विचार

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Published / 2021-06-29 14:30:52
आजादी की पहली लड़ाई थी हूल...

एबीएन डेस्क, रांची। इस ऐतिहासिक परिघटना संथाल हूल को इतिहासकार संथाल विद्रोह मानते हैं जबकि सच्चाई यह है कि यह कोई विद्रोही आंदोलन नहीं था बल्कि ईस्ट इंडिया कंपनी के साथ जंग था इसे समझने के लिए जंग और विद्रोह के बीच फर्क को समझना होगा विद्रोह किसी भी सत्ता से असंतुष्ट जन आंदोलन को कहा जा सकता है जबकि जंग दो सत्ताओं के बीच अपनी सत्ता बचाए रखने के लिए होता है और संथाल हूल संथालो द्वारा अपनी सत्ता बचाए रखने के लिए ईस्ट इंडिया कंपनी के साथ जंग था। 30 जून अट्ठारह सौ पचपन को शुरू हुआ भारत में प्रथम सशस्त्र जन संघर्ष जो बाद में चलकर प्रथम छापामार जंग भी बना 26 जुलाई अट्ठारह सौ पचपन को संथाल हूल के सृजनकर्ताओं में से प्रमुख व तत्कालीन संथाल राज्य के राजा सिद्धू और उनके सलाहकार व उनके सहोदर भाई कान्हू को वर्तमान झारखंड के साहिबगंज जिला के बरहेट प्रखंड में भोगनाडीह गांव में 1815 ईसवी को और सिद्धू का जन्म 1820 में हुआ था। संथाल विद्रोह में सक्रिय भूमिका निभाने वाले इनके और दो भाई भी थे जिनका नाम चांद मुर्मू और भैरव मुर्मू था चांद का जन्म 1825 एवं भैरव का जन्म 1835 ईस्वी में हुआ था इनके अलावा इनकी दो बहने भी थी जिनका नाम फूलों मुर्मू और जानू मुर्मू था इन छह भाई-बहनों का पिता का नाम चुन्नी मांझी था। अपने वतन व जनचेतना की सुरक्षा हेतु वह निरंतर संघर्ष करता है बिहार जनजातीय समाज में अब तक जितने भी संघर्ष हुए उनका प्रमुख पहलू सामुदायिक पहचान बचाना रहा है जोत जमीन जल जंगल की रक्षा व समानता पर आधारित समाज निर्माण हेतु जमीन से जुड़े आदिवासियों के आंदोलन का एक लंबा इतिहास है। पाट,शोषण, बलात्कार जैसे उत्पीड़न व जुल्म से त्रस्त संथाल भागते फिर रहे थे लेकिन उनकी अधीनता स्वीकार करने को कतई तैयार नहीं थे इन तमाम घटनाक्रम को देखते हुए विद्रोह किया 1789 से 1831- 32 के बीच कई जनजातियां आंदोलन हुए हैं जिनके लिए खुंट - कट्टी व्यवस्था के विघटन के प्रति प्रतिशोध की भावना प्रमुख रूप से रही 1831 में मुख्य कोल विद्रोह हुआ मुंडा, हो, उरांव आदि सभी विद्रोह में बढ़ चढ़कर हिस्सा लिया मानसून में भूमिजो का विद्रोह हुआ इस विद्रोह के दौरान गांव लूटे गए जलाए गए तथा पुलिस सैनिकों सहित कई नागरिक मारे गए। रांची पलामू जिले विद्रोह के केंद्रबिंदु रहे। ब्रिटिश शासन के शुरू के 100 वर्षो में नागरिक विद्रोह का सिलसिला किसी खास मुद्दे व स्थानीय असंतोष के कारण चलता रहा 1763 से 1856 के मध्य देशभर में अंग्रेजो के खिलाफ 40 से अधिक बड़े विद्रोह में छोटे पैमाने पर तो इनकी संख्या बेशुमार है धार्मिक नेताओं के मौलवी पंडित ने भी विद्रोह के झंडे लहराए जनजातीय विद्रोह में उनकी जातीय हित की बुनियादी कारण रहे हैं जनजातियों में संथाल का विद्रोह ठोस, व्यापक और आक्रमक था भारत से अंग्रेजों को भगाने के लिए प्रथम जनक्रांति थी जो संथाल हुल के नाम से प्रसिद्ध हुई। संथालों में जनजातियों की संख्या सर्वाधिक है और उनका निवास संथाल परगना है उस समय छोटनागपुर के उत्तरी पूर्वी छोर पर स्थित है। इनकी अधिसंख्या के वजह ही संथाल परगना नाम दिया छोटनागपुर में दाखिल के बाद संथाल में इसी इलाके को अपना निवास स्थल बनाया संथाल परगना तब भागलपुर कमिश्नरी का अंग था हजारीबाग और वीरभूम जिले में संथाल बहुत पहले आ बसे थे इन्हीं इलाको से आकर ये मूल निवासी भोले भाले पहाड़िया की ओर से कोई खास विरोध नहीं हुआ। और कई गैर संथाली लोगों ने बड़ी हिस्सेदारी निभाई जिनमें मंगरा पूजोहर (पहाड़िया) गुरैया पुजहर (पहाड़ियां) हरदास जमादार (ओबीसी) ठाकुरदास (दलित) बेचू अहीर (ओबीसी) गंदू लोहरा, चुकू डोम दलित वर्ग से मानसिंह ओबीसी और गुरु चरण दास शामिल थे। जंगल को साफ कर खेती के लायक जमीन तैयार करते गए गांव बसाते गए सर्वप्रथम 1790- 1810 के बीच यहां बसे इनका आना-जाना जारी रहा 1836 तक 427 गांव से कम नहीं बसाए गए 1851 तक यहां संथालो के 1473 गांव बस चुके थे जिनकी आबादी लगभग 82795 हो गई थी। छोटनागपुर में अंग्रेजों का वर्चस्व 1756 से ही हो चुका था परंतु यहां की जनजातियों पर नहीं धीरे-धीरे शोषण, अत्याचार और जुल्म का शिकंजा जकड़ता गया 1850 तक यहां के चप्पे-चप्पे में शोषण छा चुका था संथाल भी इससे अछूता नहीं रहा। 71 साल बाद संथाल हूल का नेतृत्व भोगनाडीह निवासी चुन्नी मांझी के चार पुत्रों ने किया ये थे सिद्धू कान्हु चांद और भैरव हुल के समय कान्हु की उम्र 35, चांद की आयु 30 वर्ष और भैरव की उम्र 20 वर्ष बताई जाती है सिद्धू सबसे बड़ा था, जब सिधु कान्हू ने शोषण और अत्याचार के विरुद्ध विद्रोह करने का संकल्प ले लिया तो जनमानस तथा जनसमूह को एकजुट करने व अपने मुहिम को मुकाम तक पहुंचाने का अहद लेते हुए जनसमूह को एकजुट व संगठित करने तथा एकत्रित करने के लिए अंग्रेजों हमारी भूमि छोड़ो कि नारे से गूंज उठा और फिर सिद्धू ने ललकारा था करो या मरो अंग्रेजों हमारी माटी छोड़ दो। अपने परंपरागत ढंग को अपनाया। डुगडुगी पिटवा दी और सालटहनी का संदेश गांव गांव में दिया। सिद्धू को अगस्त 1855 में पंचकठिया नामक स्थान पर बरगद के पेड़ पर फांसी दे दी गई वह पेड़ आज भी उसी स्थान पर स्थित है जिसे शहीद स्थल कहा जाता है जबकि कन्हू को भोगनाडीह ने फांसी दी गई पर आज भी वह संथालो के दिलों में आज भी जिंदा है और याद किए जाते हैं। (लेखक अखिल झारखंड प्राथमिक शिक्षक संघ झारखंड प्रदेश मुख्य प्रवक्ता हैं।)

Published / 2021-06-23 15:07:20
बेहतर बिजली झारखंडवासियों के लिए अभी भी सपना ही है...

एबीएन डेस्क, रांची। झारखंड में कोयले का भंडार समृद्ध है। साथ ही सौर और बायोमास जैसी ऊर्जा के प्राकृतिक संसाधन भी राज्य में प्रचुर मात्रा में हैं। ऊर्जा के इतने स्रोतों के बाद भी पूरे राज्य में बिजली की पहुंच अभी दूर के ख्वाब हैं। खासकर ग्रामीण इलाकों में बिजली की पहुंच का न होना, अभी भी चिंता के कारण हैं। ऐसा इसलिए है कि राज्य अपनी क्षमता और उपलब्धता के बराबर अक्षय ऊर्जा के स्रोतों का पूरा इस्तेमाल करने में असमर्थ है। राज्य के नेतृत्व को घरेलू और औद्योगिक उपभोक्ताओं की ऊर्जा मांग पूरा करने के लिए अपने नवीकरणीय ऊर्जा संसाधनों के उपयोग वास्ते एक स्वच्छ ऊर्जा नीति की आवश्यकता है। इनिशिएटिव फॉर सस्टेनेबल एनर्जी पॉलिसी के शोधकर्ताओं ने झारखंड के ऊर्जा क्षेत्र में काम करने वाले कई हितधारकों के साथ बातचीत की। विभिन्न साक्षात्कारों के माध्यम से, उन्होंने निष्कर्ष निकाला कि राज्य में स्वच्छ ऊर्जा एकीकरण की आवश्यकता अनिवार्य है। इसके अलावा, उन्होंने राज्य के थर्मल पावर प्लांटों के पुराने बेड़े को बदलने के लिए स्वच्छ ऊर्जा समाधानों को लागू करने में आने वाली विभिन्न चुनौतियों की पहचान की। झारखंड की विकास नीतियों, पहलों और उनकी स्थिति की रिपोर्टों की विस्तृत समीक्षा की। इसके बाद अनुसंधान समूह ने राज्य के नेतृत्व के सामने आने वाली चुनौतियों को रचनात्मक रूप से कम करने के लिए दो व्यावहारिक कार्यान्वयन ढांचे बनाए हैं। कोयला के मामले में एतिहासिक रूप से समृद्ध होने के बीच बिजली क्षेत्र की समस्या बनी हुई है। खराब एकीकृत नई नीतियों, कई सरकारी गतिविधियों के बीच समन्वय की कमी, जैसी बाधाओं ने राज्य के क्लीन एनर्जी के विस्तारीकरण को प्रभावित किया है। झारखंड में घरेलू उद्योग न केवल अपनी क्षमता के अनुसार स्वच्छ ऊर्जा का उपयोग नहीं कर रहे हैं, चुनौतियों को दूर करने और सरकारी प्रोत्साहन की कमी के कारण अक्षय ऊर्जा आधारित समाधान अपनाने से भी हिचक रहे हैं। कोयला आधारित बिजली विकास की प्राथमिकता ने अक्षय और विकेंद्रीकृत ऊर्जा क्षेत्र में विकास को पीछे धकेल दिया है। झारखंड सरकार को निवेश आकर्षित करने और अक्षय ऊर्जा के बुनियादी ढांचे को विकसित करने के लिए एक व्यापक ढांचे का निर्माण करना चाहिए। राज्य में प्रमुख उद्योगों को अक्षय ऊर्जा के उच्च मूल्यों का उपभोग करने के लिए रास्ते बनाना चाहिए। क्लीन एनर्जी की खरीद राज्य की वितरण कंपनियों को उनके नवीकरणीय खरीद दायित्वों (रिन्यूएबल परचेज आॅब्लीगेशंस- आरपीओ) अनुपालनों को पूरा करने में भी सहायता करेगी। समानांतर रूप से, सरकार को विकेंद्रीकृत ऊर्जा क्षेत्र में विकास को गति देने के लिए राज्य में काम कर रहे जमीनी स्तर के संगठनों के साथ साझेदारी करने के लिए स्थानीय अधिकारियों पर जोर देना चाहिए। इस संदर्भ में, हम राज्य की मौजूदा चुनौतियों के लिए कार्य समाधान के रूप में तैयार किए गए दो ढांचे की अनुशंसा करते हैं। यह स्पष्ट है कि कई भौगोलिक बाधाओं के कारण राष्ट्रीय ग्रिड हर घर तक नहीं पहुंच सकता है। जमीनी स्तर के विकास संगठनों के साथ बातचीत से पता चलता है कि ग्रामीण समुदाय बिजली के एक विश्वसनीय स्रोत तक पहुंचने में असमर्थ था। खासकर अविकसित केंद्रीय बिजली ग्रिड के माध्यम से अधिक बिजली कटौती के कारण। चूंकि बिजली एक जरूरी विकास संसाधन है, इसलिए राज्य के ग्रामीण और उप-शहरी क्षेत्रों में आॅफ-ग्रिड ऊर्जा को एकीकृत करना जरूरी है। ताकि बिजली के कारण जो व्यवसाय नहीं हो पा रहा है, उसे विकसित करने में मदद मिल सके। झारखंड में आॅफ-ग्रिड ऊर्जा को बढ़ावा देने के लिए तेजी से अभियान चलाया जाना चाहिए। इसमें झारखंड अक्षय ऊर्जा विकास एजेंसी (जेआरईडीए) और राज्य वितरण कंपनियों (डिस्कॉम) के बीच समन्वय में सुधार करना होगा। ताकि रणनीतिक जागरूकता अभियान के माध्यम से सोलर (आॅफ-ग्रिड) ऊर्जा समाधानों पर सामाजिक स्तर पर सुधार किया जा सके। राज्य-व्यापी कार्यान्वयन तकनीकों के माध्यम से मौजूदा मिनी-ग्रिड को राष्ट्रीय ग्रिड से जोड़ने के लिए एक तंत्र स्थापित किया जा सकता है। राज्य नियामकों और ऊर्जा विशेषज्ञों का कहना है कि बड़ी संख्या में उपभोक्ताओं तक पहुंच बनाने के लिए मिनी-ग्रिड एक अधिक कुशल और तेज मार्ग हो सकता है। लेकिन इसके लिए एक मजबूत नीति की आवश्यकता होगी। इससे राज्य की आॅफ-ग्रिड क्षमता में वृद्धि होगी। हालांकि इसे लागू करने में राजनीतिक बाधाएं और जन जागरूकता की कमी बाधा बन सकती है। राज्य में वित्तीय सहायता तंत्र और कौशल विकास में सुधार की योजना बनानी होगी। ऐसे परिदृश्य में, जहां सरकार निवेश करती है और एक गांव में एक संयंत्र स्थापित करती है, यह आवश्यक है कि संयंत्र गांव की बिजली की आवश्यकताओं को पूरा करे और आत्मनिर्भर हो। अक्षय ऊर्जा को वित्तीय और व्यवहारिक तरीके से एकीकृत करना केवल प्रशिक्षित स्थानीय व्यक्तियों द्वारा ही किया जा सकता है। ये व्यक्ति समुदायों में प्रौद्योगिकी को एकीकृत करने वाले आॅन-ग्राउंड कार्यबल के रूप में कार्य करेंगे। इसके अलावा, स्थापना के समय उनकी उपस्थिति राज्य में स्थानीय लोगों के साथ एक भरोसेमंद स्थिति बनाने में मदद करेगी। तेजी से नवीकरणीय ऊर्जा उत्पादन की दिशा में एक रूफटॉप सोलर का उपयोग करके राज्य की उच्च सौर क्षमता का लाभ उठाना होगा। राज्य में 1,300 से अधिक पंजीकृत एमएसएमई, 1,200 हाई स्कूल और कई अन्य सार्वजनिक भवन हैं, जिनका उपयोग रूफटॉप सोलर इंफ्रास्ट्रक्चर विकसित करने के लिए किया जा सकता है। इस परियोजना को झारखंड सरकार के साथ साझेदारी में रूफटॉप सोलर विकसित करने के लिए चल रहे राष्ट्रीय मिशन से जोड़ा जा सकता है।

Published / 2021-06-22 14:37:38
योग सभी मानसिक शारीरिक रोगों का इलाज

एबीएन डेस्क, रांची। योग भारतीय जीवन पद्धति का एक महत्वपूर्ण अंग है भारतीय विज्ञान के अनुसार योग की उत्पत्ति हजारों वर्ष पहले हुई। सिंधु घाटी सभ्यता को योग विद्या का प्रारंभिक उद्गम माना जाता है। यह भारत की प्रथम शहरी सभ्यता है। योग शब्द का उल्लेख सर्वप्रथम ऋग्वेद में हुआ। ऋग्वेद एक प्राचीन भारतीय पाठ संग्रह है जो चार वेदों में सबसे ज्यादा प्रचलित है। आज के समय में अगर योग की बात करें तो योग का अर्थ आसन प्राणायम करना है। लेकिन अगर ग्रंथों में उल्लेखित योग की परिभाषा या अर्थ को देखते हैं, तो किसी भी परिभाषा में आसन प्राणायम का जिक्र नहीं है। योग शब्द संस्कृत के युज धातु से बना है, जिसका अर्थ है जोड़ना अर्थात किसी वस्तु से अपने को जोड़ना। अंग्रेजी का योक शब्द भी उसी धातु से बना है। योग का आध्यात्मिक अर्थ है, वह साधन जिसके द्वारा योगी को जीवात्मा और परमात्मा के साथ ज्ञान पूर्वक संयोग होता है या संयोग कराने की प्रक्रिया बतलाई है। योग का अर्थ सभी आचार्यों ने आत्मदर्शन तथा ब्रह्म साक्षातपूर्वक स्वरूप स्थिति एवं मोक्ष की प्राप्ति से किया है। वेदांतिक शास्त्रों में भी आत्मदर्शन तथा ब्रह्म साक्षात्कार होने की बात कही है। गणित शास्त्र में योग शब्द का अर्थ है जोड़ होता है। रसायन शास्त्र में योग दो विभिन्न पदार्थों को अपना अपना स्वरूप खोकर एक अद्भुत पदार्थ में परिणत होने का ज्ञान भी योग है उदाहरण के लिए एक अनुपात नाइट्रोजन, तीन अनुपात हाइड्रोजन के योग के फलस्वरूप दो अनुपात अमोनिया प्राप्त होता है। महर्षि व्यास ने योग को समाधि बतलाया है, जिसका भाव यह है कि जीवात्मा इस उपलब्ध समाधि के द्वारा सच्चिदानंद (सत + चित + आनंद) स्वरूप ब्रह्म का साक्षात्कार करें। पुरुष प्रकृत्योतियोगेपि योग इत्यभिधीयते- सांख्य शास्त्र अर्थात प्रकृति पुरुष पृथ्कतव स्थापित कर अर्थात् दोनों का वियोग करके पुरुष के स्वरूप में स्थिर हो जाना योग है। कैवल्योपनिषद मे कहा है, श्रद्धा भक्तियोगावदेहि (1/2) अर्थात् श्रद्धा भक्ति और ध्यान के द्वारा आत्मा को जानना योग है। अग्नि पुराण ब्रह्मप्रकाशकं ज्ञानं योगस्तत्रैक चित्तता। चित्तवृत्तिनिरोधश्च जीवब्रह्मात्मनी: पर: ।। अग्निपुराण 183/ 1-2 अर्थात ज्ञान का प्रकाश पड़ने पर चित्त ब्रह्म मे एकाग्र हो जाता है, जिससे जीव का ब्रह्म मिलन हो जाता है। ब्रह्म में चित्त की एकाग्रता ही योग है। स्कंद पुराण जीवात्मा परमार्थोऽयमविभाग: परमतप: स: एव परोयोग: समासा कथितस्तव। अर्थात जीवात्मा और परमात्मा का अलग अलग होना ही दुख का कारण है और इसका अपृथक तक भाव ही योग है (एकत्व की स्थिति ही योग हैं)। लिंग पुराण: योग निरोधो वृत्तेस्तु चितस्य द्विज सत्तमा।अर्थात चित्त की सभी वृत्तियों का निरोध हो जाना उसे पूर्ण समाप्त कर देना योग है । उसी से परमगति अर्थात ब्रह्म की प्राप्ति होती है विष्णुपुराण के अनुसार - योग: संयोग इत्युक्त: जीवात्म परमात्मने, अर्थात् जीवात्मा तथा परमात्मा का पूर्णतया मिलन ही योग है। कठोषनिषद् में योग के विषय में कहा गया है : यदा पंचावतिष्ठनते ज्ञानानि मनसा सह। बुद्धिश्च न विचेष्टति तामाहु: परमां गतिम।। तां योगमिति मन्यन्ते स्थिरामिन्द्रियधारणाम् ।अप्रमत्तस्तदा भवति योगो हि प्रभावाप्ययौ।। कठो.2/3/10-11, अर्थात जब पांचों ज्ञानेन्द्रियां मन के साथ स्थिर हो जाती है और मन निश्चल बुद्धि के साथ आ मिलता है. उस अवस्था को ‘परमगति’ कहते है। इंद्रियों की स्थिर धारणा ही योग है। जिसकी इंद्रियां स्थिर हो जाती हैं, अर्थात् प्रमाद हीन हो जाता है। उसमें शुभ संस्कारो की उत्पत्ति और अशुभ संस्कारो का नाश होने लगता है। यही अवस्था योग है। गीता में श्रीकृष्ण ने अर्जुन से आध्यात्मिक चर्चा के दौरान योग को कई तरह से परिभाषित किया। योगस्थ: कुरू कर्माणि संगं त्यक्त्वा धनंजय:। सिद्ध्यसिद्धयो: समो भूत्वा समत्वं योग उच्यते।। गीता ( 2/48 ) अर्थात योग में स्थित हुआ कर्म फल को त्याग कर और सिद्धि असिद्धि में सम होकर तू कर्मों को कर, यह समता ही योग है।जब किसी कार्य में अशक्ति होती है तभी उसके भले या बुरे फल का प्रभाव हमारे दिल दिमाग पर पड़ता है और उसके अनुसार ही संस्कार बन जाता है ।फिर वही संस्कार पाप और पुण्य के रूप में कर्म के परिपक्व अवस्था में उदय होते है। योग सूत्र के प्रणेता महर्षि पतंजलि ने योग को परिभाषित करते हुए कहा है। योगश्चित्तवृत्तिनिरोध:ह्ण  यो.सू.1/2, अर्थात चित्त की वृत्तियों का निरोध करना ही योग है। चित्त का तत्पर अंतरण से है। बाहयकरण ज्ञानेन्द्र जब विषयों को ग्रहण करती है, मन ज्ञान को आत्मा तक पहुँचता है। आत्मा साक्षी भाव से देखता है बुद्धि अहंकार विषय का निश्चय करके उसमें कर्तव्य भाव लाते है। इस संपूर्ण क्रिया से चित्त में जो प्रतिबिंब बनता है। वही वृत्ति कहलाता है। यह चित्त का परिणाम है। अत: विषयाकार उसमें आकर प्रतिबिंबित होता है अर्थात चित्त का विषयाकार हो जाता है। महर्षि कहते हैं कि योग के आठ अंगों के अनुष्ठान करने से अर्थात उनको आचरण में लाने से चित्त के मल का अभाव होकर वह सर्वथा निर्मल हो जाता है। उस समय योगी के ज्ञान का प्रकाश विवेकख्याति तक हो जाता है, अर्थात उसे आत्मा का स्वरूप, बुद्धि, अहंकार और इंद्रियों से सर्वथा भिन्न प्रत्यक्ष दिखाई देता है। योग के आठ अंगों को अष्टांग योग की संज्ञा दी गई है। इसका उल्लेख महर्षि पतंजलि योग सूत्र के साधन पाद के 29 श्लोक में किया है उन्होंने कहा है यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान, समाधि, ये योग के आठ अंग है और हर अंग  का अपना महत्व है। निष्कर्ष के तौर पर हम कह सकते हैं कि योग केवल आसन प्राणायम ही नहीं है उससे भी अधिक है आसन प्राणायम तो मात्र उसकी सीढ़ियां हैं।

Published / 2021-06-21 14:48:54
कोरोनाकाल में भारत की आत्मनिर्भरता और चुनौतियां

एबीएन डेस्क, रांची। कोरोना महामारी की चुनौतियों से इस वक्त भारत ही नहीं बल्कि पूरा विश्व लड़ रहा है। वैश्विक महामारी के चलते दुनियाभर के देशों में रोजगार सृजन एक प्रमुख समस्या उभरकर सामने आई है। इस समस्या को देखते हुए ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी लगातार अपने भाषणों में आत्मनिर्भर भारत बनाने की बात कर रहे हैं। जिसका उद्देश्य कोरोना महामारी से लड़ना नहीं बल्कि भविष्य के भारत का निर्माण करना है। कई दशकों तक भारतीय अर्थव्यवस्था दुनिया के लिए बंद थी। लेकिन आर्थिक संकटों से जुझ रहे भारत ने अपने बाजार को 1991 में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश के जरिए दुनिया के लिए खोल दिया। ऐसे वक्त में जब विदेशी कंपनियों ने भारत को अपने आगोश में ले रखा है। उस स्थिति में स्वदेशी वस्तुओं के जरिए बाहरी कंपनियों के उत्पादों को टक्कर देना किसी चुनौती से कम नहीं होगा। भारत को आत्मनिर्भर बनाने का मतलब दुनिया से नाता तोड़ने जैसा नहीं है, लेकिन प्रधानमंत्री जो कह रहे हैं उसे निभाना आसान नहीं होगा। मौजूदा समय में अमेरिका और चीन हमारे जीवन से जुड़ी वस्तुओं के जरिए सीधा दखल दे रहे हैं। इसके अलावा सरकार को स्वदेशी वस्तुओं के निर्माण के लिए निमार्ताओं को आर्थिक सहायता भी मुहैया करानी होगी, जिससे विश्व व्यपार संगठन के साथ भारत का सीधा मुकाबला हो। मार्च 2020 से ही विश्व की लगभग सभी अर्थव्यवस्थाएं परिणामी स्वास्थ्य व आर्थिक क्षेत्र में हो रही गिरावट के चलते तनाव में हैं। इसके परिणामस्वरूप कई उद्योग और संगठन या तो बंद हो गए हैं या न्यूनतम क्षमता पर काम कर रहे हैं और इसका प्रभाव अब वैश्विक स्तर पर दिखाई दे रहा है। एनआईपी के रिपोर्ट के अनुसार भारत दुनिया में जनसंख्या के मामले में दूसरे, अर्थव्यवस्था में 5वें और इंफ्रास्ट्राक्चर के मामले में 70वें स्थान पर है। जो एक तरह से चिंताजनक स्थिति है। इस रिपोर्ट में अलग-अलग क्षेत्रों की प्राथमिकताओं और उनकी चुनौतियों की पहचान की गई तथा इसके समाधान के लिये एक रूप रेखा तैयार की गई है। देश में इंफ्रास्ट्रक्चर विकास के क्षेत्र में तीव्र सुधार हेतु विभिन्न क्षेत्रों से 7000 परियोजनाओं को चिन्हित किया गया है। पिछले कई वर्षों में यह देखा गया है कि अर्थव्यवस्था को गति प्रदान करने में इंफ्रास्ट्रक्चर परियोजनाएं बहुत ही सहायक रही हैं। पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी सरकार द्वारा 2001 में प्रारंभ किये गए स्वर्णिम चतुर्भुज परियोजना की शुरूआत के दौरान भी देश की आर्थिक स्थिति बहुत ठीक नहीं थी। हाल के वर्षों में बड़ी संख्या में इंफ्रास्ट्रक्चर से जुड़ी परियोजनाओं के लंबित होने के कारण अधिकांश बैंक ऐसी परियोजनाओं के लिये ऋण उपलब्ध कराने से बचती नजर आ रही हैं। वर्तमान परिस्थिति में अधिक लागत वाली बड़ी परियोजनाओं को शुरू करना और उनके लिए धन जुटाना सरकार के लिए चुनौतीपूर्ण है। अधिकांश बड़ी परियोजनाओं को पूरा होने में समय लग जाता है। जिससे सरकारों के बदलने और सरकार की नीतियों में बदलाव के कारण निजी क्षेत्रों की भागीदारी पर नाकारात्मक प्रभाव पड़ता है। महामारी के कारण बेहाल अर्थव्यवस्था को मजबूती प्रदान करने के लिए केद्र सरकार द्वारा उठाए जा रहे कदम में ऐसी योजनाओं को प्राथमिकता देनी चाहिए जिसे कम समय में पूरा किया जा सके। ताकि इन परियोजनाओं से अर्थव्यवस्था को आसानी से पटरी पर लाने में मदद मिल सके। इंफ्रास्ट्रक्चर से जुड़ी परियोजनाओं में आर्थिक संकटो का सामना करना पड़ता है। जिससे के निजी क्षेत्र के कंपनियों को तय समय सीमा के अंदर काम को पूरा करना कठिन होता है। सरकार को विकास वित्तीय संस्थान की स्थापना के लिए कदम उठाना चाहिए जिससे ऐसी परियोजनाओं के लिए निर्धारित ब्याज दर पर 20-25 वर्षों के लिए ऋण उपलब्ध करा सके। ऐसे संस्थानों के स्थापना से परियोजना से जुड़ी कंपनियों को बैंकों के दरवाजे को खटखटाना नहीं पड़ेगा और एनपीए की समस्या से निजात मिलेगा। दिल्ली मेट्रो जैसी बड़ी परियोजनाओं को इस लिए शुरू किया जा सका था क्योंकि इनके लिए जापान से लंबी अवधि का ऋण उपलब्ध कराया गया था। गौरतलब है कि आम बजट 2021 में सरकार की ओर से भारत की आर्थिक विकास दर स्थिर रखने के लिए लंबे समय तक चलने वाले इंफ्रास्ट्रक्चर परियोजनाओं पर विशेष बल दे रही है। इस योजना के साथ सरकार ने विकास वित्तीय संस्थान (डीएफआइ) की स्थापना पर पुन: विचार करने का प्रस्ताव किया है। आजादी के बाद से देश के विकास को तेज गति देने के लिए डीएफआई 1948 में भारतीय औद्योगिक वित्त निगम (आइएफएसआइ) की स्थापना के साथ प्रारंभ हुआ था। लेकिन 1970-80 के दशक के दौरान डीएफआई में राजनीति हस्तक्षेप के कारण लाभ पहुंचाने के लिए प्रभाव वाले निजी क्षेत्र की कंपनियों को ऋण दिया गया। परिणति के रुप में संस्थान एनपीए हो गया। मामला सामने आने के बाद 1991 में नरसिंहम समिति की सिफारिश के बाद डीएफआई को भंग कर दिया गया और तत्कालीन सक्रिय विकास वित्तीय संस्थानों को वाणिज्य बैंको में बदल दिया गया था। कोरोना के कारण उपजी हुई परिस्थितियों में आत्मनिर्भर भारत अभियान में तमाम चुनौतियों होने के बावजूद मजबूती के लिए औद्योगिक निवेश की आवश्यकता है। जिससे रोजगार सृजन के साथ वैश्विक ताकत के साथ देश को उभारने में मददगार साबित हो। मनरेगा जैसी रोजगार परक योजनाओं में पारदर्शिता लाने, 100 दिन के कार्य दिवस और मजदूरी दर को बढ़ाने पर सरकार को बल देना चाहिए। जिससे गांव के लोगों को असानी से गांव में ही रोजगार मिल सके। भारत में आर्थिक उदारीकरण के बाद कई क्षेत्रों में अपनी उत्पाद क्षमता में वृद्धि की है। परंतु अन्य कई अन्य कई क्षेत्रों में भी जहां बेहतर संभावनाएं हैं। भारतीय कंपनियां उत्पादन से हटकर व्यापार में अधिक सक्रिय रही हैं। पूर्व में भारत को स्टील उत्पाद, सूचना प्रौद्योगिकी और दूरसंचार में आत्मनिर्भर के लिए किये गए प्रयास में काफी सफलताएं मिली हैं।

Published / 2021-06-18 15:03:40
कोविड-19 : दूसरा टीका जल्दी लगाने की जरूरत

एबीएन डेस्क, रांची। भारत कोविड-19 से बचाव के लिए आंशिक एवं पूर्ण टीकाकरण के असर पर तेजी से मिल रहे तथ्यों एवं आंकड़ों का का अध्ययन कर रहा है। इस बीच, मई के मध्य से इस बात पर भी चर्चा चल रही है कि कोविशील्ड टीके की खुराक के बीच चार से आठ हफ्तों का अंतर दोबारा बहाल किया जाए या नहीं। टीकाकरण कार्यक्रम पर गठित राष्ट्रीय तकनीकी सलाहकार समूह (एनटीएजी) के कोविड-19 कार्यशील समूह के चेयरमैन एन के अरोड़ा ने यह बात कही। यह चर्चा उन खबरों के बाद जोर पकड़ रही है जिनमें कहा गया है कि ब्रिटेन में एस्ट्राजेनेका की एक खुराक कोविड-19 के प्रति केवल 33 प्रतिशत तक असरदार रहा है, जबकि दो खुराक के बाद 60 प्रतिशत तक सुरक्षा मिल जाती है। भारत ने जब कोविशील्ड की दो खुराक के बीच अंतर बढ़ाकर 12 से 16 हफ्ते कर दिया था तब उसके दो-तीन दिन बाद ये आंकड़े सामने आए थे। डीडी न्यूज पर बातचीत में अरोड़ा ने कहा कि कोविड-19 और इसे बचाव के लिए टीकाकरण गतिशील प्रक्रिया है और अगर दो खुराक के बीच अंतराल कम करने से अधिक कारगर नतीजे मिलते हैं तो तकनीकी समिति इस विषय पर अवश्य विचार करेगी। उन्होंने कहा, कल अगर हमें यह बताया जाता है कि पहली और दूसरी खुराक के बीच अंतर कम रखना अधिक कारगर है, भले ही इसका लाभ 5 से 10 प्रतिशत ही अधिक क्यों न हो, समिति तथ्यों पर विचार करने के बाद इस पर निर्णय जरूर लेगी। हां, अगर मौजूदा अंतर ठीक लगा तो हम इसे जारी रखेंगे। दो खुराक के बीच अंतराल बढ़ाने के सरकार के निर्णय पर अलग-अलग प्रतिक्रियाएं आ रही हैं। इस पर स्वास्थ्य मंत्रालय का कहना है कि वैज्ञानिक आंकड़ों के आधार पर पारदर्शी तरीके से दो यह निर्णय (अंतराल बढ़ाने का) लिया गया था। मंत्रालय ने कहा कि इस निर्णय पर तकनीकी विशेषज्ञों के बीच कोई मतभेद नहीं था। स्वास्थ्य मंत्री हर्ष वर्द्धन ने कहा, आंकड़ों का अवलोकन करने के लिए भारत में मजबूत ढांचा उपलब्ध है। यह अफसोस की बात है कि ऐसे महत्त्वपूर्ण विषय पर राजनीति हो रही है। अरोड़ा ने सीएमसी वेलूर और पीजीआई चंडीगढ़ के अध्ययन का भी हवाला दिया जिनमें कहा गया था कि एक खुराक के साथ टीकाकरण से संक्रमण का खतरा चार प्रतिशत और दो खुराक के साथ करीब पांच प्रतिशत रहता है। उन्होंने कहा, मोटे तौर पर बहुत अंतर नहीं है। टीकाकरण कार्यक्रम के विभिन्न पहलुओं पर विभिन्न स्रोतों से जानकारियां जुटाई जाएंगी और उनके अध्ययन के बाद किसी निष्कर्ष पर पहुंच जाएगा। कोविशील्ड की दो खुराक के बीच अंतर 6-8 हफ्तों से बढ़ाकर 12-16 हफ्ते करने के भारत के निर्णय को पब्लिक हेल्थ इंगलैंड के अध्ययन से भी बल मिला है। इस अध्ययन के नतीजे अप्रैल के अंतिम सप्ताह में सामने आए थे। इस अध्ययन के अनुसार दो खुराक में 12 हफ्तों का अंतर रखने से टीका 65 से 88 प्रतिशत तक असरदार रहता है। वैज्ञानिकों के अनुसार दो खुराक के बीच इतना अंतर रखने की बदौलत ही ब्रिटेन कोविड-19 के अल्फा स्वरूप के फैलने पर अंकुश लगा पाया था। अरोड़ा ने कहा, हमें यह भी लगा कि अंतर अधिक रखना एक अच्छी सोच है। ऐसा इसलिए क्योंकि इस बात के पुख्ता सबूत हैं कि दो खुराक के बीच अंतर अधिक रखने से एडिनोवेक्टर टीके अधिक असरदार साबित होते हैं। इससे लोगों को भी आसानी होती है क्योंकि सभी लोगों के लिए ठीक 12 हफ्तों के अंतर पर आना संभव भी नहीं होता। कनाडा, श्रीलंका और कुछ दूसरे देश एस्ट्राजेनेका के टीके की खुराक के बीच 12-16 हफ्तों का अंतर रख रहे हैं। पहले चार हफ्तों का अंतराल रखने के निर्णय पर अरोड़ा ने कहा कि वह संक्षिप्त परीक्षण के आंकड़ों पर आधारित था। उन्होंने कहा, हमें लगा कि अंतर चार हफ्तों से बढ़ाकर आठ हफ्ते करना चाहिए क्योंकि अध्ययनों में पता चला था कि चार हफ्तों का अंतर रखने से टीका 57 प्रतिशत असरदार रहता है जबकि अंतर आठ हफ्ते करने पर यह 60 प्रतिशत तक कारगर होता है। भारत ने दो खुराक के बीच समय अंतराल बढ़ाने से पहले ब्रिटेन से आंकड़े आने तक इंतजार करने का निर्णय किया था। सरकार ने कहा है कि खुराक के बीच अंतर बढ़ाने की कोविड-19 कार्यशील समूह की सिफारिश पर एनटीएजीआई स्टैंडिग टेक्निकल सब-कमिटी की 13 मई को हुई 31 बैठक में चर्चा हुई थी। जब दो खुराक के बीच समय अंतराल बढ़ाने के समय यह भी निर्णय लिया गया था कि टीकाकरण कार्यक्रम के असर पर नजर रखने के लिए एक व्यवस्था भी तैयार की जाए। मंत्रालय ने कहा कि इस निर्णय पर तकनीकी विशेषज्ञों के बीच कोई मतभेद नहीं था। स्वास्थ्य मंत्री हर्ष वर्द्धन ने कहा, आंकड़ों का अवलोकन करने के लिए भारत में मजबूत ढांचा उपलब्ध है। यह अफसोस की बात है कि ऐसे महत्त्वपूर्ण विषय पर राजनीति हो रही है। इस व्यवस्था के जरिये न केवल टीकाकरण कार्यक्रम के प्रभाव पर नजर रखी जा सकेगी, बल्कि टीके के प्रकार और दो खुराक के बीच अंतर रखने के असर का भी अध्ययन हो सकेगा। इससे यह भी पता चल पाएगा कि जब कोई आंशिक या पूरी खुराक लेता है तो किस तरह के नतीजे मिलते हैं। कोविड-19 और इसे बचाव के लिए टीकाकरण गतिशील प्रक्रिया है और अगर दो खुराक के बीच अंतराल कम करने से अधिक कारगर नतीजे मिलते हैं तो तकनीकी समिति इस विषय पर अवश्य विचार करेगी। उन्होंने कहा, कल अगर हमें यह बताया जाता है कि पहली और दूसरी खुराक के बीच अंतर कम रखना अधिक कारगर है, भले ही इसका लाभ 5 से 10 प्रतिशत ही अधिक क्यों न हो, भारत में ऐसी व्यवस्था बहुत महत्त्वपूर्ण है क्योंकि अब तक 17 से 18 लोगों को केवल एक खुराक दी गई है। चार करोड़ लोगों को दो खुराक लगाई जा चुकी है।

Published / 2021-06-17 14:53:41
अहम चुनाव के पूर्व कठिन दौर में कांग्रेस

एबीएन डेस्क, रांची। पूर्व केंद्रीय राज्य मंत्री और पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनावों में कांग्रेस के प्रभारी रहे नेता जितिन प्रसाद के भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) में शामिल होने पर न तो कांग्रेस विचलित दिखी और न ही उसमें कोई बेचैनी देखने को मिली। तमिलनाडु के एक कांग्रेस सांसद कहते हैं, वह लगातार तीन चुनाव हारे। अंतिम चुनाव में तो उनकी जमानत तक जब्त हो गई। इसके बावजूद पार्टी ने उन्हें महत्त्वपूर्ण दायित्व सौंपा। उनका बाहर जाना बहुत बड़ी बात नहीं है। लेकिन उन्होंने कहा कि पार्टी के चिंतित होने की दूसरी बड़ी वजह है। वह पूछते हैं, मुकुल रॉय भाजपा से तृणमूल कांग्रेस में एक चुंबकीय शक्ति की वजह से लौटे। वह चुंबक हैं ममता बनर्जी। हमारा चुंबक कहां है? लगभग इसी समय पार्टी अध्यक्ष पद का चुनाव होना था (इसकी तय मियाद 30 जून तक थी)। कोविड-19 संकट के बीच यह कवायद अनियतकाल के लिए टाल दी गई और कांग्रेस कार्य समिति ने भी प्रक्रिया रोकने पर मुहर लगा दी। नेतृत्व परिवर्तन चाहने वाले कांग्रेस के 23 नेताओं के समूह की मुख्य मांग अब तक लंबित पड़ी है। समूह में शामिल एक पूर्व केंद्रीय मंत्री ने कहा, हमें एक निर्वाचित कांग्रेस कार्य समिति की तत्काल जरूरत है, न कि मौजूदा की तरह नामित समिति की। हमने कभी अध्यक्ष को बदलने की बात नहीं की, हम केवल एक पूर्णकालिक नेतृत्व चाहते हैं जो दिखाई दे। यही कारण है कि पार्टी मनमाने निर्णयों की शिकार है और जवाबदेही पूरी तरह अनुपस्थित है। उदाहरण के लिए पार्टी सूत्रों का कहना है कि पश्चिम बंगाल में भारी हार के बावजूद किसी को जवाबदेह नहीं ठहराया गया। अधीर रंजन चौधरी अभी भी पीसीसी प्रमुख और लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष बने हुए हैं। एक साक्षात्कार में उन्होंने साफ कहा कि कांग्रेस की हार की एक वजह यह भी थी कि प्रचार अभियान में शीर्ष नेतृत्व अनुपस्थित था। उन्होंने कहा, दो रैलियों के बाद राहुल गांधीजी ने पश्चिम बंगाल आना बंद कर दिया क्योंकि कोविड के कारण हालात बिगड़ रहे थे। दूसरी ओर पार्टी नेता और केरल विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष रमेश चेन्निथला ने वीडी सतीशन को नेता प्रतिपक्ष बनाए जाने के बाद शिकायत की कि उन्हें पीठ पीछे पद से हटा दिया गया और शमिंर्दा किया गया। हालिया चुनाव के बाद विधानसभा में कांग्रेस के सदस्यों की तादाद कम हुई है। परंतु चेन्निथला पीसीसी प्रमुख नहीं थे, वह केवल नेता प्रतिपक्ष थे। उन्हें एक कद्दावर और प्रभावशाली कांग्रेस नेता माना जाता है जिसे कांग्रेस की राजनीति के मौजूदा दौर में अपने प्रतिद्वंद्वी उम्मेन चांडी का भी समर्थन हासिल है। चांडी ने नेता प्रतिपक्ष बने रहने के उनके दावे का समर्थन किया था। पार्टी पर्यवेक्षकों को इसमें राहुल गांधी के सहयोगी केसी वेणुगोपाल का हाथ नजर आता है जो स्वयं केरल से ताल्लुक रखते हैं। ठीक एक वर्ष पहले राजस्थान के तत्कालीन उपमुख्यमंत्री सचिन पायलट ने मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के खिलाफ बगावत का झंडा उठाया था और वह लगभग भाजपा में जाने ही वाले थे। यदि ऐसा होता तो गहलोत के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार का गिरना तय था। हालात तब संभले जब उन्हें आश्वासन दिया गया कि उनकी चिंताओं को दूर किया जाएगा और उनके समर्थकों को मंत्रिपरिषद में जगह दी जाएगी। 10 महीने बाद अब पायलट दिल्ली में हैं और पार्टी से कह रहे हैं कि उनसे किए गए वादे निभाए जाएं। गहलोत मंत्रिमंडल में नौ जगह खाली हैं और पायलट उनमें से ज्यादातर मांग रहे हैं। जबकि खबरों के अनुसार गहलोत ने पार्टी के वरिष्ठ नेताओं से कहा है कि वह स्वतंत्र विधायकों और उन अन्य लोगों की अनदेखी नहीं कर सकते जिन्होंने गत वर्ष पायलट की बगावत के समय उनका साथ दिया था। दूसरे शब्दों में कहें तो जुलाई 2020 का घटनाक्रम दोहराया जा सकता है। गहलोत को लगता है कि पार्टी के बाहर के लोग उनके प्रति पार्टी के लोगों से अधिक वफादार हैं। पायलट और उनके समर्थक इस बात को स्वीकार नहीं कर पा रहे। कांग्रेस की राजस्थान इकाई के प्रमुख गोविंद सिंह डोटासरा ने बिजनेस स्टैंडर्ड से कहा, पायलट कांग्रेस के वरिष्ठ नेता हैं और पार्टी में कोई समस्या नहीं है। पार्टी के राजस्थान प्रभारी अजय माकन ने कहा है कि प्रदेश में जल्दी ही मंत्रिमंडल परिवर्तन होगा। परंतु हाल ही में एक सप्ताह से दिल्ली में डेरा डाले पायलट कहते हैं, 10 महीने बीत चुके हैं। मुझे यही कहा गया कि कदम उठाए जाएंगे लेकिन अब आधा कार्यकाल तो बीत चुका है और मुद्दे जस के तस हैं। बहुत खेद की बात है कि ढेर सारे पार्टी कार्यकर्ता जिन्होंने काम किया और जनादेश दिलाने में मदद की उनमें से अधिकांश की सुनवाई नहीं हो रही है। पंजाब का किस्सा भी ऐसा ही है। नेतृत्व परिवर्तन की मांग कर रहे नाराज नेता नवजोत सिंह सिद्धू के क्षेत्र अमृतसर में रातोरात ऐसे पोस्टर लग गए जिनमें उनकी मांग को खारिज करते हुए लिखा है: पंजाब दा इक ही कैप्टन यानी पंजाब का एक ही कैप्टन है। इन पोस्टर में मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह का जिक्र करते हुए लिखा है: हैशटैग कैप्टन फॉर 2022। इस बीच सिंह के प्रभाव वाले पटियाला में सिद्धू समर्थकों के पोस्टर नजर आए जिन पर लिखा है: सारा पंजाब सिद्धू दे नाल यानी सारा पंजाब सिद्धू के साथ और किसाना दी आवाज मांगदा है पंजाब गुरु दी बेअदबी दा हिसाब यानी किसानों की आवाज पंजाब गुरु की बेअदबी का हिसाब मांगता है। आलाकमान द्वारा नियुक्त राज्य सभा के नेता प्रतिपक्ष मल्लिकार्जुन खडगे के नेतृत्च वाली समिति जिसमें वरिष्ठ नेता जेपी अग्रवाल और पंजाब के प्रभारी महासचिव हरीश रावत शामिल हैं, वह अब तक दिक्कतों को दूर नहीं कर सकी है और न ही उसने रिपोर्ट सार्वजनिक की है। पंजाब में अगले वर्ष फरवरी/मार्च में चुनाव होने हैं। जी 23 के एक नेता कहते हैं, यह हालत उन राज्यों में है जहां हम सत्ता में हैं या मजबूत हैं। हमें सोचना होगा कि हम कहां जा रहे हैं।

Published / 2021-06-16 14:21:14
बारिश की हर बूंद के बचाव से ही हम बचेंगे

एबीएन डेस्क, रांची। हमने जल को अमृत माना नदियों को भगवान का दर्जा दिया। पानी की महत्ता स्वीकार की। यानी हमें हर वह काम करना होगा जो करने की जरूरत है। वर्षा-जल की हरेक बूंद को जमा कर पानी की उपलब्धता बढ़ानी है, इसका इस्तेमाल इतने कारगर ढंग से करना है कि वर्षा-जल की हरेक बूंद का इस्तेमाल हमारे भोजन या फ्लश होने वाले पानी में हो। हमें यह भी सुनिश्चित करना है कि इस्तेमाल पानी की हरेक बूंद का पुनर्चक्रण हो और प्रदूषण से वह खराब न हो। हम यह बात पहले से जानते हैं और अमल में भी लाते हैं। लेकिन जलवायु परिवर्तन के दौर में इतना ही काफी नहीं होगा। हमें ये सारे काम कहीं अधिक तेजी से और व्यापक स्तर पर अलग ढंग से करने होंगे। हमें मालूम है कि जलवायु परिवर्तन के प्रभावों का ताल्लुक गर्मी और कम-ज्यादा बारिश से है। इन दोनों का जल चक्र से सीधा सह-संबंध है। इस तरह जलवायु परिवर्तन के असर को कम करने के लिए पानी एवं उसके प्रबंधन पर ध्यान देना होगा। हमें पता है कि हर नया साल इतिहास का सर्वाधिक गरम साल बनता जा रहा है और पिछले रिकॉर्ड को तोड़ता जा रहा है। भारत में ओडिशा के कुछ हिस्सों में तापमान फरवरी की शुरूआत में ही 40 डिग्री सेल्सियस को पार कर गया था। उत्तर भारतीय राज्य बढ़ती गर्मी एवं सामान्य से अधिक तापमान के सारे पुराने रिकॉर्ड तोड़ रहे हैं। खास बात यह है कि यह सब ला नीना के साल में हो रहा है। ला नीना प्रशांत महासागर की वे जल धाराएं हैं जो दुनिया का तापमान कम करने के लिए जिम्मेदार मानी जाती हैं। लेकिन भारत के मौसम वैज्ञानिकों का कहना है कि वैश्विक ताप वृद्धि ने ला नीना के इस शीतकारी प्रभाव को कम कर दिया है। बढ़ती हुई गर्मी का जल सुरक्षा के लिहाज से कई मायने हैं। पहला, इसका मतलब है कि जल इकाइयों से अधिक वाष्पीकरण होगा। यानी हमें न सिर्फ लाखों जल निकायों में पानी जमा करने पर ध्यान देने की जरूरत है बल्कि वाष्पन के कारण होने वाले नुकसान की भरपाई के लिए भी योजना बनानी होगी। एक विकल्प भूमिगत जल भंडारण यानी कुओं पर काम करने का है। भारत लंबे वक्त से भूमिगत जल प्रणालियों के प्रबंधन को कम तवज्जो देता रहा है क्योंकि सिंचाई विभाग की समूची अफसरशाही ही नहरों एवं अन्य सतही जल प्रणालियों पर आधारित है। लेकिन जलवायु परिवर्तन एवं पानी की भारी किल्लत के इस दौर में इसे बदलने की जरूरत होगी। हमें तालाबों, पोखरों एवं नहरों से होने वाले नुकसान की भरपाई के तरीके तलाशने होंगे। ऐसा नहीं है कि वाष्पीकरण से पहले नुकसान नहीं होता था लेकिन तापमान बढ?े के साथ इसकी दर बहुत ज्यादा हो गई है। हमें योजना बनाने और अधिक काम करने की जरूरत है। दूसरा, बढ़ती गर्मी का मतलब है कि मिट्टी में नमी कम होती जाएगी जिससे जमीन में धूल की मात्रा बढ़ जाएगी और सिंचाई की जरूरत बढ़ती जाएगी। भारत जैसे देश में जहां भोजन का बड़ा हिस्सा अब भी वर्षा-सिंचित इलाकों में ही पैदा होता है, वहां पर मिट्टी की नमी कम होने से भूमि अपरदन तेज होगा और धूल का बनना भी बढ़ जाएगा। जल प्रबंधन को वनस्पति नियोजन के साथ तालमेल बिठाकर चलना होगा ताकि मिट्टी में पानी को रोके रखने की क्षमता बेहतर हो, अधिक देर तक चलने वाली तीव्र गर्मी के दौर में भी। तीसरा, साफ है कि गर्मी बढ़ने से पानी का इस्तेमाल बढ़ जाएगा क्योंकि पीने एवं सिंचाई के साथ ही जंगलों या इमारतों में लगी आग बुझाने के लिए भी ज्यादा पानी की दरकार होगी। हम दुनिया के कई हिस्सों एवं भारत में भी जंगलों में भीषण आग लगने के डरावने दृश्य देख चुके हैं। तापमान जैसे-जैसे बढ़ता जाएगा, यह सिलसिला भी तेज होता जाएगा। जलवायु परिवर्तन से पानी की मांग बढ़ेगी लिहाजा यह और भी जरूरी हो जाता है कि हम पानी के साथ अपशिष्ट जल को भी बरबाद न करें। सच यह है कि अत्यधिक बारिश होने की बढ़ती घटनाओं के संदर्भ में भी जलवायु परिवर्तन का असर दिख रहा है। हम बारिश के एक बाढ़ के तौर पर आने की भी अपेक्षा करें। इस तरह बाढ़ों का एक चक्र पूरा होने के बाद सूखे की स्थिति और भी गंभीर हो। भारत में पहले से ही साल में बारिश कम दिन होती है। साल भर में औसतन सिर्फ 100 घंटे की ही बारिश होती है। लेकिन जलवायु परिवर्तन बारिश वाले दिनों की संख्या और कम करेगा। वैसे भारी बारिश वाले दिनों की संख्या बढ़ जाएगी। इसका जल प्रबंधन की हमारी योजनाओं पर बड़ा असर होगा। हमें बाढ़ प्रबंधन पर अधिक शिद्दत से गौर करने की जरूरत है, नदियों के तटबंध बनाने के साथ ही बाढ़ के पानी को भूमिगत एवं सतहीय जलभंडार निकायों-कुओं एवं तालाबों में जमा किया जा सके। लेकिन हमें वर्षाजल को इकट्ठा करने के बारे में अलग तरह से योजना बनाने की जरूरत है। फिलहाल मनरेगा के तहत लाखों की संख्या में बन रहे तालाब एवं पोखर सामान्य बारिश के हिसाब से डिजाइन हैं। लेकिन अब भारी बारिश की बात आम होने के साथ ही ये जल भंडार संरचनाओं को भी नए सिरे से डिजाइन करने की जरूरत है ताकि वे लंबे समय तक लबालब रहें। मूल बात यह है कि जलवायु परिवर्तन के दौर में हमें पानी की हर बूंद बचानी होगी, चाहे बारिश का पानी हो या बाढ़ का पानी। हमें पानी एवं उसके प्रबंधन को लेकर पहले जुनूनी होना था लेकिन अब तो सेहत एवं दौलत के आधार पानी को लेकर हमें संकल्पित एवं सुविचारित रवैया अपनाना होगा। यह अपने भविष्य को बनाने- बिगाड़ने की बात है।

Published / 2021-06-10 17:07:53
कोविडकाल में कम आंका गया पत्रकारों का योगदान

एबीएन डेस्क, रांची। संकट काल में ही सच्चे मित्र की पहचान होती है। जब कोरोना महामारी के दूसरे लहर से पूरा देश संकटग्रस्त है ऐेसे समय में चिकित्सकों से लेकर सारे मेडिकल स्टाफ के समर्पण और उनके दिन रात के प्रयास की सराहना हुयी। चिकित्सा क्षेत्र से जुड़े लोगों के अलावा एक और तबके ने पिछले दो महिनों में इस त्रासदी में करोड़ो लोगों की मदद की और खुद अपनी जान देकर लोगों की जान बचायी। ये तबका उन पत्रकारों का था जो भयावह परिस्थिति में भी कमजोर ,वंचितों और लाचार लोगों की मदद किसी न किसी रूप में करते रहा। मीडिया पर यह आरोप तो लगते हैं कि इन्होंने चरम संक्रमण के वक्त इस तरह से कोरोना के भयावहता को परोसा कि लोगों में भय हताशा का संचार हुआ, पर इसके इतर एक दूसरा पक्ष भी है कि फिल्ड रिपोर्टरों के प्रयास उनके कवरेज के चलते त्वरित सरकारी मदद आवश्यक अस्पतालों तक पहुंचायी जा सकी। एक अनुभवी पत्रकार सिर्फ सतही खबरों का संदेशवाहक नहीं होता बल्कि खामियों के खिलाफ उसकी निर्भिकता और मुखरता बढ जाती है, उसकी बातें सुनी जाती है। बहुतों की नजर में यह रसूखदार होना लगता है, पर कोराना संकट में इस कथित रसूख का एक धवल पक्ष दिखा। मैने देखा कि कई कमजोर और लाचार लोगों के लिये अस्पताल में बेड, आॅक्सीजन, वेंटिलेटर, दवा तक की उपलब्धता पत्रकारों की मुखरता के कारण ही हुयी। पत्रकारों ने अपनी जान जोखिम में डाल कर हताश निराश लोगों को चिकित्सा सुविधायें उपलब्ध करवायी। यहां तक कि कुछ निजि अस्पतालों ने बीमार संक्रमित लोगों से लाखो रुपए इलाज के नाम पर ले लिये। पत्रकारों को जब इस बात का पता चला तो उन्होंने इसे प्रमुखता से प्रकाशित किया और इन निजी अस्पतालों को पैसे वापस तक करने पड़े। जिन कुछेक अस्पतालों में आॅक्सीजन सिलिंडर से लेकर, दवाओं की कालाबाजारी और जमाखोरी हो रही थी उसे भी इन्होंने उजागर किया और प्रशासन को इस पर नकेल कसनी पड़ी। मैंने देखा कि रांची में परेशान कोरोना मरीजों के परिजन पत्रकारों को ही मदद की उम्मीद में फोन लगा रहे थे। एक नजर में यह पहुंच पैरवी सी हरकत लग सकती है। दूसरा पक्ष है कि पत्रकारों से इलाज में मदद के लिये आस लगाने वालों में ज्यादतर निरीह और आम हताश लोग ही थे और प्रेस लॉ पत्रकारों को अलग से कोई कानूनी शक्ति नहीं देता। यह सद्प्रयास पत्रकारों पत्रकारों की पेशागत मददगार फितरत का नतीजा रहा। इन सबके बीच सबसे भी दुखद कि सिर्फ झारखंड में ही तीस से ज्यादा पत्रकारों को कोरोना ने हमसे छीन लिया। सोंचिये ये पत्रकार चाहते तो हम आप की तरह घर में छुपे रह कर अपनी जान भी बचा सकते थे। लेकिन इन्होंने ऐसा नहीं किया। दिल्ली के टीवी चैनल के प्रसिद्ध पत्रकार रोहित सरदाना से लेकर रांची प्रेस क्लब के सुनील सिंह सहित झारखंड में ही दर्जनों युवा पत्रकारों का पत्रकारिता जगत से चला जाना बहुत पीड़ादायी है। इसकी भरपाई कहीं से भी संभव नहीं है, पर इससे भी दुखद है कि पत्रकारों के इस योगदान को अनदेखा किया गया। कुछेक राज्यों में पत्रकारों को कोरोना वॉरियर बता कर उनकी आर्थिक मदद की घोषणा की गयी, । मीडिया पर सैकड़ो आरोप भी लगते हैं, पर यह हकीकत है कि आज भी आम जन सच्चाई के लिये, दबाये जा रहे तथ्यों और वाकयों को जानने के लिये, घोर संकट में अपनी बात को उचित मंच पर पहुंचाने के लिये पत्रकारों पर ही भरोसा रहता है। मैने पत्रकारिता के छात्रों को अपने विभाग में देखा है कि जैसे-जैसे पुराने होते जाते हैं उनकी सोच व्यापक होने लगती है। अवश्य ही इस पेशे में कुछ ऐसा है जो फितरतन पत्रकारों को वंचितो और आम लोगों की आवाज बना देती है। अपने कार्य में खुद कई तरह के तनाव झेलने वाले, आरोपों से हलकान और अक्सर आर्थिक संकट के पीड़ा व्यथा को चुपचाप सहने वाले पत्रकार कोरोना संकट में भी वंचितों और जरूरतमंदों के मददगार बने, शहीद भी हुये, पर अफसोस उनके कार्यों को कमतर करके आंका गया। आलोचना का एक सिद्धांत है कि सदैव मुखर की ही आलोचना होती है। आज मीडिया में श्रेष्ठ का ही चयन किया जाएगा उसे ही सुना जाएगा और समझा जाएगा। आम लोगों के मंच पर पत्रकारों की सूचनाधर्मिता अन्य प्रोफेशन से अलग है। इस कोरोना काल में हर एक मौत के साथ बचें जीवन की पूरी धारदार और प्रमाणिक सूचना देकर जीवन बचाने का काम किया। चाहे आॅक्सीजन की कमी की बात हो या वैक्सीन की कठिनाई की आज शासन-प्रशासन को सजग करने का काम मीडिया ही करता है और उसके माध्यम होते हैं हमारे देश के सजग पत्रकार जो हर व्यक्ति को अब इन पर विश्वास करने को प्रेरित कर रहा है। अबतक सैकड़ों पत्रकारों की जान कोविड महामारी के कारण जा चुकी है? स्विट्जरलैंड की मीडिया अधिकार और सुरक्षा से जुड़ी संस्थाय प्रेस एम्बलम कैम्पेन (पीएसी) ने कोरोना वायरस के चलते पत्रकारों की हुई मौत पर दुख जताते हुए एक बयान जारी किया है और बताया है कि दुनिया भर में हजार से ज्यादा पत्रकार कोरोना वायरस का शिकार हो चुके हैं और कुल 75 देशों के बीच भारत इस मामले में दूसरे नंबर पर है। पीईसी के महासचिव ब्लेतस लेम्पेयन ने कहा, यह इस पेशे को हुआ अप्रत्याशित नुकसान है और कत्लेआम है। इसलिए प्रेस आजादी दिवस पर आह्वान करते हैं कि उन सभी प्रतिष्ठित पत्रकार साथियों को हम श्रद्धांजलि दें जो महामारी का शिकार हो गए। पीईसी के मुताबिक दुनिया में हर दिन चार पत्रकारों की मौत हुई। मौत से सबसे ज्यादा प्रभावित चार देश हैं- ब्राजील (189), भारत (151), पेरू (140) और मेक्सिको (109)अच्छी बात ये है कि इस बीच यूरोप और अमेरिका में पत्रकारों की मौत की दर कम हुई है, जिसका श्रेय वहां टीकाकरण और सुरक्षा उपायों को जाता है। लैटिन अमेरिका सबसे अधिक प्रभावित है। (लेखक पत्रकारिता एवं जनसंचार विभाग रांची विश्वविद्यालय रांची के उपनिदेशक हैं।)

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