Breaking
ताज़ा समाचार लोड हो रहा है...
लाइव: 19
होम ई-पेपर देश झारखंड खेल समाचार राज काज कानून व्यवस्था करियर बिजनेस वर्ल्ड हेल्थ विचार ज्ञान विज्ञान समाज वन और पर्यावरण मनोरंजन बिहार विज्ञापन

विचार

View All
वंदे मातरम् ...
Published / 2026-08-15 20:51:40
वंदे मातरम् ...

वंदे मातरम् ...त्रिवेणी दासएबीएन एडिटोरियल डेस्क। भारत के राष्ट्रगीत वंदे मातरम् को लाल किला के प्राचीर तक पहुंचने और गाए जाने में अंग्रेजों से अपने देश के आजादी के बाद 80 वर्ष लग गए।वंदे मातरम् गीत की रचना आज से 150 वर्ष पूर्व बंगाल के बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय ने 1875 में किया और अपने प्रसिद्ध उपन्यास "आनंद मठ" में 1882 में सम्मिलित करते हुए उपन्यास का अंग बनाया।गुरुदेव रविंद्र नाथ टैगोर ने इस गीत को 1896 में तत्कालीन कांग्रेस के एक सभा में आजादी के प्रेरणा-गीत के स्वरूप में पहली बार गया, और तब से यह गीत आजादी के मतवालों, जेल जाने वालों और फांसी के फंदे पर झूलने वालों का नारा (Slogan) बन गया। आपस में मिलने वाले भारतीयों का दुआ-सलाम का वाक्य बन गया। गुलामी के समय ब्रिटिश सरकार चाहती थी कि राष्ट्रगीत के रूप में गौड सेभ द क्वीन (god save the queen) गया जाए, लेकिन आजादी के दीवानों ने उसका प्रतिकार किया।भारत के प्रथम राष्ट्रपति डॉ राजेंद्र प्रसाद को 11 दिसंबर 1946 को संविधान सभा का स्थाई अध्यक्ष चुना गया और 24 जनवरी 1950 को संविधान सभा की स्वीकृति के बाद डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद ने इस गीत को राष्ट्रगीत का दर्जा प्रदान किया; तब से यह गीत राष्ट्रगीत के रूप में भारत में गया जा रहा है।भारत के फिल्मों में प्रसिद्ध संगीतकार एवं गायक ए. आर. रहमान ने एक संगीत "मां तुझे सलाम"  तैयार किया और इसे अपने एल्बम वंदे मातरम् सम्मिलित करते हुए इस गीत को जन-जन तक पहुंचाया। 30 जुलाई 2026 को लोकसभा में बिल पास करके वंदे मातरम् गीत को आंशिक नहीं गाते हुए पूर्ण स्वरूप में गाने का संरक्षण एवं सम्मान प्रदान किया गया।आज 15 अगस्त 2026 को संपूर्ण देश एवं दुनिया भर के लोगों ने देखा कि तिरंगा ध्वजारोहण के बाद वंदे मातरम् के धुन बजाए गए तत्काल बाद राष्ट्रगान जन गण मन के धुन बजाए गए। वायुसेना के हेलीकॉप्टर M_17 ने वंदे मातरम् का बैनर लेकर लाल किला के ऊपर उड़ान भरते हुए तिरंगा के ऊपर फूलों की बरसात की। वंदे मातरम् गीत गाते हुए जिन स्वतंत्रता सेनानियों ने अपनी कुर्बानी दी थी आज पूरे राष्ट्र ने उनके प्रति अपनी श्रद्धांजलि समर्पित किया है..भारत माता की जय _! वंदे मातरम् _!!जय हिंद_!!!

नासूर...
Published / 2026-08-14 21:48:56
नासूर...

त्रिवेणी दास एबीएन एडिटोरियल डेस्क। नासूर वह जख्म है जो कभी ठीक नहीं होता है और उसकी दर्द-भरी टीश भारी तकलीफ देती रहती है। देश के बंटवारे का नासूर हम भारतीयों के लिए कभी नहीं खत्म होने वाला एक ऐसा मर्ज है जो लाइलाज है। भारत को लगभग 200 वर्षों तक अंग्रेजों ने गुलाम बनाए रखा। ब्रिटिश सरकार के अंतिम गवर्नर-जनरल माउंटबेटन ब्रिटिश सरकार के प्रतिनिधि के रूप में भारत में कार्यरत थे। 3 जून 1947 को भारत के विभाजन की योजना माउंटबेटन योजना के रूप में घोषित की गई और जुलाई 1947 को इसे ब्रिटिश संसद में पेश करते हुए पारित किया गया और भारत का विभाजन सुनिश्चित हो गया।  14 अगस्त 1947 को पाकिस्तान ने अपना स्वतंत्रता दिवस मनाया और दुनिया के नक्शे में एक नए राष्ट्र का उदय हो गया। भारत ने 15 अगस्त 1947 को अपने खंडित स्वरूप में अपना स्वतंत्रता दिवस मनाया। कश्मीर को लेकर भारत एवं पाकिस्तान के बीच 22 अक्टूबर 1947 को युद्ध शुरू हुआ और कश्मीर के भारत में विलय के बाद भी कश्मीर का एक भाग पाकिस्तान के कब्जे में चला गया जिसे आज भी पाक अधिकृत कश्मीर (ढडङ) कहा जाता है। देश के बंटवारा के बाद से आज तक पाकिस्तान भारत के साथ अनेक मुद्दों पर लड़ाई करते रहता है, कभी सीधा तो कभी छद्म अटैक भारत के ऊपर करते रहना उसकी आदत बन गयी है और यही वह नासूर है जो देशवासियों के लिए कभी नहीं ठीक होने वाला एक घाव बन गया है। बंटवारा के बाद पाकिस्तान से पलायन, खून खराबा और हत्या बलात्कार की एक अलग ही दर्द भरी दास्तान है जो नासूर को नीम चढ़ा बना देता है। कल 15 अगस्त 2026 को हम सभी देशवासी स्थापित परंपरा के अनुसार स्वतंत्रता दिवस मनाएंगे और लाल किला के प्राचीर में प्रधानमंत्री तिरंगा का ध्वजारोहण करेंगे तथा राष्ट्र को संबोधित करेंगे। स्वतंत्रता दिवस के शुभ अवसर पर हर वर्ष हम सभी एक नई उम्मीद, नई योजना के साथ राष्ट्र के सम्पूर्ण समृद्धि का संकल्प लेते हैं...। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं और ये उनके निजी विचार हैं।)

रोम जल रहा था और नीरो बंशी बजा रहा था...
Published / 2026-08-13 22:41:45
रोम जल रहा था और नीरो बंशी बजा रहा था...

रोम जल रहा था और नीरो बंशी बजा रहा था...त्रिवेणी दासरोम जल रहा था नीरो बंसी बजा रहा था बयानवीर का अपना घर जल रहा था दूसरे के घर में अंजलि से पानी डाल रहा थासवाल है कि दिल्ली के जंतर मंतर के आंदोलनकारी छात्र अगर छात्र थे, तो झारखंड के रांची में आंदोलनकारी छात्र दूसरे ग्रह आये बाह्य अंतरिक्ष-जीव हैं क्या? सवालों से बचने के लिए झारखंड में इं.डि.या. गठबंधन की सरकार विधानसभा का सत्र एक दिन पहले ही समाप्त कर देती है, इस पर तो माननीय सांसद इं.डि.या. गठबंधन के हिस्सा होने का फर्ज तो नहीं निभाते हैं, अलबत्ता संसद नहीं चलने देकर गर्व से अपना पीठ थपथपाते हुए डेमोक्रेसी के शान में बंदर राग में गजल गुनगुनाते हैं।रांची में छात्रों के आंदोलन को कभर करने वाले वाले पत्रकार को थाना में डिटेन कराया जाता है और एफआईआर की कॉपी थमा दी जाती है, परिवारवादियों की तानाशाही उजागर हो जाती है, जो अक्सर होती रहती है;  ऐसे में वह आदर्श, उसूल और लोकतंत्र के नैतिकता पता नहीं क्यों पीछे रह जाती है?हकीकत है कि काठ की हांडी से बार-बार खिचड़ी नहीं पकाइ जा सकती है। आवाम की समझदारी ने अपने मतदान से देश भर में लोकप्रिय सरकार का गठन किया है और आने वाले दिनों में जनता की समझदारी दूध का दूध और पानी का पानी को अलग करने का अपनी समझदारी पुन: सिद्ध करेगी...।

जॉब लॉस कवर: आपकी फाइनेंशियल स्थिरता की सुरक्षा
Published / 2026-08-12 21:01:14
जॉब लॉस कवर: आपकी फाइनेंशियल स्थिरता की सुरक्षा

अमरनाथ सक्सेना एबीएन एडिटोरियल डेस्क। आज की तेजी से बदलती दुनिया में, फाइनेंशियल सेक्योरिटी अब आपके स्वास्थ्य, जीवन या आपकी कार जैसे मूल्यवान एसेट की सेक्योरिटी तक सीमित नहीं है। जहां हेल्थ और लाइफ इंश्योरेंस आपके परिवार के भविष्य को सुरक्षित करता है, और मोटर इंश्योरेंस आपके वाहन की सुरक्षा करता है, वहीं एक ऐसा रिस्क भी है जिसे अक्सर नजरअंदाज कर दिया जाता है- और वह है अचानक नौकरी छूट जाने का संकट। नौकरी का छूटना, चाहे वह ले आॅफ के कारण हो या अचानक आई स्वास्थ्य समस्याओं की वजह से, आपकी नियमित आय में बाधा डाल सकता है और आपकी आर्थिक स्थिरता के लिए खतरा पैदा कर सकता है। जॉब लॉस कवर का उद्देश्य इसी फाइनेंशियल कमी को दूर करना है। यह आपको एक ऐसा सुरक्षा कवच प्रदान करता है जो आपके अगले करियर अवसर तक आपकी आर्थिक जरूरतों को पूरा करने में मदद करता है। जॉब लॉस कवर क्या है? जॉब लॉस कवर एक विशेष इंश्योरेंस लाभ है जो आपकी इच्छा के बिना नौकरी छूट जाने की स्थिति में आपको फाइनेंशियल सहायता प्रदान करता है। इसका मतलब है ऐसी स्थितियों में नौकरी जाना जो आपके नियंत्रण में न हों, जैसे कंपनियों का मर्जर, अधिग्रहण, कॉस्ट-कटिंग या आॅपरेशन बंद करना। यह उन स्थितियों को भी कवर करता है जब किसी बीमारी या चोट की वजह से आप अपनी नौकरी जारी नहीं रख पाते। इस लाभ का भुगतान आमतौर पर मासिक किश्तों के रूप में किया जाता है, जो चुने गए कवर और अवधि के अनुसार आपको कुछ समय के लिए आय का सहारा प्रदान करता है। जॉब लॉस कवर की प्रमुख विशेषताएं यह प्लान विशेष रूप से उन वेतनभोगी कर्मचारियों के लिए है जो सीधे कंपनी के पेरोल पर हैं; इसमें अस्थायी, कॉन्ट्रैक्चुअल और प्रोबेशनरी कर्मचारियों को शामिल नहीं किया गया है। अगर मर्जी के बिना नौकरी छूटती है, तो तय की गई राशि हर महीने तब तक दी जाती है जब तक कि इंश्योर्ड व्यक्ति द्वारा चुने गए महीनों की अवधि पूरी न हो जाये या उसे नयी नौकरी न मिल जाए, इनमें से जो भी पहले हो। भुगतान शुरू होने से पहले एक प्रतीक्षा अवधि होती है। अगर आपकी कंपनी आपको सेवरेंस पे या नोटिस पीरियड के बदले वेतन देती है, तो ओवरलैपिंग लाभों से बचने के लिए इंश्योरेंस भुगतान को एडजस्ट किया जाता है। कवरेज की अधिकतम लिमिट आपके मासिक वेतन के एक निश्चित प्रतिशत, आमतौर पर लगभग 70% तक सीमित होती है, भले ही आपके पास एक से अधिक पॉलिसी क्यों न हों। यही कारण है कि जॉब लॉस कवर एक बहुत ही व्यावहारिक और मददगार प्लान बन जाता है, जो करियर में बदलाव के मुश्किल समय में आपको  स्थिर फाइनेंशियल सहायता प्रदान करता है। जॉब लॉस कवर क्यों महत्वपूर्ण है जॉब लॉस कवर होने से अचानक आने आर्थिक संकटों का सामना और भी बेहतर तरीके से कर सकते हैं। अगर आपके पास यह कवर नहीं है, तो अचानक नौकरी जाने से आप बड़ी मुश्किल में पड़ सकते हैं। किराया, एटक२ और बच्चों की स्कूल फीस जैसे जरूरी खर्चों को रोका नहीं जा सकता, इसलिए यह सुरक्षा होना बहुत जरूरी है। ऐसे मामलों में, लोग अक्सर केवल अपनी बचत पर निर्भर रहते हैं, लेकिन अगर नौकरी मिलने में देरी हो जाए, तो वह पैसा बहुत जल्दी खत्म हो सकता है। हालांकि, जॉब लॉस कवर होने से आपके पास एक सुरक्षित विकल्प रहता है, जो आपको हर महीने किश्तों में भुगतान देता है। यह इंश्योरेंस अवधि के दौरान आपको आर्थिक रूप से मजबूत रखता है ताकि आप बिना किसी तनाव के नई नौकरी की तलाश कर सकें। इस लगातार सहयोग से आप अपनी बचत को खर्च किए बिना अपने बुनियादी खर्चे पूरे कर सकते हैं। यह आपको वह मानसिक शांति और भरोसा देता है जिससे आप आर्थिक तंगी की परवाह किए बिना फिर से रोजगार पाने की कोशिश कर सकते हैं। संक्षेप में, जॉब लॉस कवर यह सुनिश्चित करता है कि कुछ समय के लिए आय रुकने का असर आपके भविष्य के बड़े प्लान्स पर न पड़े। एक्सक्लूजन जिनके बारे में आपको पता होना चाहिए जॉब लॉस कवर में कुछ खास एक्सक्लूजन होते हैं, जो यह तय करते हैं कि आप कब क्लेम का लाभ ले सकते हैं। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि सहायता केवल उन वास्तविक मामलों में मिले जहां नौकरी आपकी मर्जी के बिना गई हो। यह उन स्थितियों में लागू नहीं होता जहां आप अपनी इच्छा से नौकरी छोड़ते हैं, जैसे कि इस्तीफा देना या रिटायर होना, क्योंकि ये आपके स्वैच्छिक फैसले हैं। ठीक इसी तरह, अगर किसी को गलत व्यवहार, धोखाधड़ी या अनुशासन तोड़ने की वजह से नौकरी से निकाला जाता है, तो उसे भी कवर नहीं दिया जाता है, क्योंकि ये आपकी अपनी गलतियों की वजह से हुए नुकसान माने जाते हैं। इसके अलावा, हड़तालों, श्रम विवादों या मैटरनिटी या पैटर्निटी लीव न बढ़ाए जाने के कारण होने वाली बेरोजगारी को भी इस कवर में शामिल नहीं किया जाता है, क्योंकि इन स्थितियों को अचानक होने वाली बेरोजगारी नहीं माना जाता है। अंत में, कवर केवल भारत के भीतर नौकरियों पर लागू होता है, जिसका मतलब है कि देश के बाहर रोजगार के नुकसान को कवर नहीं किया जाता है। इन एक्सक्लूजन का उद्देश्य इस कवर को सिर्फ स्थाई नौकरी में आने वाली उन अचानक और बड़ी रुकावटों तक सीमित रखना है जिन्हें टाला न जा सके, न कि उन स्थितियों के लिए जो आपकी अपनी मर्जी से हों या जिनके बारे में पहले से पता हो। कुल मिलाकर, जॉब लॉस कवर लेना आपके भविष्य की आर्थिक सुरक्षा के प्रति एक जिम्मेदारी भरा कदम है। यह सुनिश्चित करता है कि अचानक नौकरी जाने जैसा कोई संकट आपके फाइनेंशियल प्लान को खराब न करें। यह अनिश्चितता के समय में आपको सुरक्षा का भरोसा देता है और मानसिक शांति बनाये रखता है। (लेखक अमरनाथ सक्सेना, चीफ टेक्निकल आॅफिसर- कमर्शियल, बजाज जनरल इंश्योरेंस लिमिटेड पूर्व नाम बजाज आलियांज जनरल इंश्योरेंस कंपनी लिमिटेड हैं।) 

प्रकृति संरक्षण से सतत विकास की राह
Published / 2026-08-11 20:50:20
प्रकृति संरक्षण से सतत विकास की राह

कविता एबीएन एडिटोरियल डेस्क। झारखंड की पहचान जल, जंगल, जमीन और जानवर से गहरे जुड़े जीवन और संस्कृति से होती है। यहां के ग्रामीण और जनजातीय समुदायों की आजीविका, परंपराएं और सामाजिक जीवन लंबे समय से प्राकृतिक संसाधनों पर आधारित रहे हैं। जंगल से मिलने वाले लघु वनोपज, खेती के लिए जमीन, जीवन और कृषि के लिए जल तथा पशुधन ग्रामीण अर्थव्यवस्था के महत्वपूर्ण आधार हैं। इसलिए झारखंड में प्रकृति संरक्षण केवल पर्यावरण का विषय नहीं, बल्कि आजीविका, खाद्य सुरक्षा, स्वास्थ्य और आने वाली पीढ़ियों के भविष्य से जुड़ा प्रश्न है। बदलते मौसम, अनियमित वर्षा, जलस्रोतों पर बढ़ता दबाव, भूमि की उर्वरता में कमी, वनों पर बढ़ता दबाव, जैव विविधता में कमी तथा ठोस एवं तरल अपशिष्ट का बढ़ता प्रभाव ग्रामीण क्षेत्रों के सामने गंभीर चुनौतियां हैं। इन परिस्थितियों में विकास की ऐसी दिशा आवश्यक है जिसमें आर्थिक और सामाजिक प्रगति के साथ प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण भी सुनिश्चित हो। इस दिशा में ग्राम पंचायतों की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाती है। स्थानीय स्वशासन की सबसे निकटस्थ संस्था होने के कारण ग्राम पंचायत अपने क्षेत्र की भौगोलिक परिस्थितियों, प्राकृतिक संसाधनों और समुदाय की आवश्यकताओं को बेहतर ढंग से समझती है। इसलिए पर्यावरण संरक्षण को अलग गतिविधि के रूप में देखने के बजाय इसे ग्राम पंचायत विकास योजना और स्थानीय विकास की प्राथमिकताओं का अभिन्न हिस्सा बनाया जाना आवश्यक है। ग्राम पंचायतें अपने क्षेत्र में उपलब्ध जलस्रोतों, भूमि, वन क्षेत्र, सामुदायिक संसाधनों, कृषि क्षेत्र और जैव विविधता की स्थिति का स्थानीय स्तर पर आकलन कर सकती हैं। तालाबों और पारंपरिक जलस्रोतों का पुनर्जीवन, वर्षा जल संचयन, जलग्रहण क्षेत्र का विकास, भूमि संरक्षण, पौधरोपण एवं पौधों का संरक्षण, सामुदायिक भूमि और चारागाहों का संरक्षण तथा स्थानीय जैव विविधता की सुरक्षा जैसे कार्यों को पंचायत की विकास योजना में प्राथमिकता दी जा सकती है। प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण तभी प्रभावी होगा जब स्थानीय समुदाय इसमें सक्रिय भागीदार बने। ग्राम सभा इस प्रक्रिया का महत्वपूर्ण मंच है। महिलाओं, युवाओं, किसानों, जनजातीय समुदायों और अन्य स्थानीय समूहों की भागीदारी से गांव की वास्तविक पर्यावरणीय समस्याओं और प्राथमिकताओं की पहचान की जा सकती है। ग्राम सभा के माध्यम से यह तय किया जा सकता है कि गांव के सामने जल संकट, भूमि क्षरण, वन संरक्षण, अपशिष्ट प्रबंधन या आजीविका से जुड़ी कौन-सी चुनौती सबसे अधिक महत्वपूर्ण है और उसके समाधान के लिए स्थानीय स्तर पर क्या प्रयास किये जा सकते हैं। सतत विकास लक्ष्यों को भी स्थानीय परिस्थितियों से जोड़ना आवश्यक है। गरीबी उन्मूलन, बेहतर आजीविका, स्वच्छ जल, स्वच्छता, स्वास्थ्य, पोषण, लैंगिक समानता, जलवायु कार्रवाई तथा प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण जैसे लक्ष्य गांव के विकास से सीधे जुड़े हैं। उदाहरण के लिए जल संरक्षण की एक पहल केवल पेयजल की उपलब्धता नहीं बढ़ाती, बल्कि कृषि, पशुपालन, आजीविका और पोषण की स्थिति को भी प्रभावित करती है। इसी प्रकार ठोस एवं तरल अपशिष्ट प्रबंधन से स्वच्छता, स्वास्थ्य और पर्यावरण तीनों में सुधार संभव है। पर्यावरण संरक्षण से जुड़े कार्य किसी एक विभाग की जिम्मेदारी नहीं हैं। जल संरक्षण, ग्रामीण रोजगार, कृषि, पशुपालन, वन, आजीविका, स्वच्छता और पेयजल से संबंधित योजनाओं के बीच प्रभावी अभिसरण से पंचायतों की क्षमता और परिणाम दोनों बढ़ाए जा सकते हैं। ग्राम पंचायत अपनी विकास योजना में स्थानीय पर्यावरणीय प्राथमिकताओं की पहचान कर विभिन्न विभागों और योजनाओं के संसाधनों को उनसे जोड़ सकती है। इससे सीमित संसाधनों का अधिक प्रभावी उपयोग संभव होगा। हालांकि इस दिशा में ग्राम पंचायतों के सामने कई चुनौतियां भी हैं। तकनीकी जानकारी और मानव संसाधन की कमी, सीमित वित्तीय संसाधन, विभागीय समन्वय की कठिनाइयां, पर्यावरणीय विषयों पर पर्याप्त जागरूकता का अभाव तथा योजनाओं के प्रभावी अनुश्रवण की सीमाएं प्रमुख चुनौतियों में शामिल हैं। जल संरक्षण, भूमि सुधार और जैव विविधता संरक्षण जैसे कार्यों का लाभ अक्सर लंबे समय में दिखाई देता है। इसलिए इनके लिए निरंतर प्रयास, सामुदायिक भागीदारी और स्थानीय स्तर पर नियमित निगरानी आवश्यक है। आने वाले समय में विकास की सोच को केवल सड़क, नाली, भवन और अन्य आधारभूत संरचनाओं तक सीमित रखने के बजाय प्राकृतिक संसाधनों कीदीर्घकालिक सुरक्षा से जोड़ना होगा। प्रत्येक ग्राम पंचायत अपने क्षेत्र की परिस्थितियों के अनुसार जल संरक्षण, हरित क्षेत्र का विस्तार, अपशिष्ट प्रबंधन, जलवायु अनुकूल कृषि, प्राकृतिक संसाधन आधारित आजीविका और जैव विविधता संरक्षण जैसी प्राथमिकताएं निर्धारित कर सकती है। इसके लिए पंचायत प्रतिनिधियों और पंचायत कर्मियों की क्षमता-वृद्धि, ग्राम सभा की प्रभावी भागीदारी, स्थानीय आंकड़ों का उपयोग और योजनाओं का नियमित अनुश्रवण महत्वपूर्ण होगा। झारखंड में सतत विकास की राह गांवों से होकर गुजरती है। जल बचेगा तो खेती और आजीविका मजबूत होगी, जंगल बचेगा तो प्राकृतिक संतुलन और स्थानीय अर्थव्यवस्था सुरक्षित रहेगी, जमीन बचेगी तो आने वाली पीढ़ियों का भविष्य सुरक्षित होगा और पशुधन तथा जैव विविधता का संरक्षण ग्रामीण जीवन को अधिक टिकाऊ बनायेगा। इसलिए प्रकृति संरक्षण को विकास से अलग नहीं, बल्कि विकास की आधारभूत शर्त के रूप में देखने की आवश्यकता है। स्थानीय स्वशासन को मजबूत करते हुए यदि ग्राम पंचायतें अपनी विकास योजनाओं को पर्यावरण संरक्षण, ग्राम सभा की भागीदारी, विभागीय अभिसरण और सतत विकास लक्ष्यों के स्थानीयकरण से जोड़ें, तो गांवों में ऐसा विकास मॉडल तैयार किया जा सकता है जो वर्तमान आवश्यकताओं को पूरा करने के साथ आने वाली पीढ़ियों के लिए भी प्राकृतिक संसाधनों को सुरक्षित रखे। यही झारखंड के गांवों को अधिक समृद्ध, स्वस्थ, समावेशी और सतत बनाने की दिशा में एक सार्थक कदम होगा। (लेखक राष्ट्रीय ग्रामीण विकास एवं पंचायती राज संस्थान पंचायती राज मंत्रालय की क्षमता निर्माण सलाहकार हैं।)

...जब भूख बनी आजादी का अस्त्र
Published / 2026-08-10 22:10:08
...जब भूख बनी आजादी का अस्त्र

23 बंदी, एक भूख हड़ताल, और टूट गया ब्रिटिश शासन का गुरूर हजारीबाग जेल का संघर्ष गाथा, जिसने सत्ता के अहंकार को तोड़ा भारतीय लोकतांत्रिक चेतना की ऐतिहासिक विजय गाथा डॉ. शत्रुघ्न कुमार पाण्डेय एबीएन एडिटोरियल डेस्क। 15 अगस्त उन अनगिनत संघर्षों की स्मृति दिवस भी है, जिनके कारण भारत स्वतंत्र हुआ। यह स्वतंत्रता केवल नारों, भाषणों, बैठकों एवं सम्मेलनों से नहीं मिली; यह जेलों की अंधेरी कोठरियों, भूख से सूखते शरीरों, जनमत की शक्ति और संवैधानिक मूल्यों की रक्षा के लिए दिए गए त्याग से भी अर्जित की गई थी। ऐसी ही एक घटना 1938 में हजारीबाग केंद्रीय कारागार में घटी। पहली दृष्टि में यह कुछ राजनीतिक बंदियों की रिहाई का प्रश्न प्रतीत होता है, किंतु वास्तव में यह औपनिवेशिक निरंकुश सत्ता और भारतीय उत्तरदायी शासन के बीच टकराव था। एक ओर ब्रिटिश शासन अपनी विशेष शक्तियों को सर्वोपरि मानता था, दूसरी ओर भारतीय नेतृत्व यह सिद्ध करना चाहता था कि जनता द्वारा चुनी गयी सरकार को जनता के प्रति उत्तरदायी होना चाहिए, न कि औपनिवेशिक अधिकारियों की इच्छा के प्रति। आज, जब हम स्वतंत्रता दिवस मना रहे हैं, तब यह प्रसंग मुझे उद्वेलित कर रहा है यह लिखने को कि लोकतंत्र केवल संविधान लिख देने से नहीं बनता, उसकी नींव उन संघर्षों से भी पड़ी है जिनमें सत्ता से अधिक सिद्धांतों को महत्व दिया जाता है। हजारीबाग जेल की भूख हड़ताल ऐसा ही एक संघर्ष थी। जब उम्मीदें सलाखों से टकरायी 20 जुलाई 1937 को बिहार में कांग्रेस मंत्रिमंडल का गठन हुआ। जेलों के भीतर यह समाचार आशा का संदेश लेकर पहुंचा। राजनीतिक बंदियों को विश्वास था कि अब उनकी रिहाई दूर नहीं। कांग्रेस ने चुनावों के दौरान यह वादा किया था। लेकिन सप्ताह बीत गये, फिर महीने। जेल के फाटक बंद रहे। हजारीबाग केंद्रीय कारागार में बेचैनी बढ़ने लगी। यहां केवल बिहार के राजनीतिक कार्यकर्ता ही नहीं थे। कुछ ऐसे क्रांतिकारी भी थे जिन्हें अंडमान की सेल्युलर जेल में भूख हड़ताल करने के कारण हजारीबाग स्थानांतरित किया गया था। काला पानी उनकी इच्छाशक्ति को नहीं तोड़ सका था। हजारीबाग में भी उन्होंने संघर्ष का वही मार्ग चुना, प्रतिरोध का अस्त्र—भूख। 17 जनवरी 1938 को आठ राजनीतिक बंदियों ने आमरण अनशन आरम्भ किया। नौ दिन बाद, 26 जनवरी तक अन्य बंदी भी इस संघर्ष में शामिल हो गए। अब यह केवल 23 बन्दियों का अनशन नहीं था। यह उस व्यवस्था के विरुद्ध नैतिक प्रतिरोध था, जो जनता के प्रतिनिधियों की सरकार बनने के बाद भी राजनीतिक बंदियों को स्वतंत्र करने को तैयार नहीं थी। जेल की चारदीवारी के भीतर उठी यह आवाज शीघ्र ही बिहार की सड़कों पर सुनाई देने लगी। 30 जनवरी को पूरे प्रदेश में राजनीतिक बंदी दिवस मनाया गया। प्रभात फेरियां निकलीं, सभाएं हुईं। छात्रों, किसानों, समाजवादियों और कांग्रेस कार्यकतार्ओं ने एक स्वर में राजनीतिक बंदियों की रिहाई की मांग उठायी। हजारीबाग जेल अब केवल एक जेल नहीं रह गई थी। वह भारतीय जनमत का प्रतीक बन चुकी थी। इतनी गंभीर हो गयी कि बिहार के मुख्यमंत्री, तब प्रधानमंत्री, श्रीकृष्ण सिंह, मौलाना अबुल कलाम आजाद और अच्युत पटवर्धन स्वयं हजारीबाग जेल पहुंचे। उन्होंने बंदियों से लंबी बातचीत की। उन्हें विश्वास दिलाया कि उनकी रिहाई के लिए पूरा प्रयास किया जाएगा। नेताओं के आग्रह पर भूख हड़ताल समाप्त हुई, किंतु संघर्ष समाप्त नहीं हुआ। असली संघर्ष अब शुरू हो चुका था। प्रश्न केवल बंदियों की रिहाई का नहीं था। प्रश्न यह था—निर्णय लेने का अधिकार किसके पास है? जनता द्वारा चुनी गई भारतीय सरकार के पास या औपनिवेशिक गवर्नर और गवर्नर-जनरल के पास। दरअसल दो शासन-दृष्टियाँ आमने-सामने थीं। बिहार के मुख्यमंत्री श्रीकृष्ण सिंह का मत स्पष्ट था, यदि जनता ने सरकार चुनी है, तो राजनीतिक बंदियों की रिहाई जैसे निर्णय लेने का अधिकार भी उसी सरकार का होना चाहिए। ब्रिटिश शासन इससे सहमत नहीं था। गवर्नर-जनरल लॉर्ड लिनलिथगो ने तर्क दिया कि भारत शासन अधिनियम, 1935 की धारा 126(5) के अंतर्गत शांति और व्यवस्था बनाए रखने का अंतिम उत्तरदायित्व उनके ऊपर है। उनके अनुसार सभी राजनीतिक बंदियों की सामूहिक रिहाई सार्वजनिक सुरक्षा के लिए जोखिम उत्पन्न कर सकती थी। इसलिए उन्होंने बिहार के गवर्नर मॉरिस गार्नियर हैलेट को मंत्रियों की सलाह न मानने का निर्देश दिया। यहीं से संघर्ष प्रशासनिक नहीं, संवैधानिक बन गया। भारतीय नेतृत्व उत्तरदायी सरकार की बात कर रहा था। औपनिवेशिक शासन विशेषाधिकारों की। 15 फरवरी 1938 को बिहार कांग्रेस मंत्रिमंडल ने इस्तीफा दे दिया। यह इस्तीफा किसी पद के लिए नहीं था; यह एक सिद्धांत के लिए था। मंत्रिमंडल ने स्पष्ट कहा कि राजनीतिक बंदियों की रिहाई से शांति को कोई खतरा नहीं है। यदि निर्वाचित सरकार के अधिकारों में इस प्रकार हस्तक्षेप होगा, तो उत्तरदायी शासन केवल नाम का रह जायेगा। औपनिवेशिक शासन के सामने यह नैतिक चुनौती थी। गांधी और बोस ने दिया राष्ट्रीय स्वर बिहार मंत्रिमंडल के इस्तीफे ने पूरे देश का ध्यान आकर्षित किया। महात्मा गांधी ने गवर्नर-जनरल के निर्णय की आलोचना करते हुए कहा कि धारा 126(5) का प्रयोग इस मामले में उचित नहीं था। गांधी ने लिखा, गवर्नर का कार्य मंत्रियों को सलाह देना है, उनके अधिकारों का स्थान लेना नहीं। यदि निर्वाचित मंत्री स्वतंत्र निर्णय ही न ले सकें, तो उत्तरदायी शासन का सिद्धांत अर्थहीन हो जायेगा।गांधी जी ने एक महत्वपूर्ण प्रश्न उठाया, यदि कुछ राजनीतिक बंदियों की रिहाई से वास्तव में कोई अशांति नहीं होने वाली थी, तो फिर असाधारण संवैधानिक शक्तियों का प्रयोग क्यों किया गया? यह प्रश्न केवल ब्रिटिश सरकार से नहीं था; यह औपनिवेशिक शासन की पूरी वैधता पर प्रश्नचिह्न था। हरिपुरा में कांग्रेस ने संघर्ष को राष्ट्रीय स्वर दिया। 19 से 21 फरवरी 1938 को आयोजित इस अधिवेशन के अध्यक्ष सुभाषचंद्र बोस थे। उनके नेतृत्व में कांग्रेस ने बिहार मंत्रिमंडल का समर्थन किया। अधिवेशन के प्रस्ताव में स्पष्ट कहा गया कि राजनीतिक बंदियों की रिहाई प्रांतीय सरकार के अधिकार-क्षेत्र का विषय है। गवर्नर-जनरल का हस्तक्षेप उत्तरदायी शासन की भावना के विरुद्ध है। यह प्रस्ताव केवल राजनीतिक समर्थन नहीं था। यह भारतीय लोकतांत्रिक मूल्यों की घोषणा थी। कांग्रेस ने पहली बार इतने स्पष्ट शब्दों में कहा कि जनता के प्रतिनिधियों की सरकार पर औपनिवेशिक नौकरशाही का नियंत्रण स्वीकार नहीं किया जा सकता। महात्मा गांधी और सुभाषचंद्र बोस के स्वर भी एक थे। इसलिए इसका प्रभाव भी औपनिवेशिक सत्ता के लिए भयावह और थर्रा देने वाला था। ब्रिटिश सत्ता झुकी, सिद्धांत जीता देशभर में बढ़ते जनमत, गांधी के हस्तक्षेप, बोस की अध्यक्षता में हरिपुरा अधिवेशन के समर्थन और बिहार मंत्रिमंडल की अडिग संवैधानिक स्थिति ने अंतत: परिस्थितियाँ बदल दीं। 26 फरवरी 1938 को बिहार के गवर्नर मॉरिस गार्नियर हैलेट और श्रीकृष्ण सिंह के बीच समझौता हुआ। राजनीतिक बंदियों के मामलों की समीक्षा का निर्णय लिया गया। उनकी रिहाई का मार्ग प्रशस्त हुआ। कांग्रेस मंत्रिमंडल ने पुन: कार्यभार संभाल लिया। यह किसी एक पक्ष की पूर्ण राजनीतिक विजय नहीं थी, लेकिन यह भारतीय संवैधानिक मूल्यों की नैतिक विजय अवश्य थी। औपनिवेशिक शासन को पहली बार यह स्वीकार करना पड़ा कि जनता द्वारा चुनी गई सरकार की उपेक्षा करके लंबे समय तक शासन नहीं चलाया जा सकता। हजारीबाग जेल की यह भूख हड़ताल केवल बारह बंदियों की कहानी नहीं है। यह भारतीय लोकतंत्र के निर्माण की कहानी है, जिसने दिखाया कि नैतिक शक्ति, जनमत और संवैधानिक प्रतिबद्धता मिलकर सबसे शक्तिशाली सत्ता को भी अपने निर्णयों पर पुनर्विचार करने के लिए विवश कर सकती है। यह भी कि स्वतंत्र भारत की लोकतांत्रिक चेतना की लौ जेलों की अँधेरी कोठरियों में भी जली थी। यह भी कि जब भी तिरंगा लहराए, हजारीबाग जेल की उन कोठरियों को भी याद किया जाए, जहाँ भूख से क्षीण होते शरीरों ने साम्राज्य की शक्ति को नहीं, उसकी नैतिकता को चुनौती दी थी। इतिहास में ऐसे क्षण कम आते हैं, जब भूख हथियार बनती है, नैतिकता शक्ति बनती है और जेल की एक कोठरी पूरे साम्राज्य की राजनीति बदल देती है। और इतिहास साक्षी है, साम्राज्य पहले अपनी नैतिक वैधता खोते हैं, उसके बाद अपना राजनीतिक प्रभुत्व। (डॉ. पाण्डेय प्रोफेसर, क्षेत्रीय इतिहास के अध्येता-शोधकर्ता और दर्जन भर पुस्तकों के लेखक हैं।)

सान्निध्य, आशीर्वाद और वरदान...
Published / 2026-08-10 21:29:41
सान्निध्य, आशीर्वाद और वरदान...

त्रिवेणी दास एबीएन एडिटोरियल डेस्क। सामान्य जीवन में गुरु, माता-पिता एवं ईस्ट देवी देवता भगवान की कृपा, आशीर्वाद तथा वरदान की आकांक्षा सभी को रहती है; यहां तक कि सांसारिक जीवन में किसी उच्च शक्तिशाली व्यक्ति की कृपापात्र बनने की अपने-अपने नफा नुकसान के गणित से प्रयास किया जाता है।  प्रश्न है कि भौतिक अथवा आध्यात्मिक आशीर्वाद एवं वरदान प्राप्त करने के लिए क्या किया जाये। सबसे पहले तो किसी बड़े अधिकारी/पदाधिकारी के पास जाना होता है। तीर्थ स्थान मंदिर देवालय जाने के पीछे का उद्देश्य नजदीक पहुंचना ही होता है। सान्निध्य बनाये बिना आदान-प्रदान की क्रिया असंभव तो नहीं है लेकिन सरल भी नहीं है।  प्रकृति के प्रत्येक अवयव का एक अपना विशेष प्रभाव मंडल एवं प्रभाव होता है जिसकी अनुभूति उसके सानिध्य में आने के उपरांत ही हो पता है। समुद्र एवं नदी का अपना-अपना प्रभाव मंडल होता है जिसकी अनुभूति तभी प्राप्त की जा सकती है जब उनके नजदीक में जाया जाये, इसी प्रकार गांव शहर जंगल पहाड़ इत्यादि इत्यादि के अपने-अपने विशेष प्रभा मंडल होते हैं और उसका प्रभाव पानी के लिए उनके आसपास होना आवश्यक होता है।  गुरु माता-पिता एवं ईश्वर का आशीर्वाद एवं वरदान प्राप्त करने के लिए उनका सान्निध्य नितांत आवश्यक है। दूर-दूर से काम नहीं बनने वाला है। अपनी चेतना भावना संवेदना बुद्धि विवेक श्रद्धा भक्ति विश्वास; अपने निवेदन एवं प्रार्थना में व्यापक करना पड़ता है। यही तो तप एवं तपस्या है, और सबको सामान्य रूप से पता होता है कि भोजन बनाने के लिए अनाज एवं सब्जी को अग्नि में पकाना पड़ता है। आजकल अनुग्रह प्राप्त करने के लिए तरह-तरह के ड्रामा और नौटंकी किये जाते हैं जिनका फल-प्रतिफल और परिणाम नहीं प्राप्त होने से आस्था एवं विश्वास टूट जाते हैं।  पहले सान्निध्य बनाया जाये, समर्पण प्रस्तुत किया जाए, निवेदन एवं प्रार्थना अर्पित किया जाए तो किसी का भी आशीर्वाद एवं वरदान प्राप्त किया जा सकता है.. और इसके लिए प्रथम एवं अंतिम शर्त यही होता है कि अपनी पात्रता को विकसित किया जाये। हर-हर महादेव...

क्या मिलावटी भोजन के विरुद्ध महाराष्ट्र के नक्शे कदम पर चलेंगे बिहार-झारखंड!
Published / 2026-08-05 19:56:33
क्या मिलावटी भोजन के विरुद्ध महाराष्ट्र के नक्शे कदम पर चलेंगे बिहार-झारखंड!

महाराष्ट्र का निर्णय एक चेतावनी: क्या झारखंड और बिहार भी मिलावटी भोजन के विरुद्ध निर्णायक कदम उठायेंगे? शिवाजी क्रांति एबीएन एडिटोरियल डेस्क। जैसा अन्न, वैसा मन- भारतीय संस्कृति का यह कथन केवल आध्यात्मिक संदेश नहीं, बल्कि स्वस्थ समाज की आधारशिला है। यदि भोजन ही मिलावटी, भ्रामक और निम्न गुणवत्ता का हो जाये तो उसका दुष्प्रभाव केवल व्यक्ति के शरीर तक सीमित नहीं रहता, बल्कि पूरे समाज के स्वास्थ्य, अर्थव्यवस्था और आने वाली पीढ़ियों पर पड़ता है। हाल ही में महाराष्ट्र सरकार ने उपभोक्ताओं के स्वास्थ्य की सुरक्षा को प्राथमिकता देते हुए एक महत्वपूर्ण निर्णय लिया। राज्य में एनालॉग (नॉन-डेयरी) पनीर के निर्माण, भंडारण, परिवहन, वितरण और बिक्री पर एक वर्ष का प्रतिबंध लगाया गया। यह निर्णय तब लिया गया जब जांच में ऐसे उत्पादों के उपयोग और गुणवत्ता को लेकर गंभीर चिंताएं सामने आयीं। इस कदम ने पूरे देश में यह संदेश दिया है कि यदि सरकार इच्छाशक्ति दिखाये तो खाद्य मिलावट और उपभोक्ता को भ्रमित करने वाली प्रवृत्तियों पर प्रभावी अंकुश लगाया जा सकता है। अब प्रश्न केवल महाराष्ट्र का नहीं है। प्रश्न यह है कि क्या झारखंड और बिहार जैसे राज्य भी उपभोक्ताओं के स्वास्थ्य की रक्षा के लिए ऐसी ही स्पष्ट और कठोर नीति अपनायेंगे? आज शहरों से लेकर कस्बों तक भोजन का बड़ा हिस्सा होटल, रेस्टोरेंट, ढाबों, मिठाई दुकानों, बेकरी और आॅनलाइन फूड डिलीवरी के माध्यम से लोगों तक पहुंच रहा है। उपभोक्ता स्वाद, सुविधा और समय बचाने के लिए इन पर निर्भर हो गया है। लेकिन क्या उसे यह पता है कि उसकी थाली में परोसा गया पनीर वास्तव में दूध से बना है या किसी वनस्पति वसा और रसायनों से तैयार एनालॉग उत्पाद? क्या उसे बताया जाता है कि मिठाई में शुद्ध खोया है या कृत्रिम मिश्रण? क्या मसाले, तेल और घी वास्तव में वही हैं जो उनके नाम से बेचे जा रहे हैं? दुर्भाग्य से अधिकांश मामलों में उत्तर नहीं है। छिपे हुए किचन और अदृश्य खतरे उपभोक्ता किसी होटल या रेस्टोरेंट का सजा-धजा भोजन कक्ष देखता है, लेकिन उसका किचन नहीं देख पाता। अधिकांश रसोईघर आम जनता के लिए पूरी तरह बंद रहते हैं। भोजन किन परिस्थितियों में तैयार हो रहा है, किस प्रकार का तेल बार-बार उपयोग हो रहा है, कच्चे माल की गुणवत्ता क्या है, सफाई का स्तर कैसा है—इन सबकी जानकारी उपभोक्ता के पास नहीं होती। यही वह जगह है जहां उपभोक्ता और विक्रेता के बीच सबसे बड़ी सूचना-असमानता पैदा होती है। उपभोक्ता विश्वास के आधार पर भोजन खरीदता है, जबकि उसके पास गुणवत्ता की स्वतंत्र जांच का कोई साधन नहीं होता। मिलावट केवल धोखा नहीं, सार्वजनिक स्वास्थ्य का संकट अक्सर खाद्य मिलावट को केवल आर्थिक अपराध माना जाता है, जबकि इसका प्रभाव कहीं अधिक व्यापक है। घटिया तेल, कृत्रिम रंग, सिंथेटिक दूध, नकली मसाले, मिलावटी घी और निम्न गुणवत्ता के खाद्य पदार्थ अनेक गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं का कारण बन सकते हैं। इनके कारण पाचन संबंधी रोगों से लेकर दीर्घकालिक स्वास्थ्य समस्याओं तक का जोखिम बढ़ सकता है। सबसे चिंताजनक स्थिति तब होती है जब उपभोक्ता को यह भी नहीं बताया जाता कि वह जो पनीर समझकर खा रहा है, वह वास्तव में पारंपरिक डेयरी पनीर नहीं है। यदि किसी उत्पाद का स्वरूप, नाम या प्रस्तुति उपभोक्ता को भ्रमित करती है, तो यह केवल व्यापारिक नैतिकता का प्रश्न नहीं, बल्कि उपभोक्ता के सूचना के अधिकार का भी उल्लंघन है। झारखंड और बिहार में स्थिति पर गंभीर विमर्श की आवश्यकता झारखंड और बिहार में समय-समय पर दूध, खोया, पनीर, मिठाइयों, सरसों तेल, मसालों तथा अन्य खाद्य पदार्थों में मिलावट के मामले सामने आते रहे हैं। त्योहारों के समय प्रशासन द्वारा छापेमारी भी होती है और नमूने लिए जाते हैं। लेकिन प्रश्न यह है कि क्या यह कार्रवाई पूरे वर्ष समान गंभीरता से चलती है? क्या प्रत्येक जिले में पर्याप्त खाद्य सुरक्षा अधिकारी हैं? क्या खाद्य परीक्षण प्रयोगशालाएं आधुनिक और पर्याप्त क्षमता वाली हैं? क्या दोषियों को समयबद्ध दंड मिलता है? क्या उपभोक्ताओं को जांच के परिणाम नियमित रूप से सार्वजनिक रूप से उपलब्ध कराये जाते हैं? इन प्रश्नों के संतोषजनक उत्तर आज भी तलाशे जाने बाकी हैं। केवल छापेमारी नहीं, व्यवस्था में सुधार चाहिए खाद्य सुरक्षा केवल त्योहारों के दौरान अभियान चलाने से सुनिश्चित नहीं होगी। इसके लिए स्थायी व्यवस्था विकसित करनी होगी। रेस्टोरेंट और होटल उद्योग में ओपन किचन जैसी अवधारणाओं को प्रोत्साहन मिलना चाहिए, जहां उपभोक्ता भोजन बनने की प्रक्रिया देख सके। जहां यह संभव न हो, वहां नियमित निरीक्षण, डिजिटल रिकॉर्ड, स्वच्छता रेटिंग और निरीक्षण रिपोर्ट सार्वजनिक करने जैसी व्यवस्थाएं लागू की जा सकती हैं। भोजन की गुणवत्ता से जुड़ी जानकारी उपभोक्ता के लिए उतनी ही सहज उपलब्ध होनी चाहिए जितनी किसी पैक्ड खाद्य पदार्थ पर सामग्री और पोषण संबंधी जानकारी उपलब्ध होती है। कानून का भय आवश्यक है खाद्य मिलावट से होने वाला लाभ यदि दंड से अधिक होगा तो यह अपराध चलता रहेगा। इसलिए केवल जुर्माना पर्याप्त नहीं है। जानबूझकर मिलावट करने, नकली खाद्य पदार्थ बेचने या उपभोक्ता को भ्रमित करने वाले मामलों में कठोर दंड, लाइसेंस निरस्तीकरण और त्वरित न्यायिक प्रक्रिया आवश्यक है। महाराष्ट्र का निर्णय इस दिशा में एक महत्वपूर्ण संदेश देता है कि सरकारें केवल सलाह जारी करने तक सीमित न रहें, बल्कि आवश्यकता पड़ने पर निर्णायक प्रशासनिक कदम भी उठायें। केंद्र और राज्यों की साझा जिम्मेदारी खाद्य सुरक्षा एक ऐसा विषय है जिसमें केंद्र सरकार, भारतीय खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण, राज्य सरकारें, स्थानीय निकाय और जिला प्रशासन सभी की भूमिका महत्वपूर्ण है। यदि विभिन्न राज्यों में अलग-अलग स्तर की निगरानी होगी तो मिलावटी उत्पाद एक राज्य से दूसरे राज्य में आसानी से पहुंच सकते हैं। इसलिए राष्ट्रीय स्तर पर समन्वित रणनीति आवश्यक है। इस रणनीति में आधुनिक प्रयोगशालाओं का विस्तार, त्वरित परीक्षण तकनीक, डिजिटल ट्रेसबिलिटी, नियमित सैंपलिंग, पारदर्शी रिपोर्टिंग और राज्यों के बीच सूचनाओं का आदान-प्रदान शामिल होना चाहिए। सामाजिक संगठनों की भागीदारी भी आवश्यक खाद्य सुरक्षा केवल सरकारी विभागों की जिम्मेदारी नहीं है। उपभोक्ता संगठन, सामाजिक संस्थाएं, व्यापारी संगठन, शिक्षण संस्थान, चिकित्सक और जागरूक नागरिक भी इस अभियान के महत्वपूर्ण भागीदार हैं। अखिल भारतीय ग्राहक पंचायत जैसे संगठन वर्षों से उपभोक्ता जागरण और व्यवस्था सुधार का कार्य कर रहे हैं। यदि सरकार ऐसे संगठनों को विश्वास में लेकर जिला और राज्य स्तर पर संयुक्त जागरूकता अभियान चलाए, शिकायत निवारण तंत्र को मजबूत करे तथा निरीक्षण प्रक्रियाओं में सामाजिक सहभागिता सुनिश्चित करे, तो इसका सकारात्मक प्रभाव अधिक व्यापक होगा। उपभोक्ता भी अपनी भूमिका निभायें जागरूक उपभोक्ता ही सबसे बड़ा प्रहरी है। बिना बिल के खरीदारी, संदिग्ध रूप से सस्ते खाद्य पदार्थ, अत्यधिक चमकीले रंग, असामान्य स्वाद या गुणवत्ता पर संदेह होने पर शिकायत दर्ज कराना नागरिक जिम्मेदारी भी है। यदि समाज मिलावट को सामान्य बात मानकर स्वीकार करता रहेगा तो यह समस्या कभी समाप्त नहीं होगी। समय की मांग महाराष्ट्र का निर्णय केवल एक राज्य का प्रशासनिक आदेश नहीं, बल्कि पूरे देश के लिए एक चेतावनी है। आज आवश्यकता है कि झारखंड, बिहार सहित सभी राज्य खाद्य सुरक्षा को केवल औपचारिक निरीक्षण का विषय न मानें, बल्कि इसे जनस्वास्थ्य और उपभोक्ता अधिकारों के केंद्र में रखें। हर नागरिक को यह अधिकार है कि उसकी थाली में परोसा गया भोजन शुद्ध, सुरक्षित और सही जानकारी के साथ उपलब्ध हो। भोजन में ईमानदारी केवल व्यापारिक नैतिकता नहीं, बल्कि संवैधानिक मूल्यों, उपभोक्ता अधिकारों और सार्वजनिक स्वास्थ्य के प्रति उत्तरदायित्व का प्रश्न है। यदि केंद्र सरकार, राज्य सरकारें, स्थानीय प्रशासन, सामाजिक संगठन, व्यापारी और जागरूक नागरिक मिलकर राष्ट्रीय स्तर पर मिलावट मुक्त भारत का अभियान चलायें, तो वह दिन दूर नहीं जब उपभोक्ता भय नहीं, बल्कि विश्वास के साथ भोजन करेगा। अब समय आ गया है कि झारखंड और बिहार भी स्वयं से यह प्रश्न पूछें- क्या हम केवल मिलावट पकड़ने की प्रतीक्षा करेंगे, या महाराष्ट्र की तरह साहसिक निर्णय लेकर अपने नागरिकों के स्वास्थ्य की रक्षा के लिए ठोस कदम उठायेंगे? इस प्रश्न का उत्तर केवल सरकारों को नहीं, पूरे समाज को मिलकर देना होगा। क्योंकि ग्राहक रहेगा मौन तो उसकी सुनेगा कौन?  (लेखक शिवाजी क्रांति : अखिल भारतीय ग्राहक पंचायत के क्षेत्रीय बिहार, झारखंड के संगठन मंत्री हैं।)

परिपक्व हो गया लोकतंत्र ...
Published / 2026-08-04 12:38:37
परिपक्व हो गया लोकतंत्र ...

त्रिवेणी दासपरिपक्व हो गया लोकतंत्र जनता समझदार हो गई,राजनीति की सूझ बूझ अबउसकी अरदार हो गईलोकतंत्र के ताने-बाने में कीर्तिमान टूट जाते हैं बनाने वाले कीर्तिमान पीछे छूट जाते हैं ,जिन्हें टूटा कहा जाता थाकीर्तिमान बन जाते हैंस्टार प्रचारक काम न आए जनता के मन में न भाए जात पात सब मिट गया ,बांकीपुर में देखो भाई पांडेय प्रशांत किशोर जीत गया। 

Newsletter

Subscribe to our website and get the latest updates straight to your inbox.

We do not share your information.

Tranding