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हिंदी दिवस : दुनिया में हिंदी की संभावनाएं और भविष्य
Published / 2026-09-13 14:25:56
हिंदी दिवस : दुनिया में हिंदी की संभावनाएं और भविष्य

हिंदी दिवस : दुनिया में हिंदी की संभावनाएं और भविष्यमनोज पांडेयएबीएन एडिटोरियल डेस्क। हिंदी केवल एक भाषा नहीं, बल्कि भारत की संस्कृति, संवेदना और विविधता को जोड़ने वाली एक सशक्त कड़ी है। हर वर्ष 14 सितंबर को हिंदी दिवस मनाया जाता है। इसी दिन 1949 में संविधान सभा ने हिंदी को देवनागरी लिपि में संघ की राजभाषा के रूप में स्वीकार किया था। हिंदी दिवस हमें अपनी भाषा के प्रति सम्मान, प्रेम और जिम्मेदारी का बोध कराता है। आज हिंदी केवल भारत तक सीमित नहीं है, बल्कि दुनिया के अनेक देशों में बोली, समझी और सीखी जा रही है। बदलते वैश्विक परिवेश में हिंदी के सामने अनेक नई संभावनाएँ दिखाई दे रही हैं। हिंदी आज दुनिया की प्रमुख भाषाओं में शामिल है। भारत के अतिरिक्त मॉरीशस, फिजी, सूरीनाम, गुयाना, नेपाल, संयुक्त अरब अमीरात, अमेरिका, कनाडा, ब्रिटेन और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों में हिंदी बोलने और समझने वाले लोगों की बड़ी संख्या है। भारतीय प्रवासी समुदाय ने हिंदी को विश्व के विभिन्न हिस्सों तक पहुँचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। विदेशों के कई विश्वविद्यालयों और शैक्षणिक संस्थानों में हिंदी के अध्ययन-अध्यापन की व्यवस्था भी है। डिजिटल युग ने हिंदी के विस्तार की संभावनाओं को और बढ़ा दिया है। आज इंटरनेट, सोशल मीडिया, ब्लॉग, ऑनलाइन शिक्षा, पॉडकास्ट और वीडियो प्लेटफॉर्म पर हिंदी की सामग्री तेजी से बढ़ रही है।स्मार्टफोन और इंटरनेट की पहुँच ने हिंदी को करोड़ों लोगों की डिजिटल भाषा बना दिया है। अब हिंदी में समाचार पढ़ना, फिल्में देखना, ऑनलाइन पाठ्यक्रम करना, खरीदारी करना और विभिन्न डिजिटल सेवाओं का उपयोग करना पहले की अपेक्षा बहुत आसान हो गया है।कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI), मशीन अनुवाद और वॉइस टेक्नोलॉजी हिंदी के भविष्य को नई दिशा दे रहे हैं। हिंदी में बोलकर जानकारी प्राप्त करना, दूसरी भाषाओं में अनुवाद करना तथा हिंदी सामग्री तैयार करना अब तकनीकी रूप से संभव और आसान होता जा रहा है। आने वाले समय में हिंदी का उपयोग शिक्षा, स्वास्थ्य, प्रशासन, व्यापार, पर्यटन और तकनीकी सेवाओं में और अधिक बढ़ सकता है।हिंदी के वैश्विक भविष्य में सिनेमा, संगीत और साहित्य की भी महत्वपूर्ण भूमिका है। भारतीय फिल्मों, वेब सीरीज़, गीतों और साहित्य ने हिंदी को दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में लोकप्रिय बनाया है। प्रेमचंद, तुलसीदास, कबीर, महादेवी वर्मा, रामधारी सिंह दिनकर जैसे साहित्यकारों की रचनाएँ हिंदी की समृद्ध परंपरा को विश्व के सामने प्रस्तुत करती हैं।हालाँकि हिंदी के सामने कुछ चुनौतियाँ भी हैं। अंग्रेजी सहित अन्य वैश्विक भाषाओं का बढ़ता प्रभाव, हिंदी लेखन में वर्तनी की अशुद्धियाँ और तकनीकी क्षेत्र में गुणवत्तापूर्ण हिंदी सामग्री की आवश्यकता प्रमुख चुनौतियाँ हैं। इनका समाधान हिंदी को आधुनिक तकनीक और रोजगार के अवसरों से जोड़कर किया जा सकता है। हिंदी का भविष्य उज्ज्वल है, बशर्ते हम इसे केवल भावनाओं तक सीमित न रखें, बल्कि ज्ञान, विज्ञान, तकनीक, रोजगार और नवाचार की भाषा बनाएँ। हिंदी को आगे बढ़ाने की जिम्मेदारी केवल सरकार या शिक्षकों की नहीं, बल्कि प्रत्येक हिंदी-प्रेमी की है।अंततः कहा जा सकता है कि हिंदी की यात्रा भारत से शुरू होकर विश्व तक पहुँच चुकी है। आने वाले वर्षों में तकनीक, शिक्षा और वैश्वीकरण के साथ हिंदी के विस्तार की संभावनाएँ और भी व्यापक होंगी। हिंदी का भविष्य तभी सशक्त होगा, जब हम हिंदी पर गर्व करने के साथ-साथ उसे आधुनिक ज्ञान और तकनीक से भी जोड़ेंगे।

कृत्रिम बुद्धिमत्ता और हिंदी का संघर्ष
Published / 2026-09-12 18:07:02
कृत्रिम बुद्धिमत्ता और हिंदी का संघर्ष

हिंदी दिवस पर विशेष डॉ. दीपक प्रसाद एबीएन एडिटोरियल डेस्क। भाषा केवल संवाद का माध्यम नहीं होती, वह किसी समाज की स्मृति, संस्कृति, विचार और आत्मसम्मान की पहचान होती है। हर वर्ष 14 सितंबर को देश में हिंदी दिवस मनाया जाता है। विद्यालयों, महाविद्यालयों, विश्वविद्यालयों, सरकारी संस्थानों और विभिन्न सामाजिक-सांस्कृतिक संगठनों में हिंदी के महत्व पर चर्चा होती है। प्रतियोगिताएं होती हैं, भाषण दिए जाते हैं और हिंदी के प्रति सम्मान व्यक्त किया जाता है। लेकिन एक गंभीर प्रश्न आज भी हमारे सामने खड़ा है कि क्या हिंदी को केवल एक दिन याद करने से उसका भविष्य सुरक्षित हो जायेगा? यह प्रश्न इसलिए और महत्वपूर्ण हो गया है क्योंकि हम ऐसे समय में प्रवेश कर चुके हैं, जहां कृत्रिम बुद्धिमत्ता यानी आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) हमारी जिंदगी के लगभग हर क्षेत्र को प्रभावित कर रही है। शिक्षा से लेकर स्वास्थ्य, व्यापार से लेकर प्रशासन, बैंकिंग से लेकर कृषि और मनोरंजन से लेकर शोध तक कृत्रिम बुद्धिमत्ता तेजी से अपना विस्तार कर रही है। ऐसे समय में हिंदी के सामने चुनौती भी है और एक अभूतपूर्व अवसर भी। भारत की संविधान सभा ने 14 सितंबर 1949 को हिंदी को संघ की राजभाषा के रूप में स्वीकार किया था। इसी ऐतिहासिक निर्णय की स्मृति में 14 सितंबर को हिंदी दिवस मनाया जाता है। संविधान के अनुच्छेद 343 में संघ की राजभाषा हिंदी और उसकी लिपि देवनागरी निर्धारित की गयी है। यह समझना आवश्यक है कि हिंदी दिवस का उद्देश्य केवल हिंदी का उत्सव मनाना नहीं है। इसका वास्तविक उद्देश्य हिंदी के प्रयोग, विकास और सम्मान को बढ़ाना है। लेकिन 14 सितंबर आते ही यदि हम हिंदी की प्रशंसा करें और 15 सितंबर से फिर उसी भाषा को पीछे छोड़ दें, तो हमें स्वयं से पूछना चाहिए कि हमारी भाषा के प्रति हमारी प्रतिबद्धता कितनी वास्तविक है? सवाल उठता है कि हिंदी का संघर्ष आखिर किससे है? यहां बताते चलें कि हिंदी का संघर्ष अंग्रेजी से कम और हमारी मानसिकता से अधिक है। अंग्रेजी सीखना या बोलना कोई समस्या नहीं है। किसी भी विदेशी भाषा का ज्ञान व्यक्ति की क्षमता बढ़ाता है। समस्या तब पैदा होती है जब अंग्रेजी को ज्ञान, योग्यता और प्रतिष्ठा का प्रमाण मान लिया जाता है तथा हिंदी या भारतीय भाषाओं में बोलने वाले व्यक्ति को कमतर समझा जाने लगता है। आज हमारे समाज में कई बार ऐसा दृश्य दिखाई देता है कि कोई व्यक्ति हिंदी में सहजता से बोलता है तो उसे सामान्य समझा जाता है, लेकिन वही व्यक्ति कुछ अंग्रेजी शब्दों का प्रयोग कर दे तो उसके व्यक्तित्व को अधिक आधुनिक और शिक्षित मान लिया जाता है। यह मानसिकता केवल शहरों तक सीमित नहीं है। इसका प्रभाव हमारे विद्यालयों और महाविद्यालयों तक पहुंच चुका है। कई बच्चे हिंदी में प्रश्न पूछने में संकोच करते हैं। उन्हें डर रहता है कि कहीं दूसरे विद्यार्थी उन्हें कम बुद्धिमान न समझ लें। कई अभिभावक भी यह मानने लगे हैं कि अंग्रेजी माध्यम ही सफलता का रास्ता है। यह सोच बदलनी होगी। भाषा बुद्धिमत्ता का प्रमाण नहीं होती। भाषा बुद्धिमत्ता को व्यक्त करने का माध्यम होती है। जापान, चीन, दक्षिण कोरिया, फ्रांस और जर्मनी जैसे अनेक देशों ने अपनी भाषाओं को आधुनिक ज्ञान, विज्ञान, तकनीक और अर्थव्यवस्था से जोड़े रखा है। उन्होंने विदेशी भाषाओं से दूरी नहीं बनायी, लेकिन अपनी भाषा को विकास की धुरी से हटने भी नहीं दिया। भारत को भी यही संतुलन सीखना होगा। क्या हिंदी विज्ञान और तकनीक की भाषा बन सकती है? यह सवाल अक्सर पूछा जाता है। इसका उत्तर है—हां, लेकिन इसके लिए केवल भावनात्मक प्रेम पर्याप्त नहीं है। हिंदी को विज्ञान, चिकित्सा, कानून, इंजीनियरिंग, प्रबंधन, कंप्यूटर, अंतरिक्ष विज्ञान और आधुनिक तकनीक की भाषा बनाना होगा। इसके लिए गुणवत्तापूर्ण पाठ्य सामग्री तैयार करनी होगी, नए शब्दों का सहज विकास करना होगा और सबसे महत्वपूर्ण बात- हिंदी में ज्ञान का विशाल डिजिटल भंडार तैयार करना होगा। यहीं से कृत्रिम बुद्धिमत्ता हिंदी के लिए एक बड़ी संभावना बनकर सामने आती है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता आज भाषा की सीमाओं को तेजी से बदल रही है। कुछ वर्ष पहले यदि किसी व्यक्ति को अंग्रेजी में कोई जानकारी चाहिए होती थी और वह अंग्रेजी नहीं जानता था, तो उसके सामने बड़ी बाधा होती थी। आज अक आधारित भाषा तकनीक अनुवाद, आवाज पहचान, पाठ निर्माण, सारांश, प्रश्नोत्तर और संवाद जैसे अनेक कार्यों में सहायता कर सकती है। कल्पना कीजिए कि गांव का एक किसान अपनी स्थानीय बोली में मोबाइल से पूछता है मेरी फसल में यह बीमारी क्यों हो रही है? यदि AI उसकी भाषा या बोली को समझकर सरल हिंदी में समाधान दे सके और जरूरत पड़ने पर स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार कृषि विशेषज्ञ की जानकारी उपलब्ध करा सके, तो तकनीक वास्तव में समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुंच रही होगी। यही अक की सबसे बड़ी ताकत हो सकती है- ज्ञान को भाषा की दीवार से मुक्त करना। शिक्षा के क्षेत्र में अक हिंदी के लिए क्रांतिकारी परिवर्तन ला सकती है। एक विद्यार्थी हिंदी में प्रश्न पूछकर गणित, विज्ञान, इतिहास, भूगोल या किसी अन्य विषय को अपनी समझ के स्तर पर समझ सकता है। कठिन अंग्रेजी पाठ का सरल हिंदी में अर्थ समझ सकता है। शिक्षक अपनी कक्षा के लिए हिंदी में शिक्षण सामग्री, प्रश्नपत्र, गतिविधियां और उदाहरण तैयार कर सकता है। ग्रामीण और वंचित क्षेत्रों के विद्यार्थियों के लिए यह विशेष रूप से उपयोगी हो सकता है। लेकिन यहां एक सावधानी भी आवश्यक है। अक शिक्षक का विकल्प नहीं, शिक्षक का सहयोगी होना चाहिए। विद्यार्थी यदि हर प्रश्न का उत्तर बिना सोचे अक से लेने लगेगा, तो उसकी मौलिक सोच कमजोर हो सकती है। इसलिए अक का उपयोग ज्ञान प्राप्त करने के लिए हो, सोचने की क्षमता समाप्त करने के लिए नहीं। भारत की बड़ी आबादी अपनी स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं को अंग्रेजी में व्यक्त नहीं कर पाती। यदि अक आधारित स्वास्थ्य सेवाएं हिंदी और भारतीय भाषाओं में उपलब्ध होती हैं तो सामान्य व्यक्ति बीमारी, दवा, जांच, खान-पान और स्वास्थ्य संबंधी सामान्य जानकारी को अधिक आसानी से समझ सकता है। उदाहरण के लिए कोई व्यक्ति अपनी समस्या बोलकर बता सके और अक उसे सरल भाषा में यह समझा सके कि उसे तत्काल डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए या सामान्य सावधानी बरतनी चाहिए। लेकिन यहां भी एक सीमा स्पष्ट है- एआई चिकित्सा विशेषज्ञ का विकल्प नहीं है। गंभीर बीमारी, आपातकाल या दवा संबंधी निर्णय में योग्य चिकित्सक की सलाह आवश्यक रहेगी। भारत की अर्थव्यवस्था का बड़ा हिस्सा ऐसे लोगों से जुड़ा है जिनकी पहली भाषा अंग्रेजी नहीं है। छोटे व्यापारी, किसान, कारीगर, घरेलू उद्यमी, स्वयं सहायता समूह और ग्रामीण युवा यदि अपनी भाषा में डिजिटल तकनीक का उपयोग कर सकें तो आर्थिक भागीदारी बढ़ सकती है। व्यापारिक जानकारी समझा सकती है, दस्तावेज तैयार करने में सहायता कर सकती है, ग्राहक सेवा को सरल बना सकती है, छोटे व्यवसाय के लिए विज्ञापन और प्रचार सामग्री तैयार करने में सहायता कर सकती है। इस प्रकार हिंदी केवल साहित्य की भाषा नहीं रहेगी, बल्कि डिजिटल अर्थव्यवस्था की भाषा भी बन सकती है। लेकिन अक के दौर में हिंदी के सामने चुनौतियां भी बड़ी हैं। AI हिंदी के लिए अवसर है, लेकिन यह चुनौती से मुक्त नहीं है। अक की गुणवत्ता इस बात पर निर्भर करती है कि उसके पास किस भाषा में कितना अच्छा और विविध डेटा उपलब्ध है। अंग्रेजी में लंबे समय से विशाल डिजिटल सामग्री मौजूद है। हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं में डिजिटल सामग्री तेजी से बढ़ रही है, लेकिन अभी भी बहुत काम किया जाना बाकी है। हमें हिंदी में गुणवत्तापूर्ण पुस्तकें, शोधपत्र, पाठ्य सामग्री, विश्वसनीय वेबसाइटें, वैज्ञानिक सामग्री, कानूनी दस्तावेज, डिजिटल अभिलेख, लोक साहित्य और भाषाई संसाधन बड़े पैमाने पर उपलब्ध कराने होंगे। इसके साथ एक और चुनौती है हिंदी की विविधता। हिंदी केवल मानक हिंदी नहीं है। इसके साथ भोजपुरी, मगही, मैथिली, अंगिका, छत्तीसगढ़ी, अवधी, ब्रज, बुंदेली, हरियाणवी और अनेक लोकभाषाओं तथा बोलियों की समृद्ध परंपरा जुड़ी है। यदि एआई इन भाषाई विविधताओं को समझ सके, तो भारत की भाषाई संस्कृति को नयी डिजिटल शक्ति मिल सकती है। जब कोई जापानी अपनी भाषा में बोलता है तो वह अपनी भाषा के कारण छोटा नहीं होता। जब कोई फ्रांसीसी अपनी भाषा में संवाद करता है तो उसकी प्रतिष्ठा कम नहीं होती। जब चीन अपनी भाषा में विज्ञान और तकनीक का निर्माण कर सकता है तो भारत क्यों नहीं? हमारी योग्यता हमारे ज्ञान, विचार, व्यवहार, रचनात्मकता और कर्म से तय होती है। हमें अंग्रेजी सीखनी चाहिए, दुनिया की अन्य भाषाएं भी सीखनी चाहिए, लेकिन अपनी भाषा बोलने में कभी संकोच नहीं करना चाहिए। दूसरी भाषा सीखना प्रगति है; अपनी भाषा को हीन समझना मानसिक गुलामी है। हिंदी को बचाने की नहीं, विकसित करने की जरूरत है। हिंदी दिवस की सार्थकता तभी होगी, जब हिंदी हमारे समारोहों से निकलकर हमारे व्यवहार, शिक्षा, शोध, तकनीक और भविष्य की निर्माण-प्रक्रिया का हिस्सा बने। (लेखक असिस्टेंट प्रोफेसर, सांस्कृतिक शोधकर्ता, चिंतक और रंग निर्देशक हैं। ये उनके निजी विचार हैं।) 

वर्तमान परिप्रेक्ष्य में शिक्षक का सम्मान चिंतनीय एवं  संवेदनशील
Published / 2026-09-04 20:51:00
वर्तमान परिप्रेक्ष्य में शिक्षक का सम्मान चिंतनीय एवं संवेदनशील

अश्लेष कुमार पांडेय एबीएन एडिटोरियल डेस्क। आज 5 सितंबर को प्रत्येक वर्ष की भांति इस वर्ष भी पूरे देश में भारत के महान दार्शनिक, शिक्षक, प्रथम उपराष्ट्रपति एवं देश के दूसरे राष्ट्रपति डॉ सर्वपल्ली राधाकृष्णन के जन्मदिन को समाज एवं राष्ट्र निर्माता रूपी पद शिक्षक को समर्पित शिक्षक दिवस के रूप में मनाया जा रहा है। अत: राष्ट्र के सभी शिक्षकों को शिक्षक दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं!  गुरु ब्रह्मा गुरु विष्णु गुरु देवो महेश्वर:। गुरु साक्षात परब्रह्मा तस्मै श्री गुरुवे नम:।। इन पंक्तियों के माध्यम से समाज एवं राष्ट्र के समस्त प्रबुद्ध नागरिक को अवगत कराने  की आवश्यकता नहीं है, कि गुरु का स्थान गोविंद अर्थात नारायण से भी बढ़कर है। वर्तमान समय से लगभग 60 वर्ष पूर्व भी शिक्षक दिवस मनाया जाता था किंतु जैसे-जैसे समय आगे बढ़ता गया इस दिवस को मनाने की पद्धति भी बदलती गयी। जहां पूर्व में गुरुकुल से लेकर विद्यालय में चकूचंदा प्राप्त कर विद्यार्थी शिक्षक दिवस मनाते थे। वहीं आज डिजिटल जमाने में अन्य कार्यक्रम को व्यवस्थित कर विद्यार्थी शिक्षकों का सम्मान देते हैं। गुरु शिष्य की परंपरा इस राष्ट्र की संस्कृति का एक अहम और पवित्र रिश्ता है, जिसका कई स्वर्णिम उदाहरण इतिहास के पन्नों में दर्ज है। शिक्षक व्यक्ति ही नहीं  मार्गदर्शक के साथ-साथ प्रेरक एवं जीवन का सच्चा मित्र होता है। शिक्षक प्रत्येक परिस्थिति में समस्या से संघर्ष करना एवं असफलताओं से सीखने की प्रेरणा देता है। डॉक्टर सर्वपल्ली राधाकृष्णन का एक कथन है कि एक वकील की गलती फाइलों में दब जाती है, एक इंजीनियर की गलती दीवार की र्इंट में पीछे छुप जाती है, एक डॉक्टर की गलती कब्रिस्तान में दफन हो जाती है। लेकिन एक शिक्षक की गलती सामाजिक एवं राष्ट्रीय जीवन में स्पष्ट रूप से झलकती है। इसीलिए कहा गया है कि असफलता ही सफलता की कुंजी है और इसी को मानकर एक महान शिक्षक हमेशा विद्यार्थियों को प्रोत्साहित करता है। शिक्षा का अर्थ ही होता है, जो मस्तिष्क को ऊर्जा दे, हृदय को करुणा दे और हाथ को हुनर दे। शिक्षक हमेशा इन पंक्तियों में विश्वास करता है कि राहें जहां तक जायेगी, राहगीर वहां तक जायेगा। तुम दरिया से क्या पूछते हो, नीर कहां तक जायेगा? अरे! खींच धनु की डोर, निशाना साध अपनी मंजिल का, बाकी बाद में देखेंगे की तीर कहां तक जायेगा।।  वर्तमान समय में प्राय यह देखा जा रहा है कि प्रतिवर्ष शिक्षक दिवस सिर्फ एक दिन के लिए समाचार पत्र एवं टीवी न्यूज चैनल से दिये गये संदेश आम जनों तक पहुंचाने का कार्य कर रहा है। डॉक्टर सर्वपल्ली राधाकृष्णन जिस उद्देश्य से अपने जन्मदिन को शिक्षक के लिए समर्पित किये थे वह कहीं ना कहीं आज अधूरा सफल साबित हो रहा है। चाहे इस कार्य के लिए विद्यार्थी, अभिभावक, समाज के प्रबुद्ध जन एवं स्वयं शिक्षक ही जिम्मेवार क्यों न हो? वर्ष के शेष 364 दिन शिक्षक सम्मान न पाकर अधिकांश शिक्षक अपमान ही महसूस कर रहे हैं। इसके लिए मेरा मानना है कि वर्तमान परिप्रेक्ष्य में सरकार, समाज के प्रबुद्ध जन के साथ-साथ विद्यार्थी, विद्यालय प्रबंधन एवं शिक्षक ही मुख्य रूप से जिम्मेवार है। आज पूरे देश में भ्रष्टाचार का बोलबाला चरम सीमा तक  पहुंच गया है जिसमें विद्यार्थी प्रांत से लेकर राष्ट्र स्तर पर प्रदर्शन कर रहे हैं। यह प्रश्न मेरे मन में बार-बार उठता है कि ऐसा क्यों?सरकार किसी भी पार्टी की हो मगर सत्य बात तो यह है कि किसी ने शिक्षा को अपनी प्रथम श्रेणी में नहीं रखा। आजादी से लेकर आज तक लगभग 80 वर्षों के सफर में शिक्षा का हाल तो ऐसा हुआ है की शिक्षक ही इसे अच्छी तरह समझ रहे हैं। सरकार एवं विद्यालय प्रबंधन की मंंशा एवं उनके कार्य के प्रति क्या है? यह अभी तक स्पष्ट नहीं हुआ है। आजादी के बाद भी सरकारी विद्यालय का संचालन एक या दो शिक्षकों के माध्यम से किया जा रहा है। इससे बच्चों का विकास कैसे कराया जा सकता है, यह मेरे 28 वर्षों के अध्यापन कार्य में समझ से परे है। आज विकसित राष्ट्र जहां शिक्षा एवं अध्यापक पर बजट एवं सुविधा का ख्याल जितना रखता है वहीं मेरे देश में इसे सामान्य श्रेणी में रखा जा रहा है। इसका तात्कालिक उदाहरण नवनियुक्त शिक्षकों के वर्तमान समय में वेतन की कमी को देखकर लगाया जा सकता है की सरकार कितना जागरूक है। जहां तक मान्यता प्राप्त एवं निजी विद्यालय के प्रबंधन को देखा जाये तो गिने चुने संगठन के अंतर्गत संचालित विद्यालय को छोड़कर शेष सभी प्रबंधन शिक्षकों का शोषण करने में कमी नहीं कर रहे हैं। इसका एक ही मुख्य कारण है-शिक्षित बेरोजगारी। निजी विद्यालय जो मान्यता प्राप्त नहीं है वेअप्रशिक्षित शिक्षकों को विद्यालय में रखकर अपने मनोनुकूल कार्य करा कर अपना अर्थ उपार्जन तो कर रहे हैं किंतु इसका प्रभाव समाज एवं विद्यार्थियों पर पड  रहा है, जिससे शिक्षक समाज में कहीं न कहीं अपने आप को वंचित महसूस कर रहे हैं। अनावश्यक कार्य तो शिक्षकों पर इतने डाल दिये गये हैं कि वे बच्चों को पढाने की जगह अपनी नौकरी बचाने के लिए पूरे दिन कागजी कार्रवाई में लगे रहते हैं। वर्तमान समय में तो निजी विद्यालय भी इससे अलग नहीं रहा है। ऐसी स्थिति में राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 तो असफल ही साबित होगी चाहे सरकार बंद ए सी कमरे में कितनी भी नीति क्यों ना तैयार कर लें। इन सभी नीतियों से एक ही अर्थ निकलता है कि जब कार्य पद के अनुसार पूर्ण रूप से नहीं करेंगे तो शिक्षक को कैसे सम्मान मिल पायेगा। इसके कारण ही वर्तमान समय में शिक्षक अपने आप को ठगा हुआ महसूस पा रहा है एवं प्रत्येक जगह अपमानित हो रहा है। अत: वर्तमान परिप्रेक्ष्य में शिक्षक का सम्मान एक अत्यंत ही संवेदनशील और विचारणीय विषय बन चुका है। प्राचीन काल में शिक्षक को गुरु मानकर ब्रह्मा एवं विष्णु के भाव से जहां सर्वोच्च स्थान दिया गया जाता था। वहीं आज की आधुनिक व्यवसाय और डिजिटल युग में शिक्षक और समाज की परिभाषा में गहरा बदलाव आया है।इस समय शिक्षकों के सम्मान में बदलते परिप्रेक्ष्य में मुख्य रूप से शिक्षा का व्यवसायीकरण, तकनीकी और इंटरनेट का प्रभाव, अतिरिक्त  शैक्षणिक कार्य, अभिभावक के शिकायती रवैया एवं पदाधिकारी द्वारा अपमानित करना एक चुनौतियां बन गया है। इस बदलते परिवेश  में विद्यार्थी उसी शिक्षक को सम्मान करते हैं जो सिर्फ किताबी ज्ञान न देकर उनके मानसिक स्वास्थ्य को समझता है एवं करियर काउंसलिंग कर मित्र की तरह व्यवहार करता है। इस बात से अलग नहीं किया जा सकता है कि वर्तमान समय में कुछ शिक्षकों द्वारा विद्यालय एवं समाज में ऐसे कृत्य कर  रहे हैं जो शोभनीय ही नहीं बल्कि अपने पद को कलंकित कर रहे  हैं। प्राय:यह समाचार पत्र के माध्यम से देखने को मिलता है जिसका मुख्य कारण अपरिपक्वता एवं अनुभवहीनता भी है। ऐसे शिक्षकों से मेरा करवद्व प्रार्थना है कि आपके अंदर यदि ऐसी प्रवृत्ति हो तो शिक्षक एवं समाज हित में अपने पद से त्यागपत्र देकर किसी अन्य  रोजगार में योगदान दें, जिससे शिक्षकों का मान सम्मान बना रहे। अत: मैं समाज एवं देश के सभी आमजनों से आह्वान करता हूं की राष्ट्र निर्माण में लगे शिक्षक समाज की नीव होते हैं। अत: नैतिकता और मूल्यों के संरक्षण मानसिक रूप से स्वस्थ रहने के लिए शिक्षक को वेतन भोगी कर्मचारी ना मानते हुए इतना सम्मान दें ताकि भविष्य में समाज की नीव को मजबूत बनाते हुए राष्ट्र को विकसित करने में अपना ईमानदारी पूर्वक योगदान दे सकें। (लेखक रोटरी स्कूल, चैनपुर पलामू के प्राचार्य हैं। ये उनके निजी विचार हैं।)

झारखण्ड के जननायक साबित हो सकते हैं टाइगर जयराम महतो
Published / 2026-09-02 13:42:33
झारखण्ड के जननायक साबित हो सकते हैं टाइगर जयराम महतो

डुमरी प्रकरण-विधायिका बनाम कार्यपालिका नहीं, सत्ता बनाम जनआक्रोश हैझारखण्ड के जननायक साबित हो सकते हैं टाइगर जयराम महतोगौतम कुमार पटेलएबीएन एडिटोरियल डेस्क। डुमरी विधायक टाइगर जयराम महतो और बरबड्डा थाना प्रभारी का प्रकरण आज झारखंड में सुर्खियों में है। सतह पर यह एक विधायक और एक थानेदार के बीच की तकरार दिखती है, लेकिन इसके पीछे का सच कहीं ज्यादा गहरा है। सवाल यह नहीं है कि जयराम महतो झारखंड के सबसे बिगड़ैल विधायक हैं जो हर किसी से बहस करते हैं।सवाल यह है कि क्या आज से पहले झारखंड के विधायकों ने थाना प्रभारियों की खरी-खोटी नहीं सुनाई है? हर दिन किसी न किसी थाने में जनता व उनके कार्यकर्ताओं को अपमानित किया जाता है, 26 वर्षों के झारखण्ड में आज तक प्रशासनिक व्यवस्था इतनी बेलगाम है कि राज्य के किसी भी विधानसभा क्षेत्र में रोज किसी न किसी जनप्रतिनिधि का अपमान होता है, पर कभी ऐसा बवंडर नहीं उठा। फिर इस बार क्यों?सरकार जिस एमएमडीआर बिल का विरोध कर रही है, वहीं पलामू जिले में 7 वर्षों से बालू का टेंडर नहीं हुआ है, लेकिन अवैध बालू और पत्थर की ढुलाई से पलामू में पदस्थापित प्रशासनिक व पुलिस अधिकारी जबरन वसूली करते हैं, यह बात पलामू के सभी माननीय विधायकों को पता है। कुछ दिन पूर्व तो राज्य के वित्त मंत्री राधाकृष्ण किशोर, पुलिस से नाराज होकर स्वयं पत्थर लदे ट्रक और ट्रैक्टर को पकड़ने लगे। क्या यह पुलिसिंग व्यवस्था पर सवाल या फिर सरकार की विफलता को नहीं दर्शाता हैं? लेकिन राज्य की खराब पुलिसिंग पर सवाल उठाना एक विधायक के लिए इतना बड़ा तूल पकड़ सकता है? यह बड़ा सवाल हैं? सच में क्या? जयराम महतो के पुलिस से माफी मांग लेने भर से राज्य की पुलिसिंग व प्रशासनिक अव्यवस्था में सुधार हो जाएगा और जनता की मूल भावनाओं को सम्मान मिलना शुरू हो जाएगा, या फिर पुलिस को जयराम महतो से माफी मांगने से कानून-व्यवस्था में सुधारात्मक डर पैदा होगा, यह तय करना किसकी जवाबदेह का काम है ?इसका उत्तर छात्र आंदोलन में छिपा है। राज्य में परीक्षा रिफॉर्म मंच, रविन्द्र पासवान, कुणाल सिंह, देवेंद्र नाथ महतो जैसे सैकड़ों छात्र नेताओं ने सरकार की नींद उड़ा रखी है। सरकार पुलिस के बल पर उन्हें किसी न किसी केस में फंसा सकती है, लेकिन एक निर्वाचित विधायक को कैसे फंसाए? खासकर तब, जब पूरे राज्य में राम और जय राम की लहर हो और युवाओं में जयराम की लोकप्रियता मुख्यमंत्री के कद को बौना साबित कर रही हैं। इसकी कलांतर में जब जाएंगे तो देखिए राज्य में कुड़मी रेल टेका जो बंगाल से लेकर झारखण्ड उड़ीसा तीन राज्यों से जुड़ा था, जिसमे भाजपा, कांग्रेस, झामुमो, आजसू, तृणमूल आदि राजनीतिक पार्टियों के महतो लीडर शामिल हुए लेकिन आंदोलन में केवल जयराम महतो और उनकी पार्टी जेएलकेएम को बदनाम किया गया। जेएसएससी, जेपीएससी आंदोलन या भाषा आंदोलन, डोमेसाइल 1932 हो या फिर खनिज संपदा, जमीन की आंदोलन हर आंदोलन में बिना जय राम के ना लिए बिना किसी मीडिया या नेता का राम राम नही होता। विधानसभा सत्र में सबसे ज्यादा जनमुद्दों को धरातल पर बहस करना हो या फिर राज्य में राजनीतिक हलचल में सियासी दाव पेच या फिर शोशल मीडिया को फ्लॉर्स सब्सक्रिप्शन बढ़ाना हो सभी जगहों पर जय राम ही आते है। यह पूरी घटना सरकार की बौखलाहट का नतीजा है। सरकार को पता है कि आज का जयराम महतो कल मुख्यमंत्री पद का दावेदार हो सकता है। इसलिए एक सोची-समझी रणनीति के तहत इस विवाद को हवा दी जा रही है। सबसे बड़ा सवाल एफआईआर पर है। विधायक पर बीएनएस की संगीन धाराएं - सरकारी काम में बाधा, जबरन धमकी, सरकारी सेवक को धमकाना - लगा दी गईं, जबकि बात केवल मोबाइल फोन पर हुई थी। यदि मामला इतना ही गंभीर था तो विधानसभा अध्यक्ष ने चार दिन तक चुप्पी क्यों साधे रखी? बाद में सिर्फ इतना कह दिया कि संयम बरतना चाहिए। क्या दो बार अध्यक्ष रह चुके अनुभवी नेता का यह दायित्व नहीं था कि वे पुलिस को विधायी प्रोटोकॉल समझाते? और मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन की चुप्पी सबसे ज्यादा सवाल खड़े करती है।विपक्ष के कई विधायक और कई दलों ने वैचारिक मतभेद के बावजूद जयराम का समर्थन किया, लेकिन राज्य के मुखिया ने अब तक मुंह नहीं खोला। बल्कि पुलिस एजेंसियों को अंदर ही अंदर इस आग को भड़काने के लिए छोड़ दिया गया है।यह लड़ाई विधायक बनाम थानेदार की नहीं है। यह लड़ाई उस पुलिसिंग व्यवस्था की विफलता को छिपाने की है, जिस पर खुद जनता का भरोसा उठ चुका है। जयराम महतो आज जननायक की भूमिका में खड़े हैं और यही बात सत्ता को चुभ रही है। (नोट:- लेखक एक स्थानीय पत्रकार हैं, यह उनके निजी विचार हैं।) 

रक्षाबंधन के अवसर पर जीडीपी में बहनों के योगदान को भी याद करें
Published / 2026-08-26 21:44:14
रक्षाबंधन के अवसर पर जीडीपी में बहनों के योगदान को भी याद करें

सत्यनारायण गुप्ता एबीएन एडिटोरियल डेस्क। संसद और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं को एक तिहाई आरक्षण उपलब्ध कराने संबंधी नारी शक्ति वंदन विधेयक संसद से पारित हो चुका है। लेकिन अभी उसके क्रियान्वयन में विलंब है। इस समय संसद में मात्र 13.6% तथा राज्य विधानसभाओं में मात्र 9% महिलाओं का प्रतिनिधित्व है। इसी तरह नौकरशाही में 13 प्रतिशत और न्यायपालिका में आधी आबादी की भागीदारी नगण्य है। व्यापार, कृषि, सुरक्षा, मेडिकल, इंजीनियरिंग, खेल या कला हर क्षेत्र महिलाओं ने अपनी उपस्थिति दर्ज करायी है। लेकिन महिला श्रम का उचित सम्मान समाज को अभी सीखना है। कंसल्टेंसी फर्म मेकिंजे की रिपोर्ट - पावर आॅफ पैरिटी एडवांसिंग वूमेंस इक्वैलिटी इन इंडिया के अनुसार महिलाओं को बराबरी का दर्जा देने पर भारत की अर्थव्यवस्था में तेजी से वृद्धि हो सकती है। इससे देश के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) लाखों करोड़ रुपए की अतिरिक्त बढ़ोतरी हो सकती है। विकास-दर भी 1.4 प्रतिशत ज्यादा संभव है। यदि विश्व के सभी देशों में लिंग भेद पूरी तरह मिट जाए तो विश्व जीडीपी में 1820 लाख करोड़ रुपए की अतिरिक्त बढ़ोतरी होगी। यह राशि संयुक्त राज्य अमेरिका और चीन के संयुक्त जीडीपी के बराबर है। जीडीपी में इस योगदान के लिए कम से कम 6.8 करोड़ और कामकाजी महिलाओं की जरूरत होगी। रिपोर्ट में शामिल 95 देश में से 26 देश प्रति व्यक्ति जीडीपी और मानव विकास इंडेक्स में भारत से पीछे हैं। भारत की जीडीपी में महिलाओं का योगदान इस समय 17 प्रतिशत है जबकि विश्व स्तर पर यह 37 प्रतिशत है। भारत स्टार्टअप और यूनिकॉर्न कम्युनिटी के क्षेत्र में दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा देश है। पर इन स्टार्टअप में सिर्फ 10 प्रतिशत महिलाएं ही फाउंडर हैं। भारत में महिलाओं को पुरुषों के समान स्टार्टअप करने के लिए प्रोत्साहित नहीं किया जाता है। जिसके कारण स्टार्टअप क्षेत्र में महिलाओं का बहुत कम योगदान है। इसके साथ ही भारत में कोरोना महामारी के कारण जेंडर गैप 4.3 प्रतिशत बढ़ गया है। जिसके कारण अर्थव्यवस्था में भी महिलाओं का योगदान कम हुआ है। महिलाओं-पुरुषों में घरेलू जिम्मेदारियों का बंटवारा भी असमान है। महिलाएं कई ऐसे काम करती हैं जिनके बदले पैसे नहीं मिलते। भारतीय महिलाएं ऐसे काम पुरुषों की तुलना में 10 गुना ज्यादा करती हैं, विश्व औसत से तीन गुना अधिक। अगर इसके मूल्य को भी जोड़ा जाए और घरेलू कामों के लिए पैसे दिये जायें तो भारत की इकोनॉमी 20 लाख करोड़ रुपये बढ़ जायेगी। मैकिंजी इंडिया द्वारा भारत के लिए एक नया इंडेक्स तैयार किया है- इंडिया फीमेल एंपावरमेंट इंडेक्स। यह राज्यों में स्त्री पुरुष समानता को मापने का पैमाना है। इसमें शीर्ष पर मिजोरम, केरल, मेघालय, गोवा और सिक्किम हैं। हालांकि नौकरी की उम्र के लिहाज से यहां देश के सिर्फ चार प्रतिशत महिलाएं हैं। सबसे नीचे बिहार, मध्य प्रदेश, असम, झारखंड और उत्तर प्रदेश हैं। यहां कामकाजी उम्र के लिहाज से देश की 32 प्रतिशत महिलाएं हैं। विश्व में बिना पैसे वाला 75 प्रतिशत काम महिलाएं करती हैं। यह हर साल 650 लाख करोड़ रुपये के बराबर है। दुनिया की जीडीपी का लगभग 13 प्रतिशत। भारत में 90 प्रतिशत ऐसे काम महिलाओं के जिम्मे है। आम धारणा है कि गृहणियों का न कोई कमाई होती है और न आर्थिक योगदान। इस धारणा को बदलने की जरुरत है। सुप्रीम कोर्ट ने कृति एवं अन्य बनाम ओरिएण्टल इंश्योरेंश कंपनी लिमिटेड के मामले में 5 जनवरी 2021 को पारित अपने फैसले में माना कि गृहणी का काम बिना कमाई वाला नहीं है। खाना बनाना, घर की देखभाल, बच्चों का पालन-पोषण, परिवार के बुजुर्गों की देखभाल,घर का प्रबंधन आदि ऐसे काम हैं, जिन्हें यदि बाहर से कराया जाए तो उनका आर्थिक मूल्य चुकाना पड़ेगा। इसी तरह  सुप्रीम कोर्ट ने 11 जून 2026 को शिशुपाल बनाम सुरजीत के मामले में एक गृहणी महिला की मासिक आय 30000 रुपये मानते हुए उनके आश्रित के लिए मुआवजा की राशि निर्धारित की है। अगर हम स्त्री-पुरुष का भेद खत्म कर दें तो अर्थव्यवस्था को बहुत ज्यादा फायदा होगा लेकिन यह अंतर तभी मिट सकता है जब हम समाज में लैंगिक समानता पर विचार करें इसके लिए हमें महिलाओं के प्रति अपना नजरिया बदलना होगा उनसे पक्षपात खत्म करना होगा।

देशभक्ति, राजनीति (सरकार) और कूटनीति...
Published / 2026-08-16 16:17:36
देशभक्ति, राजनीति (सरकार) और कूटनीति...

तस्वीर में सरदार वल्लभ भाई पटेल के आज के परिवार के साथ प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी दिखाई दे रहे हैं, यह परिवार आज गुमनामी के अंधेरे में है त्रिवेणी दास एबीएन एडिटोरियल डेस्क। देशभक्ति अलग वस्तु है, राजनीति सर्वथा भिन्न वस्तु है, देश भक्ति का परिणाम अलग है, राजनीति का परिणाम भिन्न ही होता है; और सफल कूटनीति उसे कहते हैं जिसमें देशभक्ति और राजनीति का सम्मिश्रण हो...। 

वंदे मातरम् ...
Published / 2026-08-15 20:51:40
वंदे मातरम् ...

वंदे मातरम् ...त्रिवेणी दासएबीएन एडिटोरियल डेस्क। भारत के राष्ट्रगीत वंदे मातरम् को लाल किला के प्राचीर तक पहुंचने और गाए जाने में अंग्रेजों से अपने देश के आजादी के बाद 80 वर्ष लग गए।वंदे मातरम् गीत की रचना आज से 150 वर्ष पूर्व बंगाल के बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय ने 1875 में किया और अपने प्रसिद्ध उपन्यास "आनंद मठ" में 1882 में सम्मिलित करते हुए उपन्यास का अंग बनाया।गुरुदेव रविंद्र नाथ टैगोर ने इस गीत को 1896 में तत्कालीन कांग्रेस के एक सभा में आजादी के प्रेरणा-गीत के स्वरूप में पहली बार गया, और तब से यह गीत आजादी के मतवालों, जेल जाने वालों और फांसी के फंदे पर झूलने वालों का नारा (Slogan) बन गया। आपस में मिलने वाले भारतीयों का दुआ-सलाम का वाक्य बन गया। गुलामी के समय ब्रिटिश सरकार चाहती थी कि राष्ट्रगीत के रूप में गौड सेभ द क्वीन (god save the queen) गया जाए, लेकिन आजादी के दीवानों ने उसका प्रतिकार किया।भारत के प्रथम राष्ट्रपति डॉ राजेंद्र प्रसाद को 11 दिसंबर 1946 को संविधान सभा का स्थाई अध्यक्ष चुना गया और 24 जनवरी 1950 को संविधान सभा की स्वीकृति के बाद डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद ने इस गीत को राष्ट्रगीत का दर्जा प्रदान किया; तब से यह गीत राष्ट्रगीत के रूप में भारत में गया जा रहा है।भारत के फिल्मों में प्रसिद्ध संगीतकार एवं गायक ए. आर. रहमान ने एक संगीत "मां तुझे सलाम"  तैयार किया और इसे अपने एल्बम वंदे मातरम् सम्मिलित करते हुए इस गीत को जन-जन तक पहुंचाया। 30 जुलाई 2026 को लोकसभा में बिल पास करके वंदे मातरम् गीत को आंशिक नहीं गाते हुए पूर्ण स्वरूप में गाने का संरक्षण एवं सम्मान प्रदान किया गया।आज 15 अगस्त 2026 को संपूर्ण देश एवं दुनिया भर के लोगों ने देखा कि तिरंगा ध्वजारोहण के बाद वंदे मातरम् के धुन बजाए गए तत्काल बाद राष्ट्रगान जन गण मन के धुन बजाए गए। वायुसेना के हेलीकॉप्टर M_17 ने वंदे मातरम् का बैनर लेकर लाल किला के ऊपर उड़ान भरते हुए तिरंगा के ऊपर फूलों की बरसात की। वंदे मातरम् गीत गाते हुए जिन स्वतंत्रता सेनानियों ने अपनी कुर्बानी दी थी आज पूरे राष्ट्र ने उनके प्रति अपनी श्रद्धांजलि समर्पित किया है..भारत माता की जय _! वंदे मातरम् _!!जय हिंद_!!!

नासूर...
Published / 2026-08-14 21:48:56
नासूर...

त्रिवेणी दास एबीएन एडिटोरियल डेस्क। नासूर वह जख्म है जो कभी ठीक नहीं होता है और उसकी दर्द-भरी टीश भारी तकलीफ देती रहती है। देश के बंटवारे का नासूर हम भारतीयों के लिए कभी नहीं खत्म होने वाला एक ऐसा मर्ज है जो लाइलाज है। भारत को लगभग 200 वर्षों तक अंग्रेजों ने गुलाम बनाए रखा। ब्रिटिश सरकार के अंतिम गवर्नर-जनरल माउंटबेटन ब्रिटिश सरकार के प्रतिनिधि के रूप में भारत में कार्यरत थे। 3 जून 1947 को भारत के विभाजन की योजना माउंटबेटन योजना के रूप में घोषित की गई और जुलाई 1947 को इसे ब्रिटिश संसद में पेश करते हुए पारित किया गया और भारत का विभाजन सुनिश्चित हो गया।  14 अगस्त 1947 को पाकिस्तान ने अपना स्वतंत्रता दिवस मनाया और दुनिया के नक्शे में एक नए राष्ट्र का उदय हो गया। भारत ने 15 अगस्त 1947 को अपने खंडित स्वरूप में अपना स्वतंत्रता दिवस मनाया। कश्मीर को लेकर भारत एवं पाकिस्तान के बीच 22 अक्टूबर 1947 को युद्ध शुरू हुआ और कश्मीर के भारत में विलय के बाद भी कश्मीर का एक भाग पाकिस्तान के कब्जे में चला गया जिसे आज भी पाक अधिकृत कश्मीर (ढडङ) कहा जाता है। देश के बंटवारा के बाद से आज तक पाकिस्तान भारत के साथ अनेक मुद्दों पर लड़ाई करते रहता है, कभी सीधा तो कभी छद्म अटैक भारत के ऊपर करते रहना उसकी आदत बन गयी है और यही वह नासूर है जो देशवासियों के लिए कभी नहीं ठीक होने वाला एक घाव बन गया है। बंटवारा के बाद पाकिस्तान से पलायन, खून खराबा और हत्या बलात्कार की एक अलग ही दर्द भरी दास्तान है जो नासूर को नीम चढ़ा बना देता है। कल 15 अगस्त 2026 को हम सभी देशवासी स्थापित परंपरा के अनुसार स्वतंत्रता दिवस मनाएंगे और लाल किला के प्राचीर में प्रधानमंत्री तिरंगा का ध्वजारोहण करेंगे तथा राष्ट्र को संबोधित करेंगे। स्वतंत्रता दिवस के शुभ अवसर पर हर वर्ष हम सभी एक नई उम्मीद, नई योजना के साथ राष्ट्र के सम्पूर्ण समृद्धि का संकल्प लेते हैं...। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं और ये उनके निजी विचार हैं।)

रोम जल रहा था और नीरो बंशी बजा रहा था...
Published / 2026-08-13 22:41:45
रोम जल रहा था और नीरो बंशी बजा रहा था...

रोम जल रहा था और नीरो बंशी बजा रहा था...त्रिवेणी दासरोम जल रहा था नीरो बंसी बजा रहा था बयानवीर का अपना घर जल रहा था दूसरे के घर में अंजलि से पानी डाल रहा थासवाल है कि दिल्ली के जंतर मंतर के आंदोलनकारी छात्र अगर छात्र थे, तो झारखंड के रांची में आंदोलनकारी छात्र दूसरे ग्रह आये बाह्य अंतरिक्ष-जीव हैं क्या? सवालों से बचने के लिए झारखंड में इं.डि.या. गठबंधन की सरकार विधानसभा का सत्र एक दिन पहले ही समाप्त कर देती है, इस पर तो माननीय सांसद इं.डि.या. गठबंधन के हिस्सा होने का फर्ज तो नहीं निभाते हैं, अलबत्ता संसद नहीं चलने देकर गर्व से अपना पीठ थपथपाते हुए डेमोक्रेसी के शान में बंदर राग में गजल गुनगुनाते हैं।रांची में छात्रों के आंदोलन को कभर करने वाले वाले पत्रकार को थाना में डिटेन कराया जाता है और एफआईआर की कॉपी थमा दी जाती है, परिवारवादियों की तानाशाही उजागर हो जाती है, जो अक्सर होती रहती है;  ऐसे में वह आदर्श, उसूल और लोकतंत्र के नैतिकता पता नहीं क्यों पीछे रह जाती है?हकीकत है कि काठ की हांडी से बार-बार खिचड़ी नहीं पकाइ जा सकती है। आवाम की समझदारी ने अपने मतदान से देश भर में लोकप्रिय सरकार का गठन किया है और आने वाले दिनों में जनता की समझदारी दूध का दूध और पानी का पानी को अलग करने का अपनी समझदारी पुन: सिद्ध करेगी...।

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