- पितृपक्ष विशेष : कर्म और सेवा से अमर हुए व्यक्तित्व
डॉ दीपक कुमार घोष
एबीएन न्यूज नेटवर्क, खूंटी। सनातन धर्म में पितृपक्ष का विशेष महत्व है। आश्विन कृष्ण पक्ष के ये 15 दिन पितरों को याद करने, उनके प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने और तर्पण-श्राद्ध करने के दिन हैं। मान्यता है कि इस दौरान हमारे पूर्वज पितृलोक से धरती पर आते हैं और तर्पण से प्रसन्न होकर परिवार को सुख-समृद्धि और शांति का आशीर्वाद देते हैं।
मुरहू के समाजसेवी डॉ धर्मेंद्र नाथ तिवारी ने कहा कि पितृपक्ष केवल कर्मकांड नहीं, बल्कि उन संस्कारों को याद करना है जो हमारे पितरों ने हमें दिये। पिता ही परिवार की नींव होते हैं। ग्रामीण सह पड़ोसी विष्णु देव चौधरी ने कहा कि स्वर्गीय वशिष्ठ मुनि तिवारी जी का जीवन आज प्रेरणा बन गया है। उन्होंने कहा कि वशिष्ठ मुनि तिवारी ने जीवन भर समाजसेवा, शिक्षा और धार्मिक मूल्यों को आगे बढ़ाया।
वे कहते थे - जीवित रहते माता-पिता की सेवा और जाने के बाद सच्चे कर्मों से उनका तर्पण ही सबसे बड़ा श्राद्ध है। उनके दोनों पुत्रों धर्मेंद्र और सत्येन्द्र और परिजनों द्वारा पितृपक्ष में किया गया पिंडदान, ब्राह्मण भोज और गरीबों को दान उनके बताये आदर्शों का ही प्रतीक है। ग्रामीणों का कहना है कि तिवारी जी ने अपने जीवन से सिखाया कि पितर तभी प्रसन्न होते हैं जब उनके वंशज समाज के लिए कुछ अच्छा करते हैं।
धर्मेंद्र तिवारी ने कहा कि आज पितृपक्ष पर पिताजी को जल तर्पण कर श्रद्धांजलि दी गयी। परिजनों ने संकल्प लिया कि उनके सेवा, सादगी और परोपकार के मार्ग पर चलते रहेंगे। उन्होंने कहा कि पिता जी अपने पिता स्वर्गीय रामप्यारे तिवारी को तर्पण किया करते थे। वे कहा करते थे कि पितरों का तर्पण जल से ही नहीं, उनके आदर्शों को जीवन में उतारने से भी होता है।