Breaking
ताज़ा समाचार लोड हो रहा है...
लाइव: 313
होम ई-पेपर देश झारखंड खेल समाचार राज काज कानून व्यवस्था करियर बिजनेस वर्ल्ड हेल्थ विचार ज्ञान विज्ञान समाज वन और पर्यावरण मनोरंजन बिहार विज्ञापन
झारखंड

कोडरमा : हज पर जाने वाले आजमीन को गर्मजोशी के साथ किया गया रवाना

शेयर करें: WhatsApp Facebook X Back to ePaper
कोडरमा : हज पर जाने वाले आजमीन को गर्मजोशी के साथ किया गया रवाना
विज्ञापन
  • फूल माला पहनाकर किया गया स्वागत, गले मिलकर  देश  की भलाई के लिए की गई दरखास्त
  • इस्लाम के पांच फर्ज में से एक अहम फर्ज हज है- मुफ्ती सरफराज

टीम एबीएन, कोडरमा। हज पर जाने वाले आजमीनों का मक्का मुअज्जमा जाने का सिलसिला जारी है। शनिवार की देर रात  झुमरी तिलैया नगर परिषद क्षेत्र अंतर्गत असनाबाद निवासी मो. कबीरूद्दीन को लोगों ने पूरे जोशो खरोश के साथ आजमीने हज के लिए रवाना किया और इस्तकबाल करते हुए मुबारकबाद दी। 

मौके पर लोगों ने कबीर साहब को फूल माला पहनाकर और रुमाल देकर कर स्वागत किया। दो रकात शुकराने  की नमाज अदा करने के बाद हाजी कबीर ने कोडरमा स्टेशन से कोलकाता के लिए हावड़ा चंबल एक्सप्रेस से रवाना हुए,जो 27 मई को मक्का मदीना हज के लिए जहाज से रवाना होंगे। 

हज पर जाने के पहले गांव व परिवार के लोगों ने हाजी कबीर को फूल माला से स्वागत करते हुए विदाई दी। वही मुसाफा और गले मिलकर अपने और देश व मूल्क की भलाई के लिए दुआ की दरखास्त की। मक्का मुकर्रामा जाने के पहले सुबह में कुराअन ख्वानी का ऐहतमाम किया गया। मौके पर मकतब के बच्चों ने कुराने पाक पढ़ा और हज-ए- आजमीन के लिए हज का तमाम रूकन आसानी के साथ अदा करने की दुआ मांगी। 

मौके पर मस्जिद-ए-हेरा जामा मस्जिद के इमाम मुफ्ती सरफराज मुजाहिरी ने कहा कि  अल्लाह के रास्ते में एक अहम फरीजा हज है, जिसे हर साहेबे निशाब को अदा करना चाहिए। उन्होंने कहा कि इस्लाम के पांच फर्ज में से एक फर्ज हज है। बाकी चार फर्ज कलमा, रोजा, नमाज और जकात है। 

उन्होंने कहा कि मजहबी मान्यताओं के मुताबिक शारीरिक और आर्थिक रूप से सक्षम हर मुसलमान को अपनी जिंदगी में काम से कम एक बार इस फर्ज को निभाने का दायित्व है। आधिकारिक तौर पर हज की शुरुआत इस्लामिक महीने ज़िल-हिज की आठ तारीख़ से होती है। आठ तारीख़ को हाजी मक्का से क़रीब 12 किलोमीटर दूर मीना शहर जाते हैं। आठ की रात हाजी मीना में गुज़ारते हैं और अगली सुबह यानी नौ तारीख़ को अराफ़ात के मैदान पहुंचते हैं। 

जहां हज यात्री अराफ़ात के मैदान में खड़े होकर अल्लाह को याद करते हैं और उनसे अपने गुनाहों की माफ़ी मांगते हैं। शाम को हाजी मुज़दलफ़ा शहर जाते हैं और नौ तारीख़ की रात में वहीं रहते हैं। दस तारीख़ की सुबह यात्री फिर मीना शहर लौटते हैं। उन्होंने कहा कि उसके बाद वो एक ख़ास जगह पर जाकर सांकेतिक तौर पर शैतान को पत्थर मारते हैं, उसे जमारात कहा जाता है। 

शैतान को पत्थर मारने के बाद हाजी एक बकरे या भेड़ की कुर्बानी देते हैं। उसके बाद मर्द अपना सिर मुंडवाते हैं और महिलाएं अपना थोड़े से बाल काटती हैं। उन्होंने कहा कि उसके बाद यात्री मक्का वापस लौटते हैं और क़ाबा के सात चक्कर लगाते हैं जिसे धार्मिक तौर पर तवाफ़ कहा जाता है। इसी दिन यानी ज़िल-हिज की दस तारीख़ को पूरी दुनिया के मुसलमान ईद-उल-अज़हा या बक़रीद का त्योहार मनाते हैं। 

कार्यक्रम के अंत में इमाम साहब ने सामूहिक दुआ कराई और हज की कामयाबी और देश तथा राज्य की तरक्की के लिए दुआ किया। कार्यक्रम में पत्रकार मो. आरिफ अंसारी, मो. असलम, मो. इमरान, मो. इफ्तिखार, अली हसन इमाम, मो. हबीब, मो. शाहिद, हाफिज सरफराज, मो. इरशाद, मो. नसीम,मो. सलीम, मो.रियाज,मो.जिशान सहित काफी संख्या में लोग मौजूद थे।

विज्ञापन