटने पर लिए गए ऋण के सामान है। चूंकि इनसे अतिरिक्त आय उत्पन्न नहीं हो रही है। इसलिए विश्व बैंक ने चेताया है कि ऋण लेकर संकट पार करने की नीति भविष्य में कष्टप्रद होगी। उन्होंने वेनेजुएला का उदाहरण दिया है, जिसने भारी मात्रा में ऋण लिए। आज उस देश को खाद्य सामग्री प्राप्त करना भी दुश्वार हो गया है। चूंकि ब्याज का भारी बोझ आ पड़ा है। इसी क्रम में छह विकासशील देश जाम्बिया, एक्वाडोर, लेबनान, बेलीज, सूरीनाम और अर्जेंटीना ने अपने ऋण की अदायगी से वर्ष 2020 में ही डिफाल्ट कर दिया है। वे लिए गए ऋण का भुगतान नहीं कर सके हैं। साथ-साथ 90 विकासशील देशों ने अंतर्राष्ट्रीय मुद्राकोष से आपात ऋण की सुविधा की मांग की है। जिससे पता लगता है कि विकासशील देशों द्वारा लिये जाने वाले ऋण का प्रचलन फैल भी रहा है और उन्हें संकट में भी डाल भी रहा है। तुलना में अमेरिका और चीन द्वारा लिए गये ऋण का चरित्र कुछ भिन्न है। अमेरिकी सरकार ने भारी मात्रा में ऋण लेकर अपने नागरिकों को नगद ट्रांसफर किए हैं। लेकिन साथ-साथ उन्होंने नयी तकनीकों में भारी निवेश भी किया है। जैसे अमेरिकी सरकार ने बैक्टीरिया रोगों की रोकथाम के लिए प्रकृति में उपलब्ध फाज से उपचार के लिए सब्सिडी दी है। इसी प्रकार चीन ने अमेरिका और रूस के साथ अंतरिक्ष यान बनाने के स्थान पर स्वयं अपने बल पर अंतरिक्ष यान बनाना शुरू कर दिया है और उसका पहला हिस्सा अंतरिक्ष में भेज दिया है; चीन ने सूर्य के बराबर तापमान पैदा किया है; अपने ही लड़ाकू विमान बनाये हैं; और मंगल ग्रह पर अपने सेटेलाइट को उतारा है। ऐसे में अमेरिका और चीन द्वारा लिए गये ऋण का चरित्र भिन्न हो जाता है। ये उसी प्रकार हैं जैसे कि उद्यमी ऋण लेकर उद्योग स्थापित करता है और उससे अतरिक्त लाभ कमाता है। अत: भारत द्वारा ऋण लेकर संकट को पार करने की नीति उचित नहीं दिखती जबकि अमेरिका और चीन की ऋण लेकर निवेश करने की नीति सही दिशा में प्रतीत होती है। भारत सरकार द्वारा लिये जाना वाला ऋण एक और दृष्टि से संकट पैदा कर सकता है। पिछले महीने अप्रैल, 2021 में जीएसटी से प्राप्त राजस्व में भारी वृद्धि हुई है। पिछले दो वर्ष में लगभग 1.0 लाख करोड़ रुपये प्रति माह से बढ़कर मार्च, 2021 में 1.23 लाख करोड़ और अप्रैल, 2021 में 1.41 लाख करोड़ का राजस्व जीएसटी से मिला है। इस आधार पर सरकार द्वारा लिया गया ऋण स्वीकार हो सकता है। लेकिन तमाम आंकड़े इतनी उत्साहवर्धक तस्वीर नहीं पेश करते । मैकेंजी द्वारा किए गये एक सर्वेक्षण में जनवरी, 2021 में देश के 86 प्रतिशत लोग देश की अर्थव्यवस्था के प्रति सकारात्मक थे जो कि अप्रैल, 2021 में घटकर 64 प्रतिशत हो गये थे। डिप्लोमेट पत्रिका में प्रकाशित एक लेख के अनुसार फैक्टरियों द्वारा बाजार से खरीद करने वाले मैनेजरों में मार्च 2021 में 54.6 प्रतिशत सकारात्मक थे जो अप्रैल में घटकर 54.0 प्रतिशत रह गये थे। मार्च और अप्रैल के बीच पेट्रोल की खपत में 6.3 प्रतिशत की गिरावट आई है, डीजल की खपत में 1.7 प्रतिशत की गिरावट आई है, कारों की बिक्री में 7 प्रतिशत की गिरावट आई है और अंतर्राज्यीय ईवे बिलों में 17 प्रतिशत की गिरावट आई है। अत: अर्थव्यवस्था के मूल आंकड़े मार्च की तुलना में अप्रैल में नकारात्मक हैं। इसके बावजूद जीएसटी की वसूली में भारी वृद्धि हुई है। इसका कारण संभवत: यह है कि बीती तिमाही में जो जीएसटी अदा किया जाना था वह अप्रैल में अदा किया गया है; अथवा सरकार ने जीएसटी के रिफंड रोक लिए हैं। और भी कारण हो सकते हैं जिनका गहन अन्वेषण करना जरूरी है। बहरहाल इतना स्पष्ट है कि जीएसटी की वसूली में वृद्धि के बावजूद मूल अर्थव्यवस्था की तस्वीर विपरीत दिशा में चल रही है। भारत सरकार ने दिसम्बर, 2019 में अपनी जीडीपी का 74 प्रतिशत ऋण ले रखा था जो दिसम्बर, 2020 में बढ़कर 90 प्रतिशत हो गया है। इस वर्ष के बजट में वित्त मंत्री ने भारी मात्रा में ऋण लेने की घोषणा की थी जो कि कोविड की दूसरी और तीसरी लहर के कारण हुई क्षति के कारण और अधिक होगा। इस कठिन परिस्थिति में सरकार को कुछ कठोर कदम उठाने चाहिये ताकि ऋण का बोझ न बढ़े। पहला यह कि ईंधन तेल के ऊपर आयात कर बढ़ाकर राजस्व वसूल करना चाहिए और इसकी खपत कम करनी चाहिए। दूसरा, सरकार को अपनी खपत में जैसे सरकारी कर्मियों के वेतन में समय की नाजुकता को देखते हुए भारी मात्रा में कटौती कर देनी चाहिए और अन्य अनुत्पादक खर्चों को समेटना चाहिए। तीसरा सरकार को नयी तकनीकों में भारी निवेश करना चाहिए। हमारे लिए यह शर्म की बात है कि दवाओं के क्षेत्र में अग्रणी होने के बावजूद आज हम अपने देश की भारत बायोटेक के टीके से आत्मनिर्भर नहीं हो सके हैं और तमाम देशों से टीके आयात कर रहे हैं। इसलिए इस कठिन परिस्थिति में अपने बल पर नयी तकनीकों में भारी निवेश करने की पहल करनी चाहिए अन्यथा यह ऋण देश की अर्थव्यवस्था को ले डूबेगा। जैसे वेनेजुएला जैसे देशों को यह संकट में डाल रहा है।

Published / 2021-05-31 14:15:53
शिक्षा को धर्म से अधिक विज्ञान से जोड़ने की जरूरत

एबीएन डेस्क, रांची। जिस प्रकार समाज में कोरोना के वैक्सीन और जांच को लेकर भ्रम और असमंजस फैल रहा है यह कोई नयी बात नहीं है। हमारी शिक्षा की कमजोरी कहें या स्तरहीनता की समस्या आज भी लोग आधुनिक अविष्कारों पर विश्वास नहीं कर रहें हैं। यही कारण है कि सरकार की योजनाओं का भी सही प्रति फल नहीं निकलता है। सवाल यह उठता है कि शिक्षा को धर्म से जोड़ा जाए कि वैज्ञानिक चिंतन और सोच से लबरेज किया जाये। क्या यह सच नहीं है कि भारत में कुछ खास धर्मों के मानने वाले शिक्षण संस्थानों में अपने-अपने धर्मों के प्रचार के लिए कोशिशें करते रहते हैं। कभी कभी सच में लगता है इस मसले पर देश में एक बार खुली बहस हो जाए कि क्या भारत में धर्म प्रचार की स्वतंत्रता जारी रहे अथवा नहीं ? देखा जाए तो केवल अपने धर्म पालन की सबको स्वतंत्रता होनी चाहिये। लेकिन, शिक्षण संस्थानों में अबोध बच्चों को अपने धर्म की अच्छाई और बाकी सभी धर्मों की बुराई बताना बच्चों को अबोध उम्र में कट्टर बनाना और दूसरे धर्मावलम्बियों के प्रति घृणा फैलाना कहाँ तक उचित है? यही तो देश में धार्मिक उन्माद फैला रहा है ? यही तो आपसी असहिष्णुता की मूल धर्म के प्रचार- प्रसार की छूट की कोई आवश्यकता नहीं। धर्म कोई दुकान या व्यापार तो है नहीं जिसका प्रचार प्रसार करना जरूरी हो। भारतीय संविधान धर्म की आजादी का अधिकार प्रदान करता है। अनुच्छेद 25 (1) में कहा गया है कि सभी व्यक्ति समान रूप से धर्म का प्रचार करने के लिए स्वतंत्र है। लेकिन अनुच्छेद 26 कहता है कि धार्मिक आजादी और धार्मिक संप्रदायों के क्रियाकलाप में शांति और नैतिकता की शर्तें भी हैं। अनुच्छेद 28 में कहा गया है कि सरकारी शैक्षिक संस्थानों में कोई धार्मिक निर्देश नहीं दिया जायेगा। अगर हम इतिहास के पन्नों को खंगाले तो देखते हैं कि भारत के संविधान निर्माताओं ने सभी धार्मिक समुदायों को अपने धर्म के प्रचार की छूट दी थी। क्या इसकी कोई आवश्यकता थी? यह मानना होगा कि दो धर्म क्रमश: इस्लाम और ईसाई धर्म के मानने वालों की तरफ से लगातार यह प्रयास होते रहते हैं कि अन्य धर्मों के लोग भी येन-केन-प्रकारेण किसी भी लालच में उनके धर्म का हिस्सा बन जाएं। यह कठोर सत्य है। इससे कोई इंकार नहीं कर सकता है। इस मसले पर देश में बार-बार बहस भी होती रही है और आरोप भी लगते रहे हैं कि इन धर्मों के ठेकेदार लालच या प्रलोभन देकर गरीब आदिवासियों, दलितों वगैरह को अपना अंग बनाने की फिराक में लगे ही रहते हैं। बेशक, भारत में ईसाई धर्म की तरफ से शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में ठोस और ईमानदारी से काम भी किया गया है। पर उस सेवा की आड़ में धर्मांतरण ही मुख्य लक्ष्य रहा है। मदर टेरेसा पर भी धर्मांतरण करवाने के अकाट्य आरोप लगे हैं। उधर, इस्लाम का प्रचार करने वाले बिना कुछ कहे ही धर्मांतरण करवाने के मौके लगातार खोजते हैं। हालांकि मुसलमानों के अंजुमन इस्लाम ने भी शिक्षा के क्षेत्र में उल्लेखनीय काम किया है। यह मुंबई में सक्रिय है। अब आप देखें कि आर्य समाज, सनातन धर्म सभी और सिखों की तरफ से देश में सैकड़ों स्कूल, कॉलेज, अस्पताल वगैरह चल रहे हैं। पर इन्होंने किसी ईसाई या मुसलमान को कभी धर्मातरण करवाने का कभी प्रयास नहीं किया। एक छोटा सा उदाहरण और देना चाहूंगा। एमडीएच नाम की मसाले बनाने वाली कंपनी के संस्थापक महाशय धर्मपाल गुलाटी को सारा देश जानता है। वे पक्के आर्य समाजी हैं। महाशय जी पूरी दुनिया में किंग आॅफ स्पाइस माने जाते है। वे देश की राजधानी में एक अस्पताल और अनेक स्कूल चलाते है। कोई बता दें कि उन्होंने कभी किसी गैर-हिंदू को हिंदू धर्म से जोड़ने की कोशिश भी की हो। खैर, धर्म परिवर्तन केवल भारत ही नहीं बल्कि दुनियाभर में एक जटिल मसला रहा है। इस पर लगातार बहस होती रही है। यह समझने की जरूरत है कि मोटा-मोटी संविधान कहता है कि कोई भी अपनी मर्जी से अपना धर्म बदल सकता है, यह उसका निजी अधिकार है। पर किसी को डरा-धमका या लालच देकर जबरदस्ती या लब जिहाद करके धर्म परिवर्तन नहीं करा सकते। संविधान संशोधन के द्वारा धर्मप्रचार को रोकना सम्भव तो है। पर यह देखना चाहिए कि धर्म के नाम पर बवाल किस वजह से हुआ? यदि धर्म प्रचार की वजह से हुआ है तो किन लोगों की वजह से हुआ है? एक राय यह भी है कि भारत में उन धर्मों के प्रचार की स्वतंत्रता होनी ही चाहिए जिनका उदय भारत भूमि पर हुआ है। जैसे हिन्दू, सिख, जैन और बौद्ध। अगर यह धर्म अपनी जन्म भूमि पर भी अधिकार खो देंगे तो यह तो उनके साथ बड़ा अन्याय होगा। समस्या का मूल कारण इस्लाम और ईसाई हैं। इस्लाम और ईसाइयत को छोड़ दें तो बाकी धर्मो के बीच कोई आपसी विवाद नहीं है। यदि सभी धर्म प्रतिबंधित हों जिनमे हिन्दू धर्म और उससे निकले दूसरे धर्म भी शामिल होंगे तो यह गेंहूं के साथ घुन पिसने जैसी बात हो जायेगी। हां केवल इस्लाम और ईसाइयत का धर्म प्रचार प्रतिबन्धित हों तो युक्ति सांगत लगता है। आगे बढ़ने से पहले पारसी धर्म की भी बात करना सही रहेगा। यह भी भारत की भूमि का धर्म नहीं है। यह भारत में इस्लाम और ईसाइयत की तरह से ही आया है। लेकिन, पारसियों ने भारत में अपने धर्म के प्रसार-प्रचार की कभी चेष्टा तक नहीं की। भारत में टाटा,गोदरेज,वाडिया जैसे बड़े उद्योगपति हैं। इन समूहो में लाखों लोग काम करते हैं। ये देश के निर्माण में लगे हुए हैं। सारा देश इनका आदर करता है। इनसे तो किसी को कोई मसला नहीं रहा। इस बीच, धर्म की अवधारणा से भिन्न है मजहब का ख्याल। धर्म का तात्पर्य मुख़्यत: कर्तव्य से है जबकि मजहब की अवधारणा किसी विशिष्ट मत को मानने से है। इसमें किसी किताब में दर्ज शब्दों के अक्षरश: पालन की अपेक्षा की जाती है। किताबिया मजहब जो मानते हैं उन्हें वैसा ही मानते रहने की आजादी बेशक बनी रहे कोई हर्ज नहीं, जैसे कोई सोते रहने की आजादी का तलबगार है, जागना नहीं चाहता, उसे सुख से सोने दीजिए। मगर दूसरों से यह कहने का अधिकार कि सत्य का ठेकेदार वही है, असंवैधानिक घोषित होना ही चाहिए। मतलब मजहबी प्रचार पर रोक लगाने पर बहस हो जाए और इस पर एक कानून बन जाये तो क्या बुराई है। एक बार इस तरह की व्यवस्था हो जाए तो यह भी पता चल जाएगा कि शिक्षा और स्वास्थ्य क्षेत्र में कितने लोग निस्वार्थ भाव से काम कर रहे हैं और कितने सवा के नाम पर धर्म परिवर्तन में लगे हैं।

Published / 2021-05-28 14:43:22
मुद्रा भंडार का प्रयोग अभी करे केंद्र सरकार

एबीएन डेस्क, रांची। यह सही है कि बीते एक दो सप्ताह में देश के शहरी इलाकों में हालात कुछ सुधरे हैं लेकिन ज्यादातर हिस्सों में अभी भी चिकित्सा की दृष्टि से बहुत खराब स्थितियां बनी हुई हैं। ऐसे में हम क्या कर सकते हैं? समस्या के हल का एक तरीका यह है कि भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) के पास मौजूद भारी भरकम मुद्रा भंडार का इस्तेमाल किया जाए। इस भंडार की सहायता से न केवल सूक्ष्म-वित्त संकट से निपटा जा सकता है बल्कि चिकित्सकीय संकट समेट किसी भी संकट में इसका इस्तेमाल किया जा सकता है। लेकिन कैसे? देश में अभी भी कोविड-19 से निपटने के लिए विभिन्न प्रकार की वस्तुओं की आपूर्ति आवश्यक है। इन वस्तुओं में आॅक्सीजन, आॅक्सीजन सिलिंडर, आॅक्सीजन कंसन्ट्रेटर, कामचलाऊ अस्पताल और नर्सिंग होम तथा खासतौर पर गहन चिकित्सा इकाई, विभिन्न दवाएं, तरह-तरह के चिकित्सकीय उपकरण और टीकों की आवश्यकता है ताकि देश में इस महामारी के प्रसार और गंभीरता पर लगाम लगाई जा सके। हमारी समस्या है तत्काल जरूरी चीजों की घरेलू उपलब्धता न हो पाना। एक देश के रूप में हमारी समस्या यह नहीं है कि हम जरूरी आयात के लिए भुगतान नहीं कर पा रहे हैं। ऐसा इसलिए क्योंकि आरबीआई के पास मुद्रा भंडार की कोई कमी नहीं है। और चूंकि आरबीआई का संबंध भारत सरकार से है इसलिए वह मामले को पूरी तरह राज्य सरकारों पर भी नहीं छोड़ सकती है। केंद्रीय बैंक की बैलेंस शीट के संदर्भ में भंडार शब्द का इस्तेमाल दो तरह से किया जा सकता है। पहला, इसके एक हिस्से को विदेशी मुद्रा भंडार के रूप में बरता जा सकता है तो दूसरी ओर पूंजी भंडार होता है जो प्रभावी तौर पर बैलेंस शीट की देनदारियों की ओर इक्विटी पूंजी के अतिरिक्त होता है। ये भंडार बचे हुए मुनाफे को एकत्रित करने से बनते हैं। आरबीआई प्राय: फॉरेक्स रिजर्व और घरेलू सरकारी बॉन्ड में इनका पुनर्निवेश करता है। मौजूदा हालात में दोनों तरह के भंडारों का इस्तेमाल करने की आवश्यकता है। यह कैसे हो? इसके मॉडल बहुत साधारण हैं। इस वर्ष आरबीआई की ओर से भारत सरकार को असाधारण लाभांश चुकाने दीजिए। इससे आरबीआई का पूंजी भंडार कम होगा और उसके साथ सरकार का नकदी संतुलन बेहतर होगा। भारत सरकार इस फंड को आरबीआई से विदेशी मुद्रा हासिल करने में व्यय कर सकती है और इसे आयात पर खर्च कर सकती है ताकि घरेलू जरूरतों को तत्काल पूरा किया जा सके। अंतत: इससे आरबीआई की बैलेंसशीट में दो बदलाव आएंगे। पहला तो यह कि परिसंपत्ति के मोर्चे पर विदेशी मुद्रा भंडार कम होगा जबकि दूसरा यह कि देनदारी के मोर्चे पर पूंजी भंडार में कमी आएगी। ध्यान रहे कि यहां दिए गए नीतिगत सुझाव के परिणामस्वरूप आरबीआई और भारत सरकार के नकदी संतुलन में कोई परिवर्तन नहीं आएगा। शुरूआत में इसमें इजाफा होगा लेकिन आगे चलकर गिरावट भी देखने को मिलेगी। आरबीआई के साथ बैंकर्स जमा, मुद्रा, राजकोषीय घाटे या आरबीआई के पास मौजूद सरकारी बॉन्ड पर भी इसका कोई असर देखने को नहीं मिलेगा। इसी प्रकार अर्थव्यवस्था में ब्याज दरों पर भी शायद ही कोई असर हो। विनिमय दर भी इससे अप्रभावित रहेगी क्योंकि विदेशी विनिमय की आपूर्ति और मांग दोनों में इजाफा होगा। आरबीआई का विदेशी मुद्रा भंडार 7 मई, 2021 को 589.465 अरब डॉलर के विशाल स्तर पर था। इस संदर्भ में देखें तो विदेशी मुद्रा भंडार की तुलना में अल्पावधि के बाहरी ऋण का अनुपात दिसंबर 2020 में पहले ही घटकर 17.7 फीसदी हो चुका है। विदेशी मुद्रा भंडार के भारी आकार में मौजूद होने के कारण भारत इसमेंं जब चाहे तब कमी कर सकता है। वैसे भी मौजूदा हालात में हमें संकट से निपटने के लिए बहुत अधिक विदेशी मुद्रा भंडार की जरूरत नहीं है। आरबीआई के भंडार के एक हिस्से का उपयोग करके ऐसा किया जा सकता है। अब बात करते हैं उस हिस्से की जिसे आरबीआई ने इस संदर्भ में अन्य देनदारियां एवं प्रावधान करार दिया है। नाम से ऐसा लगता है कि यह भंडार इसलिए सुरक्षित रखा गया है क्योंकि आरबीआई की परिसंपत्तियों की कीमत में उतार-चढ़ाव आ सकता है। बहरहाल ऐसा अंकेक्षण पूरी तरह सही नहीं होता है क्योंकि आरबीआई के पास संरक्षित विदेशी मुद्रा और सोने का मूल्यांकन न केवल कीमतों में अल्पकालिक उछाल का परिचायक है बल्कि यह लंबी अवधि के दौरान धारित विदेशी मुद्रा और सोने के मूल्य मेंं कम स्थायी बढ़ोतरी का भी द्योतक है। आरबीआई द्वारा उल्लिखित तथाकथित अन्य देनदारी और प्रावधान मेंं 30 जून 2020 को 15,61,621 करोड़ रुपये की राशि थी। यह राशि आरबीआई की कुल परिसंपत्तियों के 28.43 प्रतिशत के बराबर है। यह सेंट्रल विस्टा परियोजना के लिए आवंटित राशि का 78 गुना और एसीसी बैटरी स्टोरेज के विनिर्माण के लिए मंजूर पीएलआई योजना के लिए मंजूर राशि का 86 गुना है। इस बात की तत्काल आवश्यकता है कि आरबीआई की बैलेंस शीट में भारी भरकम प्रावधान को कम किया जाए। यदि हम किसी अन्य क्षेत्र में सार्वजनिक व्यय में कमी नहीं कर सकते तो हमें इस मोर्चे पर कटौती करनी होगी।

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