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क्या वैभव सूर्यवंशी का कैरियर खत्म करना चाहते हैं गौतम गंभीर?
Published / 2026-10-31 20:33:45
क्या वैभव सूर्यवंशी का कैरियर खत्म करना चाहते हैं गौतम गंभीर?

पवन कुमार पाण्डेय एबीएन एडिटोरियल डेस्क। गंभीर पर ये आरोप कोई और नहीं क्रिकेट प्रशंसक उठा रहे हैं। लोगों का आरोप है कि गौतम वैभव को लेकर गंभीर नहीं दिख रहे हैं? मैदान पर उतरकर पहली ही गेंद से बेखौफ होकर चौके-छक्के बरसाना और इंटरनेशनल गेंदबाजों के होश उड़ा देना किसी भी युवा खिलाड़ी के लिए सपने जैसा होता है। बिहार के लाल और भारतीय क्रिकेट के सबसे कम उम्र के सनसनीखेज प्रतिभा वैभव सूर्यवंशी ने न्यूजीलैंड के खिलाफ पिछले मुकाबले में विस्फोटक शुरुआत देकर वही किया, जिसकी उम्मीद पूरे देश को थी। लेकिन हैरान करने वाली बात यह है कि जिस लड़के ने अपने बल्ले की धमक से पूरे क्रिकेट जगत का ध्यान खींचा, अगले ही मैच में टीम मैनेजमेंट ने उसे सीधे प्लेइंग इलेवन से बाहर कर बेंच पर बैठा दिया। हेड कोच गौतम गंभीर और कप्तान श्रेयस अय्यर के इस चौंकाने वाले फैसले के बाद अब सोशल मीडिया से लेकर क्रिकेट गलियारों तक फैंस और एक्सपर्ट्स का गुस्सा सातवें आसमान पर है। सवाल उठना इसलिए भी लाजिमी है क्योंकि भारतीय टीम पहले ही सीरीज अपने नाम कर चुकी है। ऐसे में क्रिकेट का सीधा सा नियम और परंपरा यही कहती है कि जब सीरीज हाथ में हो, तो युवा और इन-फॉर्म खिलाड़ियों को ज्यादा से ज्यादा मैच टाइम देकर उनका आत्मविश्वास बढ़ाया जाये। लेकिन यहां उल्टा देखने को मिला—जिस 13-14 साल के बच्चे के हौसले को आसमान छूना चाहिए था, उसे अगले मैच में साथी खिलाड़ियों को बाउंड्री लाइन पर पानी पिलाने के लिए छोड़ दिया गया। सोशल मीडिया पर फैंस सीधे तौर पर पूछ रहे हैं कि क्या यह वही आक्रामक और निडर क्रिकेट का विजन है जिसकी बातें प्रेस कॉन्फ्रेंस में की जाती हैं? क्रिकेट पंडित भी इस फैसले को सरासर बचकाना और आत्मघाती बता रहे हैं। सदियों में ऐसा कोई कुदरती टैलेंट सामने आता है जो इतनी छोटी उम्र में बिना किसी दबाव के इंटरनेशनल दर्जे की गेंदबाजी के सामने छा जाता है। जब कोई युवा बल्लेबाज अपनी लय और प्रचंड फॉर्म में हो, तब उसे रोटेशन या अजीबोगरीब टीम कॉम्बिनेशन के नाम पर बाहर बैठाना उसके मानसिक मनोबल पर सीधा आघात करने जैसा है। एक तरफ जहां कुछ फ्लॉप खिलाड़ियों को अपनी लय तलाशने के लिए दर्जनों मौके दिये जाते हैं, वहीं दूसरी तरफ एक विस्फोटक पारी खेलने के बावजूद इस होनहार लड़के को बाहर का रास्ता दिखा देना भारतीय टीम मैनेजमेंट की प्राथमिकताओं पर गंभीर सवाल खड़े करता है। अगर देश के सबसे बेहतरीन और दुर्लभ टैलेंट को तराशने के बजाय अजीबोगरीब रणनीतियों की बलि चढ़ाया जायेगा, तो इससे न सिर्फ एक उभरते सितारे का आत्मविश्वास टूटेगा बल्कि ड्रेसिंग रूम की नीयत पर भी उंगलियां उठेंगी। मैनेजमेंट को यह समझना होगा कि प्रतिभा को संवारने का काम उसे मैदान पर खुलकर खेलने की आजादी देकर किया जाता है, डगआउट में बैठाकर नहीं!

भाजपा अध्यक्ष नीतिन के सार्थक प्रयास और झारखंड भाजपा में मॉस कॉम्यूनिकेटर की कमी
Published / 2026-10-27 23:35:23
भाजपा अध्यक्ष नीतिन के सार्थक प्रयास और झारखंड भाजपा में मॉस कॉम्यूनिकेटर की कमी

भाजपा अध्यक्ष नीतिन के सार्थक प्रयास और झारखंड भाजपा में मॉस कॉम्यूनिकेटर की कमीबासुकीनाथ पाण्डेयएबीएन डेस्क। भाजपा पस्त है और त्रस्त भी। जी हां, झारखंड राज्य में उसके पास नेताओं की कमी और विशेषकर वैसे नेताओं की कमी है,जो पूरे राज्य में सरकार की कमियों के खिलाफ खड़ा हो सके। वरिष्ठ पत्रकार पंकज प्रसून ने फेसबुक वॉल पर लिखा है कि एक तस्वीर अच्छी लगी। सही में यह तस्वीर अच्छी है। पंकज लिखते हैं-पिछले कुछ सालों में झारखंड भाजपा की सबसे अच्छी तस्वीर अगर लगी, तो ये वाली है।सच कहूं तो ये स्प्रीट जिंदा रहना चाहिए। यही बीजेपी का मतलब भी है। यहां दायित्व होता है, पद का अहंकार नहीं। किसी भी कार्यकर्ता या समर्थक का मन खट्टा हो जाता है, जब वो प्रदेश के बड़े नेताओं के बीच गुटबाजी देखता है। लेकिन वही मन गर्व और उत्साह से भर जाता है जब राष्ट्रीय अध्यक्ष, बूथ अध्यक्ष, मंडल अध्यक्ष और प्रदेश अध्यक्ष, एक ही लक्ष्य के लिए मिशन मोड में काम करते हैं। जिसको भी लगता है कि वो बड़ा नेता बन गया तो थोड़ा "कमल" निशान से अलग होकर चुनाव लड़ लें, औकात का पता चल जाएगा। कार्यसमिति की बैठक में जो सौदान सिंह जी का संबोधन था, अद्भुत। मतलब मजा आ गया। सौदान सिंह पहले भी यहां काम कर चुके हैं। उन्हें सब जानकारी है कि कौन क्या है? एक बात और, ये वाले संगठन मंत्री नीचे कार्यकर्ताओं  के बीच बैठे थे। पहले वाले तो स्टेज छोड़ते ही नहीं थे। सुखद बदलाव। पंकज जी वरिष्ठ पत्रकार हैं लेकिन झारखंड भाजपा की दुर्गति का सबसे बड़ा कारण पर गौर करना आवश्यक है।पीछे जाए तो रघुवर दास की पहली भाजपा सरकार थी जिसने पांच साल का कार्यकाल पूरा किया। काम भी किया। सरकार की सक्रियता नजर भी आई। लेकिन राजनीतिक बिंदुओं पर शीर्ष नेतृत्व ने राजनीतिक छूट देकर कितनी बड़ी गलती की, जिसे हर सामान्य समर्थक भी समझ रहा था।सरयू राय जैसे शीर्ष व्यक्ति से विवाद, सुदेश महतो से सीटों का समझौता नहीं करना, सीट बंटवारे में पारदर्शिता का अभाव। क्या शीर्ष नेतृत्व इन बिंदुओं को नहीं समझा? अवश्य समझा। नजर अंदाज किया या अति आत्म विश्वास में झारखंड की सत्ता गंवा दी। अब दूसरी बार भी हार का सामना करना पड़ा। क्योंकि झामुमो की सरकार ने मईंया योजना में लगभग 50 लाख परिवार को सीधे प्रभावित कर दिया।रघुवर सरकार कल्याणकारी योजनाओं में कृपण रहे। आज 200 यूनिट बिजली फ्री है जिससे लाखों परिवार को सीधा लाभ मिला। आखिर चुनाव जीतने की क्षमता कम होती जा रही है। भाजपा नेताओं का जनता के लिए संघर्ष न के बराबर है। उदाहरण से समझें। रांची के कांके  और खिजरी सीट पर भाजपा हार गयी। खिजरी में दुबारा हार गयी। शहरी सीटों पर भाजपा की हार झारखंड में एक आश्चर्यजनक पहलू है। कांके विस सीट के उदाहरण को समझें। यहां की एक मुख्य सड़क जो रांची से चिरौंदी और बोड़या होते हुए रिंग रोड को जोड़ती है। यह सड़क दो वर्ष से टूटी है। हर दिन चार से पांच दुर्घटना हो रही है। भाजपा कांके से हार चुकी है, कांग्रेस को विधायक में कोई संवेदनशीलता नहीं है। भाजपा क्या कर रही है? यह जन मुद्दा है लेकिन कांके भाजपा सो रही है। क्या यह भाजपा का कांग्रेसीकरण नहीं है? यही हाल पूरे राज्य में है। जहां भाजपा जीती है वहां भी सोई है और जहां हारी है, वहां बेहोश है।एक बड़ा जनाधार राष्ट्रीय कारणों से भी नाराज है और स्थानीय नेता तो एसी से बाहर निकलते ही नहीं। राजनीति में सत्ता पाने के बाद की सुस्ती बड़ी खतरनाक होती है और झारखंड भाजपा इसी का शिकार है।

सत्ता परिवर्तन...
Published / 2026-10-22 20:37:15
सत्ता परिवर्तन...

त्रिवेणी दास एबीएन एडिटोरियल डेस्क। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (फरर) के प्रमुख सरसंघचालक मोहन भागवत ने कहा है कि रिजीम चेंज से समाज की परिस्थितियां न तो कभी बदली है और न ही कभी बदली जा सकती है, जबकि यथार्थ यह है कि समाज की परिस्थिति समाज के प्रयास से ही बदलती है। शिवसेना के उद्धव गुट के नेता (प्रवक्ता संजय राउत, जो अपने उटपटांग बयान के लिए प्रसिद्ध हैं) ने दावा किया है कि लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी के वियतनाम से लौट के बाद भारत में तख्तापलट होगा। दुनिया के देशों में हाल में हो रहे घटना क्रम से भारत की जनता का चिंतित होना स्वाभाविक ही है। विजयादशमी के शुभ अवसर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा है कि इस समय जो शक्तियां भारत को अस्थिर करने में लगी हुई हैं उनके तीन मुख्य हेतु हैं। सत्ता में आने पर लूट, समाज में फूट और भारतीय संस्कृति से घृणा। इस प्रकार के लोगों का सभी आरोप निराधार होते हैं। कभी एलआईसी को गड़बड़ बतायेंगे, कभी वैक्सीन को, जहां-जहां से चुनाव हार जायेंगे वहां ईवीएम मशीन को और मतदाता सूची के शुद्धिकरण में चुनाव आयोग को पक्षपात करते हुए बतायेंगे।  भारतीय समाज का तानाबाना नेपाल और बांग्लादेश से पूर्णत: भिन्न है। तख्ता पलट जैसे किसी भी क्रिया को भारतीय जनमानस ने आजादी के बाद से न तो कभी स्वीकार किया है और ना कभी आगे स्वीकार करेगा।

तुलसीदास की रचनाओं में भी है मां दुर्गा की आराधना
Published / 2026-10-17 20:53:04
तुलसीदास की रचनाओं में भी है मां दुर्गा की आराधना

डॉ हराधन कोईरी एबीएन एडिटोरियल डेस्क। शारदीय नवरात्र में सभी भक्तगण माता की पूजा हेतु तैयारी में तन, मन से जुटे हुए हैं। नवरात्र में देवी दुर्गा के नौ रुपों की पूजा-उपासना की जाती है। देवी का पहला स्वरूप शैलपुत्री का है। दूसरा का नाम ब्रह्मचारिणी है। तीसरा स्वरूप चन्द्रघण्टा के नाम से प्रसिद्ध है। चौथा स्वरूप को कूष्माण्डा कहते हैं। पांचवां का नाम स्कन्दमाता है। देवी के छठे स्वरूप को कात्यायनी कहते हैं। सातवां कालरात्रि और आठवां स्वरूप  महागौरी के नाम से जाना जाता है।भगवती का नौवां स्वरूप सिद्धिदात्री के नाम से जगत विख्यात है। भगवती दुर्गा के इन नौ स्वरूपों को इस श्लोक के माध्यम से जाना जा सकता है- प्रथमं शैलपुत्री च द्वितीयं  ब्रह्मचारिणी। तृतीयं चन्द्रघण्टेति कूष्माण्डेति चतुर्थकम्।। पञ्चमं स्कन्दमातेति षष्ठं कात्यायनीति च। सप्तमं कालरात्रीति महागौरीति चाष्टमम्। । नवमं सिद्धिदात्री च नवदुर्गा: प्रकीर्तिता:। भगवती जगदम्बा का पूजन प्रत्येक नर-नारी को करना चाहिए। उनके पूजन से मनुष्य धर्म,अर्थ,काम और मोक्ष को प्राप्त कर सकते हैं। श्रीमद्देवीभागवत पुराण के अनुसार चारों वर्ण के स्त्री- पुरुष एवं चारों आश्रम के लोग उनकी सेवा करने के अधिकारी हैं। साथ ही शाक्त के अतिरिक्त शैव,वैष्णव,सूयोर्पासक और गणेशोपासक सभी इनकी आराधना कर परम शांति को प्राप्त कर सकते हैं। भेद कहीं है तो केवल मनुष्य के मस्तिष्क में।  महाकवि तुलसीदास उदार हृदय संपन्न विराट समन्वयवादी कवि थे। उनकी उदारता का सबसे बड़ा प्रमाण उनकी विनय पत्रिका है। विनय पत्रिका में सभी देवी-देवता की स्तुति करते हैं और उनसे राम की निश्चल भक्ति मांगते हैं। इस क्रम में वे भवानी से कहते हैं-  जय जय जगजननि देवि सुर-नर मुनि-असुर-सेवि, भुक्ति-मुक्ति-दायिनी,भय-हरणि कालिका।  मंगल-मुद-सिद्धि-सदनि,पर्वशर्वरीश-वदनि, ताप-तिमिर-तरुण-तरणि-किरणमालिका ।। तुलसीदास कहते हैं कि हे जगत् की माता! हे देवि ! तुम्हारी जय हो, जय हो। देवता, मनुष्य, मुनि और असुर सभी तुम्हारी सेवा करते हैं। तुम भोग और मोक्ष को देने वाली हो। भक्तों के भय को दूर करने के लिए तुम कालिका हो। तुम कल्याण करने वाली हो सुख-समृद्धि का घर हो। तुम ही आध्यात्मिक, आधिभौतिक और आधिदैविक ताप को दूर करने वाली हो। इसलिए हे शिवे! तुम्हारी जय हो। तुम्हारे अनेक नाम और रुप हैं। तुम समस्त संसार की स्वामिनी हो। हिमाचल की कन्या हो। हे शरणागत की रक्षा करने वाली माता! मेरी रक्षा करो -- जय महेश भामिनी, अनेक-रुप-नामिनी, समस्त-लोक-स्वामिनी,  हिमशैल-बालिका। रघुपति-पद परम प्रेम, तुलसी यह अचल नेम, देहु ह्वै प्रसन्न पाहि प्रणत-पालिका ।। तुलसीदास मां जगदम्बा से विनती करते हुए कहते हैं - तुम रुप, सुख और शील की सीमा हो, दुष्ट के लिए तुम भयानक रुप धारण करने वाली हो। तुम्हीं लक्ष्मी,तुम्हीं पार्वती और तुम्हीं श्रेष्ठ बुद्धि वाली सरस्वती हो। हे जगजननि! तुम कार्तिकेय और गणेश की माता हो और शिव की गृहिणी हो। हे भवानी!तुम्हारी जय हो, जय हो-- रुप-सुख-शील-सीमाऽसि,भीमाऽसि, रामाऽसि,वामाऽसि बर बुद्धि बानी। छमुख-हेरम्ब-अंबासि, जगदंबिका, शंभु-जायासि जय जय भवानी।।  आगे वे कहते हैं तुम्हीं ने चण्ड दानव को और महिषासुर को मारने वाली हो। मुण्ड दानव के घमंड को तोड़ने वाली हैं। शुम्भ-निशुम्भ को मारने वाली हो। तुमने अपने क्रोध रुपी समुद्र में शत्रु के दल-के -दल को डुबो दिये हैं। वेद,शास्त्र एवं शेषजी भी आपकी महिमा का गुणगान करके पार नहीं पाते हैं- निगम-आगम-अगम गुर्वि! तव गुन-कथन, उर्विधर करत जेहि सहसजीहा।। हे अम्बिके! आप ही इस मोहमय भवसागर से मेरी रक्षा कर सकती हो। आप सर्वार्थ दायिनी हैं, कल्याणी हैं। इस प्रकार तुलसी ने दो ही पदों में मनुष्य के सांसारिक भव-बाधा को उपस्थित किया है। मानव जाति का कल्याण भगवती जगदम्बा की कृपा से ही हो सकती है। इसलिए, आइए! हम सब मिलकर भगवती से वैश्विक कल्याण की कामना करें! (लेखक गोस्नर कॉलेज रांची हिंदी विभाग के विभागाध्यक्ष हैं। निवास चोगा, सोनाहातू, रांची)

वंदे मातरम, भारत माता की जय
Published / 2026-10-17 14:35:54
वंदे मातरम, भारत माता की जय

वंदे मातरम, भारत माता की जयत्रिवेणी दाससबसे बड़ी आबादी वाला देश भारतजनसंख्या...१५० करोड़ लगभग२८ राज्य ८ केंद्र शासित प्रदेश क्षेत्रफल 32,87,263 वर्ग किलोमीटरशासन व्यवस्था... लोकतंत्रअभिव्यक्ति की आजादी, हर राज्य के अलग भाषा एक राज्य में अनेक भाषा, 10 कोस में पानी एवं भाषा अलग-अलग।चीन 142 करोड़शासन व्यवस्था.. एकदलीय सत्तावादीभारत को संभालने, जनजीवन को संचालित करने, राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए, दुनिया के कठिन प्रतिस्पर्धा में आगे रहने के लिए, अनेक विघ्न, बाधा एवं विरोध के सामने स्थिर दृढ़प्रतिज्ञ दूरदर्शी व्यक्तित्व का होना अति आवश्यक है; ऐसे व्यक्तित्व का चुनाव करके देश की जनता ने राष्ट्र प्रथम की भावना को प्रबल किया है। 

भारतीय सांस्कृतिक चेतना में शक्ति-साधना, नारी-सम्मान और राष्ट्र-निर्माण
Published / 2026-10-15 20:59:10
भारतीय सांस्कृतिक चेतना में शक्ति-साधना, नारी-सम्मान और राष्ट्र-निर्माण

शिवानन्द उपाध्याय  एबीएन एडिटोरियल डेस्क। भारत की सांस्कृतिक चेतना में शक्ति की आराधना का एक अत्यंत विशिष्ट और सनातन स्थान रहा है। शक्ति-उपासना का महापर्व नवरात्रि केवल एक धार्मिक अनुष्ठान या परंपरा मात्र नहीं है, बल्कि यह भारतीय संस्कृति में सृजन, संरक्षण, आत्म-शुद्धि और अन्याय के विरुद्ध प्रतिकार की भावना को अभिव्यक्त करने वाला एक कालजयी पर्व है। शक्ति के बिना जीवन की कल्पना भी संभव नहीं है; क्योंकि शक्ति ही सर्वत्र व्याप्त रहकर जड़ में चेतना का संचार करती है, संकल्प को सामर्थ्य प्रदान करती है और साधना को सिद्धि तक पहुंचाती है। प्रकृति के विविध रूपों से लेकर मनुष्य की अंतर्निहित क्षमताओं और संभावनाओं तक, शक्ति की सर्वव्यापी अभिव्यक्ति हर ओर दिखाई देती है। नवरात्रि के प्रारंभ में किया जाने वाला घटस्थापना का विधान और बीजों का अंकुरण नवजीवन, नयी आशाओं और सृजनशीलता का अनुपम प्रतीक है। भारतीय दर्शन का महान सूत्र एकोऽहं बहुस्याम् (मैं एक हूं, बहुरूप हो जाऊं) एक ईश्वरीय शक्ति से अनेक की अभिव्यक्ति के विचार को रेखांकित करता है। देवी के विभिन्न रूप हमें जीवन के गूढ़ संदेश देते हैं—महादुर्गा जहां असीम सामर्थ्य और पराक्रम की प्रतीक हैं, वहीं माता सिद्धिदात्री साधना के फलीभूत होने तथा सिद्धि का संदेश देती हैं। इनकी उपासना वास्तव में विवेक, शक्ति और साधना के अद्भुत समन्वय की प्रेरणा है। नवरात्रि पर्व की वास्तविक सार्थकता केवल देवी की प्रतिमा के सम्मुख नतमस्तक होने में निहित नहीं है, बल्कि अपने भीतर छुपे अज्ञान, अहंकार, आसुरी प्रवृत्तियों और दुर्गुणों पर विजय प्राप्त करने में है। जब शक्ति करुणा से जुड़ती है, ज्ञान विवेक से परिमार्जित होता है और साधना उदात्त लोक-कल्याणकारी संकल्पों से अनुप्राणित होती है, तभी व्यक्ति का वास्तविक उत्थान, समाज का परिष्कार और राष्ट्र का उत्कर्ष संभव हो पाता है। भारतीय परंपरा में यह मान्यता रही है कि जब-जब आसुरी शक्तियों के अत्याचार से मानवता, समाज और संस्कृति संकटापन्न होती है, तब-तब शक्ति का अवतरण होता है। आधुनिक परिवेश में शाब्दिक या भौतिक अर्थों में शक्ति का अवतरण संभव नहीं है, बल्कि अपने भीतर ही शक्ति का संधान और उसे जागृत करना संभव है। जब भारत पराधीनता की बेड़ियों में जकड़ा हुआ था, तब भारतेंदु हरिश्चंद्र से लेकर मैथिलीशरण गुप्त, सूर्यकांत त्रिपाठी निराला और जयशंकर प्रसाद जैसे महान साहित्यकारों ने देश की जनता को अपनी अंतर्निहित शक्तियों को साधने, उनकी आराधना करने और उनका समन्वय करने का बार-बार आह्वान किया था।उनका यह आह्वान व्यक्तिगत और सामूहिक दोनों स्तरों पर था। यह इस बात का प्रतीक है कि हमें केवल अपने बाहर स्थित असुर भाव को नष्ट करना आवश्यक नहीं है, बल्कि अपने भीतर छिपे असुर यानी दुष्प्रवृत्तियों को भी समूल नष्ट करना होगा। निराला की कालजयी कविता राम की शक्ति पूजा में श्री राम द्वारा अनन्य समर्पण के साथ शक्ति की कठिन साधना के बाद ही महाशक्ति उन्हें "होगी जय, होगी जय, हे पुरुषोत्तम नवीन" का आश्वस्तकारी वरदान देती है। वस्तुत: शक्ति मनुष्य के भीतर ही समाहित वह ऊर्जा है, जिसे यदि सही अर्थों में पहचाना और जगाया जाये, तो मनुष्य हर पल अपने भीतर की कुंठाओं और दुर्गुणों पर विजय प्राप्त कर सकता है। नवरात्रि में शक्ति की उपासना से हमें व्यक्तिगत और सामाजिक स्तर पर अपनी दूषित मानसिकता को समाप्त करना होगा; इसके बिना समाज में खुलेआम घूम रहे आधुनिक महिषासुरों का संहार संभव नहीं है। यह तभी संभव होगा जब हम नवरात्रि के उपवास और उपासना के बहाने अपनी दुष्प्रवृत्तियों को त्यागकर आत्मिक शुद्धि करें तथा अपनी जीवनशैली में सकारात्मक सुधार लायें। नवरात्रि की उपासना शरीर और आत्मा के बीच एक रागात्मक संबंध स्थापित करती है। यह केवल ईश्वर के प्रति अंध-समर्पण नहीं, बल्कि स्वयं को अनुशासित और संयमित करने का आध्यात्मिक संधान है। नवरात्रि के अंतिम चरण में सिद्धि का विशेष महत्त्व बताया गया है। सामान्य अर्थों में सफलता का तात्पर्य मनोनुकूल परिणाम प्राप्त करना है, जबकि सिद्धि का व्यापक अर्थ व्यक्तिगत स्वार्थ से ऊपर उठकर लोकमंगल और समाज-सेवा के लिए समर्पित होना है। निष्काम साधना, कड़ा अनुशासन और उदात्त संकल्पों से प्राप्त सामर्थ्य ही व्यक्ति को समाज, राष्ट्र और समग्र मानवता के कल्याण की दिशा में प्रेरित करता है। माता सिद्धिदात्री की आराधना हमें अपनी व्यक्तिगत क्षमताओं को लोकमंगल में लगाने की पावन प्रेरणा देती है। राष्ट्रोत्थान, सांस्कृतिक चेतना के पुनर्जागरण, सामाजिक समरसता और विश्व-कल्याण के लिए ज्ञान, विवेक और निरंतर साधना अनिवार्य हैं। इसके साथ ही, समाज में प्रचलित विभिन्न विचारधाराओं का मूल्यांकन पूर्वाग्रहों से ग्रस्त होकर नहीं, बल्कि उनके सिद्धांतों, व्यावहारिक आचरण और सामाजिक प्रभावों के निष्पक्ष आधार पर किया जाना चाहिए। नवरात्रि की सप्तमी तिथि को पूजित माता कालरात्रि हमें यह स्मरण कराती हैं कि अन्याय और अत्याचार का निर्भीकता से प्रतिरोध करना अत्यंत आवश्यक है। यद्यपि अहिंसा भारतीय चिंतन का एक परम आदर्श है, किंतु अहिंसा का अर्थ अन्याय के समक्ष कायरतापूर्वक निष्क्रिय बने रहना कदापि नहीं है। वास्तविक अहिंसा का अर्थ विवेक, संयम और अदम्य साहस के साथ अत्याचार का प्रतिरोध करना और समाज में न्याय की स्थापना करना है। नवरात्रि में कन्या-पूजन केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि नारी के सामर्थ्य, स्वाभिमान और सम्मान के प्रति आदर व्यक्त करने का प्रतीक है। ईश्वर की मातृरूप में अवधारणा मानव मन में करुणा, स्नेह और संरक्षण की भावना को सुदृढ़ करती है। यह परंपरा रेखांकित करती है कि स्त्री केवल परिवार का आधार नहीं, बल्कि समाज और राष्ट्र-निर्माण में समान रूप से महत्त्वपूर्ण भागीदार है। किंतु विडंबना यह है कि जिस समाज में कन्या को देवी तुल्य पूजा जाता है, वहीं महिलाओं के विरुद्ध हिंसा, उत्पीड़न और अपराध निरंतर बढ़ रहे हैं। हमारी धार्मिक आस्था और सामाजिक व्यवहार के बीच का यह विरोधाभास हमारी सामूहिक चेतना पर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़ा करता है। संवेदनशीलता में कमी और विकृत मानसिकता के कारण सैद्धांतिक मान्यताओं और वास्तविक आचरण में खाई चौड़ी होती जा रही है। स्वामी विवेकानंद ने कहा था— किसी राष्ट्र की प्रगति का सर्वोत्तम थमार्मीटर वहां की महिलाओं की स्थिति है। जिस समाज में स्त्रियों को सुरक्षा, सम्मान और समान अवसर मिलते हैं, वही वास्तव में समृद्ध बनता है। महिला सुरक्षा और गरिमा सुनिश्चित करना आज एक प्रमुख सामाजिक चुनौती है। फिल्मों, संगोष्ठियों और सम्मेलनों में इस पर औपचारिक चर्चा करना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि इस विचार को हमारे दैनिक व्यवहार और सोच में उतरना होगा।अपराधों की रोकथाम केवल पुलिस और प्रशासन का दायित्व नहीं है; जब तक व्यापक सामाजिक चेतना और नागरिक सहभागिता नहीं होगी, तब तक एक सुरक्षित और सशक्त भारत का निर्माण संभव नहीं है। अत: आइये, इस नवरात्रि हम केवल देवी की कर्मकांडीय आराधना तक स्वयं को सीमित न रखें, बल्कि उनके उदात्त आदर्शों को अपने जीवन का मूल संकल्प बनायें। ज्ञान के प्रकाश से अज्ञान का, विवेक से अंधविश्वास का, साहस से भय का और न्याय से अन्याय का डटकर प्रतिकार करें। अपने भीतर की छिपी हुई शक्ति को पहचानें और उसे केवल आत्मकल्याण तक सीमित न रखकर समाज और राष्ट्र के नवनिर्माण में लगायें। यही सच्ची साधना है, यही वास्तविक सिद्धि है और यही मां दुर्गा की आराधना का सच्चा व व्यापक अर्थ है। जब प्रत्येक नागरिक अपने भीतर की आसुरी प्रवृत्तियों पर विजय प्राप्त कर मानवीय मूल्यों को सहर्ष अपनायेगा, तभी एक सशक्त, समरस, संवेदनशील, समृद्ध और आत्मनिर्भर भारत का स्वप्न साकार होगा।

क्या मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाना इतना सरल है?
Published / 2026-10-15 18:03:59
क्या मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाना इतना सरल है?

त्रिवेणी दास एबीएन एडिटोरियल डेस्क। देश में इं.डि.या. गठबंधन और कॉकरोच पार्टी मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने या उन्हें त्यागपत्र देने के लिए कांग्रेस के नेतृत्व में सड़कों पर आंदोलन चला रहा है।  मुख्य चुनाव की नियुक्ति राष्ट्रपति के द्वारा की जाती है। देश का प्रधानमंत्री, सदन में विपक्ष का नेता या विपक्ष के सबसे बड़े दल का नेता और प्रधानमंत्री के द्वारा नियुक्त कोई एक कैबिनेट मंत्री के द्वारा सामूहिक निर्णय से मुख्य चुनाव आयुक्त के लिए राष्ट्रपति के पास सुझाव प्रस्तुत किया जाता है उसके आधार पर राष्ट्रपति मुख्य चुनाव आयुक्त की नियुक्ति करते हैं। मुख्य चुनाव आयुक्त या मुख्य न्यायाधीश को सड़क में आंदोलन करके नहीं हटाया जा सकता है, इसके लिए पार्लियामेंट में महाभियोग का प्रस्ताव लाना पड़ता है। महाभियोग एक ऐसी संवैधानिक प्रक्रिया है जिसके माध्यम से किसी देश के उच्च पद पर बैठे सार्वजनिक अधिकारी (जैसे राष्ट्रपति, न्यायाधीश आदि) पर कदाचार, संविधान के उल्लंघन या गंभीर अपराधों के आरोप लगाए जाते हैं और उन्हें पद से हटाया जाता है। भारत में महाभियोग चलाने की प्रक्रिया भारत का संविधान के अनुच्छेद 61 में दी गयी है। लोकसभा में और राज्यसभा में प्रस्ताव लाने के लिए सांसदों की संख्या निर्धारित होती है जो लगभग एक चौथाई के बराबर है। बिल पास करने के लिए टू थर्ड 2/3 मेजॉरिटी आवश्यक है। महाभियोग लाने के लिए लोकसभा में 100 सांसदों की हस्ताक्षर चाहिए और राज्यसभा में 50 सांसदों कम से कम का हस्ताक्षर चाहिए। सर्वोच्च न्यायालय मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने पर विचार कर ही नहीं सकती है। संसद के दोनों सदनों से महाभियोग का बिल पास होने पर राष्ट्रपति मुख्य चुनाव आयुक्त को उनके पद से रिमूव कर सकते हैं।  दुनिया भर में फैला एक इको सिस्टम है, जो भारत को डिस्टर्ब करके रखना चाहता है। भारत की तरक्की, आर्थिक उन्नति, आत्मनिर्भरता दुनिया भर में प्राप्त हो रहे प्रतिष्ठा इत्यादि को वे विखंडित करने का प्रयास करते रहते हैं। ध्रुव राठी एक यूट्यूबर है। हरियाणा में जन्म लिया और अभी जर्मनी के बर्लिन में रहता है। सोशल मीडिया के माध्यम से भारत के खिलाफ झूठी खबरें फैलाता रहता है। इस प्रकार के अनेक लोग विदेश में बैठकर भारत के खिलाफ षड्यंत्र करते रहते हैं। उनके इकोसिस्टम में भारत के भी कुछ लोग स्वार्थवश शामिल हो जाते हैं। लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष कांग्रेस के राहुल गांधी ने कहा है कि मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने का उनके आंदोलन का कोई समय सीमा नहीं है, वर्षों तक चलाया जा सकता है। अब देखना दिलचस्प होगा कि विपक्ष मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के विरुद्ध संसद में महाभियोग कब लाता है और लाता भी है कि नहीं? 

आखिर भारत के आसमान पर अधिकार किसका है?
Published / 2026-10-12 20:45:33
आखिर भारत के आसमान पर अधिकार किसका है?

कैलाश चन्द्र एबीएन एडिटोरियल डेस्क। दुनिया में तकनीकी प्रतिस्पर्धा अब बाजार, उत्पाद और ग्राहकों तक सीमित नहीं रह गई है। आज संचार नेटवर्क, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, सेमीकंडक्टर, अंतरिक्ष और डिजिटल आधारभूत संरचना पर नियंत्रण किसी भी राष्ट्र की आर्थिक शक्ति, सामरिक सुरक्षा और नीतिगत स्वायत्तता को प्रभावित करता है। ऐसे समय में भारत के प्रस्तावित लो-अर्थ-आॅर्बिट (एलईओ) सैटेलाइट नेटवर्क और एलन मस्क की कंपनी स्टारलिंक के बीच उभरती प्रतिस्पर्धा को इंटरनेट सेवा की लड़ाई भर समझना अधूरा होगा। इसके केंद्र में बाजार के साथ तकनीकी क्षमता, नियामक व्यवस्था, राष्ट्रीय सुरक्षा और डिजिटल संप्रभुता के प्रश्न भी हैं। वैश्विक बाजारवादी शक्तियों का सीधे हस्तक्षेप है। देखा जाये तो अक्टूबर 2026 में भारत में स्टारलिंक की मंजूरी और प्रतिस्पर्धा को लेकर मस्क की तीखी सार्वजनिक टिप्पणियों ने इस बहस को नया आयाम दिया है। दूसरी ओर, रिलायंस जियो की प्रस्तावित सैटेलाइट योजना से जुड़े आंकड़े भारतीय अंतरिक्ष एवं दूरसंचार क्षेत्र की संभावनाओं की ओर संकेत करते हैं। इस पूरे घटनाक्रम को समझने के लिए पुष्ट तथ्यों, प्रस्तावित योजनाओं और उनके आधार पर निकाले जा रहे निष्कर्षों के बीच स्पष्ट अंतर रखना आवश्यक है। साथ ही, वैश्विक शक्तियों के दबाव और भारत की तकनीकी आत्मनिर्भरता के प्रश्नों का अध्ययन भी जरूरी है। इंटरनेट की लड़ाई अब धरती से अंतरिक्ष तक अब तक भारत में इंटरनेट का विस्तार मुख्यत: मोबाइल टावरों, आॅप्टिकल फाइबर और स्थलीय दूरसंचार नेटवर्क के माध्यम से हुआ है। इन माध्यमों ने शहरों से लेकर गांवों तक कनेक्टिविटी पहुंचाने में बड़ी भूमिका निभाई है। फिर भी देश के अनेक दुर्गम पहाड़ी क्षेत्रों, द्वीपों, सीमावर्ती चौकियों और विरल आबादी वाले इलाकों में विश्वसनीय इंटरनेट उपलब्ध कराना कठिन और महंगा हो सकता है। सैटेलाइट इंटरनेट इस चुनौती का एक विकल्प है। इसमें पृथ्वी की निचली कक्षा में स्थापित उपग्रहों के माध्यम से डेटा का संचार किया जाता है। एलईओ उपग्रह पृथ्वी के अपेक्षाकृत निकट होते हैं, इसलिए पारंपरिक भूस्थिर उपग्रहों की तुलना में कम विलंबता वाली कनेक्टिविटी उपलब्ध कराने की क्षमता रखते हैं। यही कारण है कि एलन मस्क की स्टारलिंक, अमेजन की अमेजन लियो और अन्य कंपनियां इस क्षेत्र में निवेश कर रही हैं। भारत में जियो और भारती समूह से जुड़ी वनवेब की योजनाएं इस प्रतिस्पर्धा को एक अलग राष्ट्रीय एवं औद्योगिक संदर्भ प्रदान करती हैं। अब यहां प्रश्न इंटरनेट उपलब्ध कराने वाली कंपनी तक सीमित नहीं है। नेटवर्क का स्वामित्व किसके पास होगा, उसका संचालन किसके नियंत्रण में रहेगा, डेटा और संचार की सुरक्षा कैसे सुनिश्चित होगी तथा संकट के समय उस पर किसका प्रभावी नियंत्रण होगा, ये सभी विषय भारत की डिजिटल संप्रभुता से सीधे जुड़े हैं। जियो की योजना : 1,600 उपग्रहों से जुड़ी महत्वाकांक्षा मध्य-2026 की रिपोर्टों में रिलायंस जियो की लगभग 1,600 से 1,650 लो-अर्थ-आॅर्बिट उपग्रहों वाली प्रस्तावित योजना का उल्लेख किया गया है। इसके साथ भारत में लगभग 20 से 23 ग्राउंड स्टेशन स्थापित करने की योजना की भी चर्चा हुई है। इस तरह के नेटवर्क का उपयोग कई क्षेत्रों में हो सकता है। दूरदराज के गांवों और द्वीपों तक ब्रॉडबैंड पहुंचाना, सीमावर्ती क्षेत्रों में संचार संपर्क मजबूत करना, मोबाइल नेटवर्क के लिए बैकहॉल कनेक्टिविटी उपलब्ध कराना तथा आपदा के समय स्थलीय नेटवर्क बाधित होने पर वैकल्पिक संचार देना इसके प्रमुख संभावित उपयोग हैं। उपयुक्त तकनीकी और नियामक व्यवस्था के अंतर्गत मोबाइल सैटेलाइट सेवाओं तथा डायरेक्ट-टू-डिवाइस कनेक्टिविटी की संभावनाएं भी विकसित की जा सकती हैं। इससे एक बात स्पष्ट है कि यदि भारत में घरेलू कंपनी अपनी प्रस्तावित अंतरिक्ष-आधारित संचार क्षमता को सफलतापूर्वक विकसित कर पाती है, तो इससे देश के दूरसंचार और अंतरिक्ष उद्योग को नई संभावनाएं मिल सकती हैं। मीडिया रिपोर्टों में जियो की परीक्षण उड़ान के लिए सितंबर 2027 का लक्ष्य तथा 2028 के आसपास शुरूआती कवरेज के लिए लगभग 90 से 100 उपग्रहों की योजना का उल्लेख किया गया है। आगे 2030 तक 400 से 450 और 2035 तक लगभग 1,600 उपग्रहों की तैनाती का लक्ष्य बताया गया है। फिर भी अंतरिक्ष परियोजनाओं में उपग्रह निर्माण, प्रक्षेपण की उपलब्धता, कक्षीय तैनाती, ग्राउंड स्टेशन, नियामक स्वीकृतियां और नेटवर्क परीक्षण एक-दूसरे से जुड़े होते हैं। इनमें किसी भी स्तर पर देरी होने से पूरे कार्यक्रम की समयरेखा प्रभावित हो सकती है। इसके बावजूद, दीर्घकालीन योजना का महत्व कम नहीं होता। यदि भारत में निजी क्षेत्र अंतरिक्ष-आधारित संचार नेटवर्क विकसित करने में सफल होता है, तो देश की तकनीकी क्षमता, औद्योगिक आपूर्ति-शृंखला और भविष्य की संचार जरूरतों के लिए विकल्प बढ़ सकते हैं। यही वह क्षेत्र है, जहां प्रतिस्पर्धा का वास्तविक परिणाम किसी एक कंपनी की जीत या हार से नहीं, बल्कि भारत में निर्मित तकनीकी क्षमता और उपभोक्ताओं को मिलने वाले लाभ से मापा जाना चाहिए। रक्षा पेलोड और राष्ट्रीय सुरक्षा का प्रश्न इस पूरे घटनाक्रम का सबसे संवेदनशील पक्ष रक्षा और सामरिक संचार से जुड़ा है। जियो के कुछ प्रस्तावित उपग्रहों पर रक्षा संबंधी पेलोड लगाने की संभावना पर सरकारी स्तर पर चर्चा का उल्लेख किया गया है। यदि ऐसी व्यवस्था विकसित होती है और उसे आवश्यक स्वीकृतियां मिलती हैं, तो इससे सुरक्षित संचार, सीमावर्ती क्षेत्रों में संपर्क और कुछ सामरिक आवश्यकताओं के लिए अतिरिक्त विकल्प उपलब्ध हो सकते हैं। इस विषय का एक पक्ष यह भी है कि किसी भारतीय कंपनी का उपग्रह नेटवर्क अपने आप भारतीय सशस्त्र बलों का स्वीकृत सैन्य संचार नेटवर्क नहीं बन जाता। इसके लिए सुरक्षा परीक्षण, तकनीकी एकीकरण, परिचालन प्रोटोकॉल और संबंधित सरकारी अनुमतियां आवश्यक होंगी। फिर भी, यह विषय एक बुनियादी प्रश्न उठाता है, क्या भारत को अपनी सामरिक संचार आवश्यकताओं के लिए विदेशी कंपनियों पर निर्भर रहना चाहिए? इसका उत्तर राष्ट्रीय हितों और व्यावहारिक आवश्यकताओं के संतुलन में तलाशना होगा। भारत को विदेशी तकनीक और वैश्विक सहयोग से लाभ उठाने में कोई संकोच नहीं होना चाहिए, लेकिन जहां महत्वपूर्ण राष्ट्रीय सुरक्षा का प्रश्न हो, वहां अपने विकल्प, तकनीकी क्षमता और निर्णय लेने की स्वतंत्रता विकसित करना भी जरूरी है। यही डिजिटल संप्रभुता का सार है। वस्तुत: डिजिटल संप्रभुता का अर्थ दुनिया से कट जाना नहीं, बल्कि दुनिया से जुड़ते हुए अपने महत्वपूर्ण निर्णय स्वयं लेने की क्षमता बनाए रखना है। भारत के लिए निर्णायक प्रश्न जियो की प्रस्तावित योजना भारत के अंतरिक्ष-आधारित संचार क्षेत्र में घरेलू तकनीकी क्षमता विकसित करने की महत्वाकांक्षा को सामने रखती है। इसके सफल क्रियान्वयन से दूरसंचार, उपग्रह निर्माण, औद्योगिक आपूर्ति-शृंखला और सामरिक संचार के क्षेत्र में नए अवसर पैदा हो सकते हैं। भारत के लिए आवश्यक है कि वह घरेलू तकनीकी क्षमता का विस्तार करे, राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े मानकों को मजबूत रखे और अंतरराष्ट्रीय सहयोग के अवसरों का विवेकपूर्ण उपयोग करे। भारत के आसमान में स्थापित होने वाले उपग्रहों का महत्व उनकी संख्या से आगे जाता है। असली प्रश्न यह है कि इस तकनीक के संचालन, सुरक्षा और भविष्य की दिशा तय करने में भारत की भूमिका कितनी प्रभावी होगी। यही प्रश्न आने वाले वर्षों में भारत की डिजिटल संप्रभुता और सामरिक आत्मनिर्भरता की कसौटी बनेगा। आज एलन मस्क की कंपनी स्टारलिंक की समस्या ही यही है, वह भारत में इंटरनेट सेवा तो आरंभ करना चाहती है, किंतु हर भारतीय का डेटा सुरक्षित रहे, यदि कोई भी भारत से बाहर या अंदर संवाद करता है, तो उसकी जरूरत पड़ने पर सरकार को जानकारी रहे, यह सुनिश्चित करना नहीं चाहती, ऐसे में भला अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा से कैसे कोई सरकार समझौता कर सकती है? इसलिए स्वदेशी को ही हमें चुनना चाहिए, जहां विश्वास बरकरार है। (लेखक, सामाजिक कार्यकर्ता एवं वरिष्ठ स्तंभकार हैं।)

दिशोम गुरु की ढाल थीं रूपी सोरेन!
Published / 2026-10-11 18:42:26
दिशोम गुरु की ढाल थीं रूपी सोरेन!

दिशोम गुरु की ढाल थीं रूपी सोरेन: संघर्ष की वह कहानी जो इतिहास के पन्नों में पीछे छूट गईयशराज सिंहएबीएन एडिटोरियल डेस्क। झारखंड के आंदोलन का इतिहास दिशोम गुरु शिबू सोरेन के नाम के बिना अधूरा लगता है, पर उनकी पत्नी रूपी सोरेन के संघर्ष से शायद ही झारखंडवासी अवगत हैं, जबकि रूपी सोरेन ने कठिन से कठिन परिस्थितियों में उनका साथ निभाया था। रूपी सोरेन के निधन के साथ केवल एक परिवार ने अपनी मां को नहीं खोया है, बल्कि झारखंड आंदोलन के एक ऐसे मौन अध्याय का भी अंत हुआ है, जिसकी चर्चा सार्वजनिक इतिहास में अपेक्षाकृत कम हुई है। दिशोम गुरु शिबू सोरेन के पिता सोबरन सोरेन गांधीवादी विचारधारा से प्रभावित शिक्षक थे और महाजनी शोषण के विरोध के लिए जाने जाते थे। रूपी सोरेन उनकी एक प्रिय छात्रा थीं, जो बचपन से ही निडर, साहसी और होशियार थीं। शायद यही कारण था कि सोबरन सोरेन की इच्छा थी कि रूपी सोरेन उनके घर की बहू बनें। शिबू सोरेन और रूपी सोरेन का विवाह छोटी उम्र में ही करा दिया गया था। वर्ष 1957 में सोबरन सोरेन की हत्या ने किशोर शिबू सोरेन के जीवन की दिशा बदल दी। इसके बाद उन्होंने अपने पिता के आदर्शों से प्रभावित होकर महाजनी प्रथा, आदिवासी शोषण, हड़िया-शराब, आदिवासियों में व्याप्त अंधविश्वास और सामाजिक बुराइयों के विरुद्ध संघर्ष शुरू किया। रूपी सोरेन का जीवन भी इसी संघर्ष के बीच आकार ले रहा था। शिबू सोरेन की पत्नी के रूप में रूपी सोरेन ने केवल परिवार की जिम्मेदारी नहीं संभाली, बल्कि उनके संघर्षपूर्ण राजनीतिक जीवन में निरंतर उनका साथ दिया। उनके जीवन से जुड़ा एक प्रसंग विशेष रूप से सामने आता है। जब शिबू सोरेन पहली बार जेल गए थे, तब परिवार आर्थिक कठिनाइयों से गुजर रहा था। इसी दौरान एक महाजन बिस्तु साव उनके खेत की फसल काटने पहुंचा। परिवार की ओर से तत्काल कोई विरोध न देखकर रूपी सोरेन ने स्वयं प्रतिरोध करने का निर्णय लिया। उन्होंने धान काटने वाले औजार हंसुआ को हाथ में लिया और महाजन को खेत से बाहर जाने के लिए मजबूर कर दिया। यह प्रसंग केवल एक खेत की रक्षा का प्रसंग नहीं था; यह उस साहस का उदाहरण था, जिसके साथ रूपी सोरेन ने अपने परिवार और अपने पति के संघर्ष को संभाला। शिबू सोरेन के जेल में रहने के दौरान परिवार की आर्थिक स्थिति इतनी कठिन हो गई थी कि उनकी जमानत के लिए भी पर्याप्त साधन उपलब्ध नहीं थे। ऐसे समय में रूपी सोरेन ने अपने मायके से सहायता लेने का प्रयास किया। जेल में कमजोर हो चुके शिबू सोरेन की उन्होंने दिन-रात सेवा की और उन्हें स्वस्थ किया। लेकिन वह जानती थीं कि उनके स्वस्थ होते ही वह फिर झारखंड के आदिवासियों के अधिकारों के संघर्ष में लौट जाएंगे। 1970 के दशक में शिबू सोरेन का संघर्ष और अधिक कठिन दौर में पहुंचा। टुंडी और पारसनाथ की पहाड़ियों का क्षेत्र उनके आंदोलन का महत्वपूर्ण केंद्र बना। महाजनों और साहूकारों के खिलाफ आदिवासियों को संगठित करने और उनके अधिकारों के लिए धान कटनी आंदोलन चलाने के कारण उन्हें लंबे समय तक भूमिगत रहना पड़ा। इस दौर में रूपी सोरेन के सामने दोहरी चुनौती थी—एक ओर पति की सुरक्षा की चिंता और दूसरी ओर परिवार की जिम्मेदारी। जब पुलिस शिबू सोरेन के बारे में पूछताछ करने घर आती थी, तब रूपी सोरेन उनका सामना करने से पीछे नहीं हटती थीं। पुलिस की ओर से शिबू सोरेन को मुठभेड़ में मार दिए जाने की धमकी भी दी जाती थी। ऐसे कठिन समय में स्वयं को संभालने के साथ-साथ रूपी सोरेन ने परिवार को भी मजबूती से थामे रखा। यहां तक कि शिबू सोरेन की तलाश में वह अपनी सास और ननद के साथ टुंडी के जंगलों तथा पारसनाथ की पहाड़ियों तक जाती थीं। उस समय उनकी गोद में उनके छोटे बच्चे भी होते थे। वर्ष 1999 में रूपी सोरेन ने दुमका लोकसभा सीट से बाबूलाल मरांडी के खिलाफ चुनाव भी लड़ा। हालांकि वह बाबूलाल मरांडी से पांच हजार से भी कम मतों के अंतर से चुनाव हार गईं, लेकिन रूपी सोरेन भी दिशोम गुरु के सिद्धांतों में विश्वास करती थीं। वह किसी विशेष जाति या जनजाति के कल्याण के बजाय झारखंड के सभी निवासियों के कल्याण की समर्थक थीं। हालांकि, दिशोम गुरु शिबू सोरेन की खराब होती स्वास्थ्य स्थिति के कारण रूपी सोरेन ने कोई और चुनाव नहीं लड़ा और अपना जीवन उनकी देखभाल में समर्पित कर दिया। वर्ष 2024 में जब हेमंत सोरेन की सरकार बनी, तब एक साक्षात्कार में उन्होंने सरकार से झारखंड के हर निवासी के विकास का भरोसा जताया था। इतिहास अक्सर आंदोलन के नेताओं के नाम याद रखता है, लेकिन उन परिवारों और विशेषकर उन महिलाओं के संघर्ष को दर्ज नहीं कर पाता, जिन्होंने उस आंदोलन को अपने निजी जीवन की खुशियों के बलिदान पर संभव बनाया।रूपी सोरेन की विदाई के साथ झारखंड ने एक ऐसी मां को खो दिया, जिसने अपने जीवन में संघर्ष को केवल देखा नहीं, बल्कि उसे जिया था। उनका जीवन यह याद दिलाता है कि किसी भी बड़े जनआंदोलन के इतिहास में केवल मंच पर दिखाई देने वाले चेहरों का योगदान नहीं होता; कई बार उसकी सबसे मजबूत नींव उन लोगों के साहस से बनती है, जिनका नाम इतिहास की सुर्खियों में नहीं आता। रूपी सोरेन को विनम्र श्रद्धांजलि। (लेखक इतिहास विभाग, विनोबा भावे विश्वविद्यालय, हजारीबाग के शोधार्थी हैं।) 

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