विचार

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Published / 2026-03-27 21:01:03
राहुल गांधी की एक ही चाल, हम नहीं सुधरेंगे...

त्रिवेणी दास 

एबीएन एडिटोरियल डेस्क। इस समय भारतीय लोकतांत्रिक व्यवस्था में कांग्रेस मुख्य विपक्ष की भूमिका में है। कांग्रेस के नेता राहुल गांधी लीडर आॅफ अपोजिशन के पद पर विराजमान हैं। वर्तमान कांग्रेस के प्रकृति में लगता है कि राष्ट्रीय संकट के समय रचनात्मक सहयोग जैसा कोई वस्तु है ही नहीं।  

अमेरिका-इजरायल तथा ईरान के बीच चल रहे युद्ध के कारण ऊर्जा के कच्चा तेल एवं प्राकृतिक गैस की आपूर्ति चैनल में रुकावट पैदा हुई है जिसका प्रभाव भारत समेत दुनिया भर में दिखाई दे रहा है।  आरंभ से ही कांग्रेस मोदीजी की सरकार के ऊपर हमलावर है, जैसे इस युद्ध के कारण उत्पन्न स्थिति में भारत की भी कोई भूमिका है।

ईरान भारत को अपना मित्र देश बात कर होर्मूज जल मार्ग से भारतीय जहाज को निकलने दे रहा है। 60 दिनों तक के लिए भारत के पास ऊर्जा का संग्रहण है। दुनिया के कई देशों में तेल का राशनिंग किया गया है जबकि भारत में सब कुछ सामान्य स्वरूप में चल रहा है।  सर्वदलीय बैठक में कांग्रेस जाएगी नहीं, समस्या से निपटने के लिए कोई सुझाव देगी नहीं और देश को घबराहट की स्थिति में लाने के लिए उल्टा सीधा बयान देगी।  

सच पूछा जाए तो इस समय पूरे देश  को एकजुट रहना राष्ट्रीय हित में आवश्यक है। प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने आह्वान किया है कि सभी राज्य सरकारों को केंद्र सरकार के साथ मिलकर टीम इंडिया की तरह काम करना होगा और इसी क्रम में आज मोदी जी सभी मुख्यमंत्री से संवाद करने वाले हैं। 

लोहरदगा में पैनिक जैसा कुछ नहीं दिखाई दे रहा है। आवश्यक ऊर्जा की आपूर्ति सामान्य स्वरूप में चल रही है। अगर किन्हीं को दिखाई नहीं दे रहा है तो उन्हें अपनी दृष्टिदोष का उपचार कराना चाहिए...

Published / 2026-03-20 21:57:13
मोदी जी अपनी ताकत का सही इस्तेमाल करते हैं...

त्रिवेणी दास 

एबीएन एडिटोरियल डेस्क। सांसारिक व्यवस्था में हर कोई शक्तिशाली बनना चाहता है। पैसे की ताकत, पद की ताकत और प्रतिष्ठा की ताकत पाने की इच्छा सभी की होती है; बहुत लोग की इच्छा पूरी भी होती है, परंतु विरले लोग ही अपनी ताकत का इस्तेमाल सही समय, सही दिशा और सही तरीका से कर पाते हैं।  

7 अक्टूबर 2001 को उन्होंने पहली बार गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ग्रहण किया था और 26 मई 2014 को उन्होंने प्रथम बार देश के प्रधानमंत्री के रूप में शपथ लिया था, तब से लेकर आज तक लगभग 25 वर्षों से वे शासनाध्यक्ष के स्वरूप में पावरफुल रहे हैं और अपनी पावर का प्रयोग देश हित और जनहित में करते चले आ रहे हैं। 

आलोचना, विरोध तथा दुष्प्रचार राजनीति का आवश्यक अंग है, जिसका सामना लगातार मोदीजी भी करते चले आ रहे हैं; लेकिन वह अपने मुख्य उद्देश्य से कभी विचलित हुए नहीं हैं जो किसी भी शक्तिशाली मानव के लिए कोई सरल बात नहीं है। 

पद-पावर-प्रतिष्ठा के उचित नियोजन के लिए सामान्य व्यक्तित्व काफी नहीं होता है, इसके लिए तो प्रखर, संवेदनशील, दृढ़निश्चयी, निडर तथा अपने संगठन के लिए अडिग सिद्धांतवादी व्यक्तित्व चाहिए जिसे हमारे यशस्वी प्रधानमंत्री ने अपने संघर्ष के बल पर प्राप्त किया है और जिसके आधार पर वे नित नए-नए सफलता के इतिहास गढ़ रहे हैं।

Published / 2026-03-19 21:02:14
पीएम की कार्यक्षमता की एक जिज्ञासा...

त्रिवेणी दास 

एबीएन एडिटोरियल डेस्क। शिवकुमार तिवारी वाराणसी गदोलिया के रहने वाले मेरे रिश्तेदार के घर मैं अतिथि स्वरूप रात्रि में रुका हुआ था। उसी दिन संध्या वहां से सांसद नरेंद्र मोदी तीन दिवसीय अपने चुनाव क्षेत्र में प्रवास के बाद वापस दिल्ली लौटे थे।  

मेरे रिश्तेदार तिवारी जी बताने लगे कि मोदी जी लगातार तीन दिनों से बनारस में रैली कर रहे थे। प्रतिदिन लगातार 14 घंटे का व्यस्ततम कार्यक्रम (भाषण, दर्शन, बयान, कार्यकर्ताओं से मिलना और अभिवादन स्वीकार करना, प्रशासनिक पदाधिकारियों से विमर्श) प्रात: उनकी व्यक्तिगत दिनचर्या के पश्चात पुन: वही परिश्रम वही व्यस्तता। 

तिवारी जी की जिज्ञासा थी कि मोदी जी किस मिट्टी के बने हुए हैं; न थकते हैं न रुकते हैं और न ही धैर्य खोते हैं। रोज 18 घंटे काम करना, पैसे के लिए नहीं, खानदान के लिए नहीं; मात्र अपने देश के लिए उनका हर एक पल समर्पित होता है। 

तिवारी जी कल्पना कर रहे थे कि अभी रात में मोदी जी अपने निवास स्थान दिल्ली पहुंचेंगे। थका मांदा, पूरे दिन भर के अनुभव, क्रिया प्रतिक्रिया का मन में बोझ, दुनिया भर की चिंता लिए निर्जीव मशीन की तरह काम करते भावहीन कर्मचारियों के बीच एकदम अकेला... लोग बताते हैं कि मोदी जी केवल चार घंटे की ही नींद लेते हैं। 

कोई सुधि लेने वाला आसपास नहीं। राजनीति का क्रूर, कठोर और भावहीन मार्ग, चाटूकार और स्वार्थी लोगों का जमावड़ा, विरोधियों की गाली, बद्दुआ, हाय, श्राप सब कुछ सहते झेलते मां भारती के सेवा में अनवरत व्रतधारी। 

तिवारी जी ने मुझसे पूछा है कि मोदी जी का जीवन तो बहुत रूखा-सूखा होगा? अब मेरे बोलने की बारी थी। मैंने कहा कि जिस व्यक्ति के साथ 144 करोड़ देशवासियों की सहानुभूति हो, समर्थन हो, आशीर्वाद हो और जिसके जीवन का आधार आध्यात्मिक हो; उसका जीवन रूखा-सूखा कैसे हो सकता है? कर्त्तव्य पथ का राही असंतुष्ट कैसे रह सकता है? 

मोदी जी का अपना व्यक्तिगत जीवन अनेक रंगों से भरा हुआ है। संतुष्टि एवं आनंद में मग्न रहते हैं। यह अलग बात है कि राजनीतिक विषयों एवं राष्ट्रीय हित के विषय पर नीतिगत अत्यंत कठोर निर्णय लेते हुए उसका अनुपालन भी करते/कराते हैं। अंत में हम और तिवारी जी इस बात से सहमत हो गये कि विभूतियों का मूल्यांकन एवं आकलन हम दोनों के सामर्थ्य से बाहर की विषय-वस्तु है। (लेखक स्वतंत्र स्तंभकार हैं। ये उनके निजी विचार हैं।)

Published / 2026-03-17 19:51:21
महिला होने का प्रिविलेज और सामाजिक संतुलन की आवश्यकता

डॉ दीपक प्रसाद  

एबीएन एडिटोरियल डेस्क। भारतीय समाज में नारी को सदैव अत्यंत सम्मान की दृष्टि से देखा गया है। हमारे धर्मग्रंथों और सांस्कृतिक परंपराओं में नारी को केवल व्यक्ति नहीं, बल्कि शक्ति, सृजन और करुणा का प्रतीक माना गया है। वैदिक वचन यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता: अर्थात जहां नारी का सम्मान होता है वहां देवताओं का वास होता है। भारतीय संस्कृति की मूल भावना को स्पष्ट करता है। इसी आदर्श के कारण भारतीय समाज में नारी को मातृशक्ति के रूप में प्रतिष्ठित किया गया। 

परंतु आधुनिक सामाजिक विमर्श में एक नया प्रश्न उठ रहा है, क्या महिलाओं को दिए गए अधिकारों और संरक्षण का कहीं-कहीं दुरुपयोग भी हो रहा है? क्या समानता की यात्रा में कभी-कभी असंतुलन की स्थिति भी बन जाती है? यह प्रश्न इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि न्याय और अधिकार का उद्देश्य किसी एक वर्ग को विशेषाधिकार देना नहीं, बल्कि समाज में संतुलन स्थापित करना है। 

भारतीय धर्मग्रंथों में नारी के अनेक महान और प्रेरणादायी रूप मिलते हैं। सीता का त्याग और धैर्य, सावित्री का सत्यवान के लिए यमराज से संघर्ष, गर्गी और मैत्रेयी का वैदिक ज्ञान में योगदान, ये उदाहरण बताते हैं कि भारतीय संस्कृति में नारी केवल परिवार का हिस्सा नहीं, बल्कि ज्ञान, शक्ति और नीति की धुरी रही है। साथ ही हमारे ग्रंथ यह भी बताते हैं कि मनुष्य चाहे वह पुरुष हो या स्त्री पूर्णत: त्रुटिहीन नहीं होता। 

उदाहरण के लिए: कैकेयी द्वारा वरदान के कारण रामायण में भगवान राम को वनवास जाना पड़ा। मंथरा की कुटिल सलाह ने भी उस घटना को जन्म दिया। शूर्पणखा की घटना ने आगे चलकर युद्ध की पृष्ठभूमि तैयार की। महाभारत में गांधारी का पुत्रमोह और कुंती के जीवन के निर्णय कई जटिल परिस्थितियों को जन्म देते हैं। 

इन उदाहरणों का उद्देश्य किसी स्त्री को दोषी ठहराना नहीं है, बल्कि यह दिखाना है कि मनुष्य के चरित्र में अच्छाई और दुर्बलता दोनों हो सकती हैं चाहे वह पुरुष हो या स्त्री। इतिहास के लंबे कालखंड में महिलाओं ने अनेक सामाजिक अन्याय झेले हैं शिक्षा से वंचित रहना, संपत्ति अधिकार का अभाव, बाल विवाह, दहेज प्रथा, घरेलू हिंसा आदि। 

इन परिस्थितियों को सुधारने के लिए आधुनिक भारत में कई कानून बनाये गये जैसे घरेलू हिंसा से संरक्षण कानून, कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न से सुरक्षा, दहेज निषेध कानून इत्यादि इन कानूनों का उद्देश्य महिलाओं को सुरक्षा देना और उन्हें समान अवसर प्रदान करना है। वास्तव में इन कानूनों ने लाखों महिलाओं को न्याय दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। सामाजिक यथार्थ यह भी बताता है कि कभी-कभी किसी भी कानून का दुरुपयोग संभव होता है। 

यह समस्या केवल महिला कानूनों तक सीमित नहीं है; लगभग हर कानून में ऐसा संभावित खतरा रहता है। कुछ मामलों में यह आरोप लगाया जाता है कि झूठे उत्पीड़न के मामले दर्ज किये जाते हैं, कार्यस्थल पर व्यक्तिगत मतभेद को कानूनी विवाद बना दिया जाता है। इस संदर्भ में न्यायालयों ने भी कई बार कहा है कि कानून का उपयोग न्याय के लिए होना चाहिए, प्रतिशोध के लिए नहीं। 

इसलिए आवश्यक है कि हर मामले की निष्पक्ष जांच हो और दोषी चाहे कोई भी हो—उसे दंड मिले। आज स्त्री-पुरुष दोनों ही समाज के हर क्षेत्र में साथ काम कर रहे हैं शिक्षा, प्रशासन, राजनीति, विज्ञान और उद्योग। यह सकारात्मक परिवर्तन है। लेकिन कभी-कभी संवाद की कमी, पूर्वाग्रह या असुरक्षा की भावना के कारण संबंध तनावपूर्ण हो सकते हैं। 

यदि किसी महिला अधिकारी के अधीन पुरुष कर्मचारी काम करते हैं या इसके उलट स्थिति होती है, तो भी परस्पर सम्मान और पेशेवर आचरण अत्यंत आवश्यक है। समाधान का मार्ग यह है कि कार्यस्थलों पर स्पष्ट नियम, पारदर्शिता और संवाद की संस्कृति विकसित हो। समाज में यह चर्चा भी बढ़ रही है कि कुछ मामलों में पुरुष भी मानसिक, सामाजिक या पारिवारिक उत्पीड़न का सामना करते हैं। 

इसलिए कई विशेषज्ञ यह सुझाव देते हैं कि पारिवारिक विवादों में लैंगिक-निरपेक्ष कानून पर विचार हो, पुरुषों की मानसिक स्वास्थ्य और पारिवारिक समस्याओं पर भी विमर्श हो, सहायता और परामर्श केंद्र सभी के लिए उपलब्ध हों। दुनिया के कई देशों में पुरुषों की समस्याओं पर भी संस्थागत चर्चा शुरू हो चुकी है। 

भारत में भी इस विषय पर संतुलित और संवेदनशील संवाद की आवश्यकता है। समाज को यह समझना होगा कि स्त्री और पुरुष एक-दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि पूरक हैं। भारतीय दर्शन में अर्धनारीश्वर की अवधारणा यही बताती है कि सृष्टि का संतुलन स्त्री-पुरुष के सामंजस्य से ही संभव है। इसलिए समाधान किसी एक पक्ष को दोषी ठहराने में नहीं, बल्कि संतुलन स्थापित करने में है। 

महिलाओं को सम्मान और सुरक्षा मिलनी चाहिए। पुरुषों के अधिकार और समस्याएं भी सुनी जानी चाहिए। कानून का उद्देश्य न्याय हो, विशेषाधिकार नहीं। समाज में संवाद और पारस्परिक विश्वास का वातावरण बने। नारी शक्ति का सम्मान भारतीय संस्कृति की आत्मा है। परंतु सम्मान और अधिकार तभी सार्थक होते हैं जब वे न्याय और संतुलन के साथ जुड़े हों। 

यदि किसी भी स्तर पर अधिकार का दुरुपयोग होता है चाहे वह पुरुष द्वारा हो या स्त्री द्वारा तो समाज को निष्पक्ष दृष्टि से उसका समाधान करना चाहिए। समानता का अर्थ प्रतिस्पर्धा नहीं, बल्कि सहयोग है। स्त्री और पुरुष दोनों जब एक-दूसरे के सम्मान, अधिकार और गरिमा को स्वीकार करेंगे तभी एक स्वस्थ, न्यायपूर्ण और संतुलित समाज का निर्माण संभव होगा। (लेखक सांस्कृतिक शोधकर्ता, रंगनिर्देशक, असिस्टेंट प्रोफेसर और स्वतंत्र स्तंभकार हैं। ये उनके निजी विचार हैं।) 

Published / 2026-03-17 19:45:18
नवरात्रि : शक्ति की उपासना का पर्व

मीरा जगनानी 

एबीएन एडिटोरियल डेस्क। नवरात्रि एक महत्वपूर्ण हिंदू त्योहार है, जो मां दुर्गा के नौ रूपों की पूजा के लिए मनाया जाता है। यह पर्व शक्ति की उपासना का प्रतीक है और इसमें मां दुर्गा के नौ रूपों- शैलपुत्री, ब्रह्मचारिणी, चंद्रघंटा, कूष्मांडा, स्कंदमाता, कात्यायनी, कालरात्रि, महागौरी और सिद्धिदात्री की पूजा की जाती है। 

प्रथम दिन: मां शैलपुत्री 

मां शैलपुत्री का स्वरूप चंद्रमा ग्रह से जुड़ा हुआ है। मां के इस रूप की पूजा कर मन को स्थिर करना सीखते हैं। मंत्र: ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे। 

द्वितीय दिन: मां ब्रह्मचारिणी 

मां ब्रह्मचारिणी का स्वरूप मंगल ग्रह से जुड़ा हुआ है। अनुशासन का हमारे जीवन में क्या महत्व है, मां हमें सिखलाती है। मंत्र: विद्यावन्तं यशस्वन्तं लक्ष्मीवन्तं जनं कुरु। रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ।। 

तृतीय दिन: मां चंद्रघंटा 

मां चंद्रघंटा का स्वरूप शुक्र ग्रह से जुड़ा हुआ है। इस दिन खूब सुंदर से तैयार होकर पूजा के लिए बैठना चाहिए। मंत्र: दारिर्द्यदु:खभयहारिणी का त्वदन्या, सर्वोपकारकरणाय सदाऽऽर्द्रचित्ता। इस दिन किये जाने वाले उपाय -  हरसिंगार के पेड़ की पूजा करें। मां से त्रृण मुक्ति के लिए प्रार्थना करें। पेड़ की जड़ अपने पास संभाल कर रखें। तीन गोमती चक्र लें। मिट्टी मे गड्डा करके इन्हें दबाना है। जिस जगह भी जातक खड़ा है, वहां के दक्षिण दिशा की ओर दबाना है। ऋण मुक्ति के लिए मां को याद करें। जिस चीज से गड्डा किए हैं , उसे भी वहीं छोड़ देना है।  

चतुर्थ दिन: मां कूष्मांडा 

मां कूष्मांडा का स्वरूप सूर्य और गुरु ग्रह से जुड़ा हुआ है। पीले कपड़े धारण करके एकाग्रचित होकर मंत्र पाठ करना अच्छा रहता है। मंत्र : ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं कमले कमलालये प्रसीद प्रसीद, श्रीं ह्रीं श्रीं महालक्ष्म्यै नम:। चतुर्थी को किये जाने योग्य धनदायक उपाय- एक पान का पत्ता लीजिए उस पर गुलाब की पांच या सात पंखुड़ियां रखें और फिर मां दुर्गा को चढ़ायें। धन प्राप्ति के लिए प्रार्थना करें। 

पांचवां दिन: मां स्कंदमाता 

मां स्कंदमाता का स्वरूप बुध ग्रह से जुड़ा हुआ है। मां के पांचवें दिन किया जाने वाला उपाय- पंचमी तिथि के दिन पत्थर का एक छोटा सा टुकड़ा, थोड़ा सा दही और इत्र लेकर के बेलपत्र के पेड़ की पूजा करें। षष्ठी तिथि के दिन उसी बेलपत्र के पेड़ की छोटी-सी टहनी तोड़कर के घर लायें। मंत्र : सर्वाबाधाविनिर्मुक्तो धनधान्यसुतान्वित:। मनुष्यो मत्प्रसादेन भविष्यति न संशय:।। 

छठा दिन : मां कात्यायनी 

मां कात्यायनी का यह स्वरूप- जिन बच्चियों का विवाह नहीं हो रहा है और विवाह के लिए कोशिश की जा रही है वे नीचे दिए मंत्र का नियमित रूप से जाप करें। मंत्र: ॐ क्लीं कात्यायनी महामाये, महायोगिन्यधीश्वरि। नन्दगोपसुतं देवि पतिं मे देहि नम:।। 

सातवां दिन: मां कालरात्रि 

मां कालरात्रि का स्वरूप आरोग्य प्रदान करता है। यह स्वरूप हमें मां काली और शनि से जोड़ता है। हमें अपने अंदर के अंधकार को दूर करना सिखाता है। मंत्र: जय त्वं देवी चामुण्डे जय भूतार्तिहारिणी। जय सर्वगते देवि कालरात्रि नमोऽस्तु ते॥ 

आठवां दिन: मां महागौरी 

मां महागौरी का स्वरूप राहु और बुध ग्रह से जुड़ा हुआ है। इस दिन किया जाने वाला उपाय- सौ ग्राम धनिया चांदी या तांबे की कटोरी में डालकर मां के सामने रखें। मंत्र: ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे। ऊपर लिखे मंत्र का पाठ करके उन्हें सिद्ध कर अपने पास रखें। अगर किसी को डर लगता हो तो वह अपने पास में इस धनिया को रख सकता है। सोते समय अपने सिरहाने रख सकते हैं। घर के कोनों से नकारात्मकता दूर करने के लिए सिद्ध धनिया वहां डाल सकते हैं। व्यापारिक प्रतिष्ठान में रख सकते हैं। घर में राहू का प्रभाव ज्यादा लगे तब धनिया के दानों की छोटी-छोटी पोटलियां बनाकर घर मे,अलमारियों में रखें। 

नौवां दिन: मां सिद्धिदात्री 

मां सिद्धिदात्री का स्वरूप केतू से जुड़ा हुआ है । यह हमें मोक्ष प्राप्ति की ओर ले जाता है। इस दिन किया जाने वाला उपाय- पीले कागज पर लाल रंग से अपनी इच्छा लिखें। ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे। इस मंत्र का जाप करें। जब तक इच्छा पूरी ना हो जाए तब तक नियमित रूप से मां के सामने एक दिया जला कर, इस कागज को सामने रखकर मंत्र पाठ करें। इच्छा पूरी होने पर कागज जल प्रवाह कर दें। जल प्रवाह करने मे दिक्कत हो तो मंदिर मे मां के सामने रख दें। सभी मंत्र और उपाय बड़े कारगर हैं। पर हम केवल एक दिया जला कर श्रद्धापूर्वक पूरे मन से कुछ वक्त मां के साथ एकाग्रचित हो कर बिताएं, तब भी मां हम भक्तों की सुनती है। 

Published / 2026-03-16 15:27:02
कुछ लोगों को है रोने की लाइलाज बीमारी...

कुछ लोगों को है रोने की लाइलाज बीमारी...

त्रिवेणी दास

एबीएन एडिटोरियल डेस्क। LPG गैस सिलेंडर के नाम पर इन दिनों कुछ महान शख्सियत विधवा विलाप कर रहे हैं और जनता जनार्दन के नाम पर अपना सब कुछ न्योछावर कर देने के लिए उतावले हो रहे हैं। दूसरे देशों में युद्ध छिड़ा है तो भारत के लोगों का गैस के नाम पर रो-रोकर आंखें सूज गई है और हेल्थ का भयानक बुरा हाल हो गया है।

अब जाकर समझ में आ रहा है कि यदि ऑपरेशन सिंदूर दो-तीन महीना चल जाता तो भगवान जाने किस-किस चीज के लिए विधवा विलाप किया जाता।

अमेरिका, इजरायल, ईरान के बीच लड़ाई चल रही है। मिसाइल ड्रोन दागे जा रहे हैं तो ऐसे में मोदीजी क्या करें? क्या सेना लेकर कूद जाए कि हमारे किए तेल भेजो गैस भेजो क्योंकि हमारे लोगों को सिलेंडर सुलगा कर उसके ऊपर अपना सियासत सेंकना है।

जब भारत LPG का 60% हिस्सा खाड़ी देशों से आयात करता है और वहां युद्ध छिड़ा हुआ है तो हल्की-फुल्की क्राइसिस स्वाभाविक  होगा ही, मुनाफाखोर क्राइसिस को बढ़ावा देंगे ही, विपक्षी नेता इस क्राइसिस को मुद्दा बनाएंगे ही जनता लाइन लगाएगी ही सरकार लाख सफाई दे वस्तु स्थिति को क्लियर करे मगर जिनको दहाड़ें मारकर रोना है वह रोएंगे ही।

कुछ साल पहले दिल्ली के अफ़वाह उड़ी कि नमक खत्म होने वाली तो दिल्ली वालों की किराना की दुकानों पर लंबी लाइन में लग गई थी और 50-50 किलो नमक ख़रीदकर घरों में रख लिया गया था।

हमारी रोने की आदत है। हम नमक प्याज टमाटर के लिए रोने लगते हैं, कभी संविधान के लिए रोने लगते हैं, कभी संसद में नहीं बोलते देने के लिए रोने लगते हैं, आज LPG के लिए रो रहे हैं। जनता अपनी रोजमर्रा के लिए रोती है तो कुछ सत्ता में बने रहने के लिए रोते हैं तो कुछ सत्ता से दूर होने के कारण रोते रहते हैं। भारत नंबर एक आर्थिक प्रधान बन भी जाए तो भी रोतड़ू प्रधान ही रहेगा।

गैस के लिए कुछ लोगों ने पूरे देश को पैनिक मोड में लाकर खड़ा कर दिया है। याद है न कुछ वर्षों पहले एक सिलेंडर लेना लड़ाई जीतने जैसा एहसास देता था। मोदी जी ने आसान कर दिया जो अब उन्हीं पर भारी पड़ रहा है और कुछ लोग हैं कि होने के सारे रिकॉर्ड तोड़ रहे है।

Published / 2026-03-14 18:38:56
विश्व उपभोक्ता अधिकार दिवस : सुरक्षित उत्पाद, जागरूक उपभोक्ता और सामाजिक दायित्व

वेंकेटेश प्रभू 

एबीएन एडिटोरियल डेस्क। हर वर्ष 15 मार्च को पूरी दुनिया में विश्व उपभोक्ता अधिकार दिवस मनाया जाता है। यह दिवस आधुनिक आर्थिक व्यवस्था में उपभोक्ता की भूमिका और उसके अधिकारों की रक्षा के महत्व को रेखांकित करता है। इस दिवस की पृष्ठभूमि 1962 से जुड़ी है, जब अमेरिकी राष्ट्रपति जॉन एफ केनेडी ने अमेरिकी संसद में उपभोक्ताओं के चार मूल अधिकारों—सुरक्षा, जानकारी, विकल्प और सुने जाने के अधिकार—को स्पष्ट रूप से सामने रखा। बाद में वैश्विक उपभोक्ता आंदोलन ने इन सिद्धांतों को स्वीकार किया और 15 मार्च को उपभोक्ता अधिकार दिवस के रूप में मनाया जाने लगा। 

वर्ष 2026 के लिए वैश्विक उपभोक्ता आंदोलन की थीम है— Safe Products, Confident Consumers अर्थात सुरक्षित उत्पाद, आत्मविश्वासी उपभोक्ता। यह विषय वर्तमान समय की एक गंभीर चुनौती की ओर संकेत करता है। वैश्विक बाजार के विस्तार, डिजिटल व्यापार के तेजी से बढ़ने और उत्पादन के जटिल तंत्र के कारण आज उपभोक्ताओं के सामने अनेक नयी समस्याएं खड़ी हो गयी हैं। ऐसे में यह सुनिश्चित करना अत्यंत आवश्यक हो गया है कि बाजार में उपलब्ध उत्पाद सुरक्षित, मानक के अनुरूप और पारदर्शी जानकारी के साथ उपलब्ध हों। 

आज बाजार का स्वरूप पूरी तरह बदल चुका है। पहले उपभोक्ता स्थानीय दुकानों से सामान खरीदता था, जहां उत्पाद के बारे में प्रत्यक्ष जानकारी मिल जाती थी। लेकिन अब ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म, वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाएं और डिजिटल मार्केटिंग ने उपभोक्ता और उत्पादक के बीच दूरी बढ़ा दी है। उपभोक्ता कई बार ऐसे उत्पाद खरीद लेता है जिनकी गुणवत्ता, निर्माण प्रक्रिया या सुरक्षा मानकों के बारे में उसे सीमित जानकारी होती है। परिणामस्वरूप नकली उत्पाद, मिलावटी खाद्य पदार्थ, निम्न गुणवत्ता वाले उपकरण और भ्रामक विज्ञापनों की समस्या बढ़ती जा रही है। 

विश्व स्तर पर कई बार यह भी देखा गया है कि जिन उत्पादों को किसी देश में असुरक्षित मानकर वापस मंगाया जाता है, वे दूसरे देशों के बाजारों या आॅनलाइन प्लेटफॉर्मों पर फिर भी बिकते रहते हैं। इससे उपभोक्ता सुरक्षा पर गंभीर प्रश्न खड़े होते हैं। यही कारण है कि इस वर्ष की थीम उपभोक्ता सुरक्षा के प्रश्न को वैश्विक चर्चा के केंद्र में लाती है। 

भारत जैसे विशाल और विविधतापूर्ण बाजार में यह विषय और भी अधिक महत्वपूर्ण हो जाता है। यहां करोड़ों उपभोक्ता प्रतिदिन खाद्य पदार्थों, दवाओं, घरेलू उपकरणों और डिजिटल सेवाओं का उपयोग करते हैं। लेकिन कई बार उपभोक्ता को उत्पाद की वास्तविक गुणवत्ता, उचित मूल्य या उसके संभावित दुष्प्रभावों के बारे में सही जानकारी नहीं मिलती। मिलावटखोरी, गलत माप-तौल, नकली ब्रांड और भ्रामक विज्ञापन जैसी समस्याएं लंबे समय से उपभोक्ताओं को प्रभावित कर रही हैं। 

भारत में उपभोक्ता अधिकारों की रक्षा के लिए मजबूत कानूनी ढाँचा भी विकसित किया गया है। विशेष रूप से Consumer Protection Act 2019 2019 ने उपभोक्ताओं को कई महत्वपूर्ण अधिकार प्रदान किए हैं। इस कानून के माध्यम से ई-कॉमर्स प्लेटफार्मों की जवाबदेही, भ्रामक विज्ञापनों पर नियंत्रण, उत्पाद उत्तरदायित्व और उपभोक्ता आयोगों की व्यवस्था को मजबूत किया गया है। राष्ट्रीय, राज्य और जिला स्तर पर स्थापित उपभोक्ता आयोगों के माध्यम से उपभोक्ता अपनी शिकायतों का समाधान प्राप्त कर सकते हैं। 

फिर भी यह स्वीकार करना होगा कि केवल कानून बना देने से उपभोक्ता संरक्षण का उद्देश्य पूर्ण नहीं हो जाता। वास्तविक परिवर्तन तब होता है जब समाज में जागरूकता बढ़ती है और उपभोक्ता स्वयं अपने अधिकारों के प्रति सजग होता है। जागरूक उपभोक्ता ही बाजार में अनुशासन और पारदर्शिता स्थापित कर सकता है। 

इसी संदर्भ में सामाजिक संगठनों और जनआंदोलनों की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाती है। भारत में उपभोक्ता जागरण के क्षेत्र में कई संगठनों ने महत्वपूर्ण कार्य किया है। विशेष रूप से अखिल भारतीय ग्राहक पंचायत ने उपभोक्ता अधिकारों की रक्षा और जागरूकता के क्षेत्र में एक सशक्त सामाजिक आंदोलन खड़ा किया है। 

ग्राहक पंचायत का दृष्टिकोण केवल शिकायत समाधान तक सीमित नहीं है, बल्कि यह उपभोक्ता को समाज की एक जिम्मेदार शक्ति के रूप में स्थापित करने का प्रयास करता है। इस संगठन ने वर्षों से पूरे देश में उपभोक्ता जागरण अभियान चलाए हैं, जिनके माध्यम से लोगों को उनके अधिकारों, कर्तव्यों और बाजार व्यवस्था की वास्तविकताओं के बारे में शिक्षित किया जाता है। 

ग्राहक पंचायत की एक महत्वपूर्ण उपलब्धि यह रही है कि उसने उपभोक्ता मुद्दों को केवल कानूनी विवाद के रूप में नहीं देखा, बल्कि इसे सामाजिक चेतना का विषय बनाया। संगठन ने विभिन्न राज्यों में जागरूकता शिविर, प्रशिक्षण कार्यक्रम, जनसंवाद और अभियान चलाकर लाखों उपभोक्ताओं को उनके अधिकारों के प्रति जागरूक किया है। मिलावटखोरी, गलत माप-तौल और अत्यधिक मूल्य वसूली जैसे मुद्दों के खिलाफ संगठन ने समय-समय पर जनजागरण अभियान चलाए हैं। 

इसके अतिरिक्त ग्राहक पंचायत ने उपभोक्ता नीतियों और कानूनों के निर्माण में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभायी है। उपभोक्ता संरक्षण कानूनों को मजबूत बनाने, उपभोक्ता आयोगों की व्यवस्था को प्रभावी बनाने और बाजार में पारदर्शिता बढ़ाने के लिए संगठन ने सरकार और नीति-निमार्ताओं के साथ निरंतर संवाद स्थापित किया है। उपभोक्ता शिक्षा को समाज के व्यापक आंदोलन के रूप में विकसित करने का प्रयास भी इस संगठन की एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है। 

उपभोक्ता आंदोलन की वास्तविक शक्ति तब दिखायी देती है जब समाज स्वयं इसमें भागीदारी करता है। जब आम नागरिक मिलावट के खिलाफ आवाज उठाते हैं, गलत बिलिंग पर प्रश्न करते हैं और अपने अधिकारों के लिए कानूनी रास्ता अपनाते हैं, तब बाजार व्यवस्था स्वत: अनुशासित होने लगती है। यही कारण है कि उपभोक्ता संगठनों का प्रयास केवल शिकायत दर्ज कराने तक सीमित नहीं रहता, बल्कि वे नागरिकों में आत्मविश्वास और जागरूकता पैदा करने का कार्य भी करते हैं। 

आज के समय में उपभोक्ता अधिकारों के साथ-साथ उत्तरदायी उपभोग का प्रश्न भी महत्वपूर्ण हो गया है। पर्यावरण संरक्षण और सतत विकास के संदर्भ में भी उपभोक्ता की भूमिका निर्णायक है। यदि उपभोक्ता पर्यावरण-अनुकूल उत्पादों को प्राथमिकता देता है, संसाधनों का संयमित उपयोग करता है और अनावश्यक उपभोग से बचता है, तो उत्पादन प्रणाली भी अधिक जिम्मेदार बनती है। 

विश्व उपभोक्ता अधिकार दिवस हमें यह स्मरण कराता है कि आर्थिक विकास का उद्देश्य केवल उत्पादन और लाभ को बढ़ाना नहीं है, बल्कि उपभोक्ता को सुरक्षित, गुणवत्तापूर्ण और न्यायपूर्ण बाजार उपलब्ध कराना भी है। यदि बाजार में उपभोक्ता का विश्वास कमजोर हो जाए तो आर्थिक व्यवस्था भी अस्थिर हो जाती है। 

अंतत: यह स्पष्ट है कि सुरक्षित उत्पाद ही आत्मविश्वासी उपभोक्ता का आधार हैं। जब उपभोक्ता को यह भरोसा होता है कि बाजार में उपलब्ध वस्तुएं सुरक्षित और प्रमाणित हैं, तब वह निश्चिंत होकर आर्थिक गतिविधियों में भागीदारी करता है। यही विश्वास एक स्वस्थ अर्थव्यवस्था और जिम्मेदार बाजार व्यवस्था की नींव बनता है। 

विश्व उपभोक्ता अधिकार दिवस 2026 का संदेश भी यही है—उपभोक्ता को जागरूक बनाना, उत्पादों को सुरक्षित बनाना और समाज में उत्तरदायी बाजार व्यवस्था स्थापित करना। सरकार, उद्योग, सामाजिक संगठन और जागरूक नागरिक यदि मिलकर इस दिशा में कार्य करें, तो एक ऐसा समाज निर्मित किया जा सकता है जहाँ उपभोक्ता केवल ग्राहक नहीं बल्कि सम्मानित और सुरक्षित नागरिक के रूप में स्थापित हो। 

(लेखक : वेंकेटेश प्रभू अखिल भारतीय ग्राहक पंचायत झारखंड के प्रांत संगठन मंत्री हैं।)

Published / 2026-03-07 21:52:47
महिलाओं की गरिमा के लिए समाज की साझी जिम्मेदारी

विकास रंजन 

एबीएन एडिटोरियल डेस्क। हर वर्ष अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस हमें यह अवसर देता है कि हम महिलाओं की प्रगति, अधिकारों और समानता पर विचार करें। शिक्षा, रोजगार और नेतृत्व के क्षेत्र में महिलाओं को सशक्त बनाने के लिए अनेक प्रयास किये जा रहे हैं। लेकिन एक ऐसा विषय है जो आज भी समाज में खुले तौर पर चर्चा का हिस्सा नहीं बन पाया है- मासिक धर्म स्वच्छता। 

भारत के कई ग्रामीण क्षेत्रों में आज भी मासिक धर्म को लेकर संकोच, सामाजिक वर्जनाएं और गलत धारणाएं मौजूद हैं। स्वच्छता से जुड़े साधनों की कमी के कारण हजारों किशोरियां अपने मासिक धर्म के दिनों में स्कूल जाने से वंचित रह जाती हैं। कई बार मजबूरी में वे असुरक्षित विकल्पों का इस्तेमाल करती हैं, जिससे स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं और संक्रमण का खतरा बढ़ जाता है। यह स्थिति केवल स्वास्थ्य का नहीं, बल्कि सम्मान और अवसर की समानता का भी प्रश्न है। 

इस समस्या का समाधान केवल जागरूकता से नहीं, बल्कि समाज की सामूहिक भागीदारी से संभव है। विशेष रूप से पुरुषों को भी इस विषय पर संवेदनशीलता के साथ आगे आना होगा। जब तक हम मासिक धर्म को केवल महिलाओं का निजी विषय मानते रहेंगे, तब तक इस समस्या का व्यापक समाधान संभव नहीं होगा। 

इसी सोच के साथ NOBA GSR (Netarhat Old Boys Association – Global Social Responsibility) ने संगिनी पहल की शुरुआत की। इस पहल का उद्देश्य बिहार और झारखंड के ग्रामीण तथा अर्ध-शहरी क्षेत्रों में स्कूल जाने वाली लड़कियों के बीच सुरक्षित मासिक धर्म स्वच्छता को बढ़ावा देना है। 

मैं स्वयं आज टोक्यो, जापान में कार्यरत हूं, लेकिन मेरी जड़ें बिहार से जुड़ी हैं। विदेश में रहते हुए अक्सर यह विचार आता रहा कि हम अपने समाज और अपने राज्य के लिए क्या योगदान दे सकते हैं। इसी भावना के साथ नेतरहाट विद्यालय के पूर्व छात्रों के सामाजिक मंच NOBA GSR के माध्यम से हमने इस विषय पर काम शुरू किया।

 संगिनी पहल तीन प्रमुख आधारों पर काम करती है—सुलभता, जागरूकता और गरिमा। 

पहला कदम है स्कूलों में सैनिटरी पैड वेंडिंग मशीन और पर्यावरण अनुकूल इन्सिनरेटर की स्थापना, जिससे लड़कियां स्कूल में ही सुरक्षित तरीके से पैड प्राप्त कर सकें और उनका निस्तारण भी कर सकें। इससे उन्हें मासिक धर्म के दौरान स्कूल से अनुपस्थित रहने की आवश्यकता नहीं पड़ती। 

दूसरा महत्वपूर्ण पहलू है जागरूकता। ग्रामीण क्षेत्रों में कई लड़कियां मासिक धर्म के बारे में सही जानकारी के अभाव में बड़ी होती हैं। संगिनी के माध्यम से स्कूलों में जागरूकता कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं, जहाँ मासिक धर्म स्वच्छता, स्वास्थ्य और आत्मविश्वास से जुड़े विषयों पर खुलकर चर्चा की जाती है। 

इस अभियान में शिक्षकों, स्वयं सहायता समूहों, सामुदायिक संगठनों और स्थानीय प्रतिनिधियों की भागीदारी भी महत्वपूर्ण रही है। इससे समाज में धीरे-धीरे वह वातावरण बन रहा है जहां मासिक धर्म पर खुले और सकारात्मक तरीके से बात की जा सके। 

आज इस पहल के माध्यम से सैकड़ों स्कूलों तक सुविधाएं पहुंचायी जा चुकी हैं और हजारों लड़कियां इससे लाभान्वित हो रही हैं। इससे भी अधिक महत्वपूर्ण यह है कि समाज की सोच में बदलाव दिखाई देने लगा है। 

अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस हमें यह याद दिलाता है कि महिलाओं का सशक्तिकरण केवल नीतियों या घोषणाओं से संभव नहीं है। यह उन छोटे-छोटे प्रयासों से संभव होता है जो महिलाओं को सम्मान, स्वास्थ्य और अवसर प्रदान करते हैं। सच्चा सशक्तिकरण तब होता है जब महिलाएं अकेले संघर्ष न करें, बल्कि पूरा समाज उनके साथ खड़ा हो। मासिक धर्म स्वच्छता के क्षेत्र में किए जा रहे प्रयास इसी दिशा में एक सकारात्मक कदम हैं। क्योंकि जब समाज महिलाओं की मूलभूत आवश्यकताओं के साथ खड़ा होता है, तभी वास्तविक समानता और सम्मान की नींव मजबूत होती है।

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