पर्यूषण महापर्व के आज तीसरे दिवस मे यत्न दिवस पर छोटे-छोटे कर्मों में सजगता और समभाव का संदेश
टीम एबीएन, रांची। पर्यूषण महापर्व के तीसरे दिवस यत्न दिवस के अवसर पर श्री साधुमार्गी जैन संघ, रांची द्वारा आयोजित धार्मिक कार्यक्रम में स्वाध्यायी जी ने जीवन में प्रत्येक छोटे-बड़े कार्य को सजगता और सकारात्मक भाव से करने का संदेश दिया। उन्होंने कहा कि छोटे-छोटे कर्मों में भी यत्न रखना आवश्यक है। आलस्य और प्रमाद एक ही रूप हैं। यदि हम अपने कार्यों को खुशी और कर्तव्य भावना से करते हैं तो कर्मबंधन को दूर करने की दिशा में आगे बढ़ते हैं। उन्होंने कहा कि जीवन में कार्य मजबूरी से नहीं, मंजूरी और प्रसन्नता से होना चाहिए।
स्वाध्यायी जी ने कहा कि हम किसी कार्य को किस भाव से करते हैं, उसका प्रभाव हमारे जीवन पर पड़ता है। उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि यदि कोई व्यक्ति भोजन बनाते समय अच्छे और सकारात्मक भाव रखता है तो उस भोजन को ग्रहण करने वाले पर भी उसका अच्छा प्रभाव पड़ता है। उन्होंने माता-पिता के महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि वे लोग अत्यंत सौभाग्यशाली हैं, जिन्हें माता-पिता का सान्निध्य प्राप्त है।
प्रत्येक व्यक्ति को प्रात: माता-पिता का आशीर्वाद अवश्य लेना चाहिए। उन्होंने कहा कि यदि हम अपने बच्चों को श्रवण कुमार जैसा बनाना चाहते हैं तो सबसे पहले अपने जीवनसाथी को श्रवण कुमार के आदर्शों पर चलने वाला बनाना होगा। उन्होंने यह भी कहा कि अपने कर्मों और परिस्थितियों को समभाव से एवं विनयपूर्वक स्वीकार करना चाहिए।
अंत:गड़ सूत्र में गजसुकुमाल मुनि के अद्भुत समभाव का प्रसंग:- अंत:गड़ सूत्र के वाचन को आगे बढ़ाते हुए स्वाध्यायी जी ने गजसुकुमाल मुनि के जीवन और उनकी अद्भुत सहनशीलता का मार्मिक प्रसंग सुनाया:- उन्होंने बताया कि जब माता देवकी की ममता उमड़ने लगी तो उन्होंने कृष्ण से कहा कि उन्होंने कभी अपने किसी बच्चे की बाल-क्रीड़ा का आनंद नहीं लिया। माता की इच्छा पूर्ण करने के लिए कृष्ण वासुदेव ने तपस्या की!
इसके फलस्वरूप देवता के प्रकट होने पर उन्होंने देवकी माता के लिए पुत्र की कामना की, देवकी माता को एक पुत्र की प्राप्ति हुई, जिसका नाम गजसुकुमाल रखा गया। बड़े होने पर गजसुकुमाल ने भगवान अरिष्टनेमी के पास दीक्षा ग्रहण कर ली। दीक्षा के उसी दिन उन्होंने भगवान से आज्ञा लेकर रात्रि में घोर श्मशान में जाकर कायोत्सर्ग ध्यान किया—अर्थात अचल खड़े होकर आत्मा के चिंतन में लीन हो गए।
उसी रात उनके होने वाले ससुर सोमशर्मा वहां से गुजरे। मुनि वेश में अपने होने वाले दामाद को देखकर वे क्रोधित हो उठे। उन्हें लगा कि गजसुकुमाल ने विवाह से पीछे हटकर उनकी पुत्री सोमा का जीवन बर्बाद कर दिया है। प्रतिशोध की भावना में सोमशर्मा ने श्मशान की गीली मिट्टी से गजसुकुमाल मुनि के सिर पर पाल बनाई और उसमें जलते हुए दहकते अंगारे रख दिये। इतनी भीषण पीड़ा के बावजूद गजसुकुमाल मुनि अपने आत्मस्वरूप से तनिक भी विचलित नहीं हुए।
उन्होंने अपने ससुर के प्रति मन में रत्ती भर भी क्रोध या द्वेष नहीं आने दिया और पूर्ण क्षमा एवं समभाव बनाये रखा। वे शुक्लध्यान में लीन हो गये। इसी अद्वितीय समता और क्षमा भाव के कारण देह के पूरी तरह जलने से पूर्व ही उन्होंने अपने समस्त कर्मों का क्षय कर केवलज्ञान प्राप्त किया और उसी रात मोक्ष को प्राप्त हुए। स्वाध्यायी जी ने इस प्रसंग के माध्यम से बताया कि वास्तविक साधना बाहरी परिस्थितियों को बदलना नहीं, बल्कि विपरीत परिस्थितियों में भी अपने मन को शांत, क्षमाशील और समभाव में रखना है।
कार्यक्रम में श्री विमल जी दस्सानी ने मन को शांत रखने की प्रेरणा देने वाला एक सुंदर गीत प्रस्तुत किया साथ ही पाक्षिक के उपलक्ष्य में श्री साधुमार्गी जैन संघ, रांची द्वारा सामूहिक एकासना का आयोजन 11 सितंबर 2026 शुक्रवार को दोपहर 1 बजे किया जा रहा है। संघ की ओर से अधिकाधिक श्रावक-श्राविकाओं से इसमें सहभागी बनने का आह्वान किया गया है।
इन दिनों छोटेलाल चोरड़िया, विशाल दस्सानी, खुशबू दस्सानी एवं ममता पींचा का तीन दिन का उपवास गतिमान है। आज के कार्यक्रम में मोहनलाल पींचा, चंदन कोठारी, राकेश बच्छावत, भास्कर पींचा, विकाश सुराणा, तेरापंथ सभा रांची के अध्यक्ष अमर चंद बेगानी, मंत्री विनोद बेगवानी एवं उपाध्यक्ष लालचंद बोथरा सहित बड़ी संख्या में श्रावक-श्राविकाएं उपस्थित रहे। उक्त जानकारी उत्तम जैन ने दी।