मनुष्य के स्वभाव की विडंबना...त्रिवेणी दासएबीएन एडिटोरियल डेस्क। मनुष्य के स्वभाव का विचित्र विडंबना है कि उसकी पूरी जीवन दुनिया को यह समझाने में व्यतीत हो जाती है कि वह क्या चीज है। हर एक व्यक्ति को अपने उलझन, परेशानी, दुख और अपने द्वारा किये गये अच्छे बुरे कार्यों को दूसरों से मान्यता तो चाहिए परंतु वह किसी दूसरे को मान्यता देने के लिए कभी तैयार होता ही नहीं है। गति एवं प्रवाह ही जीवन है, जहां दोनों रुके कि जीवन मृत्यु में परिवर्तित हो जाती है।दोनों में यदि व्यवधान उत्पन्न हुआ तो रोग धर दबोचता है। नदियों के प्रवाह में जो जल बह जाती है वह वापस नहीं लौटती है। जल आते रहते हैं प्रवाहित होकर समुद्र में मिल जाते हैं। जीवन में घटित होने वाले घटनाएं नदी के प्रवाह के भांति किनारों से टकराती तो जरूर है परंतु जब बाढ़ का स्वरूप ग्रहण कर लेती है तो विनाश की विभीषिका उत्पन्न कर देती है।अपने कार्यों के लेखा-जोखा का स्मारक एक दिन इतना भारी हो जाता है कि उसे ढोना मुश्किल हो जाता है और उसके बोझ के तले दबा हुआ आदमी कराहते रहता है, उसकी स्वतंत्रता समाप्त हो जाती है। जिस दिन जिस घड़ी दूसरों से प्रशंसा सुनने का काम बंद हो जाता है ठीक उसी क्षण से आदमी स्वतंत्र हो जाता है। उसके स्मारक के बोझ से वह मुक्त हो जाता है। उसके मैं वाले बोध का परत हट जाता है, अहंकार तिरोहित हो जाते हैं और उसका अपने वास्तविक स्वरूप से साक्षात्कार हो जाता है। जीवन की यात्रा महासागर में सरलता से विलीन हो जाती है, तथा वह स्वयं महासागर बन जाता है।
भारतीय राजनीति में विकल्प नहीं हो तो मोह स्वाभाविक स्वरूपअति परिचय होत हैअरुचि अनादर भाय,मलयागिरि की भीलनीचंदन देत जराय।त्रिवेणी दासएबीएन एडिटोरियल डेस्क। बताया जाता है कि परिचय के लंबे दौर से मोह भंग होने लगता है, लेकिन विकल्प नहीं हो तो मोह स्वाभाविक स्वरूप में बना रहता है। आज के भारतीय राजनीति में लगभग यही स्थिति बनी हुई है। नेता प्रतिपक्ष कांग्रेस के राहुल गांधी और इं.डि.या. गठबंधन के अन्य नेताओं को वह कारण नहीं मिल रहा है कि क्यों मोदी जी के लगभग 12..13 साल के कार्यकाल के बाद भी जन सामान्य का आकर्षण उनके प्रति बना हुआ है। राज्यों में चुनाव दर चुनाव भाजपा की जीत होते जाना विपक्ष के लिए रहस्य का कारण बना हुआ है। विपक्ष कहता रहा है कि वोट की चोरी हो रही है, ईवीएम मशीन को हैक किया जा रहा है, मतदाता सूची में गड़बड़ी किया जा रहा है; लेकिन उनके ओर से अभी तक देश के सामने कोई अकाट्य ठोस प्रमाण प्रस्तुत नहीं किया जा सके हैं।पिछले चुनाव में उत्तर प्रदेश में भाजपा को कम सीट आई, तमिलनाडु और केरल में भाजपा कुछ नहीं कर पाई, पंजाब और हिमाचल प्रदेश में गैर भाजपा की सरकार है; ऐसे में मतदान में गड़बड़ी के आरोप स्वत: झूठा सिद्ध हो जाते हैं। भाजपा एवं मोदी जी के प्रति जन सामान्य का मोह भंग होने का इंतजार कर रहे राहुल गांधी एवं अन्य विरोधी नेता मजबूत विकल्प देने में नाकामयाब रहे हैं, तो जानता अंधकूप में क्यों कूद पड़ेगी? हर देश में अवैध घुसपैठ का विरोध किया जाता है। मतदाता सूची को दुरुस्त रखने के लिए समय-समय पर उनका गहन पुनरीक्षण किया जाता है; लेकिन भारत में विरोध किया जाता है। संविधान एवं देश के सुरक्षा का प्रश्न खड़ा किया जाता है। अभद्र भाषा एवं गाली गलौज से मतदाता लुभाये नहीं जा सकते हैं। संसद की कार्यवाही नहीं चलने दे कर जनता में मोह और लगाव उत्पन्न नहीं किया जा सकता है।भारत में लोकतंत्र के लंबी अवधि के बाद और आज के सूचना तकनीक की उपलब्धता के जमाने में जनता को उल्लू बनाना यदि समाप्त नहीं हुआ है तो सरल भी नहीं रह गया है। बाकी चुनाव के परिणाम में बहुत सारे आयाम होते हैं, चुनाव लड़ने वाला हर कोई उसे साधता ही है.. "जो जीता वही सिकंदर"
डॉक्टरों के प्रति संवेदनशीलता : समय की मांगप्रो. प्रेम नारायण सिंहएबीएन एडिटोरियल डेस्क। पिछले दिनों एक दैनिक समाचार पत्र में देश के विभिन्न मेडिकल कॉलेजों और चिकित्सा संस्थानों में मेडिकल छात्रों तथा रेजिडेंट डॉक्टरों की आत्महत्या से जुड़ी खबर प्रकाशित हुई। किसी युवा की असमय मृत्यु, विशेषकर आत्महत्या, निस्संदेह परिवार, समाज और देश के लिए गहरा आघात है। ऐसे हर मामले पर गंभीरता से विचार होना चाहिए। लेकिन उससे भी अधिक जरूरी यह है कि हम इन घटनाओं के पीछे छिपी परिस्थितियों को समझें और यह सुनिश्चित करें कि ऐसी त्रासदियों की पुनरावृत्ति न हो। जब जीवन बचाने वाले ही जीवन से हारने लगें, तब यह केवल व्यक्तिगत संकट नहीं रह जाता; यह हमारी चिकित्सा शिक्षा और स्वास्थ्य व्यवस्था के सामने खड़ा एक गंभीर प्रश्न बन जाता है। हम चिकित्सक को सामान्यत: जीवनदाता, संकटमोचक और आशा के प्रतीक के रूप में देखते हैं।अस्पताल के किसी आपातकालीन कक्ष में जब मरीज और उसके परिजन भय और असमंजस में होते हैं, तब उनकी निगाहें डॉक्टर पर टिकी होती हैं। लेकिन इस पूरे परिदृश्य में एक सवाल अक्सर अनदेखा रह जाता है—जिस डॉक्टर पर किसी दूसरे व्यक्ति का जीवन निर्भर है, उस समय उसकी अपनी मानसिक और शारीरिक स्थिति कैसी है?26 सितंबर 2026 को प्रकाशित एक समाचार के अनुसार, मार्च से 24 सितंबर के बीच लगभग छह महीनों में देश के 11 मेडिकल कॉलेजों एवं चिकित्सा संस्थानों के 12 पीजी रेजिडेंट, जूनियर डॉक्टर और मेडिकल छात्रों ने आत्महत्या की। रिपोर्ट में लगातार लंबी ड्यूटी, पढ़ाई का दबाव और रैगिंग जैसी परिस्थितियों का उल्लेख किया गया। यदि ये परिस्थितियां बार-बार सामने आ रही हैं, तो हमें इसे केवल व्यक्तिगत असफलता या व्यक्तिगत कमजोरी मानकर आगे नहीं बढ़ जाना चाहिए। रेजिडेंट डॉक्टरों पर किए गए एक अध्ययन के आंकड़े भी चिंता पैदा करते हैं। अध्ययन में बड़ी संख्या में डॉक्टरों ने नींद पूरी न होने, लगातार लंबी ड्यूटी और अत्यधिक तनाव की शिकायत की। कुछ डॉक्टरों ने आत्महत्या के विचार आने की बात भी स्वीकार की। ये आंकड़े महज आंकड़े नहीं हैं; ये हमारी चिकित्सा व्यवस्था के लिए चेतावनी हैं।यह समस्या नई नहीं है। लगभग दो दशक पहले बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के सर सुंदरलाल चिकित्सालय में मेरे पिता के इलाज के दौरान मुझे स्वयं एक रेजिडेंट डॉक्टर के अत्यधिक तनाव और चिड़चिड़े व्यवहार का अनुभव हुआ। बाद में बातचीत से पता चला कि रेजिडेंट डॉक्टरों की लगातार 25-30 घंटे तक ड्यूटी सामान्य बात मानी जाती थी। उस समय भी प्रश्न यही था कि इतनी लंबी ड्यूटी के बाद कोई चिकित्सक स्वयं को मानसिक और शारीरिक रूप से कितना संतुलित रख सकता है? आज इतने वर्षों बाद भी यदि वही प्रश्न हमारे सामने खड़ा है, तो हमें ठहरकर सोचना होगा कि चिकित्सा शिक्षा और स्वास्थ्य संस्थानों की कार्य-संस्कृति में वास्तविक परिवर्तन कितना आया है। चिकित्सकों के सामने चुनौती केवल लंबी ड्यूटी तक सीमित नहीं है। वे प्रतिदिन बीमारी, पीड़ा और मृत्यु से रूबरू होते हैं। गंभीर मरीजों की स्थिति, मरीज की मृत्यु, परिजनों का आक्रोश, संसाधनों की कमी और उपचार से जुड़े कठिन निर्णय उनके मानसिक संसार पर प्रभाव डालते हैं।इसे केवल प्रोफेशनल ड्यूटी कहकर नजरअंदाज करना उचित नहीं होगा। हमारे यहां अक्सर कहा जाता है कि डॉक्टर को मजबूत होना चाहिए। निस्संदेह चिकित्सक में कठिन परिस्थितियों में निर्णय लेने, भावनात्मक संतुलन बनाए रखने और आपात स्थिति में नेतृत्व करने की क्षमता होनी चाहिए। लेकिन मजबूत होने का अर्थ यह नहीं कि उसे थकान, तनाव, भय या मानसिक पीड़ा महसूस करने का अधिकार ही न हो। डॉक्टर भी मनुष्य है। उसे भी पर्याप्त नींद, विश्राम, सम्मान, संवाद और भावनात्मक सहारे की आवश्यकता होती है।इस संदर्भ में राष्ट्रीय आयुर्विज्ञान आयोग और संबंधित संस्थाओं द्वारा बनाए गए नियम एवं प्रावधान महत्वपूर्ण हैं, लेकिन असली चुनौती उनके प्रभावी क्रियान्वयन की है। किसी भी व्यवस्था की सफलता उसके नियमों की संख्या से नहीं, बल्कि उन नियमों के जमीन पर उतरने से तय होती है। इस दिशा में कुछ संस्थागत कदम तत्काल प्रभाव से मजबूत किए जाने चाहिए।पहला, लंबी और लगातार ड्यूटी की नियमित समीक्षा हो तथा पर्याप्त विश्राम और शिफ्ट व्यवस्था सुनिश्चित की जाए।दूसरा, मेडिकल छात्रों और रेजिडेंट डॉक्टरों के लिए नियमित काउंसलिंग तथा मनोवैज्ञानिक सहायता की व्यवस्था हो। मानसिक स्वास्थ्य को कमजोरी नहीं, बल्कि पेशेवर स्वास्थ्य का अनिवार्य हिस्सा माना जाए।तीसरा, नियमित स्वास्थ्य परीक्षण के साथ मानसिक स्वास्थ्य की भी समय-समय पर स्क्रीनिंग की जाए।चौथा, प्रत्येक चिकित्सा संस्थान में प्रभावी और स्वतंत्र शिकायत निवारण तंत्र हो, जहां रैगिंग, उत्पीड़न, बुलिंग, अपमानजनक व्यवहार और अनुचित कार्यभार से जुड़ी शिकायतें सुरक्षित तरीके से दर्ज की जा सकें।पांचवां, मेंटोर-मेंटी सिस्टम को प्रभावी बनाया जाए। प्रत्येक जूनियर या रेजिडेंट डॉक्टर को ऐसा प्रशिक्षित फैकल्टी मेंटर मिले, जिसके साथ वह अकादमिक के साथ-साथ व्यक्तिगत और पेशेवर कठिनाइयों पर भी खुलकर संवाद कर सके।छठा, मरीजों और उनके परिजनों की तरह डॉक्टरों और अन्य स्वास्थ्यकर्मियों के लिए भी मनोवैज्ञानिक प्राथमिक सहायता की संस्थागत व्यवस्था विकसित की जाए।सातवां, संस्थानों के नेतृत्व की जवाबदेही केवल परीक्षा परिणाम, शोध और अकादमिक उपलब्धियों तक सीमित न रहे। विभागाध्यक्ष और संस्थान के नेतृत्व को कार्यस्थल के वातावरण, कर्मचारियों के मानसिक स्वास्थ्य और सुरक्षित कार्य-संस्कृति के लिए भी जवाबदेह बनाया जाना चाहिए।सबसे बड़ा परिवर्तन शायद हमारी सोच में होना चाहिए। डॉक्टर को केवल सेवा प्रदाता मानने के बजाय हमें उसे एक संवेदनशील मनुष्य और प्रशिक्षित पेशेवर के रूप में देखना होगा। जो डॉक्टर दिन-रात दूसरों की धड़कन बचाने में लगा है, उसकी अपनी धड़कन को भी सुनना होगा। जो डॉक्टर मरीज से पूछता है— आपको कैसा महसूस हो रहा है? उसी तरह संस्थानों के अकादमिक और प्रशासनिक नेतृत्व को भी कभी-कभी डॉक्टर से पूछना चाहिए—आप कैसा महसूस कर रहे हैं? यह सवाल औपचारिकता नहीं, बल्कि संवेदनशील चिकित्सा व्यवस्था की पहचान होना चाहिए। हमें ऐसी कार्य-संस्कृति विकसित करनी होगी जिसमें चिकित्सक लंबे समय तक स्वस्थ, संवेदनशील और सक्षम रह सकें। आखिरकार मरीज की सुरक्षा और डॉक्टर का मानसिक स्वास्थ्य एक-दूसरे से अलग नहीं हैं। एक स्वस्थ चिकित्सक ही बेहतर निर्णय ले सकता है, बेहतर संवाद कर सकता है और बेहतर चिकित्सा सेवा दे सकता है।इसलिए डॉक्टरों की मानसिक और शारीरिक सुरक्षा कोई अतिरिक्त सुविधा नहीं, बल्कि मरीज की सुरक्षा और गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य सेवा की मूल आवश्यकता है। जो लोग दूसरों का जीवन बचाने के लिए अपना जीवन समर्पित करते हैं, उनके जीवन की रक्षा करना केवल संस्थानों का दायित्व नहीं, बल्कि पूरे समाज की जिम्मेदारी है। (लेखक अंतर विश्वविद्यालय अध्यापक शिक्षा केंद्र, बीएचयू वाराणसी के निदेशक हैं।)
डॉक्टरों के प्रति संवेदनशीलता : समय की मांगप्रो. प्रेम नारायण सिंहएबीएन एडिटोरियल डेस्क। पिछले दिनों एक दैनिक समाचार पत्र में देश के विभिन्न मेडिकल कॉलेजों और चिकित्सा संस्थानों में मेडिकल छात्रों तथा रेजिडेंट डॉक्टरों की आत्महत्या से जुड़ी खबर प्रकाशित हुई। किसी युवा की असमय मृत्यु, विशेषकर आत्महत्या, निस्संदेह परिवार, समाज और देश के लिए गहरा आघात है। ऐसे हर मामले पर गंभीरता से विचार होना चाहिए। लेकिन उससे भी अधिक जरूरी यह है कि हम इन घटनाओं के पीछे छिपी परिस्थितियों को समझें और यह सुनिश्चित करें कि ऐसी त्रासदियों की पुनरावृत्ति न हो। जब जीवन बचाने वाले ही जीवन से हारने लगें, तब यह केवल व्यक्तिगत संकट नहीं रह जाता; यह हमारी चिकित्सा शिक्षा और स्वास्थ्य व्यवस्था के सामने खड़ा एक गंभीर प्रश्न बन जाता है। हम चिकित्सक को सामान्यत: जीवनदाता, संकटमोचक और आशा के प्रतीक के रूप में देखते हैं।अस्पताल के किसी आपातकालीन कक्ष में जब मरीज और उसके परिजन भय और असमंजस में होते हैं, तब उनकी निगाहें डॉक्टर पर टिकी होती हैं। लेकिन इस पूरे परिदृश्य में एक सवाल अक्सर अनदेखा रह जाता है—जिस डॉक्टर पर किसी दूसरे व्यक्ति का जीवन निर्भर है, उस समय उसकी अपनी मानसिक और शारीरिक स्थिति कैसी है?26 सितंबर 2026 को प्रकाशित एक समाचार के अनुसार, मार्च से 24 सितंबर के बीच लगभग छह महीनों में देश के 11 मेडिकल कॉलेजों एवं चिकित्सा संस्थानों के 12 पीजी रेजिडेंट, जूनियर डॉक्टर और मेडिकल छात्रों ने आत्महत्या की। रिपोर्ट में लगातार लंबी ड्यूटी, पढ़ाई का दबाव और रैगिंग जैसी परिस्थितियों का उल्लेख किया गया। यदि ये परिस्थितियां बार-बार सामने आ रही हैं, तो हमें इसे केवल व्यक्तिगत असफलता या व्यक्तिगत कमजोरी मानकर आगे नहीं बढ़ जाना चाहिए। रेजिडेंट डॉक्टरों पर किए गए एक अध्ययन के आंकड़े भी चिंता पैदा करते हैं। अध्ययन में बड़ी संख्या में डॉक्टरों ने नींद पूरी न होने, लगातार लंबी ड्यूटी और अत्यधिक तनाव की शिकायत की। कुछ डॉक्टरों ने आत्महत्या के विचार आने की बात भी स्वीकार की। ये आंकड़े महज आंकड़े नहीं हैं; ये हमारी चिकित्सा व्यवस्था के लिए चेतावनी हैं।यह समस्या नई नहीं है। लगभग दो दशक पहले बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के सर सुंदरलाल चिकित्सालय में मेरे पिता के इलाज के दौरान मुझे स्वयं एक रेजिडेंट डॉक्टर के अत्यधिक तनाव और चिड़चिड़े व्यवहार का अनुभव हुआ। बाद में बातचीत से पता चला कि रेजिडेंट डॉक्टरों की लगातार 25-30 घंटे तक ड्यूटी सामान्य बात मानी जाती थी। उस समय भी प्रश्न यही था कि इतनी लंबी ड्यूटी के बाद कोई चिकित्सक स्वयं को मानसिक और शारीरिक रूप से कितना संतुलित रख सकता है? आज इतने वर्षों बाद भी यदि वही प्रश्न हमारे सामने खड़ा है, तो हमें ठहरकर सोचना होगा कि चिकित्सा शिक्षा और स्वास्थ्य संस्थानों की कार्य-संस्कृति में वास्तविक परिवर्तन कितना आया है। चिकित्सकों के सामने चुनौती केवल लंबी ड्यूटी तक सीमित नहीं है। वे प्रतिदिन बीमारी, पीड़ा और मृत्यु से रूबरू होते हैं। गंभीर मरीजों की स्थिति, मरीज की मृत्यु, परिजनों का आक्रोश, संसाधनों की कमी और उपचार से जुड़े कठिन निर्णय उनके मानसिक संसार पर प्रभाव डालते हैं।इसे केवल प्रोफेशनल ड्यूटी कहकर नजरअंदाज करना उचित नहीं होगा। हमारे यहां अक्सर कहा जाता है कि डॉक्टर को मजबूत होना चाहिए। निस्संदेह चिकित्सक में कठिन परिस्थितियों में निर्णय लेने, भावनात्मक संतुलन बनाए रखने और आपात स्थिति में नेतृत्व करने की क्षमता होनी चाहिए। लेकिन मजबूत होने का अर्थ यह नहीं कि उसे थकान, तनाव, भय या मानसिक पीड़ा महसूस करने का अधिकार ही न हो। डॉक्टर भी मनुष्य है। उसे भी पर्याप्त नींद, विश्राम, सम्मान, संवाद और भावनात्मक सहारे की आवश्यकता होती है।इस संदर्भ में राष्ट्रीय आयुर्विज्ञान आयोग और संबंधित संस्थाओं द्वारा बनाए गए नियम एवं प्रावधान महत्वपूर्ण हैं, लेकिन असली चुनौती उनके प्रभावी क्रियान्वयन की है। किसी भी व्यवस्था की सफलता उसके नियमों की संख्या से नहीं, बल्कि उन नियमों के जमीन पर उतरने से तय होती है। इस दिशा में कुछ संस्थागत कदम तत्काल प्रभाव से मजबूत किए जाने चाहिए।पहला, लंबी और लगातार ड्यूटी की नियमित समीक्षा हो तथा पर्याप्त विश्राम और शिफ्ट व्यवस्था सुनिश्चित की जाए।दूसरा, मेडिकल छात्रों और रेजिडेंट डॉक्टरों के लिए नियमित काउंसलिंग तथा मनोवैज्ञानिक सहायता की व्यवस्था हो। मानसिक स्वास्थ्य को कमजोरी नहीं, बल्कि पेशेवर स्वास्थ्य का अनिवार्य हिस्सा माना जाए।तीसरा, नियमित स्वास्थ्य परीक्षण के साथ मानसिक स्वास्थ्य की भी समय-समय पर स्क्रीनिंग की जाए।चौथा, प्रत्येक चिकित्सा संस्थान में प्रभावी और स्वतंत्र शिकायत निवारण तंत्र हो, जहां रैगिंग, उत्पीड़न, बुलिंग, अपमानजनक व्यवहार और अनुचित कार्यभार से जुड़ी शिकायतें सुरक्षित तरीके से दर्ज की जा सकें।पांचवां, मेंटोर-मेंटी सिस्टम को प्रभावी बनाया जाए। प्रत्येक जूनियर या रेजिडेंट डॉक्टर को ऐसा प्रशिक्षित फैकल्टी मेंटर मिले, जिसके साथ वह अकादमिक के साथ-साथ व्यक्तिगत और पेशेवर कठिनाइयों पर भी खुलकर संवाद कर सके।छठा, मरीजों और उनके परिजनों की तरह डॉक्टरों और अन्य स्वास्थ्यकर्मियों के लिए भी मनोवैज्ञानिक प्राथमिक सहायता की संस्थागत व्यवस्था विकसित की जाए।सातवां, संस्थानों के नेतृत्व की जवाबदेही केवल परीक्षा परिणाम, शोध और अकादमिक उपलब्धियों तक सीमित न रहे। विभागाध्यक्ष और संस्थान के नेतृत्व को कार्यस्थल के वातावरण, कर्मचारियों के मानसिक स्वास्थ्य और सुरक्षित कार्य-संस्कृति के लिए भी जवाबदेह बनाया जाना चाहिए।सबसे बड़ा परिवर्तन शायद हमारी सोच में होना चाहिए। डॉक्टर को केवल सेवा प्रदाता मानने के बजाय हमें उसे एक संवेदनशील मनुष्य और प्रशिक्षित पेशेवर के रूप में देखना होगा। जो डॉक्टर दिन-रात दूसरों की धड़कन बचाने में लगा है, उसकी अपनी धड़कन को भी सुनना होगा। जो डॉक्टर मरीज से पूछता है— आपको कैसा महसूस हो रहा है? उसी तरह संस्थानों के अकादमिक और प्रशासनिक नेतृत्व को भी कभी-कभी डॉक्टर से पूछना चाहिए—आप कैसा महसूस कर रहे हैं? यह सवाल औपचारिकता नहीं, बल्कि संवेदनशील चिकित्सा व्यवस्था की पहचान होना चाहिए। हमें ऐसी कार्य-संस्कृति विकसित करनी होगी जिसमें चिकित्सक लंबे समय तक स्वस्थ, संवेदनशील और सक्षम रह सकें। आखिरकार मरीज की सुरक्षा और डॉक्टर का मानसिक स्वास्थ्य एक-दूसरे से अलग नहीं हैं। एक स्वस्थ चिकित्सक ही बेहतर निर्णय ले सकता है, बेहतर संवाद कर सकता है और बेहतर चिकित्सा सेवा दे सकता है।इसलिए डॉक्टरों की मानसिक और शारीरिक सुरक्षा कोई अतिरिक्त सुविधा नहीं, बल्कि मरीज की सुरक्षा और गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य सेवा की मूल आवश्यकता है। जो लोग दूसरों का जीवन बचाने के लिए अपना जीवन समर्पित करते हैं, उनके जीवन की रक्षा करना केवल संस्थानों का दायित्व नहीं, बल्कि पूरे समाज की जिम्मेदारी है। (लेखक अंतर विश्वविद्यालय अध्यापक शिक्षा केंद्र, बीएचयू वाराणसी के निदेशक हैं।)
15 सेकंड का दौर: क्या हम अपनी आने वाली पीढ़ी की सोच और भविष्य को खो रहे हैं?डॉ नीता रजकएबीएन एडिटोरियल डेस्क। कल शाम मेज़ पर रखी कुछ पुरानी किताबों को देखकर मुझे अपनी एक छात्रा की बात याद आ गई, जिसने सहजता से कहा था कि मैम, आजकल इतनी मोटी किताबें कौन पढ़ता है, आप तो बस 15 सेकंड की रील बता दीजिए। यह बात सिर्फ एक बच्ची की सोच नहीं, बल्कि आज के पूरे समाज का सच बन चुकी है। एक शिक्षिका होने के नाते मेरे मन में बार-बार यह सवाल उठता है कि हम बच्चों को किस तरफ ले जा रहे हैं। क्या 15 सेकंड के टुकड़ों में बंटी यह दुनिया बच्चों के दिमाग के लिए सही है, या हम अनजाने में उनकी सोचने की ताकत और सब्र खो रहे हैं?जब भी रील्स के नुकसान पर बात होती है, लोग कहते हैं कि इससे युवाओं को कमाई का मौका मिल रहा है, तो बुराई क्या है। इंटरनेट ने कुछ बच्चों को हुनर दिखाने का मौका ज़रूर दिया है, पर गहराई से सोचने पर इसमें एक बड़ा धोखा नज़र आता है। क्या कुछ चुनिंदा युवाओं की कमाई के बहाने हम उन करोड़ों बच्चों का नुकसान भूल जाएं, जो वीडियो बनाते नहीं, बल्कि हर दिन 5-6 घंटे सिर्फ दूसरों के वीडियो देखते हैं? काम करने और लत में बड़ा फर्क है। असल में कमाई करने वाले लोग बहुत मुट्ठी भर हैं, जबकि ज़्यादातर लोग अपना सबसे कीमती समय और सोचने की ताकत मुफ़्त में गँवा रहे हैं।यह 15 सेकंड का खेल सिर्फ मनोरंजन नहीं, इसके पीछे दिमाग का एक खेल चल रहा है। अगली रील में क्या आएगा, इसी उत्सुकता में हमारा मन बेचैन रहता है—बिल्कुल वैसे ही जैसे जुए में लोग बार-बार दांव लगाते हैं। नतीजा यह है कि बच्चों का दिमाग तुरंत खुशी पाने का आदी होता जा रहा है, और किसी कठिन बात को सब्र से समझने की ताकत धीरे-धीरे खत्म हो रही है। ज्ञान कोई फास्ट फूड नहीं जिसे 15 सेकंड में खा लिया जाए; वह एक पेड़ की तरह है जिसकी जड़ें गहरी होती हैं। जब नई पीढ़ी के पास किसी बात को पूरा समझने का समय ही नहीं होगा, तो बड़े डॉक्टर, वैज्ञानिक, लेखक या शिक्षक कैसे बनेंगे? अधूरी जानकारी से कभी बड़े विचार पैदा नहीं होते। हमारे रिश्ते भी रील की तरह नहीं होते कि पसंद न आए तो स्वाइप कर दिया जाए। रिश्तों को बचाने के लिए समय, सब्र और सुनने की आदत चाहिए, जो बच्चों में खत्म होती जा रही है। साथ ही रील्स की दुनिया एक झूठी चमक-दमक वाली दुनिया है, जहाँ हर कोई कामयाब दिखने का नाटक करता है। इस झूठी चमक से अपनी तुलना करते हुए आज के युवाओं में चिड़चिड़ापन, घबराहट और उदासी तेज़ी से बढ़ रही है। एक शिक्षिका के तौर पर मैं साफ कहना चाहती हूँ कि यह दौर हमारी नई पीढ़ी की सोच और संस्कारों के लिए बिल्कुल सही नहीं है। जानकारी होने और सच्ची समझ होने में बहुत फर्क है—समझदारी हमेशा ठहरने और गहराई से सोचने से आती है। पर इसका मतलब यह नहीं कि सब कुछ खत्म हो चुका है। बदलाव किसी बड़े नियम से नहीं, बल्कि अपने घर और स्कूल से शुरू होगा। दिन में एक-दो घंटे ऐसे रखें जब घर के सारे फोन बंद हों—उस समय किताबें पढ़ी जाएं या आपस में बातें की जाएं। इसके साथ ही बच्चों को खेलकूद और शारीरिक गतिविधियों से जोड़ना सबसे व्यावहारिक उपाय है। अगर स्कूलों में दिन की आखिरी क्लास खेल के लिए अनिवार्य कर दी जाए, तो बच्चों को मानसिक ताजगी मिलेगी और उनकी ऊर्जा सही दिशा में लगेगी। जब बच्चा मैदान में पसीना बहाता है, तो उसका दिमाग स्क्रीन के नकली आकर्षण से हटकर वास्तविक दुनिया से जुड़ता है, और खेलों से अनुशासन व आगे बढ़ने का जज़्बा पैदा होता है। घर में माता-पिता भी बच्चों को बाहरी गतिविधियों के लिए प्रेरित करें, तो मोबाइल से दूरी स्वाभाविक रूप से बनेगी। बच्चों को समझाना होगा कि मंजिल तक पहुँचने की असली खुशी पूरी यात्रा में है, 2 मिनट के रीकैप में नहीं। तकनीक हमारी सुविधा के लिए है, हमें उसका गुलाम नहीं बनना चाहिए।आने वाले समय में सबसे सफल और शांत वही रहेगा, जिसका अपने मन और ध्यान पर काबू होगा। शिक्षकों और माता-पिता की ज़िम्मेदारी है कि बच्चों के हाथों में फिर से किताबें और खेल का सामान थमाएं, और उन्हें सिखाएं कि ज़िंदगी की असली कामयाबी 15 सेकंड की रील में नहीं, मन को शांत रखकर गहराई से सोचने और मेहनत करने में है। अपने ध्यान को बचाइए, क्योंकि जब हमारी एकाग्रता वापस आएगी, तभी हमारी आने वाली पीढ़ी का भविष्य सुरक्षित हो पाएगा। (लेखिका देव संघ इंस्टिट्यूट ऑफ़ प्रोफेशनल स्टडीज एंड एजुकेशनल रिसर्च (डिपसर), देवघर की असिस्टेंट प्रोफेसर हैं और ये उनके निजी विचार हैं।)
सारथी कृष्ण : भाग- 1 विद्यार्थियों के लिए श्रीमद्भगवद्गीता का पहला पाठ- भ्रम से स्पष्टता की ओर प्रशांत झाएबीएन एडिटोरियल डेस्क। जीवन में कुछ क्षण ऐसे आते हैं, जब हमारे सामने रास्ते तो बहुत होते हैं, लेकिन यह समझ नहीं आता कि जाना किस रास्ते पर है। मेहनत करने की इच्छा होती है, लेकिन मन साथ नहीं देता। लक्ष्य सामने होता है, लेकिन आत्मविश्वास डगमगाने लगता है। कभी परीक्षा का डर, कभी करियर की चिंता, कभी माता-पिता की अपेक्षाएं और कभी दूसरों से आगे निकलने की होड़—इन सबके बीच विद्यार्थी कई बार भीतर से थक जाता है। ऐसा ही कुछ कुरुक्षेत्र के मैदान में अर्जुन के साथ हुआ था। अर्जुन कोई कमजोर योद्धा नहीं थे। वे महान धनुर्धर थे, उन्होंने वर्षों तक प्रशिक्षण लिया था और युद्ध के लिए पूरी तरह तैयार थे। लेकिन युद्ध शुरू होने से ठीक पहले जब उन्होंने अपने सामने अपने ही संबंधियों, गुरुजनों और प्रियजनों को देखा, तो उनका मन विचलित हो गया। उनके हाथ से गांडीव छूटने लगा। यही स्थिति श्रीमद्भगवद्गीता के प्रथम अध्याय- अर्जुन विषाद योग की शुरुआत है। और यहीं से सारथी कृष्ण की कहानी शुरू होती है। अर्जुन का विषाद वास्तव में क्या था? अर्जुन की समस्या केवल युद्ध की नहीं थी। उनकी असली समस्या थी—निर्णय का संकट। वे जानते थे कि उन्हें कुछ करना है, लेकिन यह तय नहीं कर पा रहे थे कि सही क्या है। विद्यार्थी जीवन में भी ऐसी स्थिति बार-बार आती है। मुझे कौन-सा विषय लेना चाहिए? जेईई करूं या कोई दूसरा आजीविका चुनूं? मेरे अंक कम आ गये, क्या मैं सफल नहीं हो सकता? मेरे दोस्त मुझसे आगे निकल गये हैं, अब मैं क्या करूं? माता-पिता कुछ और चाहते हैं और मेरी रुचि कुछ और है- मैं क्या करूं? ये प्रश्न आज के अर्जुन के प्रश्न हैं। इसलिए गीता केवल हजारों वर्ष पुराना ग्रंथ नहीं है। उसमें मनुष्य की उस मानसिक स्थिति को समझने की कोशिश है, जिसमें वह बाहरी परिस्थितियों से अधिक अपने भीतर के संघर्ष से परेशान होता है। पहला महत्वपूर्ण श्लोक: समस्या को देखना गीता के प्रारंभ में धृतराष्ट्र पूछते हैं- धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे समवेता युयुत्सव:। मामका: पाण्डवाश्चैव किमकुर्वत सञ्जय॥ अर्थात्- कुरुक्षेत्र में युद्ध के लिए एकत्र हुए मेरे पुत्रों और पांडवों ने क्या किया? यह केवल युद्धभूमि का प्रश्न नहीं, बल्कि जीवन का पहला पाठ है- समाधान से पहले समस्या को सही पहचानना आवश्यक है। आज विद्यार्थी अक्सर अपनी वास्तविक समस्या नहीं पहचान पाता। कम अंक समस्या नहीं, गलत अध्ययन-रणनीति हो सकती है। असफलता बुद्धिमत्ता की कमी नहीं, अभ्यास की कमी हो सकती है। एकाग्रता की कमी का कारण क्षमता नहीं, बल्कि मोबाइल और सोशल मीडिया भी हो सकते हैं। पहला पाठ यही है- अपनी समस्या को ईमानदारी से पहचानिए, क्योंकि सही समस्या की पहचान ही सही समाधान की पहली सीढ़ी है। अर्जुन का टूटना कमजोरी नहीं था जब अर्जुन युद्धभूमि में अपने संबंधियों और गुरुजनों को सामने खड़ा देखते हैं, तो उनका मन विचलित हो जाता हैउनका शरीर कांपने लगता है, मुख सूख जाता है और विचारों में भ्रम उत्पन्न हो जाता है। वे स्वयं कहते हैं मेरे अंग शिथिल हो रहे हैं और मेरा मुख सूख रहा है।अर्जुन की यह स्थिति कमजोरी नहीं, बल्कि एक गहरे मानवीय द्वंद्व का प्रतीक थी ,जीवन में ऐसे क्षण हर व्यक्ति के सामने आते हैं—परीक्षा हॉल के बाहर खड़े विद्यार्थी की बेचैनी, परिणाम आने से पहले का भय, साक्षात्कार से पहले की घबराहट या अपने भविष्य और आजीविका से जुड़ा कोई महत्वपूर्ण निर्णय लेते समय मन में उठने वाला संशय। इन परिस्थितियों में डर और असमंजस होना स्वाभाविक है महत्त्वपूर्ण यह नहीं कि मन कभी विचलित न हो, बल्कि यह है कि विचलन के बीच सही दिशा कैसे खोजी जाए यही अर्जुन से कृष्ण की यात्रा की शुरूआत है—और यही आज के विद्यार्थी के जीवन में भी प्रासंगिक है। गीता हमें यह नहीं कहती कि डरना गलत है। बल्कि वह दिखाती है कि डर और भ्रम की स्थिति में सही मार्गदर्शन कितना आवश्यक है। जब अर्जुन कहते हैं—मैं नहीं लड़ूंगा अर्जुन अंतत: अपना धनुष रख देते हैं और कहते हैं कि वे युद्ध नहीं करना चाहते। यही गीता का सबसे मानवीय क्षण है। एक महान योद्धा भी कभी-कभी अपने जीवन के सबसे महत्वपूर्ण मोड़ पर निर्णय लेने में असमर्थ हो सकता है। इससे विद्यार्थियों को एक बहुत महत्वपूर्ण संदेश मिलता है—भ्रम होना असफलता नहीं है; भ्रम में फंसे रहना समस्या है। यदि विद्यार्थी किसी विषय को लेकर परेशान है, तो उसे प्रश्न पूछना चाहिए। यदि आजीविका को लेकर भ्रम है, तो योग्य व्यक्ति से मार्गदर्शन लेना चाहिए। यदि किसी परीक्षा में असफलता मिली है, तो अपने प्रदर्शन का विश्लेषण करना चाहिए। सवाल पूछना कमजोरी नहीं है। यहीं से कृष्ण सारथी बनते हैं श्रीकृष्ण अर्जुन के सामने व्याख्यान देने के लिए नहीं बैठे थे। वे पहले से अर्जुन के सारथी थे। लेकिन वास्तविक अर्थ में वे केवल रथ के सारथी नहीं, बल्कि अर्जुन की चेतना के सारथी बनते हैं। उन्होंने अर्जुन से यह नहीं कहा— तुम्हारी जगह मैं फैसला कर देता हूं। उन्होंने अर्जुन को सोचने, समझने और अपने कर्तव्य को पहचानने की दिशा दी। यही सारथी कृष्ण की मूल भावना है। आज के विद्यार्थी को भी एक ऐसे सारथी की आवश्यकता है। ऐसा सारथी जो उसे केवल यह न बताए कि क्या पढ़ो, बल्कि यह भी समझायें- क्यों पढ़ो? कैसे पढ़ो? असफल होने पर क्या करो? सफल होने के बाद कैसे व्यवहार करो? जीवन में सही निर्णय कैसे लो? पहले अध्याय का नाम विषाद योग है। पहली नजर में यह थोड़ा अजीब लगता है। विषाद यानी दुख, निराशा, मानसिक पीड़ा—और इसे योग क्यों कहा गया? क्योंकि अर्जुन का विषाद ही उन्हें ज्ञान की ओर ले जाता है। कभी-कभी जीवन की परेशानी हमें अपने बारे में सोचने के लिए मजबूर करती है। असफलता हमें अपनी तैयारी समझाती है। गलत निर्णय हमें विवेक सिखाता है। भ्रम हमें सही मार्ग खोजने के लिए प्रेरित करता है। इसलिए विद्यार्थी के जीवन में भी— हर परेशानी अंत नहीं होती; कई बार वही सही दिशा की शुरूआत होती है। आज का अर्जुन कौन है? आज का अर्जुन केवल वह विद्यार्थी नहीं है जो अच्छे अंक पाने का सपना देखता है, बल्कि वह हर विद्यार्थी है जो अपने भीतर की उलझनों से जूझ रहा है। वह विद्यार्थी भी अर्जुन है जो सफलता चाहता है, लेकिन पढ़ाई और अपेक्षाओं के दबाव में है। वह भी अर्जुन है जो अपने माता-पिता को गर्व महसूस कराना चाहता है, लेकिन अपने भविष्य की दिशा को लेकर भ्रमित है। वह विद्यार्थी भी अर्जुन है जो बार-बार असफल होने के बाद खुद से पूछता है- क्या मुझसे नहीं होगा? और वह भी अर्जुन है जिसके भीतर प्रतिभा और क्षमता तो भरपूर है, लेकिन सही दिशा का अभाव है। ऐसे समय में विद्यार्थी को केवल प्रेरणा की नहीं, बल्कि सही दिशा, अनुशासन, धैर्य और विवेक की आवश्यकता होती है। क्योंकि प्रतिभा सफलता की शुरूआत कर सकती है, लेकिन सही दिशा ही उसे मंजिल तक पहुंचाती है। यही वह क्षण है, जब हर विद्यार्थी को अपने भीतर के अर्जुन को पहचानने और अपने जीवन के सारथी की तलाश करने की आवश्यकता है। यही सारथी कृष्ण का संदेश है। विद्यार्थियों के लिए पांच सीख पहली सीख — अपनी समस्या स्वीकार करो। दिखावा मत करो कि सब ठीक है। जहां समस्या है, उसे पहचानो। दूसरी सीख — डर को निर्णय मत लेने दो। डर होना स्वाभाविक है, लेकिन निर्णय विवेक से होना चाहिए। तीसरी सीख — सही व्यक्ति से मार्गदर्शन लो। हर समस्या का उत्तर अकेले खोजने की आवश्यकता नहीं है। चौथी सीख — अपने कर्तव्य को पहचानो। विद्यार्थी का पहला धर्म ईमानदारी से सीखना, मेहनत करना और अपने चरित्र का निर्माण करना है। पांचवीं सीख — परिणाम से पहले प्रक्रिया पर ध्यान दो। आज की मेहनत ही कल की उपलब्धि की नींव बनती है। जब मन भ्रमित हो, तब भागो मत। रुकिए, अपनी स्थिति को समझिए, सही प्रश्न पूछिए और सही मार्गदर्शन लेकर आगे बढ़िए। श्रीकृष्ण ने अर्जुन के विचारों को सही दिशा दी आज आवश्यकता ऐसे विद्यार्थियों की है, जो केवल परीक्षा में सफलता के लिए नहीं, बल्कि जीवन को समझने के लिए भी पढ़ें! क्योंकि जीवन की सबसे बड़ी परीक्षा परीक्षा-हॉल में नहीं, बल्कि जीवन के संघर्षों में होती है। वह परीक्षा तब होती है जब हमारे सामने कठिन परिस्थिति आती है और हमें तय करना होता है- अब मुझे क्या करना चाहिए? उस समय यदि हमारे भीतर विवेक, धैर्य और सही दिशा है, तो हम अपने जीवन के कुरुक्षेत्र में भी आगे बढ़ सकते हैं। यही है पहला पाठ- अर्जुन बनिए, प्रश्न पूछिए; कृष्ण को अपना सारथी बनाइये।
राजेश सिरोठिया एबीएन एडिटोरियल डेस्क। देश की प्रमुख विपक्षी पार्टी कांग्रेस के शीर्ष नेता और लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी इन दिनों जातिगत जनगणना के मुद्दे से आगे बढ़कर देश की युवा तरुणाई तक पहुंच बनाने की कोशिश करते दिखाई दे रहे हैं। सवाल है- छात्रों और युवाओं के बीच उठायी जा रही उनकी यह गूंज आखिर कितनी दूर तक जायेगी? राहुल गांधी लंबे समय से जातिगत जनगणना को सामाजिक न्याय और राजनीतिक प्रतिनिधित्व से जोड़कर उठाते रहे हैं। लेकिन बिहार के चुनावी अनुभव ने इस रणनीति की राजनीतिक उपयोगिता पर सवाल खड़े किये। अब उन्होंने छात्रों और युवाओं की ओर रुख किया है। कोटा, देहरादून, प्रयागराज और पुणे के बाद 19 सितंबर को इंदौर में छात्रों की गूंज का पांचवां कार्यक्रम हुआ। शिक्षा, रोजगार, प्रतियोगी परीक्षाओं की पारदर्शिता और सिस्टम राहुल गांधी के नये अभियान के प्रमुख विषय हैं। इन सवालों से असहमति की गुंजाइश कम है। देश का युवा सचमुच इन समस्याओं से जूझ रहा है। लेकिन यहीं राहुल गांधी के सामने असली सवाल खड़ा होता है- समस्या सबको दिखाई दे रही है, समाधान क्या है? जिस सिस्टम पर राहुल गांधी सवाल उठा रहे हैं, वह एक दिन में बना हुआ ढांचा नहीं है। कांग्रेस सहित विभिन्न दलों की सरकारें दशकों तक इसे चलाती रही हैं। इसलिए अगर राहुल गांधी इसे बदलने की बात करते हैं तो देश यह जानना चाहेगा कि वे सत्ता में आने पर इसे बदलेंगे कैसे? करोड़ों युवाओं को केवल सरकारी नौकरियां देना संभव नहीं है। रोजगार का रास्ता सरकारी क्षेत्र के साथ निजी उद्योग, छोटे-मझोले उद्यम, स्टार्टअप, स्वरोजगार, कृषि और नई अर्थव्यवस्था से होकर भी गुजरता है। ऐसे में राहुल गांधी की आर्थिक नीति और रोजगार का वैकल्पिक मॉडल क्या होगा- यह सवाल उनके भाषणों से कहीं अधिक महत्वपूर्ण है। यहीं राहुल गांधी की राजनीति की एक बड़ी कमजोरी सामने आती है। वे कई बार भाजपा सरकारों की वास्तविक कमजोरियों को पकड़ने के बजाय नरेन्द्र मोदी सरीखी विशाल राजनीतिक मछली पकड़ने की कोशिश करते हैं, जो उनके हाथ से बार-बार फिसल जाती है। सत्ता की अकुलाहट में कांग्रेस ने अपने कई प्रभावी राजनीतिक अस्त्रों की धार भी कुंद की है। मोदी सरकार की नीतियों, प्रशासनिक विफलताओं, बेरोजगारी, महंगाई, शिक्षा, स्वास्थ्य और संस्थागत पारदर्शिता जैसे मुद्दों पर लगातार और ठोस अभियान चलाने के बजाय बहस कई बार व्यक्ति-केंद्रित हो जाती है। दूसरी ओर भाजपा, कांग्रेस को मुस्लिम तुष्टिकरण के आरोप वाले राजनीतिक नैरेटिव पर घेरती है। कांग्रेस के लिए मुश्किल यह है कि इस आरोप का जवाब देते हुए उसे अपनी अल्पसंख्यक नीति और व्यापक सामाजिक न्याय की नीति को अधिक स्पष्ट करना होगा। कांग्रेस की पुरानी राजनीति को उसके आलोचक एक ऐसे सामाजिक समीकरण से जोड़ते रहे हैं जिसमें मुस्लिम मतदाताओं को उसका अपेक्षाकृत स्थिर आधार माना गया। यही धारणा अब कांग्रेस के लिए राजनीतिक बोझ भी बनती दिखाई देती है। मुस्लिम मतदाताओं का समर्थन भी कोई स्थायी या एकमुश्त राजनीतिक संपत्ति नहीं है। अलग-अलग राज्यों में जब उन्हें प्रभावी क्षेत्रीय विकल्प दिखाई देता है, तो उनका समर्थन उन दलों की ओर जाता रहा है। बिहार के चुनावी अध्ययन में भी मुस्लिम और यादव मतदाताओं के एक बड़े हिस्से के महागठबंधन की ओर जाने का उल्लेख मिलता है, जबकि दलित मतदाताओं के व्यवहार में चरण और क्षेत्र के अनुसार बदलाव दिखाई दिया। यही बात कांग्रेस के व्यापक सामाजिक आधार पर भी लागू होती है। दलित, आदिवासी, पिछड़े और सवर्ण मतदाताओं का समर्थन भी किसी एक दल के लिए स्थायी नहीं है। चुनाव-दर-चुनाव समीकरण बदलते रहे हैं। कांग्रेस के लिए चुनौती यह है कि वह इन समुदायों को केवल चुनावी गणित का हिस्सा मानने के बजाय उनके लिए शिक्षा, रोजगार, उद्यमिता, सामाजिक सुरक्षा और आर्थिक अवसरों के ठोस कार्यक्रम सामने रखे। राहुल गांधी के सामने चुनौती केवल भीड़ जुटाने की नहीं है। युवा एकरूप मतदाता नहीं है। किसी के लिए सरकारी नौकरी महत्वपूर्ण है, किसी के लिए निजी रोजगार, किसी के लिए उद्यमिता और किसी के लिए गुणवत्तापूर्ण शिक्षा। इसलिए छात्रों की भावनाओं को राजनीतिक समर्थन में बदलने के लिए भावनात्मक भाषण से अधिक जरूरी है- ठोस कार्यक्रम। यदि राहुल गांधी सिस्टम बदलने की बात करते हैं तो उन्हें बताना होगा कि शिक्षा व्यवस्था कैसे बदलेगी, भर्ती प्रक्रिया कैसे सुधरेगी, निजी क्षेत्र में रोजगार कैसे बढ़ेगा, युवाओं को कौशल और पूंजी कैसे मिलेगी और देश की अर्थव्यवस्था में उनकी भूमिका क्या होगी। यही छात्रों की गूंज की असली परीक्षा है। कोटा से इंदौर तक उठी आवाज यदि केवल सभाओं और सोशल मीडिया तक सीमित रहती है तो उसका प्रभाव सीमित हो सकता है। लेकिन यदि कांग्रेस इसे युवाओं के लिए स्पष्ट नीति, रोजगार के कार्यक्रम और शासन के वैकल्पिक मॉडल में बदल पाती है, तो यह उसके राजनीतिक विमर्श को नई दिशा दे सकती है। राहुल गांधी को यह भी समझना होगा कि नरेन्द्र मोदी को चुनौती देने के लिए केवल मोदी-विरोध पर्याप्त नहीं है। उन्हें देश के सामने यह भी रखना होगा कि मोदी के बाद भारत कैसा होगा और उस भारत को बनाने की उनकी योजना क्या है। छात्रों की गूंज कितनी दूर तक जाएगी, इसका फैसला किसी मंच पर नहीं होगा। फैसला तब होगा, जब देश का युवा यह तय करेगा कि उसे केवल अपनी समस्या की आवाज चाहिए—या उस समस्या का समाधान भी।
डॉ. मयंक चतुर्वेदी एबीएन एडिटोरियल डेस्क। इटली की प्रधानमंत्री जॉर्जिया मेलोनी द्वारा देश के स्कूलों में बुरका-हिजाब पर प्रतिबंध लगाने और हर कक्षा में विदेशी छात्रों की संख्या सीमित करने की घोषणा ने एक बार फिर वैश्विक पटल पर बुरका-हिजाब ला दिया है। वस्तुत: विश्व के कई देशों की सरकारों ने यह पाया है कि कैसे राष्ट्रीय सुरक्षा और सार्वजनिक पहचान के बीच इस्लाम से जुड़ी ये दो आदत आधुनिक सुरक्षा व्यवस्था जैसे हवाई अड्डे, रेलवे स्टेशन, सरकारी बैंक और संवेदनशील इमारतें सीसीटीवी और फेशियल रिकॉग्निशन टेक्नोलॉजी (चेहरा पहचानने वाली तकनीक) पर भारी पड़ रही हैं। बुरका और हिजाब से चेहरा पूरी तरह ढक जाने के कारण किसी व्यक्ति की पहचान सत्यापित करना असंभव हो जाता है। श्रीलंका और कई अफ्रीकी देशों ने पाया है कि चरमपंथी और आत्मघाती हमलावर अपनी पहचान छिपाने और हथियारों की तस्करी के लिए बुरके का दुरुपयोग करते हैं, जिसके कारण सुरक्षा के लिहाज से कानून प्रवर्तन एजेंसियां सार्वजनिक स्थानों पर हर नागरिक का चेहरा खुला रखना अनिवार्य मानती हैं। इसके अलावा, पश्चिमी देश, विशेषकर यूरोपीय राष्ट्र, एक बहुसांस्कृतिक समाज में प्रवासियों के पूरी तरह घुलने-मिलने पर जोर देते हैं। वैसे भी इंसानी बातचीत और सामाजिक जुड़ाव में चेहरे के हाव-भाव सबसे बड़ी भूमिका निभाते हैं। चेहरा ढंके होने से बातचीत में एक अघोषित दीवार खड़ी हो जाती है, जो प्रवासियों को स्थानीय नागरिकों से अलग करती है। इटली की पीएम जॉर्जिया मेलोनी के अनुसार, सच्चे एकीकरण का मतलब यह है कि प्रवासी देश की भाषा सीखें और वहां के सामाजिक ताने-बाने का सम्मान करें। बुरके को एक ऐसे सांस्कृतिक अलगाव के प्रतीक के रूप में देखा जाता है जो किसी समुदाय को मुख्यधारा के समाज में शामिल होने से रोकता है। यूरोप के देश फ्रांस में लाइसीते (कट्टर धर्मनिरपेक्षता) का सिद्धांत लागू है, जिसके तहत सरकारी स्कूलों, दफ्तरों और सार्वजनिक स्थानों पर किसी भी प्रकार के प्रमुख धार्मिक प्रतीकों (चाहे वह बड़ा इसाई क्रॉस हो, यहूदी टोपी हो, या मुस्लिम हिजाब/ बुरका हो) के प्रदर्शन पर रोक है। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि सार्वजनिक क्षेत्र पूरी तरह से तटस्थ रहे। साथ ही, उदारवादी और नारीवादी विचारकों का एक बड़ा वर्ग बुरके और नकाब को पितृसत्तात्मक दमन का प्रतीक मानता है। सरकार का तर्क है कि बहुत सी युवा लड़कियों और महिलाओं को उनके परिवारों या मजहबी संरक्षकों द्वारा अपनी इच्छा के विरुद्ध चेहरा ढंकने के लिए मजबूर किया जाता है, इसलिए प्रतिबंध लगाने वाले देशों का मानना है कि यह कानून उन महिलाओं को सुरक्षा प्रदान करता है जो अपनी मर्जी से इसे नहीं पहनना चाहतीं। फ्रांस साल 2011 में सार्वजनिक स्थानों पर बुरका और नकाब पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने वाला पहला यूरोपीय देश बना था। इसके तुरंत बाद बेल्जियम ने भी यही राह चुनी। स्विट्जरलैंड ने एक जनवरी 2025 से पूरे देश के सार्वजनिक स्थानों पर इसे प्रतिबंधित किया है, जबकि पुर्तगाल की संसद ने अगस्त 2026 में इस पर अपनी मुहर लगाई है। इसके अलावा आॅस्ट्रिया, डेनमार्क, बुल्गारिया और नीदरलैंड जैसे देशों में भी आंशिक प्रतिबंध लागू हैं। सिर्फ यूरोपीय देश ही नहीं, ताजिकिस्तान, उज्बेकिस्तान, कजाकिस्तान और किर्गिस्तान जैसे मुस्लिम बहुल देशों ने भी मजहबी कट्टरपंथ पर लगाम लगाने और अपनी मूल धर्मनिरपेक्ष संस्कृति की रक्षा के लिए स्कूलों और सार्वजनिक स्थानों पर हिजाब और बुरके पर कड़े नियम तय किए गए हैं। यहां एक ओर बात ध्यान देने योग्य है कि शोध संस्था फोंडाजियोन आईएसएमयू के आंकड़ों से यह बात निकलकर सामने आई है कि इटली के स्कूलों में कुल नामांकित छात्रों में से लगभग 11.6 फीसद छात्र ऐसे हैं जिनके पास इटली की नागरिकता नहीं है, यानी हर 100 में से लगभग 12 छात्र विदेशी मूल के हैं। इस जनसांख्यिकीय बदलाव को देखते हुए, मेलोनी सरकार स्कूलों में चेहरा ढंकने पर रोक लगा रही है ताकि समानता दिखे, और प्रत्येक कक्षा में विदेशी छात्रों का कोटा तय कर रही है। स्थानीय इतालवी बच्चे अल्पसंख्यक महसूस न करें और प्रवासी बच्चे तेजी से इतालवी भाषा व संस्कृति सीख सकें।इस तरह से इस पूरे प्रकरण को गहराई से देखने पर यह बात साफ तौर पर पता चलती है कि इटली एवं अन्य यूरोपीय देश प्रवासियों को अपने समाज में शामिल करने के लिए भविष्य में ओर अधिक सख्त और कानूनी रूप से बाध्यकारी नीतियां अपनायेंगे, जिसमें पहनावे से लेकर भाषा सीखने तक की शर्तें शामिल होंगी। फिलहाल, इटली इस निर्णय को अपने हित में देख रहा है। पीएम जॉर्जिया मेलोनी बुरका और हिजाब मामले में निर्णय लेने को लेकर सख्त नजर आ रही हैं। दूसरी ओर भारत जैसे देश हैं, जहां बरका और हिजाब को लेकर सामुदायिक पहचान को इतना अधिक तूल दिया जा रहा है कि समानता के स्तर पर विद्यालयों एवं महाविद्यालयों तक में विवाद खड़े किए जा रहे हैं, जिसमें कि हस्तक्षेप के लिए कानून और संविधान की दुहाई देते हुए न्यायालय में बार-बार प्रकरणों को लेकर जाया जा रहा है! कहने को भारत में इस्लाम को माननेवाले अल्पसंख्यक कहलाते हैं, किंतु ये अल्पसंख्यक आज उन तमाम इस्लामिक देशों से भी कुछ सीखना नहीं चाहते, जहां ये बहुसंख्यक होने के बाद भी अपने इस्लामिक रिपब्लिक में सुरक्षा एवं अन्य कारणों के चलते हिजाब एवं बुरका पर पूरी तरह बैन लगा हुआ है!
जेन जी का निर्णय... त्रिवेणी दासएबीएन एडिटोरियल डेस्क। 15 मई 2026 को सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस के एक टिप्पणी के विरोध में ऑनलाइन एक व्यंग्यात्मक (Satirical) कार्यक्रम की शुरुआत अभिजीत दीपके ने की थी, और ठीक उसके दूसरे दिन 16 मई 2026 को उन्होंने अपनी एक पार्टी कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) का गठन किया। Gen Z का एक आंदोलन दिल्ली के जंतर मंतर में आरंभ किया गया। केंद्र के मोदी सरकार के ऊपर भारी दबाव बनाया गया। इस आंदोलन में विपक्ष की राजनीतिक पार्टियां भी कूद पड़ी। केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को अपने पद से त्यागपत्र देना पड़ा। दिल्ली यूनिवर्सिटी के छात्र संघ के चुनाव में जिसके मतदाता Gen Z ही होते हैं, अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद ने तीनों प्रमुख पद में विजय प्राप्त किया। अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद ABBP भाजपा एवं संघ समर्थित छात्र संगठन है। छात्र संघ के चुनाव के परिणाम से स्वतंत्र हो जा रहा है कि आज भी जेन जी राष्ट्र के भविष्य के प्रति अत्यंत संवेदनशील हैं और उनकी राजनीतिक सूझबूझ किसी भी प्रकार के संदेह से परे है।अध्यक्ष पद : यश डबास ABBP विजयीउपाध्यक्ष पद : यश डबास ABBP विजयीउपाध्यक्ष : ईशू मौर्या ABBP विजयीसचिव पद : रिया छावड़ी ABBP विजयीसह सचिव : लक्ष्य राज सिंह ABBP विजयी
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