रांची। उच्च न्यायालय परिसर में आचार्य मुक्तरथ जी के सानिध्य में चल रहे दस दिवसीय योग स्वास्थ्य प्रबंधन शिविर का आज समापन। हुआ। शिविर में 200 से भी ज्यादा संख्या में हाई कोर्ट के अधिकारी, रजिस्ट्रार, असिस्टेंट एवं कर्मचारियों ने योग से स्वास्थ्य लाभ प्राप्त किया। माननीय चीफ जस्टिस डॉ रवि रंजन एवं माननीय जस्टिस अपरेश कुमार सिंह के निर्णय से आयोजित यह कैंप बहुत लोगों के लिये स्वास्थ्य वर्धक सिद्ध हुआ। आचार्य मुक्तरथ ने बताया कि आज आफिस जाने के लिये न तो साईकल है और न लोगों के पास समय है। ऐसी परिस्थिति में खुद को स्वस्थ रखने के लिये यौगिक साइकिल की जरूरत है। व्यक्ति को हर दिन नब्बे मिनट यानि डेढ़ घण्टा अपने स्वास्थ्य के लिए निकलना होगा तभी आप बढ़ते हृदय रोग को, मधुमेह को,डिप्रेशन और एंजाइटी को अनिद्रा और हाइपरटेंशन को रोक सकते हैं तथा दूर हटा सकते हैं। उन्होंने कहा योग के सरल अभ्यास पवनमुक्तासन पार्ट-1 और नाड़ीशोधन तथा भ्रामरी प्राणायाम से बड़ी-बड़ी बिमारियों से मुक्ति पाया जा सकता है। शलभासन और भुजंगासन से पूरे मेरूदंड को स्वस्थ रखा जा सकता है। पवनमुक्तासन भाग-2 और सूर्यनमस्कार के अभ्यासों से मधुमेह और पूरे पाचन प्रणाली को दुरुस्त रखा जा सकता है। योगनिद्रा एंजाइटी और स्ट्रेस से व्यक्ति को मुक्त रखता है और ये सभी योग साधनायें बहुत सरल हैं। ऐसे सरल योग के अभ्यासों को कोई भी व्यक्ति कर सकता है। योग का शक्तिशाली पक्ष है दिमाग के सुषुप्त केन्द्रों की जागृति जिसमें मनुष्य की असीमित प्रतिभा छिपी हुई है। जब योग की क्रियाओं को श्वांस के साथ पूरी तन्मयता के साथ एकाग्रचित होकर किया जाता है तो उससे दिमाग खुलने लगते हैं, दिमाग में स्थिरता आती है और फिर अंदर के सुषुप्त केंद्र जागृत होने लगता है। इससे कुशल स्वास्थ्य की प्राप्ति होती है,रोग नष्ट होते हैं और बुद्धि प्रकाशित होती है। लगातार ऐसा होने से व्यवहार और सोच-विचार उच्च होने लगता है और फिर मनुष्य अपने आप को सच्चा मनुष्य के रूप में देख पाता है। दस दिनों के अभ्यास से सभी लोगों को काफी लाभ मिला है और भाग लेने वाले प्रतिभागियों ने योगाभ्यास को लगातार कराने की इच्छा व्यक्त की है।
एबीएन डेस्क, रांची। इस साल का अंतिम खंड ग्रास सूर्य ग्रहण 4 दिसंबर को मार्गशीर्ष मास शनिवार अमावस्या को भारतीय समयानुसार 10 बजकर 59 मिनट पर लगेगा, जो दोपहर 3 बजकर 7 मिनट तक रहेगा। इस सम्बंध में पंडित सन्तोष कुमार पाण्डेय (सोनू) ने बताया कि सूर्य ग्रहण भारत में दिखाई नहीं देगा और न ही इसका सूतक लगेगा। आस्ट्रेलिया, अफ्रीका, प्रशांत, एटलांटिक, नामिबिया, अंटाकर्टिका व हिंद महासागर सहित अन्य देशों के लोग इसे देख सकेंगे। उन्होंने बताया कि अगला खंड ग्रास सूर्य ग्रहण 30 अप्रैल 2022 को लगेगा, लेकिन यह ग्रहण भी भारत में दिखाई नहीं देगा।
एबीएन सेंट्रल डेस्क। नीति आयोग के बहुआयामी गरीबी सूचकांक के अनुसार, बिहार, झारखंड और उत्तर प्रदेश भारत के सबसे गरीब राज्यों के रूप में उभरे हैं। सूचकांक के अनुसार, बिहार की 51.91 प्रतिशत जनसंख्या गरीब है, इसके बाद झारखंड में 42.16 प्रतिशत, उत्तर प्रदेश में 37.79 प्रतिशत लोग गरीब हैं। सूचकांक में मध्य प्रदेश (36.65 प्रतिशत) को चौथे स्थान पर रखा गया है, जबकि मेघालय (32.67 प्रतिशत) पांचवें स्थान पर है। इन राज्यों में सबसे कम गरीबी केरल (0.71 प्रतिशत), गोवा (3.76 प्रतिशत), सिक्किम (3.82 प्रतिशत), तमिलनाडु (4.89 प्रतिशत) और पंजाब (5.59 प्रतिशत) सूचकांक के साथ पूरे भारत में सबसे कम गरीबी दर्ज की है। ये राज्य सूचकांक में सबसे नीचे हैं। रिपोर्ट के अनुसार, भारत का राष्ट्रीय एमपीआई का मानक, ऑक्सफोर्ड पॉवर्टी एंड ह्यूमन डेवलपमेंट इनिशिएटिव (ओपीएचआई) और संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम द्वारा विकसित विश्व स्तर पर स्वीकृत और मजबूत कार्यप्रणाली का उपयोग करता है। केंद्रशासित प्रदेशों में पुडुचेरी में सबसे कम गरीब : जबकि केंद्र शासित प्रदेशों दादरा और नगर हवेली (27.36 प्रतिशत), जम्मू और कश्मीर व लद्दाख (12.58), दमन और दीव (6.82 प्रतिशत) और चंडीगढ़ (5.97 प्रतिशत) सबसे गरीब केंद्र शासित प्रदेश के रूप में उभरे हैं। पुडुचेरी में 1.72 प्रतिशत आबादी ही गरीब है, जबकि लक्षद्वीप में 1.82 प्रतिशत, अंडमान और निकोबार द्वीप समूह में 4.30 प्रतिशत और दिल्ली में 4.79 प्रतिशत गरीब हैं। भारत के एमपीआई में तीन आयाम : रिपोर्ट में कहा गया है कि महत्वपूर्ण रूप से यह सूचकांक परिवारों द्वारा सामना किए जाने वाले कई अभावों को दर्ज करता है। इसमें कहा गया है कि भारत के एमपीआई में तीन समान आयाम हैं- स्वास्थ्य, शिक्षा और जीवन स्तर। ये पोषण, बाल और किशोर मृत्यु दर, प्रसवपूर्व देखभाल, स्कूली शिक्षा के वर्ष, स्कूल में उपस्थिति, खाना पकाने के ईंधन, स्वच्छता, पीने का पानी, बिजली, आवास, संपत्ति और बैंक खाते जैसे 12 संकेतकों द्वारा दर्शाए जाते हैं। 2015 में 193 देशों द्वारा अपनाए गए सतत विकास लक्ष्यों ढांचे ने दुनिया भर में विकास की प्रगति को मापने के लिए विकास नीतियों, सरकारी प्राथमिकताओं और मैट्रिक्स को फिर से परिभाषित किया है। 17 वैश्विक लक्ष्यों और 169 लक्ष्यों के साथ एसडीजी ढांचा अपने पूर्ववर्ती मिलेनियम डेवलपमेंट गोल्स की तुलना में काफी व्यापक है।नीति आयोग के उपाध्यक्ष राजीव कुमार ने अपने प्रस्ताव में कहा कि भारत के राष्ट्रीय बहुआयामी गरीबी सूचकांक का विकसित होना एक सार्वजनिक नीति उपकरण स्थापित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण योगदान है जो बहुआयामी गरीबी की निगरानी करता है, साक्ष्य-आधारित और केंद्रित हस्तक्षेपों के बारे में सूचित करता है। इससे यह सुनिश्चित होता है कि कोई भी पीछे रह गया है।
एबीएन सेंट्रल डेस्क। केंद्रीय कैबिनेट ने तीनों कृषि कानूनों को वापस करने वाले बिल को मंजूरी दी है। सरकार की ओर से कहा गया कि तीनों कृषि कानूनों को रद्द करना संसद के आगामी शीतकालीन सत्र में उसकी प्राथमिकता होगी। कैबिनेट की बैठक के बाद केंद्रीय मंत्री अनुराग ठाकुर ने बुधवार को यह जानकारी दी। उन्होंने बताया कि प्रधानमंत्री गरीब कल्याण अन्न योजना को भी मार्च 2022 तक बढ़ाने का फैसला लिया गया है। कोरोना काल में गरीबों को हर महीने सस्ते दामों पर अनाज इस योजना के तहत दिया जाता है। गौरतलब है कि प्रधानमंत्री गरीब कल्याण अन्न योजना नवंबर माह तक थी और कई राज्यों की ओर से इसे बढ़ाने की मांग की जा रही थी। ओडिशा के सीएम नवीन पटनायक ने भी इस मसले पर पीएम मोदी को लेटर लिखा था। संसद का शीतकालीन सत्र 29 नवंबर से प्रारंभ हो रहा है। सूचना और प्रसारण मंत्री अनुराग ठाकुर ने मीडिया को जानकारी देते हुए बताया कि मंत्रिमंडल ने तीन कृषि कानूनों को निरस्त करने का फैसला किया है। गौरतलब है कि पीएम नरेंद्र मोदी ने प्रकाश पर्व के मौके पर देश के नाम अपने संबोधन में तीनों कृषि कानूनों को वापस लेने का ऐलान करके हर किसी को चौंका दिया था। हालांकि, पीएम की ओर से कृषि कानूनों को वापस लिए जाने के ऐलान के बावजूद किसान फिलहाल अपने आंदोलन को खत्म करने के लिए तैयार नहीं हैं। लखनऊ में हुई किसान महापंचायत में किसानों ने कहा कि खेती के काले कानून वापस करना ही काफी नहीं है, जब तक एमएसपी गारंटी कानून नहीं बनता और पहले से तैयार किसान विरोधी विधेयक रद्द नहीं किए जाते तब तक उनका आंदोलन चलता रहेगा।
रांची। विश्व हिंदू परिषद के झारखंड प्रांत मंत्री डॉ बिरेन्द्र साहू ने डॉ करमा उरांव के विचार पर आपत्ति प्रकट करते हुए कहा कि हिंदू शब्द देखने में जितना सरल लगता है, व्याख्या तथा अर्थ में उतना ही व्यापक, कठिन तथा गंभीर है। समय-समय पर अनेक ऋषियों, महात्माओं, महापुरुषों ने हिंदू शब्द की व्याख्या करते रहे हैं। सर्वपल्ली डॉ राधाकृष्णन ने कहा है। हिंदू वह है, जो हिंदू दिखता है। मदन मोहन मालवीय ने कहा है मैं हिंदू हूं, क्योंकि मुझे जीवन का यही सही मार्ग दिखाता है। वृहत विश्वकोष के अनुसार प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष वेदों के विचारों के आधार पर बने अचार, विचार, रीति-नीति, समाज व्यवस्था आदि में किसी न किसी रूप में विश्वास करने और उनपर चलने वाले भारतीय को हिंदू कहा गया है। भिन्न-भिन्न संप्रदायों में कुछ अंतर होते हुए भी हिंदू समाज धार्मिक सिद्धांतों, सम्यक संस्कृति व जीवन पद्धति जातीय नियमों का पालन और एकता से बंधे हुए हैं। स्वाधीनता के पश्चात हिंदू शब्द की व्यापकता को कानूनी परिधि में बांधने का प्रयास किया गया। भारतीय संविधान के 25 में अनुच्छेद में हिंदू किसे माना जाए, इसे समझाने का प्रयास हुआ। इसी तरह 1956 में हिंदू कोड बिल में कहा गया कि मुसलमान, ईसाई, पारसी छोड़कर यहां के सनातनी, आर्य समाज, सिख, जैन और जितने भी अन्य बंधु हैं, वह सब हिंदू हैं। डॉ बिरेन्द्र ने कहा भारतीय संस्कृति अनादिकाल से विश्व बंधुत्व की भावना को लेकर सर्वे भवंतु सुखिन: की उदात्त विचारधारा को जन-जन में सुप्रतिष्ठित करने का कार्य कर रही है। इसी कारण प्राचीन काल से ही भारत के प्रति विश्व समुदाय का आदर और श्रद्धा का भाव रहा है, इतिहास इस बात का साक्षी है। किंतु ईसाइयत और इस्लाम अपने घोषित लक्ष्य के अनुसार क्रूसेड और जिहाद के माध्यम से समस्त विश्व को पदाक्रांत करते हुए अपने साम्राज्य की स्थापना का अभियान चलाते रहे। करोड़ों हिंदू इस्लाम की बर्बरतापूर्ण अमानवीय अत्याचार के शिकार हुए। ईसाइयों ने सेवा के नाम का कुश्चक्र तथा मुस्लिमों का जिहाद के नाम पर तांडव के कारण आज देश में 15 से 20% हिंदू मुस्लिम बन चुके हैं तथा लगभग 5% हिंदू ईसाई बन चुके हैं। उन्होंने कहा ईसाइयों के चंगुल में आए हुए डॉ करमा उरांव जैसे विद्वान भी अपने मूल संस्कार को भूल कर पद्मभूषण कड़िया मुंडा जैसे बरगद के समान खड़ा व्यक्तित्व पर कुल्हाड़ी चलाने का कार्य कर रहे हैं, जो अति निदंनीय है। उन्होंने कहा, हमें ज्ञात होना चाहिए सनातन अथवा हिंदू का विस्तार जम्बुद्वीप हुआ करता था। जम्बुद्वीप अर्थात आज का यूरेशिया। एक विशाल भूखंड में प्रकृति का पूजा करने वाले तथा प्रकृति पर अपना विश्वास एवं सर्वस्व निछावर करने तथा उसके संरक्षण करने का एक विशाल मन लेकर समाज में चलने वाला व्यक्तित्व ही हिंदू था और आज भी है और आने वाले समय में भी रहेगा। हिंदू का अभिन्न अंग जनजातीय समाज है। जाति व्यवस्था में यदि हम जातिविज्ञान का अध्ययन करने पर जातियों का उद्भव उनके लगातार पैतृक कर्मों के कारण हुआ है। साधारणतया मिट्टी का कार्य करने वाला को कभी भी लोहार अथवा तेली नहीं कहा जाता है उसे कुम्हार ही कहा जाता है। कोई लोहा के काम करने वाला को बढ़ई अथवा चमार नहीं कहा जाता है उसे लोहार ही कहा जाता है। ऐसे एक लंबे कालखंड तक अपने - अपने कार्यों को संपादित करने के लिए जो सामाजिक व्यवस्था बनी तथा कालान्तर में जाति प्रथा का उदय हुआ है। हम जातियों में बंटकर अपने संस्कृति और समाज को छोड़े नहीं क्योंकि हम बंट रहे हैं तो कहीं ना कहीं घट रहे हैं। उन्होंने कहा हिंदू में 16 संस्कार करने की परंपरा है। इन संस्कारों का पालन जनजातीय समाज भी करते आ रहे हैं। हिंदू में गोत्र परंपरा रही है। गोत्र किसी न किसी ऋषि मुनि के नाम पर चलता है। हम उन ऋषि के वंशज है ऐसा मानते हैं। समान गोत्र में विवाह वर्जित है चाहे वह सनातन परंपरा हो या जनजतिय परंपरा। डॉ० करमा उरांव जैसे व्यक्ति को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, विश्व हिंदू परिषद, वनवासी कल्याण केंद्र जैसे संस्थाओं के लिए अनुचित शब्दों का प्रयोग करना शोभा नहीं देती है क्योंकि ये संस्थाएं समस्त भारतीय रुढ़िवादि विचारधारा व प्राचीन परंपराओं को जीवंत रखने हेतु निरंतर कार्य कर रहे हैं। उक्त जानकारी विहिप के प्रांत मंत्री डॉ बिरेंद्र साहू ने एक प्रेस विज्ञप्ति जारी कर दी।
एबीएन डेस्क (सन्तोष पांडेय "सोनू")। पूरे देश में महापर्व छठ की धूम है। जब विश्व की सबसे प्राचीन सभ्यता की स्त्रियां अपने सम्पूर्ण वैभव के साथ सज-धज कर अपने आंचल में फल लेकर निकलती हैं, तो लगता है जैसे संस्कृति स्वयं समय को चुनौती देती हुई कह रही हो, "देखो! तुम्हारे असंख्य झंझावातों को सहन करने के बाद भी हमारा वैभव कम नहीं हुआ है। हम सनातन हैं, हम भारत हैं। हम तबसे हैं जबसे तुम हो, और जबतक तुम रहोगे तबतक हम भी रहेंगे।" जब घुटने भर जल में खड़ी व्रती की सुपली में बालक सूर्य की किरणें उतरती हैं तो लगता है जैसे स्वयं सूर्य बालक बनकर उसकी गोद में खेलने उतरे हैं। स्त्री का सबसे भव्य, सबसे वैभवशाली स्वरूप वही है। इस धरा को "भारत माता" कहने वाले बुजुर्ग के मन में स्त्री का यही स्वरूप रहा होगा। कभी ध्यान से देखिएगा छठ के दिन जल में खड़े हो कर सूर्य को अर्घ दे रही किसी स्त्री को, आपके मन में मोह नहीं श्रद्धा उपजेगी। छठ वह प्राचीन पर्व है जिसमें राजा और रंक एक घाट पर माथा टेकते हैं। एक ही देवता को अर्घ देते हैं, और एक बराबर आशीर्वाद पाते हैं। धन और पद का लोभ मनुष्य को मनुष्य से दूर करता है, पर धर्म उनके बीच की खाई को पाट कर उन्हें साथ लाता है। अपने धर्म के साथ होने का सबसे बड़ा लाभ यह होता है कि आप अपने समस्त पुरुखों के आशीर्वाद की छाया में होते हैं। छठ के दिन नाक से माथे तक सिंदूर लगा कर घाट पर बैठी स्त्री अपनी हजारों पीढ़ी की आजीसास-नानी सास की छाया में होती है, बल्कि वह उन्हीं का स्वरूप होती है। उसके दउरे में केवल फल नहीं होते, समूची प्रकृति होती है। वह एक सामान्य स्त्री सी नहीं, अन्नपूर्णा सी दिखती है। ध्यान से देखिये! आपको उनमें कौशल्या दिखेंगी, उनमें मैत्रेयी दिखेंगी, उनमें सीता दिखेंगी, उनमें अनुसुइया दिखेंगी, सावित्री दिखेंगी... उनमें पद्मावती दिखेंगी, उनमें लक्ष्मीबाई दिखेंगी, उनमें भारत माता दिखेगी। इसमें कोई संदेह नहीं कि उनके आंचल में बंध कर ही यह सभ्यता अगले हजारों वर्षों का सफर तय कर लेगी। छठ डूबते सूर्य की आराधना का पर्व है। डूबता सूर्य इतिहास होता है, और कोई भी सभ्यता तभी दीर्घजीवी होती है जब वह अपने इतिहास को पूजे। अपने इतिहास के समस्त योद्धाओं को पूजे और इतिहास में अपने विरुद्ध हुए सारे आक्रमणों और षड्यंत्रों को याद रखे। छठ उगते सूर्य की आराधना का पर्व है। उगता सूर्य भविष्य होता है, और किसी भी सभ्यता के यशश्वी होने के लिए आवश्यक है कि वह अपने भविष्य को पूजा जैसी श्रद्धा और निष्ठा से संवारे... हमारी आज की पीढ़ी यही करने में चूक रही है, पर उसे यह करना ही होगा... यही छठ व्रत का मूल भाव है। मैं खुश होता हूं घाट जाती स्त्रियों को देख कर। मैं खुश होता हूं उनके लिए राह बुहारते पुरुषों को देख कर। मैं खुश होता हूं उत्साह से लबरेज बच्चों को देख कर... सच पूछिए तो यह मेरी खुशी नहीं, मेरी मिट्टी, मेरे देश, मेरी सभ्यता और हमारी संस्कृति की खुशी है। मेरे देश की माताओं! अर्घ्य के दिन जब आदित्य आपकी सुपली में उतरें, तो उनसे कहिएगा कि इस देश, इस संस्कृति पर अपनी कृपा बनाये रखें, ताकि हजारों वर्ष बाद भी हमारी पुत्रवधुएं यूं ही सज-धज कर गंगा के जल में खड़ी हों और कहें- उगs हो सुरुज देव, भइले अरघ के बेर...
एबीएन डेस्क। लोक आस्था का महापर्व छठ को लेकर देश भर में उत्साह का माहौल है। नहाय-खाय के साथ सोमवार से इस चार दिवसीय महापर्व की शुरुआत हो गयी है। इसमें व्रतियां 36 घंटे का निर्जला व्रत रखती हैं। छठ पूजा हर साल कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि को मनाई जाती है। दीपावली के बाद छठ पूजा, हिंदुओं का छठ सबसे बड़े त्योहार है। इस व्रत को छठ पूजा, सूर्य षष्ठी पूजा और डाला छठ के नाम से भी जाना जाता है। इस बार छठ पूजा 8 से 11 नवंबर तक है। उत्तर भारत और खासतौर से बिहार, यूपी, झारखंड में इस त्योहार का बेहद खास महत्व होता है। 8 नवंबर को नहाय खाय : छठ पर्व के पहले दिन घर में जो भी छठ का व्रत करने का संकल्प लेता है, वह स्नान कर साफ या नए वस्त्र धारण करता है। फिर व्रती शाकाहारी भोजन ग्रहण करते हैं। आमतौर पर इस दिन कद्दू की सब्जी बनाई जाती है। इस वर्ष नहाय-खाय 8 नवंबर ( सोमवार ) को है। इस दिन सूर्योदय 6 बजकर 02 मिनट पर और सूर्यास्त 5 बजकर 04 मिनट पर होगा। नहाय-खाय का विधि-विधान : सबसे पहले घर की साफ-सफाई कर लें। किसी नदी-तालाब में नहाकर शुद्ध वस्त्र पहनें। नहाय-खाय पर भी गंगास्नान संभव हो तो करें। अगर गंगा स्नान सम्भव नहीं हो, तो अपने स्नान के जल में गंगाजल डाल लें। ऐसा करना शुभ माना जाता है। छठ करने वाली व्रती महिलाएं या पुरुष चने की दाल और लौकी की सब्जी बनाएं। खाने में सेंधा नमक का प्रयोग करें। भगवान गणेश और सूर्यनारायण को भोग लगाकर व्रती भोजन को प्रसाद के रुप में ग्रहण करें और घर के सभी सदस्य भी यही खाएं। नहाय-खाय और छठ पर्व के दौरान घर के सदस्य मांस-मदिरा का सेवन न करें। रात को भी घर के सदस्य छना हुआ खाना ही खाएं। व्रत रखने वाली महिला या पुरुष को जमीन पर सोना चाहिए। 9 नवंबर को खरना : खरना छठ पूजा का दूसरा दिन होता है। यह कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को होता है। इस दिन सूर्योदय 6 बजकर 03 मिनट पर और सूर्यास्त 5 बजकर 04 मिनट पर होगा। 10 नवंबर को डूबते सूर्य को अर्घ्य : बुधवार शाम को सूर्य को अर्घ्य दिया जाएगा। इस दिन सूर्यादय 6 बजकर 03 मिनट पर और सूर्यास्त 5 बजकर 03 मिनट पर होगा। 11 नवंबर को उगते सूर्य को अर्घ्य : छठ पूजा का अंतिम दिन कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की सप्तमी तिथि होती है। इस दिन सूर्योदय के समय सूर्यदेव को अर्घ्य अर्पित किया जाता है। उसके बाद पारण कर व्रत को पूरा किया जाता है। इस दिन सूर्योदय 6 बजकर 04 मिनट पर और सूर्यास्त 5 बजकर 03 मिनट पर होगा। (नोट : सूर्योदय और सूर्यास्त का समय पटना के अनुसार दिया गया है, शहर के अनुसार इसमें बदलाव सम्भव है।)
एबीएन डेस्क। दीपोत्सव पर राम नगरी अयोध्या रोशनी से पहले से ही नहायी हुई है। लेकिन आज रात एक साथ जलते हुए 12 लाख दीये अमावस्या की रात को चुनौती देते नजर आयेंगे। विकास के नये आयाम गढ़ने वाले उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ दीपावली पर भी रिकॉर्ड बनाने वाले हैं। आज छोटी दीवाली के मौके पर अयोध्या राम की पैड़ी पर 12 लाख दिये जलाए जलाकर योगी यह रिकॉर्ड बनाने वाले हैं। 12 लाख दीयों में 9 लाख दीये सरयू किनारे स्थित राम की पैड़ी और 3 लाख दीये अयोध्या के मठ मंदिरों को रोशन करेंगे। इस आयोजन का गवाह होगा गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड। गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड की टीम अयोध्या नगरी में मौजूद रहेगी और विश्व रिकॉर्ड बनते हुए देखेगी। बता दें, विश्व रिकॉर्ड कायम करने के लिए मिट्टी के दीये को कम से कम 5 मिनट तक जलना होगा। अयोध्या में इस समय पांच दिवसीय दीपोत्सव कार्यक्रम चल रहा है। चूंकि राम मंदिर के कारण अयोध्या विशिष्ट नगरी में शुमार है, इसलिए यहां सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम किए गए हैं। चप्पे-चप्पे पर पुलिस के जवान तैनात हैं। मुख्यमंत्री के आयोजन के कारण नया घाट से राम की पैड़ी तक जाने वाले रास्ते को बंद कर दिया गया है। यहां दोनों तरफ बैरिकेडिंग लगाई गई है। सरयू पर बने पुराने पुल पर भी आवागमन बंद किया गया है।सीएम योगी आदित्यनाथ ने 2017 में अयोध्या में पहली बार दीपोत्सव की शुरुआत की थी। सर्वप्रथम दीपोत्सव का आयोजन 51 हजार दीयों के साथ हुआ था। इसके बाद 2019 में 4 लाख मिट्टी के दीयों को रौशन कर दीपोत्सव मनाया गया था। वहीं 2020 में 6 लाख दीये सरयू के तट पर जलाये गये थे। अब एक बार फिर साल 2021 में योगी आदित्यनाथ सरकार विश्व रिकॉर्ड कायम करने के लिए दीपोत्सव में 12 लाख से ज्यादा दिये रोशन करने जा रही है।
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