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अध्ययन : कोरोना टीका न लेनेवालों में 22 फीसदी की मौत

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अध्ययन : कोरोना टीका न लेनेवालों में 22 फीसदी की मौत
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एबीएन सेंट्रल डेस्क। देश के 37 अस्पतालों ने पहली बार डेल्टा बनाम ओमिक्रॉन स्वरूप के असर पर किया गया चिकित्सीय अध्ययन पूरा हो गया। इसके अनुसार टीका न लेने वाले संक्रमित मरीजों में 22 फीसदी की मौत हुई है जिनमें से 83 फीसदी संक्रमण की चपेट में आने से पहले किसी न किसी बीमारी से पीड़ित थे। इसके अलावा टीके की दोनों खुराक लेने वालों में मृत्युदर 10 फीसदी दर्ज की गई। हालांकि इनमें 91 फीसदी में पहले से ही कोई न कोई बीमारी थी। भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (आईसीएमआर) के महानिदेशक डॉ बलराम भार्गव ने बृहस्पतिवार को प्रेस कान्फ्रेंस में बताया, टीकाकरण के बाद इस तीसरी लहर में कोरोना की चपेट में आए मरीजों को जब अस्पतालों में भर्ती किया गया तो उपचार के दौरान 10.20 फीसदी की मौत हुई। इनकी केस हिस्ट्री देखी गई तो पता चला कि 91 फीसदी मृतकों को संक्रमण से पहले कोई न कोई बीमारी थी। वहीं अस्पतालों में 21.80 फीसदी मौतें टीकाकरण न कराने वालों की हुई हैं। जिनमें 83 फीसदी को पहले से कोई न कोई बीमारी थी। इस अध्ययन को जल्द ही मेडिकल जर्नल में प्रकाशित किया जाएगा। ओमिक्रॉन का कम आयु वालों पर अधिक असर : ओमिक्रॉन का कम आयु वालों पर अधिक असर देखने को मिला है। पिछले साल 15 नवंबर से 15 दिसंबर और 16 दिसंबर से 17 जनवरी 2022 के बीच 37 अस्पतालों में डेल्टा और ओमिक्रॉन का असर जानने के लिए यह अध्ययन हुआ है। 15 नवंबर से 15 दिसंबर 2021 के बीच इन अस्पतालों में 564 मरीज भर्ती हुए थे। जबकि 16 दिसंबर 2021 से 17 जनवरी 2022 के बीच 956 मरीज भर्ती हुए। इन दोनों के बीच अंतर देखें तो डेल्टा संक्रमित मरीजों की आयु 18 से 55 वर्ष के बीच देखी गई। वहीं ओमिक्रॉन में 20 से 43 वर्ष के बीच मरीजों की आयु मिली। इसके अलावा डेल्टा संक्रमित मरीजों में से 66.1 फीसदी में सह रोग पहले से थे लेकिन ओमिक्रॉन वैरिएंट से संक्रमित मरीजों में 45.80 फीसदी में सहायक रोग पहले से मिले। इसी तरह डेल्टा की वजह से बुखार, कफ सबसे आम लक्षण थे लेकिन ओमिक्रॉन की लहर में सबसे अधिक गले में खराश, दर्द लक्षण देखने को मिला। स्वास्थ्य मंत्रालय के संयुक्त सचिव लव कुमार अग्रवाल ने दिल्ली एम्स के चिकित्सीय अध्ययन का हवाला देते हुए बताया कि देश में अब कोरोना संक्रमित मरीजों में ऑपरेशन का जोखिम कम हुआ है। लव अग्रवाल ने बताया कि साल 2020 में जब कोरोना महामारी आई तो उस दौरान संक्रमित रोगियों के ऑपरेशन रोकने पड़े थे। उसके बाद यह भी देखने को मिला कि ऑपरेशन के सात सप्ताह बाद मरीज का जोखिम भी बढ़ा है लेकिन हाल ही में दिल्ली एम्स ने अध्ययन पूरा किया है जिसमें पता चला है कि 20 दिसंबर 2021 से 20 जनवरी 2022 के बीच 53 मरीजों का ऑपरेशन किया गया और इनमें से किसी में भी जोखिम नहीं मिला है। ऐसे में अब यह कहा जा सकता है कि कोरोना संक्रमित के ऑपरेशन को टालने की आवश्यकता नहीं है। जरूरत पड़ने पर इन रोगियों की सर्जरी की जा सकती है।
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