एबीएन एडिटोरियल डेस्क। संसद और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं को एक तिहाई आरक्षण उपलब्ध कराने संबंधी नारी शक्ति वंदन विधेयक संसद से पारित हो चुका है। लेकिन अभी उसके क्रियान्वयन में विलंब है। इस समय संसद में मात्र 13.6% तथा राज्य विधानसभाओं में मात्र 9% महिलाओं का प्रतिनिधित्व है। इसी तरह नौकरशाही में 13 प्रतिशत और न्यायपालिका में आधी आबादी की भागीदारी नगण्य है। व्यापार, कृषि, सुरक्षा, मेडिकल, इंजीनियरिंग, खेल या कला हर क्षेत्र महिलाओं ने अपनी उपस्थिति दर्ज करायी है। लेकिन महिला श्रम का उचित सम्मान समाज को अभी सीखना है।
कंसल्टेंसी फर्म मेकिंजे की रिपोर्ट - पावर आॅफ पैरिटी एडवांसिंग वूमेंस इक्वैलिटी इन इंडिया के अनुसार महिलाओं को बराबरी का दर्जा देने पर भारत की अर्थव्यवस्था में तेजी से वृद्धि हो सकती है। इससे देश के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) लाखों करोड़ रुपए की अतिरिक्त बढ़ोतरी हो सकती है। विकास-दर भी 1.4 प्रतिशत ज्यादा संभव है। यदि विश्व के सभी देशों में लिंग भेद पूरी तरह मिट जाए तो विश्व जीडीपी में 1820 लाख करोड़ रुपए की अतिरिक्त बढ़ोतरी होगी।
यह राशि संयुक्त राज्य अमेरिका और चीन के संयुक्त जीडीपी के बराबर है। जीडीपी में इस योगदान के लिए कम से कम 6.8 करोड़ और कामकाजी महिलाओं की जरूरत होगी। रिपोर्ट में शामिल 95 देश में से 26 देश प्रति व्यक्ति जीडीपी और मानव विकास इंडेक्स में भारत से पीछे हैं। भारत की जीडीपी में महिलाओं का योगदान इस समय 17 प्रतिशत है जबकि विश्व स्तर पर यह 37 प्रतिशत है।
भारत स्टार्टअप और यूनिकॉर्न कम्युनिटी के क्षेत्र में दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा देश है। पर इन स्टार्टअप में सिर्फ 10 प्रतिशत महिलाएं ही फाउंडर हैं। भारत में महिलाओं को पुरुषों के समान स्टार्टअप करने के लिए प्रोत्साहित नहीं किया जाता है। जिसके कारण स्टार्टअप क्षेत्र में महिलाओं का बहुत कम योगदान है। इसके साथ ही भारत में कोरोना महामारी के कारण जेंडर गैप 4.3 प्रतिशत बढ़ गया है। जिसके कारण अर्थव्यवस्था में भी महिलाओं का योगदान कम हुआ है।
महिलाओं-पुरुषों में घरेलू जिम्मेदारियों का बंटवारा भी असमान है। महिलाएं कई ऐसे काम करती हैं जिनके बदले पैसे नहीं मिलते। भारतीय महिलाएं ऐसे काम पुरुषों की तुलना में 10 गुना ज्यादा करती हैं, विश्व औसत से तीन गुना अधिक। अगर इसके मूल्य को भी जोड़ा जाए और घरेलू कामों के लिए पैसे दिये जायें तो भारत की इकोनॉमी 20 लाख करोड़ रुपये बढ़ जायेगी।
मैकिंजी इंडिया द्वारा भारत के लिए एक नया इंडेक्स तैयार किया है- इंडिया फीमेल एंपावरमेंट इंडेक्स। यह राज्यों में स्त्री पुरुष समानता को मापने का पैमाना है। इसमें शीर्ष पर मिजोरम, केरल, मेघालय, गोवा और सिक्किम हैं। हालांकि नौकरी की उम्र के लिहाज से यहां देश के सिर्फ चार प्रतिशत महिलाएं हैं। सबसे नीचे बिहार, मध्य प्रदेश, असम, झारखंड और उत्तर प्रदेश हैं। यहां कामकाजी उम्र के लिहाज से देश की 32 प्रतिशत महिलाएं हैं।
विश्व में बिना पैसे वाला 75 प्रतिशत काम महिलाएं करती हैं। यह हर साल 650 लाख करोड़ रुपये के बराबर है। दुनिया की जीडीपी का लगभग 13 प्रतिशत। भारत में 90 प्रतिशत ऐसे काम महिलाओं के जिम्मे है। आम धारणा है कि गृहणियों का न कोई कमाई होती है और न आर्थिक योगदान। इस धारणा को बदलने की जरुरत है। सुप्रीम कोर्ट ने कृति एवं अन्य बनाम ओरिएण्टल इंश्योरेंश कंपनी लिमिटेड के मामले में 5 जनवरी 2021 को पारित अपने फैसले में माना कि गृहणी का काम बिना कमाई वाला नहीं है।
खाना बनाना, घर की देखभाल, बच्चों का पालन-पोषण, परिवार के बुजुर्गों की देखभाल,घर का प्रबंधन आदि ऐसे काम हैं, जिन्हें यदि बाहर से कराया जाए तो उनका आर्थिक मूल्य चुकाना पड़ेगा। इसी तरह सुप्रीम कोर्ट ने 11 जून 2026 को शिशुपाल बनाम सुरजीत के मामले में एक गृहणी महिला की मासिक आय 30000 रुपये मानते हुए उनके आश्रित के लिए मुआवजा की राशि निर्धारित की है।
अगर हम स्त्री-पुरुष का भेद खत्म कर दें तो अर्थव्यवस्था को बहुत ज्यादा फायदा होगा लेकिन यह अंतर तभी मिट सकता है जब हम समाज में लैंगिक समानता पर विचार करें इसके लिए हमें महिलाओं के प्रति अपना नजरिया बदलना होगा उनसे पक्षपात खत्म करना होगा।
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