विचार

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Published / 2021-07-27 14:37:12
पाक और इस्लाम के बिना अफगानिस्तान

एबीएन डेस्क। इन दिनों भारत और अफगानिस्तान के बीच गतिविधियां तेज हो गई हैं। साफ नजर आ रहा है कि तालिबान उभार पर है। इससे भारत पर क्या प्रभाव पड़ेगा? क्या इस बात से भारत का दिल टूट जाना चाहिए कि अमेरिका के नए राष्ट्रपति जो बाइडन ने इस तरह वापस हटने का निर्णय लिया? या इस बदलाव में भी अवसर हैं? क्या तालिबान के साथ शत्रुता का रिश्ता रखना अपरिहार्य है? क्या हम यह मानकर चलें कि यह पाकिस्तान नियंत्रित इस्लामिक लड़ाकू संगठन बना रहेगा? जॉर्ज डब्ल्यू बुश ने अफगानिस्तान पर आक्रमण करके और मुशर्रफ को साझेदार बनाकर इस क्षेत्र को एक नया नाम दिया: अफ-पाक। क्या भारत अब इसे ऐसे ही स्वीकार कर ले? सन 2011 में मैंने एक आलेख लिखकर कारण बताया था कि क्यों भारत को अफ को पाक के लिए छोड़ देना चाहिए। तब से अब तक हम किस दिशा में बढ़े हैं? पहली बात, क्या ऐसा कोई प्रमाण है कि तालिबान निर्भरता या आभार जताने के लिए हमेशा पाकिस्तान का अनुचर बना रहेगा? एक ऐसा अटूट साझेदार जिसके लिए अगर पाकिस्तान-चीन शिखर बैठकों में इस्तेमाल होने वाला जुमला इस्तेमाल किया जाए तो जिसके साथ पहाड़ों से ऊंची और सागर से गहरी दोस्ती है? आप सोच सकते हैं, क्यों नहीं? क्या पहली पारी में तालिबान और पाकिस्तान के बीच ऐसा ही रिश्ता नहीं था? परंतु जैसा कि म्युचुअल फंड्स पर लिखी वैधानिक चेतावनी में कहा जाता है: अतीत का प्रदर्शन भविष्य के प्रदर्शन का मानक नहीं है। क्या यह कहावत भू-सामरिक हितों पर भी लागू होती है? विभिन्न देशों और समाजों की वैचारिक स्थिति चाहे जो भी हो, अंतत: वे अपने हित में काम करते हैं। क्या ऐसा कोई संकेत है कि इस बार तालिबान अलग साबित हो सकता है? उनके तौर तरीके, इस्लाम की उनकी व्याख्या, महिलाओं, शिक्षा और नागरिक स्वतंत्रता को लेकर उनका नजरिया आदि आधुनिक समाज को बुरे लग सकते हैं। परंतु क्या जरूरी है कि इसके चलते वे भारत के शत्रु बन जाएं? क्या वे भारत से जंग छेड़ सकते हैं या हमारे खिलाफ युद्ध में पाकिस्तान का साथ दे सकते हैं? इसमें उनका क्या फायदा? क्या वे भारत को इस्लामी राष्ट्र बना देंगे और हमें किसी खिलाफत का अंग बना देंगे? तालिबान बर्बर, मध्ययुगीन, स्त्री-विरोधी, गैर भरोसेमंद, दकियानूस हो सकते हैं या शायद इससे भी बुरे। परंतु वे मूर्ख या आत्मघाती नहीं हैं। वरना वे अमेरिका से दो दशक तक जूझने और उसे परास्त करने में कामयाब न हो पाते। अतीत के मुजाहिदीन के उलट उन्हें हथियारों से समर्थन देने वाले भी नहीं थे। बस पाकिस्तान ही चोरी छिपे उनकी मदद करता रहा। भारत के पश्चिम में पाकिस्तान के रणनीतिक नजरिये से देखने में नुकसान भी हैं। हम यह सोच कर परेशान हो जाते हैं कि अमेरिका पाकिस्तान को एक प्रसिद्ध जीत सौंपकर जा रहा है। पाकिस्तान के पास अब कुछ ऐसा है जो वह हमेशा से चाहता था: एक सामरिक गहराई। परंतु यह जीत कितनी भ्रामक है यह समझने के लिए फॉरेन अफेयर्स में हुसैन हक्कानी का लेख पढ़ा जरूरी है। इस क्षेत्र के मानचित्र पर एक नजर डालने पर पता चल जाएगा कि ऐसी कल्पना केवल रावलपिंडी के सैन्य मुख्यालय में बैठे बुद्धिमान ही कर सकते हैं जिनके बारे में माना जाता है कि उनका दिमाग सर में नहीं बल्कि कहीं और होता है। वे सन 1986-87 से ही ऐसे स्वप्न देख रहे हैं। इसलिए क्योंकि जनरल कृष्णास्वामी सुंदरजी के आॅपरेशन ब्रासटैक्स ने यह दु:स्वप्न पैदा कर दिया था कि भारतीय टैंक पाकिस्तान के संकरे इलाकों में वारसा संधि शैली में तेजी से पैठ बना सकते हैं। ऐसे में उसे रणनीतिक गहराई की जरूरत थी। पैंतीस वर्ष बाद दुनिया बदल चुकी है और रणनीतिक और सामरिक तस्वीर भी। इसके अलावा अब परमाणु हथियार भी हैं। यदि पाकिस्तानी सैन्य अधिकारी अभी भी सोच रहे हैं कि हिंदुकुश पर्वत होते हुए अफगानिस्तान पहुंच सकते हैं या वहां कोई सामरिक बदलाव ला सकते हैं तो वे बहुत मासूम हैं। बीते 75 वर्ष से अधिक समय में दुनिया ने पाकिस्तानी सेना के बारे में एक बात सीखी है। सामरिक दृष्टि से वह शानदार है लेकिन रणनीतिक नजरिये से भ्रमित है। लेकिन क्या वह तालिबान के मित्र होने के नाते अपने परमाणु हथियार या एफ-16 लड़ाकू विमानों के दो बेड़े अफगानिस्तान भेज सकती है? हम तटस्थ आकलन कर सकते हैं कि अफगानिस्तान में कौन जीता और कौन हारा। यकीनन तालिबान जीते और अमेरिका और उसके सहयोगी हारे। लेकिन पाकिस्तान? तालिबान ने गत दो दशक में एक बात साबित की है कि वे उससे अधिक होशियार हैं। पाकिस्तान उनके देश को रणनीतिक गहराई हासिल करने के लिए इस्तेमाल करने की कल्पना कर रहा था लेकिन इन वर्षों में उन्होंने यह समीकरण उलट दिया। उन्होंने पाकिस्तान का इस्तेमाल अपनी रणनीतिक गहराई के लिए किया। ऐसा करके उन्होंने अमेरिका को हराया। बाइडन का जीत का दावा उतना ही खोखला है जितनी जॉर्ज डब्ल्यू बुश की यह आलोचना कि यह वापसी हड़बड़ी में की गई। बाइडन ने उस शर्मनाक हकीकत को स्वीकार किया जिसे बुश नहीं कर सके। अमेरिका वहां से बाहर निकल रहा है और उसने यह घोषणा भी कर दी है कि अफगानिस्तान में नए राष्ट्र का निर्माण कभी अमेरिका का लक्ष्य नहीं था। साफ कहें तो इस्तेमाल करो और फेंको। अमेरिका ने एक निर्वात छोड़ा है। तालिबान की पकड़ दिनबदिन मजबूत हो रही है। देखना है कि पाकिस्तान का क्या होता है? यदि लड़ाई लंबी चली तो तात्कालिक लाभ की आशा समाप्त हो जाएगी। डूरंड रेखा के आरपार घायल, बेघर, शरणार्थी नजर आएंगे। यदि तालिबान इसे जल्द निपटाने में कामयाब रहा तो भी उसे पाकिस्तानियों को कितना नियंत्रण सौंपना होगा? खासतौर पर तब जबकि उन्हें रणनीतिक गहराई की जरूरत नहीं होगी?आप कह सकते हैं कि वे चीन और पाकिस्तान के बीच फंस जाएंगे और एक अधीनस्थ देश के दर्जे में रहेंगे। परंतु अफगानिस्तान का इतिहास ऐसा नहीं बताता। वह इस क्षेत्र में रुचि रखने वाली अन्य शक्तियों मसलन ईरान और रूस के साथ सुलह कर सकता है।

Published / 2021-07-23 14:34:39
...अब देश में हो रोजगार की कमी पर बहस

एबीएन डेस्क। देश की आय को मापने के लिए देश में हुए उत्पादन का अनुमान लगाया जाता है। जैसे किसानों द्वारा कितने माल पर जीएसटी दिया गया, रेलवे ने कितनों को यातायात उपलब्ध कराया, बिजली की कितनी बिक्री हुई, इत्यादि। इन आधारों पर आकलन किया जाता है कि देश में कितना उत्पादन हुआ होगा। चूंकि हर ढाबे वाले से पूछना कठिन है कि उसने कितनी रोटी बेची। सरकारी अनुमान के अनुसार इस वित्तीय वर्ष की पहली तिमाही यानी अप्रैल से जून 2020 में देश के कुल उत्पादन में 23.9 प्रतिशत की गिरावट आई है लेकिन जवाहर लाल नेहरू यूनिवर्सिटी के पूर्व प्रोफेसर अरुण कुमार के अनुसार अप्रैल में जीडीपी में 75 प्रतिशत की गिरावट आई है, मई में 60 प्रतिशत और जून में 40 प्रतिशत। यानी औसत 58 प्रतिशत की गिरावट पहली तिमाही में आई है। इस प्रकार सरकार और अरुण कुमार के अनुमान में दुगने से ज्यादा का अंतर दिखता है पर वास्तविकता इन दोनों के बीच है। ऐसा प्रतीत होता है कि सरकार ने जो जीडीपी का अनुमान लगाया है, वह कम्पनियों द्वारा प्रकाशित परिणाम के आधार पर लगाया है जो कि सही विधि है। लेकिन कोविड संकट के दौरान पहली तिमाही में विशेषता यह है कि केवल कुछ बड़ी कंपनियों जैसे मोबाइल टेलीफोन, बिजली एवं ई-कॉमर्स का ही कारोबार ठीकठाक चला है। तमाम छोटी कम्पनियों की हालत गड़बड़ रही है लेकिन इन छोटी कम्पनियों द्वारा अपने परिणाम प्रकाशित नहीं किये गये हैं। इसलिए यदि केवल प्रकाशित परिणामों के आधार पर जीडीपी का आकलन करें तो वह बड़ी सफल कम्पनियों के आधार पर हो जाता है जो कि अर्थव्यवस्था की सही स्थिति को नहीं बताता है। सरकार के अनुमान में दूसरी समस्या यह है कि असंगठित क्षेत्र, जिसमें किराना दुकान, दर्जी, टैक्सी, छोटे स्कूल, डाक्टर, ढाबे इत्यादि आते हैं, इनके आंकड़े एकत्रित करना पहली तिमाही में असम्भव था। इसलिए सरकार ने इनके द्वारा उत्पादन में आयी गिरावट का अनुमान कैसे लगाया है, इसका ब्योरा उपलब्ध नहीं है। इसलिए सरकार द्वारा जो 23.9 प्रतिशत की गिरावट बताई गयी है, उस पर विश्वास नहीं होता है। सरकार ने यह भी कहा है कि इस तिमाही में कृषि में 3.4 प्रतिशत की जीडीपी में वृद्धि हुई है। इस पर भी संदेह उत्पन्न होता है। अरुण कुमार के अनुसार अप्रैल में हमारी मंडियों में 50 प्रतिशत की आवक कम हुई है। पर नींबू का मूल्य जो 40 रुपये प्रति किलो पूर्व में था, वह इस अवधि में गिरकर 25 रुपये हो गया है। यदि फल-सब्जी के दाम गिरते हैं तो जीडीपी उसी अनुपात में गिरता है। जैसे 1 किलो नींबू यदि 25 रुपये में बिके तो वह जीडीपी में 25 रुपये की वृद्धि करता है। वही नींबू यदि 40 रुपये में बिके तो जीडीपी में 40 रुपये की वृद्धि होती है। क्योंकि इस अवधि में कृषि उत्पादों के दाम में गिरावट आई है, इसलिए कृषि की जीडीपी में वृद्धि हुई, इस पर विश्वास करना कठिन हो जाता है। यह मान भी लें कि कृषि में 3.4 प्रतिशत की वृद्धि हुई तो भी कृषि क्षेत्र को अर्थव्यवस्था में आगे बढ़ाने में भरोसा करना उचित नहीं होगा। कारण यह कि जीडीपी में कृषि का हिस्सा मात्र 14 प्रतिशत है। 14 प्रतिशत में यदि 3.4 प्रतिशत की वृद्धि हो तो कुल जीडीपी में 0.24 प्रतिशत की वृद्धि कृषि के कारण हो सकती है जो कि नगण्य है। जीडीपी के कमजोर होने का एक और आंकड़ा छोटे उद्यमों को दिए गये ऋण का है। रिजर्व बैंक के अनुसार बैंकों द्वारा मझले, छोटे एवं अति छोटे उद्योगों को मार्च 2020 में 11.49 लाख करोड़ रुपये का ऋण दिया गया था। अप्रैल-मई में इसमें गिरावट आई, जून में यह सुधरा और 11.32 लाख करोड़ तक पहुंच गया जो कि मार्च से कम था। लेकिन विचारणीय यह है कि छोटे उद्योगों को जो 3 लाख करोड़ रुपये का सरकार ने ऋण का पैकेज जारी किया था, उसके बावजूद कुल ऋण में वृद्धि क्यों नहीं हुई? ऐसा प्रतीत होता है कि बैंकों ने छोटे उद्योगों को दिए पुराने ऋण का भुगतान ले लिया और नये ऋण उन्हें दे दिए। इस प्रकार कुल ऋण पूर्ववत रहे। यह एक और संकट का द्योतक है। इस अवधि में इनका उत्पादन प्रभावित हुआ है और अपने को जीवित रखने के लिए इन्होंने ऋण लेकर अपने को जीवित रखा है। जैसे आईसीयू में मरीज को कुछ समय के लिए भर्ती किया जाता है। इस ऋण को विकास नहीं मान सकते। यह ऋण लेना संकट को बताता है। कुल मिलाकर परिस्थिति यह है कि सरकार द्वारा जो 23.9 प्रतिशत की जीडीपी में गिरावट बताई जा रही है, वह वास्तव में इससे अधिक है। यद्यपि अरुण कुमार द्वारा 58 प्रतिशत की जो गिरावट बताई जा रही है, उसके पीछे कोई ठोस आंकड़े नहीं दिए गये हैं। इसलिए वह वास्तविकता से अधिक दिखती है। बहरहाल इतना स्पष्ट है कि हमारे देश की अर्थव्यवस्था की हालत अच्छी नहीं है। इस परिस्थिति में अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष ने भारत सरकार को सलाह दी है कि वह अपने निर्यात बढ़ाये और वैश्वीकरण को और पुरजोर तरीके से अपनाए, जिससे विदेशी पूंजी मिले इत्यादि। ऐसा ही हम पिछले 6 वर्षों से करते आ रहे हैं लेकिन हमारा जीडीपी लगातार गिर ही रहा है। इस समय इस नीति को अपनाना और ज्यादा घातक होगा। कारण यह कि संकट के समय जब हम वैश्वीकरण को अपनाते हैं तो दूसरे देशों में बना सस्ता माल अपने देश में प्रवेश करता है और हमारे उपभोक्ता के रोजगार साथ -साथ समाप्त हो जाते हैं। रोजगार समाप्त होने से उसके हाथ में क्रय शक्ति नहीं बचती और वह माल दुकान में पड़ा रह जाता है तथा बिक नहीं पाता। इसलिए हमारे सामने विकल्प यह है कि हम जनता को रोजगार उपलब्ध करायें अथवा सस्ता माल? पर रोजगार उपलब्ध करना ज्यादा महत्वपूर्ण है। रोजगार उपलब्ध हो तो व्यक्ति महंगा माल भी बर्दाश्त कर लेता है। लेकिन यदि रोजगार न हो तो दुकान में रखा सस्ता माल भी व्यर्थ है। इसलिए सरकार को चाहिए कि तत्काल विदेश से आने वाले तमाम माल पर आयात कर में भारी वृद्धि करे, जिससे देश के बंद उद्योगों का काम फिर से चालू हो जाये। इन उद्योगों का माल बिकने से इनके द्वारा रोजगार उत्पन्न किये जायेंगे, जिससे पुन: बाजार में माल की मांग उत्पन्न होगी और अर्थव्यवस्था चल निकलेगी। लेकिन इस प्रक्रिया को अपनाने में जनता को महंगा माल स्वीकार करना पड़ेगा। इसलिए सरकार को चाहिए कि जनता को अपने विश्वास में ले। उन्हें बताये कि विदेश में बने सस्ते माल के स्थान पर हमें देश में बने महंगे माल को खरीदना चाहिए, जिससे कि देश में रोजगार उत्पन्न हो और अर्थव्यवस्था चल निकले।

Published / 2021-07-22 14:32:30
महर्षि वेदव्यास को मिलता है पहले गुरु का सम्मान...

एबीएन डेस्क। उन्हें विश्व के इतिहास में पहले गुरु संपादक के रूप में स्वीकार करते हुए हम उनकी जन्म और कर्म को लोगों तक पहुंचाने का कार्य कर रहे हैं। उन्होंने जितनी रचना की उतना विश्व के इतिहास में किसी दूसरे ने नहीं किया। उमहाभारत जैसे महान ग्रंथ की रचना करने वाले वेद व्यास के जीवन के बारे में बहुत ही कम लोग जानते हैं। महर्षि वेद व्यास के पिता कौन थे, किन परिस्थितियों में व्यास का जन्म हुआ, उनका जीवनकाल कैसे और कहां बीता, आदि जैसे घटनाक्रम के विषय में ज्यादा चर्चाएं नहीं हुई हैं। वेदों का विस्तार करने के कारण ये वेदव्यास तथा बदरीवन में निवास करने के कारण बादरायण के नाम से भी जाने जाते हैं। वेद व्यास ने चारो वेदों के विस्तार के साथ-साथ अठारह महापुराणों तथा ब्रह्मसूत्र का भी प्रणयन किया। हिन्दू पुराणों के अनुसार भगवान विष्णु ने ही व्यास के रूप में अवतार लेकर वेदों का विस्तार किया था। वेद सबसे प्राचीण ग्रंथो में एक है।महर्षि वेदव्यास न केवल महाभारत के रचयिता हैं, बल्कि वह उन घटनाओ के भी साक्षी रहे हैं जो क्रमानुशार घटित हुई हैं। असल में इस महान धार्मिक ग्रंथ में व्यासजी की भी एक अदद भूमिका है। वेदव्यास उन मुनियों में से एक हैं, जिन्होंने अपने साहित्य और लेखन के माध्यम से संपूर्ण मानवता को यथार्थ और ज्ञान का खजाना दिया है। महर्षि व्यास ने न केवल अपने आसपास हो रही घटनाओं को लिपिबद्ध किया, बल्कि वह उन घटनाओं पर बराबर परामर्श भी देते थे। महर्षि वेदव्यास ने समस्त विवरणों के साथ महाभारत ग्रन्थ की रचना कुछ इस तरह की थी कि यह एक महान इतिहास बन गया। हिन्दू धर्म में मान्यता है कि महाभारत में उल्लखित घटनाएं सत्य और प्रमाणिक वृत्तांत है। भगवान शिव और देवी पार्वती के पुत्र भगवान गणेश ने वेदव्यास के मुख से निकली वाणी और वैदिक ज्ञान को लिपिबद्ध करने का काम किया था। आम जनों को समझने में आसानी हो, इसलिए मर्हिष व्यास ने अपने वैदिक ज्ञानन को चार हिस्सों में विभाजित कर दिया। वेदों को आसान बनाने के लिए समय-समय पर इसमें संशोधन किए जाते रहे हैं। कहा जाता है कि वेदव्यास ने इसे 28 बार संशोधित किया था। महर्षि व्यास का जन्म त्रेता युग के अन्त में हुआ था। वह पूरे द्वापर युग तक जीवित रहे। कहा जाता है कि महर्षि व्यास ने कलियुग के शुरू होने पर यहां से प्रयाण किया। महर्षि व्यास को भगवान विष्णु का 18वां अवतार माना जाता है। महर्षि राम विष्णु के 17वें अवतार थे। बलराम और कृष्ण 19वें और 20वें। इसके बारे में श्रीमद् भागवत में विस्तार से लिखा गया है, जिसकी रचना मुनि व्यास ने द्वापर युग के अन्त में किया था। श्रीमद् भागवतम की रचना महाभारत की रचना के बाद की गई थी। महर्षि व्यास का जन्म नेपाल में स्थित तानहु जिले के दमौली में हुआ था। महर्षि व्यास ने जिस गुफा में बैठक महाभारत की रचना की थी, वह नेपाल में अब भी मौजूद है। इस मानचित्र के माध्यम से आप नेपाल में तानहू के बारे में जान सकते हैं। महर्षि वेदव्यास के पिता ऋषि पराशर थे। उनकी माता का नाम सत्यवती था। पराशर यायावर ऋषि थे। एक नदी को पार करने के दौरान उन्हें नाव खेने वाली सुन्दर कन्या सत्यवती से प्रेम हो गया। बाद में सत्यवती ने ऋषि व्यास को जन्म दिया। व्यास पितमाह भीष्म के सौतेले भाई थे। बाद में सत्यवती ने हस्तिनापुर के राजा शान्तनु से विवाह कर लिया। शान्तनु भीष्म के पिता थे। इस विवाह के लिए सत्यवती के पिता ने राजा शान्तनु के समक्ष यह शर्त रखी थी कि सत्यवती के गर्भ से जन्म लेने वाला बालक ही हस्तिनापुर का उत्तराधिकारी होगा। हालांकि इससे पहले ही शान्तनु ने अपने पुत्र देवव्रत को हस्तिनापुर का युवराज घोषित कर दिया था। इसी प्रतिज्ञा की वजह से उनका नाम भीष्म पड़ा। बाद में उनके पिता शान्तनु ने उन्हें ईच्छा-मृत्यु का वरदान दिया। वेदव्यास धृतराष्ट्र, पांडु और विदुर के जैवीय या आध्यात्मिक पिता थे। वेदव्यास के जन्मदिन के अवसर पर गुरू पुर्णिमा का पर्व मनाया जाता है। व्यासजी के बारे में कहा जाता है कि द्वापर युग के दौरान उन्होंने पुराण, उपनिषद, महाभारत सहित वैदिक ज्ञान के तमाम ग्रन्थों की रचना की थी। कलियुग के शुरू होने के बाद वेदव्यास के बारे में कोई ठोस जानकारी या दस्तावेज उपलब्ध नहीं हैं। माना जाता है कि वह तप और ध्यान के लिए पर्वत श्रृंखलाओं में लौट गए थे। दो बौद्ध जातक कथाओं ‘कान्हा दीपायना’ और ‘घाटा’ में मर्हिष वेदव्यास का जिक्र किया गया है। प्रथम जातक कथा में उन्हें बोधिसत्व कहा गया है। हालांकि इसमें उनके वैदिक ज्ञान की चर्चा नहीं की गई है। दूसरी जातक कथा में उन्हें महाभारत का रचयिता और इससे जुड़ा हुआ व्यक्ति बताया गया है। अपनी मां के कहने पर वेद व्यास ने विचित्रवीर्य की रानियों के साथ नियोग किया, जिसके बाद पांडु और धृतराष्ट्र का जन्म हुआ। तीन पुत्र: वेद व्यास ने विचित्रवीर्य की रानियों, अंबिका और अंबालिका के अलावा एक दासी के साथ भी नियोग की प्रथा का पालन किया, जिसके बाद विदुर का जन्म हुआ। तीनों पुत्रों में से विदुर वेद-वेदान्त में पारंगत और नीतिवान पुत्र थे। वेद व्यास का नाम: द्वैपायन द्वीप पर जाकर तपस्या करने और काले रंग की वजह से उन्हें कृष्ण द्वैपायन नाम दिया गया, जो आगे चल कर वेदों का भाष्य करने के कारण वेद व्यास के नाम से प्रसिद्ध हुए।महर्षि वेदव्यास ने समस्त विवरणों के साथ महाभारत ग्रन्थ की रचना कुछ इस तरह की थी कि यह एक महान इतिहास बन गया।हिन्दू धर्म में मान्यता है कि महाभारत में उल्लखित घटनाएं सत्य और प्रमाणिक वृत्तांत है। भगवान शिव और देवी पार्वती के पुत्र भगवान गणेश ने वेदव्यास के मुख से निकली वाणी और वैदिक ज्ञान को लिपिबद्ध करने का काम किया था। भारत के बहुत से संप्रदाय तो केवल गुरुवाणी के आधार पर ही कायम हैं। भारतीय संस्कृति के वाहक शास्त्रों में गु का अर्थ बताया गया है- अंधकार या मूल अज्ञान और रुका का अर्थ किया गया है- उसका निरोधक। आज गुरु पूर्णिमा के अवसर पर जो वेद व्यास जी के जन्म दिवस के रूप में भी मनाया जाता है। गुरु तत्व की प्रशंसा तो सभी शास्त्रों ने की है।

Published / 2021-07-21 14:40:12
क्या कोरोना से लड़ने की कोई सही नीति ही नहीं है...

एबीएन डेस्क। कोविड-19 महामारी ने दुनिया की अर्थव्यवस्था को भी लगभग तबाह ही कर दिया है। यह सही है कि अब दुनिया भर में टीकाकरण शुरू हो चुका है लेकिन संकट है कि समाप्त होने का नाम ही नहीं ले रहा है। निश्चित तौर पर कोरोना वायरस के बदले हुए स्वरूप की यह लहर और कहीं अधिक खतरनाक हो सकती है। अलग-अलग देशों ने इस चुनौती से निपटने के लिए अलग-अलग रणनीति अपनाई है। ऐसे में यह देखना उचित होगा कि वे कौन से देश हैं जो महामारी से बेहतर तरीके से निपटने मेंं कामयाब रहे, कहां मौत के आंकड़े कम रखने में सफलता मिली, बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं मुहैया कराई गईं और आर्थिक नुकसान कम करने में कामयाबी हाथ लगी? विश्व स्वास्थ्य संगठन की ओर से इसे महामारी करार देने के एक वर्ष बाद हम इसका उदाहरण हैं। यह केवल अकादमिक बहस नहीं है: नीति निमार्ताओं को मौजूदा हालात से निपटना होगा और उन्हें सन 2020 की सफलताओं और विफलताओं से सबक लेने की आवश्यकता है। अपेक्षाकृत कम मौतों और बेहतर आर्थिक स्थिरता के साथ जर्मनी, न्यूजीलैंड, जापान, वियतनाम, ताइवान और दक्षिण कोरिया सन 2020 से अपेक्षाकृत बेहतर तरीके से निपटने में कामयाब रहे। जबकि अमेरिका, ब्राजील, इटली, ब्रिटेन और रूस में मौत के आंकड़े भी अधिक रहे और आर्थिक संकट भी अन्य देशों की तुलना में अधिक रहा। मौत के मामलों में भारत का प्रदर्शन बहुत खराब नहीं कहा जा सकता है। परंतु आर्थिक नुकसान के मामले में हम सबसे खराब प्रदर्शन वाले देशोंं में शुमार हैं। चीन में मौत तथा संक्रमितों के आंकड़ों के बारे में जान पाना कठिन है लेकिन वह अपने यहां आर्थिक गतिविधियों को ठीक रख पाने मेंकामयाब रहा है। पेंसिल्वेनिया विश्वविद्यालय के व्हार्टन स्कूल के समाजशास्त्री माउरो गुइलेन ने एक पर्चा लिखा है, द पॉलिटिक्स आॅफ पैनडेमिक्स: डेमोक्रेसी, स्टेट कैपिसिटी ऐंड इकनॉमिक इनेक्विलिटी। इसमें 146 देशों में सन 1990 के बाद से संक्रामक रोगों और उनके प्रबंधन पर नजर डाली गई है। उन्होंने इन विषयों पर तीन अध्ययन किए। पहले में सन 1990 और 2019 के बीच संक्रामक रोगों की आवृत्ति और इनके घातक होने का अध्ययन किया गया है। दूसरे में कोविड-19 के दौरान सरकारों की ओर से लगाए गए लॉकडाउन की गति और उसकी गंभीरता का अध्ययन है। तीसरा अध्ययन शारीरिक दूरी के मानकों के अनुपालन पर आधारित है। गुइलेन कहते हैं, लोकतांत्रिक देशों में, गहरी पारदर्शिता, जवाबदेही और जनता के विश्वास ने ऐसे रोगों की आवृत्ति और उनके घातक असर को सीमित किया है, इन्हें लेकर दी जाने वाली प्रतिक्रिया मेंं समय कम लगा है और सार्वजनिक स्वास्थ्य से जुड़े उपायों को लेकर लोगों में अनुपालन की प्रवृत्ति बढ़ी है। खेद की बात यह है कि सालाना वैश्विक लोकतांत्रिक सूचकांक यह संकेत दे रहा है कि लोकतंत्र के स्तर मेंं गिरावट आ रही है। इससे अविश्वास का माहौल उत्पन्न हुआ है। इसका अर्थ यह है कि लोग शारीरिक दूरी का पालन करने, मास्क पहनने और टीका लगवाने से इनकार कर रहे हैं। एक अधिक दिलचस्प नतीजा यह है कि सरकार के स्वरूपों से ज्यादा आर्थिक असमानता ने ऐसी बीमारियों के प्रभाव को बढ़ाया है और क्वारंटीन, शारीरिक दूरी आदि के व्यापक अनुपालन पर भी असर डाला है। कम आय वाले लोगों के लिए काम करना मजबूरी है। उन्हें मामूली लक्षणों की अनदेखी करना और जांच से बचना आसान लगता है क्योंकि वे काम नहीं छोड़ सकते। इतना ही नहीं कम आय का संबंध कमजोर पोषण, स्वास्थ्य सेवाओं तक अपर्याप्त पहुंच और भीड़भाड़ वाले इलाकों में बिना साफ सफाई के रहने से भी है। मजबूत सरकारी क्षमता और अच्छी नीति हमें खराब नतीजों से बचा सकती है और आय की असमानता में इजाफा भी रोक सकती है। गुइलेन का मानना है कि लोकतांत्रिक और अधिनायकवादी दोनों तरह के शासन जरूरी संसाधन और क्षमता के साथ-साथ आवश्यक संगठनात्मक ढांचा तैयार कर सकते हैं। कुछ भी हो, लोकतांत्रिक व्यवस्था हो अथवा नहीं लेकिन अगर असमानता अधिक हो तो परिणाम भी बुरे होते हैं। यह दलील मजबूत नजर आती है। अमेरिका, भारत और ब्राजील तीनों में असमानता का स्तर बहुत अधिक है। भारत के मामले में दुखद बात यह है कि लॉकडाउन के कारण आय का अंतर काफी बढ़ गया क्योंकि लाखों लोगों को रोजगार गंवाना पड़ा। अमेरिका इस मामले में खुशकिस्मत है क्योंकि वहां सत्ता परिवर्तन हो गया। इससे वहां अधिक बेहतर नीति लागू हुई। अमेरिका में राष्ट्रपति जो बाइडन के नेतृत्व वाले नए सत्ता प्रतिष्ठान ने एक प्रभावशाली टीकाकरण कार्यक्रम की शुरूआत की और प्रोत्साहन के चेकों के माध्यम से राहत में इजाफा किया। भारत में इस बात के प्रमाण हैं कि केंद्र सरकार ने टीकाकरण की प्रक्रिया को भी सहज तरीके से नहीं शुरू किया। अब राज्यों में टीकों की कमी हो गई है और केंद्र, राज्यों पर दोषारोपण कर रहा है। विभिन्न चरणों में चुनाव के आयोजन और असमय कुंभ मेले के लिए भी राजनीतिक कारण ही जिम्मेदार हैं। इसमें कोई दो राय नहीं कि इनके कारण संक्रमण में बेतहाशा वृद्धि होना तय है। आर्थिक मोर्चे पर मांग में जो भी सुधार हुआ है वह ईंधन पर भारी भरकम कर और सख्त वस्तु एवं सेवा कर व्यवस्था के बावजूद हुआ है। सन 2020 में लगाए गए लॉकडाउन ने आर्थिक गतिविधियों को बुरी तरह प्रभावित किया था और अगर दोबारा लॉकडाउन लगता है कि निम्र आय वर्ग वाले लोग मजबूर हो जाएंगे कि वे या तो भूखों मरें या फिर कानून तोड़ें और संक्रमण का खतरा बढ़ाएं। यह देखा जाना है कि क्या यह सरकार टीकाकरण में सुधार कर एक बेहतर प्रोत्साहन योजना पेश कर पाती है या नहीं।

Published / 2021-07-08 13:28:29
महंगाई दिखा रहा लोगों का वजूद

एबीएन डेस्क, रांची। सरकार से अधिक खर्च करने की मांग करने वाले सभी लोगों से सवाल है कि सियासत की सबसे बड़ी दुश्मन मुद्रास्फीति से उस समय बचा जा सकता है जब लगभग सारे मौजूदा प्रयास विनिर्माण उत्पादों की खपत की मांग फिर से पैदा करने से अधिक वजूद बनाए रखने पर ही टिके हुए हैं? यह ध्यान रखना चाहिए कि सरकार करीब 80 करोड़ लोगों को मुफ्त अनाज दे रही है। पिछले साल से ही इसने कई महीनों तक 8 करोड़ परिवारों को मुफ्त रसोई गैस मुहैया कराने के अलावा 40 करोड़ से अधिक लोगों के खातों में सीधे नकदी भी भिजवाई है। यह सब सिर्फ वजूद बचाने के लिए है। इसी के साथ सरकार अपनी गारंटी पर बिना किसी दस्तावेज के सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम इकाइयों (एमएसएमई) को कर्ज दिलाकर उनके पास पैसे भी भिजवा रही है। इस तरह करीब 2.5 लाख करोड़ रुपये या तो स्वीकृत किए जा चुके हैं या वितरित हो चुके हैं। वह भी वजूद बचाना ही है। इसमें से किसी का भी इस्तेमाल वृद्धि के लिए निवेश में नहीं हो रहा है, छोटी कंपनियां सिर्फ अपना वजूद बचाए रखने के लिए इस राशि का इस्तेमाल कर रही हैं। कुल मिलाकर, वित्तीय वर्ष 2020-21 में सरकार ने सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) की करीब 1.5 फीसदी रकम खर्च की। समस्या यह है कि इससे कीमतें बढ़ रही हैं और यह रकम बढ़ती ही जाएगी। इसे एक और तरीके से देखते हैं। क्या औद्योगिक मांग बहाल करने के कीन्सवादी समाधान कारगर हो सकते हैं जब समस्या भी कीन्सवादी नहीं है? याद रखें कि औद्योगिक उत्पाद खरीदने वाले लोगों पर ज्यादा मार नहीं पड़ी है क्योंकि दिहाड़ी मजदूरी पर जीवन जीने वाले लोगों की आमदनी में भारी गिरावट आई है। सच है कि औपचारिक क्षेत्र में भी करीब 20 लाख लोगों को आय में बड़ी गिरावट का सामना करना पड़ा है लेकिन दिहाड़ी मजदूरी पर ही जीवन बिताने वाले करीब 20 करोड़ लोगों की तुलना में उनकी समस्या नगण्य है। आखिर, दिहाड़ी पर जिंदगी गुजारने वाले इन लोगों की आय शून्य के करीब हो गई है। किसी भी सत्तारूढ़ दल के लिए इस श्रेणी के लोग राजनीतिक समस्या का सबब बन सकते हैं। आर्थिक समस्या तो उसके बाद आती है। लेकिन यह मान लें कि सत्तारूढ़ दल अभी अपने वोट को लेकर फिक्रमंद नहीं है। आखिर अगले तीन वर्षों तक उसे किसी के मत की जरूरत भी नहीं है। इस दौरान सरकार को निशाना किस पर लगाना चाहिए? औपचारिक क्षेत्र के कर्मचारी या अनौपचारिक क्षेत्र के कर्मचारी या फिर खर्च करने लायक होने पर दोनों का ही ध्यान रखे? इस सवाल का जवाब इसलिए अहम है कि यह राजकोषीय एवं मौद्रिक नीति दोनों से ही सीधे तौर पर जुड़ा हुआ है। दुखद है कि इसकी राजनीति एवं अर्थशास्त्र के बीच कोई सही संतुलन है ही नहीं। निर्वहन योग्य गतिविधियों को दी गई वित्तीय मदद से हुए भारी घाटे का नतीजा निश्चित तौर पर खाद्य उत्पादों की महंगाई के रूप में सामने आएगा- उपभोक्ता मूल्य सूचकांक में भोजन का भारांक 54 है। जबकि औद्योगिक उत्पादों की खपत के लिए वित्त मुहैया कराने से हुए घाटे का ब्याज दर के जरिये मौद्रिक नीति पर असर पड़ेगा।यह मान पाना मुश्किल है कि पश्चिमी अर्थव्यवस्थाओं की तरह भारत सरकार से भी कदम उठाने की मांग करने वाले लोग असल में नोट छापने की बात कर रहे हैं, मानो कल आएगा ही नहीं। अमेरिका अपनी मुद्रास्फीति दूसरे देशों को निर्यात कर देता है और वह जल्द ही सेहतमंद हो जाएगा। लेकिन पश्चिमी यूरोप के देशों का क्या? वे चीन के संरक्षित देश भी बन सकते हैं। उसके अलावा हमारी सरकार भले ही न कहे लेकिन असल में वह नोट छाप रही है। सच यह है कि भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) की तरफ से केंद्र को करीब एक लाख करोड़ रुपये का अधिशेष दिया गया है। सरकार ने बिना किसी उधारी के ही उधारी जुटा ली है और अपनी मुद्रा आपूर्ति बढ़ा ली है। लिहाजा सरकार एवं आरबीआई को इसकी वजह से पैदा हुई मुद्रास्फीति से निपटना होगा। मुख्य रूप से खाद्य उत्पादों के महंगा होने से आबादी का बड़ा हिस्सा प्रभावित हो रहा है। दरअसल यह आरबीआई के समक्ष उत्पन्न कोई आर्थिक समस्या ही नहीं है बल्कि यह सरकार के लिए एक राजनीतिक समस्या भी है। आरबीआई के पास ब्याज दरें बढ़ाने का काफी हद तक स्पष्ट जवाब मौजूद है लेकिन सरकार उतनी खुशकिस्मत नहीं है। उसे अगले दो महीनों में 16 विधानसभा चुनावों का सामना करना है। इनमें से सात राज्यों में चुनाव 2022 में होने हैं जबकि नौ राज्यों के चुनाव 2023 में होंगे। फिर 2024 में लोकसभा चुनाव होने ही हैं। लिहाजा एनआरआई अर्थशास्त्रियों के शोर मचाने के बावजूद राजकोषीय समझदारी का प्रदर्शन दूर की कौड़ी ही लग रही है। सरकार को निर्वाह-व्यय बरकरार रखने के साथ ही मुद्रास्फीति को और बढ़ाए बगैर बड़े पैमाने पर रोजगार अवसर पैदा करने हैं। यह मुद्रास्फीति एवं वृद्धि का क्लासिक दुविधा है लेकिन इस बार निर्वाह-व्यय के रूप में बढ़ी अप्रत्याशित राशि भी शामिल है। और किसी शख्स की दाढ़ी की तरह यह खर्च हमेशा बढ़ता ही रहता है क्योंकि ज्यादा लोगों को मदद की दरकार होती है। इस वजह से राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) सरकार का कलहंस कुछ उसी तरह पक चुका है जैसा 2012 एवं 2013 में संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (संप्रग) सरकार के समय था। वर्ष 2010 एवं 2014 के बीच खाद्य मुद्रास्फीति 65 फीसदी थी और राजकोषीय घाटा औसतन 6 फीसदी था। यही कारण है कि 2014 में नरेंद्र मोदी की भरोसेमंद वक्तृत्व क्षमता के बगैर भी विपक्ष जीत गया होता। राजग इस समय खुद को उसी स्थिति में पा रहा है।

Published / 2021-07-07 14:12:03
साझा संस्कृति की बात को सही चश्मे से देखें

एबीएन डेस्क, रांची। बेहद दुखद है कि दुनिया के सबसे बड़े गैर राजनैतिक संगठन के प्रमुख मोहन भागवत जब हिंदू-मुस्लिम एकता पर जोर दे रहे हैं, तब कुछ नेता इसके लिए अतिरिक्त कोशिश कर रहे हैं कि हमारा समाज एकजुटता-सद्भावना की ऐसी बातों पर ध्यान न दे। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ प्रमुख मोहन भागवत ने संघ से जुड़े पूर्वाग्रहों को दूर करते हुए कहा है कि संघ भले हिन्दुओं का संगठन है, लेकिन वह दूसरे धर्म वालों से नफरत नहीं करता। सभी भारतीयों का डीएनए एक है, के कथन को लेकर विभिन्न राजनीतिक दलों के आपत्ति एवं असहमति के स्वर राष्ट्रीय एकता की बड़ी बाधा है। अनेकता में एकता भारतीय संस्कृति का आदर्श रहा है। यहां अनेक धर्म, संप्रदाय, जाति, वर्ण, प्रांत एवं राजनैतिक पार्टियां हैं, भिन्नता और अनेकता होने मात्र से सांस्कृतिक एवं राष्ट्रीय एकता को विघटित नहीं किया जा सकता। निश्चित ही मेवाड़ विश्वविद्यालय में दिया गया मोहन भागवत का उद्बोधन देश की एकता को बल देने का माध्यम बनेगा, देश के सांस्कृतिक एवं राष्ट्रीय परिवेश को एक नया मोड़ देगा। यह एक दिशासूचक बना है, गिरजे पर लगा दिशा-सूचक नहीं, यह तो जिधर की हवा होती है उधर ही घूम जाता है। यह कुतुबनुमा है, जो हर स्थिति में सही दिशा एवं दृष्टि को उजागर करता रहेगा। विभिन्न जाति, धर्म, भाषा, वर्ग के लोगों का एक साथ रहना भारतीय लोकतंत्र का सौन्दर्य है, राजनीतिक स्वार्थों के चलते इस सौन्दर्य को नुकसान पहुंचाना राष्ट्रीय एकता को खंडित करता है। भिन्नताओं का लोप कर सबको एक कर देना असंभव है। ऐसी एकता में विकास के द्वार भी अवरुद्ध हो जाते हैं। लेकिन अनेकता भी वही कीमती है, जो हमारी मौलिक एवं राष्ट्रीय एकता को किसी प्रकार का खतरा पैदा न करे। जैसे एक वृक्ष की अनेक शाखाओं की भांति एक राष्ट्र के अनेक प्रांत हो सकते हैं, उसमें अनेक जाति एवं धर्म के लोग रह सकते हैं, पर उनका विकास राष्ट्रीयता की जड़ से जुड़कर रहने में है, जब भेद में अभेद को मूल्य देने की बात व्यावहारिक बनेगी, उसी दिन राष्ट्रीय एकता की सम्यक् परिणति होगी और उसी दिन भारत अखंड बनेगा। मोहन भागवत ने कहा कि अगर कोई हिंदू कहता है कि यहां कोई मुसलमान नहीं रहना चाहिए, तो वह व्यक्ति हिंदू नहीं है। गाय एक पवित्र जानवर है लेकिन जो लोग दूसरों को मार रहे हैं वे हिंदुत्व के खिलाफ जा रहे हैं। कानून को बिना किसी पक्षपात के उनके खिलाफ कार्रवाई करनी चाहिए। हिंदू-मुस्लिम एकता शब्द ही भ्रामक है। हिंदू-मुस्लिम अलग हैं ही नहीं, हमेशा से एक हैं। जब लोग दोनों को अलग मानते हैं तभी संकट खड़ा होता है। हमारी श्रद्धा आकार और निराकार दोनों में समान है। हम मातृभूमि से प्रेम करते हैं क्योंकि ये यहां रहने वाले हर एक व्यक्ति को पालती आई है और पाल रही है। जनसंख्या के लिहाज से भविष्य में खतरा है, उसे ठीक करना पड़ेगा। भारत को यदि विश्वगुरु बनाना है तो अल्पसंख्यक-बहुसंख्यक की शब्दों की लड़ाई में नहीं पड़ना होगा। अल्पसंख्यकों के मन में यह बिठाया गया है कि हिंदू उनको खा जाएंगे। अब समय आ गया है कि मुस्लिम समाज आंखों से पट्टी हटाए और सबको गले लगाए। कट्टरता को छोड़कर आपसी भाई-चारे की राह अपनाए। यही एक आदर्श स्थिति की स्थापना है और इसी के प्रयास में संघ जुटा है। संघ सिर्फ राष्ट्रवाद के लिए काम करता है। राजनीति स्वयंसेवकों का काम नहीं है। संघ जोड़ने का काम करता है, जबकि राजनीति तोड़ने का हथियार बन जाती है। राजनीति की वजह से ही हिंदू-मुस्लिम एक नहीं हो सके हैं। बेहद दुखद है कि दुनिया के सबसे बड़े गैर राजनैतिक संगठन के प्रमुख मोहन भागवत जब हिंदू-मुस्लिम एकता पर जोर दे रहे हैं, तब कुछ नेता इसके लिए अतिरिक्त कोशिश कर रहे हैं कि हमारा समाज एकजुटता-सद्भावना की ऐसी बातों पर ध्यान न दे। इस कोशिश से यही प्रकट हुआ कि कुछ लोगों की दिलचस्पी इसमें है कि हिंदू-मुस्लिम के बीच की दूरी खत्म न हो। इस संदर्भ में संघ प्रमुख ने यह सही कहा कि हिंदू-मुस्लिम एकता की बातें इस अर्थ में भ्रामक हैं, क्योंकि वे तो पहले से ही एकजुट हैं और उन्हें अलग-अलग देखना सही नहीं। कायदे से इसका स्वागत करते हुए अपने-अपने स्तर पर ऐसी कोशिश की जानी चाहिए कि भारतीय समाज एकजुट हो और उसके बीच जो भी वैमनस्य है, जो भी दूरियां हैं, वह खत्म हो। नि:संदेह कुछ लोग ऐसा नहीं होने देना चाहते और इसीलिए किसी ने संघ की कथनी-करनी में अंतर का उल्लेख किया तो किसी ने भीड़ की हिंसा का जिक्र। विडंबनापूर्ण है कि अपने देश में इस तरह की सीधी-सच्ची एवं आदर्श की बात पर भी सस्ती राजनीति की जा रही है, इसका उदाहरण है भागवत के इस प्रेरक एवं क्रांतिकारी उद्बोधन पर आपत्ति और असहमति भरी प्रतिक्रिया का होना। मायावती और असदुद्दीन ओवैसी से लेकर दिग्विजय सिंह ने जैसी प्रतिक्रिया दी, उससे विरोध के लिए विरोध वाली मानसिकता का ही परिचय मिला। इनमें से किसी ने भी यह समझने की कोशिश नहीं की कि मोहन भागवत अपने इस कथन के जरिये सभी देशवासियों में एकता, साम्प्रदायिक सौहार्द एवं भाईचारे की भावना का संचार करने के साथ यह रेखांकित करना चाह रहे थे कि भारत के लोगों में जाति, मजहब, पूजा-पद्धति की कितनी भी भिन्नता हो, उन्हें यह स्मरण रखना चाहिए कि वे सब इस देश की संतान हैं और सबके पूर्वज एक हैं। इस विचार में ऐसा कुछ भी नहीं कि उस पर आपत्ति जताई जाए। बावजूद इसके किसी-न-किसी बहाने आपत्ति जताई गई और विमर्श को खास दिशा में मोड़ने की कोशिश की गई। इसका मकसद लोगों को गुमराह करना और अपने वोट बैंक को साधने के अलावा और कुछ नहीं नजर आता। ऐसा लगता है कतिपय राजनीतिक दलों की राजनीति एवं उनकी सोच विकृत हैं, उनका व्यवहार झूठा है, चेहरों पर ज्यादा नकाबें ओढ़ रखे हैं, उन्होंने सभी आदर्शों एवं मूल्यों को धराशायी कर दिया है। देश के करोड़ों लोग देश के भविष्य को लेकर चिन्तित हैं। वक्त आ गया है कि देश की साझा संस्कृति, गौरवशाली विरासत को सुरक्षित रखने के लिये भागवत जैसे शिखर व्यक्तियों को भागीरथ प्रयास करने होंगे, दिशाशून्य हुए नेतृत्व के सामने नया मापदण्ड रखना होगा।

Published / 2021-07-05 14:29:07
देश के आर्थिक विकास पर भारी आरक्षण

एबीएन डेस्क। आजादी के बाद भारतीय संविधान के अनुच्छेद 15(4) के तहत सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े तबकों के लिए आरक्षण की व्यवस्था की गई है। आरंभ में आरक्षण की व्यवस्था 10 वर्ष के लिए होनी थी लेकिन हर 10 वर्ष के बाद उसे आगे बढ़ाने का सिलसिला चलता रहा। फिलहाल अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति तथा अन्य पिछड़ा वर्ग को सरकारी रोजगार, सरकारी कंपनियों और शैक्षणिक संस्थानों में नौकरी तथा सीटों के मामले में 49.5 फीसदी आरक्षण प्राप्त है। जनवरी 2019 में यानी अप्रैल-मई 2019 के लोकसभा चुनाव से कुछ महीने पहले संसद ने आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के लिए 10 फीसदी अतिरिक्त आरक्षण को मंजूरी दे दी। इसके अलावा राज्य विधानसभाओं और लोकसभा में भी अनुसूचित जाति एवं जनजाति के लिए सीटें आरक्षित हैं। यह संभव है कि आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के लिए घोषित 10 फीसदी का आरक्षण शायद कुल आरक्षण को बढ़ाकर 59.5 फीसदी नहीं करे क्योंकि आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग और अनुसूचित जाति-जनजाति एवं अन्य पिछड़ा वर्ग का आरक्षण उसका अतिव्यापन कर सकता है। बहरहाल यदि आर्थिक रूप से पिछड़े वर्ग के लिए आरक्षण लागू होता है तो संभव है कि वह सन 1993 में सर्वोच्च न्यायालय के नौ न्यायाधीशों वाले पीठ के उस निर्णय का उल्लंघन कर दे जिसमें उन्होंने सभी प्रकार के आरक्षण के लिए कुल मिलाकर 50 फीसदी की सीमा तय की थी। फिलहाल 10 फीसदी अतिरिक्त आरक्षण के खिलाफ कई याचिकाएं लंबित हैं। आर्थिक आधार पर 10 फीसदी आरक्षण के पहले भी तमिलनाडु विधानसभा ने कुल मिलाकर 69 फीसदी आरक्षण को मंजूरी दे दी थी। अप्रैल 2021 में होने वाले विधानसभा चुनाव के पहले तमिलनाडु की द्रविड़ मुन्नेत्र कषगम (द्रमुक) ने राज्य के निवासियों के लिए 75 फीसदी आरक्षण का वादा किया है। मध्य प्रदेश, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, गुजरात, महाराष्ट्र और हरियाणा पहले ही रोजगार में स्थानीय लोगों के आरक्षण की नीतियां बना चुके हैं। देश भर में कई याचिकाएं दायर कर 50 फीसदी के ऊपर के आरक्षण को समाप्त करने की मांग की गई है। खासतौर पर 8 फरवरी को खबर आई कि सर्वोच्च न्यायालय एक ऐसी याचिका पर सुनवाई के लिए तैयार हो गया है जो तमिलनाडु में 50 फीसदी से अधिक आरक्षण को चुनौती देती है। परिणामस्वरूप अब तक राज्यों में मौजूदा आरक्षण के अतिरिक्त स्थानीय लोगों के लिए आरक्षण के क्रियान्वयन का कानूनी दर्जा अस्पष्ट है। ऐसे आरक्षण के स्तर के पक्ष में दलील यह है कि देश में अभी भी सामाजिक और शैक्षणिक दृष्टि से वंचितों की तादाद बहुत अधिक है। शैक्षणिक संस्थानों में आरक्षण का पारदर्शी और निष्पक्ष क्रियान्वयन जटिल है जिसके चलते कई कानूनी विवाद पैदा हुए। यदि आरक्षण कोटा विश्वविद्यालय स्तर पर होता है तो व्यक्तिगत विभागों में यह 50 फीसदी का स्तर पार कर सकता है। एक अन्य मुद्दा यह है कि किसे क्रीमी लेयर का हिस्सा होने के कारण अन्य पिछड़ा वर्ग के आरक्षण के लायक नहीं माना जाए। फिलहाल क्रीमी लेयर में वे लोग आते हैं जिनकी सालाना पारिवारिक आय 8 लाख रुपये से अधिक है। गैर पिछड़ा वर्ग के लोगों को लगता है कि यदि पिछड़ा वर्ग के लोग स्वरोजगार में हैं तो उनकी आय का आकलन आसान नहीं है। उत्तर प्रदेश और बिहार के प्रवासी श्रमिक दशकों से मुंबई, दिल्ली या बेंगलूरु में किराये के मकानों में रहते हैं। उनके लिए खुद को वहां का निवासी साबित करना मुश्किल है। परिणामस्वरूप राज्यस्तरीय आरक्षण भारतीय श्रम बाजार को आर्थिक रूप से अक्षम बना सकता है। खबरों के मुताबिक सर्वोच्च न्यायालय को 15 मार्च, 2021 से 50 फीसदी सीमा के मामले पर सुनवाई करनी थी। शीर्ष न्यायालय को स्पष्ट करना चाहिए कि देश में आरक्षण के अलग-अलग स्तर नहीं हो सकते और अलग-अलग राज्य ऐसे कानून नहीं बना सकते कि रोजगार वहां के निवासियों के लिए आरक्षित होंगे। समाचार पत्रों में 19 मार्च, 2021 को प्रकाशित खबरों के मुताबिक महाराष्ट्र में राज्य के विशिष्ट आरक्षण से संबंधित याचिका पर सुनवाई करते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने चुटीले अंदाज में यह तक पूछ डाला कि क्या आजादी के बाद से कोई सामाजिक-आर्थिक प्रगति हासिल नहीं हुई? यह बात शायद सबसे जानकार भारतीयों पर भी लागू होती है। केंद्र सरकार को संसद में श्वेत पत्र पेश करना चाहिए ताकि आरक्षण के क्रियान्वयन को लेकर स्पष्टता आ सके। हालांकि ऐसा होने की संभावना बहुत कम है क्योंकि आरक्षण मतदाताओं और ज्यादातर राजनीतिक दलों के लिए बहुत संवेदनशील मसला है। आरक्षण में इजाफे के खिलाफ या मौजूदा स्तर का आरक्षण जारी रखने के विरोध में कुछ कहा जाए तो यह भावनात्मक दलील दी जाती है कि अनुसूचित जाति-जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग के साथ हजारों साल के भेदभाव को कुछ दशकों में पूरा नहीं किया जा सकता। हालिया अतीत का एक उदाहरण है करीब दो सौ वर्ष के ब्रिटिश शासन के कारण भारतीय उपमहाद्वीप की गरीबी। लब्बोलुआब यह कि अतिरिक्त आरक्षण शासन मानकों को शिथिल करेगा तथा केंद्र, राज्यों और नगर निकाय स्तर के प्रदर्शन पर असर पड़ेगा। शैक्षणिक संस्थान भी अप्रभावित नहीं रह सकेंगे। मिसाल के तौर पर नैशनल एसोसिएशन आॅफ सॉफ्टवेयर ऐंड सर्विस कंपनीज ने संकेत दिया है कि उससे संबद्ध कंपनियों में से 80 प्रतिशत को लगता है कि हरियाणा के नागरिकों की पक्षधर आरक्षण नीतियां उनके कारोबार और भविष्य की निवेश योजनाओं को प्रभावित करेंगी। देश की राष्ट्रीय और राज्य सरकारें न केवल आरक्षण की मदद करती हैं बल्कि अतिरिक्त आरक्षण की मांग को प्रोत्साहन देती हैं। देश में हर प्रकार के आरक्षण को खत्म करने की जरूरत है और इस दौरान उन लोगों को उचित वित्तीय सहायता मुहैया कराई जानी चाहिए जो सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े हुए हैं।

Published / 2021-07-02 14:55:42
देश के रक्षा क्षेत्र में निजी निवेश की संभावना

एबीएन डेस्क। कोविड-19 के कारण गत छह माह के दौरान रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह और रक्षा मंत्रालय के चुनिंदा अधिकारी उद्योग जगत के लोगों से वर्चुअल कॉन्फ्रेंस के जरिये ही रूबरू हुए हैं। अधिकारियों ने 2014 के बाद किए गए रक्षा नीति सुधारों के बारे में बात की। उनका कहना है कि ये सुधार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के आत्मनिर्भर भारत के नारे के अनुरूप रक्षा उत्पादन को बढ़ावा देने वाले हैं। अधिकारी रक्षा क्षेत्र की 101 वस्तुओं की नकारात्मक आयात सूची, नई रक्षा अधिग्रहण नीति 2020 (डीएपी 2020) का जिक्र करते हुए स्वदेशीकरण पर जोर देते हैं। वे कहते हैं कि नई रक्षा उत्पादन एवं निर्यात संवर्द्धन नीति (डीपीईपीपी 2020) की मदद से सालाना रक्षा उत्पादन को बढ़ाकर 26 अरब डॉलर पहुंचाया जाएगा और हर वर्ष 5 अरब डॉलर के हथियार निर्यात किए जाएंगे। तमिलनाडु और उत्तर प्रदेश में दो रक्षा उद्योग कॉरिडोर दो स्थापित किए जाएंगे। वे देश के रक्षा उद्योग में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) के उदारीकरण का भी जिक्र करते हैं। गत 17 सितंबर को उद्योग संवर्द्धन एवं आंतरिक व्यापार विभाग ने रक्षा क्षेत्र में एफडीआई की सीमा को उन कंपनियों के लिए 49 फीसदी से बढ़ाकर 74 फीसदी (स्वचालित रास्ते के जरिये) कर दिया जो नए लाइसेंस चाहती हैं। महज 13 दिन बाद 30 सितंबर को रक्षा मंत्रालय ने नई रक्षा खरीद नीति 2020 (डीएपी 2020) जारी कर दी जिसमें संशोधित एफडीआई सीमा का जिक्र नहीं था। नई नीति में कहा गया कि किसी कंपनी को भारतीय नागरिक के स्वामित्व वाला माना जाएगा जब उसमें 50 फीसदी से अधिक हिस्सेदारी भारतीय नागरिक या भारतीय कंपनी के पास होगी। यानी एफडीआई की अधिकतम सीमा 49 फीसदी होगी। डीएपी 2020 में कंपनी अधिनियम 2013 में परिभाषित उपायों का भी हवाला दिया गया ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि विभिन्न श्रेणियों में रक्षा निविदाओं में भाग लेने वाली कंपनियों का नियंत्रण भारतीय नागरिकों के हाथ में ही रहे। नीति में कहा गया है, नियंत्रण में अधिकांश निदेशकों की नियुक्ति का अधिकार या प्रबंधन पर नियंत्रण या नीतिगत निर्णयों पर नियंत्रण जिसमें उनकी अंशधारिता या प्रबंधन अधिकार अथवा अंशधारक समझौते या वोटिंग समझौते शामिल होंगे। इस विरोधाभास से कुछ सवाल उठते हैं: एफडीआई की सीमा को बढ़ाकर 74 फीसदी करने के पीछे इरादा क्या था? क्या 49 फीसदी विदेशी हिस्सेदारी वाली भारतीय कंपनियों के साथ अलग व्यवहार होगा और 74 फीसदी विदेशी हिस्सेदारी वाली कंपनियों के साथ अलग? अंतरराष्ट्रीय रक्षा कंपनियां भारतीय रक्षा क्षेत्र में 74 फीसदी निवेश क्यों करेंगी जबकि कंपनी को भारतीय माना भी नहीं जाएगा और वे भारतीय कंपनियों के लिए आरक्षित श्रेणी में बोली भी नहीं लगा सकेंगी। रक्षा एफडीआई नीति सन 2001 में निजी क्षेत्र को मंजूरी के समय से ही उद्देश्य विहीन नजर आती है। रक्षा और विमानन क्षेत्र में 2001 से अब तक कुल एफडीआई बमुश्किल 3,454 करोड़ रुपये है। इसमें से 2,133 करोड़ रुपये की राशि वित्त वर्ष 2014-15 के बाद आई। रक्षा मंत्रालय ने कभी यह स्पष्ट नहीं किया कि रक्षा क्षेत्र में एफडीआई को उदार बनाकर क्या हासिल किया जाना है। सन 2001 में 26 फीसदी से 2016 में इसे 49 फीसदी किया गया और फिर यह 74 फीसदी तक पहुंचा। एक ओर इसे आधुनिक सैन्य तकनीक को भारत लाने के तरीके के रूप में देखा गया (मंत्रालय ने कहा भी है कि उच्च तकनीक वाली परियोजनाओं में 100 फीसदी एफडीआई की इजाजत होगी) तो दूसरी ओर एफडीआई को उदार बनाने को रक्षा उत्पादन बढ़ाने के तरीके के रूप में भी देखा जा रहा है। भले ही यहां सस्ते और मझोले तकनीकी उपकरण बनें जिन्हें वैश्विक उपकरण निमार्ता भारत में श्रम सस्ता होने के कारण बनाएं। रक्षा एफडीआई को 100 फीसदी तक बढ़ाने को लेकर दी गई दलील इस गलत धारणा पर आधारित है कि रक्षा उद्योग बाजार संचालित है। बल्कि सरकार उच्च गुणवत्ता वाले सैन्य उपकरणों के निर्माण पर कड़ा नियंत्रण रखती है। बल्कि जब कोई रक्षा कंपनी विनिर्माण को भारत स्थानांतरित करने में बेहतरी देखती है तो यह निर्णय भी उसका बोर्ड नहीं भारत सरकार की मंजूरी पर निर्भर है। उन्नत रक्षा क्षमताओं वाले देशों में विधायी ढांचा मसलन अमेरिकी अंतरराष्ट्रीय शस्त्र व्यापार नियमन आदि रक्षा तकनीक से जुड़े मसले देखते हैं। रक्षा एफडीआई की सीमा बढ़ाने और उसे 100 फीसदी करने के पीछे दलील यह है कि इससे विनिर्माण को बढ़ाया जा सकता है, रोजगार उत्पन्न किए जा सकते हैं और उत्पादन कौशल में सुधार किया जा सकता है। यह कौशल मध्यम तकनीक वाले उत्पाद मसलन इलेक्ट्रॉनिक सर्किटरी, फ्यूज बॉक्स या विमानों का लैंडिंग गियर बनाने के काम आता है। हम अपनी रक्षा जरूरत का 55-60 फीसदी आयात करते हैं जिसमें अधिकांश रूस, अमेरिका, फ्रांस और इजरायल से खरीदा जाता है। यदि इन देशों की कंपनियों को भारत में पूर्ण क्षमता वाली उत्पादन इकाइयां स्थापित करने दिया जाए तो बड़े आॅर्डर का अहम हिस्सा यहीं बन सकता है। इससे देश में उच्च गुणवत्ता वाली विनिर्माण इकाइयां तैयार होंगी, भले ही स्वामित्व विदेशियों का हो। आॅफसेट करारों के माध्यम से इस विकल्प को टटोला गया है लेकिन भविष्य की सभी प्रत्यक्ष विदेशी खरीद में यह शर्त जोड़ी जा सकती है कि वे भारत में पूर्ण स्वामित्व वाली इकाई स्थापित करेंगे। देश के रक्षा बाजार में पहुंच को सशर्त बनाया जा सकता है। यानी केवल उनके लिए जो देश में लंबी अवधि तक टिक सकें। वैश्विक कंपनियों को पूर्ण स्वामित्व वाली या 74 फीसदी स्वामित्व वाली विनिर्माण इकाइयां भारत में स्थापित करने से उच्च प्रतिस्पर्धा का माहौल बनेगा और भारतीय निजी और सरकारी कंपनियां अंतरराष्ट्रीय स्तर के उत्पाद बनाने के लिए प्रतिस्पर्धा करेंगी। शायद इससे देश के रक्षा उद्योग में तेजी आए और सामान्य से अलग उत्कृष्ट उत्पाद तैयार हों।

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