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Published / 2026-07-18 21:46:49
रिश्ते अब मटेरियलिस्टिक हो गये हैं...

  • रिश्ते अब मटेरियलिस्टिक हो गये हैं...
  • क्या बुजुर्गों का सम्मान भी आर्थिक क्षमता पर निर्भर हो गया है?

डॉ. दीपक प्रसाद

एबीएन एडिटोरियल डेस्क। किसी भी सभ्य समाज की पहचान उसके बुजुर्गों के प्रति व्यवहार से होती है। जिस समाज में वृद्धों का सम्मान, सुरक्षा और स्नेह बना रहता है, वह समाज सांस्कृतिक रूप से समृद्ध माना जाता है। किंतु आज का बदलता सामाजिक परिवेश एक अत्यंत चिंताजनक प्रश्न हमारे सामने खड़ा करता है क्या रिश्ते अब केवल आर्थिक लाभ और भौतिक स्वार्थ तक सीमित हो गए हैं? क्या परिवार में बुजुर्ग का सम्मान अब इस बात से तय होने लगा है कि उन्हें पेंशन मिलती है या नहीं?

यह प्रश्न केवल भावनात्मक नहीं, बल्कि सामाजिक, नैतिक और मानवीय चेतना से जुड़ा हुआ है। भारतीय संस्कृति में माता-पिता और बुजुर्गों को देवतुल्य माना गया है। मातृदेवो भव:, पितृदेवो भव: केवल एक श्लोक नहीं, बल्कि जीवन-दर्शन है। संयुक्त परिवार की परंपरा में दादा-दादी और नाना-नानी केवल परिवार के सदस्य नहीं, बल्कि अनुभव, संस्कार और जीवन-मूल्यों के संरक्षक होते थे। 

आज वही बुजुर्ग अपने ही घर में स्वयं को उपेक्षित, अकेला और असुरक्षित महसूस कर रहे हैं। आज समाज में एक ऐसी प्रवृत्ति तेजी से उभर रही है जो अत्यंत पीड़ादायक है। यदि किसी बुजुर्ग को नियमित पेंशन मिलती है, तो उसके साथ रहने और उसकी सेवा करने के लिए कई लोग तैयार दिखाई देते हैं। लेकिन जिस बुजुर्ग के पास कोई आय नहीं है, वही व्यक्ति धीरे-धीरे परिवार पर बोझ समझा जाने लगता है। यह स्थिति केवल आर्थिक नहीं, बल्कि हमारी संवेदनाओं के क्षरण का संकेत है।

क्या सचमुच रिश्तों का मूल्य अब बैंक खाते से तय होगा? क्या माता-पिता का सम्मान उनकी पेंशन, संपत्ति और बचत के आधार पर होगा? यदि ऐसा है, तो यह केवल परिवार की नहीं, पूरे समाज की नैतिक पराजय है।
बुजुर्ग जीवन के उस पड़ाव पर होते हैं जहां उन्हें सबसे अधिक प्रेम, धैर्य, सम्मान और भावनात्मक सहारे की आवश्यकता होती है। वे फिर से बच्चों की तरह हो जाते हैं। उन्हें समय चाहिए, अपनापन चाहिए, बातचीत चाहिए और यह विश्वास चाहिए कि वे अकेले नहीं हैं। 

दुर्भाग्य से आधुनिक जीवन की भागदौड़, उपभोक्तावाद और स्वार्थपरक सोच ने इन मानवीय आवश्यकताओं को पीछे छोड़ दिया है। आज का युवा वर्ग अनेक चुनौतियों से जूझ रहा है- रोजगार, प्रतिस्पर्धा, आर्थिक दबाव और बदलती जीवनशैली। इन परिस्थितियों को नकारा नहीं जा सकता। किंतु इन चुनौतियों के बीच यदि परिवार के सबसे अनुभवी सदस्य ही उपेक्षा के शिकार हो जाएँ, तो यह विकास अधूरा है। आधुनिकता का अर्थ अपने मूल्यों को त्याग देना नहीं है।

तकनीकी प्रगति और आर्थिक सफलता तभी सार्थक है जब उसके साथ मानवीय संवेदनाएं भी जीवित रहें। एक पुरानी कहावत है एक बुजुर्ग चार बच्चों का पालन-पोषण कर सकता है, लेकिन कई बार चार बच्चे मिलकर भी एक बुजुर्ग की सेवा नहीं कर पाते। यह केवल कहावत नहीं, बल्कि आज के समाज की कड़वी सच्चाई बनती जा रही है। माता-पिता अपने बच्चों के लिए अपना सुख, समय, स्वास्थ्य और सपने तक न्योछावर कर देते हैं। 

वृद्धावस्था में जब उन्हें सहारे की आवश्यकता होती है, तब यदि उन्हें सम्मान के स्थान पर उपेक्षा मिले, तो इससे बड़ा दुर्भाग्य और क्या हो सकता है? यह भी ध्यान रखना होगा कि सभी परिवार ऐसे नहीं हैं। आज भी असंख्य युवा अपने माता-पिता की निस्वार्थ सेवा कर रहे हैं, उन्हें सम्मान दे रहे हैं और अपने बच्चों को भी यही संस्कार सिखा रहे हैं। ऐसे परिवार समाज के लिए प्रेरणा हैं। इसलिए उद्देश्य किसी एक पीढ़ी को दोष देना नहीं, बल्कि समाज को आत्ममंथन के लिए प्रेरित करना है। 

सरकारें वृद्धावस्था पेंशन, स्वास्थ्य योजनाओं और सामाजिक सुरक्षा कार्यक्रमों के माध्यम से सहयोग कर रही हैं, परंतु कोई भी योजना उस आत्मीयता का स्थान नहीं ले सकती जो परिवार दे सकता है। आर्थिक सहायता आवश्यक है, लेकिन उससे कहीं अधिक आवश्यक है भावनात्मक सुरक्षा, सम्मान और अपनापन। आज आवश्यकता इस बात की है कि परिवारों में संवाद बढ़े, बच्चों को बचपन से ही बुजुर्गों के प्रति सम्मान का संस्कार दिया जाए और समाज यह समझे कि माता-पिता कोई आर्थिक निवेश नहीं, बल्कि हमारे अस्तित्व की जड़ें हैं। 

यदि रिश्ते केवल लाभ-हानि के तराजू पर तौले जाने लगे, तो परिवार केवल एक साथ रहने का स्थान रह जाएगा, घर नहीं। हमें स्वयं से यह प्रश्न पूछना होगा कि क्या हम भी अनजाने में रिश्तों को मटेरियलिस्टिक बना रहे हैं? क्या हम अपने माता-पिता के साथ वही व्यवहार कर रहे हैं जिसकी अपेक्षा हम अपने बच्चों से भविष्य में करेंगे? समय का चक्र सबके लिए समान है। आज जो युवा है, वह कल बुजुर्ग होगा।

अंतत: यही कहा जा सकता है कि किसी समाज की वास्तविक समृद्धि उसकी ऊंची इमारतों, आधुनिक तकनीक या बढ़ती आय से नहीं, बल्कि उसके बुजुर्गों के चेहरे पर दिखने वाली संतुष्टि और सम्मान से आंकी जाती है। यदि हमारे घरों में बुजुर्ग सुरक्षित, सम्मानित और प्रसन्न हैं, तभी हमारा विकास वास्तविक है। रिश्तों को धन से नहीं, मन से जोड़िये। पेंशन से नहीं, प्रेम से पहचानिए। क्योंकि धन जीवन को सुविधाएं दे सकता है, परंतु केवल अपनापन ही जीवन को गरिमा दे सकता है। (लेखक असिस्टेंट प्रोफेसर सांस्कृतिक शोधकर्ता, चिन्तक एवं रंगनिर्देशक हैं और ये उनके निजी विचार हैं।)

Published / 2026-07-18 12:53:15
पीएम मोदी और आत्मनिर्भर भारत...

  • पीएम मोदी और आत्मनिर्भर भारत... 

त्रिवेणी दास

एबीएन एडिटोरियल डेस्क। भारत की पहली हाइड्रोजन ट्रेन को प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने कल शुक्रवार को हरियाणा के जींद रेलवे स्टेशन से हरी झंडी दिखाकर उद्घाटन करते हुए रवाना किया। यह ट्रेन जींद से सोनीपत रूट पर 89 किलोमीटर की दूरी तय करेगी। इस ट्रेन में 10 कोच हैं और यात्री क्षमता 2,600 की है। इस ट्रेन के इंजन में 9 लीटर पानी से 1 लीटर हाइड्रोजन गैस बनाया जा रहा है। 

8 हाइड्रोजन फ्यूल सेल लगाए गए हैं जो हाइड्रोजन एवं हवा के रासायनिक क्रिया से बिजली उत्पन्न करते हैं और लिथियम बैटरियों को चार्ज करते हैं और इसी बैटरी के बिजली से ट्रेन चलती है। ट्रेन प्रदूषण मुक्त है और ट्रेन धुएं की जगह पानी का भाँप छोड़ती है। ट्रेन की गति अधिकतम 110 किलोमीटर प्रति घंटा है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की यही विशेषता है कि वे अग्रिम (Advance) सोचते हैं और समस्या के समाधान का ठोस उपाय करते हैं और सकारात्मक परिणाम को धरातल के ऊपर उतारते भी हैं। भारतीय रेल के विद्युतीकरण का कार्य 1025 शुरू हुई थी। 2014 ई तक 30% विद्युतीकरण का कार्य 90 वर्ष में हो सका था। 

2014 में मोदीजी के प्रधानमंत्री बनने के बाद 99% रेलवे रूट के विद्युतीकरण का कार्य हो चुका है; और यही कारण है कि तेल संकट के बाद भी भारत के विकास की गति बाधित नहीं हो पाई है। अपने राष्ट्र तथा हम लोगों का सौभाग्य है कि हम अपने भारत को आवश्यकता के हर एक आयाम में आत्मनिर्भर होते हुए अपनी आंखों से देख पा रहे हैं। 

Published / 2026-07-14 20:24:57
विद्यार्थी जीवन का समय...

त्रिवेणी दास 

एबीएन एडिटोरियल डेस्क। भारतीय जीवन दर्शन के अनुसार 25 वर्ष की आयु तक ब्रह्मचर्य व्रत का अनुपालन करते हुए विद्या अध्ययन का काल आने वाले दायित्वों के निर्वहन के लिए स्वयं को परिपक्व करने का समय निर्धारित किया गया है। छात्र जीवन का समय ही वह समय होता है जब व्यक्ति के चरित्र का निर्माण, कर्तव्यों के प्रति संस्कार, आत्म सम्मान तथा आत्मविश्वास वाला व्यक्तित्व आकार ग्रहण करता है।  

छात्र जीवन में शिक्षा के साथ-साथ व्यक्तिगत, पारिवारिक, सामाजिक एवं राष्ट्रीय हितों में भागीदारी की भावनाएं परिपुष्ट होती है।  पारिवारिक एवं सामाजिक दायित्व का बोध पारिवारिक एवं सामाजिक मर्यादाओं के अनुपालन के लिए उत्प्रेरित करते रहता है और परिवार तथा समाज से भटकाव को रोकने का कार्य करता है।  

पारिवारिक एवं सामाजिक विरासत का उल्लंघन आज एक सामान्य घटना बन गयी है। विद्यार्थी जीवन कुछ इस प्रकार से निर्धारित हो गए हैं कि परिवार का विद्यार्थी पारिवारिक एवं सामाजिक अनुशासन को भंग करना अपनी आधुनिकता का पहचान समझ लिया है जबकि उसका आने वाला भविष्य उसे परिवार एवं समाज से दूर करते हुए एकाकी बना देता है।  

आज शिक्षण संस्थान के वातावरण भी अत्यंत प्रदूषित हो चुके हैं। विद्यार्थी अपनी व्यक्तिगत सफलता को ही सर्वोपरि मान बैठे हैं, और इस व्यक्तिगत स्वार्थ की लपट जब अभिभावकों के पास पहुंचती है तब तक बहुत देर हो चुका होता है, अभिभावक के पास रोने-गाने के सिवा और कुछ नहीं बचता है। वास्तव में विद्यार्थी जीवन ही वह नींव है जिसके ऊपर व्यक्तिगत, पारिवारिक, सामाजिक एवं राष्ट्रीय भविष्य का निर्माण किया जा सकता है।

Published / 2026-07-10 22:02:41
हर हाल में रूकना चाहिए जनसंख्या विस्फोट

(विश्व जनसंख्या दिवस/ 11 जुलाई विशेष)  

योगेश कुमार गोयल 

एबीएन एडिटोरियल डेस्क। जनसंख्या संबंधित समस्याओं पर वैश्विक चेतना जागृत करने के लिए प्रतिवर्ष 11 जुलाई को विश्व जनसंख्या दिवस मनाया जाता है। भारत के संदर्भ में देखें तो तेजी से बढ़ती आबादी के कारण ही हम सभी तक शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी बुनियादी जरूरतों को पहुंचाने में पिछड़ रहे हैं। देश में बेरोजगारी की समस्या विकराल हो चुकी है। हालांकि विगत दशकों में विभिन्न योजनाओं के माध्यम से नए रोजगार जुटाने के कार्यक्रम चलाए गए लेकिन बढ़ती आबादी के कारण ये सभी कार्यक्रम ऊंट के मुंह में जीरा ही साबित हुए। देश में आबादी और संसाधनों के बीच असंतुलन बढ़ता जा रहा है। वास्तविकता यही है कि विगत दशकों में देश की जनसंख्या जिस गति से बढ़ी, उस गति से कोई भी सरकार जनता के लिए आवश्यक संसाधन जुटाने की व्यवस्था करने में सफल हो ही नहीं सकती थी। 

आज देश की बहुत बड़ी आबादी निम्न स्तर का जीवन जीने को विवश है। देश में करीब 40 प्रतिशत आबादी आजादी के बाद से ही गरीबी के आलम में जी रही है। गरीबी में जीवन गुजार रहे ऐसे बहुत से लोगों की यही सोच रही है कि उनके यहां जितने ज्यादा बच्चे होंगे, उतने ही ज्यादा कमाने वाले हाथ होंगे किन्तु यह सोच वास्तविकता के धरातल से परे है। 

लगातार बढ़ती महंगाई के जमाने में परिवार बड़ा होने से कमाने वाले हाथ ज्यादा होने पर जितनी आय बढ़ती है, उससे कहीं ज्यादा जरूरतें और विभिन्न उत्पादों की कीमतें बढ़ जाती हैं, जिनकी पूर्ति कर पाना सामर्थ्य से परे हो जाता है। इसलिए जनसंख्या नियंत्रण कार्यक्रमों की सफलता के लिए सर्वाधिक जरूरी यही है कि घोर निर्धनता में जी रहे ऐसे लोगों को परिवार नियोजन कार्यक्रमों के महत्व के बारे में जागरूक करने की ओर खास ध्यान दिया जाए क्योंकि जब तक इस कार्यक्रम में इन लोगों की भागीदारी नहीं होगी, तब तक लक्ष्य की प्राप्ति संभव नहीं है। 

देश में जनसंख्या वृद्धि का मुकाबला करने के लिए पिछले काफी समय से कुछ कड़े कानून बनाने की मांग हो रही है लेकिन इस दिशा में कुछ राज्य सरकारें दो से ज्यादा बच्चों वाले परिवारों को सरकारी नौकरी तथा स्थानीय निकाय चुनावों में उम्मीदवारी से अयोग्य अघोषित करने जैसे जिस तरह के उपायों पर विचार कर रही हैं, उन्हें तर्कसंगत नहीं माना जा सकता। हालांकि जनसंख्या वृद्धि मौजूदा समय में गंभीर चुनौती है लेकिन ऐसे उपायों को संवैधानिक नजरिये से भी तर्कसम्मत नहीं माना जाता। 

चीन में 1980 से पहले केवल एक बच्चा पैदा करने की अनुमति थी, जिसका उल्लंघन करने पर दम्पति को न केवल सरकारी योजनाओं से वंचित कर दिया जाता था बल्कि सजा भी दी जाती थी लेकिन वहां यह नीति सफल नहीं हुई। इसीलिए चीन सरकार ने 2016 में इस नीति में बदलाव कर दो बच्चों की अनुमति दी और बाद में तीन बच्चों की अनुमति देनी पड़ी। चीन की तानाशाही सरकार द्वारा नीतियों में बड़ा बदलाव करते हुए दम्पत्तियों को तीन बच्चे करने की अनुमति क्यों दी गई, इसके कारण समझना भी जरूरी है। दरअसल वहां लोगों की सामान्य प्रजनन दर में निरन्तर गिरावट आ रही है और कुछ विशेषज्ञों के मुताबिक यही स्थिति भारत में भी होनी है। 

जनसंख्या में स्थायित्व और कामकाजी युवाओं की स्थिर संख्या के लिए महिलाओं की सामान्य प्रजनन दर 2.1 होनी चाहिए और चीन में यह दर निरन्तर गिर रही है। 1970 में चीन में यह दर 5.8 थी, जो 2015 में घटकर 1.6 और 2020 में केवल 1.3 ही रह गई जबकि बुजुर्गों की आबादी लगातार बढ़ती गई। नेशनल ब्यूरो आॅफ स्टेटिस्टिक्स (एनबीएस) के अनुसार आने वाले समय में आबादी में अधिक उम्र वालों की संख्या बढ़ने से संतुलित विकास और जनसंख्या को लेकर दबाव बढ़ेगा। 1982 में हुई जनगणना में चीन की जनसंख्या में 2.1 फीसदी की सबसे ज्यादा वृद्धि दर्ज की गई थी लेकिन उसके बाद जनसंख्या में लगातार गिरावट दर्ज की गई, जिसके लिए वहां की कम्युनिस्ट सरकार द्वारा अपनायी गयी दशकों पुरानी वन चाइल्ड पॉलिसी को जिम्मेदार माना जाता है। 

विगत एक दशक में चीन की जनसंख्या करीब सात करोड़ बढ़ी लेकिन बुजुर्गों की संख्या बढ़ने से चीन के लिए अलग ही समस्या उत्पन्न होने लगी है। दरअसल चीन को आशंका है कि अगले दस वर्षों में उसकी जनसंख्या में गिरावट आएगी, जिससे कामगारों की संख्या में कमी आने से उसकी खपत भी घटेगी। एनबीएस के आंकड़ों के मुताबिक चीन को जिन जनसांख्यिकीय संकट का सामना करना पड़ा था, वह और गहरा होने की उम्मीद थी, इसीलिए चीन को अपनी जनसंख्या नीति में बदलाव करने पर विवश होना पड़ा। 

जहां तक भारत की बात है तो यहां 1994 में महिलाओं की सामान्य प्रजनन दर 3.4 थी, जो घटकर 2015 में 2.2 रह गई थी यानी सामान्य के करीब। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण के अनुसार भारत की जनसंख्या 2050 तक बढ़ने के बाद से गिरनी शुरू हो जाएगी और 2100 तक पहुंचते-पहुंचते सामान्य प्रजनन दर केवल 1.3 ही रह जाएगी। इसका अर्थ है कि तब अधिकांश परिवारों में केवल एक ही बच्चा होगा और भारत उसी स्थिति में खड़ा होगा, जिसमें वन चाइल्ड पॉलिसी के बाद चीन खड़ा हुआ और उसे विगत सात वर्षों में दो बार अपनी जनसंख्या नीति में बड़ा परिवर्तन करना पड़ा। इसलिए टू चाइल्ड पॉलिसी जैसे कानूनों के जरिये जनसंख्या नियंत्रण की कोशिशों को व्यावहारिक नहीं माना जा रहा बल्कि इसके लिए डराने-धमकाने वाले कानूनों के बजाय लोगों में जागरुकता पैदा किया जाना सबसे जरूरी है। 

बगैर कड़े कानूनों के देश के ऐसे राज्यों में जनसंख्या वृद्धि दर में कमी आयी सर्वेक्षण के अनुसार भारत में गरीब महिलाओं की प्रजनन दर करीब 3.2 है जबकि सम्पन्न महिलाओं में यह दर केवल 1.5 पाई गई है। इसी प्रकार अनपढ़ महिलाओं के औसतन 3.1 बच्चे होते हैं जबकि शिक्षित महिलाओं में यह संख्या औसतन 1.7 है। इसका स्पष्ट अर्थ है कि जनसंख्या विस्फोट का सीधा संबंध सामाजिक और शैक्षिक स्थितियों से जुड़ा है। शिक्षा के अभाव में ही देश की बड़ी आबादी को छोटे परिवार के लाभ को लेकर जागरूक नहीं किया जा सका है। (लेखक, स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं और ये उनके निजी विचार हैं।) 

Published / 2026-07-10 21:12:10
भारतीय सनातन दर्शन के पुरुषार्थ...

त्रिवेणी दास 

एबीएन एडिटोरियल डेस्क। भारतीय सनातन दर्शन के अनुसार 100 वर्ष की आयु को पुरुषार्थ की दृष्टि से आश्रम के चार भागों में विभक्त किया गया है। 1. ब्रह्मचर्य आश्रम, 2. गृहस्थ आश्रम, 3. वानप्रस्थ आश्रम, 4. सन्यास आश्रम। 

25 वर्ष तक की आयु में विद्या अध्ययन, 25 से 50 वर्ष की आयु में पारिवारिक जीवन के कर्तव्यों का निर्वहन, 50 से 75 वर्ष की आयु तक घर में रहते हुए सामाजिक दायित्वों का निर्वहन और 75 से 100 वर्ष की आयु तक गृह का परित्याग करते हुए अर्जित अनुभव के आधार पर सेवा का कार्य करना; प्रथम पुरुषार्थ किस श्रेणी में आता है। जीवन की एक संपूर्ण अवधि में 1.. धर्म 2..अर्थ 3.. काम 4.. मोक्ष;  पुरुषार्थ की दूसरी उत्तम श्रेणी में आता है।  

दोनों श्रेणी के पुरुषार्थ के लिए स्वयं को तपाना पड़ता है। अंधकार से प्रकाश की ओर कदम बढ़ाना पड़ता है। गर्भस्थ शिशु अंधकार से प्रसव के बाद प्रकाश में अवतरित होता है। पृथ्वी के गर्भ के अंधकार में पड़े बीज धरती को चिर कर बाहर प्रकाश में उगता है और पौधा बनकर फूल फल प्रदान करता है। 

पुरुषार्थ के धैर्य, संयम, संघर्ष, सहिष्णुता और कर्म अलंकार होते हैं, जबकि दृढ़ संकल्प पुरुषार्थ का प्राण वायु होता है।  पुरुषार्थ की शक्ति से भौतिक तथा आध्यात्मिक दोनों उद्देश्यों की पूर्ति निश्चित रूप से की जा सकती है, और अंत में पूर्ण संतुष्टि के साथ विदाई में आलिंगनबद्ध हुआ जा सकता है।

Published / 2026-07-08 11:33:50
पीएम नरेंद्र मोदी को प्राप्त 35वां सर्वोच्च विदेशी नागरिक सम्मान

  • पीएम नरेंद्र मोदी को प्राप्त 35वां सर्वोच्च विदेशी नागरिक सम्मान

एबीएन एडिटोरियल डेस्क। कल मंगलवार को इंडोनेशिया के राष्ट्रपति प्राबोवो सुबियांतो ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को अपने देश का सर्वोच्च नागरिक सम्मान वितांक एडिपुरना ऑफ द रिपब्लिक इंडोनेशिया से जकार्ता में आयोजित एक विशेष सम्मान समारोह में सम्मानित किया। 

यह सम्मान इंडोनेशिया की एकता, निरंतरता एवं समृद्धि के लिए योगदान करने वाले व्यक्तियों को दिया जाता है। यह मोदीजी को प्राप्त 35वां विदेशी नागरिक सम्मान है। मोदीजी के बारे में भ्रामक प्रचार किया जाता रहा है कि वे इस्लाम विरोधी सोंच रखने वाले व्यक्ति हैं, जबकि इंडोनेशिया मुस्लिम बहुल आबादी वाला देश है। 

इसके पहले मुस्लिम आबादी वाले देश सऊदी अरब, फिलिस्तीन, मालदीव, बहरीन, संयुक्त अरब अमीरात, ओमान मिस्र ने भी अपने देश का सर्वोच्च नागरिक सम्मान मोदीजी को दिया है। दुनिया के भर के देशों के मध्य मतभेदों में मोदीजी के नेतृत्व में भारत को एक सेतु की भूमिका में स्वीकार किया जाना, मोदीजी को प्राप्त हो रहे हैं नागरिक सम्मान से स्वत: सिद्ध हो रहा है। 

मोदीजी का सम्मान वास्तव में भारत का सम्मान है। विश्व के मंच पर कभी भारत की अनदेखी की जाती थी लेकिन आज भारत को एक शक्तिशाली, आत्मनिर्भर, सुदृढ़ विकसित अर्थव्यवस्था, ज्ञान विज्ञान कला साहित्य से समृद्ध एक विश्वसनीय राष्ट्र के रूप में जाना जाता है। 

Published / 2026-07-01 10:50:46
सबको साथ लेकर चलने की नीति पर अडिग पीएम मोदी

  • सबको साथ लेकर चलने की नीति पर अडिग पीएम मोदी

त्रिवेणी दास

एबीएन एडिटोरियल डेस्क। 2014 में देश के प्रधानमंत्री के रूप में शपथ लेने के बाद से मोदीजी के कार्यकाल में भारत दुनिया के मंच में एक दूरदर्शी खिलाड़ी/ Proactive Player के स्वरूप में स्थान बनाया है। आज की तिथि में डोनाल्ड ट्रंप, व्लादिमीर पुतिन, शी जिनपिंग, नितिनयाहू, अयातुल्ला मोजतबा ख़ामेनेई से उनके बीच तनाव एवं विवाद के रहते मोदी जी सबसे बात कर सकते हैं। 

रस से बात कर सकते हैं तो यूक्रेन से भी उनकी बात होती है। भारत की छवि उन्होंने एक विश्वसनीय देश के रूप में स्थापित करने की सफलता प्राप्त की है। दुनिया के कई देशों में अपने यहां के सबसे प्रतिष्ठित सम्मान से मोदीजी को सम्मानित किया है।

अभी हाल में ही मोदी जी ने सबसे लंबे निर्वाचित प्रधानमंत्री रहने का रिकॉर्ड बनाया है, जो 144 करोड़ जनता के मध्य उनकी लोकप्रियता को सिद्ध करता है। मोदीजी का मूल मंत्र सबका साथ, सबका विकास, और सब का प्रयास उनकी गारंटी को जनसामान्य का विश्वासपात्र बनाया है।

मोदी की आयु 75 वर्ष की हो चुकी है। प्रधानमंत्री रहते हुए पिछले 12 वर्षों में वे कभी थके हुए दिखाई नहीं दिए, उन्होंने कभी छुट्टी नहीं ली और दुनिया के प्रतिस्पर्धा में आशा एवं आत्मविश्वास से नित्य नए-नए मिल के पत्थरों को स्थापित करते जा रहे हैं। 

राजनीतिक दृष्टि से भारतीय जनता पार्टी की गठबंधन नेशनल डेमोक्रेटिक अलायंस (NDA) को उन्होंने सशक्त बनाया है परिणाम यह है कि आज देश के 20 राज्यों से अधिक राज्य में डबल इंजन की सरकार चल रही है। परिवारवादी क्षेत्रीय दलों के अधिकांश नेता मोदीजी की कार्य पद्धति और विश्वसनीयता से प्रभावित होकर उनके साथ काम करने की इच्छा रखते हुए उनकी ओर आकर्षित हो रहे हैं। 

भारत में लोकतंत्र के संविधान में मोदीजी की गहरी आस्था है, राष्ट्र प्रथम उनकी भावनाओं में प्रवाहित है और उनका व्यक्तिगत जीवन अत्यंत सधा एवं कसा हुआ है; और यही वे मूल कारक हैं जिसके आधारशिला पर मोदी जी का व्यक्तित्व खड़ा हुआ है। (लेखक स्वतन्त्र स्तंभकार हैं और ये उनके निजी विचार हैं।) 

Published / 2026-06-29 22:04:14
अंग्रेज समझे हूल दब गया, इतिहास ने कहा- संघर्ष अभी जिन्ंदा है...

हजारीबाग से उठी चुनौती, वर्षों तक बेचैन रहा ब्रिटिश प्रशासन 30 जून : हूल दिवस पर विशेष 

डॉ शत्रुघ्न कुमार पाण्डेय 

एबीएन एडिटोरियल डेस्क। हर वर्ष 30 जून को देश संताल हूल दिवस मनाता है। अधिकांश स्मरण 1855 के भगनाडीह और सिदो-कान्हू, चांद तथा भैरव मुर्मू के नेतृत्व में फूटे उस महान विद्रोह तक सीमित रह जाते हैं, जिसने अंग्रेजी शासन को आदिवासी भारत की संगठित शक्ति का परिचय कराया। किंतु हूल केवल एक दिन, एक वर्ष या एक क्षेत्र की घटना नहीं था। उसकी ज्वाला दामिन-ए-कोह से निकलकर छोटानागपुर, विशेषकर हजारीबाग की धरती पर लंबे समय तक धधकती रही। हूल का वास्तविक इतिहास उसकी निरंतरता में छिपा है। 

हूल के दमन के बाद बड़ी संख्या में संताल योद्धाओं और नेताओं को गिरफ्तार कर हजारीबाग जेल में बंद कर दिया गया। अंग्रेज अधिकारियों को लगा कि नेतृत्व को कैद कर देने से प्रतिरोध समाप्त हो जायेगा। लेकिन कुछ ही महीनों बाद यह विश्वास टूट गया। अप्रैल 1856 में सैकड़ों संताल अपने बंदी साथियों को मुक्त कराने के लिए हजारीबाग जेल पर टूट पड़े। जेल भवन में आग लगा दी गई। जेल अस्पताल, मालखाना और संतरी चैकी पर तीरों की बौछार हुई। प्रशासन ने पहले इसे कुछ बरकंदाजों की शरारत मानकर टालना चाहा, किंतु शीघ्र ही स्पष्ट हो गया कि यह किसी छोटे समूह की दुस्साहसिक घटना नहीं, बल्कि जीवित प्रतिरोध की उद्घोषणा थी। संताल अपने नेताओं को मुक्त नहीं करा सके, पर अंग्रेजी शासन को यह संदेश अवश्य दे गए कि हूल अभी जिंदा है। 

लगभग एक वर्ष बाद वही हजारीबाग फिर इतिहास के केंद्र में था। 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में जब विद्रोही सैनिकों ने जेल पर धावा बोला और फाटक तोड़ा, तब सबसे बड़ी संख्या उन संताल बंदियों की थी जिन्हें हूल और उसके पहले और बाद के संघर्षों में कारावास मिला था। जेल से बाहर निकलते ही वे अपने गाँवों और समुदायों में लौटे। उन्होंने एक बार फिर औपनिवेशिक शासन के विरुद्ध हथियार उठा लिए। इस प्रकार हूल और 1857 का महासमर हजारीबाग की धरती पर एक-दूसरे से जुड़ गए।  

अब संघर्ष का स्वरूप भी बदल चुका था। यह केवल हथियारों का प्रतिरोध नहीं रहा। संतालों ने फसल-दखल आंदोलन आरंभ किया। जिन जमींदारों और महाजनों को वे अंग्रेजी शासन का सहायक मानते थे, उनके खेतों से अनाज अपने अधिकार में लेना शुरू कर दिया। रूपु मांझी के नेतृत्व में यह आंदोलन गोला, चितरपुर, गोमिया, पेटरवार, चास और मानभूम तक फैल गया। यह केवल अन्न प्राप्त करने का प्रयास नहीं था, यह उस भूमि पर अधिकार की घोषणा थी जिसे संतालों अपने श्रम से उपजाऊ बनाया था।  

इन घटनाओं ने ब्रिटिश प्रशासन की चिंता को चरम पर पहुंचा दिया। उनका भय था कि यदि संताल ग्रैंड ट्रंक रोड तक पहुंच गए या उसे पार कर गए, तो कलकत्ता और उत्तर भारत के बीच साम्राज्य का सबसे महत्त्वपूर्ण संपर्क मार्ग संकट में पड़ जाएगा। इसी आशंका में बगोदर और बरही के बीच सैनिक बढ़ाये गये, यूरोपीय और सिख सैनिकों की टुकड़ियां भेजी गयीं, टेलीग्राफ कार्यालय को बगोदर से बरही स्थानांतरित करने का निर्णय लिया गया और शेरघाटी में कटते तारों की खबरों ने औपनिवेशिक शासन के होश उड़ा दिये थे।  

यह केवल सुरक्षा-व्यवस्था नहीं थी, यह उस भय का प्रमाण था, जो संताल प्रतिरोध ने औपनिवेशिक शासन के भीतर पैदा कर दिया था। उधर रूपू मांझी और उनके साथियों की गतिविधियां रुक नहीं रही थीं। ब्रिटिश समर्थक जमींदार उनके निशाने पर थे। गांवों में अनाज जब्त किया जा रहा था। राजा रामगढ़ स्वयं चिंतित थे और अतिरिक्त सैनिकों की मांग कर रहे थे। अंतत: अंग्रेजी शासन ने स्थानीय जमींदारों, जागीरदारों, सिख सैनिकों और यूरोपीय टुकड़ियों की सहायता से व्यापक सैन्य अभियान चलाया। गांव जलाये गये, नेताओं के घर नष्ट किए गए, इनाम घोषित हुए और सैकड़ों संताल एक बार फिर से गिरफ्तार किये गये। तब जाकर यह प्रतिरोध धीरे-धीरे दबाया जा सका।  

हूल दिवस केवल अतीत को याद करने का अवसर नहीं है, यह इतिहास को उसकी संपूर्णता में समझने का भी दिन है। यदि हम हूल को केवल 30 जून 1855 की घटना मानते हैं, तो उसके सबसे महत्त्वपूर्ण अध्याय हमारी दृष्टि से ओझल हो जाते हैं। हजारीबाग जेल पर हमला, 1857 के महासमर में संताल बंदियों की निर्णायक भूमिका, फसल-दखल आंदोलन और ब्रिटिश शासन की बढ़ती प्रशासनिक घबराहट इस तथ्य के साक्ष्य हैं कि हूल ने औपनिवेशिक सत्ता को वर्षों तक चुनौती दी। संताल हूल भारतीय स्वतंत्रता संघर्ष का केवल प्रारंभिक विद्रोह नहीं, बल्कि उस दीर्घ प्रतिरोध परंपरा का आधार स्तंभ है, जिसने अंतत: विदेशी शासन की जड़ों को हिला दिया। आज हूल दिवस पर उन ज्ञात-अज्ञात संताल वीरों को स्मरण करने का सबसे सार्थक तरीका यही है कि उनके संघर्ष को इतिहास के सीमित अध्याय के रूप में नहीं, बल्कि भारतीय स्वाधीनता चेतना की सतत् और जीवंत धारा के रूप में देखा जाए। (लेखक इतिहास के प्रोफेसर, क्षेत्रीय इतिहास के अध्येता-शोधकर्ता और दर्जन भर पुस्तकों के लेखक हैं।) 

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सच तो सामने आकर रहेगा

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